यह एक सुन्दर अनुभूति है कि माँ गंगा की अविरलता एवं निर्मलता की पुनप्र्रतिष्ठा की दिशा में भारत सरकार एवं उत्तर प्रदेश सरकार के साथ ही देश के लोकतन्त्र के प्रहरी मा॰ सर्वाेच्च न्यायालय के द्वारा पहल की जा चुकी है। भारत सरकार गंगा को अविरल एवं निर्मल बनाने हेतु प्रत्येक नगर के स्थानीय मुद्दों का अध्ययन करा रही है ताकि भावी कार्यक्रम तैयार किए जा सके।
गंगा के किनारे लगभग 118 कस्बे व शहर तथा 1632 गाँव हैं। गंगा में गिरने वाली 80 प्रतिशत गंदगी शहरों से तथा 20 प्रतिशत गंदगी औद्योगिक इकाइयों से आती है। गाँवों की गंदगी गंगा में न जाय इसके लिए गाँवों में विशेष डिजाइन के आधुनिक शौचालय बनाने की भी योजना है।
उल्लेखनीय है कि मा॰ उच्च न्यायालय, इालाहाबाद के द्वारा वर्ष 2008 से सुनवाई के क्रम में लगभग 80 आदेश दिये जा चुके हैं, जिनमें मुख्य हैं - गंगा के दोनों ओर 200 मीटर तक पालीथीन पर प्रतिबन्धि, अविरल गंगा के लिए गंगा में पर्याप्त पानी, गंगा में गंदगी फैलाने वाली चमड़ा इकाइयों को कहीं अन्यत्र स्थानान्तरित करना, नदियों में मूर्ति विसर्जन, नालों व सीवेज बहाने पर रोक। परन्तु मा॰ उच्च न्यायालयों के आदेशों को लागू करने में प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड सहित सरकारी तंत्र अब तक पूरी तरह से नाकाम रहा है।
अन्ततः मा॰ सर्वोच्च न्यायालय ने गंगा सफाई पर सख्ती दिखाते हुए गंगा नदी को प्रदूषित करने वाली औद्योगिक इकाइयों पर लगाम न कसने पर केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण परिषद एवं राज्य प्रदूषण नियंत्रण परिषदों को कड़ी फटकार लगाई तथा तीन दशकों के प्रयासों एवं न्यायालय के निर्णयों के बावजूद गंगा के दिन-प्रतिदिन प्रदूषित होते जाने पर भी न्यायालय ने अफसोस जताया है। नियंत्रण परिषदों की निष्क्रियता एंव विफलता से क्षुब्ध हो न्यायालय ने गुनाहगारों पर कार्यवाही का दायित्व राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण (नैशनल ग्रीन ट्रिबुनल) को सौंप दिया तथा कहा है कि गंगा को प्रदूषित करने वाली अति प्रदूषित 17 श्रेणियों की औद्योगिक इकाइयों पर कार्यवाही करें, बिजली-पानी बन्द करने सहित सभी तरह की कार्यवाही करने की छूट दे दी है। यदि इन इकाइयों से प्रदूषण आना बन्द हो तोे 30 प्रतिशत प्रदूषण स्वतः समाप्त हो जाएगा। प्राधिकरण को प्रत्येक छः माह में अपनी अन्तरिम रिर्पोट प्रस्तुत करना है।
राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण ने गंगा में गंदगी डालने पर सिंम्भावली चीनी मिल पर पाँच करोड़ रूपये का जुर्माना लगाने के बाद अब केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण परिषद एवं प्रदेशों के राज्य प्रदूषण नियंत्रण परिषदों को आदेश दिया कि ऐसे उद्योगों के परिसरों में जाकर इस बात की पड़ताल करें कि वहाँ पर प्रदूषण रोकने वाले उपकरण लगे हैं या नहीं। केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण परिषद प्राधिकरण के आदेशों पर गंगा को प्रदूषित करने वाले 764 औद्योगिक इकाइयों की श्रेणीवार सूची अपनी वेब साइट पर प्रकाशित कर चुका है। निसंदेह उद्योग भी जरूरी हैं, लेकिन गंगा की निर्मलता की कीमत पर नहीं।
उत्तर प्रदेश सरकार ने प्रदेश में हरियाली, भूगर्भ एवं पर्यावरण संरक्षण हेतु विगत दिनों एक शासनादेश जारी किया है जिसमे अन्य बातों के साथ यह भी शामिल किया है - नदियों के किनारे बसे शहरों में जो-जो नाले सीधे नदियों में मिलते हैं, उनके डायवर्जन के लिए नगर निगम, जल निगम, सिंचाई विभाग से समन्वय स्थापित कर नालों को नदी में गिरने से रोका जाय। एस॰टी॰पी॰ निर्माण ऐसी जगह पर किया जाय जहाँ प्लान्ट से निकलने वाला शोधित जल कृषि एवं बागवानी के उपयोग में लाया जा सके। जल, मल, घरेलू अपशिष्ट के नदियांे में निस्तारण को प्रतिबन्धित किया जा सके। नदियों के बाढ़ क्षेत्र को संवेदनशील क्षेत्र घोषित किया जाय तथा ऐसे क्षेत्रों में निर्माण प्रतिबन्धित किया जाय। प्रदेश में बहने वाली गंगा, यमुना, गोमती, राप्ती, रामगंगा, हिण्डन, बेतवा, घाघरा आदि नदियों की अविरलता एवं निर्मलता को अक्षुण्य बनाने में पूर्व शासनादेश मील का पत्थर सिद्ध हो सकते हैं, बशर्ते इसका पूर्ण निष्ठा के साथ अनुपालन हो।
इस प्रकार गंगा की अविरलता एवं निर्मलता सुनिश्चित करने के लिए भारत सरकार मा॰ उच्च न्यायालय एवं मा॰ सर्वोच्च न्यायालय, राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण, राज्य सरकार अपने-अपने कार्य क्षेत्र में सक्रिय हैं तो ऐसी स्थिति में स्वयं सेवी सामाजिक संगठनों, गंगा से सम्बन्धित सभी हितग्राहियों का यह दायित्व है कि अपने-अपने स्तर से गंगा को अविरल एवं निर्मल बनाने हेतु तन से, मन से, धन से जुट जाँय, ताकि सभी को शुद्ध पेय जल मिले, कृषि उन्नति करे, जैवविविधता की रक्षा हो सके, सभी प्रकार से प्रदूषण से मुक्ति मिले। ु
- रामशरण
गंगा के किनारे लगभग 118 कस्बे व शहर तथा 1632 गाँव हैं। गंगा में गिरने वाली 80 प्रतिशत गंदगी शहरों से तथा 20 प्रतिशत गंदगी औद्योगिक इकाइयों से आती है। गाँवों की गंदगी गंगा में न जाय इसके लिए गाँवों में विशेष डिजाइन के आधुनिक शौचालय बनाने की भी योजना है।
उल्लेखनीय है कि मा॰ उच्च न्यायालय, इालाहाबाद के द्वारा वर्ष 2008 से सुनवाई के क्रम में लगभग 80 आदेश दिये जा चुके हैं, जिनमें मुख्य हैं - गंगा के दोनों ओर 200 मीटर तक पालीथीन पर प्रतिबन्धि, अविरल गंगा के लिए गंगा में पर्याप्त पानी, गंगा में गंदगी फैलाने वाली चमड़ा इकाइयों को कहीं अन्यत्र स्थानान्तरित करना, नदियों में मूर्ति विसर्जन, नालों व सीवेज बहाने पर रोक। परन्तु मा॰ उच्च न्यायालयों के आदेशों को लागू करने में प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड सहित सरकारी तंत्र अब तक पूरी तरह से नाकाम रहा है।
अन्ततः मा॰ सर्वोच्च न्यायालय ने गंगा सफाई पर सख्ती दिखाते हुए गंगा नदी को प्रदूषित करने वाली औद्योगिक इकाइयों पर लगाम न कसने पर केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण परिषद एवं राज्य प्रदूषण नियंत्रण परिषदों को कड़ी फटकार लगाई तथा तीन दशकों के प्रयासों एवं न्यायालय के निर्णयों के बावजूद गंगा के दिन-प्रतिदिन प्रदूषित होते जाने पर भी न्यायालय ने अफसोस जताया है। नियंत्रण परिषदों की निष्क्रियता एंव विफलता से क्षुब्ध हो न्यायालय ने गुनाहगारों पर कार्यवाही का दायित्व राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण (नैशनल ग्रीन ट्रिबुनल) को सौंप दिया तथा कहा है कि गंगा को प्रदूषित करने वाली अति प्रदूषित 17 श्रेणियों की औद्योगिक इकाइयों पर कार्यवाही करें, बिजली-पानी बन्द करने सहित सभी तरह की कार्यवाही करने की छूट दे दी है। यदि इन इकाइयों से प्रदूषण आना बन्द हो तोे 30 प्रतिशत प्रदूषण स्वतः समाप्त हो जाएगा। प्राधिकरण को प्रत्येक छः माह में अपनी अन्तरिम रिर्पोट प्रस्तुत करना है।
राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण ने गंगा में गंदगी डालने पर सिंम्भावली चीनी मिल पर पाँच करोड़ रूपये का जुर्माना लगाने के बाद अब केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण परिषद एवं प्रदेशों के राज्य प्रदूषण नियंत्रण परिषदों को आदेश दिया कि ऐसे उद्योगों के परिसरों में जाकर इस बात की पड़ताल करें कि वहाँ पर प्रदूषण रोकने वाले उपकरण लगे हैं या नहीं। केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण परिषद प्राधिकरण के आदेशों पर गंगा को प्रदूषित करने वाले 764 औद्योगिक इकाइयों की श्रेणीवार सूची अपनी वेब साइट पर प्रकाशित कर चुका है। निसंदेह उद्योग भी जरूरी हैं, लेकिन गंगा की निर्मलता की कीमत पर नहीं।
उत्तर प्रदेश सरकार ने प्रदेश में हरियाली, भूगर्भ एवं पर्यावरण संरक्षण हेतु विगत दिनों एक शासनादेश जारी किया है जिसमे अन्य बातों के साथ यह भी शामिल किया है - नदियों के किनारे बसे शहरों में जो-जो नाले सीधे नदियों में मिलते हैं, उनके डायवर्जन के लिए नगर निगम, जल निगम, सिंचाई विभाग से समन्वय स्थापित कर नालों को नदी में गिरने से रोका जाय। एस॰टी॰पी॰ निर्माण ऐसी जगह पर किया जाय जहाँ प्लान्ट से निकलने वाला शोधित जल कृषि एवं बागवानी के उपयोग में लाया जा सके। जल, मल, घरेलू अपशिष्ट के नदियांे में निस्तारण को प्रतिबन्धित किया जा सके। नदियों के बाढ़ क्षेत्र को संवेदनशील क्षेत्र घोषित किया जाय तथा ऐसे क्षेत्रों में निर्माण प्रतिबन्धित किया जाय। प्रदेश में बहने वाली गंगा, यमुना, गोमती, राप्ती, रामगंगा, हिण्डन, बेतवा, घाघरा आदि नदियों की अविरलता एवं निर्मलता को अक्षुण्य बनाने में पूर्व शासनादेश मील का पत्थर सिद्ध हो सकते हैं, बशर्ते इसका पूर्ण निष्ठा के साथ अनुपालन हो।
इस प्रकार गंगा की अविरलता एवं निर्मलता सुनिश्चित करने के लिए भारत सरकार मा॰ उच्च न्यायालय एवं मा॰ सर्वोच्च न्यायालय, राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण, राज्य सरकार अपने-अपने कार्य क्षेत्र में सक्रिय हैं तो ऐसी स्थिति में स्वयं सेवी सामाजिक संगठनों, गंगा से सम्बन्धित सभी हितग्राहियों का यह दायित्व है कि अपने-अपने स्तर से गंगा को अविरल एवं निर्मल बनाने हेतु तन से, मन से, धन से जुट जाँय, ताकि सभी को शुद्ध पेय जल मिले, कृषि उन्नति करे, जैवविविधता की रक्षा हो सके, सभी प्रकार से प्रदूषण से मुक्ति मिले। ु
- रामशरण





