जब कोई कहता है कि, ‘भारत गांव में बसता है’ तो, इसका अर्थ होता है भारत ‘गाँव-संस्कृति’ में बसता है और ‘गाँव-संस्कृति’ का मूलाधार हमारी ‘परिवार-व्यवस्था’ है, जिसका व्यापक व व्यावहारिक स्वरूप ‘हमारे गांँव’ हैं। हमारे पूर्वजों नें अपने इन्हीं वैशिष्ट्य के बल पर ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ का उद्घोष किया था, जो आज के ‘ग्लोवलाइजेशन’ की शोषणकारी बाजारवादी-व्यवस्था से विश्व को मुक्ति दिलाकर, मानवातावादी-संसार का सृजन कर सकती है। यह कार्य ‘भारत’ से ही सिद्ध होगा, ‘इण्डिया’ से नहीं।
इस निमित्त नियोजित व व्यापक जागरूकता अभियान के साथ उसकी व्यावहारिक कार्ययोजना बनाकर कार्य करने की आवश्यकता है। उसी दिशा में एक साकार कदम - ‘‘मेरा गाँव-मेरा तीर्थ’’ योजना है।
‘मेरा गाँव-मेरा तीर्थ’ अभियान की आवश्यकता क्यों?-
मेरा गाँव-मेरा तीर्थ’ योजना पर विचार करने से पूर्व पहले यह समझने की आवश्यकता है कि भारतीय संस्कृति का मूलाधार हमारी परिवार व्यवस्था और उसका व्यापक व व्यावहारिक स्वरूप ‘गाँव’ की आज के समय में क्या स्थिति है? क्या आज हमारे गाँवों में उस ग्राम संस्कृति का वह पे्ररक स्वरूप विद्यमान है, जिसकी हमें व विश्व की भावी पीढ़ी को आवश्यकता है?
किसी विचार व दर्शन को अपने व्यावहारिक जीवन में जाज्वल्यमान रूप में स्थापित करने के लिए शतत् जीवन प्रकिृया की आवश्यकता होती है, जिसका सृजन हमारे पूर्वजों ने बड़े विधि-विधान से किया और उसे अपने जीवन में ऐसे जिया कि, जिसके बल पर भारत ‘आध्यात्मिक’ परम उन्नति के साथ ही भौतिक व आर्थिक ंऊँचाइयों में‘ ‘सोने की चिडि़या’ कहलाया और चीनी यात्री ‘ह्वेनसांग’ जिसे देख मन्त्र-मुग्ध हो गया।
कालचक्र की गति ने भारत की उन विशेषताओं पर परदा डाल दिया। स्वतन्त्रता के पश्चात् पुनः जागृत भारतीय समाज को आज की परिस्थिति में चमत्कृत-विश्व की चुनातियों को स्वीकार करते हुए अपने को सिद्ध करने और विश्व के समक्ष उपस्थित अनेक विषम परिस्थितियों से उन्हें मुक्ति का मार्ग दिखाने का सुयोग दिया है, जिसमें हमें सफल होना है।
भारत के गाँववासी इस संघर्षपूर्ण-बेला में अपने आप को टिकाने और आगे बढ़ने के लिए गाँव से शहर जाते थे और वहांँ तात्कालीन आवश्यकताओं के लिए एक किराये का अथवा स्वयं का मकान रखतेे थे। किन्तु, उस समय शहर के उस मकान में वह सशरीर रहते हुए भी, उनकी आत्मा सदैव अपने गाँव के अपने ‘घर’ में ही बसती थी। परन्तु, धीरे-धीरे परिस्थितिवश समय की आवश्यकताओं से विवश गाँववासी समाज ने शहर में ‘घर’ बनाना प्रारम्भ कर दिया और अब गाँव में केवल ‘मकान’ ही शेष बच रहे हैं। इससे गाँव की बुद्धि और सार्मथ्य (बे्रन एण्ड पावर)’ गाँवों से शहर की ओर भागने लगी, शहरों का विस्तार होने लगा, जिसके दुस्परिणाम गाँव की आज समस्त व्यवस्थाओं में दिखाई पड़ते हैं।
क्योकि, बुद्धि और विवेक के बल पर ही पुरातन, सनातन बनता है और बुद्धि के बल पर ही नये-नये आविस्कार होते हैं, जिनका बुद्धि एवं विवेकपूर्ण उपयोग से पुरातन के सनातन को आधुनिकतम परिवेश में भी सर्वकालिक सार्थक व सर्वोपयोगी बनाये रखने की सार्मथ्य रहती है। आज उस बुद्धि-विवेक और सार्मथ्य को जगाकर भारत की उस गौरवमयी गाँव-संस्कृति को पुनप्र्रकाशित करने की आवश्यकता है, जो काल-चक्र के प्रवाह में ओझल हो रही थी, परन्तु अधुनातन विश्व के लिए जो आज भी आवश्यक है।
गाँव संस्कृति क्या है?-
गाँव अनेक परिवारों की वह संयुक्त इकाई है, जिसमें पूरा गाँव एक परिवार की भाँति जीवन-यापन करता है। जिसकी मूलभूत विशेषतायें इस प्रकार हैं -
1. गाँव के सभी निवासी सामन्य रूप से एक-दूसरे को जानते हैं तथा एक-दूसरे के सुख-दुख में सहज रूप से सहभागी होते हैं।
2. गाँव में अधिकांश परिवारिक व सामाजिक कार्य सहकारिता के आधार पर सम्पन्न होने की परम्रागत सु-व्यवस्थायें थीं।
3. सभी एक दूसरे का आदर करते थे।
4. जाति भेद से ऊपर उठकर परिवारिक सम्बोधन चाचा, ताऊ, चाची, आदि होता था।
5. गाँव की आवश्यकता के अनुकूल कुशल कारीगर गाँव में ही उपलब्ध होते थे।
6 विशेष अवसरों पर सभी प्रवासी गाँववासी गाँव में उपस्थि होते थे, जिसमें उन्हें अनन्दानुभूति होती थी।
7. गाँव की बहन-बेटी पूरे गाँव की बहन-बेटी होती थी, जिसके प्रति उसके गाँव में रहते, उसके विवाह और उसके विवाहोपरान्त उसकी ससुराल तक बहन-बेटी का व्यवहार होता था।
8. गाँव का अपना एक देवस्थान होता था, जिसके प्रति पूरे गाँव की आस्था तथा वहाँ पर मुण्डन आदि पारिवारिक संस्कार करने की मान्यता थी।
9. गाँव में कोई व्यक्ति एकाकी, असहाय अवस्था में नहीं रहता था, जिसके विषय में किसी को कोई सुध न हो।
आज एक सुअवसर -
- आपको, अपने पूर्वजों व अपने गाँव का ऋण उतारने, अपनी नई पीढ़ी को अपनी जड़ों से जोड़ने और अपने राष्ट्र व समाज के लिए कुछ करने का सुअवसर है।
- यह कार्य करते समय किसी स्वार्थ या किसी व्यक्तिगत लाभ से मुक्त होना, सफलता की कुँजी है।
- जिनके बीच में कार्य करना है, सबसे पहले उनके मन में अपने प्रति विश्वास पैदा हो, ऐसे निर्विवाद व सहज कार्य हाथ में लें।
- कोई भी कार्य असम्भव नहीं है, यदि उसे संकल्प व मनोयोग से किया जाये।
- आपको जो सबसे छोटा व सुगम कार्य लगता हो या आपकी जिसमें रूचि हो, वहीं से एक कदम आगे बढ़ायें, मार्ग तो अपने आप मिल जायेगा।
‘मेरा गाँव-मेरा तीर्थ’ की कार्य योजना -
1. जो बुद्धि-विवेक और सार्मथ्य गाँव से पलायन कर शहरों में रहने लगी है, उसे जागृत कर आज की आवश्यकता, चुनौती और उसमें उनकी भूमिका का बोध कराया जाये तथा उस दिशा में सार्थक परिणाम के लिए कृतसंकल्पित होकर कार्य करने के लिए पे्ररित किया जाये।
2. वह आज जिस शहरी व्यवस्था में, जिस कालोनी में निवास कर रहे हैं, वहाँ पर ‘गाँव-संस्कृति’ के विकास हेतु कार्ययोजना बने और उसे क्रियान्वित किया जाये।
3. जो गाँववासी, अभी गाँव नहीं जा रहे, वह गाँव जायें। जो जाते हैं, पर वहांँ रूकते नहीं, वह वहांँ, रूकें। जो जाते हैं और रूकते भी हैं, वे गाँव व गाँव-संस्कृति के लिए कुछ कार्य प्रारम्भ करें।
4. बुद्धि-विवेक और सार्मथ्य के धनी शहर-निवासी बन चुके गाँववासी अपने गाँव में पुनः जायें और वहाँ एक प्रेरणा का दीप जलायें, जिससे प्रकाश लेकर गाँव की भावी पीढ़ी शिक्षा, रोजगार, नौकरी या अन्य आवश्यकताओं के लिए गाँव से शहर जायें पर अपने ‘घर’ सहित नहीं।
5. राजनैतिक क्षेत्र के लोग शासन की ऐसी नीतियाँ बनाने में योगदान करें, जिससे गाँव उन सभी आवश्यक सुविधाओं से युक्त हों, जिनके अभाव में गाँव से शहर की ओर पलायन होता है।
6. प्रशासनिक क्षेत्र के लोग उन योजनाओं के क्रियान्वयन में उस कुशलता का परिचय दें जिससे गाँव के बुद्धि-विवेक व सार्मथ्य का पलायन रूके।
7. सामाजिक कार्यकर्ताओं व गाँव के समर्थ समाज का दायित्व बनता है, कि वह गाँव में पनपी उन कुरीतियों, परम्पराओं, व्यवस्थाओं में सुधार के लिए कार्य करें, जिनके कारण गाँव का सामान्य वर्ग जो ह्नदय से तो गाँव को चाहता है, लेकिन मजबूरीवश उसे अपना गाँव छोड़ना पड़ता है।
8. ऐसे लोग, जो गाँव के रहने वाले नहीं हेैं, पर गाँव संस्कृति का महत्व समझते हेैं, वे अपनी क्षमता, सामथ्र्य और योग्यता से गाँव की उन व्यवस्थाओं, संसाधनों के विकास मंे योगदान करें, जिनके अभाव में गाँव का ‘बुद्धि-विवेक’ गाँव से पलायन के लिए मजबूर होता है।
9. उद्योग जगत के लोग लघु व कुटीर उद्योग गाँव में लगायें जिससे गाँव की युवा पीढ़ी को शहर के स्थान पर गाँव में ही आजीविका मिल जाये और वह शहर की ओर पलायन से बच जायंे।
मेरा गाँव-मरा तीर्थ’ अभियान हेतु करणीय कार्य अ) शहर में गाँव-संस्कृति विकास कार्यक्रम - शहरी क्षेत्र में गाँव-संस्कृति विकास के लिए निम्न लिखित कार्य व कार्यक्रमों का उपयोग किया जा सकता है -
1. वर्ष में किसी अनुकूल अवसर पर कोई एक धर्मिक, सामाजिक, सांस्कृतिक कार्यक्रम का आयोजन हो, जिसमें पूरी कालोनी का सहयोग व सक्रिय सहभागिता सुनिश्चित हो सके।
2. इस हेतु कालोनी के पार्क में वृक्षारोपण, स्वच्छता व उसके रखरखाव हेतु स्थानीय टीम के साथ कार्य करें।
3. अपने पारिवारिक कार्यक्रमों में कालोनी के लोगों को बुलाना व कार्य दायित्व की जुम्मेदारी भी सौंपना।
4. किसी परिवार के दुख या संकट के समय उसका आवश्यक सहयोग करने व कराने की व्यवस्था।
5. अवकाश प्राप्त व सामाजिक कार्यों हेतु अधिक समय देने में सक्षम व्यक्तियों की गोष्ठियाँ व कार्यशालाऐं आयोजित कर, उसमें आये लागों के सहयोग से टीम का निर्माण।
6. ऐसे कार्यक्रमों का आयोजन, जिनके माध्यम से युवा पीढ़ी में सामाजिक संस्कार विकसित किए जा सकें।
7. ऐसे कार्यक्रम, जिनसे कालोनी के लोगों में सामाजिक कार्यों में अपने तन, मन, धन के उपयोग का भाव जागे।
ब) गाँव के लिए कार्य व कार्यक्रम -
1. जब कभी गाँव जाना हो, तो वहाँ स्कूल के शिक्षकों से मित्र-भाव से मिलकर किसी कक्षा के छात्रों के साथ अपने ज्ञान को उनके स्तर पर बांटें। परिणामतः गाँव के गली-मोहल्ले में बच्चे आपको नमस्ते, प्रणाम आदि अभिवादन अपनेपन के भाव से करने लगेंगे, आप उनके अपने हो जायेंगे।
2. स्कूल में कोई प्रतियोगिता (सुलेख, स्वच्छता, खेलकूद आदि) आयोजित करायें और पुरस्कार (पेन, पेन्सिल-बाक्स आदि) की व्यवस्था करें, जिससे गाँव के बच्चों का लगाव आपके प्रति और बढ़ने लगेगा।
3. गाँव में किसी स्थानीय शिक्षक की खोज कर बच्चों के स्तर को ऊँचा उठाने हेतु शिक्षा-संस्कार या कोचिंग-सेन्टर प्रारम्भ करा सकते हैं, जिससे नई पीढ़ी का भविष्य सुधारने में मदद मिले।
4. गाँव के हाईस्कूल/इन्टर के छात्रों की कौंसलिंग करके उनका व उनके परिवार का भावी शिक्षा हेतु सही मार्गदर्शन कर मदद कर सकते हैं, जिससें वह छात्र आपको जीवन भर याद रखेगा।
5. गाँव में योग्य और समय दे सकने वाले लोगों को प्रेरित करें कि वह विद्यालय में मित्र-भाव से जाकर पढ़ाने में यागदान करें। इससे स्कूल छात्रों, शिक्षकों सहित उन व्यक्तियों का भी बहुत भला होगा।
6. गाँव के शिल्पियों की कार्यकुशलता बढ़ाने व उनकी आय वृद्धि में उनकों प्रशिक्षण, आधुनिक तकनीक व आधुनिक उपकरणों की जानकारी देकर/उपलब्ध कराकर अत्यन्त सहयोगी बन सकते है।
7. शाश्वत खेती, जल प्रबन्धन, पर्यावरण संरक्षण, खाद्यान्न प्रशोधन बागवानी, वानिकी व विपणन आदि विविध कार्यों एवं सरकारी, अर्धसरकारी उपयोगी योजनाओं की जानकारी व उनके प्रशिक्षण में सहयोगी बनकर गाँव के लिए बहुत उपयोगी हो सकते हैं।
8. गाँव के सार्वजनिक स्थल या किसी श्रद्धा-स्थल के पुनर्निमाण अथवा उसके विकास में सहभागी बनकर, पूरे गाँव को एकसूत्र में जोड़ा जा सकता है।
9. किसी पर्व या अन्य किसी शुभ अवसर पर गाँव में एक समारोह आयोजित करे और उसमें गाँव से बाहर गये सभी लोगों को आमन्त्रित करें सभी को अपने कार्य में सहयोगी बना सकते हैं।
10. प्रवासी परिवारों में अपनी भावी पीढ़ी को अपने गाव व अपनी जड़ों से जोड़ने के लिए उनके बच्चों के मुण्डन आदि संस्कार गाँव में कराने की परम्परा उपयोगी सिद्ध हो सकती है।
11. गाँव में रह रही प्रतिभाओं तथा गाँव की प्रवासी प्रतिभाओं का सम्मान समारोह आयोजित कर उन्हें अपने गाँव के लिए कुछ करने की प्रेरणा दी जा सकती है।
12. गाँव में व्याप्त कुरीतियों के प्रति जागरूकता पैदा करने, उनसे मुक्ति के उपाय सुझाने तथा छोटी-छोटी बातों से उत्पन्न होने वाले झगड़ों में मध्यस्थता करके गाँव का बहुत बड़ा हित किया जा सकता है।
13. गाँव या गाँव संस्कृति के लिए कार्य करने वाले या करने क इच्छुक बन्धुओं के लिए ‘माॅडल गाँव’ भ्रमण कार्यक्रम आयोजित करें।
14. गाँव की किसी विशेषता को समझ कर उस कार्य के निमित्त गाँव को माॅडल बनाने में मदद करके, अपने गाँव में एक ‘पे्ररणा-दीप’ जला सकते हैं। ु
इस निमित्त नियोजित व व्यापक जागरूकता अभियान के साथ उसकी व्यावहारिक कार्ययोजना बनाकर कार्य करने की आवश्यकता है। उसी दिशा में एक साकार कदम - ‘‘मेरा गाँव-मेरा तीर्थ’’ योजना है।
‘मेरा गाँव-मेरा तीर्थ’ अभियान की आवश्यकता क्यों?-
मेरा गाँव-मेरा तीर्थ’ योजना पर विचार करने से पूर्व पहले यह समझने की आवश्यकता है कि भारतीय संस्कृति का मूलाधार हमारी परिवार व्यवस्था और उसका व्यापक व व्यावहारिक स्वरूप ‘गाँव’ की आज के समय में क्या स्थिति है? क्या आज हमारे गाँवों में उस ग्राम संस्कृति का वह पे्ररक स्वरूप विद्यमान है, जिसकी हमें व विश्व की भावी पीढ़ी को आवश्यकता है?
किसी विचार व दर्शन को अपने व्यावहारिक जीवन में जाज्वल्यमान रूप में स्थापित करने के लिए शतत् जीवन प्रकिृया की आवश्यकता होती है, जिसका सृजन हमारे पूर्वजों ने बड़े विधि-विधान से किया और उसे अपने जीवन में ऐसे जिया कि, जिसके बल पर भारत ‘आध्यात्मिक’ परम उन्नति के साथ ही भौतिक व आर्थिक ंऊँचाइयों में‘ ‘सोने की चिडि़या’ कहलाया और चीनी यात्री ‘ह्वेनसांग’ जिसे देख मन्त्र-मुग्ध हो गया।
कालचक्र की गति ने भारत की उन विशेषताओं पर परदा डाल दिया। स्वतन्त्रता के पश्चात् पुनः जागृत भारतीय समाज को आज की परिस्थिति में चमत्कृत-विश्व की चुनातियों को स्वीकार करते हुए अपने को सिद्ध करने और विश्व के समक्ष उपस्थित अनेक विषम परिस्थितियों से उन्हें मुक्ति का मार्ग दिखाने का सुयोग दिया है, जिसमें हमें सफल होना है।
भारत के गाँववासी इस संघर्षपूर्ण-बेला में अपने आप को टिकाने और आगे बढ़ने के लिए गाँव से शहर जाते थे और वहांँ तात्कालीन आवश्यकताओं के लिए एक किराये का अथवा स्वयं का मकान रखतेे थे। किन्तु, उस समय शहर के उस मकान में वह सशरीर रहते हुए भी, उनकी आत्मा सदैव अपने गाँव के अपने ‘घर’ में ही बसती थी। परन्तु, धीरे-धीरे परिस्थितिवश समय की आवश्यकताओं से विवश गाँववासी समाज ने शहर में ‘घर’ बनाना प्रारम्भ कर दिया और अब गाँव में केवल ‘मकान’ ही शेष बच रहे हैं। इससे गाँव की बुद्धि और सार्मथ्य (बे्रन एण्ड पावर)’ गाँवों से शहर की ओर भागने लगी, शहरों का विस्तार होने लगा, जिसके दुस्परिणाम गाँव की आज समस्त व्यवस्थाओं में दिखाई पड़ते हैं।
क्योकि, बुद्धि और विवेक के बल पर ही पुरातन, सनातन बनता है और बुद्धि के बल पर ही नये-नये आविस्कार होते हैं, जिनका बुद्धि एवं विवेकपूर्ण उपयोग से पुरातन के सनातन को आधुनिकतम परिवेश में भी सर्वकालिक सार्थक व सर्वोपयोगी बनाये रखने की सार्मथ्य रहती है। आज उस बुद्धि-विवेक और सार्मथ्य को जगाकर भारत की उस गौरवमयी गाँव-संस्कृति को पुनप्र्रकाशित करने की आवश्यकता है, जो काल-चक्र के प्रवाह में ओझल हो रही थी, परन्तु अधुनातन विश्व के लिए जो आज भी आवश्यक है।
गाँव संस्कृति क्या है?-
गाँव अनेक परिवारों की वह संयुक्त इकाई है, जिसमें पूरा गाँव एक परिवार की भाँति जीवन-यापन करता है। जिसकी मूलभूत विशेषतायें इस प्रकार हैं -
1. गाँव के सभी निवासी सामन्य रूप से एक-दूसरे को जानते हैं तथा एक-दूसरे के सुख-दुख में सहज रूप से सहभागी होते हैं।
2. गाँव में अधिकांश परिवारिक व सामाजिक कार्य सहकारिता के आधार पर सम्पन्न होने की परम्रागत सु-व्यवस्थायें थीं।
3. सभी एक दूसरे का आदर करते थे।
4. जाति भेद से ऊपर उठकर परिवारिक सम्बोधन चाचा, ताऊ, चाची, आदि होता था।
5. गाँव की आवश्यकता के अनुकूल कुशल कारीगर गाँव में ही उपलब्ध होते थे।
6 विशेष अवसरों पर सभी प्रवासी गाँववासी गाँव में उपस्थि होते थे, जिसमें उन्हें अनन्दानुभूति होती थी।
7. गाँव की बहन-बेटी पूरे गाँव की बहन-बेटी होती थी, जिसके प्रति उसके गाँव में रहते, उसके विवाह और उसके विवाहोपरान्त उसकी ससुराल तक बहन-बेटी का व्यवहार होता था।
8. गाँव का अपना एक देवस्थान होता था, जिसके प्रति पूरे गाँव की आस्था तथा वहाँ पर मुण्डन आदि पारिवारिक संस्कार करने की मान्यता थी।
9. गाँव में कोई व्यक्ति एकाकी, असहाय अवस्था में नहीं रहता था, जिसके विषय में किसी को कोई सुध न हो।
आज एक सुअवसर -
- आपको, अपने पूर्वजों व अपने गाँव का ऋण उतारने, अपनी नई पीढ़ी को अपनी जड़ों से जोड़ने और अपने राष्ट्र व समाज के लिए कुछ करने का सुअवसर है।
- यह कार्य करते समय किसी स्वार्थ या किसी व्यक्तिगत लाभ से मुक्त होना, सफलता की कुँजी है।
- जिनके बीच में कार्य करना है, सबसे पहले उनके मन में अपने प्रति विश्वास पैदा हो, ऐसे निर्विवाद व सहज कार्य हाथ में लें।
- कोई भी कार्य असम्भव नहीं है, यदि उसे संकल्प व मनोयोग से किया जाये।
- आपको जो सबसे छोटा व सुगम कार्य लगता हो या आपकी जिसमें रूचि हो, वहीं से एक कदम आगे बढ़ायें, मार्ग तो अपने आप मिल जायेगा।
‘मेरा गाँव-मेरा तीर्थ’ की कार्य योजना -
1. जो बुद्धि-विवेक और सार्मथ्य गाँव से पलायन कर शहरों में रहने लगी है, उसे जागृत कर आज की आवश्यकता, चुनौती और उसमें उनकी भूमिका का बोध कराया जाये तथा उस दिशा में सार्थक परिणाम के लिए कृतसंकल्पित होकर कार्य करने के लिए पे्ररित किया जाये।
2. वह आज जिस शहरी व्यवस्था में, जिस कालोनी में निवास कर रहे हैं, वहाँ पर ‘गाँव-संस्कृति’ के विकास हेतु कार्ययोजना बने और उसे क्रियान्वित किया जाये।
3. जो गाँववासी, अभी गाँव नहीं जा रहे, वह गाँव जायें। जो जाते हैं, पर वहांँ रूकते नहीं, वह वहांँ, रूकें। जो जाते हैं और रूकते भी हैं, वे गाँव व गाँव-संस्कृति के लिए कुछ कार्य प्रारम्भ करें।
4. बुद्धि-विवेक और सार्मथ्य के धनी शहर-निवासी बन चुके गाँववासी अपने गाँव में पुनः जायें और वहाँ एक प्रेरणा का दीप जलायें, जिससे प्रकाश लेकर गाँव की भावी पीढ़ी शिक्षा, रोजगार, नौकरी या अन्य आवश्यकताओं के लिए गाँव से शहर जायें पर अपने ‘घर’ सहित नहीं।
5. राजनैतिक क्षेत्र के लोग शासन की ऐसी नीतियाँ बनाने में योगदान करें, जिससे गाँव उन सभी आवश्यक सुविधाओं से युक्त हों, जिनके अभाव में गाँव से शहर की ओर पलायन होता है।
6. प्रशासनिक क्षेत्र के लोग उन योजनाओं के क्रियान्वयन में उस कुशलता का परिचय दें जिससे गाँव के बुद्धि-विवेक व सार्मथ्य का पलायन रूके।
7. सामाजिक कार्यकर्ताओं व गाँव के समर्थ समाज का दायित्व बनता है, कि वह गाँव में पनपी उन कुरीतियों, परम्पराओं, व्यवस्थाओं में सुधार के लिए कार्य करें, जिनके कारण गाँव का सामान्य वर्ग जो ह्नदय से तो गाँव को चाहता है, लेकिन मजबूरीवश उसे अपना गाँव छोड़ना पड़ता है।
8. ऐसे लोग, जो गाँव के रहने वाले नहीं हेैं, पर गाँव संस्कृति का महत्व समझते हेैं, वे अपनी क्षमता, सामथ्र्य और योग्यता से गाँव की उन व्यवस्थाओं, संसाधनों के विकास मंे योगदान करें, जिनके अभाव में गाँव का ‘बुद्धि-विवेक’ गाँव से पलायन के लिए मजबूर होता है।
9. उद्योग जगत के लोग लघु व कुटीर उद्योग गाँव में लगायें जिससे गाँव की युवा पीढ़ी को शहर के स्थान पर गाँव में ही आजीविका मिल जाये और वह शहर की ओर पलायन से बच जायंे।
मेरा गाँव-मरा तीर्थ’ अभियान हेतु करणीय कार्य अ) शहर में गाँव-संस्कृति विकास कार्यक्रम - शहरी क्षेत्र में गाँव-संस्कृति विकास के लिए निम्न लिखित कार्य व कार्यक्रमों का उपयोग किया जा सकता है -
1. वर्ष में किसी अनुकूल अवसर पर कोई एक धर्मिक, सामाजिक, सांस्कृतिक कार्यक्रम का आयोजन हो, जिसमें पूरी कालोनी का सहयोग व सक्रिय सहभागिता सुनिश्चित हो सके।
2. इस हेतु कालोनी के पार्क में वृक्षारोपण, स्वच्छता व उसके रखरखाव हेतु स्थानीय टीम के साथ कार्य करें।
3. अपने पारिवारिक कार्यक्रमों में कालोनी के लोगों को बुलाना व कार्य दायित्व की जुम्मेदारी भी सौंपना।
4. किसी परिवार के दुख या संकट के समय उसका आवश्यक सहयोग करने व कराने की व्यवस्था।
5. अवकाश प्राप्त व सामाजिक कार्यों हेतु अधिक समय देने में सक्षम व्यक्तियों की गोष्ठियाँ व कार्यशालाऐं आयोजित कर, उसमें आये लागों के सहयोग से टीम का निर्माण।
6. ऐसे कार्यक्रमों का आयोजन, जिनके माध्यम से युवा पीढ़ी में सामाजिक संस्कार विकसित किए जा सकें।
7. ऐसे कार्यक्रम, जिनसे कालोनी के लोगों में सामाजिक कार्यों में अपने तन, मन, धन के उपयोग का भाव जागे।
ब) गाँव के लिए कार्य व कार्यक्रम -
1. जब कभी गाँव जाना हो, तो वहाँ स्कूल के शिक्षकों से मित्र-भाव से मिलकर किसी कक्षा के छात्रों के साथ अपने ज्ञान को उनके स्तर पर बांटें। परिणामतः गाँव के गली-मोहल्ले में बच्चे आपको नमस्ते, प्रणाम आदि अभिवादन अपनेपन के भाव से करने लगेंगे, आप उनके अपने हो जायेंगे।
2. स्कूल में कोई प्रतियोगिता (सुलेख, स्वच्छता, खेलकूद आदि) आयोजित करायें और पुरस्कार (पेन, पेन्सिल-बाक्स आदि) की व्यवस्था करें, जिससे गाँव के बच्चों का लगाव आपके प्रति और बढ़ने लगेगा।
3. गाँव में किसी स्थानीय शिक्षक की खोज कर बच्चों के स्तर को ऊँचा उठाने हेतु शिक्षा-संस्कार या कोचिंग-सेन्टर प्रारम्भ करा सकते हैं, जिससे नई पीढ़ी का भविष्य सुधारने में मदद मिले।
4. गाँव के हाईस्कूल/इन्टर के छात्रों की कौंसलिंग करके उनका व उनके परिवार का भावी शिक्षा हेतु सही मार्गदर्शन कर मदद कर सकते हैं, जिससें वह छात्र आपको जीवन भर याद रखेगा।
5. गाँव में योग्य और समय दे सकने वाले लोगों को प्रेरित करें कि वह विद्यालय में मित्र-भाव से जाकर पढ़ाने में यागदान करें। इससे स्कूल छात्रों, शिक्षकों सहित उन व्यक्तियों का भी बहुत भला होगा।
6. गाँव के शिल्पियों की कार्यकुशलता बढ़ाने व उनकी आय वृद्धि में उनकों प्रशिक्षण, आधुनिक तकनीक व आधुनिक उपकरणों की जानकारी देकर/उपलब्ध कराकर अत्यन्त सहयोगी बन सकते है।
7. शाश्वत खेती, जल प्रबन्धन, पर्यावरण संरक्षण, खाद्यान्न प्रशोधन बागवानी, वानिकी व विपणन आदि विविध कार्यों एवं सरकारी, अर्धसरकारी उपयोगी योजनाओं की जानकारी व उनके प्रशिक्षण में सहयोगी बनकर गाँव के लिए बहुत उपयोगी हो सकते हैं।
8. गाँव के सार्वजनिक स्थल या किसी श्रद्धा-स्थल के पुनर्निमाण अथवा उसके विकास में सहभागी बनकर, पूरे गाँव को एकसूत्र में जोड़ा जा सकता है।
9. किसी पर्व या अन्य किसी शुभ अवसर पर गाँव में एक समारोह आयोजित करे और उसमें गाँव से बाहर गये सभी लोगों को आमन्त्रित करें सभी को अपने कार्य में सहयोगी बना सकते हैं।
10. प्रवासी परिवारों में अपनी भावी पीढ़ी को अपने गाव व अपनी जड़ों से जोड़ने के लिए उनके बच्चों के मुण्डन आदि संस्कार गाँव में कराने की परम्परा उपयोगी सिद्ध हो सकती है।
11. गाँव में रह रही प्रतिभाओं तथा गाँव की प्रवासी प्रतिभाओं का सम्मान समारोह आयोजित कर उन्हें अपने गाँव के लिए कुछ करने की प्रेरणा दी जा सकती है।
12. गाँव में व्याप्त कुरीतियों के प्रति जागरूकता पैदा करने, उनसे मुक्ति के उपाय सुझाने तथा छोटी-छोटी बातों से उत्पन्न होने वाले झगड़ों में मध्यस्थता करके गाँव का बहुत बड़ा हित किया जा सकता है।
13. गाँव या गाँव संस्कृति के लिए कार्य करने वाले या करने क इच्छुक बन्धुओं के लिए ‘माॅडल गाँव’ भ्रमण कार्यक्रम आयोजित करें।
14. गाँव की किसी विशेषता को समझ कर उस कार्य के निमित्त गाँव को माॅडल बनाने में मदद करके, अपने गाँव में एक ‘पे्ररणा-दीप’ जला सकते हैं। ु





