Tuesday, November 18, 2014

स्वशासन के 67 वर्ष- कुछ भूलें और कुछ सबक - .डा॰ वेद प्रकाश त्रिपाठी


वर्ष 2014 में 15 अगस्त को स्वतन्त्रता दिवस के समारोह को मनाने के साथ ही हमने स्वतन्त्रता के 67 वर्षो को पूरा कर लिया। यद्यपि 67 वर्ष किसी देश की दृष्टि से बहुत लम्बा समय नहीं होता है, तथापि यह कालावधि किसी राष्ट्र की दृष्टि से बहुत छोटी भी नहीं है। इतने लम्बे कालखण्ड को दृष्टिगत करते हुए यह कहा जा सकता है कि इतनी कालावधि में कम से कम एक पीढ़ी गुजर जाती है या लगभग गुजरने के कगार पर होती है। अतः यह कालावधि किसी भी देश की प्रगति का मूल्यांकन करने हेतु या उस देश में नागरिकों के जीवन की गुणवत्ता में उन्नयन का आकलन करने हेतु पूर्ण रूप से पर्याप्त अवधि है।
मूल्यांकन हेतु उक्त कालावधि की पर्याप्तता की संपुष्टि कुछ अनुभव जन्य तथ्यों के आधार पर भी देखी और परखी जा सकती है। किसी देश में जब कोई बहुत बड़ी सकारात्मक क्रान्ति होती है, जब सत्ता-शासन में कोई बहुत बड़ा उलट-फेर होता है या व्यापक सुधारों का कोई आवेग आता है, तो सामान्यतः नागरिक उसके प्रति उत्साहित होते हैं तथा नवीन सुधारों हेतु सहयोग प्रदान करते हैं और यही नहीं उस हेतु त्याग करने तथा उसके फल प्राप्त करने हेतु प्रतीक्षा भी करते हैं। किन्तु यह प्रतीक्षा अनवरत नहीं हो सकती है। एक लम्बे समय में यदि राजसत्ता नागरिकों के जीवन की गुणवत्ता में आवश्यक उन्नयन करने में असफल रहती है तो उसे न तो अनवरत समय तक मूर्ख बनाया जा सकता है और न ही उसे कुछ आकर्षक भावनात्मक नारों में बहकाकर गुमराह किया जा सकता है। विगत शताब्दी में इन्डोनेशिया, चिली, अर्जेन्टीना आदि की क्रान्तियाँ और हाल के ही कुछ विगत वर्षो में मिस्र, लीबिया, अल्जीरिया आदि के परिवर्तन इसकी पुष्टि करते हैं। किन्तु यहाँ इन सब की व्याख्या करना वास्तविक प्रसंग से भटकना होगा। किन्तु फिर भी यदि यहाँ प्रसंगवश, विगत शताब्दी के सोवियत संध की लोकतान्त्रिक क्रान्ति और विखण्डन, इस तथ्य का सर्वोत्तम उदाहरण है कि साम्यवादी क्रान्ति के लगभग 70 वर्ष बाद जब पूरी एक पीढ़ी जन्म लेकर जीवन की संध्या में पहुँची तो उसे अपने ‘खाली हाथ रहने’ का मलाल किसी तरह सहन नहीं हुआ और विश्व की एक सर्वोच्च सत्ता जनाक्रोश विस्फोटक के सामने ताश के पत्तों की तरह बिखर गयी। चीन के सन् 1949 की साम्यवादी क्रान्ति के 65 बसन्त गुजर चुके हैं। जनाक्रोश वहाँ भी है और यह लावा कभी भी स्फिोटक और निर्णायक मोड़ ले सकता है। इन विभिन्न देशों की क्रान्तियाँ यह भी इंगित करती हैं कि जनता की महत्वकान्क्षाएँ केवल आर्थिक विकास तक ही सीमित नहीं होती हैं, उसे एकांगी नहीं, समग्र विकास चाहिये होता है। मानव स्वयं के साथ ‘समग्र मानव’ के ही रूप में व्यवहारित होना चाहता है उससे किंचित रूप भी कमतर व्यवहार उसे बुरी तरह नापसन्द है। प्रसन्नता की बात है कि भारतीय मेधा और चेतना ऐसा ही देखती और सोचती है और तदनुसार ही उसका व्यवहार और आचरण भी होता है, जिसका प्रतिबिम्ब देश में समय-समय पर आये विभिन्न राजनीतिक परिवर्तनों में भी स्पष्ट रूप से परिलक्षित होता है।
अपनी तमाम कमी-बेसियों के बावजूद भी स्वतन्त्रता के पश्चात भारत में राजनीतिक स्थिरता है तथा लोकतान्त्रिक व्यवस्था कायम है। एशिया के तमाम अड़ोसी-पड़ोसी देशों के नागरिकों के लिये यह एक ईष्र्या और किसी सीमा तक आश्चर्य का विषय है। तमाम विविधताओं के बावजूद भारत ने लोकतान्त्रिक मूल्यों और मर्यादाओं का अनुसरण करते हुए भी विकास किया है और सामाजिक न्याय को भी सुनिश्चित किया है। यह किस सीमा तक हुआ और कितना हुआ तथा कितना अपेक्षित था, यह एक अलग विषय है। इस विषय पर विवाद और मतभेद की बहुत गुंजाइश हो सकती है कि गत 67 वर्षो में क्या-क्या और कितना-कितना हो जाना चाहिए था तथा इसके साथ ही यह प्रश्न भी जुड़ा है क्या जितना होना आवश्यक था और हो जाना चाहिए था, वह क्यों नहीं हुआ और क्या उतना सम्भव होने के लिये पर्याप्त साधन और सम्भावनाएँ थीं?
उक्त प्रश्नों पर बहुत विवाद, विश्लेषण और मंथन हो सकता है। किन्तु यहाँ ऐसे सामान्य बिन्दुओं का उल्लेख किया जा रहा है जिनका अधिक सम्बन्ध साधनों की उपलब्धता से बहुत कम है तथा जो मात्र कुछ नीतिगत निर्णय थे और एक उच्च इच्छा शक्ति, सुस्पष्ट चिन्तन, भारतीय समाज और परम्परा की गहरी समझ और उच्च संवेदनशीलता से सुनिश्चित किये जा सकते थे। अग्रिम शीर्षकों में इन्हीं कुछ बिन्दुओं पर चर्चा की गयी है।
1. जनसहभागिता और जन सहयोग - स्वतन्त्रता के तुरन्त बाद तथा विशेष रूप से सरदार बल्लभ भाई पटेल के अवसान के बाद भारत में समाजवाद का नारा बड़े ही जोर-शोर से बुलन्द होने लगा। वर्ष 1953 में जवाहरलाल नेहरू ने अवाड़ी में कांग्रेस पार्टी के अधिवेशन में देश में ‘समाजवादी ढंग के समाज’ गढने की संकल्पना को घोषित किया। इसके पश्चात् देश में नियोजन की प्रकिृया सोवियत संघ की भाँति बेहद केन्द्रीकृत हो गयी, जिसमें सामान्य नागरिक और स्थानीय इकाईयाँ तो दूर, देश के विभिन्न राज्यों और मुख्यमंत्रियों तक की भागीदारी लगभग नकार दी गयी। इस स्थिति ने देश में एक ऐसे वातावरण का सृजन कर दिया कि जैसे जो कुछ भी विकास होगा वह ऊपर से आयेगा। इस स्थिति ने आम नागरिक को बेपरवाह, गैर जिम्मेदार और बेहद परजीवी बना दिया। आम नागरिक हर छोटे से छोटे विषय में सरकार का मुँह ताकने लगे अन्यथा हाथ पर हाथ धरे बैठे रहने के आदी होने लगे। यह स्थिति वस्तुतः बहुत बुरी थी। जो साधारण कार्य सामुदायिक स्तर या छोटे-छोटे जनसमूहों की पहल पर होने सम्भव थे तथा जो इस देश में पूर्व में भी परम्परागत रूप से होते आये थे, लोगों ने उन्हें भी छोड़ दिया और वे उन कार्यो के सम्पादन हेतु सरकार का मुँह ताकने लगे। यह प्रसन्नता का विषय है कि वर्तमान सरकार ने इस बीमारी को भली प्रकार पहचान लिया है तथा केन्द्रीय योजना आयोग पर ताला डालकर इसमें सर्वोच्च स्तर से सुधार की शुरूआत कर दी है।
2. कर्तव्यों से अधिक अधिकारों पर बल - देश की स्वतन्त्रता के पश्चात् तथा विशेष रूप से विगत दो-तीन दशकों से मानवाधिकारों की बातें बड़े ही जोर-शोर से उठ रहीं हैं। मानवाधिकारों पर संगोष्ठियों और सम्मेलनों की बाढ़ सी आ गयी है। एक बड़ी संख्या में मानवाधिकारी संगठन खड़े हो गये हैं जो देश-विदेश से मोटे अनुदान लेकर फल-फूल रहे हैं। दुर्भाग्य से इनमें से तमाम संगठन या तो किसी शरारत या षडयन्त्र के तहत या अपने एकांगी चिन्तन कार्यक्रम के नाते या किसी अज्ञानतावश ऐसे तमाम मुद्दों को उठाते, गर्माते और भुनाते हैं जिससे देश का भला कम और बुरा अधिक होता है। वस्तुतः चाहे वह किन्ही विशिष्ट स्थितियों में भारतीय सेना या पुलिस की कार्यवाही हो या किसी स्थान पर किसी परियोजना का लगाना, इस पर इन मानवाधिकार संगठनों का जो रवैय्या होता है वह बहुत बार बहुत आपत्तिजनक होता है। वस्तुतः मानवाधिकार का कोई भी मुद्दा अलग-थलग रूप से नहीं देखा जा सकता है। उसे उसके सम्पूर्ण परिप्रेक्ष्य में समग्रता के साथ देखा जाना अति-आवश्यक है।
उक्त सन्दर्भ में यह बताना भी प्रासंगिक है कि जहाँ मानवाधिकार का प्रश्न है तो उसकी चर्चा या उसे विभिन्न ंिस्थतियों में संज्ञान में लेना नितान्त अनुचित नहीं है। किन्तु जहाँ हम इतने जोर-शोर से मानवाधिकारों की बात करते हैं तो वहीं हम नागरिक कर्तव्यों की बात करने से क्यों कतराते हैं? क्या एक अच्छे नागरिक की भाँति हमें राष्ट्र और समाज के प्रति अपने कर्तव्य का बोध नहीं होना चाहिए? क्या शान्तिपूर्वक अहिंसक होकर रहना, पर्यावरण के प्रति जागरूकता, पशु-संरक्षण, सीमित परिवार, सरकारी कर और शुल्कों का ईमानदारी से भुगतान, सार्वजनिक स्थानों को घेरना और अवैध निर्माण न करना आदि हमारे नागरिक दायित्व नहीं हैं? क्या हम इन नागरिक कर्तव्यों का पालन न करके दूसरे नागरिकों के अधिकारों का हरण तो नहीं कर रहे हैं? इस प्रकार के बोध का अभाव बड़ा ही दुर्भाग्यपूर्ण है। वस्तुतः मानवाधिकारों का यह पश्चिमी या आयातित संस्करण भारतीय परम्पराओं के अनुकूल नहीं है। हमारी परम्परा में चाहे वह राष्ट्र हो या परिवार, कर्तव्य पहले है अधिकार बाद में। फिर यदि गहराई में झाँका जाय, तो जहाँ कर्तव्य पालन निष्ठा से होने लगता है वहाँ अधिकार तो स्वयं ही संरक्षित, सुरक्षित और सुलभ हो जाते हैं। जब अधिकारों की बात होती है तो प्रत्येक व्यक्ति या समूह की माँग का दायरा बढ़ता जाता है और वह दूसरे व्यक्ति या समूहों से टकराता और उनकी सीमा में अतिक्रमण करता है। इसके विपरीत जहाँ व्यक्ति या समूह में कर्तव्य की भावना बलवती होती है, वहाँ किसी की सीमा में अतिक्रमण या टकराव का प्रश्न ही नहीं होता है। वहाँ तो प्रेम, सद्भाव, सौहाद्रय और साथ ही अधिकारों का संरक्षण स्वयमेव ही हो जाता है।
3. समाज में समरसता के स्थान पर श्रेणीकरण और विभाजन - स्वतन्त्रता के पश्चात् समाज को व्यवहारिक रूप से, अधिकांश स्थितियों में बांटकर अथवा श्रेणीगत तरीके से देखने की प्रवृत्ति बढ़ी है। जिससे समाज की समरसता में ह्ास होने की सम्भावनाएँ बढ़ती हैं। विकास के चिंतन में भी इस प्रकार की प्रवृत्तियों से बचने की कोशिश नहीं की गयी। ग्रामीण-नगरीय, महिला-पुरूष, अल्पसंख्यक-बहुसंख्यक, उत्पादक-मजदूर, व्यापारी ग्राहक आदि को अलग-अलग वर्गों में इस प्रकार प्रदर्शित किया जाता रहा है, जैसे उन सबके हित परस्पर विरोधी हों। यह उचित है कि कुछ कतिपय स्थितियों में या किसी समय अन्तराल में किसी वर्ग या क्षेत्र पर अधिक ध्यान देना आवश्यक हो सकता है तथा दिया भी जाना चाहिए किन्तु उनको इस प्रकार से प्रोजेक्ट कर देना कि उनके हित एक दूसरे के विरोधी हैं, समाज की समरसता के लिये खतरनाक है। पुनः नये परिप्रेक्ष्य में, जब विकास के उपादान, न्यूनतम विभाजनकारी या अल्पवर्ग के पोषणीय नहीं रहे हैं, तब तो इस प्रकार के विभाजनकारी विचार की आवश्यकता ही न्यूनतम हो जाती है।
4. स्थानीय स्वशासन व्यवस्था की दिशाहीनता - स्थानीय स्वशासी संस्थाओं का सृजन तथा 73वें और 74वें संविधान सशोधन के माध्यम से उनका सशक्तीकरण निश्चित ही एक स्वागत योग्य कदम था। किन्तु इन संस्थाओं के माध्यम से जिस प्रकार की जनसहभागिता, धरातलीय स्तर पर स्थानिक आवश्यकताओं के अनुरूप नियोजन, स्थानिक संसाधनों का विकास, स्थानीय स्तर पर समस्याओं का तात्कालिक निराकरण, सामाजिक सौहाद्र, स्थानीय संस्कृति तथा धरोहर संरक्षण आदि प्रकार की जो अपेक्षाएं की गयीं थीं, वे या तो बिल्कुल पूरी न हो सकीं या केवल आंशिक रूप से पूरी हुई। यह भी एक कारण है कि स्थानीय स्वशासी संस्थाएंँ देश की लोकतान्त्रिक व्यवस्था की आधार-शिलाओं के बजाय केवल एक प्रकार की आदर्शात्मक उत्तरदायित्व (आइडियलिस्टिक लाइबिलिटी) सी बनतीं जा रहीं है। स्थानीय स्वशासी संस्थाएँ, विशेष रूप से ग्रामीण क्षेत्रों में, विकास की वाहक बनने के बजाय या विकास की अनूठी पहल करने वाली संस्थाओं के बजाय, ग्रामीण समाज में एक नयी रणस्थली बनती जा रही हैं। इन संस्थाओं के चुनाव ग्रामीण क्षेत्रों में विभाजनकारी प्रवृत्तियों, परस्पर अविश्वास और शत्रुता तथा आपसी फौजदारी के नये मोर्चे खोल रहे हैं। इसका अर्थ यह नहीं है कि यह व्यवस्था समाप्त की जाय, बल्कि आवश्यकता इस बात की है कि इस व्यवस्था पर एक नये सिरे से चिन्तन करके इसे परिमार्जित किया जाये। यह आश्चर्य की बात है कि इन संस्थाओं में संघर्ष, टकराव और अस्थिरता की स्थिति, राष्ट्रीय राजनीति से कहीं ज्यादा है। राष्ट्रीय राजनीति में तो नीतिगत अथवा अन्य प्रकार के मतभेदों की बहुत गुंजाइश भी हो सकती है किन्तु स्थानीय स्तर पर तो विकास कार्यक्रमों में मतभेद या मनभेद का क्षेत्र अति सीमित है। फिर राष्ट्रीय राजनीति की भाँति स्थानीय राजनीति में शामिल लोग एक दूसरे से अपरिचित या कम परिचित भी नहीं होते हैं। वे तो एक क्षेत्र के निवासी होते हैं। एक-दूसरे से पूर्ण परिचित होते हैं। अधिकांश के परस्पर व्यक्तिगत सम्बन्ध होते हैं तथा तकरीबन सभी को लगभग जीवन भर साथ रहना होता है। अतः पंचायत राज-व्यवस्था की इस विभाजनकारी प्रवृत्ति पर आवश्यक ध्यान देने की आवश्यकता है। वहाँ तो निश्चित रूप से बहुमत नहीं, सहमति से काम होना चाहिए। वही बात जो हमारे वर्तमान प्रधानमन्त्री ने राष्ट्रीय राजनीति के सन्दर्भ में हाल ही में कही है, उसकी आवश्यकता स्थानीय-स्तर पर उससे कहीं बहुत अधिक है जितनी कि राष्ट्रीय स्तर पर। वस्तुतः यह असम्भव नहीं है। किन्तु इसके लिए काफी सघन प्रयास करने होंगे। इस हेतु इन स्थानीय संस्थाओं के जनप्रतिनिधियों को प्रशिक्षण, प्रोत्साहन, प्रेरणा और पुरस्कार की एक कार्यनीति तैयार करनी होगी और साथ ही उनको निर्वाचित करने वाली जनता को भी उन प्रतिनिधियों पर दबाव बनाये रखने के लिये जागरूक करना होगा। इसमें समय भी लग सकता है। किन्तु इसमें अन्ततः सफलता अवश्य मिलेगी।
5. न्याय प्रक्रिया में गुणात्मक बदलाव की आवश्यकता - एक वह बिन्दु जिसकी ओर सामान्यतः काफी कम ध्यान दिया गया है वह है न्याय व्यवस्था में आवश्यक गुणात्मक सुधार। स्वतन्त्रता के पश्चात् से यह समस्या निरन्तर बढती ही जा रही है। त्वरित एवं उचित न्याय निरन्तर दूर होता जा रहा है। न्याय प्रकिृया में इतना विलम्ब होता है कि न्याय मिलना न मिलने के बराबर हो जाता है। यद्यपि कहा तो यह जाता है कि ‘जस्टिस डिलेड इज जस्टिस डिनायड’, लेकिन इस दिशा में कोई प्रभावशाली कदम नहीं उठाये जाते हैं।
विभिन्न अदालतों में जितने मामले विचाराधीन हैं, उनसे सम्बन्धित आंकड़े काफी चैंकाने वाले हैं। देश की विभिन्न स्तर की अदालतों में इस समय लगभग 3 करोड़ 50 लाख से अधिक मामले विचाराधीन हैं। लगभग 42 लाख से अधिक मुकदमें देश के विभिन्न उच्च न्यायालयों में चल रहे हैं तथा 50 हजार से अधिक मुकदमें उच्चतम न्यायालय में चल रहे हैं।
किन्तु उपरोक्त दुर्भाग्यपूर्ण समस्या का जो सर्वाधिक दुर्दान्त और दर्दनाक पक्ष है, उस तरफ सामान्यतः अधिकांश लोगों का ध्यान नहीं जाता है। वस्तुतः दो पक्षों के बीच मुकदमेबाजी उसमें से एक पक्ष को सही तथा त्वरित न्याय मिलने तक ही सीमित नहीं है बल्कि इससे अधिक महत्वपूर्ण तथ्य इन मुकदमों की वास्तविक लागत से सम्बन्धित है। इन मुकदमों की वित्तीय तथा सामाजिक लागत अकल्पनीय है। इन मुकदमों का प्रभाव इनसे सम्बन्धित परिवारों पर भी पड़ता है तथा यदि इस प्रकार इन मुकदमों से प्रभावित जनसंख्या की गणना की जाये तो वह 10 करोड़ से भी अधिक हो सकती है। देश में लाखों परिवार ऐसे हैं जिनकी एक से अधिक पीढ़ी मुकदमों में ही खप गयी। लाखों की संख्या में ऐसे मुकदमें हैं, जिन्हें चलते-चलते 50 वर्ष यानी आधी शताब्दी बीत गयी है तथा उनमें से बहुत बड़ी संख्या ऐसी है जिन्हें चलते एक शताब्दी बीत चुकी है। हजारों ग्रामीण परिवार फौजदारी के मुकदमों में अपना सब कुछ लुटा बैठे हैं और यही नहीं त्वरित न्याय न मिलने के कारण तमाम दीवानी मुकदमों से आगे बढ़कर फौजदारी मुकदमों का सिलसिला शुरू हो जाता है। ग्रामीण क्षेत्रों में तो दो परिवारों के बीच मुकदमें, अन्ततः दो समुदाय या दो समूहों में ‘संघर्ष के रूप में भी तब्दील हो जाते हैं और दोनों पक्षों से मुकदमों की बौछार प्रारम्भ हो जाती है। मुकदमें में दो पक्षों के साथ-साथ गवाह भी सम्मिलित हो जाते हैं और इस प्रकार किसी गांव की शान्ति, समृद्धि और विकास पूरी तरह मुकदमों की ही भेंट चढ़ जाता है। तमाम मुकदमें केवल इसलिये ही किये जाते हैं क्योंकि एक पक्ष यह जानते हुए भी कि वह गलत है और निश्चित रूप से मुकदमा हार जायेगा, अदालत पहुँच जाता है क्योंकि उसे विश्वास है कि वह मुकदमे को कई दशकों तक खींच देगा और इस बीच वह दूसरे पक्ष को इतना छका देगा कि वह उसे गलत सौदेबाजी के लिये मजबूर कर सकेगा। जैसा कि पूर्व में कहा जा चुका है कि इन मुकदमों की वास्तविक लागत (साथ ही विकास-जनित लागत) बहुत ऊँची है। मुकदमें में फँसे परिवारों का पूरा ध्यान मुकदमें पर केन्द्रित हो जाता है जिससे परिवार में बच्चों की शिक्षा पर कुप्रभाव पड़ता है, अपराध पनपते हैं। परिवार की स्वास्थ्य और आजीविका नकारात्मक रूप से प्रभावित होती है। परिवार के सदस्यों की उत्पादकता में क्षरण होता है। तमाम नकारात्मक प्रेरणाएं और प्रवृत्तियाँ पनपती हैं आदि। यही नहीं वित्त, अपार भुगतान, कम्पनियों आदि से सम्बन्धित मुकदमें व्यापारिक, वाणिज्यिक तथा उत्पादक प्रेरणाओं को हतोत्साहित करके विकास विरोधी वातावरण का भी सृजन करते हैं।
उपरोक्त तथ्यों के आलोक में यह स्वय सिद्ध है कि देश की न्याय व्यवस्था को सुदृढ़, संवेदनशील और त्वरित बनाना बहुत आवश्यक है। यह कार्य काफी मुश्किल अवश्य है किन्तु असम्भव नहीं है। वस्तुतः अन्य तमाम निवारक उपायों को अपनाने से पूर्व इस समस्या का विश्लेषण करके उसकी जड़ तक पहुँचना होगा। यदि मुकदमें इतनी अधिक संख्या में दायर होंगे तो केवल न्यायाधीशों की संख्या बढाने या त्वरित अदालतों के गठन से काम नहीं चलेगा। दरअसल समस्या की जड़ प्रति वर्ष नये-नये मुकदमों की बढ़ती हुई संख्या है। अतः इसका निदान भी बढ़ते हुए मुकदमों की संख्या कम करने से ही सम्भव हो सकेगा। इस हेतु वस्तुतः मुकदमों के जन्म लेने का कारण को ही समाप्त करना होगा अथवा उसका बीज पड़ते ही गर्भपात करना पड़ेगा, तभी इस समस्या का हल सम्भव होगा। मुकदमों की बढ़ती हुई संख्या का एक बहुत बड़ा कारण स्वयं मुकदमों का लम्बे समय तक चलना है तथा लम्बे समय तक चलने का कारण स्वयं मुकदमों की संख्या है। दूसरे शब्दों में, मुकदमों की संख्या तथा मुकदमों का लम्बे समय खिंचने का एक-दूसरे से कारण और परिणाम का अन्तर्सम्बन्ध है अर्थात् दोनों एक-दूसरे को बढ़ाने में सहयोग देते हैं। मुकदमों का लम्बा समय एक तो नये वादियों की संख्या में इजाफा करता है, तो लम्बे चलते हुए एक मुकदमें की शाखाओं के रूप में तमाम नये सहयोगी मुकदमें भी पनपने लगते हैं तथा इस प्रकार एक एकल मुकदमें से, मुकदमों का एक अन्तहीन गुच्छा या लच्छी बन जाती है, जिसका अन्ततः जब भी अन्त होता है तो वह अधिकांशतः अदालत में न होकर अदालत के बाहर ही होता है। इस प्रकार यह अन्त उसी प्रकार का होता है जो यदि प्रारम्भ में ही हो सकता था। इस प्रकार दोनों पक्षों के तमाम ऊर्जा और साधन बर्बाद होने से बच जाते और जिन्हें किसी उत्पादक या रचनात्मक प्रकिृया में लगाया जा सकता था। अतः सारांश में, यह कहा जा सकता है कि मुकदमों के निस्तारण में देरी और मुकदमों की निरन्तर बढ़ती संख्या का, यह अनवरत दुश्चक्र कहीं न कहीं अवश्य टूटना चाहिए। इसके अतिरिक्त देश में विशेष रूप से ग्रामीण क्षेत्रों में विधिक-साक्षरता तथा विधिक-जागरूकता के अधिकाधिक प्रयास और प्रशिक्षणों की आवश्यकता है। हाल में इस ओर प्रयास भी हुए हैं किन्तु वे अभी न के बराबर ही हैं। इसके अलावा अधिकांश विवादों का उचित निस्तारण प्रशासनिक स्तर पर ही करने का प्रयास होना चाहिए, जिससे मामला न्यायालयों तक पहुँचने की नौबत ही न आये। इसके लिये सरकारी अधिकारियों की जबावदेही स्पष्ट रूप से तय होनी चाहिए। नियम, परिनियम, सरकारी आदेशों और कानूनों में पूर्ण स्पष्टता होनी चाहिए तथा उनकी स्पष्ट व्याख्या भी की जानी चाहिए। सभी वर्ग के मुकदमें अलग-अलग समूहों में वर्गीकृत करके उनके मूल में जाया जा सकता है तथा उसे मूल-बिन्दु पर ही किस प्रकार रोका जा सकता है इस पर गम्भीरता से विचार होना चाहिए, जिससे वह न्यायालय तक पहुँचे ही नहीं।
6. प्रशासनिक व्यवस्था को चुस्त, जवाबदेह और संवेदनशील बनाने की आवश्यकता - देश के अल्पविकास और अव्यवस्था के लिये राजनीतिक तन्त्र और चुनी हुई सरकार को तो बहुधा कठघरे में खड़ा किया जाता है, किन्तु देश के प्रशासन तन्त्र और अफसरशाही से होने वाली नकारात्मक प्रवृत्तियों और हानियों को अक्सर अनदेखा कर दिया जाता है। जबकि वास्तविकता तो यह है कि देश की प्रशासनिक व्यवस्था के माध्यम से ही देश में विभिन्न नीतियों और कार्यक्रमों को लागू किया जाता है तथा सम्बन्धित नीतियों या कार्यक्रमों की सफलता और असफलता अति प्रमुख रूप से इसी प्रशासनिक मशीनरी के सहयोग और व्यवहार पर निर्भर करती है।
यह अति दुर्भाग्य का विषय है कि स्वतन्त्रता के 67 वर्ष व्यतीत होने के बावजूद भी देश की प्रशासनिक व्यवस्था एक ओर तो लचर, कमजोर, समन्वय विहीन है तो दूसरी ओर वह जनता के प्रति घोर असंवेदनशील, निष्ठुर, लापरवाह, कर्तव्य-परायणताविहीन, सत्यनिष्ठता-विरत और शासक मनोवृत्तिधारी है। यदि गहनता से देखा जाय, तो आज भी भारत की उच्च पदस्थ अफसरशाही ब्रिटिश परम्परा और मनोवृत्ति से अपने को मुक्त नहीं कर पाई है। अफसर आज भी अपने को जनता का सेवक नहीं, शासक मानते हैं और तदनुसार ही बड़ी ही संवेदनशून्यता के साथ सामान्य जनता से व्यवहार करते हैं। भारत में उच्च पदस्थ अफसरशाही की जड़े आज भी इतनी गहरी तथा मजबूत हैं कि वह विभिन्न अवसरों पर लोकतान्त्रिक निकायों और पेशेवर संस्थानों को भी आसानी से धता बता सकते हैं या धोखे में रख सकते हैं। ऐसा बहुध ा देखा जाता है कि विभिन्न लोकतान्त्रिक तथा पेशेवर प्रतिष्ठान और जन-प्रतिनिधि, इस बेहद संगठित और जटिल अफसरशाही के समक्ष हथियार डालने या उससे समझौता करने को अक्सर मजबूर हो जाते हैं।
उपरोक्त स्थिति वास्तव में दुर्भाग्यपूर्ण ही नहीं देश के स्वस्थ विकास और जनकल्याण कार्यक्रमों के क्रियान्वयन के दृष्टिकोण से बहुत घातक है। देश के लोकतान्त्रित ढंग से चुने गये शासकों को वास्तविक शक्ति स्वयं में स्थानान्तरित और निहित करने हेतु इस स्थिति का तोड़ ढूंढना ही होगा। इस समस्या के निवारण हेतु विभिन्न प्रशासनिक सुधार आयोगों की अनुशंसाओं का नये परिप्रेक्ष्य में अध्ययन करके उन्हें परिमार्जित रूप में लागू करने का प्रयास होना चाहिए। इस सम्बन्ध में अति सघन और कठोर उपाय शीघ्र लागू किये जाने चाहिए, क्योंकि वर्तमान की निरकुंश अफसरशाही के ढाँचे को संवेदनशील और जबावदेह बनाये बिना किसी प्रकार के सुधार पूर्ण रूप से फलित नहीं होंगे।
7. स्वास्थ्य सुविधाओं को विस्तारित करने तथा उनमें गुणात्मक सुधार की आवश्यकता - देश में स्वास्थ्य सुविधाओं की स्थिति बड़ी ही नाजुक है। ग्रामीण क्षेत्रों में तो यह सुविधाएँ न के बराबर ही हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य सुविधाओं की अनुपलब्धता के कारण वहाँ लोग तब तक इलाज नहीं कराते हैं जब तक कि वह बीमारी बेहद नाजुक न हो जाये। बहुत समय तक तो यह लोग झाड़-फूँक या गाँव के नीम हकीमों आदि से ही इलाज कराते रहते हैं और जब सही इलाज के लिये उन्हें उपयुक्त चिकित्सक के पास लाते हैं तब तक बहुत देर हो चुकी होती है। किन्तु शहर में भी पूर्ण विशेषज्ञ चिकित्सक पर ले जाने पर भी, वह निरीह ग्रामीण उपयुक्त चिकित्सकीय सुविधाएँ उचित मूल्य पर प्राप्त कर सके, यह आवश्यक नहीं होता है। यहाँ भी उसे पग-पग पर लूटा और ठगा जाता है। कई बार तो उसे इलाज कराने हेतु अपने घर-मकान, जानवर-जमीन-जायदाद गहने-गुरिया आदि को बेचने या गिरवी रखने को मजबूर होना पड़ता है और यहीं से उसकी बदहाली और पतन की वह कथा प्रारम्भ होती है जिसका अन्त, एक खुशहाल परिवार का एक अति दरिद्र और दुखी परिवार में बदलने के रूप में होता है। विभिन्न अर्थशास्त्रियों के अध्ययन इस तथ्य की भली भाँति पुष्टि करते हैं, जिन्होंने विभिन्न अध्ययनों के माध्यम से यह बताया है कि किस प्रकार न केवल वह परिवार जो गरीबी रेखा से थोड़े ऊपर होते हैं, बल्कि तमाम ग्रामीण मध्यम वर्गीय और भूमिधारी समृद्ध किसान परिवार के किसी सदस्य की बीमारी के कारण, इलाज कराते-कराते वह परिवार गरीबी की रेखा के नीचे फिसल जाते हैं। यहाँ ध्यान देने की बात यह भी है कि यह स्थिति तो उन ग्रामीणों की है जिनके पास बेचने या गिरबी रखने के लिये आवश्यक परिसम्पत्तियाँ हैं। किन्तु जिनके पास कुछ भी नहीं है (दैनिक मजदूरी के अतिरिक्त) या नाममात्र की परिसम्पत्तियाँ हैं, ऐसे भूमिहीन श्रमिक, लघु और सीमान्त किसान, ग्रामीण दस्तकार, पशुपालक आदि तो, जो कुछ थोड़ा बहुत उनके पास होता है उसे भी गंवा कर मृत्यु की ओर कूच कर लेते हैं।
उक्त स्थिति ग्रामीण क्षेत्रों में बहुतायत से है किन्तु इसका अर्थ यह नहीं है कि यह स्थिति शहरों में नहीं है। शहरों के गरीबों और साधनहीन लोगों की स्थिति भी लगभग उतनी ही खराब है जितनी ग्रामीण क्षेत्र के गरीबों की।
उपरोक्त स्थिति का सामना करने हेतु जिस बात की सबसे अधिक आवश्यकता है, दुर्भाग्य से उस पर अब तक सबसे कम ध्यान दिया गया है और वह है सामान्य जनता में स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता पैदा करना। यदि स्वास्थ्य और चिकित्सा के प्रति लोग जागरूक होंगे तो रोगग्रस्त लोगों की संख्या में कमी आयेगी या शुरूआत में ही लोग उस रोग का उचित इलाज करा सकेंगे। यह प्रसन्नता की बात है कि पिछले कुछ समय से बाबा रामदेव तथा विभिन्न योग गुरूओं ने लोगों को स्वास्थ्य के प्रति क्रान्तिकारी रूप से जागरूक बनाया है। अब लोगों की समझ में आने लगा है कि उचित दिनचर्या, उचित खानपान, व्यायाम, प्राकृतिक तथा आयुर्वेदिक चिकित्सा आदि से अच्छा स्वास्थ्य और दीर्घायु सुनिश्चित की जा सकती है तथा तमाम चिकित्सकीय खर्चो से बचा जा सकता है। इस जागरूकता को और अधिक व्यापक बनाने की आवश्यकता है, विशेष रूप से महिलाओं, बच्चों और ग्रामीणों के मध्य। इस जागरूकता में रोगों की प्रारम्भिक स्थिति में पहचान और उसके प्रारम्भिक निवारक चिकित्सकीय उपायों का और अधिक प्रचार-प्रसार किया जाये, तो और भी उत्तम होगा। इसके अलावा यह भी आवश्यक है कि विशेषज्ञ चिकित्सीय सेवाओं के बजाय सर्वप्रथम आवश्यक आधारभूत चिकित्सकीय सेवाओं पर अधिक व्यय करके उन्हें यथाशीघ्र विस्तारित किया जाये। इस सन्दर्भ में यह भी ध्यान रखना होगा कि जनता को निरोग रखना या रोगमुक्त करना केवल उन व्यक्तियों को कष्ट मुक्त करना ही नहीं है जो उनसे ग्रस्त हैं, बल्कि उसका सीधा और घनिष्ठ सम्बन्ध एक परिवार की उत्पादकता और विकास में उसके योगदान से भी प्रत्यक्ष रूप से जुड़ा है। अतः इस मद में जो भी व्यय किया जाता है उसे केवल कल्याणकारी व्यय के रूप में न देखकर विकास प्रकिृया में निवेश के रूप में देखना चाहिए।
8. शिक्षा व्यवस्था में गुणात्मक सुधार की आवश्यकता - स्वतन्त्रता के पश्चात् देश में साक्षरता और शिक्षा की स्थिति कोई पं्रशसनीय नहीं रही है। यही कारण है कि विश्व के प्रत्येक तीन में से लगभग दो निरक्षर भारतीय हैं। विगत कुछ समय से इस स्थिति में यद्यपि काफी सुधार हो रहा है तथा समाज के अति कमजोर और वंचित वर्गो में भी शिक्षित होने के प्रति काफी जागृति आयी है। निजीकरण के कारण विभिन्न स्तरों के शैक्षिक संस्थानों की उपलब्धता में काफी विस्तार हो चुका है। प्राथमिक शिक्षा के देश में सार्वभौमीकरण का भी दावा किया जा रहा है तथा अब माध्यमिक स्तर की शिक्षा के सार्वभौमीकरण की बात तेजी से चल रही है। किन्तु दुर्भाग्य से शिक्षा के इस विस्तार में, हम शिक्षा की गुणवत्ता का उन्नयन तो दूर, उसका ह्रास भी रोकने में बुरी तरह विफल रहे हैं। अतः आज डिग्री तो हैं लेकिन उन डिग्र्री धारियों में उत्पादकता, कार्य कुशलता, आवश्यक योग्यता का नितान्त अभाव है। जिसके चलते वे रोजगार प्राप्त करने की दृष्टि से नितान्त अनुपयुक्त (अनएम्पलोयेबेल) हैं। इस कारण एक ओर तो वे अपने परम्परागत कार्यो को छोड़ चुके हैं या डिग्रीधारी होने के कारण उन कार्यो को तुच्छ और हीन मानने लगे हैं तो दूसरी ओर वे नये प्रकार के रोजगार को भी प्राप्त करने में असमर्थ हैं, क्योंकि वे उसके लिये आवश्यक योग्यता और उत्पादकता धारण नहीं ही करते हैं।
स्वतन्त्रता के पश्चात् शिक्षा के विस्तार का एक अन्य अति दुर्भाग्य पूर्ण और बेहद निराशाजनक पक्ष यह भी है कि वर्तमान शिक्षा केवल ज्ञानार्जन और उससे भी अधिक धनार्जन का जरिया मात्र बन चुकी है। विद्यार्थियों और उनके अभिवावक यह मानते हैं कि वे पढ़-लिख कर अच्छी से अच्छी नौकरी में लग जायें। वर्तमान शिक्षा वस्तुतः अधिकाधिक रूप से यही कर भी रही है। जबकि शिक्षा का एकमात्र उद्देश्य केवल नौकरी पाना नहीं है। बल्कि शिक्षा ऐसी होनी चाहिए जो विद्यार्थियों को उच्च कोटीय संस्कारों से आभूषित कर सके, जो उन्हें श्रेष्ठ मानवीय गुणों से युक्त नागरिक बना सके। जो उन्हें समाज के प्रति गहन रूप से संवेदनशील बना सके और जिससे वे समाज और राष्ट्र के प्रति समर्पित निष्ठावान और कर्तव्य परायण नागरिक बन सकें।
9. आपदा-प्रबन्धन की आवश्यक व्यवस्था और तद्सम्बन्धी जागरूकता - स्वतन्त्रता के पश्चात् देश में जब विकास की प्रकिृया गतिमान हुई तो उसके साथ आपदा प्रबन्धन पर भी ध्यान देने की आवश्यकता थी। किन्तु इस पर आवश्यक ध्यान देने की महती आवश्यकता को प्रारम्भिक दौर की विभिन्न सरकारों ने बिल्कुल नहीं समझा। इसका परिणाम यह हुआ कि देश में आपदाएँ भी बढ़ती गयीं और उनके कारण विनाश भी।
यहाँ इस तथ्य को आंकड़ों में व्यक्त करते हुए यह बताना सम्भव नहीं है कि आपदाओं से प्रति वर्ष कितना अधिक विनाश होता है तथा इस विनाश को किस प्रकार न्यूनतम किया जा सकता है। कई वर्षो में तो आपदा से होने वाली प्रत्यक्ष हानि ही देश के सकल राष्ट्रीय उत्पादन से अधिक हो जाती है। यदि इसमें अप्रत्यक्ष और अदृश्य हानियों को भी सम्मिलित कर दिया जाये तब तो यह हानि और भी कई गुना हो सकती है।
पिछले कुछ वर्षो में सरकार ने आपदाओं से होने वाली भारी क्षति का संज्ञान लेते हुए, इस दिशा में कुछ कदम उठाये हैं। इन कदमों के अन्तर्गत राष्ट्रीय स्तर पर, ‘राष्ट्रीय आपदा प्रबन्धन प्राधिकरण तथा राष्ट्रीय आपदा प्रबन्धन संस्थान का गठन किया गया है। इसका अनुगमन करते हुए प्रत्येक राज्य में भी राज्य स्तर पर ‘राज्य आपदा प्रबन्धन प्राधिकरणों’ तथा ‘राज्य आपदा प्रबन्धन संस्थाओं का गठन किया जा रहा है। अब तक कई राज्य इस प्रकार की संस्थाओं का गठन कर भी चुके हैं तथा कई राज्यों में इनका गठन अभी होना शेष है। राज्यों के अतिरिक्त प्रत्येक जिले में भी इस प्रकार की व्यवस्था की आवश्यकता है जिससे आपदा ग्रस्त क्षेत्र को त्वरित रूप से सहायता मुहैय्या कराई जा सके।
‘आपदा’ एक प्रकार से एक ऐसी घटना होती है जो बड़े ही अचानक भी आ सकती है। अतः आपदा के प्रबन्धन के सम्बन्ध में जो सबसे आवश्यक कदम है, वह है-आपदाओं के प्रति व्यापक जागरूकता अभियान चलाना। आपदा प्रबन्धन का एक उज्जवल पक्ष यह भी है कि मात्र जागरूकता से ही विभिन्न आपदाओं से एक बहुत बड़ी सीमा तक बचा जा सकता है। केवल पेशगी मंे चेतावनी, अति अल्पकालीन प्रशिक्षण और नाममात्र के साधनों की तात्कालिक उपलब्धता (यथा रस्सी, सीढ़ी, लम्बा बांस आदि) से ही जन धन की भारी क्षति से बचा जा सकता है। अतः अब देर से ही सही, यदि समय रहते आपदा प्रबन्धन के प्रति देशव्यापी जागरूकता अभियान चलाया जाये तथा विभिन्न स्तरों पर अन्य आवश्यक कदम उठा लिये जायें, तो देश के विकास तथा जनकल्याण की दिशा में यह एक अति महत्वपूर्ण कदम होगा।
उपरोक्त बिन्दु देश के विकास और समृद्धि की दृष्टि से बहुत उपयोगी तथा प्रभावशाली बिन्दु हैं। उपरोक्त बिन्दुओं के सन्दर्भ में एक महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि इनमें से अधिकांश बिन्दु देश की उन नकारात्मक प्रवृत्तियों के निराकरण से सम्बन्धित हैं जिनके कारण देश की विकास प्रकिृया अवरूद्ध होती है तथा देश की जनता का कल्याण और खुशहाली कुप्रभावित होती है। दूसरे शब्दों में, उपरोक्त आठ बिन्दुओं में अधिकांश का सम्बन्ध सामान्य जनता की क्षमता-व ृद्धि या उनके सशक्तीकरण से है। इसमें कोई संदेह भी नहीं है कि कोई भी विकास कार्यक्रम या कल्याण कार्यक्रम की सफलता तब तक पूर्ण रूप से सम्भव नहीं है जब तक उस देश के नागरिक सशक्त नहीं होते हैं तथा उनकी क्षमता में उचित स्तर तक उन्नयन नहीं होता है। यहाँ यह स्पष्ट करना परम आवश्यक है कि जहाँ सरकार दृश्य साधनों को विकसित करने तथा उन्हें लोगों को पहुँचाने हेतु प्रयत्नशील है वहीं उसे इन ‘अदृश्य-शक्तियों या साधनों’ अर्थात् क्षमता-वृद्धि तथा सशक्तीकरण पर भी उचित ध्यान देना आवश्यक है।ं