Tuesday, November 18, 2014

दूर के ढोल सुहावने.संकलित - राधेकृष्ण दुब

 चैन से रहने वाले एक कौए ने एक दिन एक हंस को देखा। वह उसकी उजली, धवल काया देख कर सोचने लगा कि हंस कितना सफेद है और मैं कैसा काला कलूटा। कौआ सोचने लगा, यह हंस जरूर दुनियांँ का सबसे सुखी प़क्षी होगा। कौआ हंस के पास गया और अपने मन की बात कही। हंस ने जवाब दिया, नहीं भाई, ऐसा नहीं है। बहुत दिनो तक मुझे भी लगता रहा कि मैं दुनियाँ का सबसे सुन्दर और सुखी पक्षी हूँ। लेकिन एक दिन मैने एक तोते को देखा, जिसके शरीर की दो रंगों की छटा अनूठी थी। जब कि मेरे पास तो केवल एक ही रंग है। मुझे लगता है, तोता ही दुनियाँ का सबसे सुन्दर व सुखी पक्षी है।
कौआ तोते के पास गया। उससे भी वही बात कही। तोते ने कहा, जब तक मैने मोर को नहीं देखा था, तब तक मुझे अपने रूप-रंग पर बड़ा गुमान था। मगर मेरे दो रंगे पंखों और मोर के बहुरंगे पंखों व उसके मनोहारी नृत्य से भला कैसा मुकाबला। कौआ फिर मोर को खोजने चला। उसे मोर एक चिडि़याघर में मिला। उसके पिंजड़े के बाहर सैकड़ों लोग उसकी सुन्दरता की तरीफ कर रहे थे। जब सब लोग वहाँ से चले गए, तो कौए ने मोर से कहा, तुम कितने सुन्दर हो। हजारों लोग तुम्हें रोज देखने आते हैं। मुझे देख कर तो वे यों ही दुत्कार देते हैं। तुम तो दुनियाँ के सबसे सुखी और खुश रहने वाले पक्षी होगे।
मोर ने कहा मुझे भी यही लगता था भाई कि मैं दुनियाँ का सबसे सुन्दर और खुश पक्षी हूंँ। लेकिन मेरी सुन्दरता तो मेरी शत्रु है। उस सुन्दरता के कारण अब मैं इस चिडि़याघर में कैद हूँ। मुझे यह लगने लगा कि मैं मोर न होकर एक कौआ होता, तो आजाद रहता और मन मर्जी से कहीं भी घूमता फिरता।
कौए को अब इस कहाबत का अर्थ समझ में आ गया था, कि ‘दूर के ढोल सुहावने’ होते हैं। ु