Tuesday, November 18, 2014

नदी का चिन्तन - गौरी शंकर वैश्य ‘‘विनम्र’’


वृद्धा माँ-सी संकेतों में
सुनों! नदी कुछ कहती है।
लोरी सा मधुरिम निनाद कर
‘कल-कल’ धारा बहती है।
हिमखण्डों को ताप मिला, तब बूँद-बूँद बनकर पिघली
प्रकृति-पुरूष रूपी जीवों का, करने को उद्धार चली
जिसने पावन अमृत बाँटा
वह अन्तर में दहती है।
सुनों! नदी कुछ ....
देवतुल्य जो पूज्य सनातन, अब उसका सम्मान नहीं
जल से रस-चेतनता हैं, बिन जल के कल्याण नहीं
तन अस्वस्थ हैं, मन मलीन है
प्रतिपल पीड़ा सहती है।
सुनों! नदी कुछ ....
स्वार्थ में अन्धे मानव ने, किया प्रदूषित, निर्मल जल
डाल रहा अपशिष्ट, रसायन, मिला रहा है वाहित मल
शुष्क-अशक्त हुए दोनों तट
उर में सिसकता ढहती है।
सुनों! नदी कुछ ....
औद्योगिक अपशिष्ट रोक दो, दूषित जल का हो शोधन
जल-जीवों की संरक्षा हो, चले स्वच्छता-आन्दोलन
पुत्र भगीरथ कब आओगे!
चिन्तन में रत रहती है।
सुनों! नदी कुछ कहती है।
चिन्तन, मनन और क्रियान्वयन की आवश्यकता है।ु
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