Tuesday, November 18, 2014

अभी भी जारी है भारतीयता पर आघात -प्रो॰ राममोहन पाठक

स्वतन्त्रता के सड़सठ साल बाद भी भारतीयता की प्रतीक वेशभूषा धोती और भारत की समृद्ध भाषा हिन्दी, संस्कृत पर उठे सवाल जवाब मांगते हैं। तामिलनाडु के एक अभिजात्य (इलीट) क्लब में धोती पहने मद्रास उच्च न्यायालय के एक न्यायाधीश और इनके दो साथी वकीलों को प्रवेश नहीं करने दिया गया। राजभाषा हिन्दी के प्रयोग को प्रोत्साहित करने के लिए सोशल मीडिया में जारी केन्द्र सरकार के दो आफिस सर्कुलर तामिलनाडु की मुख्यमन्त्री की अगुवाई में दक्षिण के राज्यों में विवादों में उलझ गए हैं। तीन-चार दशक बाद एक बार फिर दक्षिण के राजनेताओं ने जुमला उछाला है, ‘दक्षिण भारतीयों पर हिन्दी थोपी जा रही है।’
संस्कृति के प्रतीक रूप में वेशभूषा, खानपान, बाल्यावस्था से मृत्यु तक के संस्कारों सहित वाचा (वाणी या भाषा) के साथ ही वपु (शरीर) का विशेष महत्व है। भारत में धोती को पारम्परिक वस्त्र की मान्यता है। क्लबों में ड्रेस कोड के नाम पर इस मनमानी के खिलाफ तामिलनाडु की मुख्यमन्त्री जयललिता की प्रतिक्रिया उचित ही है कि वेशभूषा की वंदिश में भारतीय वस्त्रों पर रोक लगाने वाले ‘क्लबों’ के लाइसेन्स रद् होने चाहिए। स्पष्ट है कि धोती पहनने के आधार पर किया गया क्लब का यह भेदभाव वस्तुतः हमारी संस्कृति का अपमान तो है ही, साथ ही संविधान में प्राप्त वाक् एवं अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता का हनन भी है।
एक ओर हिन्दी को संयुक्त राष्ट्र की भाषा के रूप में वैश्विक प्रतिष्ठा के अभियान चल रहे हैं, वहीं दूसरी ओर भारतीय प्रशासनिक सेवा के लिए होने वाली आईएएस की परीक्षा में हिन्दी को कम महत्व दिए जाने को लेकर देश आक्रोशित और आन्दोलित है। अपने ही घर में हिन्दी का यह विरोध सालों बाद एक बार फिर अंगड़ाई ले रहा है। इसके खतरों से देश को सतर्क होना जरूरी है। गृह मन्त्रालय की यह सफाई अत्यन्त महत्वपूर्ण है कि हिन्दी के प्रोत्साहन को दूसरी भाषाओं की उपेक्षा के तौर पर नहीं लिया जाना चाहिए। किन्तु इसके बावजूद दक्षिण में प्रतिक्रिया तीखी हुई। तमिल, तेलगु, कन्नड़, मलयालम आदि भाषाओं की तरक्की की बातें कहने या माँग करने के बजाय हिन्दी को राजभाषा के रूप में प्रतिष्ठित करने के नई सरकार के प्रयासों में दुर्भावना तलाशने की संकुचित राजनैतिक सोंच के रूप में सामने आई प्रतिक्रिया को अब 1960-70 के पहले जैसा जन समर्थन मिलेगा, यह कदापि सम्भव नहीं। यह पिछले 67 सालों में हुए प्रयासों एवं सामाजिक विकास का प्रतिफल है, जिसमें राष्ट्र हित में और अधिक प्रगति की अपेक्षा थी।
दक्षिण में ही भाषा, खास कर हिन्दी के मामले में वातावरण और परिदृष्य बदल चुका है। महात्मा गाँधी की प्रेरणा से स्थापित दक्षिण भारत हिन्दी प्रचार सभा (टी. नगर, चेन्नई) का परिसर आज हिन्दी का तीर्थ बन चुुका है। जबकि हिन्दी विरोध के दौरान वहाँ आये दिन प्रदर्शन होते थे, बम फूटते थे, जिनके धमाकों की भयावह आवाज हिन्दी पे्रमियों को अपने संकल्प से डिगा न सकी। आज यहांँ हर महीने लगने वाले हिन्दी मेले में हजारों लोग शामिल होते हैं। इसकी अनदेखी कर  राजनैतिक कारणों से हिन्दी को कोसना दक्षिण के आम आदमी की फिदरत नहीं है, इसे सिर्फ राजनैतिक लाभ के चश्में से देखना अलोकतान्त्रिक, भाषाई समरसता और सहभाग के विपरीत है।
भाषा से जुड़ा एक और सवाल या मुद्दा उठा है संस्कृत का। सीबीएसई का हर राज्य के सभी विद्यालयों में 7 से 13 अगस्त तक संस्कृत सप्ताह मनाने का निर्देश इस विवाद का बड़ा कारण क्यों बना? चिन्ता और चिन्तन का विषय है। क्यांेकि संस्कृत का भारत की भाषाई संरचना में एतिहासिक महत्व रहा है। दक्षिण की तमिल, तेलगु, कन्नड़ और मलयालम भाषाओं की जननी के रूप में संस्कृत को विद्वानो की मान्यता प्राप्त है। इसी संस्कृत की रक्षा के लिए 1835 में जो आन्दोलन शुरू हुआ, उसमें संस्कृत भाषा के सवाल पर कलकŸाा में कैलाशचन्द्र दŸा फांसी के फंदे पर झूल गए। लार्ड मैकाले ने अंगे्रजी को संस्कृत के स्थान पर शिक्षा की भाषा और राष्ट्रभाषा बनाने की कोशिश की। इसके विरूद्ध आन्दोलन में सैकड़ों छात्र मरे और घायल हुए।
दक्षिण में अनादि काल से लेकर आज भी संस्कृति की संवाहक संस्कृत ही है। यहाँ के मठ-मन्दिरों में पूजा स्थलों एवं सामाजिक-पारिवारिक संस्कारों में सम्पूर्ण भारत की तरह ही क्षेत्रीय भाषाओं में नहीं, बल्कि संस्कृत में धार्मिक कार्य सम्पन्न होते है। भारत ही नहीं तो विश्व भर में फैले हिन्दु परिवारों में जन्म-विवाह से लेकर मृत्यु तक सभी कर्मकाण्ड संस्कृत में ही होने की प्राचीन परम्परा, हमारे ऋषियों द्वारा भारत की एकात्मता की दूरगामी दृष्टि थी, जो आज भी जीवित है। भारतीय संस्कृति और संस्कृत को समर्पित आदि शंकराचार्य कालाडि (केरल) से ही आये थे। देश में स्थापित चार शंकराचार्य पीठ और कांची कामकोटि पीठ में स्थापित उनका आम्नाय (मठ) आज भी संस्कृत का केन्द्र है। इस पीठों के निर्देशन में सैकड़ों संस्कृत विश्वविद्यालय देश भर में चल रहे है।
भारत-योरोप भाषा परिवार की लैटिन, ग्रीक आदि तमाम भाषाओं की जननी के रूप में संस्कृत को मान्यता प्राप्त है। नेपाली, तिब्बती, बर्मी, पाली-प्राकृत-अपभं्रश सभी के सूत्र संस्कृत में निहित है। राजनैतिक और भाषाई संकीर्णता के आधार पर  संस्कृत को अमान्य कर देने की सोच रखने वाले अभारतीय ही होगे।
व्यावहारिक तौर पर भी संस्कृत को विश्व में मान्यता और महत्व प्राप्त है। वर्तमान में वैज्ञानिक प्रगति के प्रतीक कम्प्युटर की वैश्विक भाषा के रूप में सर्वाधिक उपयुक्त संस्कृत को ही पाया गया है। इसे ही ध्यान में रखते हुए सर्वोच्च न्यायालय की दो सदस्यीय पीठ ने ऐतिहासिक निर्णय में कहाकि ‘भारतवासी संस्कृत का अध्ययन देश की संास्कृतिक धरोहर की रक्षा के लिए करते है।’ ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्र में देश के हजारों संस्कृत विद्वानों के अवदान को विस्मृत नहीं किया जा सकता। विदेशी भाषा के विद्वान मैक्स मूलर, ग्रियर्सन, हवस्ले, दारा शिकोह ने संस्कृत का अध्ययन कर विश्व को इसके महत्व से परिचित कराया। संस्कृत, हिन्दी और धोती का प्रश्न भारतीय संस्कृति से जुड़ा है। संकुचित राजनैतिक स्वार्थों एवं क्षेत्रीयता की दृष्टि से इन प्रश्नो को विवाद का मुद्दा बनाना राष्ट्रीय हित के विरूद्ध है।