गंगा संरक्षण हेतु गंगोत्री से गंगा सागर तक व्यापक क्षेत्र में सामाजिक सहयोग से कार्य करने वाले संगठनों, व्यक्तियों को जोड़ने एवं उनके प्रबोधन व प्रशिक्षण कार्य की निश्चित दीर्घकालिक योजना व सुनिश्चित दृष्टि आवश्यक है। इस निमिŸा विचारणीय बिन्दु प्रस्तुत हैंः-
(1) गंगा की अविरलता सुनिश्चित हो और उसमें पर्याप्त जल रहे।
(2) गंगा जल की गुणवŸाा आचमन योग्य रहे। उसकी स्वच्छता, पवित्रता, शुद्धता की मान्यता बनी रहे।
(3) गंगा के जल की उपयोगिता का संतुलित विचार हो।
(4) जल विद्युत हो, पर उपरोक्त पक्ष दुर्लक्षित न हांें।
गंगा के प्रति सामाजिक जागरूकता, नरेन्द्र मोदी का संसदीय क्षेत्र काशी होना, गंगा पूजन तथा गंगा मन्त्रालय बनने के कारण, गंगा सरक्षण के प्रति समाज में विश्वास जागा है। अतः अब हमें इस कार्य में सामाजिक आस्था, स्वच्छता के प्रति जागरण, प्रबोधन एवं संगठन तथा इस सब में उस समाज की भूमिका का विचार करना है, जिनका गंगा से अटूट नाता है, वे हैं -
(1) गंगा के प्रति आस्थावान समाज, जिसके हर शुभाशुभ् कार्य में गंगा जल का महत्व है।
(2) नाविक, मल्लाह जिनका हजारों पीढि़यों से गंगा से नाता है।
(3) पण्डा, पुरोहित समाज, जिनकी आजीविका गंगा पर निर्भर है।
(4) पूजा सामग्री के व्यापारी।
(5) गंगा के किनारे सब्जी की खेती करने वाले समाज आदि का विचार करना होगा।
- इसके साथ ही उनके लिए कुछ कार्यक्रम, जैसे - गंगा आरती हो तो उसका स्वरूप क्या हो, कौन सी आरती हो तथा उसकी पद्धति क्या हो? आदि का विचार करना होगा।
- गंगा तटीय क्षेत्र में अन्य करणीय कार्य हो सकते हैं, जैसे - बड़े-बड़े जलाशयो, गंगा सरोवरों का निर्माण, वर्षा जल एवं भू-गर्भ जल संरक्षण एवं संवर्धन तथा वृक्षारोपण, घाट-तट स्वच्छता एवं सज्जा आदि।
- समाज को जोड़ने एवं उनमें उत्तरदायित्व का भाव विकसित करने हेतु ग्राम, घाट, खण्ड एवं जिला स्तरीय गंगा समग्र समितियों का गठन।
- गंगा एवं नदियों सम्बन्धी कानूनो, कानून के जानकारों एवं इस सम्बन्ध में याचिका-कर्ताओं की जानकारी रखनी होगी।
- न्यायालयों द्वारा दिये गए निर्णयों के अनुसार आगे न्यायिक कार्य, न्यायिक सम्मान तथा निर्णयों का पालन सुनिश्चित कराना होगा।
- गंगा तटवर्ती 10 से 20 कि॰मी॰ के क्षेत्र में रसायन मुक्त गौ आधारित खेती पर बल तथा उसके लिए आवश्यक व्यवस्था निर्माण करना आवश्यक है।
- ‘गंगा वन’ निर्माण, इस हेतु क्षेत्रों का चयन, तटवर्ती उपयोगी वृक्ष-तालिका बनाकर सघन वृक्षारोपण कार्य।
- आज समाज को ऐसा लगता है कि, गंगा को पूर्व स्थिति में हम ला सकते हैं, ऐसा होना चाहिए और ऐसा हो सकता है का विश्वास जागा है। इस विश्वास को पूरा करने के लिए संगठनात्मक संरचना बनानी होगी।
- जल, जंगल, प्रकृति एवं वन्य जीव संरक्षण की साधना करनी होगी।
- मिशन भाव वाले कार्यकर्ताओं का चयन कर उन्हें इस कार्य में लगाना होगा।
- कार्य की सफलता के लिए सभी स्तरों पर कार्यकर्ताओं में अनुशासन, आकांक्षा रहित कार्य करने का स्वभाव संस्कार के लिए प्रबोधन, प्रशिक्षण करना होगा।
- गंगा समग्र के कार्य की रचना, राजनैतिक भावना से मुक्त करनी होगी।
- इस कार्य से आत्मिक, आध्यात्मिक सुख मिलेगा, ऐसा राष्ट्रीय महत्व का विषय बनाऐं।
- जल सम्पदा के अन्र्तगत वर्षा जल, भूगर्भ जल तथा नदियों का जल आता है, अतः सभी पक्षों पर कार्य करना होगा।
- अभी तक गंगा अविरल रहे, इसके विपरीत कार्य हुए हैं। यद्यपि गोमुख से आने वाली भगीरथी पर पूर्व स्वीकृत चार प्रोजेक्ट स्थगित हो गए है, अतः आवश्यक है कि अब उस पर कोई नए बांध न बनेे।
- यद्यपि देश में कुल उत्पादित एक लाख छियालीस हजार मेगावाट बिजली के सापेक्ष्य भगीरथी पर निर्मित बांधों से मात्र 2 हजार मेगावाट बिजली का उत्पादन बहुत ही कम है, इस प्रकाश में बाधों पर विचार होना चाहिए। ..... नदी बहती रहनी चाहिए।
- इस कार्य का व्यापक परिदृश्य है, व्यापक कार्य है। यह केवल नदी बचाने का कार्य नहीं, सामाजिक जागरण का भी है।
- संकल्पवान समाज ही संसार में गौरव का अधिकारी है। जापान का संकल्प हमारे सामने है। जापान में जब परमाणु विद्युुत संयन्त्र के कारण महाविनाश आया, तो जापान ने ऐसी विनाशकारी व्यवस्था को तत्काल बन्द करने का निर्णय लिया और उस निर्णय का तत्काल क्रियान्वयन कर विश्व के सामने, एक उदाहरण प्रस्तुत किया।
- आज हमारे सामने भी देश की मान्यताओं, प्रतीकों का प्रश्न है। अतः हमें भी आस्था, श्रद्धा एवं समग्रता के आधार पर निर्णय लेकर कार्य करना है।
गंगा संरक्षण हेतु अन्य आवश्यक सुझाव -
1. वर्षा जल के रीचार्जिंग का कार्य किया जाये।
2. प्रदूषित जल का शोधन कर, फैक्ट्रियों में ही उनका पुनः प्रयोग किया जाये अथवा सिंचाई में प्रयोग हो, गंगा में न डाला जाये।
3. कुम्भ के अवसर पर गंगा में 2.50 से 3 हजार क्यूसिक जल चाहिए, गंगा में जल की यह मात्रा कैसे उपलब्ध होगी? विचार किया जाये।
4. अण्डमान निकोबार में सर्वत्र खारा पानी ही है, वहाँ वर्षा जल संग्रहण का सफल प्रयोग किया जाता है, यहाँ भी करें।
5. तालाबों को ठीक किया जाये, तालाबों से निकलने वाली सिल्ट का उपयोग खेतों में किया जाये, जिससे खेत की उपज बढ़ेगी और तालाबों की नियमित रूप से सफाई होती रहेगी।
6. गंगा समग्र व गंगा प्रकोष्ठ के कार्यों का स्वरूप सुनिश्चित हो।
7. नगरीय इकाइयों के साथ ही नगर पंचायतों को भी जोड़ा जाये।
8. गंगा की बाढ़ से प्रभावित बंगाल व बिहार के क्षेत्रों की समस्या का विचार किया जाये।
9. कटान रोकने के लिए गंगा के प्रवाह क्षेत्र की गहराई बढ़ाई जाये।
10. गंगा के किनारे के स्रोतों व कुण्डों को ठीक किया जाये।
11. हिमालय के पहाड़ों पर डायनामाइट का प्रयोग न हो।
12. गंगा में बढ़ रहे हानिकारक रसायनों का शोध तथा गंगा में उनके बढ़ने के स्रोतों की खोज कर उनके खिलाफ कानूनी कार्यवाही की जाये।
13. गंगा सहित सभी नदियों में खनन आवश्यक व उपयोगी है, पर उसके अनुपात का ध्यान रखा जाये।
14. गंगा की नीतियाँ हैं, पर उसका पालन नहीं। पालन व्यवस्था बनाने पर ध्यान दिया जाये।
15. गंगा सम्बन्धी नियमों के अनुपालन के लिए संवैधानिक संस्था नेशनल ग्रीन टेªवुनल (एन.जी.टी.) बहुत उपयोगी है। इसका उपयोग किया जाये।
16. मध्य प्रदेश में गणपति प्रतिमाओं का निर्माण घर पर ही, छोटे आकार में कच्ची मिट्टी से तथा खाने योग्य रंगो से किया जाने लगा है। उसका विसर्जन भी घर पर बाल्टी के जल में किया जाता है और उस जल का उपयोग बगीचे के पेड़ों गमलों में कर लेते हैं। यही प्रथा गंगा क्षेत्र में प्रारम्भ की जाये।
17. नदियों को हम गंदा न करें, नदियाँं अपने आपको स्वयं साफ कर लेती हैं।
18. नदियों में सिल्ट बढ़ने का कारण मिट्टी का कटान है। कटान बढ़ने का कारण पेड़ों की कटाई है। अतः उसका निदान वृक्षारोपण ही है।
19. बूचड़खानों एवं चमड़ा उद्योग से नदियाँ प्रदूषित होती हैं, उनका विचार करें, विस्तार रोकें।
20. ‘हमारी नदियाँ’ नामक विनोवा जी की एक महत्वपूर्ण पुस्तक है, जिसकी पुनः छपाई हो रही है, जो आवश्यकतानुसार उसका उपयोग करें।
21. आवश्यकतानुसार मार्ग दर्शक मण्डल, संरक्षक मण्डलों का गठन किया जा सकता है।
22. गाँव/घाट/आस्था स्थलों/ जलस्रोतों/तालाबों/झीलों की सफाई, वृक्षारोपण तथा गंगा आरती के कार्यों द्वारा सामाजिक एकत्रीकरण व प्रबोधन/प्रशिक्षण की प्रक्रिया प्रारम्भ करें।
23. ऐसे सरल कार्यक्रम प्रारम्भ में लिए जायें, जिनके माध्यम से स्वच्छता, आस्था, सहकार एवं श्रमदान की भावना बलवती हो। ु
(1) गंगा की अविरलता सुनिश्चित हो और उसमें पर्याप्त जल रहे।
(2) गंगा जल की गुणवŸाा आचमन योग्य रहे। उसकी स्वच्छता, पवित्रता, शुद्धता की मान्यता बनी रहे।
(3) गंगा के जल की उपयोगिता का संतुलित विचार हो।
(4) जल विद्युत हो, पर उपरोक्त पक्ष दुर्लक्षित न हांें।
गंगा के प्रति सामाजिक जागरूकता, नरेन्द्र मोदी का संसदीय क्षेत्र काशी होना, गंगा पूजन तथा गंगा मन्त्रालय बनने के कारण, गंगा सरक्षण के प्रति समाज में विश्वास जागा है। अतः अब हमें इस कार्य में सामाजिक आस्था, स्वच्छता के प्रति जागरण, प्रबोधन एवं संगठन तथा इस सब में उस समाज की भूमिका का विचार करना है, जिनका गंगा से अटूट नाता है, वे हैं -
(1) गंगा के प्रति आस्थावान समाज, जिसके हर शुभाशुभ् कार्य में गंगा जल का महत्व है।
(2) नाविक, मल्लाह जिनका हजारों पीढि़यों से गंगा से नाता है।
(3) पण्डा, पुरोहित समाज, जिनकी आजीविका गंगा पर निर्भर है।
(4) पूजा सामग्री के व्यापारी।
(5) गंगा के किनारे सब्जी की खेती करने वाले समाज आदि का विचार करना होगा।
- इसके साथ ही उनके लिए कुछ कार्यक्रम, जैसे - गंगा आरती हो तो उसका स्वरूप क्या हो, कौन सी आरती हो तथा उसकी पद्धति क्या हो? आदि का विचार करना होगा।
- गंगा तटीय क्षेत्र में अन्य करणीय कार्य हो सकते हैं, जैसे - बड़े-बड़े जलाशयो, गंगा सरोवरों का निर्माण, वर्षा जल एवं भू-गर्भ जल संरक्षण एवं संवर्धन तथा वृक्षारोपण, घाट-तट स्वच्छता एवं सज्जा आदि।
- समाज को जोड़ने एवं उनमें उत्तरदायित्व का भाव विकसित करने हेतु ग्राम, घाट, खण्ड एवं जिला स्तरीय गंगा समग्र समितियों का गठन।
- गंगा एवं नदियों सम्बन्धी कानूनो, कानून के जानकारों एवं इस सम्बन्ध में याचिका-कर्ताओं की जानकारी रखनी होगी।
- न्यायालयों द्वारा दिये गए निर्णयों के अनुसार आगे न्यायिक कार्य, न्यायिक सम्मान तथा निर्णयों का पालन सुनिश्चित कराना होगा।
- गंगा तटवर्ती 10 से 20 कि॰मी॰ के क्षेत्र में रसायन मुक्त गौ आधारित खेती पर बल तथा उसके लिए आवश्यक व्यवस्था निर्माण करना आवश्यक है।
- ‘गंगा वन’ निर्माण, इस हेतु क्षेत्रों का चयन, तटवर्ती उपयोगी वृक्ष-तालिका बनाकर सघन वृक्षारोपण कार्य।
- आज समाज को ऐसा लगता है कि, गंगा को पूर्व स्थिति में हम ला सकते हैं, ऐसा होना चाहिए और ऐसा हो सकता है का विश्वास जागा है। इस विश्वास को पूरा करने के लिए संगठनात्मक संरचना बनानी होगी।
- जल, जंगल, प्रकृति एवं वन्य जीव संरक्षण की साधना करनी होगी।
- मिशन भाव वाले कार्यकर्ताओं का चयन कर उन्हें इस कार्य में लगाना होगा।
- कार्य की सफलता के लिए सभी स्तरों पर कार्यकर्ताओं में अनुशासन, आकांक्षा रहित कार्य करने का स्वभाव संस्कार के लिए प्रबोधन, प्रशिक्षण करना होगा।
- गंगा समग्र के कार्य की रचना, राजनैतिक भावना से मुक्त करनी होगी।
- इस कार्य से आत्मिक, आध्यात्मिक सुख मिलेगा, ऐसा राष्ट्रीय महत्व का विषय बनाऐं।
- जल सम्पदा के अन्र्तगत वर्षा जल, भूगर्भ जल तथा नदियों का जल आता है, अतः सभी पक्षों पर कार्य करना होगा।
- अभी तक गंगा अविरल रहे, इसके विपरीत कार्य हुए हैं। यद्यपि गोमुख से आने वाली भगीरथी पर पूर्व स्वीकृत चार प्रोजेक्ट स्थगित हो गए है, अतः आवश्यक है कि अब उस पर कोई नए बांध न बनेे।
- यद्यपि देश में कुल उत्पादित एक लाख छियालीस हजार मेगावाट बिजली के सापेक्ष्य भगीरथी पर निर्मित बांधों से मात्र 2 हजार मेगावाट बिजली का उत्पादन बहुत ही कम है, इस प्रकाश में बाधों पर विचार होना चाहिए। ..... नदी बहती रहनी चाहिए।
- इस कार्य का व्यापक परिदृश्य है, व्यापक कार्य है। यह केवल नदी बचाने का कार्य नहीं, सामाजिक जागरण का भी है।
- संकल्पवान समाज ही संसार में गौरव का अधिकारी है। जापान का संकल्प हमारे सामने है। जापान में जब परमाणु विद्युुत संयन्त्र के कारण महाविनाश आया, तो जापान ने ऐसी विनाशकारी व्यवस्था को तत्काल बन्द करने का निर्णय लिया और उस निर्णय का तत्काल क्रियान्वयन कर विश्व के सामने, एक उदाहरण प्रस्तुत किया।
- आज हमारे सामने भी देश की मान्यताओं, प्रतीकों का प्रश्न है। अतः हमें भी आस्था, श्रद्धा एवं समग्रता के आधार पर निर्णय लेकर कार्य करना है।
गंगा संरक्षण हेतु अन्य आवश्यक सुझाव -
1. वर्षा जल के रीचार्जिंग का कार्य किया जाये।
2. प्रदूषित जल का शोधन कर, फैक्ट्रियों में ही उनका पुनः प्रयोग किया जाये अथवा सिंचाई में प्रयोग हो, गंगा में न डाला जाये।
3. कुम्भ के अवसर पर गंगा में 2.50 से 3 हजार क्यूसिक जल चाहिए, गंगा में जल की यह मात्रा कैसे उपलब्ध होगी? विचार किया जाये।
4. अण्डमान निकोबार में सर्वत्र खारा पानी ही है, वहाँ वर्षा जल संग्रहण का सफल प्रयोग किया जाता है, यहाँ भी करें।
5. तालाबों को ठीक किया जाये, तालाबों से निकलने वाली सिल्ट का उपयोग खेतों में किया जाये, जिससे खेत की उपज बढ़ेगी और तालाबों की नियमित रूप से सफाई होती रहेगी।
6. गंगा समग्र व गंगा प्रकोष्ठ के कार्यों का स्वरूप सुनिश्चित हो।
7. नगरीय इकाइयों के साथ ही नगर पंचायतों को भी जोड़ा जाये।
8. गंगा की बाढ़ से प्रभावित बंगाल व बिहार के क्षेत्रों की समस्या का विचार किया जाये।
9. कटान रोकने के लिए गंगा के प्रवाह क्षेत्र की गहराई बढ़ाई जाये।
10. गंगा के किनारे के स्रोतों व कुण्डों को ठीक किया जाये।
11. हिमालय के पहाड़ों पर डायनामाइट का प्रयोग न हो।
12. गंगा में बढ़ रहे हानिकारक रसायनों का शोध तथा गंगा में उनके बढ़ने के स्रोतों की खोज कर उनके खिलाफ कानूनी कार्यवाही की जाये।
13. गंगा सहित सभी नदियों में खनन आवश्यक व उपयोगी है, पर उसके अनुपात का ध्यान रखा जाये।
14. गंगा की नीतियाँ हैं, पर उसका पालन नहीं। पालन व्यवस्था बनाने पर ध्यान दिया जाये।
15. गंगा सम्बन्धी नियमों के अनुपालन के लिए संवैधानिक संस्था नेशनल ग्रीन टेªवुनल (एन.जी.टी.) बहुत उपयोगी है। इसका उपयोग किया जाये।
16. मध्य प्रदेश में गणपति प्रतिमाओं का निर्माण घर पर ही, छोटे आकार में कच्ची मिट्टी से तथा खाने योग्य रंगो से किया जाने लगा है। उसका विसर्जन भी घर पर बाल्टी के जल में किया जाता है और उस जल का उपयोग बगीचे के पेड़ों गमलों में कर लेते हैं। यही प्रथा गंगा क्षेत्र में प्रारम्भ की जाये।
17. नदियों को हम गंदा न करें, नदियाँं अपने आपको स्वयं साफ कर लेती हैं।
18. नदियों में सिल्ट बढ़ने का कारण मिट्टी का कटान है। कटान बढ़ने का कारण पेड़ों की कटाई है। अतः उसका निदान वृक्षारोपण ही है।
19. बूचड़खानों एवं चमड़ा उद्योग से नदियाँ प्रदूषित होती हैं, उनका विचार करें, विस्तार रोकें।
20. ‘हमारी नदियाँ’ नामक विनोवा जी की एक महत्वपूर्ण पुस्तक है, जिसकी पुनः छपाई हो रही है, जो आवश्यकतानुसार उसका उपयोग करें।
21. आवश्यकतानुसार मार्ग दर्शक मण्डल, संरक्षक मण्डलों का गठन किया जा सकता है।
22. गाँव/घाट/आस्था स्थलों/ जलस्रोतों/तालाबों/झीलों की सफाई, वृक्षारोपण तथा गंगा आरती के कार्यों द्वारा सामाजिक एकत्रीकरण व प्रबोधन/प्रशिक्षण की प्रक्रिया प्रारम्भ करें।
23. ऐसे सरल कार्यक्रम प्रारम्भ में लिए जायें, जिनके माध्यम से स्वच्छता, आस्था, सहकार एवं श्रमदान की भावना बलवती हो। ु





