प्रचीन काल से भारत शिक्षा का महत्वपूर्ण केन्द्र था। यहांँ पर बड़े-बड़े विश्वविद्यालय थे जिनमें पूरे विश्व के हजारों छात्र शिक्षा लेने आते थे। उनमें से कुछ की संक्षिप्त जानकारी प्रस्तुत है।
(1) तक्षशिला विश्वविद्यालय - तक्षशिला प्राचीन भारत में गांधार देश की राजधानी और शिक्षा का प्रमुख केन्द्र था। यह विश्व का प्रथम विश्वविद्यालय था जिसकी स्थापना 700 वर्ष ईसा पूर्व में हुई थी, वह तक्षशिला वर्तमान समय में पाकिस्तान के पंजाब प्रान्त के रावलपिण्डी जिले की एक तहसील है। तक्षशिला की जानकारी सर्वप्रथम वाल्मीकि रामायण से होती है, जहांँ अयोध्या के राजा श्रीरामचन्द्र की विजय के पश्चात उनके छोटे भाई भरत ने अपने नाना केकयराज अश्वपति के आमंत्रण और उनकी सहायता से गंधर्वो के देश (गांधार) को जीता और अपने दो पुत्रों को वहाँ का शासक नियुक्त किया। गंधर्व देश सिधु नदी के दोनों किनारे स्थित था, उसके दोनो ओर भरत के तक्ष और पुष्कल नामक दोनो पुत्रों ने अपनी-अपनी राजधानियांँ तक्षशिला सिन्धु के पूर्वी तट पर और पुष्करावती पश्चिमी तट पर बसाईं।
तक्षशिला विश्वविद्यालय में पूरे विश्व के 10,500 से अधिक छात्र अध्ययन करते थे, जहाँ 60 से अधिक विषयों की पढ़ाई होती थी। विभिन्न विषयों पर शोध का भी प्रबन्ध था। प्राचीन भारतीय साहित्य के अनुसार पाणिनी, कौटिल्य, चन्द्रगुप्त, जीवक, कौशलराज, प्रसेनजित आदि महापुरूषों ने इसी विश्वविद्यालय से शिक्षा प्राप्त की।
(2) नालंदा विश्वविद्यालय - पांचवी सदी के विश्व विख्यात शिक्षा केन्द्र नालंदा विश्वविद्यालय, जो वर्तमान बिहार राज्य में पटना से 88.5 किमी दक्षिण पूर्व और राजगीर से 11.5 किमी उŸार में स्थित था, जिसके भग्नावशेष इसके प्रचीन वैभव का बहुत कुछ अंदाज करा देते हैं। अनेक पुराभिलेखों और सातवीं सदी में भारत भ्रमण के लिए आए चीनी यात्री ह्वेनसांग जिन्होनें अपने जीवन का महत्वपूर्ण एक वर्ष इस विश्वविद्यायल में छात्र तथा शिक्षक के रूप में बिताया तथा इत्सिंग के यात्रा विवरणों से इस विश्वविद्यायल के बारे में विस्तृत जानकारी प्राप्त होती है। यहांँ 10,000 छात्रों की पूर्ण आवासीय व्यवस्था थी, जिन्हें पढ़ाने के लिए 2,000 शिक्षक थे। यहांँ सभागार के जो भग्नावशेष मिले हैं, उसमें 8,000 छात्रों के बैठने की क्षमता थी। यहांँ भारत के अतिरिक्त कोरिया, जापान, चीन, तिब्बत, इण्डोनेशिया, फारस तथा तुर्की से भी विद्यार्थी शिक्षा के लिए आते थे।
इस विश्वविद्यालय की स्थापना का श्रेय गुप्त शासक कुमार गुप्त प्रथम 450-470 को प्राप्त है। इसे महान सम्राट हर्षवर्द्धन और पाल शासकों का भी संरक्षण मिला। इस विश्वविद्यालय की नौवीं से बारहवीं सदी तक अन्र्तराष्ट्रीय ख्याति रही, जिसे आज से लगभग 800 वर्ष पूर्व विदेशी आक्रमणकारियों ने नष्ट कर दिया।
पिछले दिनों जब पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम नालंदा जिले में एक रेल कोच कारखाने के शिलान्यास के लिए पहूँचे, तो उन्होनें तत्कालीन रेल मन्त्री नितीश कुमार से नालंदा विश्वविद्यालय को दुबारा जिन्दा करने की चर्चा की। उसके बाद इस दिशा में कार्य प्रारम्भ हुआ और अक्टूबर 2009 में पूर्वी एशियाई देशों के शिखर सम्मेलन में नालंदा विश्वविद्यालय की स्थापना को लेकर सहमति बनी। तत्पश्चात् बिहार विधान सभा में विधेयक परित हुआ और 2010 में इससे सम्बन्धित विधेयक संसद की मंजूरी के लिए विदेश मन्त्रालय में प्रस्तुत किया गया, जो अब व्यवहार में जमीन पर उतर रहा है।
वर्तमान में इस विश्वविद्यालय के पुनर्जीवन क्रम में यहाँ प्रवेश के लिए 40 देशों के एक हजार आवेदनों में से चयनित केवल 15 छात्रों के साथ 2 सितम्बर, 2014 से पढ़ाई प्रारम्भ हो गई है। यहांँ विश्व के अन्य देशों के दोे शिक्षक भी हैं। यह विश्वविद्यालय शिक्षा की दृष्टि से अपने आप में अनूठा, शोध कार्यों की प्राथमिकता से युक्त हार्वड और आक्सफोर्ड के समकक्ष होगा। इसका विश्वस्तरीय निर्माण लगभग एक हजार एकड़ भूमि पर 2020 तक पूरा होना है, जिसमें से 500 एकड़ भूमि का अधिग्रहण हो चुका है।
(3) विक्रमशिला विश्वविद्यालय - आठवीं शताब्दी के पाल वंश के शासक धर्मपाल द्वारा (770-820 ईशा से पूर्व) बिहार प्रान्त के भागलपुर में विक्रमशिला की स्थापना की गई थी। यहांँ पर बौद्ध धर्म, दर्शन के अतिरिक्त न्याय, तत्वज्ञान एवं व्याकरण का भी अध्ययन कराया जाता था। इस विश्वविद्यालय में लगभग 3,000 अध्यापक कार्यरत थे। इस विश्वविद्यालय के सर्वाधिक प्रतिभाशाली भिक्षु ‘दीपंकर’ ने लगभग 200 ग्रन्थों की रचना की थी। 1204 ईसवी में बख्तियार खिलजी के आक्रमण के परिणाम स्वरूप यह विश्वविद्यालय नष्ट हो गया। भविष्य में विक्रम तक्षशिला विश्वविद्यालय के पुर्नजीवन और उसके गौरव की पुर्नप्रतिष्ठा की दिशा में भी प्रयत्न प्रारम्भ हुए हैं। ु





