आज समाज में पर्यावरण के प्रति अपने कर्तव्यों को सोचने और उसके अनुरूप कुछ करने का भाव प्रबल हुआ है। अनेक कार्य ऐसे हो गये जिनमें तो प्रयाश्चित की आवश्यकता है। गंगा की अविरलता और निर्मलता ऐसा ही विषय है। अतः विचारणीय है कि, जब तक गंगा जी में जल का प्रवाह नहीं होगा तब-तक निर्मल गंगा-अविरल गंगा के बारे में सोचा नहीं जा सकता। उत्तर प्रदेश में वर्ष 1960 में हजारों की संख्या से लाखांे की संख्या में ट्यूबवेल की स्थापना होने के कारण गंगा जी के किनारे भूजल स्तर (ळॅस्) जमीनी सतह से पहले जो 7-8 मीटर नीचे था वह अब 35 मीटर से अधिक हो गया है। इस प्रक्रिया के कारण गंगा जी का जल प्रवाह के बजाय भूमि में रिसना पूर्व की अपेक्षा अब ज्यादा हो रहा है। देश के लोगांे को पीने के लिए पानी तथा अन्न की पैदावार के लिए ट्यूबवेल बड़ा साधन है जिसे बंद नही किया जा सकता है। हिमालय घाटी में उत्तर प्रदेश सिंचाई विभाग के माध्यम से गंगा जी पर टेहरी बाँध का निर्माण करवाया गया है जिसमें बरसात में बहने वाले पानी का भण्डारण होता है। इसके निर्माण के कारण अपर गंगा परियोजना में 5000 क्यूसेक पानी अतिरिक्त की आपूर्ती होने लगी है जो खेती तथा पीने के लिए प्रयोग में आता है।
भारत सरकार ‘‘नमामि गंगे’’ परियोजना के माध्यम से गंगा जी में जल की मात्रा की कमी, जल प्रदूषित होना तथा निर्मल धारा को प्रवाहमय रखने के लिए प्रयत्नशील है। लोगों का यह सोचना है कि टिहरी बाँध के निर्माण के कारण गंगा जी में ये प्रवाह संकट उत्पन्न हुआ है। इस संकट से बाहर निकलने के प्रयास हेतु निम्न प्रस्ताव हैं:-
1. परियोजना की सफलता हेतु ठम्छब्भ् ड।त्ज्ञप्छळ की जाय। कानपुर या प्रयाग में गंगा जी में उपलब्ध जल की मात्रा व गुणवत्ता प्राप्ति हेतु (वर्ष 1960 या उसके आसपास) को आधार बनाया जाय। बरसात में बहने वाले पानी का भण्डारण करके गंगा जी में उसके स्मंद च्मतपवक में विनियमित (त्महनसंजमक) प्रवाह किया जाय। इसके लिए गंगा बेसिन विशेषकर उत्तर प्रदेश की नदियों तथा नालों में चेक डैम आदि का निर्माण समय बद्धता के साथ किया जाय।
2. यमुना नदी पर शंकरगढ़, चिल्लाघाट तथा हमीरपुर से नीचे तीन बैराजों का निर्माण किया जाय। लगभग 700 करोड़ प्रति बैराज के खर्च से 2100 करोड़ रूपये में गंगा में यमुना के माध्यम से उसके स्मंद च्मतपवक में लगभग 1200 क्यूसेक पानी की उपलब्धता सम्भव हो सकती है। शंकरगढ़ बैराज परियोजना सम्भवतः ब्ॅब् द्वारा अनुमोदित भी है। इसे अविलम्ब प्रारम्भ किया जाय।
3. सिंचाई परियोजनाओं में ॅन्म् ;ूंजमत नेम मििपबपमदबलद्ध बढ़ाकर तथा ब्तवचचपदह च्ंजजमतद में संशोधन कर 05-10ः नदी जल नहरों से बचत कर गंगा में जल बहाव को बढ़ाया जाये।
4. ैज्च् का संचालन व्छ स्प्छम् ैलेजमउ त्मबवतकपदह द्वारा प्रभावी किया जाय।
5. उद्योगों के म्ििसनमदज को ज्तमंजए त्मबलबसम - त्मनेम उद्योगों में ही किया जाय। छव ैमूंहमए छव म्ििसनमदज सिवू जव त्पअमत का अनुपालन सुनिष्चित हो।
6. गंगा समग्र में न्यायिक पैनल को प्रभावी किया जाय।
7. गंगा जी के किनारों के गाँवों में ठपव.वनजसमजए स्वच्छता एवं जन-जागरण हेतु शिक्षा केन्द्रों की स्थापना की जाय।
8. विगत 30 वर्षो में भारत की जलवायु में अत्यधिक परिवर्तन हुआ है। इसके वैश्विक तथा हिमालय घाटी के म्बव ैलेजमउ को प्रभावित करने वाले सभी च्ंतंउमजमते का समावेश करते हुए संशोधन कार्य किया जाय। संशोधन का उपयोग हिमालय घाटी एवं नदी जीवन की समग्रता और मौसम के सकारात्मक प्रभाव हेतु किया जाय।
9. टेहरी बाँध से अविरल प्रवाह हेतु 300-400 क्यूसेक का एक व्नजसमज है। गंगा जी में अविरल प्रवाह हेतु मानकों के आधार पर अन्य व्नजसमज की सम्भावना पर विचार किया जाय।
10. जो नदियाँ त्महपउ ैजंजम में हैं उनमें सिल्ट सफाई उपयोगी नही सिद्ध होगी। ऋषीकेश से ऊपर हिमालय घाटी में बैराज निर्माण व्यवहारिक नहीं है। अतः गंगा जी में जल की मात्रा तथा प्रवाह की गति बढ़ाने हेतु यदि आवश्यकता हो तो घाटी में 40-50 मीटर ऊचाई का बाँध निर्मित हो जिसमें नदी तल से ही जल प्रवाह का प्राविधान हो और उसके फाटक त्ंकपंस हांे। इस बाँध के जल भण्डारण का उपयोग केवल गंगा जी में गंगा को अविरल गंगा-निर्मल गंगा हेतु ही हो।
उपरोक्त कार्यांे की समीक्षा के पश्चात,् क्रियान्वयन से ‘नमामि गंगे परियोजना’ कम लागत तथा सफलता से अगले पांँच वर्षों तक निश्चित होगी ही और गंगा के किनारे तीर्थ, ‘मानव के आनन्द स्थल’ बनेंगे। गंगा मैया के अविरल-निर्मल प्रवाह की बाधाओं की समाप्ति ज्ञान-विज्ञान पूरक संयोजन से ही होगी, ऐसा मेरा व्यक्तिगत दृढ़ विश्वास है। ु





