Tuesday, November 18, 2014

स्मृति मन्दिर में माँ-पिता बैठे हैं।- प्रो॰ हेमराज मीणा ‘दिवाकर’


मुझें अपने खेतों में
हल चलाते पिता याद आते हैं
पर मांँ! कुछ ज्यादा याद आती हैं।
हर रोज दही विलोकर
ताजा-ताजा लौनी घी
मांँ ही खिलाती थीं,
रात को बची बाजरे की
ठंढ़ी रोटी पर रख कर।
माँ हर रोज तड़के में
चाकी से बेजड़ का चून पीस कर
चूल्हे पर गरम-गरम
ताजा रोटी पका कर
मुझे ठीक से खिला-पिलाकर
नातडे में दो रोटी बांधकर
कांखी से बाल सूत कर
प्रतिदिन स्कूल में पढ़ने भेजती थीं।
मैं आज जहांँ खड़ा हूँ
जो यात्रा मैने तय की है
जितना और जान पाया हूँ
इसके पीछे मेरे किसान पिता की
जी तोड़ कड़ी मेहनत
और माँ के आर्शीवाद की सुगन्ध है।
मेरे स्मृति मन्दिर में
मांँ-पिता बैठे हैं।
जो आज भी
मुझे भटकने से रोकते हैं।
साथ ही
मैं किस जमीन से आया हूंँ
मैं कौन हूँ
यह बोध कराते हैं।
- केन्द्रीय हिन्दी संस्थान, हैदराबाद।