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Tuesday, November 18, 2014

क्या, हम कर सकते है? -

पर्यावरणीय परिसर संरचना निर्माण -
(1) हरियाली - जहांँ हरियाली हो, हरियाली मे फलदार व औषधीय गुणवŸाा के पौधे हों, उसकी गुणवत्ता व उपयोग की जानकारी उपलब्ध हो, हरियाली में सौन्दर्य हो, सौन्दर्य में पुष्प हों, पुष्पों में सुगन्ध हो।
(2) जल - वर्षा जल संरक्षण एवं रिचार्जिंग की व्यवस्था हो, उपयोग किए हुए पानी का परिसर में ही सदुपयोग हो।
(3) स्वच्छता - परिसर स्चच्छ रहे, समुचित व नियमित व्यवस्था हो। कूड़ा-कचरा निस्तारण एवं उसके सदुपयोग के परिसर में ही उपाय हों।
(4) जैव विविधता - जैव विविधता के समन्वय, संरक्षण के साथ उनमें मानव के प्रति मित्रता का वातावरण हो।
(5) ऊर्जा - पर्यावरर्णीय (सौर व बायो गैस आदि) ऊर्जा का अधिकाधिक उपयोग हो। ऐसी संरचना हो, जिससे न्यूनतम ऊर्जा की आवश्यकता हो।
(6) संस्कृति - परिसर में आनन्द, स्वालम्बन तथा ज्ञान, विज्ञान एवं संस्कार की त्रिवेणी बहे।
(7) पे्ररणा - परिसर स्वयं पे्ररणा के साथ पे्ररक दिशा, दृष्टि एवं संसाधन का स्रोत बने।

मिशन गंगा से जुड़े कतिपय विचारणीय बिन्दु - रामशरण


आज माँ गंगा के प्रकृति प्रदत्त शाश्वत, अविरल, निर्मल एवं पवित्र प्रवाह के स्वरूप को अक्षुण्य बनाए रखना समाज के प्रत्येक व्यक्ति के लिए राष्ट्र धर्म है। माँ गंगा की सेवा राष्ट्र धर्म है। माँ गंगा की सेवा राष्ट्र की सेवा है। यह एक ऐसी धरोहर है जिस पर खाद्य-सुरक्षा, स्वच्छ पेय जल उपलब्धता, जैव विविधता, जलीय जीवों का अस्तित्व तटवासियों, नाविकों, पुराहितों, गंगा पुत्रों की आजीविका, धरा की उर्वरता आदि आश्रित हैं। इसी के दर्शन, आचमन व स्नान से व्यक्ति अपने को धन्य मानता है। इसी के तट पर भारत के प्रमुख नगर एवं तीर्थ बसे है जो देश के व्यापारिक केन्द्र भी है।
अतएव, मिशन गंगा में उपरोक्त विषयों एवं हित ग्राहियों (स्टेक होल्डर्स) के साथ-साथ स्वयं सेवी संस्थाओं, निकायों, समाजसेवियों, बुद्धजीवियों, साधु-सन्तों, विषय-विशेषज्ञों, सूचना प्रोद्योगिकी विशेषज्ञों, सम्बन्धित सरकारी विभागों के पदाधिकारियों को भी विभिन्न स्तरों एवं चरणों में जोड़ा जाय ताकि मिशन त्रुटि रहित हो।
इसी क्रम में कतिपय करणीय कार्य निम्न प्रकार है:-
1. योजनाएं चरण बद्ध एवं समय बद्ध बनें।
2. उपाय सशक्त क्रियात्मक एवं परिणाम परक हों।
3. योजनाओं को तात्कालिक, अल्पकालिक एवं दीर्घकालिक वर्गों में आवश्यकता, महत्व एवं प्राथमिकताओं के आधार पर विभाजित कर कार्यान्वित किया जाय।
4. सभी हितग्राहियों हेतु प्रथक-प्रथक कार्यदल बनाए जाँय जो सौंपे गए कार्यों के प्रति उत्तरदायी हो।
5. पूर्व में चल रहे कार्यो-योजनाओं की समीक्षा की जाय तथा उसमें यथा अनुसार अपेक्षित संशोधन को समायोजित किए जा सकते हों का समायोजन करते हुए उन्हें गति प्रदान की जाय।
6. यह भी सुनिश्चित किया जाय कि सभी योजनाएं एक दूसरे की पूरक हों तथा इनसे किसी हितग्राही का अहित न हो।
7. आँकड़ों एवं सूचनाओं के आदान-प्रदान में यथा आवश्यक आधुनिक संचार साधनों, टेक्नोलोजी का उपयोग किया जाय।
8. खाद्य सुरक्षा के अन्तर्गत कृषि फसलों के उत्पादन में नहरों के माध्यम से प्रयोग होने वाले सिंचाई जल के अपव्यय को रोका जाय व जल उपयोग की क्षमता बढ़ाई जाय ताकि इसमें 15 से 20 प्रतिशत जल की बचत हो सके जिससे पर्वो/तीर्थों पर जल की पर्याप्त मात्रा उपलब्ध हो सके।
9. नदी के कैचमेन्ट क्षेत्र में बाढ़ की विभीषिका से मुक्ति पाने के लिए क्षेत्र में तालाब आदि जल संग्रह इकाइयों का प्राविधान करने के साथ ही साथ आकस्मिक योजनाएं ;ब्वदजपदहमदबल च्संदेद्ध भी बनाई जाय।
10. गंगा जल के प्रदूषण को हस्तक्षेपीय अपराध ;ब्वहदप्रंइसम व्ििमदबमद्ध बनाया जाय तथा इसे प्रदूषित करने वाले व्यक्तियों, संस्थाओं, फैक्टरियों, नालों आदि के प्रति कठोंर कार्यवाही की जाय तथा इसकी पुनरावृत्ति को रोका जाय। इस सम्बन्ध में ‘‘कोड आॅफ कण्डक्ट’’ बनाया जाय।
11. सभी सहायक नदियों/नालों हेतु भी समानान्तर योजनाएं बनाई एवं कार्यान्वित की जाय।
12. योजनाओं का नियमित एवं निरन्तर अनुश्रवण हो।
13. गंगा की पूरी लम्बाई में स्थानीय निगरानी चैकियाँ हों जो मिशन की सफलता हेतु सौंपे गए दायित्वों का निर्वहन करें।
14. गंगा के तटों का सौन्दर्यीकरण हो, नदी के किनारों पर शोभाकार वृक्ष लगाए जाँय, करणीय कार्यों एवं न करणीय कार्यों के सम्बन्ध में सूचना पट, दीवार लेखन, माईक के द्वारा लोगों को जागृत किया जाय।
15. गंगा मिशन से मिलने वाले लाभों का मूल्यांकन हो, कार्य प्रणाली में पारदर्शिता हो, समय की माँग के अनुसार उसमें आवश्यक परिवर्तन की सम्भावना हो।
16. गंगा मिशन में राष्ट्र का प्रत्येक परिवार जुड़े ऐसा लक्ष्य हो। ु

लोक भारती कार्य की दिशायें .सामाजिक सेवा को समर्पित राष्ट्रीय संगठन - शोक सिंह


लोक भारती सामाजिक सहयोग से अनेक क्षेत्रों में प्रभावी कार्य कर रही है, जिनका संक्षिप्त विवरण इस प्रकार है।
1. गौ आधारित खेती - सामान्यतः इस पद्धति को शून्य लागत प्राकृतिक खेती के नाम से जानते हैं। पिछले दो वर्ष से कई संस्थाओं के सहयोग से 13 स्थानों पर प्रशिक्षण वर्गों के आयोजन किए, जिनमें उŸार प्रदेश, उŸाराखण्ड, हरियाणा, राजस्थान, दिल्ली, मध्यप्रदेश, बिहार सहित कई अन्य प्रान्तों के लगभग 6000 प्रयोगधर्मी किसानों, कृषि वैज्ञानिकों, सामाजिक कार्यकर्र्ताओं, गन्ना उद्योगों एवं कृषि विभाग के अधिकारियों ने भाग लिया।
बजाज ग्रुप (गन्ना मिल) के बाद अब उŸार प्रदेश गन्ना शोध संस्थान, शाहजहाँपुर द्वारा इस पद्धति के पांँच माॅडल केन्द्रों पर अध्ययन कार्य प्रारम्भ हुआ है, वहीं   कृषि विभाग, उ॰प्र॰ से सम्बन्धित ‘आत्मा’ द्वारा प्रदेश के सभी विकास खण्ड से चयनित 1000 किसानों के प्रशिक्षण की तैयारी चल रही है। लोकभारती की मुख्य भूमिका (1) प्रशिक्षण (2) अनुवर्ती कार्य (3) समन्वय (4) माॅडल केन्द्र व (5) प्रशिक्षक तैयार करना है।
2. ‘सरिता समग्र’ अभियान - लोक भारती द्वारा 22, 23 जनवरी, 2011 को लखनऊ में माँ गंगा समग्र चिन्तन गोष्ठी का आयोजन हुआ, जिसमें एक दिशा व दृष्टि बनी कि - ‘‘गंगा मांँ को अपने पावन स्वरूप में अविरल, निर्मल बनाये रखने के लिए उससे मिलने वाली सभी नदियों पर कार्य करना होगा।’’  इस गोष्ठी में एक दर्जन नदियों, जल व पर्यावरण पर कार्य करने वाले 250 प्रतिनिधियों के साथं गंगा व अन्य नदियों सम्बन्धी योजना बनी, कि- (1) विभिन्न नदियों, जल व पर्यावरण पर कार्य करने वाली संस्थाओं, व्यक्तियों एवं वैज्ञानिकों के मध्य समन्वय। (2) गंगा सम्बन्धी कार्य में सहभागिता (3) गोमती नदी पर स्वयं कार्य करना।
3. गोमती संरक्षण अभियान - सर्वप्रथम लखनऊ में गोमती तटों पर स्वच्छता कार्यक्रम, वृक्षारोपण एवं जागरूकता कार्यक्रम प्रारम्भ हुए। तत्पश्चात् 28 मार्च से 4 अपै्रल, 2011 को गोमती उद्गम माधौटाण्डा, पीलीभीत से गोमती-गंगा संगम स्थल, कैथी घाट (मारकण्डे आश्रम) वाराणसी तक 7 दिवसीय गोमती यात्रा का आयोजन, 33 स्थानों पर गोमती मित्र मण्डलों का गठन, नैमिषारण्य के चैरासी कोसी परिक्रमा पथ पर एक माह की यात्रा, 88 हजार ऋषियों की स्मृति में व्यापक वृक्षारोपण तथा 2020 तक गोमती को प्रदूषण मुक्त, सुजला करने का संकल्प महत्वपूर्ण कार्य हैं।
4. वृक्षारोपण व हरियाली पखवारा -गोमती संरक्षण अभियान के क्रम में नैमिषारण्य में सघन व व्यापक वृक्षारोपण अभियान के बाद धरती माँ के 33 प्रतिशत अपेक्षित वृक्षादन की दिशा में ‘हरियाली चादर विकास’ का कार्य प्रारम्भ हुआ। जिसके अन्र्तगत जुलाई माह के गुरूपूर्णिमा से हरियाली तीज तक 18 दिवसीय ‘हरियाली पखवारा’ में वृक्षारोपण का कार्य है। इसमें पंचवटी, नक्षत्र वाटिका, हरिशंकरी (पीपल, बरगद, पाकड़ एक थाले में लगाना) वृक्ष धर्मशाला, वृक्ष भण्डारा एवं हरियानी चूनर आदि मुख्य कार्य हैं।
5. तीर्थ व घाट सुव्यवस्था - चन्द्रिकादेवी लखनऊ के पालीथीन मुक्त, हरियाली से युक्त तीर्थ के सफल अभियान के बाद, नैमिष तीर्थ सीतापुर, प्राकृतिक वन एवं जल स्रोत स्थल धोबिया घाट, हरदोई, वृन्दावन, मथुरा में हरित पट्टी हेतु वृक्षारोपण तथा सौलानी देवी प्राकृति जल स्रोत, लखनऊ पर सघन वृक्षारोपण महत्वपूर्ण कार्य हैं। यह कार्य अन्यत्र तीर्थों पर भी प्रारम्भ होना है।
6. मेरा गाँव, मेरा तीर्थ - वर्ष 2011 स्वामी विवेकानन्द की सार्धशती से समग्र ग्राम विकास र्में नई दिशा के दो भाग कार्ययोजना में हैं- (1) नगरों में निवास कर रहे बन्धुओं द्वारा अपने गाँव के विकास के लिए कार्य करना। (2) नगरों में हम जहांँ निवास कर रहे हैं, उस कालोनी में ग्राम संस्कृति के विकास सम्बन्धी आयोजन, जिसका अर्थ है - परिवारिक भाव, एक दूसरे को जानना, सुख-दुख में सहभागी होना, सहयोग एवं सहकार।
7. आर्दश गाँव सहभागिता - जहाँ हमारा सम्पर्क है, सामाजिक सहकार के कार्य करना, जैसे गौ आधारित खेती, जल संरक्षण, वृक्षारोपण, विद्यालय, सहकार, व्यक्तित्व विकास, सम्मेलन एवं स्वच्छता आदि।
8. स्वच्छता अभियान, 9. युवा कौशल विकास, 10.रसोई वाटिका, 11. लोक सम्मान, 12. ई-समाचार बुलेटिन, 13.औषधीय कृषि एवं 14. पर्यावरणीय परिसर विकास आदि। ु

गंगा संरक्षण एक दिशा, दृष्टि - प्रेम बड़ाकोटी

गंगा संरक्षण हेतु गंगोत्री से गंगा सागर तक व्यापक क्षेत्र में सामाजिक सहयोग से कार्य करने वाले संगठनों, व्यक्तियों को जोड़ने एवं उनके प्रबोधन व प्रशिक्षण कार्य की निश्चित दीर्घकालिक योजना व सुनिश्चित दृष्टि आवश्यक है। इस निमिŸा विचारणीय बिन्दु प्रस्तुत हैंः-
(1) गंगा की अविरलता सुनिश्चित हो और उसमें पर्याप्त जल रहे।
(2) गंगा जल की गुणवŸाा आचमन योग्य रहे। उसकी स्वच्छता, पवित्रता, शुद्धता की मान्यता बनी रहे।
(3) गंगा के जल की उपयोगिता का संतुलित विचार हो।
(4) जल विद्युत हो, पर उपरोक्त पक्ष दुर्लक्षित न हांें।
गंगा के प्रति सामाजिक जागरूकता, नरेन्द्र मोदी का संसदीय क्षेत्र काशी होना, गंगा पूजन तथा गंगा मन्त्रालय बनने के कारण, गंगा सरक्षण के प्रति समाज में विश्वास जागा है। अतः अब हमें इस कार्य में सामाजिक आस्था, स्वच्छता के प्रति जागरण, प्रबोधन एवं संगठन तथा इस सब में उस समाज की भूमिका का विचार करना है, जिनका गंगा से अटूट नाता है, वे हैं -
(1) गंगा के प्रति आस्थावान समाज, जिसके हर शुभाशुभ् कार्य में गंगा जल का महत्व है।
(2) नाविक, मल्लाह जिनका हजारों पीढि़यों से गंगा से नाता है।
(3) पण्डा, पुरोहित समाज, जिनकी आजीविका गंगा पर निर्भर है।
(4) पूजा सामग्री के व्यापारी।
(5) गंगा के किनारे सब्जी की खेती करने वाले समाज आदि का विचार करना होगा।
- इसके साथ ही उनके लिए कुछ कार्यक्रम, जैसे - गंगा आरती हो तो उसका स्वरूप क्या हो, कौन सी आरती हो तथा उसकी पद्धति क्या हो? आदि का विचार करना होगा।
- गंगा तटीय क्षेत्र में अन्य करणीय कार्य हो सकते हैं, जैसे - बड़े-बड़े जलाशयो, गंगा सरोवरों का निर्माण, वर्षा जल एवं भू-गर्भ जल संरक्षण एवं संवर्धन तथा वृक्षारोपण, घाट-तट स्वच्छता एवं सज्जा आदि।
- समाज को जोड़ने एवं उनमें उत्तरदायित्व का भाव विकसित करने हेतु ग्राम, घाट, खण्ड एवं जिला स्तरीय गंगा समग्र समितियों का गठन।
- गंगा एवं नदियों सम्बन्धी कानूनो, कानून के जानकारों एवं इस सम्बन्ध में याचिका-कर्ताओं की जानकारी रखनी होगी।
- न्यायालयों द्वारा दिये गए निर्णयों के अनुसार आगे न्यायिक कार्य, न्यायिक सम्मान तथा निर्णयों का पालन सुनिश्चित कराना होगा।
- गंगा तटवर्ती 10 से 20 कि॰मी॰ के क्षेत्र में रसायन मुक्त गौ आधारित खेती पर बल तथा उसके लिए आवश्यक व्यवस्था निर्माण करना आवश्यक है।
- ‘गंगा वन’ निर्माण, इस हेतु क्षेत्रों का चयन, तटवर्ती उपयोगी वृक्ष-तालिका बनाकर सघन वृक्षारोपण कार्य।
- आज समाज को ऐसा लगता है कि, गंगा को पूर्व स्थिति में हम ला सकते हैं, ऐसा होना चाहिए और ऐसा हो सकता है का विश्वास जागा है। इस विश्वास को पूरा करने के लिए संगठनात्मक संरचना बनानी होगी।
- जल, जंगल, प्रकृति एवं वन्य जीव संरक्षण की साधना करनी होगी।
- मिशन भाव वाले कार्यकर्ताओं का चयन कर उन्हें इस कार्य में लगाना होगा।
- कार्य की सफलता के लिए सभी स्तरों पर कार्यकर्ताओं में अनुशासन, आकांक्षा रहित कार्य करने का स्वभाव संस्कार के लिए प्रबोधन, प्रशिक्षण करना होगा।
- गंगा समग्र के कार्य की रचना, राजनैतिक भावना से मुक्त करनी होगी।
- इस कार्य से आत्मिक, आध्यात्मिक सुख मिलेगा, ऐसा राष्ट्रीय महत्व का विषय बनाऐं।
- जल सम्पदा के अन्र्तगत वर्षा जल, भूगर्भ जल तथा नदियों का जल आता है, अतः सभी पक्षों पर कार्य करना होगा।
- अभी तक गंगा अविरल रहे, इसके विपरीत कार्य हुए हैं। यद्यपि गोमुख से आने वाली भगीरथी पर पूर्व स्वीकृत चार प्रोजेक्ट स्थगित हो गए है, अतः आवश्यक है कि अब उस पर कोई नए बांध न बनेे।
- यद्यपि देश में कुल उत्पादित एक लाख छियालीस हजार मेगावाट बिजली के सापेक्ष्य भगीरथी पर निर्मित बांधों से मात्र 2 हजार मेगावाट बिजली का उत्पादन बहुत ही कम है, इस प्रकाश में बाधों पर विचार होना चाहिए। ..... नदी बहती रहनी चाहिए।
- इस कार्य का व्यापक परिदृश्य है, व्यापक कार्य है। यह केवल नदी बचाने का कार्य नहीं, सामाजिक जागरण का भी है।
- संकल्पवान समाज ही संसार में गौरव का अधिकारी है। जापान का संकल्प हमारे सामने है। जापान में जब परमाणु विद्युुत संयन्त्र के कारण महाविनाश आया, तो जापान ने ऐसी विनाशकारी व्यवस्था को तत्काल बन्द करने का निर्णय लिया और उस निर्णय का तत्काल क्रियान्वयन कर विश्व के सामने, एक उदाहरण प्रस्तुत किया।
- आज हमारे सामने भी देश की मान्यताओं, प्रतीकों का प्रश्न है। अतः हमें भी आस्था, श्रद्धा एवं समग्रता के आधार पर निर्णय लेकर कार्य करना है।
गंगा संरक्षण हेतु अन्य आवश्यक सुझाव -
1. वर्षा जल के रीचार्जिंग का कार्य किया जाये।
2. प्रदूषित जल का शोधन कर, फैक्ट्रियों में ही उनका पुनः प्रयोग किया जाये अथवा सिंचाई में प्रयोग हो, गंगा में न डाला जाये।
3. कुम्भ के अवसर पर गंगा में 2.50 से 3 हजार क्यूसिक जल चाहिए, गंगा में जल की यह मात्रा कैसे उपलब्ध होगी? विचार किया जाये।
4. अण्डमान निकोबार में सर्वत्र खारा पानी ही है, वहाँ वर्षा जल संग्रहण का सफल प्रयोग किया जाता है, यहाँ भी करें।
5. तालाबों को ठीक किया जाये, तालाबों से निकलने वाली सिल्ट का उपयोग खेतों में किया जाये, जिससे खेत की उपज बढ़ेगी और तालाबों की नियमित रूप से सफाई होती रहेगी।
6. गंगा समग्र व गंगा प्रकोष्ठ के कार्यों का स्वरूप सुनिश्चित हो।
7. नगरीय इकाइयों के साथ ही नगर पंचायतों को भी जोड़ा जाये।
8. गंगा की बाढ़ से प्रभावित बंगाल व बिहार के क्षेत्रों की समस्या का विचार किया जाये।
9. कटान रोकने के लिए गंगा के प्रवाह क्षेत्र की गहराई बढ़ाई जाये।
10. गंगा के किनारे के स्रोतों व कुण्डों को ठीक किया जाये।
11. हिमालय के पहाड़ों पर डायनामाइट का प्रयोग न हो।
12. गंगा में बढ़ रहे हानिकारक रसायनों का शोध तथा गंगा में उनके बढ़ने के स्रोतों की खोज कर उनके खिलाफ कानूनी कार्यवाही की जाये।
13. गंगा सहित सभी नदियों में खनन आवश्यक व उपयोगी है, पर उसके अनुपात का ध्यान रखा जाये।
14. गंगा की नीतियाँ हैं, पर उसका पालन नहीं। पालन व्यवस्था बनाने पर ध्यान दिया जाये।
15. गंगा सम्बन्धी नियमों के अनुपालन के लिए संवैधानिक संस्था नेशनल ग्रीन टेªवुनल (एन.जी.टी.) बहुत उपयोगी है। इसका उपयोग किया जाये।
16. मध्य प्रदेश में गणपति प्रतिमाओं का निर्माण घर पर ही, छोटे आकार में कच्ची मिट्टी से तथा खाने योग्य रंगो से किया जाने लगा है। उसका विसर्जन भी घर पर बाल्टी के जल में किया जाता है और उस जल का उपयोग बगीचे के पेड़ों गमलों में कर लेते हैं। यही प्रथा गंगा क्षेत्र में प्रारम्भ की जाये।
17. नदियों को हम गंदा न करें, नदियाँं अपने आपको स्वयं साफ कर लेती हैं।
18. नदियों में सिल्ट बढ़ने का कारण मिट्टी का कटान है। कटान बढ़ने का कारण पेड़ों की कटाई है। अतः उसका निदान वृक्षारोपण ही है।
19. बूचड़खानों एवं चमड़ा उद्योग से नदियाँ प्रदूषित होती हैं, उनका विचार करें, विस्तार रोकें।
20. ‘हमारी नदियाँ’ नामक विनोवा जी की एक महत्वपूर्ण पुस्तक है, जिसकी पुनः छपाई हो रही है, जो आवश्यकतानुसार उसका उपयोग करें।
21. आवश्यकतानुसार मार्ग दर्शक मण्डल, संरक्षक मण्डलों का गठन किया जा सकता है।
22. गाँव/घाट/आस्था स्थलों/ जलस्रोतों/तालाबों/झीलों की सफाई, वृक्षारोपण तथा गंगा आरती के कार्यों द्वारा सामाजिक एकत्रीकरण व प्रबोधन/प्रशिक्षण की प्रक्रिया प्रारम्भ करें।
23. ऐसे सरल कार्यक्रम प्रारम्भ में लिए जायें, जिनके माध्यम से स्वच्छता, आस्था, सहकार एवं श्रमदान की भावना बलवती हो। ु

मेरा गाँव-मेरा तीर्थ एक जागरूकता अभियान - श्रीकृष्ण चैधरी

जब कोई कहता है कि, ‘भारत गांव में बसता है’ तो, इसका अर्थ होता है भारत ‘गाँव-संस्कृति’ में बसता है और ‘गाँव-संस्कृति’ का मूलाधार हमारी ‘परिवार-व्यवस्था’ है, जिसका व्यापक व व्यावहारिक स्वरूप ‘हमारे गांँव’ हैं। हमारे पूर्वजों नें अपने इन्हीं वैशिष्ट्य के बल पर ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ का उद्घोष किया था, जो आज के ‘ग्लोवलाइजेशन’ की शोषणकारी बाजारवादी-व्यवस्था से विश्व को मुक्ति दिलाकर, मानवातावादी-संसार का सृजन कर सकती है। यह कार्य ‘भारत’ से ही सिद्ध होगा, ‘इण्डिया’ से नहीं।
इस निमित्त नियोजित व व्यापक जागरूकता अभियान के साथ उसकी व्यावहारिक कार्ययोजना बनाकर कार्य करने की आवश्यकता है। उसी दिशा में एक साकार कदम - ‘‘मेरा गाँव-मेरा तीर्थ’’ योजना है।
‘मेरा गाँव-मेरा तीर्थ’ अभियान की आवश्यकता क्यों?-
मेरा गाँव-मेरा तीर्थ’ योजना पर विचार करने से पूर्व पहले यह समझने की आवश्यकता है कि भारतीय संस्कृति का मूलाधार हमारी परिवार व्यवस्था और उसका व्यापक व व्यावहारिक स्वरूप ‘गाँव’ की आज के समय में क्या स्थिति है? क्या आज हमारे गाँवों में उस ग्राम संस्कृति का वह पे्ररक स्वरूप विद्यमान है, जिसकी हमें व विश्व की भावी पीढ़ी को आवश्यकता है?
किसी विचार व दर्शन को अपने व्यावहारिक जीवन में जाज्वल्यमान रूप में स्थापित करने के लिए शतत् जीवन प्रकिृया की आवश्यकता होती है, जिसका सृजन हमारे पूर्वजों ने बड़े विधि-विधान से किया और उसे अपने जीवन में ऐसे जिया कि, जिसके बल पर भारत ‘आध्यात्मिक’ परम उन्नति के साथ ही भौतिक व आर्थिक ंऊँचाइयों में‘ ‘सोने की चिडि़या’ कहलाया और चीनी यात्री ‘ह्वेनसांग’ जिसे देख मन्त्र-मुग्ध हो गया।
कालचक्र की गति ने भारत की उन विशेषताओं पर परदा डाल दिया। स्वतन्त्रता के पश्चात् पुनः जागृत भारतीय समाज को आज की परिस्थिति में चमत्कृत-विश्व की चुनातियों को स्वीकार करते हुए अपने को सिद्ध करने और विश्व के समक्ष उपस्थित अनेक विषम परिस्थितियों से उन्हें मुक्ति का मार्ग दिखाने का सुयोग दिया है, जिसमें हमें सफल होना है।
भारत के गाँववासी इस संघर्षपूर्ण-बेला में अपने आप को टिकाने और आगे बढ़ने के लिए गाँव से शहर जाते थे और वहांँ तात्कालीन आवश्यकताओं के लिए एक किराये का अथवा स्वयं का मकान रखतेे थे। किन्तु, उस समय शहर के उस मकान में वह सशरीर रहते हुए भी, उनकी आत्मा सदैव अपने गाँव के अपने ‘घर’ में ही बसती थी। परन्तु, धीरे-धीरे परिस्थितिवश समय की आवश्यकताओं से विवश गाँववासी समाज ने शहर में ‘घर’ बनाना प्रारम्भ कर दिया और अब गाँव में केवल ‘मकान’ ही शेष बच रहे हैं। इससे गाँव की बुद्धि और सार्मथ्य (बे्रन एण्ड पावर)’ गाँवों से शहर की ओर भागने लगी, शहरों का विस्तार होने लगा, जिसके दुस्परिणाम गाँव की आज समस्त व्यवस्थाओं में दिखाई पड़ते हैं।
क्योकि, बुद्धि और विवेक के बल पर ही पुरातन, सनातन बनता है और बुद्धि के बल पर ही नये-नये आविस्कार होते हैं, जिनका बुद्धि एवं विवेकपूर्ण उपयोग से पुरातन के सनातन को आधुनिकतम परिवेश में भी सर्वकालिक सार्थक व सर्वोपयोगी बनाये रखने की सार्मथ्य रहती है। आज उस बुद्धि-विवेक और सार्मथ्य को जगाकर भारत की उस गौरवमयी गाँव-संस्कृति को पुनप्र्रकाशित करने की आवश्यकता है, जो काल-चक्र के प्रवाह में ओझल हो रही थी, परन्तु अधुनातन विश्व के लिए जो आज भी आवश्यक है।
गाँव संस्कृति क्या है?-
गाँव अनेक परिवारों की वह संयुक्त इकाई है, जिसमें पूरा गाँव एक परिवार की भाँति जीवन-यापन करता है। जिसकी मूलभूत विशेषतायें इस प्रकार हैं -
1. गाँव के सभी निवासी सामन्य रूप से एक-दूसरे को जानते हैं तथा एक-दूसरे के सुख-दुख में सहज रूप से सहभागी होते हैं।
2. गाँव में अधिकांश परिवारिक व सामाजिक कार्य सहकारिता के आधार पर सम्पन्न होने की परम्रागत सु-व्यवस्थायें थीं।
3. सभी एक दूसरे का आदर करते थे।
4. जाति भेद से ऊपर उठकर परिवारिक सम्बोधन चाचा, ताऊ, चाची, आदि होता था।
5. गाँव की आवश्यकता के अनुकूल कुशल कारीगर गाँव में ही उपलब्ध होते थे।
6 विशेष अवसरों पर सभी प्रवासी गाँववासी गाँव में उपस्थि होते थे, जिसमें उन्हें अनन्दानुभूति होती थी।
7. गाँव की बहन-बेटी पूरे गाँव की बहन-बेटी होती थी, जिसके प्रति उसके गाँव में रहते, उसके विवाह और उसके विवाहोपरान्त उसकी ससुराल तक बहन-बेटी का व्यवहार होता था।
8. गाँव का अपना एक देवस्थान होता था, जिसके प्रति पूरे गाँव की आस्था तथा वहाँ पर मुण्डन आदि पारिवारिक संस्कार करने की मान्यता थी।
9. गाँव में कोई व्यक्ति एकाकी, असहाय अवस्था में नहीं रहता था, जिसके विषय में किसी को कोई सुध न हो।
आज एक सुअवसर -
- आपको, अपने पूर्वजों व अपने गाँव का ऋण उतारने, अपनी नई पीढ़ी को अपनी जड़ों से जोड़ने और अपने राष्ट्र व समाज के लिए कुछ करने का सुअवसर है।
- यह कार्य करते समय किसी स्वार्थ या किसी व्यक्तिगत लाभ से मुक्त होना, सफलता की कुँजी है।
- जिनके बीच में कार्य करना है, सबसे पहले उनके मन में अपने प्रति विश्वास पैदा हो, ऐसे निर्विवाद व सहज कार्य हाथ में लें।
- कोई भी कार्य असम्भव नहीं है, यदि उसे संकल्प व मनोयोग से किया जाये।
- आपको जो सबसे छोटा व सुगम कार्य लगता हो या आपकी जिसमें रूचि हो, वहीं से एक कदम आगे बढ़ायें, मार्ग तो अपने आप मिल जायेगा।
‘मेरा गाँव-मेरा तीर्थ’ की कार्य योजना -
1. जो बुद्धि-विवेक और सार्मथ्य गाँव से पलायन कर शहरों में रहने लगी है, उसे जागृत कर आज की आवश्यकता, चुनौती और उसमें उनकी भूमिका का बोध कराया जाये तथा उस दिशा में सार्थक परिणाम के लिए कृतसंकल्पित होकर कार्य करने के लिए पे्ररित किया जाये।
2. वह आज जिस शहरी व्यवस्था में, जिस कालोनी में निवास कर रहे हैं, वहाँ पर ‘गाँव-संस्कृति’ के विकास हेतु कार्ययोजना बने और उसे क्रियान्वित किया जाये।
3. जो गाँववासी, अभी गाँव नहीं जा रहे, वह गाँव जायें। जो जाते हैं, पर वहांँ रूकते नहीं, वह वहांँ, रूकें। जो जाते हैं और रूकते भी हैं, वे गाँव व गाँव-संस्कृति के लिए कुछ कार्य प्रारम्भ करें।
4. बुद्धि-विवेक और सार्मथ्य के धनी शहर-निवासी बन चुके गाँववासी अपने गाँव में पुनः जायें और वहाँ एक प्रेरणा का दीप जलायें, जिससे प्रकाश लेकर गाँव की भावी पीढ़ी शिक्षा, रोजगार, नौकरी या अन्य आवश्यकताओं के लिए गाँव से शहर जायें पर अपने ‘घर’ सहित नहीं।
5. राजनैतिक क्षेत्र के लोग शासन की ऐसी नीतियाँ बनाने में योगदान करें, जिससे गाँव उन सभी आवश्यक सुविधाओं से युक्त हों, जिनके अभाव में गाँव से शहर की ओर पलायन होता है।
6. प्रशासनिक क्षेत्र के लोग उन योजनाओं के क्रियान्वयन में उस कुशलता का परिचय दें जिससे गाँव के बुद्धि-विवेक व सार्मथ्य का पलायन रूके।
7. सामाजिक कार्यकर्ताओं व गाँव के समर्थ समाज का दायित्व बनता है, कि वह गाँव में पनपी उन कुरीतियों, परम्पराओं, व्यवस्थाओं में सुधार के लिए कार्य करें, जिनके कारण गाँव का सामान्य वर्ग जो ह्नदय से तो गाँव को चाहता है, लेकिन मजबूरीवश उसे अपना गाँव छोड़ना पड़ता है।
8. ऐसे लोग, जो गाँव के रहने वाले नहीं हेैं, पर गाँव संस्कृति का महत्व समझते हेैं, वे अपनी क्षमता, सामथ्र्य और योग्यता से गाँव की उन व्यवस्थाओं, संसाधनों के विकास मंे योगदान करें, जिनके अभाव में गाँव का ‘बुद्धि-विवेक’ गाँव से पलायन के लिए मजबूर होता है।
9. उद्योग जगत के लोग लघु व कुटीर उद्योग गाँव में लगायें जिससे गाँव की युवा पीढ़ी को शहर के स्थान पर गाँव में ही आजीविका मिल जाये और वह शहर की ओर पलायन से बच जायंे।
मेरा गाँव-मरा तीर्थ’ अभियान हेतु करणीय कार्य अ) शहर में गाँव-संस्कृति विकास कार्यक्रम - शहरी क्षेत्र में गाँव-संस्कृति विकास के लिए निम्न लिखित कार्य व कार्यक्रमों का उपयोग किया जा सकता है -
1. वर्ष में किसी अनुकूल अवसर पर कोई एक धर्मिक, सामाजिक, सांस्कृतिक कार्यक्रम का आयोजन हो, जिसमें पूरी कालोनी का सहयोग व सक्रिय सहभागिता सुनिश्चित हो सके।
2. इस हेतु कालोनी के पार्क में वृक्षारोपण, स्वच्छता व उसके रखरखाव हेतु स्थानीय टीम के साथ कार्य करें।
3. अपने पारिवारिक कार्यक्रमों में कालोनी के लोगों को बुलाना व कार्य दायित्व की जुम्मेदारी भी सौंपना।
4. किसी परिवार के दुख या संकट के समय उसका आवश्यक सहयोग करने व कराने की व्यवस्था।
5. अवकाश प्राप्त व सामाजिक कार्यों हेतु अधिक समय देने में सक्षम व्यक्तियों की गोष्ठियाँ व कार्यशालाऐं आयोजित कर, उसमें आये लागों के सहयोग से टीम का निर्माण।
6. ऐसे कार्यक्रमों का आयोजन, जिनके माध्यम से युवा पीढ़ी में सामाजिक संस्कार विकसित किए जा सकें।
7. ऐसे कार्यक्रम, जिनसे कालोनी के लोगों में सामाजिक कार्यों में अपने तन, मन, धन के उपयोग का भाव जागे।
ब) गाँव के लिए कार्य व कार्यक्रम -
1. जब कभी गाँव जाना हो, तो वहाँ स्कूल के शिक्षकों से मित्र-भाव से मिलकर किसी कक्षा के छात्रों के साथ अपने ज्ञान को उनके स्तर पर बांटें। परिणामतः गाँव के गली-मोहल्ले में बच्चे आपको नमस्ते, प्रणाम आदि अभिवादन अपनेपन के भाव से करने लगेंगे, आप उनके अपने हो जायेंगे।
2. स्कूल में कोई प्रतियोगिता (सुलेख, स्वच्छता, खेलकूद आदि) आयोजित करायें और पुरस्कार (पेन, पेन्सिल-बाक्स आदि) की व्यवस्था करें, जिससे गाँव के बच्चों का लगाव आपके प्रति और बढ़ने लगेगा।
3. गाँव में किसी स्थानीय शिक्षक की खोज कर बच्चों के स्तर को ऊँचा उठाने हेतु शिक्षा-संस्कार या कोचिंग-सेन्टर प्रारम्भ करा सकते हैं, जिससे नई पीढ़ी का भविष्य सुधारने में मदद मिले।
4. गाँव के हाईस्कूल/इन्टर के छात्रों की कौंसलिंग करके उनका व उनके परिवार का भावी शिक्षा हेतु सही मार्गदर्शन कर मदद कर सकते हैं, जिससें वह छात्र आपको जीवन भर याद रखेगा।
5. गाँव में योग्य और समय दे सकने वाले लोगों को प्रेरित करें कि वह विद्यालय में मित्र-भाव से जाकर पढ़ाने में यागदान करें। इससे स्कूल छात्रों, शिक्षकों सहित उन व्यक्तियों का भी बहुत भला होगा।
6. गाँव के शिल्पियों की कार्यकुशलता बढ़ाने व उनकी आय वृद्धि में उनकों प्रशिक्षण, आधुनिक तकनीक व आधुनिक उपकरणों की जानकारी देकर/उपलब्ध कराकर अत्यन्त सहयोगी बन सकते है।
7. शाश्वत खेती, जल प्रबन्धन, पर्यावरण संरक्षण, खाद्यान्न प्रशोधन बागवानी, वानिकी व विपणन आदि विविध कार्यों एवं सरकारी, अर्धसरकारी उपयोगी योजनाओं की जानकारी व उनके प्रशिक्षण में सहयोगी बनकर गाँव के लिए बहुत उपयोगी हो सकते हैं।
8. गाँव के सार्वजनिक स्थल या किसी श्रद्धा-स्थल के पुनर्निमाण अथवा उसके विकास में सहभागी बनकर, पूरे गाँव को एकसूत्र में जोड़ा जा सकता है।
9. किसी पर्व या अन्य किसी शुभ अवसर पर गाँव में एक समारोह आयोजित करे और उसमें गाँव से बाहर गये सभी लोगों को आमन्त्रित करें सभी को अपने कार्य में सहयोगी बना सकते हैं।
10. प्रवासी परिवारों में अपनी भावी पीढ़ी को अपने गाव व अपनी जड़ों से जोड़ने के लिए उनके बच्चों के मुण्डन आदि संस्कार गाँव में कराने की परम्परा उपयोगी सिद्ध हो सकती है।
11. गाँव में रह रही प्रतिभाओं तथा गाँव की प्रवासी प्रतिभाओं का सम्मान समारोह आयोजित कर उन्हें अपने गाँव के लिए कुछ करने की प्रेरणा दी जा सकती है।
12. गाँव में व्याप्त कुरीतियों के प्रति जागरूकता पैदा करने, उनसे मुक्ति के उपाय सुझाने तथा छोटी-छोटी बातों से उत्पन्न होने वाले झगड़ों में मध्यस्थता करके गाँव का बहुत बड़ा हित किया जा सकता है।
13. गाँव या गाँव संस्कृति के लिए कार्य करने वाले या करने क इच्छुक बन्धुओं के लिए ‘माॅडल गाँव’ भ्रमण कार्यक्रम आयोजित करें।
14. गाँव की किसी विशेषता को समझ कर उस कार्य के निमित्त गाँव को माॅडल बनाने में मदद करके, अपने गाँव में एक ‘पे्ररणा-दीप’ जला सकते हैं। ु 

मेरा भारत त्योहारों का देश - सोम दीक्षित


सूरज-चन्दा औ तारों का देश है।
दशों दिशाओं के द्वारों का देश है।
सादाजीवन-सुविचारों का देश है।
मेरा भारत त्योहारों का देश है।।1।।

यहांँ रामनवमी का पर्व मनाते हैं।
गीत जानकी-मंगल सब गाते हैं।
औ मंगलघट घर-घर में धरवाते हैं।
गाँव-गाँव में धनुष यज्ञ करवाते हैं।
यह अनन्त के अवतारों का देश है।
मेरा भारत त्योहारों का देश है।।2।।

रामराज्य हर वर्ष यहांँ चल आता है।
विजयादशमी पर्व विजय-फल लाता है।
भले, साल भर पापों से बल पाता है।
मगर, दशहरा में रावण जल जाता है।
यह फूलों-अंगारों का देश है।
मेरा भारत त्योहारों का देश है।।3।।

मंगल करवा चैथ पतिव्रत धर्म है।
दीपावली हमारी संस्कृति का मर्म है।
गोधन पूजा, कृषि संवर्धन का कर्म है।
 है आत्म-ज्ञान का मन्त्र न केवल चर्म है।
अंधकार में भी जिसका प्रकाश परिवेश है।
मेरा भारत त्योहारों का देश है।।4।।

भैयादूज पर्व भाई का वन्दन है।
चमका देता जो माथे का चन्दन है।
अटल प्रतिज्ञा, तीन ताग का बन्धन है।
रक्षाबन्धन बहनों का अभिनन्दन है।
प्यार पुलकते परिवारों का देश है।
मेरा भारत त्योहारों का देश है।।5।। ु

दूर के ढोल सुहावने.संकलित - राधेकृष्ण दुब

 चैन से रहने वाले एक कौए ने एक दिन एक हंस को देखा। वह उसकी उजली, धवल काया देख कर सोचने लगा कि हंस कितना सफेद है और मैं कैसा काला कलूटा। कौआ सोचने लगा, यह हंस जरूर दुनियांँ का सबसे सुखी प़क्षी होगा। कौआ हंस के पास गया और अपने मन की बात कही। हंस ने जवाब दिया, नहीं भाई, ऐसा नहीं है। बहुत दिनो तक मुझे भी लगता रहा कि मैं दुनियाँ का सबसे सुन्दर और सुखी पक्षी हूँ। लेकिन एक दिन मैने एक तोते को देखा, जिसके शरीर की दो रंगों की छटा अनूठी थी। जब कि मेरे पास तो केवल एक ही रंग है। मुझे लगता है, तोता ही दुनियाँ का सबसे सुन्दर व सुखी पक्षी है।
कौआ तोते के पास गया। उससे भी वही बात कही। तोते ने कहा, जब तक मैने मोर को नहीं देखा था, तब तक मुझे अपने रूप-रंग पर बड़ा गुमान था। मगर मेरे दो रंगे पंखों और मोर के बहुरंगे पंखों व उसके मनोहारी नृत्य से भला कैसा मुकाबला। कौआ फिर मोर को खोजने चला। उसे मोर एक चिडि़याघर में मिला। उसके पिंजड़े के बाहर सैकड़ों लोग उसकी सुन्दरता की तरीफ कर रहे थे। जब सब लोग वहाँ से चले गए, तो कौए ने मोर से कहा, तुम कितने सुन्दर हो। हजारों लोग तुम्हें रोज देखने आते हैं। मुझे देख कर तो वे यों ही दुत्कार देते हैं। तुम तो दुनियाँ के सबसे सुखी और खुश रहने वाले पक्षी होगे।
मोर ने कहा मुझे भी यही लगता था भाई कि मैं दुनियाँ का सबसे सुन्दर और खुश पक्षी हूंँ। लेकिन मेरी सुन्दरता तो मेरी शत्रु है। उस सुन्दरता के कारण अब मैं इस चिडि़याघर में कैद हूँ। मुझे यह लगने लगा कि मैं मोर न होकर एक कौआ होता, तो आजाद रहता और मन मर्जी से कहीं भी घूमता फिरता।
कौए को अब इस कहाबत का अर्थ समझ में आ गया था, कि ‘दूर के ढोल सुहावने’ होते हैं। ु

शून्य लागत (जीरो बजट) प्राकृतिक कृषि अभियान - गोपाल उपाध्याय

भारत में हरित क्रान्ति के नाम पर अन्धाधुन्ध रासायनिक उर्वरकों हानिकारक कीटनाशकों, हाईब्रिड बीजों एवं अधिकाधिक भूजल उपयोग से भूमि की उर्वरा शक्ति, उत्पादन, भूजल स्तर और मानव स्वास्थ्य में निरन्तर गिरावट आयी है। किसान बढ़ती लागत एवं बाजार पर निर्भरता के कारण खेती छोड़ रहे हैं और आत्महत्या तक करने पर मजबूर हो रहे हैं। बाद में आयी विदेशी तकनीक जैविक खेती, जिसमें वर्मी कम्पोस्ट, कम्पोस्ट, बायोडायनामिक आदि विधियांँ जटिल होने के कारण अन्ततः किसान को बाजार पर ही निर्भर बनाती हैं। अतः आवश्यकता है ऐसी कृषि पद्धति की, जिसमें किसान को बार-बार बाजार न जाना पडे़, उत्पादन न घटे, खेत उपजाऊ बने रहें तथा मानव रोगी न बनें। ऐसी कृषि पद्धति है ‘शून्य लागत प्राकृतिक खेती’, जिसमें 1 देशी गाय से 10-30 एकड़ खेती सम्भव है।
पिछले दो वर्षों में लोक भारती द्वारा पांँच दिवसीय, 13 स्थानों पर प्रशिक्षण वर्गों के आयोजन सम्पन्न हुए हैं, जिनके माध्यम से अब तक लगभग छः हजार किसान इस पद्धति का प्रशिक्षण प्राप्त कर सफलतापूर्वक लाभाकारी खेती कर रहे हैं।
शून्य लागत कैसे? -
1. मुख्य फसल का लागत मूल्य, साथ में उत्पादित सह फसलों के विक्रय से निकाल लेना और मुख्य फसल को बोनस (शून्य लागत) के रुप में लेना।
2. खेती के लिये कोई भी संसाधन - बीज, खाद, कीटनाशक आदि बाजार से न लेकर इसका निर्माण अपने घर या खेत में करके बाजारी लागत शून्य करना, जिससे गाँव का पैसा गाँव में रहेगा बाहर नहीं जायेगा। किसान को खेती करने के लिए बाजार से कुछ खरीदना नहीं होगा, तो कर्ज भी नहीं लेगा।
शून्य लागत खेती का आधार - प्रकृति में सभी जीवों एवं वनस्पति इकाईयों के भोजन की एक स्वालम्बी व्यवस्था है, जिसमेें मानव की भूमिका नहीं है। जिसका प्रमाण है बिना किसी मानवीय सहायता के जंगलों में खड़े हरे-भरे पेड़ व उनके साथ रहने वाले लाखों जीव-जन्तुओं का स्वाभाविक विकास होना। इस प्राकृतिक व्यवस्था को समझना व उसके अनुरुप खेती करना।
क्या है प्राकृतिक व्यवस्था? - पौधों के पोषण के लिये आवश्यक सभी 16 तत्व प्रकृति में उपलब्ध रहते हंै, जिन्हें पौंधे के भोजन के रुप (।अंपसंइसम थ्वतउद्ध में बदलने का कार्य मिट्टी में पाये जाने वाले करोड़ों सूक्ष्म जीवाणु करते हैं। यदि यह सूक्ष्म जीवाणु पर्याप्त संख्या में मिट्टी में उपलब्ध रहें तो अच्छी उपज के लिए किसी बाहरी पदार्थ की जरुरत नहीं पड़ेगी। इस पद्धति में पौधों को भोजन न देकर भोजन बनाने वाले सूक्ष्म जीवाणुओं की उपलब्धता पर जोर दिया जाता है। प्रकृति में इन सूक्ष्म जीवाणुओं की भी उपलब्धता की एक विशिष्ट व्यवस्था है? पौधा अपने पोषण के लिये मिट्टी से सभी तत्व लेता है। फसल के पकने के बाद उसका काष्ठ पदार्थ कूड़ा-करकट के रुप में मिट्टी के साथ अपघटित (क्मबवउचवेम) होकर, मिट्टी को उर्वरा-शक्ति लौटाता है।
देशी गाय का कृषि में महत्व - एक ग्राम देशी गाय के गोबर में 300-500 करोड़ सूक्ष्म जीवाणु पाये जाते हैं। गाय के गोबर में गुड़ एवं अन्य पदार्थ डालकर किण्वन (थ्मतउमदजंजपवद) से सूक्ष्म जीवाणु बढ़ाने की क्रिया तेज कराके तैयार जीवामृत व घनजीवामृत जब खेत में पड़ता है तो करोड़ांे सूक्ष्म जीवाणु भूमि में पहुंचते हैं, जो पौधों का भोजन निर्माण करते हैं। किसी बाहरी पदार्थ की आवश्यकता नहीं पड़ती।
देशी कंेचुओ का कृषि में महत्व - कंेचुआ मिट्टी, बालू, पत्थर (कच्चा व चूना) खाता हुआ धरती के नीचे 15 फुट गहराई तक भूमि के नीचे जाता है। धरती के नीचे से पोषक तत्वों को ऊपर लाता है तथा पौधे की जड़ के पास धरती के ऊपर अपनी विष्टा छोड़ता है जिसमें फसल के लिये सभी आवश्यक तत्वों का भण्डार होता है। केंचुआ जिस छेद से नीचे जाता है कभी उससे ऊपर नहीं आता है। भूमि में दिन रात करोड़ो छिद्र कर भूमि की जुताई करता रहता है। भूमि को मुलायम बनाता है एवं जब बारिश होती है तो इन्हीं छिद्रों से पूरा वर्षा जल भूमि में संग्रहित होता है।
शून्य लागत प्राकृतिक कृषि के चरण -
1. बीजामृत (बीज शोधन) - 5 किलो देशी गाय का गोबर, 5 ली0 गोमूत्र, 50 ग्राम चूना, एक मुट्ठी खेती की मिट्टी को 20 ली0 पानी में मिलाकर 24 घंटे रखें। दिन में दो बार लकड़ी से घोलें। तैयार बीजामृत को 100 किलो बीजों पर छिड़क कर उपचार करें। बीज को छांव में सुखायें एवं बोयें।
2. जीवामृत - जीवामृत सूक्ष्म जीवाणुओं का महासागर है जो पेड़ पौधों के लिए कच्चे पोषक तत्वों को पकाकर उनके लिये भोजन तैयार करते हैं। इसे बनाने के लिए, गौमूत्र 5-10 लीटर, गोबर 10 किलो, गुड़ 1-2 किलो, दलहन आटा 1-2 किलो, एक मुट्ठी जीवाणुयुक्त मिट्टी (100 ग्राम) तथा पानी 200 लीटर, इन सभी सामग्री को एक साथ मिलाकर, ड्रम में जूट की बोरी से ढककर छाया में रखें। सुबह व शाम डंडे से घड़ी की सुई की दिशा में घोलें। 48 घंटे बाद छानकर निम्न प्रकार से दें। इसका प्रयोग सात दिन के अन्दर ही करें।
(क) सिंचाई पानी के साथ:- 1 एकड़ में 200 लीटर जीवामृत सिंचाई करते समय पानी के साथ टपक विधि से या धीमे-धीमे बहा दें।
(ख) छिड़काव द्वारा:- पहला छिड़काव बुवाई के 1 माह बाद 1 एकड़ में 100 लीटर पानी, 5 लीटर जीवामृत मिलाकर दंे। दूसरा छिड़काव 21 दिन बाद 1 एकड़ में 150 लीटर पानी व 10 लीटर जीवामृत मिलाकर दंे। तीसरा व चैथा छिड़काव 21-21 दिन बाद 1 एकड़ में 200 लीटर पानी व 20 लीटर जीवामृत मिलाकर दंे। आखिरी छिड़काव दाने की दूध की अवस्था (डपसापदह ैजंहम) में प्रति एकड़ में 200 लीटर पानी, 5-10 लीटर खट्टी छाछ (मट्ठा) मिलाकर छिड़काव करें।
घन जीवनामृत - घन जीवनामृत, जीवाणुयुक्त सूखी खाद है जिसे बुवाई के समय या पानी के तीन दिन बाद भी दे सकते हैं। बनाने की विधि इस प्रकार है - गोबर 100 किलो, गुड़ 1 किलो, आटा दलहन 1 किलो, मिट्टी जीवाणुयुक्त 100 ग्राम उपर्युक्त सामग्री में इतना गौमूत्र (लगभग 5 ली0) मिलायें जिससे हलवा/पेस्ट जैसा बन जाये, इसे 48 घंटे छाया में बोरी से ढ़ककर रखें। इसके बाद छाया में ही फैलाकर सुखा लें फिर बारीक करके बोरी में भरें। इसका 6 माह तक प्रयोग कर सकते हैं। एक एकड़ खेत में 1 कुन्तल तैयार घन जीवामृत देना चाहिए।
अच्छादन ;डनसबीपदहद्ध - देशी केंचुओं एवं सूक्ष्म जीवाणुओं के कार्य करने के लिये आवश्यक ‘‘सूक्ष्म पर्यावरण’’ उपलब्ध कराने हेतु एवं भूमि की नमी को सुरक्षित करने हेतु भूमि को ढ़कना (आच्छादन) पड़ता है। सूक्ष्म पर्यावरण का आशय है पौधों के बीच हवा का तापमान 25-32 डिग्री, नमी 65-72 प्रतिशत व भूमि सतह पर अंधेरा। जब हम भूमि का काष्ठ पदार्थो से या अन्य प्रकार से आच्छादन करते है तो सूक्ष्म पर्यावरण का निर्माण होता है जिसमें देशी केंचुओं व सूक्ष्म जीवाणु को उपयुक्त वातावरण मिलता है एवं भूमि की नमी का वाष्पन नहीं हो पाता। बाद में काष्ठाच्छादन भूमि में अपघठित होकर उर्वरा शक्ति का निर्माण करता है। सहफसलों द्वारा भी भूमि को सजीव आच्छादन के द्वारा ढ़का जा सकता है।
बेड व नाली व्यवस्था द्वारा जल की बचत - पौधों की जडं़े सीधे पानी नहीं लेतीं, बल्कि मिट्टी कणों के बीच 50 प्रतिशत हवा व 50 प्रतिशत वाष्प के मिश्रण (वाफसा) होते हैं, जिन्हें पौधे लेते हैं। अतः सतह से ऊचे तैयार बेड पर फसलो को नालियों द्वारा पौधों की आवश्यक सिंचाई वाफसा के रुप में उपलब्ध कराने से पानी की आवश्यकता बहुत कम पड़ती है। नालियों को भी आच्छादन से ढ़क दिया जाता है, जिससे नमी का वाष्पन कम से कम हो।
बहुफसली पद्धति - उचित मिश्रित फसलों को लेने पर फसलों की जड़े अलग-अलग स्तर से उचित खुराक ले लेती हैं एवं सहअस्तित्व के आधार पर रोगों एवं कीटों से बचाव तथा नाइट्रोजन का बटवारा कर लेती हैं। उचित फसल चक्र अपनाने से भूमि को नाइट्रोजन स्वतः ही प्राप्त हो जायेगा, ऊपर से यूरिया देने की आवश्यकता नहीं होगी।
फसल सुरक्षा - इस पद्धति में कीट नियंत्रको की आवष्यकता ही नहीं पड़ती क्योंकि कीट आते ही नहीं, फिर भी आवश्यकता पड़ने पर गोबर, गौमूत्र, छाछ एवं वनस्पतियों द्वारा तैयार नीमास्त्र, ब्रह्यास्त्र, अग्नियास्त्र, फफूदनाशक, दशपर्णी अर्क आदि बनायी जाती है। इस प्रकार स्वयं तैयार कीट नियन्त्रकों का प्रयोग कर फसल सुरक्षा कर सकते हैं।
विशेष प्रयोग - शाहजहांँपुर प्रशिक्षण वर्ग में वहांँ स्थित गन्ना शोध संस्थान के वैज्ञानिकों ने भी पूरे समय रहकर प्रशिक्षण लिया और उसके बाद उसका प्रयोग गन्ने की खेती में स्वयं गन्ना संस्थान में भी एक एकड़़ में प्रारम्भ किया गया है तथा क्षेत्र के अन्य प्रयोगधर्मी पांच किसानों के यहांँ भी संस्थान के निरीक्षण में एक-एक एकड़ खेत के प्रयोग प्रारम्भ कराए गये है, जिससे आवश्यक समस्त आंकड़े एकत्र किए जा सकें। इस प्रयोग में फसल की बुवाई अक्टूबर के प्रथम सप्ताह में की गई है, जिसकी अन्य  विशेष बातें इस प्रकार हैं -
1. गन्ना उŸार-दक्षिण की लाइनों में बोया गया है।
2. गन्ने की लाइन की दूरी 8 फिट है तथा गन्ने से गन्ने की दूरी 4 फिट रखी है।
3. गन्ने की लाइनों के मध्य चार लाइन मसूर तथा उनके मध्य एक लाइन सरसों की बोई गई है।
4. बुवाई से पूर्व खेत में 4 कुन्तल घनजीवामृत का प्रयोग किया गया है। जीवामृत का प्रयोग सिंचाई के साथ किया जायेगा।
5. फसल की बुवाई अक्टूबर के प्रथम सप्ताह में सभी बीजों को बीजामृत में शोधित कर की गई।
6. नौ अक्टूबर को क्षेत्र के प्रमुख किसानों तथा लोक भारती के कार्यकर्ताओं नें गन्ना शोध संस्थान के वैज्ञानिकों के साथ खेत का निरीक्षण किया, तब तक सभी फसलें अच्छी तरह जम चुकी हैं और सभी पौधे स्वस्थ, बढ़वार युक्त हंै।
7. साथ में ही एक एकड़ रासायनिक परम्परागत पद्धति से गन्ना बोया गया है, जिसमें रासायनिक खाद के कारण घासों की मात्रा अधिक है।
8. अन्य खेतों में सहफसली के रूप में मसूर के स्थान पर चना, मटर का भी प्रयोग किया गया है।
ध्यान देने योग्य बातें -
- प्राकृतिक कृषि में देशी बीज ही प्रयोग करें।
- प्राकृतिक कृषि में किसी भी भारतीय नस्ल का देशी गोवंश ही प्रयोग करें। जर्सी या होलस्टीन का प्रयोग हानिकारक है।
- जीवाणुयुक्त मिट्टी हेतु वट वृक्ष, पीपल के नीचे या मेंड़ की मिट्टी लें।
- पेड़ पौधों व फसल की पक्ंितयों की दिशा उत्तर दक्षिण होगी।
- दलहन फसलों की सहफसली खेती करना अच्छा रहता है।
- वर्मी कम्पोस्ट बनाने में जो आयसेनिया फीटिडा नामक जन्तु प्रयोग होता है, जो केंचुआ नहीं है। यह जन्तु कैडमीयम, आर्सेनिक, पारा सीसा आदि विषैले तत्व छोड़ता है, जो कि भूमि के लिये अत्यन्त हानिकारक हैं।
माडल कृषक -
1. हिमांशु गंगवार, फर्रुखाबाद, उ0प्र0-09319856993
2. श्री किशन जाखड़, हनुमानगढ़,
राजस्थान - 09414091200
3. ठाकुर धरमपाल सिंह, थाना भवन, शामली,
उ0प्र0 - 09627376363
4. आचार्य श्याम बिहारी, झाॅसी, उ0प्र0-09889196787
5. श्री विवेक चतुर्वेदी, कानपुर, उ0प्र0-09839039997
6. श्री कालूरामजी, मुजफ्फरनगर, उ0प्र0-09758571008
7. श्री राजकुमार आर्य, लाडवा, कुरुक्षेत्र-09416914051
8. श्री आर0एस0 यादव, चित्रकूट, उ0प्र0-09455712183
9. श्री नरेन्द्र सिंह ठाकुर, टीकमगढ़, म0प्र0 -08720019830
10. श्रीकृष्ण चैधरी, हरैया, बस्ती, उ0प्र0-9919257534
11. श्री गोपाल भाईजी, अखिल भारतीय समाज सेवा संस्थान, चित्रकूट, उ0प्र0-09450221331
अभियान के नारें -
- गाँव का पैसा गाँव में, गाँव का पैसा शहर में नहीं, शहर का पैसा गाँव में।
- एक गाय देशी 10-30 एकड़ खेती।
- प्राकृतिक खेती के दो उपाय- देशी केंचुआ देशी गाय।
- सहफसलो से मिलेगी लागत, मुख्य फसल होगी सब लाभ।
- कम पानी होगी खेती, किसान बनेगा तब खुशहाल।
- न खाद, न कीटनाशक, न कम्पनी, न बाजार। न होगी किसान को कर्ज की दरकार।
- बच्चे पियेंगे गाय का दूध, खेती करायेंगा गोबर गौमूत्र।
- गाय बैल बचेंगे अन्न मिलेगा।
- गाय बैल बचेंगे-किसान बचेगा, किसान बचेगा- गाँव बचेगा।
- गाँव बचेगा- देश बचेगा। ु

छोटे काम बड़े परिणाम -सुधाकर सिंह


ग्राम आधारित काम - गाँव एक बड़ा परिवार है। हमारा यह परिवार देश की हर कसौटी पर खरा उतरे और देश के विकास में अपना सशक्त योगदान करने में समर्थ हो, इस हेतु गाँव में छोटे-छोटे अनेक काम हो सकते हैं, जिनको करने से बड़े परिणाम होंगे। उनमें से कुछ कामों के सम्बन्ध में संक्षिप्त विवरण प्रस्तुत है।
1. स्वच्छता अभियान - इस निमित्त व्यक्ति स्तर पर घर-घर की स्वच्छता एवं गली, विद्यालय, मन्दिर, तालाब, घाट आदि सार्वजनिक स्थानों के लिए सामाजिक सहभाग से स्वच्छता अभियान चलाने से नेतृत्व विकसित होगा, श्रम का महत्व स्थापित होगा, सहकार की भावना बढ़ेगी, स्वच्छता का संस्कार बनेगा, गाँव का गौरव बढ़ेगा और इस गाँव का नागरिक देश में कहीं भी जायेगा तो उसके द्वारा ऐसा कोई काम नहीं होगा जिससे गंदगी होती हो। गाँव स्वच्छता का ऐम्बेसडर बन जायेगा।
2. गाँव का उत्सव - वर्ष, दो वर्ष में गाँव को सामूहिक उत्सव मनाने की परम्परा प्रारम्भ करना चाहिए, जिसके लिए उस गाँव में मान्य कोई धार्मिक, सांस्कृतिक, परम्परागत, आस्थागत अवसर या आवश्यकता अनुसार कोई उपलक्ष्य सुनिश्चित किया जा सकता है। इस अवसर पर आयोजित कार्यक्रम में अपने गाँव से बाहर गए अथवा रह रहे सभी लोगों को आमन्त्रित करना चाहिए, जिससे उस व्यक्ति का भी उपयोग गाँव के विकास में किया जा सके। इस आयोजन से निम्नांकित लाभकारी परिणाम आयेंगे। गाँव का उत्सव होने से घर, गाँव, गली, मोहल्ला सभी स्वच्छ होगा, कार्य विभाजन एवं दायित्व निर्धारण से सामजिक कार्य के प्रति आस्था एवं कार्यकुशलता बढ़ेगी। गाँव से बाहर रह रहे परिवारों एवं रिश्तेदारों के आने से गाँव के प्रति लगाव बढ़ेगा, कर्तव्य भाव जगेगा, अपनत्व बढ़ेगा, सामजिक विकास के नए-नए आयामों के संकल्प जगेंगे और दायित्वबोध के साथ व्यक्तित्व का विकास होगा।
उत्तराखण्ड में प्रेम बड़ाकोटी ने अपने गाँव में पिछले तीन वर्ष से ग्राम उत्सव प्रारम्भ किया है, जिससे वषों बाद अनेक लोगों ने अपने गाँव को देखा, उन परिवारों के बच्चों के मुण्डन आदि संस्कार अब गाँव में ही होने लगे हैं, गाँव का मन्दिर बन गया है, स्कूल की हालत अच्छी हो गई है, गाँव के प्रति गौरव भाव जागृत हुआ है और निरन्तरता के साथ ही सहभागिता बढ़ी है।
3. आस्था स्थल सुव्यवस्था - गाँव का जो भी आस्था स्थल हो, यदि नहीं है तो विकसित किया जाये और उसे सब प्रकार से सुसज्जित, संस्कार युक्त बनाया जाये, दैनिक/साप्ताहिक/मासिक या आवश्यकता अनुसार संस्कार जन्य कार्यक्रम आयोजित किए जाएं। इससे गाँव में एक संस्कार युक्त स्थान पर सुनिश्चित समय पर परस्पर मिलने का अवसर बनेगा और संस्कारों को बल मिलेगा, गाँव सम्बन्धी कार्ययोजना बनाने ओर उसे क्रियान्वित करने के लिए उपयुक्त टीम उपलब्ध होगी।
4. विद्यालय सुव्यवस्था - विद्यालय के शिक्षकों से मित्रवत सम्बन्ध बनाकर, गाँव के शिक्षित व समय दे सकने वाले महिला, पुरूषों को जोड़कर, विद्यालय की स्वच्छता, सज्जा, बच्चों की व उनके बस्तों की स्वच्छता, हर कक्षा में सुचारू पढ़ाई सुनिश्चित करने हेतु सेवाभागी लोगों की व्यवस्था, बच्चों में स्वस्थ प्रतियोगी भाव जगाने हेतु शैक्षिक, सांस्कृतिक, शारीरिक कार्यक्रमों की योजना करना, अच्छे कायों हेतु सम्मानित करना उपयोगी होगा।
5. गौ आधारित खेती - सबसे पहले गाँव के प्रयोगधर्मी, लगनशील, परिश्रमी किसानों का चयन कर, उन्हें शून्य लागत प्राकृतिक (गौ आधारित) खेती का व्यावहारिक व सैद्धान्तिक प्रशिक्षण कराना, प्रारम्भ में स्वंय की आवश्यकता या छोटे खेत में प्रयोग प्रारम्भ कराना, क्रमशः अनुभव के आधार पर माॅडल विकसित कराना और पूरे गाँव से आगे क्षेत्र में संकुल विकास की योजना करनी चाहिए। इससे किसानों के घर में गाय आयेगी, हर घर को दूध उपलब्ध होगा, गाँव से पलायन रूकेगा, भूमि उर्वरा होगी, गुणवŸाा युक्त उत्पादन बढ़ेगा, किसान की आर्थिक स्थिति मजबूत होगी, पर्यावरण शुद्ध होगा, जैवविविधता का संरक्षण होगा, जल का दोहन कम होगा, भूजल स्तर में वृद्धि होगी, सूखते भूजल स्रोत पुनः चलने लगेंगे, नदियांे को सजला व सुजला बनाने में महत्वपूर्ण योगदान होगा और स्वावलम्बी समाज का निर्माण होगा।
6. वृक्षारोपण - वृ़क्ष जीवनदाता हैं, इनसे हमे प्राणवायु, फल, फूल, औषधियाँ तथा जीवन निर्वाह सम्बन्धी अनेक वस्तुए उपलब्ध होती हैं, पर्यावरण, जैवविविधता एवं जल संरक्षण होता है और हमारे द्वारा उत्सर्जित कार्बनडाई आक्साइड जैसी गैसों का उपयोगी संतुलन तन्त्र बनता है, जिससे विश्व की समस्या बनी ग्लोबलवार्मिंग से निजात मिलती है। इसके लिए हर घर में रसोई वाटिका, हर खुली जगह पर पेड़, सड़कों के किनारे, खेत की मेड़ों पर, तालाबों, स्कूलों आदि स्थानों पर प्रतिवर्ष वृक्षारोपण अभियान चलाना चाहिए। इस हेतु जुलाई माह में गुरूपूर्णिमा से हरियाली तीज तक अट्ठारह दिवसीय ‘हरियाली पखचारा’ का आयोजन करना उपयोगी हो सकता है। इसके लिए आवश्यक पौध का चयन व उपलब्धता सुनिश्चित करने हेतु पौधशाला विकसित करना भी ठीक रहेगा। हम अपने गाँव को हरियाली की दृष्टि से 33 प्रतिशत लक्ष्य तक ले जा सकते हैं। गाँव क्षेत्र के लिए एक माॅडल बनेगा और गाँव की अनेक आवश्यकताए भी इससे पूरी होगी।
7. जल संरक्षण - ‘जल ही जीवन है’ सभी जानते हैं, परन्तु उसके महत्व को समझ कर व्यवहार नहीं करते। हमारी लापरवाही के कारण हमारे कुएँ सूख गए हें, भूगर्भ जल का स्तर निरन्तर नीचे गिर रहा है, तालाबों, झीलों एवं नदियों के जल स्रोत सूख गए है, परिणाम स्वरूप अनेक छोटी नदियांँ सूख गई हैं और अनेक नदियां सूखने की कगार पर हैं। हमने विकास क्रम में भ्रमित होकर कुछ ऐसे काम कर ड़ाले या अभी भी कर रहे हैं, जिसके कारण भूगर्भ जल भी प्रदूषित हो गया है, जिसके कारण 100 फिट गहराई तक का पानी पीने योग्य नहीं रहा है। अभी भी समय है, जागने और गलतियों को सुधार कर अपनी भावी पीढ़ी का जीवन सुरक्षित करने का। इस हेतु हम करें - हमारे खेत का पानी बहकर बाहर न जाये, इस हेतु मेड़बंदी, गांव में कहीं भी बह रहे बरसाती पानी को रोकने के लिए छोटे बंधे और उस रूके हुए पानी को किसी तालाब या झील में पहुँचाने हेतु नाली या वहीं पर रिचार्जिंग वेल बनाना। कम पानी वाली फसलें लेना तथा पानी के समुचित उपयोग की विधियों का प्रयोग। रसायनिक खादों व रसायनिक कीटनाशकों का प्रयोग नहीं करना तथा तालाबों एवं जल स्रोतों को स्वच्छ रखना सीखना होगा। इसके लिए कार्यक्रम बनाए, आवश्यक अभियान चलाएं।
8. प्रतिभा सम्मान - ‘गांव की प्रतिभाओं को खोजना, उनका विकास हा,े इसकी योजना करना तथा उनका सम्मान करना जिससे नई पीढ़ी को भी उनसे प्रेरणा मिल सके तथा उनकी प्रतिभा का उपयोग गांव के हित में लग सके। इसमें अच्छी खेती, नए प्रयोग, अच्छी पढ़ाई, गांव या समाज हित का कोई काम, वरिष्ठ व समाज सेवी   जनों का सम्मान करना उपयोगी रहेगा।
9. व्यक्तित्व विकास - ‘युवकों के व्यक्तित्व विकास के लिए विभन्न प्रकार की शैक्षिक, संास्कृतिक, श्रमाधारित, खेलकूद आदि प्रतियोगिताएँ आयोजित करना।
10. शैक्षिक सुधार - ‘गांव का शैक्षिक स्तर वर्तमान विकास की कसौटी पर खरा उतर सके, इस हेतु बाल शिक्षा के लिए बाल संस्कार केन्द्र, जूनियर व माध्यमिक शिक्षा के लिए कोचिंग सेन्टर, मानसिक व शारीरिक विकास हेतु योग-व्यायाम केन्द्र संचालित करना चाहिए। इसके अतिरिक्त गांव में अनेक लोग ऐसे रहते हैं, जिनके पास पर्याप्त समय रहता है, उनको गांव के विद्यालय के साथ जोड़ा जा सकता है।
11. समन्वय - ‘गांव में छोटी-छोटी बातो पर झगड़े होते हैं, मुकदमें प्रारम्भ हो जाते हैं। इससे गांव को बचाना, गांव की बहुत बड़ी सेवा होगी। यह कार्य तत्काल आपसी बातचीत, समन्वय एवं समझौते से हो सकता है। इससे गांव का सदभाव बना रहेगा।
12. परामर्श (कौन्सलिंग) - ‘गांव में पढ़ाई करते समय छात्रों व उनके अभिभावकों को वर्तमान की आवश्यकताओं और मांग का पता नहीं रहता, इसलिए क्या पढ़ने की आवश्यकता है, कौन सा कोर्स करना है, यह भी उन्हें  पता नहीं होता। इस कारण हाई स्कूल, इण्टर के बाद वह क्या पढ़ाई करे, यह उपयुक्त व्यक्तियों द्वारा उन्हें परामर्श देने की व्यवस्था की जा सकती है।ं इससे श्रम, समय की बचत के साथ ही भविष्य का मार्ग सुगम होगा। ु

नमामि गंगे परियोजना हेतु सुझाव - विश्वनाथ खेमका


आज समाज में पर्यावरण के प्रति अपने कर्तव्यों को सोचने और उसके अनुरूप कुछ करने का भाव प्रबल हुआ है। अनेक कार्य ऐसे हो गये जिनमें तो प्रयाश्चित की आवश्यकता है। गंगा की अविरलता और निर्मलता ऐसा ही विषय है। अतः विचारणीय है कि, जब तक गंगा जी में जल का प्रवाह नहीं होगा तब-तक निर्मल गंगा-अविरल गंगा के बारे में सोचा नहीं जा सकता। उत्तर प्रदेश में वर्ष 1960 में हजारों की संख्या से लाखांे की संख्या में ट्यूबवेल की स्थापना होने के कारण गंगा जी के किनारे भूजल स्तर (ळॅस्) जमीनी सतह से पहले जो 7-8 मीटर नीचे था वह अब 35 मीटर से अधिक हो गया है। इस प्रक्रिया के कारण गंगा जी का जल प्रवाह के बजाय भूमि में रिसना पूर्व की अपेक्षा अब ज्यादा हो रहा है। देश के लोगांे को पीने के लिए पानी तथा अन्न की पैदावार के लिए ट्यूबवेल बड़ा साधन है जिसे बंद नही किया जा सकता है। हिमालय घाटी में उत्तर प्रदेश सिंचाई विभाग के माध्यम से गंगा जी पर टेहरी बाँध का निर्माण करवाया गया है जिसमें बरसात में बहने वाले पानी का भण्डारण होता है। इसके निर्माण के कारण अपर गंगा परियोजना में 5000 क्यूसेक पानी अतिरिक्त की आपूर्ती होने लगी है जो खेती तथा पीने के लिए प्रयोग में आता है।
भारत सरकार ‘‘नमामि गंगे’’ परियोजना के माध्यम से गंगा जी में जल की मात्रा की कमी, जल प्रदूषित होना तथा निर्मल धारा को प्रवाहमय रखने के लिए प्रयत्नशील  है। लोगों का यह सोचना है कि टिहरी बाँध के निर्माण के कारण गंगा जी में ये प्रवाह संकट उत्पन्न हुआ है। इस संकट से बाहर निकलने के प्रयास हेतु निम्न प्रस्ताव हैं:-
1. परियोजना की सफलता हेतु ठम्छब्भ् ड।त्ज्ञप्छळ की जाय। कानपुर या प्रयाग में गंगा जी में उपलब्ध जल की मात्रा व गुणवत्ता प्राप्ति हेतु (वर्ष 1960 या उसके आसपास) को आधार बनाया जाय। बरसात में बहने वाले पानी का भण्डारण करके गंगा जी में उसके स्मंद च्मतपवक में विनियमित (त्महनसंजमक) प्रवाह किया जाय। इसके लिए गंगा बेसिन विशेषकर उत्तर प्रदेश की नदियों तथा नालों में चेक डैम आदि का निर्माण समय बद्धता के साथ किया जाय।
2. यमुना नदी पर शंकरगढ़, चिल्लाघाट तथा हमीरपुर से नीचे तीन बैराजों का निर्माण किया जाय। लगभग 700 करोड़ प्रति बैराज के खर्च से 2100 करोड़ रूपये में गंगा में यमुना के माध्यम से उसके स्मंद च्मतपवक में लगभग 1200 क्यूसेक पानी की उपलब्धता सम्भव हो सकती है। शंकरगढ़ बैराज परियोजना सम्भवतः ब्ॅब् द्वारा अनुमोदित भी है। इसे अविलम्ब प्रारम्भ किया जाय।
3. सिंचाई परियोजनाओं में ॅन्म् ;ूंजमत नेम मििपबपमदबलद्ध बढ़ाकर तथा ब्तवचचपदह च्ंजजमतद में संशोधन कर 05-10ः नदी जल नहरों से बचत कर गंगा में जल बहाव को बढ़ाया जाये।
4. ैज्च् का संचालन व्छ स्प्छम् ैलेजमउ त्मबवतकपदह द्वारा प्रभावी किया जाय।
5. उद्योगों के म्ििसनमदज को ज्तमंजए त्मबलबसम - त्मनेम उद्योगों में ही किया जाय। छव ैमूंहमए छव म्ििसनमदज सिवू जव त्पअमत का अनुपालन सुनिष्चित हो।
6. गंगा समग्र में न्यायिक पैनल को प्रभावी किया जाय।
7. गंगा जी के किनारों के गाँवों में ठपव.वनजसमजए स्वच्छता एवं जन-जागरण हेतु शिक्षा केन्द्रों की स्थापना की जाय।
8. विगत 30 वर्षो में भारत की जलवायु में अत्यधिक परिवर्तन हुआ है। इसके वैश्विक तथा हिमालय घाटी के म्बव ैलेजमउ को प्रभावित करने वाले सभी च्ंतंउमजमते का समावेश करते हुए संशोधन कार्य किया जाय। संशोधन का उपयोग हिमालय घाटी एवं नदी जीवन की समग्रता और मौसम के सकारात्मक प्रभाव हेतु किया जाय।
9. टेहरी बाँध से अविरल प्रवाह हेतु 300-400 क्यूसेक का एक व्नजसमज है। गंगा जी में अविरल प्रवाह हेतु मानकों के आधार पर अन्य व्नजसमज की सम्भावना पर विचार किया जाय।
10. जो नदियाँ त्महपउ ैजंजम में हैं उनमें सिल्ट सफाई उपयोगी नही सिद्ध होगी। ऋषीकेश से ऊपर हिमालय घाटी में बैराज निर्माण व्यवहारिक नहीं है। अतः गंगा जी में जल की मात्रा तथा प्रवाह की गति बढ़ाने हेतु यदि आवश्यकता हो तो घाटी में 40-50 मीटर ऊचाई का बाँध निर्मित हो जिसमें नदी तल से ही जल प्रवाह का प्राविधान हो और उसके फाटक त्ंकपंस  हांे। इस बाँध के जल भण्डारण का उपयोग केवल गंगा जी में गंगा को अविरल गंगा-निर्मल गंगा हेतु ही हो।
उपरोक्त कार्यांे की समीक्षा के पश्चात,् क्रियान्वयन से ‘नमामि गंगे परियोजना’ कम लागत तथा सफलता से अगले पांँच वर्षों तक निश्चित होगी ही और गंगा के किनारे तीर्थ, ‘मानव के आनन्द स्थल’ बनेंगे। गंगा मैया के अविरल-निर्मल प्रवाह की बाधाओं की समाप्ति  ज्ञान-विज्ञान पूरक संयोजन से ही होगी, ऐसा मेरा व्यक्तिगत दृढ़ विश्वास है। ु

नदी का चिन्तन - गौरी शंकर वैश्य ‘‘विनम्र’’


वृद्धा माँ-सी संकेतों में
सुनों! नदी कुछ कहती है।
लोरी सा मधुरिम निनाद कर
‘कल-कल’ धारा बहती है।
हिमखण्डों को ताप मिला, तब बूँद-बूँद बनकर पिघली
प्रकृति-पुरूष रूपी जीवों का, करने को उद्धार चली
जिसने पावन अमृत बाँटा
वह अन्तर में दहती है।
सुनों! नदी कुछ ....
देवतुल्य जो पूज्य सनातन, अब उसका सम्मान नहीं
जल से रस-चेतनता हैं, बिन जल के कल्याण नहीं
तन अस्वस्थ हैं, मन मलीन है
प्रतिपल पीड़ा सहती है।
सुनों! नदी कुछ ....
स्वार्थ में अन्धे मानव ने, किया प्रदूषित, निर्मल जल
डाल रहा अपशिष्ट, रसायन, मिला रहा है वाहित मल
शुष्क-अशक्त हुए दोनों तट
उर में सिसकता ढहती है।
सुनों! नदी कुछ ....
औद्योगिक अपशिष्ट रोक दो, दूषित जल का हो शोधन
जल-जीवों की संरक्षा हो, चले स्वच्छता-आन्दोलन
पुत्र भगीरथ कब आओगे!
चिन्तन में रत रहती है।
सुनों! नदी कुछ कहती है।
चिन्तन, मनन और क्रियान्वयन की आवश्यकता है।ु
- 117 आदिल नगर, डाकघर-विकास नगर, लखनऊ-226022, दूरभाष: 9956087585

अब प्राकृतिक रूप से पकाएं कच्चे फल - डाॅ॰ राज किशोर एवं डाॅ॰ वी॰के॰ चैधरी


देश में जनसंख्या बढ़ने तथा स्वास्थ्य के प्रति लोगो की बढ़ती जागरूकता से राष्ट्रीय स्तर पर बड़े शहरों से लेकर सुदूर गाँवों तक बाजार में विभिन्न प्रकार के पके फलों की माँग निरन्तर बढ़ती जा रही है। ऐसी स्थिति में फलों की खेती करने वाले किसानों तथा फलों का व्यापार करने वाले बड़े-छोटे व्यापारियों के लिए बाजार में पके फलों की जितनी अधिक माँग रहती है उतनी बड़ी मात्रा में फल प्राकृतिक रूप से पक नहीं सकते हैं। इसलिए मांग और आपूर्ति के बीच के इस अन्तर को दूर करने के लिए बागवानों एवं व्यापारियों को फलों को पकाने के लिए कृत्रिम विधियों का सहारा लेना पड़ता है। दूसरी ओर विभिन्न प्रकार के फल व्यावसायिक स्तर पर दूर-दराज के क्षेत्रों और यहाँ तक कि दूसरे प्रदेशों में उगाए जाते है, जहाँ से वे देश के विभिन्न क्षेत्रों में परिवहन के विभिन्न माध्यमों से भेजे जाते है। अब यदि दूर-दराज से भेजे जाने वाले इन फलों को पकी हुई अवस्था में विपणन के लिए तोड़ा जाएगा तों वांछित स्थान तक पहुँचते-पहुँचते ये फल खराब हो जायेंगें या फिर सड़ जायंेगें। इन सभी परिस्थितियों के कारण फलों को कृत्रिम रूप से पकाने का सहारा लिया जाता है।
फलों को कृत्रिम रूप से पकाने की विधियाँ -
फल चाहें प्राकृतिक रूप से पकें या कृत्रिम रूप से पकाएं जायें, इसके लिए इथिलीन और एसिटिलीन गैसें मुख्य कारक हैं। ‘खरबूजे को देखकर खरबूजा रंग बदलता है।’ यह कहावत जिसने भी और जिस उद्देश्य से पहली बार कही होगी उसे कृषि कार्यो का गहन अनुभव रहा होगा, क्योंकि इस कहावत का वैज्ञानिक आधार है। खरबूजे के खेत में जब एक खरबूजा पकता है तो इस क्रिया में इथिलीन गैस मुक्त होती है। मुक्त हुई यह गैस खेत के दूसरे खरबूजे को पकाने में उत्प्रेरक का कार्य करती है और धीरे-धीरे पूरे खेत में इथिलीन गैस मुक्त होने लगती है और फलों के पकने की प्रक्रिया तीव्रता से चल पड़ती है। कृत्रिम रूप से फलों को पकाने के लिए बागवानों और व्यापारियों द्वारा कैल्सियम कार्बाइड रसायन (रसायनिक सूत्रःब्ंब्2) का उपयोग किया जाता है। रसायन शास्त्री फ्रेडरिक वोहलर ने वर्ष 1862 में सर्वप्रथम यह ज्ञात किया था कि कैल्सियम कार्बाइड पानी के साथ रसायनिक अभिक्रिया करके एसिटिलीन गैस का निर्माण करती है। इस गैस का उपयोग उसी समय से अनेक औद्योगिक कार्यो के साथ-साथ फलों को पकाने में होता आ रहा है। यद्यपि एसिटिलीन इथिलीन सदृश गैस होती है और इसका व्यावसायिक स्तर पर उपयोग फलों को पकाने के लिए किया जाता है, लेकिन यह मानव स्वास्थ्य के लिए अत्यधिक खतरनाक है, जिसके कारण कैल्शियम कार्बाइड से पकाएं फलों को खाने से आँख, फेफड़े, गुर्दे एवं हृदय पर अत्यधिक दुष्प्रभाव पड़ता है। कैल्शियम के इन्हीं दुष्प्रभावों को देखते हुए फलों को पकाने के लिए शासन द्वारा इसे प्रतिबन्धित कर दिया गया है और विकल्प के रूप में इथेफान या इथेरल नामक तरल रसायनों के उपयोग की अनुमति प्रदान की गयी है।
इथेफान या इथेरल के द्वारा अलग-अलग प्रकार के फलों को पकाने के लिए इन रसायनों की अलग-अलग मात्राओं का प्रयोग किया जाता है। आम एवं केला पकाने के लिए 12.5 मि॰ली॰, पपीता पकाने के लिए 18 मि॰ली॰ तथा टमाटर को पकाने के लिए 6.5 मि॰ली॰ रसायन प्रति दस लीटर पानी में घोलकर और उसमें 10 मि॰ली॰ तरल साबुन मिलाकर घोल तैयार करके फलों को इस घोल में 10 से 15 मिनट तक (फलों के आकार के अनुसार) डुबोकर निकाल लिया जाता है। 5 से 7 दिन के भीतर सारे फल समान रूप से पक जाते हैं। रसायनों की माप के लिए कोई साधन न होने पर चाय की चम्मच का प्रयोग करना चाहिए। चाय की एक चम्मच में पाँच  मि॰ली॰ दवा आती है।
फलों को पकाने के प्राकृतिक उपाय -
नरेन्द्र देव कृषि एवं प्रौद्योगिक विश्वविद्यालय, नरेन्द्र नगर, कुमारगंज, फैजाबाद के फल प्रसंस्करण एवं संरक्षण विभाग के अध्यक्ष डाॅ॰ संजय पाठक द्वारा विभिन्न प्रकार के कच्चे फलों में मिठास बढ़ाने तथा पेड़ों पर फलों को देर से पकाने जैसे अनेक कार्यों के लिए सरल विधियों का विकास किया गया है। पोस्ट-हार्वेस्ट टेक्नोलाॅजी के विशेषज्ञ डाॅ॰ संजय पाठक के अनुसार कच्चा केला, पपीता, आम तथा टमाटर जैसे फलों को प्राकृतिक रूप से पकाने के लिए इन फलों के साथ पका पपीता, सेब, आम, केला या पका शरीफा रख देने से कच्चे फल आसानी से पक जाते है। प्राकृतिक रूप से पके हुए इस प्रकार के फल रंग एवं स्वाद में उत्तम किस्म के रहते है और उपभोक्ता के शरीर पर कोई विपरीत प्रभाव नहीं डालते हैं। आम को पकाने के लिए 22 डिग्री तापमान एवं केले को पकाने के लिए 18 डिग्री तापमान उचित रहता है। डाॅ॰ पाठक के अनुसार शरीफा एक ऐसा फल है जिसके पकने पर और फलों की तुलना में सबसे ज्यादा इथीलीन गैस का उत्सर्जन होता है जो कच्चे फलों को पकाने के लिए सबसे सुरक्षित गैस मानी जाती है।
डाॅ॰ संजय पाठक द्वारा किए गए शोधों के अनुसार पेड़ों पर लगे फलों का जीवन काल और भण्डारण समय बढ़ाने के लिए बागवान को फल लगे पेड़ों पर कैल्सियम क्लोराईड के दो प्रतिशत जलीय घोल का छिड़काव करना चाहिए। आम के फलों में मिठास बढ़ाने के लिए फलों के पकने के एक माह पूर्व पोटैशियम सल्फेट के एक प्रतिशत जलीय घोल का छिड़काव किया जा सकता है। दूसरी ओर यदि बागवान आम या अन्य फलों को पेड़ों पर देर से पकाना चाहते है तो उन्हें पेड़ों पर लगे फलों पर दो प्रतिशत यूरिया के जलीय घोल का छिड़काव करना चाहिए। ु
- कुमारगंज, कृषि विश्वविद्यालय, फैजावाद।

नदियों के किनारे स्थित तीर्थों का सम्यक विकास -डा॰ महेन्द्र प्रताप सिंह


हमारे देश के प्रायः सभी प्राचीन तीर्थस्थल नदियों के किनारे स्थित हैं। नदियों की स्वच्छता हेतु चलाए जा रहे विभिन्न प्रयत्नों के क्रम में नदियोें के किनारे स्थित तीर्थों के सम्यक विकास हेतु कुछ उपयोगी सुझाव निम्न प्रकार हैं -
1. स्वच्छता अभियान -  तीर्थस्थलों पर प्रायः अपेक्षित स्वच्छता नहीं रहती है। धार्मिक भावना से वहाँ के लोगों मुख्यतः साधु-सन्तों, सामाजिक कार्यकर्ताओं एवं अन्य प्रबुद्ध लोगों के साथ स्वच्छता का कार्यक्रम चलाया जा सकता है। तीर्थे स्थलों के जलस्रोतों की सफाई पर विशेष ध्यान दिया जाना चाहिए।
2. पालीथीन मुक्ति - पालीथीन स्थाई गन्दगी का एक प्रमुख स्रोत है। यह हजारों वर्ष तक विघटित नहीं होता तथा गाय एवं अन्य जानवर इसे खाकर मर जाते हैं। धीरे-धीरे तीर्थस्थलों पर पालीथीन का प्रयोग समाप्त किया जाना चाहिए।
3. वृक्षारोपण - तीर्थों को हरा-भरा किया जाना आवश्यक है। तीर्थस्थल स्थित नदी तट पर धार्मिक एवं पर्यावरणीय महत्व की प्रजातियों जैसे- पीपल, पाकड़, बरगद, गूलर आदि एवं लुप्त हो रही प्रजातियों जैसे- कैथा, बड़हल, खिरनी आदि का रोपण किया जाना चाहिये। विभिन्न देवी, देवताओं से जुड़े पौधों का रोपण एवं यदि देखरेख की व्यवस्था हो तो विशिष्ट प्रजातियाँ जैसे- रुद्राक्ष एवं कल्पवृक्ष आदि का रोपण किया जाना चाहिये।
4. चढ़ाए गये फूल आदि का उपयोग - मुख्य मन्दिरों से बड़ी मात्रा में फूल, माला आदि निकलते हैं। इनसे अगरबत्ती एवं धूपबत्ती बनाई जाती हैं। इस कार्य से मन्दिर की सफाई के साथ-साथ स्थानीय लोगों को रोजगार भी मिलता है।
5. जलस्रोतों में विसर्जन को हतोत्साहित करना - नदियों एवं पवित्र सरोवर आदि में मूर्तियों एवं प्रयोग की जा चुकी हवन सामग्री को विसर्जित करने की परम्परा है। इसी के साथ बड़ी मात्रा में पालीथीन थैली भी जलस्रोतों में डाल दी जाती हैं। इसे प्रत्येक दशा में रोका जाना चाहिए। इस दिशा में किये गये कतिपय कार्यों का उल्लेख यहाँ पर किया जा रहा है -
माँ चन्द्रिका देवी मन्दिर - लखनऊ से लगभग 30 कि0मी0 दूर बक्शी के तालाब के आगे माँ चन्द्रिका देवी शक्तिपीठ परिसर स्थित है। मन्दिर समिति एवं स्थानीय लोगों के साथ बैठक कर सर्वसम्मति से निर्णय लिया गया कि दिनाँक 28.09.2011 से इस परिसर को पालीथीन मुक्त किया जायगा। उसके बाद आस-पास के कुम्हारों के साथ बैठक कर कुल्हड़ आपूर्ति की व्यवस्था की गई। पालीथीन थैली के विकल्प रूप में दुकानदारों को कागज एवं वैकल्पिक थैले उपलब्ध कराये गये। इस प्रकार प्रथम चरण में दुकानों पर पालीथीन कप के स्थान पर कुल्हड़ लाये गये तथा पालीथीन थैलियों के स्थान पर कागज एवं अन्य थैलों का प्रयोग प्रारम्भ किया गया। स्थाई रूप में इस परिसर को पालीथीन मुक्त बनाने के लिये स्थानीय ग्रामवासियों, मन्दिर समिति के लोगों एवं दुकानदारों को दिनाँक 28.09.2011 को नवरात्रि के प्रथम दिवस पर मेरे आध्यात्मिक गुरु सन्त स्वामी महेशानन्द जी द्वारा परिसर को पालीथीन मुक्त करने की शपथ दिलाई गई। इस समय तक परिसर में दुकानों को पालीथीन मुक्त किया जा चुका है। श्रद्धालुओं एवं भक्तों द्वारा पालीथीन का प्रयोग रुकवाने एवं मेला के दिनों में बाहर से आने वालों सेे पालीथीन रुकवाने की दिशा में मन्दिर समिति के सहयोग से प्रयास जारी है।
दिनाँक 28.09.2011 को ही स्वामी जी द्वारा कृष्णवट का रोपण कर परिसर में वृक्षारोपण का शुभारम्भ कर दिया गया जो अब वृक्ष का रूप ले रहे हैं। गोमती तट पर जल भराव वाले क्षेत्र में अर्जुन का रोपण किया गया एवं मन्दिर के आस-पास पीपल, पाकड़ एवं बरगद के साथ-साथ कैथ, बड़हर एवं आमरा जैसी अनेक लुप्त हो रही प्रजातियों को रोपित किया गया। धार्मिक महत्व को देखते हुये यहाँ कल्पवृक्ष, रुद्राक्ष, सिन्दूर का भी रोपण किया गया है। सभी प्रजातियाँ न केवल जीवित हैं बल्कि अच्छी दशा में चल रही हैं।
यहाँ पर चाय आदि की दुकानों पर मिट्टी के कुल्हड़, चाट की दुकानों पर पत्तल एवं अन्य दुकानों पर कागज के थैलों का व्यापक प्रयोग किया जा रहा है। इससे वहाँ होने वाली गन्दगी में कमी आयी है।
मन्दिर परिसर में चढ़ाए गए फूलों से अगरबत्ती एवं धूपबत्ती बनाने का कार्य किया जा रहा है। अन्य मन्दिर से जुड़े लोगों को दिखाकर यह कार्य अन्यत्र भी प्रारम्भ किया जाना चाहिये।
नैमिशारण्य  - उत्तर प्रदेश के सीतापुर जनपद में स्थित नैमिशारण्य एक प्रसिद्ध एवं प्राचीन तीर्थस्थल है। यह प्राचीन ऋषियों की तपस्थली रही है।
परिक्रमा पथ पर स्थानीय लोगों एवं वन विभाग के सहयोग से 88000 ऋषियों की स्मृति में 88000 पौधांें का रोपण कराया गया। दिनाँक 29 दिसम्बर सन् 2012 को नैमिशारण्य के प्रमुख साधु सन्त, व्यापार मण्डल के प्रतिनिधि गण एवं गणमान्य लोगों ने माँ चन्द्रिकादेवी मन्दिर परिसर में आकर वहाँ पर पालीथीन के विकल्प प्रयोग तथा वहाँ गोमती नदी के किनारे किये जा रहे रोपण कार्य को देखा। दिनाँक 27 जनवरी 2013 को पालीथीन के विकल्प के विक्रेता के साथ मैं नैमिशारण्य पहुँचा। इस सभा में पहला आश्रम के महन्त जी एवं अन्य कई लोगों ने पालीथीन के विकल्प के रूप में प्रयोग की जाने वाली थैलियाँ खरीदीं। दिनाँक 8 मार्च 2013 को माँ ललितादेवी परिसर को पालीथीन मुक्त करने का आदेश रिसीवर से निर्गत होने से पालीथीन मुक्ति की दिशा में एक सार्थक प्रयास प्रारम्भ हुआ।
गोमती के तट पर शमशानघाट के निकट स्थानीय गणमान्य नागरिकों के सहयोग से भूमि का प्रस्ताव प्राप्त कर 05 हे0 क्षेत्र में वन विभाग एवं स्थानीय लोगों के सहयोग से विधिवत् पौधारोपण कार्य कराया गया जिससेे उसे अतिक्रमण से भी बचाया जा सका है। इसके अतिरिक्त बालाजी मन्दिर परिसर में पंचवटी, नवग्रह वाटिका एवं नक्षत्र वाटिका की स्थापना कराई गई है।
उक्त के अतिरिक्त गोमतीपार क्षेत्र स्थित पहला आश्रम की भूमि पर भी व्यापक रोपण कराया गया। नैमिशारण्य से थोड़ी दूर स्थित रुद्रावर्त मन्दिर के पास हरिशंकरी स्थापित की गई। यहाँ पर रोपित सभी पौध सुरक्षित एवं प्रफुल्लित हैं।
वृन्दावन -  यहाँ पर विशेष प्रयास करके वन विभाग की सहायता से 2013 वर्षाकाल में 119 एकड़ क्षेत्र में पौधारोपण कार्य कराया गया।
धौम्य ऋषि आश्रम, धोबियाघाट - हरदोई जनपद में गोमती के तट पर स्थित धोबियाघाट एक अद्भुत स्थान है- पहला यहाँ भूमि से अनेक पानी के सोते निकलते हैं जो बाद में गोमती नदी में मिलते हैं तथा दूसरा गोमती के तट पर स्थित मन्दिर के सघन वन क्षेत्र को देखकर प्राचीन आश्रमों की परिकल्पना साकार रूप लेती है। पालीथीन बन्द करने का अभियान यहाँ भी प्रारम्भ हो गया।
सैलानी माता मन्दिर - लखनऊ से लगभग 20 कि0मी0 दूर बाराबंकी जिले में गोमती नदी के तट पर सैलानी माता का मन्दिर स्थित है। वर्ष 2014 वर्षाकाल में यहाँ पर धार्मिक महत्व के एवं लुप्त हो रही वृक्ष प्रजातियों के व्यापक पौधारोपण की योजना बनायी गयी। उक्त पौधारोपण हेतु मन्दिर समिति द्वारा यहाँ पर रोपण हेतु वृत्ताकार खाईं खुदवाई गयी। दिनाँक 04.05.2014 को मन्दिर समिति के अध्यक्ष श्री रामदुलारे यादव एवं मन्दिर के मुख्य पुजारी श्री वासुदेव जी द्वारा रुद्राक्ष के पौधे का रोपण कर पौध रोपण का शुभारम्भ किया गया। दिनाँक 20.07.2014 को सैलानी माता मन्दिर परिसर में कल्पवृक्ष, पारिजात (हरसिंगार), हरिशंकरी (पीपल, पाकड़ एवं बरगद), कैथ, खिरनी, कनकचम्पा, मौलश्री, खैर, बड़हल, गूलर आदि प्रजातियों का रोपण किया गया।
भविष्य के कार्यक्रम -
1. रायबरेली जनपद में सई नदी के किनारे स्थित भौरेश्वर महादेव मन्दिर परिसर में धार्मिक महत्व की प्रजातियों का रोपण।
2. सैलानी माता मन्दिर परिसर में पालीथीन मुक्ति का कार्य।
3. उपरोक्त मन्दिरों में कभी-कभी सफाई कार्य किया जाना। ु
- उप वन संरक्षक, कार्यालय प्रमुख व संरक्षक, 17, राणा प्रताप मार्ग, उŸार प्रदेश, लखनऊ।

आदर्श गाँव की पहल.संकलन - भास्कर अस्थाना

जहांँ समाज जाग्रत होता है, वहाँ कोई भी किया गया काम स्थायी व प्रभावी होता है। अपने गाँव को सक्षम बनाने और वर्तमान चुनौतियों के अनुरूप उसे विकसित करने की दिशा में गाँव के जागरूक नागरिकों ने भी पहल की है, जिसमें से गुजरात के ‘पुंसरी’ और उत्तर प्रदेश में बरेली जिले के ‘ग्रेम’ गाँव का संक्षिप्त विवरण प्रस्तुत है।
1. पुंसरी गाँव - गुजरात की राजधानी ‘गाँधी नगर’ से 35 किमी॰ दूर सावरकांठा जिले में स्थित पुंसरी गाँव के युवा सरपंच हिमांशु पटेल की कुछ करने की जिद ने आज गाँव की सूरत व सीरत दोनो बदल दी है। केन्द्र व राज्य सरकार की योजनाओं से हर ग्राम पंचायत को तीन से पाँच करोड़ रूपये मिलते हैं, लेकिन कुछ गाँव ही उस पैसे का उपयोग कर पाते हैं। सरपंच हिमांशु भाई ने पद संभालते ही सबसे पहले सेनीटेशन सुविधा पर जोर दिया तथा सुरक्षा व मानीटरिंग के लिए सी॰सी॰ टीवी लगाये। बिजली की तकनीकी खराबी व उसकी तत्काल मरम्मत की सुविधा के लिए खम्भों पर नम्बर डाल दिये, गाँव के 1200 घरों में से 250 घरों को इको फ्रैन्डली बिजली की उपलब्धता के लिए बायो इलेक्ट्रिीसिटी प्लांट पर काम प्रारम्भ किया। 6 हजार आबादी वाले गाँव में कम लागत में प्रकाश उपलब्धता हेतु 22 लाख रू॰ खर्च करके 450 एलईडी लाइट का प्रावधान किया, जिससे बिजली के बिल में 50 प्रतिशत तक की कमी की उम्मीद है। गाँव में सी॰सी॰ रोड है, स्वच्छता व्यवस्था उत्तम है, गाँव का अपना आर॰ओ॰ वाटर प्लांट है जिससे गाँववासियों को 4 रू॰ में 20 लीटर मिनरल वाटर की उपलब्धता होती है। बच्चों को स्कूल भेजने व दूध बेचने वाले पशुपालकों के लिए गाँव की अपनी बस सेवा तथा आधुनिकता में शहरों को भी पीछे छोड़ते हुए वाईफाई व कम्युनिटी रेडियों की उपलब्धता की ओर कदम बढ़ाता पंुसरी गाँव आज देश के सात लाख गावों के लिए एक पे्ररक ‘दीप’ बन गया है।
पंुसरी गाँव पंचायत के पास पाँच साल पहले 30 लाख 40 हजार रूपये जमा पूँजी थी, अब उसके खाते में 45 लाख रूपये हैं, जो प्रारम्भ किए गये कार्यों को गति देने में सहायक हांेगे।
2. ग्रेम गाँव - उŸार प्रदेश में बरेली जिले के नवाबगंज क्षेत्र में गाँव के विकास की कहानी भी एक संकल्प की कहानी है। राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित, संकल्प के धनी मास्टर लालता प्रसाद जब उच्च प्राथमिक विद्यालय से रिटायर हुए तोे गाँव वालों ने तय कर लिया कि अगले प्रधान वही होंगे। मास्टर साहब ने सशर्त स्वीकृति दी कि वह चुनाव प्रचार पर एक पैसा खर्च नहीं करेंगे, वोट माँगने किसी के घर नहीं जायेंगे तथा जीतने के लिए कोई वायदा नहीं करेंगे। मास्टर साहब ने विचारों के अनुरूप चुनाव लड़ने की स्वीकृति देकर प्रजातन्त्र की नींव मजबूत की। नतीजा आया तो वह प्रधान बन गए। जीत के बाद सबसे पहले बालिका शिक्षा उत्थान के लिए 7.49 लाख रू॰ सरकारी सहयोग और डेढ़ लाख अपने पास से लगाकर उच्च प्राथमिक विद्यालय बनवाया, जो तमाम स्कूलों के लिए रोल माॅडल है। इसके साथ ही गाँव के अन्दर व बाहर पक्की सड़कों का उपयोगी जाल है। खेतों तक जाने वाले पक्के चकरोड, पक्की सड़कें, गंदे पानी निकास को नालियाँ व बहगुल नदी तक नाले की 2 कि॰मी॰ सफाई, साफ पानी को हैण्डपम्प, चैराहे के मोड़ों पर ढ़की हुई नालियाँ, मरकरी लाइट, कब्रिस्तान और शमशान के पास से गंदगी की सफाई, जल संचय को तालाब, शौच को शौचालय, हरियाली हेतु मुख्य मार्ग से विद्यालय और तालाबों के किनारे पेड़ लगवाये तथा खुले में शौच न जाने और सड़कों पर कूड़ा न फेंकने के ग्रामीणों में संस्कार भरे हैं।
इतना सब कुछ करने के बाद भी वह स्वयं दुबारा प्रधान नहीं बनना चाहते। प्रधान बनने से पहले के मास्टर साहब के तन पर कुर्ता-पायजामा, पैर में साधारण चप्पल, चलने को पुराना वेस्पा स्कूटर और रहने को पुराना मकान, प्रधान बनने के बाद मास्टर लालता प्र्रसाद जी का कुछ भी तो नहीं बदला। हांँ, उनके प्रधान बनने से गाँव की तस्वीर और तकदीर जरूर बदल गई।
मास्टर साहब अपने को प्रधान कहलाना पसन्द नहीं करते, क्योंकि, वह कहते हैं- ‘आज प्रधान शब्द की गरिमा ही नहीं बची है।’ वह प्रधानों को सीख देते हैं, ‘उन्हें प्रधान शब्द के प्रति समाज में बनी सोच बदलने के लिए काम करना होगा।’
उनका कहना है, ‘‘प्रधान चाहें तो गाँव स्वर्ग बन सकता है। न संसाधनों का टोटा रास्ता रोकेगा और न पैसे की कमी आड़े आयेगी। लेकिन ताली दोनो हाथों से बजती है, जैसा कि ‘ग्रेम’ गाँव में हुआ।’’ ु

सांसद आदर्श ग्राम योजना एक दृष्टि - ब्रजेन्द्र पाल सिंह


ग्राम एक संस्कृति है, एक विचार है और अन्ततः व्यक्ति निर्माण की एक पाठशाला है। जहाँ वह व्यक्ति से परिवार, परिवार से समाज, समाज से राष्ट्र और राष्ट्र से वसुधैव कुटुम्बकम् का पाठ सीखता है। हम जहांँ भी जायें, जहांँ भी रहें, अपने पूर्वजों की विरासत ‘ग्राम संस्कृति’ के विकास के लिए कार्य करें। हम अपने गाँव को न भूलें, उसे अपने जीवन का तीर्थ बनाएँ। अपने जीवन-तीर्थ रूपी गाँव को सजाएं, संवारें और भारत को विश्व का सिरमौर बनाने के लिए एक कदम आगे बढ़ाएँ।
प्रधानमंत्री मोदी जी ने भी इसी दिशा में एक कदम आगे बढ़ाते हुए लोकनायक जयप्रकाश नारायण के जन्मदिन 11 नवम्बर को सांसद आदर्श ग्राम योजना की घोषणा करते हुए उŸाल दृष्टि का प्रयोग किया है। हम सभी जानते हैं कि यदि सूर्य की किरणों को एक लेंस (उŸाल लेंस) के माध्यम से एक बिन्दु पर केन्द्रित किया जाये, तो अग्नि प्रज्ज्वलित हो जाती है। इसी दृष्टि का प्रयोग करते हुए मोदी जी ने फैली हुई सांसद निधि की ऊर्जा को उसके संसदीय क्षेत्र के एक गाँव पर केन्द्रित करने की व्यवस्था बना दी है। इससे सांसद-निधि की ऊर्जा के साथ ही अनेक अन्य ऊर्जाएँ भी उस चयनित गाँव पर केन्द्रित होंगी और उससे राष्ट्र विकास की असीम-ऊर्जा प्रकट होगी।
यह ऊर्जाएँ हैं -
1. राष्ट्रीय विकास के एजेन्डे में ग्राम विकास का कार्य प्राथमिकता पर आ जायेगा, जिससे गाँव का बहुमुखी विकास होगा, आर्थिक समृद्धि के मार्ग खुलेंगे, रोजगार सृजन होगा और पलायन रूकेगा।
2. सांसदों, विधायकों को अपनी क्षमता प्रकट करने का अवसर मिलेगा। ग्राम का चयन उसकी प्रथम परीक्षा होगी।
3. केन्द्र व राज्य की ग्राम विकास की अनेक योजनाएंँ एक ग्राम पर केन्द्रित होकर प्रभावी परिणाम देंगी।
चुनौतियाँ भी हैं -
1. गाँव की समस्त शक्तियों को इस अभियान से जोड़ना, जिससे वह इस कार्य में अपने कार्य की अनुभूति कर गौरान्वित हो सकें।
2. गाँव से बाहर गई मानवीय ऊर्जा को भी अपने गाँव के प्रति प्रेरित करना और गाँव में उन्हें अपेक्षित सम्मान मिल सके ऐसा अनुकूल वातावरण बनाना।
3. वर्तमान पंचायत की चुनाव प्रकिृया के कारण गाँव में बढ़ती सामाजिक खाईं को पाटना।
4. वर्तमान प्रदूषित राजनीति और सरकारी नीतियों के कारण गावों में आई परावलम्बन की भावना का निवारण करना।
5. ग्राम संस्कृति के प्राण-तत्व, सबके प्रति अपनत्व के भाव का विकास करना।
मोदी जी की सांसद आदर्श ग्राम योजना समस्त चुनौतियों को पार कर सफल होगी, उसका भी कारण है। हम सबने बचपन में श्रंखला-निर्माण (चेन बनाना) खेल, अनेक बार खेला है। मोदी जी ने उसी खेल-भावना का प्रयोग करते हुए गाँधी जयन्ती पर ‘नव-मन्त्र’ के साथ ‘स्वच्छ भारत अभियान’ प्रारम्भ किया। उन्हांेने नौ राष्ट्रीय प्रतिभाओं को इस कार्य का एम्बेसडर बनाया, उनमें से अनिल अम्बानी ने राष्ट्र की जानी-मानी नौ हस्तियों को चुन कर श्रंखला निर्माण का कार्य प्रारम्भ कर दिया। श्रंखला निर्माण के खेल-खेल में यह अभियान समाज का अपना अभियान बन जायेगा, क्योंकि वास्तव में तो समाज के अन्तस में गंदगी के प्रति छिपी विरल भावना को ही एक बिन्दु पर केन्द्रित करने और उससे प्रकट होने वाली ऊर्जा के लिए ‘स्वच्छ भारत अभियान’ एक सशक्त उपक्रम है।
सांसद आदर्श ग्राम योजना उसकी ही अगली कड़ी है। अतः उसकी सफलता में हमारा भी योगदान हो सके, इस हेतु इस योजना के महत्वपूर्ण बिन्दुओं को जान लेना आवश्यक है। वे बिन्दु हैं -
लक्ष्य -
1. माँग आधारित सुविधा की सीढ़ी की उपलब्धता सुुनिश्चित कराना तथा वर्तमान सांसद काल में कम से कम तीन गाँव आदर्श गाँव बनाने का लक्ष्य है।
2. आदर्श गाँव का अर्थ, वह गाँव- स्वास्थ्य, स्वच्छता, शिक्षा, विकास एवं आपसी सौहार्दय का केन्द्र बने।
3. विज्ञान सार्वभौमिक है, पर स्थानीय तकनीकी को प्राथमिकता।
चयन -
1. शहरी इलाके के सांसद अपने निकट की किसी लोकसभा का कोई गाँव चुनेंगे।
2. लोक सभा सांसद को अपने क्षेत्र से गाँव चुनना होगा और राज्यसभा सांसद जिस राज्य से चुनकर आये हैं, उस राज्य से गाँव चुन सकते हैं।
3. सांसद अपना या अपनी पत्नी का गाँव नहीं चुन सकेंगे।
4. मैदानी इलाकों में 3000 से 5000 तक आबादी वाले गाँव को चुना जायेगा और जिन इलाकों में इतनी आबादी नहीं हैं, वहाँ ग्राम पंचायतों को ग्राम चुनने का अधिकार दिया जायेगा।
कार्य -
1. हर गाँव अपना आर्थिक एजेन्डा तय करेगा, ताकि उस गाँव में उत्पादित होने वाली चीजों का उत्पादन बढ़े।
2. गाँव में ढ़ांचागत विकास के साथ नैतिक विकास का साधन मुहैया होगा और कोशिश होगी रामराज की तर्ज पर व्यवस्था बन सके।
3. सबसे पहले छोटी अवधि वाले काम को प्राथमिकता देनी होगी, जैसे - गाँव की सफाई और हराभरा बनाने का काम, स्कूल और आंगनबाड़ी में गाँव के 100 फीसदी बच्चों का नामांकन, सबको स्वास्थ्य सुविधायें आदि।
4. हर गाँव अपना जन्म दिन मनायेगा, जिसमें गाँव से बाहर रह रहे किसी व्यक्ति को बुलाकर उसका सम्मान किया जायेगा।
5. गाँव के बुर्जुगों का भी सम्मान हो, गाँव में कोई स्वतन्त्रता संग्राम सेनानी या शहीद हो उसके बारे में बच्चों को जागरूक किया जाये।
कार्यकाल -
1. तीन चरणों में आदर्श गाँव बनाने के लिए कार्य किए जायेंगे। छोटी अवधि वाले कामों को तीन महीने, मध्यम अवधि वाले काम एक साल में पूरे करने होंगे, वहीं लम्बी अवधि वाले कामों के लिए एक साल से अधिक समय रहेगा।
कार्यपद्धति -
1. ग्राम विकास से जुड़ी सभी योजनाऐं, इस गाँव में लाई जायेंगी।
2. सांसदों और जनता की स्पष्ट भूमिका होगी, कोई बिचैलिया नहीं होगा।
जिम्मेदारी -
1. इस योजना को अमल में लाने की जवाबदेही उस सांसद की होगी, जिसने उस गाँव का चयन किया है।
निगरानी -
1. देश भर में वर्कशाप आयोजित की जायेंगी, जिसमें खुद प्रधानमन्त्री सांसदो, अधिकारियों और पंचायत प्रतिनिधियों से वीडियो कान्फ्रेन्सिंग से बात करेंगे।
चुनौतियांँ -
1. सांसदों को अपनी योग्यता, योजना कुशलता व कार्यक्षमता सिद्ध करने का अवसर है।
2. राज्यों के सामने चुनौती है कि उनके भी अपने राज्य में विधायकों के लिए विधायक आदर्श ग्राम योेजना बनाई जाये, जिससे अतिरिक्त 6-7 हजार गाँव आदर्श गाँव बन सकें।
3. गाँव के निवासियों को योजना का सहभागी बनाना और उस कार्य को अपना समझना एक बड़ी चुनौती है।
पेशकश -
1. कारपोरेट जगत।, 2. स्वयंयेवी संस्थायें। ु

मनुज प्रत्येक स्वच्छ भारत बनाता हो। - यानन्द जडि़या ‘अबोध’


स्वच्छता सदैव सर्वश्रेष्ठ है समाज मध्य,
हर सन्त, ग्रन्थ सत्य तथ्य नित्य गाता है।
तन, मन, सदन, चमन, हाट, बाट, पथ,
सभी साफ रहे, ज्ञान ज्ञाता बतलाता है।
स्वच्छता सदैव प्रफुल्लित करे तन, मन,
सुन्दर सुस्वास्थ्य की सफाई प्रदाता है।
साफ रहने व रखने की ही प्रवृत्ति बने,
यही वृत्ति गांँव, पुर भारत-सृजाता है।।(1)

सलिल सदैव सर सरिता का स्वच्छ रहे,
जलचर, थलचर, खग सुख पाते हैं।
तन की सुस्वच्छता से, सुन्दर सुस्वस्थ रहें,
रोग दोष दुख दूर भागते दिखाते हैं।
सज्जित सुस्वच्छ हो सदन सभी सज्जनों का,
स्वागत अतिथि सुर सम पाते हैं।
मंजु मन-मन्दिर मनोरम हो मानव का,
ममता ले माया पति महिमा दिखाते हैं।।(2)

आंँगन सदन द्वार, पथ सब साफ रहे,
पर्यावरण स्वच्छ स्वास्थ्य उपजाता है।
कूड़ा कचड़ा न दिखाई पड़े पथ पर,
मनुज प्रत्येक स्वच्छ भारत बनाता हो।
हाट, बाट, गली, कूचा, सर, सरितादि, वन,
साफ हो प्रत्येक थल, स्र्वग सम भाता है।
कीजिए सफाई खुद, मुख अन्य का न देख,
सपनों का भारत, अबोध छबि पाता है।।(3)
- चन्द्रा-मण्डप, 370/27 हाता नूरवेग,
संगम लाल वीथिका, सअसदतगंज,
लखनऊ-226003

आवश्यकता है स्वदेशी बने- .दयानन्द जडि़या ‘‘अबोध’’


वर्ष 1905 ई॰ में बंगाल विभाजन के विरोध में बंग भंग आन्दोलन के दौरान तत्कालीन नेताओं ‘‘लाल, बाल, पाल’ व रवीन्द्र नाथ टैगोर ने विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार के साथ स्वदेशी आन्दोलन आरम्भ किया था। वर्ष 1911 ई॰ में बंगाल विभाजन की प्रस्तावित योजना वापिस लिए जाने के साथ ही यद्यपि स्वदेशी आन्दोलन उस समय समाप्ति की ओर दिखा, किन्तु राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी के नेतृत्व में चले स्वाधीनता आन्दोलन में पुनः सक्रिय हुआ और स्थान-स्थान पर विदेशी वस्त्रों की होली जलाई गई। परिणामस्वरूप हमारा देश भारतवर्ष 15 अगस्त, 1947 को स्वतंत्र हो गया।
 स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात् स्वाधीन भारत में राष्ट्र के कर्णधारों ने न जाने क्या सोच कर विदेशी वस्तुओं के आयात को इतनी अधिक छूट दे दी कि आज भारत के बाजार विदेशी वस्तुओं से पटे पड़े हैं। छोटे-छोटे बच्चों के खिलौनों से लेकर, मोबाईल, इलेक्ट्रानिक वस्तुयें यहाँ तक पालीथीन की थैलियाँ जो कचड़ा बढ़ाने और पर्यावरण प्रदूषण बढ़ाने का एक मात्र मूलाधार है के साथ अनेकानेक खाद्य पदार्थ, फर्नीचर सभी विदेशी हैं।
 विदेशी शब्द आते ही एक बात याद आयेगी,  कि विदेशी सामान सबसे अधिक भारत में भेजने वाला देश चीन है। यह वही चीन है जिसने सन् 1963 ई॰ में भारत पर आक्रमण कर उत्तरी सीमा स्थित एक बड़े भू भाग को अपने अधिकार में ले लिया था जिसे उसने आज तक भारत को वापिस नहीं किया और इस युद्ध के दौरान बड़ी संख्या में भारतीय जवान हताहत हुए थे। भारतीय शासकों ने उसे कैसे भारत में व्यापार करने की छूट दी मैं तो आज तक समझ न सका। पर इतना अवश्य जानता हूँ कि इन व्यापारियों के कारण भारतीय लघु उद्योगों व घरेलू उद्योग धन्धों को बहुत बड़ी हानि पहुँची है।
अभी कुछ वर्ष पूर्व तक भारतीय मेलों व हाटों में यहाँ के निर्धन कुम्हार बच्चों के लिए मिट्टी के खिलौने बेचने हेतु दुकानें सजाये दिखाई पड़ते थे, पर अब उनकी जगह चाइनीज खिलौने बिकते दिखाई पड़ते हंै। इससे कितनी हानि हुई भारतीय उद्योग धन्धों की। अब विदेशी  वस्त्रों के सामने भारतीय खादी को कौन पूछता है। यहाँ के हथकरघे बेकार हो गये हैं। सरकार घरों में बिजली के मीटर भी चाइना के बने हुए लगा रही है अपने देश में इनका उत्पादन व निर्माण नहीं कराती।
हमारे पर्वांे त्योहारों के अवसर पर पूजी जाने वाली देवी-देवताओं की मूर्तियाँ भी विदेशों से बनकर आ रही हैं। और तो और आज हमारे देश में प्रचलित शिक्षा प्रणालियाँ भी विदेशी हैं। अब गुरूकुल पद्धती के विद्यालयों की कौन कहे यहाँ तो गली-गली में ‘‘कान्वेन्ट स्कूल’’ व कालेज खुल हुये हैं, स्वाधीनता आन्दोलन के दिनों में गाँधी जी ने बेसिक शिक्षा की आधार शिला रखी थी। तत्कालीन विदेशी ब्रिटिश सरकार ने गाँव-गाँव में बेसिक स्कूल खोले और पाठ्य पुस्तकों में बेसिक रीडर चालू की, पर आज ‘‘मेरिया मान्टेसरी’’ द्वारा संचालित ‘‘मान्टेसरी पद्धति’’ के और ‘‘किंडर गार्डेन’’ स्कूल चल रहे हैं। बेसिक स्कूल तो खोजने पर शायद कहीं अपनी गुण्वŸाा में मिल जायें।
 हमारी भाषा भी अब हिन्दी के स्थान पर हिंगलिश हो गयी है। अखबारों में आधे के कुछ ही कम इंगलिश शब्द प्रयुक्त होते मिलेंगे अब तो ‘हाई वे’, ‘ कौंसिलिंग’, रेप, पोस्टमार्टम, टैक्स, ए॰टी॰एम॰, बैकिंग, एफ॰आई॰आर॰, रिजर्वेशन, एयर बस, सिस्टम जैसे कितने शब्द हैं, कहाँ तक कहा जाये। और तो और प्रधानमंत्री को पी॰एम॰ और मुख्यमंत्री को सी॰एम॰ कहने में ही गर्व का अनुभव होता है।
इस प्रकार हम देखते हैं कि आज हम कहने को गाँधी जी के देश के निवासी हैं पर अब तो हम अपनी वेश भूषा भी भूल कर पैन्ट शर्ट में सजे घूम रहे हैं। गाँधी जी तो 2 अक्टूबर व 30 जनवरी को याद कर लिये जाते हैं। किन्तु यदि हमें वास्तविक भारत का निर्माण करना है, तो पूर्ण रूप से स्वदेशी वस्तुओं को और अपने पुराने संस्कारों को पुनः अपनाना होगा। चाहें वह नित्य प्रयोग में आने वाली वस्तुयें हों या पहनने के वस्त्र अथवा शिक्षा प्रणाली, भाषा, वेश भूषा सभी को स्वदेशी रूप में अपनाना होगा, तभी देश का हित और हमारा भविष्य सुरक्षित होगा। ु
- ‘चन्द्रा-मण्डप’, 370/27, हाता नूरबेग, संगम लाल वीथिका, सआदतगंज, लखनऊ-226003
दूरभाष: 9235989096

स्मृति मन्दिर में माँ-पिता बैठे हैं।- प्रो॰ हेमराज मीणा ‘दिवाकर’


मुझें अपने खेतों में
हल चलाते पिता याद आते हैं
पर मांँ! कुछ ज्यादा याद आती हैं।
हर रोज दही विलोकर
ताजा-ताजा लौनी घी
मांँ ही खिलाती थीं,
रात को बची बाजरे की
ठंढ़ी रोटी पर रख कर।
माँ हर रोज तड़के में
चाकी से बेजड़ का चून पीस कर
चूल्हे पर गरम-गरम
ताजा रोटी पका कर
मुझे ठीक से खिला-पिलाकर
नातडे में दो रोटी बांधकर
कांखी से बाल सूत कर
प्रतिदिन स्कूल में पढ़ने भेजती थीं।
मैं आज जहांँ खड़ा हूँ
जो यात्रा मैने तय की है
जितना और जान पाया हूँ
इसके पीछे मेरे किसान पिता की
जी तोड़ कड़ी मेहनत
और माँ के आर्शीवाद की सुगन्ध है।
मेरे स्मृति मन्दिर में
मांँ-पिता बैठे हैं।
जो आज भी
मुझे भटकने से रोकते हैं।
साथ ही
मैं किस जमीन से आया हूंँ
मैं कौन हूँ
यह बोध कराते हैं।
- केन्द्रीय हिन्दी संस्थान, हैदराबाद।

भारत के प्राचीन विश्वविद्यालय - डाॅ॰ विनय कुमार शर्मा


प्रचीन काल से भारत शिक्षा का महत्वपूर्ण केन्द्र था। यहांँ पर बड़े-बड़े विश्वविद्यालय थे जिनमें पूरे विश्व के हजारों छात्र शिक्षा लेने आते थे। उनमें से कुछ की संक्षिप्त जानकारी प्रस्तुत है।
(1) तक्षशिला विश्वविद्यालय - तक्षशिला प्राचीन भारत में गांधार देश की राजधानी और शिक्षा का प्रमुख केन्द्र था। यह विश्व का प्रथम विश्वविद्यालय था जिसकी स्थापना 700 वर्ष ईसा पूर्व में हुई थी, वह तक्षशिला वर्तमान समय में पाकिस्तान के पंजाब प्रान्त के रावलपिण्डी जिले की एक तहसील है। तक्षशिला की जानकारी सर्वप्रथम वाल्मीकि रामायण से होती है, जहांँ अयोध्या के राजा श्रीरामचन्द्र की विजय के पश्चात उनके छोटे भाई भरत ने अपने नाना केकयराज अश्वपति के आमंत्रण और उनकी सहायता से गंधर्वो के देश (गांधार) को जीता और अपने दो पुत्रों को वहाँ का शासक नियुक्त किया। गंधर्व देश सिधु नदी के दोनों किनारे स्थित था, उसके दोनो ओर भरत के तक्ष और पुष्कल नामक दोनो पुत्रों ने अपनी-अपनी राजधानियांँ तक्षशिला सिन्धु के पूर्वी तट पर और पुष्करावती पश्चिमी तट पर बसाईं।
तक्षशिला विश्वविद्यालय में पूरे विश्व के 10,500 से अधिक छात्र अध्ययन करते थे, जहाँ 60 से अधिक विषयों की पढ़ाई होती थी। विभिन्न विषयों पर शोध का भी प्रबन्ध था। प्राचीन भारतीय साहित्य के अनुसार पाणिनी, कौटिल्य, चन्द्रगुप्त, जीवक, कौशलराज, प्रसेनजित आदि महापुरूषों ने इसी विश्वविद्यालय से शिक्षा प्राप्त की।
(2) नालंदा विश्वविद्यालय - पांचवी सदी के  विश्व विख्यात शिक्षा केन्द्र नालंदा विश्वविद्यालय, जो वर्तमान बिहार राज्य में पटना से 88.5 किमी दक्षिण पूर्व और राजगीर से 11.5 किमी उŸार में स्थित था, जिसके भग्नावशेष इसके प्रचीन वैभव का बहुत कुछ अंदाज करा देते हैं। अनेक पुराभिलेखों और सातवीं सदी में भारत भ्रमण के लिए आए चीनी यात्री ह्वेनसांग जिन्होनें अपने जीवन का महत्वपूर्ण एक वर्ष इस विश्वविद्यायल में छात्र तथा शिक्षक के रूप में बिताया तथा इत्सिंग के यात्रा विवरणों से इस विश्वविद्यायल के बारे में विस्तृत जानकारी प्राप्त होती है। यहांँ 10,000 छात्रों की पूर्ण आवासीय व्यवस्था थी, जिन्हें पढ़ाने के लिए 2,000 शिक्षक थे। यहांँ सभागार के जो भग्नावशेष मिले हैं, उसमें  8,000 छात्रों के बैठने की क्षमता थी। यहांँ भारत के अतिरिक्त कोरिया, जापान, चीन, तिब्बत, इण्डोनेशिया, फारस तथा तुर्की से भी विद्यार्थी शिक्षा के लिए आते थे।
इस विश्वविद्यालय की स्थापना का श्रेय गुप्त शासक कुमार गुप्त प्रथम 450-470 को प्राप्त है। इसे महान सम्राट हर्षवर्द्धन और पाल शासकों का भी संरक्षण मिला। इस विश्वविद्यालय की नौवीं से बारहवीं सदी तक अन्र्तराष्ट्रीय ख्याति रही, जिसे आज से लगभग 800 वर्ष पूर्व विदेशी आक्रमणकारियों ने नष्ट कर दिया।
पिछले दिनों जब पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम नालंदा जिले में एक रेल कोच कारखाने के शिलान्यास के लिए पहूँचे, तो उन्होनें तत्कालीन रेल मन्त्री नितीश कुमार से नालंदा विश्वविद्यालय को दुबारा जिन्दा करने की चर्चा की। उसके बाद इस दिशा में कार्य प्रारम्भ हुआ और अक्टूबर 2009 में पूर्वी एशियाई देशों के शिखर सम्मेलन में नालंदा विश्वविद्यालय की स्थापना को लेकर सहमति बनी। तत्पश्चात् बिहार विधान सभा में विधेयक परित हुआ और 2010 में इससे सम्बन्धित विधेयक संसद की मंजूरी के लिए विदेश मन्त्रालय में प्रस्तुत किया गया, जो अब व्यवहार में जमीन पर उतर रहा है।
वर्तमान में इस विश्वविद्यालय के पुनर्जीवन क्रम में यहाँ प्रवेश के लिए 40 देशों के एक हजार आवेदनों में से चयनित केवल 15 छात्रों के साथ 2 सितम्बर, 2014 से पढ़ाई प्रारम्भ हो गई है। यहांँ विश्व के अन्य देशों के दोे शिक्षक भी हैं। यह विश्वविद्यालय शिक्षा की दृष्टि से अपने आप में अनूठा, शोध कार्यों की प्राथमिकता से युक्त हार्वड और आक्सफोर्ड के समकक्ष होगा। इसका विश्वस्तरीय निर्माण लगभग एक हजार एकड़ भूमि पर 2020 तक पूरा होना है, जिसमें से 500 एकड़ भूमि का अधिग्रहण हो चुका है।
(3) विक्रमशिला विश्वविद्यालय - आठवीं शताब्दी के पाल वंश के शासक धर्मपाल द्वारा (770-820 ईशा से पूर्व) बिहार प्रान्त के भागलपुर में विक्रमशिला की स्थापना की गई थी। यहांँ पर बौद्ध धर्म, दर्शन के अतिरिक्त न्याय, तत्वज्ञान एवं व्याकरण का भी अध्ययन कराया जाता था। इस विश्वविद्यालय में लगभग 3,000 अध्यापक कार्यरत थे। इस विश्वविद्यालय के सर्वाधिक प्रतिभाशाली भिक्षु ‘दीपंकर’ ने लगभग 200 ग्रन्थों की रचना की थी। 1204 ईसवी में बख्तियार खिलजी के आक्रमण के परिणाम स्वरूप यह विश्वविद्यालय नष्ट हो गया। भविष्य में विक्रम तक्षशिला विश्वविद्यालय के पुर्नजीवन और उसके गौरव की पुर्नप्रतिष्ठा की दिशा में भी प्रयत्न प्रारम्भ हुए हैं। ु

मैं गंगा हूँ - डाॅ॰ नवलता


गंगा के तट पर खड़ी हुई थी देख रही मन्थर प्रवाह।
लहरों से तभी सुनाई दी अव्यक्त दबी सी मन्द आह।।
मैंने सोचा, है यहाँ कौन, रो रहा मौन इस निर्जन में।
कितने ही उठने लगे प्रश्न अनजाने ही मेरे मन में।।

तब तक मैंने देखा, कोई कृषकाय मलिनवेशा नारी।
संकुचित, उदास, विकल, विह्वल जाने किस विपदा की मारी।।
थी देख रही कुछ दूर खड़ी, फिर मेरे निकट चली आई।
मैंने पूछा, क्या कष्ट तुम्हें, हो कौन, कहाँ से हो आई?

बोली वह मन्द शिथिल स्वर में, ‘‘हा’’! तुमने मुझे न पहचाना!
मैं पतितपावनी गंगा हूँ, तुमने जिसको माता माना।।
मैं स्वर्गलोक में पली-बढ़ी, बन देवसरित् भू पर आई।
पाताल चली, त्रैलोक्यगामिनी अतः त्रिपथगा कहलाई।।

मैं ज्येष्ठ सुता हूँ हिमगिरि की शिखरों के अंचल में खेली।
शंकर की जूट-जटाओं में नानाविध करती अठखेली।।
कर के तप घोर भगीरथ ने मेरे हित पथ-निर्माण किया।
दिव्यौषधियों का यौतक ले, सागरपत्नी मैं बनी प्रिया।।

पथ पर निर्मलता, शीतलता, नाना दिव्यौषधियाॅं अमोल।
बाँटती चली तुम मनुजों को, निज वक्षोरस में घोल-घोल।।
पी-पी कर जिसको पुष्ट हुये, आरोग्यभरा पाया जीवन।
पाया मेरा निर्मल प्रसाद, कर मेरे जल में अवगाहन।।

थीं छिपी हुई मेरे उर में जाने कितनी निधियाँ अपार।
धर्मार्थकामरत तुम मनुजों ने जाना मुझको मोक्षद्वार।।
मेरे आश्रय में जाने कितने जीव-जन्तु पाते जीवन।
मेरा जल पीकर बड़े हुये हैं जाने कितने वन-उपवन।।
मेरी ममता की छाया में ऋषियों ने तप निर्बाध किया।
आरोग्य मिला उसको, जिसने जीवन भर मेरा क्षीर पिया।।
पाकर आशीष सदा जिसका, मानव जीवन में सुख पाता।
जीवन देती आई तुमको, निम्नगा नहीं, मैं हूँ माता।।

पर हाय! आज मदमत्त हुये, मन आज तुम्हारे हुए विकृत।
समझा उसको बस केवल जल, जो था आप्यायक शुद्ध अमृत।।
मेरी धारा को रोक-रोक, पग बाँध दिये मेरे गतिमय।
कर छेड़-छाड़ उच्छिन्न किये, मेरे गीतों के स्वर, यति, लय।।

अपनी उच्छिष्ट मलिनता से कलुशित कर दिये सभी अवयव।
यौवन में वृद्धा सी दिखती हा! कहाँ गया वह पूर्व विभव?
मेरे अपने ही पुत्रों ने मेरी छाती को चीर दिया!
जिसका ऋण चुकता नहीं कभी, वह आज कलङ्कित क्षीर किया!!

मंै मनस्ताप से सूख गई, दिखता विषाद का अन्त नहीं।
तुम सबके कलुषित कर्मों से छिप गया पवन वासन्त कहीं।।
जिस माता का पोषण करना सत्पुत्रों का है कर्म पुण्य।
वे आज भूल कर धर्ममर्म, बन मूक-वधिर से अकर्मण्य।।

ऐसा न कहीं हो, ग्लानि और लज्जा से हृदय फटे मेरा!
हो जाऊँ लुप्त न धरती से, अब महाविपद् ने आ घेरा।।
क्या होगा हाल कपूतों का, मेरी चिन्ता का विषय बना।’’
यह सुन सहसा मेरे आगे छा गया अँधेरा घोर-घना।।

मैं लगी सोचने, अब भी यदि हम मनुजों के खुल जायें नयन।
तो सम्भव है, हम बचा सकें माँ के संग अपना भी जीवन।।
अब भी है समय नहीं बीता, आओ सब मिल कर जुट जायें।
निर्मल रक्खें गंगा माँ को पीढि़याँ युगों तक सुख पायें।। ु
- के-680, आशियाना काॅलोनी,
 कानपुर रोड, लखनऊ।

सम्पादकीय- रामशरण

यह एक सुन्दर अनुभूति है कि माँ गंगा की अविरलता एवं निर्मलता की पुनप्र्रतिष्ठा की दिशा में भारत सरकार एवं उत्तर प्रदेश सरकार के साथ ही देश के लोकतन्त्र के प्रहरी मा॰ सर्वाेच्च न्यायालय के द्वारा पहल की जा चुकी है। भारत सरकार गंगा को अविरल एवं निर्मल बनाने हेतु प्रत्येक नगर के स्थानीय मुद्दों का अध्ययन करा रही है ताकि भावी कार्यक्रम तैयार किए जा सके।
गंगा के किनारे लगभग 118 कस्बे व शहर तथा 1632 गाँव हैं। गंगा में गिरने वाली 80 प्रतिशत गंदगी शहरों से तथा 20 प्रतिशत गंदगी औद्योगिक इकाइयों से आती है। गाँवों की गंदगी गंगा में न जाय इसके लिए गाँवों में विशेष डिजाइन के आधुनिक शौचालय बनाने की भी योजना है।
उल्लेखनीय है कि मा॰ उच्च न्यायालय, इालाहाबाद के द्वारा वर्ष 2008 से सुनवाई के क्रम में लगभग 80 आदेश दिये जा चुके हैं, जिनमें मुख्य हैं - गंगा के दोनों ओर 200 मीटर तक पालीथीन पर प्रतिबन्धि, अविरल गंगा के लिए गंगा में पर्याप्त पानी, गंगा में गंदगी फैलाने वाली चमड़ा इकाइयों को कहीं अन्यत्र स्थानान्तरित करना, नदियों में मूर्ति विसर्जन, नालों व सीवेज बहाने पर रोक। परन्तु मा॰ उच्च न्यायालयों के आदेशों को लागू करने में प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड सहित सरकारी तंत्र अब तक पूरी तरह से नाकाम रहा है।
अन्ततः मा॰ सर्वोच्च न्यायालय ने गंगा सफाई पर सख्ती दिखाते हुए गंगा नदी को प्रदूषित करने वाली औद्योगिक इकाइयों पर लगाम न कसने पर केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण परिषद एवं राज्य प्रदूषण नियंत्रण परिषदों को कड़ी फटकार लगाई तथा तीन दशकों के प्रयासों एवं न्यायालय के निर्णयों के बावजूद गंगा के दिन-प्रतिदिन प्रदूषित होते जाने पर भी न्यायालय ने अफसोस जताया है। नियंत्रण परिषदों की निष्क्रियता एंव विफलता से क्षुब्ध हो न्यायालय ने गुनाहगारों पर कार्यवाही का दायित्व राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण (नैशनल ग्रीन ट्रिबुनल) को सौंप दिया तथा कहा है कि गंगा को प्रदूषित करने वाली अति प्रदूषित 17 श्रेणियों की औद्योगिक इकाइयों पर कार्यवाही करें, बिजली-पानी बन्द करने सहित सभी तरह की कार्यवाही करने की छूट दे दी है। यदि इन इकाइयों से प्रदूषण आना बन्द हो तोे 30 प्रतिशत प्रदूषण स्वतः समाप्त हो जाएगा। प्राधिकरण को प्रत्येक छः माह में अपनी अन्तरिम रिर्पोट प्रस्तुत करना है।
राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण ने गंगा में गंदगी डालने पर सिंम्भावली चीनी मिल पर पाँच करोड़ रूपये का जुर्माना लगाने के बाद अब केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण परिषद एवं प्रदेशों के राज्य प्रदूषण नियंत्रण परिषदों को आदेश दिया कि ऐसे उद्योगों के परिसरों में जाकर इस बात की पड़ताल करें कि वहाँ पर प्रदूषण रोकने वाले उपकरण लगे हैं या नहीं। केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण परिषद प्राधिकरण के आदेशों पर गंगा को प्रदूषित करने वाले 764 औद्योगिक इकाइयों की श्रेणीवार सूची अपनी वेब साइट पर प्रकाशित कर चुका है। निसंदेह उद्योग भी जरूरी हैं, लेकिन गंगा की निर्मलता की कीमत पर नहीं।
उत्तर प्रदेश सरकार ने प्रदेश में हरियाली, भूगर्भ एवं पर्यावरण संरक्षण हेतु विगत दिनों एक शासनादेश जारी किया है जिसमे अन्य बातों के साथ यह भी शामिल किया है - नदियों के किनारे बसे शहरों में जो-जो नाले सीधे नदियों में मिलते हैं, उनके डायवर्जन के लिए नगर निगम, जल निगम, सिंचाई विभाग से समन्वय स्थापित कर नालों को नदी में गिरने से रोका जाय। एस॰टी॰पी॰ निर्माण ऐसी जगह पर किया जाय जहाँ प्लान्ट से निकलने वाला शोधित जल कृषि एवं बागवानी के उपयोग में लाया जा सके। जल, मल, घरेलू  अपशिष्ट के नदियांे में निस्तारण को प्रतिबन्धित किया जा सके। नदियों के बाढ़ क्षेत्र को संवेदनशील क्षेत्र घोषित किया जाय तथा ऐसे क्षेत्रों में निर्माण प्रतिबन्धित किया जाय। प्रदेश में बहने वाली गंगा, यमुना, गोमती, राप्ती, रामगंगा, हिण्डन, बेतवा, घाघरा आदि नदियों की अविरलता एवं निर्मलता को अक्षुण्य बनाने में पूर्व शासनादेश मील का पत्थर सिद्ध हो सकते हैं, बशर्ते इसका पूर्ण निष्ठा के साथ अनुपालन हो।
इस प्रकार गंगा की अविरलता एवं निर्मलता सुनिश्चित करने के लिए भारत सरकार मा॰ उच्च न्यायालय एवं मा॰ सर्वोच्च न्यायालय, राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण, राज्य सरकार अपने-अपने कार्य क्षेत्र में सक्रिय हैं तो ऐसी स्थिति में स्वयं सेवी सामाजिक संगठनों, गंगा से सम्बन्धित सभी हितग्राहियों का यह दायित्व है कि अपने-अपने स्तर से गंगा को अविरल एवं निर्मल बनाने हेतु तन से, मन से, धन से जुट जाँय, ताकि सभी को शुद्ध पेय जल मिले, कृषि उन्नति करे, जैवविविधता की रक्षा हो सके, सभी प्रकार से प्रदूषण से मुक्ति मिले। ु
- रामशरण

'मेरा भारत - त्योहारों का देश'-.सोम दीक्षित


सूरज-चन्दा औ तारों का देश है।
दशों दिशाओं के द्वारों का देश है।
सादाजीवन-सुविचारों का देश है।
मेरा भारत त्योहारों का देश है।।1।।

यहांँ रामनवमी का पर्व मनाते हैं।
गीत जानकी-मंगल सब गाते हैं।
औ मंगलघट घर-घर में धरवाते हैं।
गाँव-गाँव में धनुष यज्ञ करवाते हैं।
यह अनन्त के अवतारों का देश है।
मेरा भारत त्योहारों का देश है।।2।।

रामराज्य हर वर्ष यहांँ चल आता है।
विजयादशमी पर्व विजय-फल लाता है।
भले, साल भर पापों से बल पाता है।
मगर, दशहरा में रावण जल जाता है।
यह फूलों-अंगारों का देश है।
मेरा भारत त्योहारों का देश है।।3।।

मंगल करवा चैथ पतिव्रत धर्म है।
दीपावली हमारी संस्कृति का मर्म है।
गोधन पूजा, कृषि संवर्धन का कर्म है।
 है आत्म-ज्ञान का मन्त्र न केवल चर्म है।
अंधकार में भी जिसका प्रकाश परिवेश है।
मेरा भारत त्योहारों का देश है।।4।।

भैयादूज पर्व भाई का वन्दन है।
चमका देता जो माथे का चन्दन है।
अटल प्रतिज्ञा, तीन ताग का बन्धन है।
रक्षाबन्धन बहनों का अभिनन्दन है।
प्यार पुलकते परिवारों का देश है।
मेरा भारत त्योहारों का देश है।।5।।

स्वशासन के 67 वर्ष- कुछ भूलें और कुछ सबक - .डा॰ वेद प्रकाश त्रिपाठी


वर्ष 2014 में 15 अगस्त को स्वतन्त्रता दिवस के समारोह को मनाने के साथ ही हमने स्वतन्त्रता के 67 वर्षो को पूरा कर लिया। यद्यपि 67 वर्ष किसी देश की दृष्टि से बहुत लम्बा समय नहीं होता है, तथापि यह कालावधि किसी राष्ट्र की दृष्टि से बहुत छोटी भी नहीं है। इतने लम्बे कालखण्ड को दृष्टिगत करते हुए यह कहा जा सकता है कि इतनी कालावधि में कम से कम एक पीढ़ी गुजर जाती है या लगभग गुजरने के कगार पर होती है। अतः यह कालावधि किसी भी देश की प्रगति का मूल्यांकन करने हेतु या उस देश में नागरिकों के जीवन की गुणवत्ता में उन्नयन का आकलन करने हेतु पूर्ण रूप से पर्याप्त अवधि है।
मूल्यांकन हेतु उक्त कालावधि की पर्याप्तता की संपुष्टि कुछ अनुभव जन्य तथ्यों के आधार पर भी देखी और परखी जा सकती है। किसी देश में जब कोई बहुत बड़ी सकारात्मक क्रान्ति होती है, जब सत्ता-शासन में कोई बहुत बड़ा उलट-फेर होता है या व्यापक सुधारों का कोई आवेग आता है, तो सामान्यतः नागरिक उसके प्रति उत्साहित होते हैं तथा नवीन सुधारों हेतु सहयोग प्रदान करते हैं और यही नहीं उस हेतु त्याग करने तथा उसके फल प्राप्त करने हेतु प्रतीक्षा भी करते हैं। किन्तु यह प्रतीक्षा अनवरत नहीं हो सकती है। एक लम्बे समय में यदि राजसत्ता नागरिकों के जीवन की गुणवत्ता में आवश्यक उन्नयन करने में असफल रहती है तो उसे न तो अनवरत समय तक मूर्ख बनाया जा सकता है और न ही उसे कुछ आकर्षक भावनात्मक नारों में बहकाकर गुमराह किया जा सकता है। विगत शताब्दी में इन्डोनेशिया, चिली, अर्जेन्टीना आदि की क्रान्तियाँ और हाल के ही कुछ विगत वर्षो में मिस्र, लीबिया, अल्जीरिया आदि के परिवर्तन इसकी पुष्टि करते हैं। किन्तु यहाँ इन सब की व्याख्या करना वास्तविक प्रसंग से भटकना होगा। किन्तु फिर भी यदि यहाँ प्रसंगवश, विगत शताब्दी के सोवियत संध की लोकतान्त्रिक क्रान्ति और विखण्डन, इस तथ्य का सर्वोत्तम उदाहरण है कि साम्यवादी क्रान्ति के लगभग 70 वर्ष बाद जब पूरी एक पीढ़ी जन्म लेकर जीवन की संध्या में पहुँची तो उसे अपने ‘खाली हाथ रहने’ का मलाल किसी तरह सहन नहीं हुआ और विश्व की एक सर्वोच्च सत्ता जनाक्रोश विस्फोटक के सामने ताश के पत्तों की तरह बिखर गयी। चीन के सन् 1949 की साम्यवादी क्रान्ति के 65 बसन्त गुजर चुके हैं। जनाक्रोश वहाँ भी है और यह लावा कभी भी स्फिोटक और निर्णायक मोड़ ले सकता है। इन विभिन्न देशों की क्रान्तियाँ यह भी इंगित करती हैं कि जनता की महत्वकान्क्षाएँ केवल आर्थिक विकास तक ही सीमित नहीं होती हैं, उसे एकांगी नहीं, समग्र विकास चाहिये होता है। मानव स्वयं के साथ ‘समग्र मानव’ के ही रूप में व्यवहारित होना चाहता है उससे किंचित रूप भी कमतर व्यवहार उसे बुरी तरह नापसन्द है। प्रसन्नता की बात है कि भारतीय मेधा और चेतना ऐसा ही देखती और सोचती है और तदनुसार ही उसका व्यवहार और आचरण भी होता है, जिसका प्रतिबिम्ब देश में समय-समय पर आये विभिन्न राजनीतिक परिवर्तनों में भी स्पष्ट रूप से परिलक्षित होता है।
अपनी तमाम कमी-बेसियों के बावजूद भी स्वतन्त्रता के पश्चात भारत में राजनीतिक स्थिरता है तथा लोकतान्त्रिक व्यवस्था कायम है। एशिया के तमाम अड़ोसी-पड़ोसी देशों के नागरिकों के लिये यह एक ईष्र्या और किसी सीमा तक आश्चर्य का विषय है। तमाम विविधताओं के बावजूद भारत ने लोकतान्त्रिक मूल्यों और मर्यादाओं का अनुसरण करते हुए भी विकास किया है और सामाजिक न्याय को भी सुनिश्चित किया है। यह किस सीमा तक हुआ और कितना हुआ तथा कितना अपेक्षित था, यह एक अलग विषय है। इस विषय पर विवाद और मतभेद की बहुत गुंजाइश हो सकती है कि गत 67 वर्षो में क्या-क्या और कितना-कितना हो जाना चाहिए था तथा इसके साथ ही यह प्रश्न भी जुड़ा है क्या जितना होना आवश्यक था और हो जाना चाहिए था, वह क्यों नहीं हुआ और क्या उतना सम्भव होने के लिये पर्याप्त साधन और सम्भावनाएँ थीं?
उक्त प्रश्नों पर बहुत विवाद, विश्लेषण और मंथन हो सकता है। किन्तु यहाँ ऐसे सामान्य बिन्दुओं का उल्लेख किया जा रहा है जिनका अधिक सम्बन्ध साधनों की उपलब्धता से बहुत कम है तथा जो मात्र कुछ नीतिगत निर्णय थे और एक उच्च इच्छा शक्ति, सुस्पष्ट चिन्तन, भारतीय समाज और परम्परा की गहरी समझ और उच्च संवेदनशीलता से सुनिश्चित किये जा सकते थे। अग्रिम शीर्षकों में इन्हीं कुछ बिन्दुओं पर चर्चा की गयी है।
1. जनसहभागिता और जन सहयोग - स्वतन्त्रता के तुरन्त बाद तथा विशेष रूप से सरदार बल्लभ भाई पटेल के अवसान के बाद भारत में समाजवाद का नारा बड़े ही जोर-शोर से बुलन्द होने लगा। वर्ष 1953 में जवाहरलाल नेहरू ने अवाड़ी में कांग्रेस पार्टी के अधिवेशन में देश में ‘समाजवादी ढंग के समाज’ गढने की संकल्पना को घोषित किया। इसके पश्चात् देश में नियोजन की प्रकिृया सोवियत संघ की भाँति बेहद केन्द्रीकृत हो गयी, जिसमें सामान्य नागरिक और स्थानीय इकाईयाँ तो दूर, देश के विभिन्न राज्यों और मुख्यमंत्रियों तक की भागीदारी लगभग नकार दी गयी। इस स्थिति ने देश में एक ऐसे वातावरण का सृजन कर दिया कि जैसे जो कुछ भी विकास होगा वह ऊपर से आयेगा। इस स्थिति ने आम नागरिक को बेपरवाह, गैर जिम्मेदार और बेहद परजीवी बना दिया। आम नागरिक हर छोटे से छोटे विषय में सरकार का मुँह ताकने लगे अन्यथा हाथ पर हाथ धरे बैठे रहने के आदी होने लगे। यह स्थिति वस्तुतः बहुत बुरी थी। जो साधारण कार्य सामुदायिक स्तर या छोटे-छोटे जनसमूहों की पहल पर होने सम्भव थे तथा जो इस देश में पूर्व में भी परम्परागत रूप से होते आये थे, लोगों ने उन्हें भी छोड़ दिया और वे उन कार्यो के सम्पादन हेतु सरकार का मुँह ताकने लगे। यह प्रसन्नता का विषय है कि वर्तमान सरकार ने इस बीमारी को भली प्रकार पहचान लिया है तथा केन्द्रीय योजना आयोग पर ताला डालकर इसमें सर्वोच्च स्तर से सुधार की शुरूआत कर दी है।
2. कर्तव्यों से अधिक अधिकारों पर बल - देश की स्वतन्त्रता के पश्चात् तथा विशेष रूप से विगत दो-तीन दशकों से मानवाधिकारों की बातें बड़े ही जोर-शोर से उठ रहीं हैं। मानवाधिकारों पर संगोष्ठियों और सम्मेलनों की बाढ़ सी आ गयी है। एक बड़ी संख्या में मानवाधिकारी संगठन खड़े हो गये हैं जो देश-विदेश से मोटे अनुदान लेकर फल-फूल रहे हैं। दुर्भाग्य से इनमें से तमाम संगठन या तो किसी शरारत या षडयन्त्र के तहत या अपने एकांगी चिन्तन कार्यक्रम के नाते या किसी अज्ञानतावश ऐसे तमाम मुद्दों को उठाते, गर्माते और भुनाते हैं जिससे देश का भला कम और बुरा अधिक होता है। वस्तुतः चाहे वह किन्ही विशिष्ट स्थितियों में भारतीय सेना या पुलिस की कार्यवाही हो या किसी स्थान पर किसी परियोजना का लगाना, इस पर इन मानवाधिकार संगठनों का जो रवैय्या होता है वह बहुत बार बहुत आपत्तिजनक होता है। वस्तुतः मानवाधिकार का कोई भी मुद्दा अलग-थलग रूप से नहीं देखा जा सकता है। उसे उसके सम्पूर्ण परिप्रेक्ष्य में समग्रता के साथ देखा जाना अति-आवश्यक है।
उक्त सन्दर्भ में यह बताना भी प्रासंगिक है कि जहाँ मानवाधिकार का प्रश्न है तो उसकी चर्चा या उसे विभिन्न ंिस्थतियों में संज्ञान में लेना नितान्त अनुचित नहीं है। किन्तु जहाँ हम इतने जोर-शोर से मानवाधिकारों की बात करते हैं तो वहीं हम नागरिक कर्तव्यों की बात करने से क्यों कतराते हैं? क्या एक अच्छे नागरिक की भाँति हमें राष्ट्र और समाज के प्रति अपने कर्तव्य का बोध नहीं होना चाहिए? क्या शान्तिपूर्वक अहिंसक होकर रहना, पर्यावरण के प्रति जागरूकता, पशु-संरक्षण, सीमित परिवार, सरकारी कर और शुल्कों का ईमानदारी से भुगतान, सार्वजनिक स्थानों को घेरना और अवैध निर्माण न करना आदि हमारे नागरिक दायित्व नहीं हैं? क्या हम इन नागरिक कर्तव्यों का पालन न करके दूसरे नागरिकों के अधिकारों का हरण तो नहीं कर रहे हैं? इस प्रकार के बोध का अभाव बड़ा ही दुर्भाग्यपूर्ण है। वस्तुतः मानवाधिकारों का यह पश्चिमी या आयातित संस्करण भारतीय परम्पराओं के अनुकूल नहीं है। हमारी परम्परा में चाहे वह राष्ट्र हो या परिवार, कर्तव्य पहले है अधिकार बाद में। फिर यदि गहराई में झाँका जाय, तो जहाँ कर्तव्य पालन निष्ठा से होने लगता है वहाँ अधिकार तो स्वयं ही संरक्षित, सुरक्षित और सुलभ हो जाते हैं। जब अधिकारों की बात होती है तो प्रत्येक व्यक्ति या समूह की माँग का दायरा बढ़ता जाता है और वह दूसरे व्यक्ति या समूहों से टकराता और उनकी सीमा में अतिक्रमण करता है। इसके विपरीत जहाँ व्यक्ति या समूह में कर्तव्य की भावना बलवती होती है, वहाँ किसी की सीमा में अतिक्रमण या टकराव का प्रश्न ही नहीं होता है। वहाँ तो प्रेम, सद्भाव, सौहाद्रय और साथ ही अधिकारों का संरक्षण स्वयमेव ही हो जाता है।
3. समाज में समरसता के स्थान पर श्रेणीकरण और विभाजन - स्वतन्त्रता के पश्चात् समाज को व्यवहारिक रूप से, अधिकांश स्थितियों में बांटकर अथवा श्रेणीगत तरीके से देखने की प्रवृत्ति बढ़ी है। जिससे समाज की समरसता में ह्ास होने की सम्भावनाएँ बढ़ती हैं। विकास के चिंतन में भी इस प्रकार की प्रवृत्तियों से बचने की कोशिश नहीं की गयी। ग्रामीण-नगरीय, महिला-पुरूष, अल्पसंख्यक-बहुसंख्यक, उत्पादक-मजदूर, व्यापारी ग्राहक आदि को अलग-अलग वर्गों में इस प्रकार प्रदर्शित किया जाता रहा है, जैसे उन सबके हित परस्पर विरोधी हों। यह उचित है कि कुछ कतिपय स्थितियों में या किसी समय अन्तराल में किसी वर्ग या क्षेत्र पर अधिक ध्यान देना आवश्यक हो सकता है तथा दिया भी जाना चाहिए किन्तु उनको इस प्रकार से प्रोजेक्ट कर देना कि उनके हित एक दूसरे के विरोधी हैं, समाज की समरसता के लिये खतरनाक है। पुनः नये परिप्रेक्ष्य में, जब विकास के उपादान, न्यूनतम विभाजनकारी या अल्पवर्ग के पोषणीय नहीं रहे हैं, तब तो इस प्रकार के विभाजनकारी विचार की आवश्यकता ही न्यूनतम हो जाती है।
4. स्थानीय स्वशासन व्यवस्था की दिशाहीनता - स्थानीय स्वशासी संस्थाओं का सृजन तथा 73वें और 74वें संविधान सशोधन के माध्यम से उनका सशक्तीकरण निश्चित ही एक स्वागत योग्य कदम था। किन्तु इन संस्थाओं के माध्यम से जिस प्रकार की जनसहभागिता, धरातलीय स्तर पर स्थानिक आवश्यकताओं के अनुरूप नियोजन, स्थानिक संसाधनों का विकास, स्थानीय स्तर पर समस्याओं का तात्कालिक निराकरण, सामाजिक सौहाद्र, स्थानीय संस्कृति तथा धरोहर संरक्षण आदि प्रकार की जो अपेक्षाएं की गयीं थीं, वे या तो बिल्कुल पूरी न हो सकीं या केवल आंशिक रूप से पूरी हुई। यह भी एक कारण है कि स्थानीय स्वशासी संस्थाएंँ देश की लोकतान्त्रिक व्यवस्था की आधार-शिलाओं के बजाय केवल एक प्रकार की आदर्शात्मक उत्तरदायित्व (आइडियलिस्टिक लाइबिलिटी) सी बनतीं जा रहीं है। स्थानीय स्वशासी संस्थाएँ, विशेष रूप से ग्रामीण क्षेत्रों में, विकास की वाहक बनने के बजाय या विकास की अनूठी पहल करने वाली संस्थाओं के बजाय, ग्रामीण समाज में एक नयी रणस्थली बनती जा रही हैं। इन संस्थाओं के चुनाव ग्रामीण क्षेत्रों में विभाजनकारी प्रवृत्तियों, परस्पर अविश्वास और शत्रुता तथा आपसी फौजदारी के नये मोर्चे खोल रहे हैं। इसका अर्थ यह नहीं है कि यह व्यवस्था समाप्त की जाय, बल्कि आवश्यकता इस बात की है कि इस व्यवस्था पर एक नये सिरे से चिन्तन करके इसे परिमार्जित किया जाये। यह आश्चर्य की बात है कि इन संस्थाओं में संघर्ष, टकराव और अस्थिरता की स्थिति, राष्ट्रीय राजनीति से कहीं ज्यादा है। राष्ट्रीय राजनीति में तो नीतिगत अथवा अन्य प्रकार के मतभेदों की बहुत गुंजाइश भी हो सकती है किन्तु स्थानीय स्तर पर तो विकास कार्यक्रमों में मतभेद या मनभेद का क्षेत्र अति सीमित है। फिर राष्ट्रीय राजनीति की भाँति स्थानीय राजनीति में शामिल लोग एक दूसरे से अपरिचित या कम परिचित भी नहीं होते हैं। वे तो एक क्षेत्र के निवासी होते हैं। एक-दूसरे से पूर्ण परिचित होते हैं। अधिकांश के परस्पर व्यक्तिगत सम्बन्ध होते हैं तथा तकरीबन सभी को लगभग जीवन भर साथ रहना होता है। अतः पंचायत राज-व्यवस्था की इस विभाजनकारी प्रवृत्ति पर आवश्यक ध्यान देने की आवश्यकता है। वहाँ तो निश्चित रूप से बहुमत नहीं, सहमति से काम होना चाहिए। वही बात जो हमारे वर्तमान प्रधानमन्त्री ने राष्ट्रीय राजनीति के सन्दर्भ में हाल ही में कही है, उसकी आवश्यकता स्थानीय-स्तर पर उससे कहीं बहुत अधिक है जितनी कि राष्ट्रीय स्तर पर। वस्तुतः यह असम्भव नहीं है। किन्तु इसके लिए काफी सघन प्रयास करने होंगे। इस हेतु इन स्थानीय संस्थाओं के जनप्रतिनिधियों को प्रशिक्षण, प्रोत्साहन, प्रेरणा और पुरस्कार की एक कार्यनीति तैयार करनी होगी और साथ ही उनको निर्वाचित करने वाली जनता को भी उन प्रतिनिधियों पर दबाव बनाये रखने के लिये जागरूक करना होगा। इसमें समय भी लग सकता है। किन्तु इसमें अन्ततः सफलता अवश्य मिलेगी।
5. न्याय प्रक्रिया में गुणात्मक बदलाव की आवश्यकता - एक वह बिन्दु जिसकी ओर सामान्यतः काफी कम ध्यान दिया गया है वह है न्याय व्यवस्था में आवश्यक गुणात्मक सुधार। स्वतन्त्रता के पश्चात् से यह समस्या निरन्तर बढती ही जा रही है। त्वरित एवं उचित न्याय निरन्तर दूर होता जा रहा है। न्याय प्रकिृया में इतना विलम्ब होता है कि न्याय मिलना न मिलने के बराबर हो जाता है। यद्यपि कहा तो यह जाता है कि ‘जस्टिस डिलेड इज जस्टिस डिनायड’, लेकिन इस दिशा में कोई प्रभावशाली कदम नहीं उठाये जाते हैं।
विभिन्न अदालतों में जितने मामले विचाराधीन हैं, उनसे सम्बन्धित आंकड़े काफी चैंकाने वाले हैं। देश की विभिन्न स्तर की अदालतों में इस समय लगभग 3 करोड़ 50 लाख से अधिक मामले विचाराधीन हैं। लगभग 42 लाख से अधिक मुकदमें देश के विभिन्न उच्च न्यायालयों में चल रहे हैं तथा 50 हजार से अधिक मुकदमें उच्चतम न्यायालय में चल रहे हैं।
किन्तु उपरोक्त दुर्भाग्यपूर्ण समस्या का जो सर्वाधिक दुर्दान्त और दर्दनाक पक्ष है, उस तरफ सामान्यतः अधिकांश लोगों का ध्यान नहीं जाता है। वस्तुतः दो पक्षों के बीच मुकदमेबाजी उसमें से एक पक्ष को सही तथा त्वरित न्याय मिलने तक ही सीमित नहीं है बल्कि इससे अधिक महत्वपूर्ण तथ्य इन मुकदमों की वास्तविक लागत से सम्बन्धित है। इन मुकदमों की वित्तीय तथा सामाजिक लागत अकल्पनीय है। इन मुकदमों का प्रभाव इनसे सम्बन्धित परिवारों पर भी पड़ता है तथा यदि इस प्रकार इन मुकदमों से प्रभावित जनसंख्या की गणना की जाये तो वह 10 करोड़ से भी अधिक हो सकती है। देश में लाखों परिवार ऐसे हैं जिनकी एक से अधिक पीढ़ी मुकदमों में ही खप गयी। लाखों की संख्या में ऐसे मुकदमें हैं, जिन्हें चलते-चलते 50 वर्ष यानी आधी शताब्दी बीत गयी है तथा उनमें से बहुत बड़ी संख्या ऐसी है जिन्हें चलते एक शताब्दी बीत चुकी है। हजारों ग्रामीण परिवार फौजदारी के मुकदमों में अपना सब कुछ लुटा बैठे हैं और यही नहीं त्वरित न्याय न मिलने के कारण तमाम दीवानी मुकदमों से आगे बढ़कर फौजदारी मुकदमों का सिलसिला शुरू हो जाता है। ग्रामीण क्षेत्रों में तो दो परिवारों के बीच मुकदमें, अन्ततः दो समुदाय या दो समूहों में ‘संघर्ष के रूप में भी तब्दील हो जाते हैं और दोनों पक्षों से मुकदमों की बौछार प्रारम्भ हो जाती है। मुकदमें में दो पक्षों के साथ-साथ गवाह भी सम्मिलित हो जाते हैं और इस प्रकार किसी गांव की शान्ति, समृद्धि और विकास पूरी तरह मुकदमों की ही भेंट चढ़ जाता है। तमाम मुकदमें केवल इसलिये ही किये जाते हैं क्योंकि एक पक्ष यह जानते हुए भी कि वह गलत है और निश्चित रूप से मुकदमा हार जायेगा, अदालत पहुँच जाता है क्योंकि उसे विश्वास है कि वह मुकदमे को कई दशकों तक खींच देगा और इस बीच वह दूसरे पक्ष को इतना छका देगा कि वह उसे गलत सौदेबाजी के लिये मजबूर कर सकेगा। जैसा कि पूर्व में कहा जा चुका है कि इन मुकदमों की वास्तविक लागत (साथ ही विकास-जनित लागत) बहुत ऊँची है। मुकदमें में फँसे परिवारों का पूरा ध्यान मुकदमें पर केन्द्रित हो जाता है जिससे परिवार में बच्चों की शिक्षा पर कुप्रभाव पड़ता है, अपराध पनपते हैं। परिवार की स्वास्थ्य और आजीविका नकारात्मक रूप से प्रभावित होती है। परिवार के सदस्यों की उत्पादकता में क्षरण होता है। तमाम नकारात्मक प्रेरणाएं और प्रवृत्तियाँ पनपती हैं आदि। यही नहीं वित्त, अपार भुगतान, कम्पनियों आदि से सम्बन्धित मुकदमें व्यापारिक, वाणिज्यिक तथा उत्पादक प्रेरणाओं को हतोत्साहित करके विकास विरोधी वातावरण का भी सृजन करते हैं।
उपरोक्त तथ्यों के आलोक में यह स्वय सिद्ध है कि देश की न्याय व्यवस्था को सुदृढ़, संवेदनशील और त्वरित बनाना बहुत आवश्यक है। यह कार्य काफी मुश्किल अवश्य है किन्तु असम्भव नहीं है। वस्तुतः अन्य तमाम निवारक उपायों को अपनाने से पूर्व इस समस्या का विश्लेषण करके उसकी जड़ तक पहुँचना होगा। यदि मुकदमें इतनी अधिक संख्या में दायर होंगे तो केवल न्यायाधीशों की संख्या बढाने या त्वरित अदालतों के गठन से काम नहीं चलेगा। दरअसल समस्या की जड़ प्रति वर्ष नये-नये मुकदमों की बढ़ती हुई संख्या है। अतः इसका निदान भी बढ़ते हुए मुकदमों की संख्या कम करने से ही सम्भव हो सकेगा। इस हेतु वस्तुतः मुकदमों के जन्म लेने का कारण को ही समाप्त करना होगा अथवा उसका बीज पड़ते ही गर्भपात करना पड़ेगा, तभी इस समस्या का हल सम्भव होगा। मुकदमों की बढ़ती हुई संख्या का एक बहुत बड़ा कारण स्वयं मुकदमों का लम्बे समय तक चलना है तथा लम्बे समय तक चलने का कारण स्वयं मुकदमों की संख्या है। दूसरे शब्दों में, मुकदमों की संख्या तथा मुकदमों का लम्बे समय खिंचने का एक-दूसरे से कारण और परिणाम का अन्तर्सम्बन्ध है अर्थात् दोनों एक-दूसरे को बढ़ाने में सहयोग देते हैं। मुकदमों का लम्बा समय एक तो नये वादियों की संख्या में इजाफा करता है, तो लम्बे चलते हुए एक मुकदमें की शाखाओं के रूप में तमाम नये सहयोगी मुकदमें भी पनपने लगते हैं तथा इस प्रकार एक एकल मुकदमें से, मुकदमों का एक अन्तहीन गुच्छा या लच्छी बन जाती है, जिसका अन्ततः जब भी अन्त होता है तो वह अधिकांशतः अदालत में न होकर अदालत के बाहर ही होता है। इस प्रकार यह अन्त उसी प्रकार का होता है जो यदि प्रारम्भ में ही हो सकता था। इस प्रकार दोनों पक्षों के तमाम ऊर्जा और साधन बर्बाद होने से बच जाते और जिन्हें किसी उत्पादक या रचनात्मक प्रकिृया में लगाया जा सकता था। अतः सारांश में, यह कहा जा सकता है कि मुकदमों के निस्तारण में देरी और मुकदमों की निरन्तर बढ़ती संख्या का, यह अनवरत दुश्चक्र कहीं न कहीं अवश्य टूटना चाहिए। इसके अतिरिक्त देश में विशेष रूप से ग्रामीण क्षेत्रों में विधिक-साक्षरता तथा विधिक-जागरूकता के अधिकाधिक प्रयास और प्रशिक्षणों की आवश्यकता है। हाल में इस ओर प्रयास भी हुए हैं किन्तु वे अभी न के बराबर ही हैं। इसके अलावा अधिकांश विवादों का उचित निस्तारण प्रशासनिक स्तर पर ही करने का प्रयास होना चाहिए, जिससे मामला न्यायालयों तक पहुँचने की नौबत ही न आये। इसके लिये सरकारी अधिकारियों की जबावदेही स्पष्ट रूप से तय होनी चाहिए। नियम, परिनियम, सरकारी आदेशों और कानूनों में पूर्ण स्पष्टता होनी चाहिए तथा उनकी स्पष्ट व्याख्या भी की जानी चाहिए। सभी वर्ग के मुकदमें अलग-अलग समूहों में वर्गीकृत करके उनके मूल में जाया जा सकता है तथा उसे मूल-बिन्दु पर ही किस प्रकार रोका जा सकता है इस पर गम्भीरता से विचार होना चाहिए, जिससे वह न्यायालय तक पहुँचे ही नहीं।
6. प्रशासनिक व्यवस्था को चुस्त, जवाबदेह और संवेदनशील बनाने की आवश्यकता - देश के अल्पविकास और अव्यवस्था के लिये राजनीतिक तन्त्र और चुनी हुई सरकार को तो बहुधा कठघरे में खड़ा किया जाता है, किन्तु देश के प्रशासन तन्त्र और अफसरशाही से होने वाली नकारात्मक प्रवृत्तियों और हानियों को अक्सर अनदेखा कर दिया जाता है। जबकि वास्तविकता तो यह है कि देश की प्रशासनिक व्यवस्था के माध्यम से ही देश में विभिन्न नीतियों और कार्यक्रमों को लागू किया जाता है तथा सम्बन्धित नीतियों या कार्यक्रमों की सफलता और असफलता अति प्रमुख रूप से इसी प्रशासनिक मशीनरी के सहयोग और व्यवहार पर निर्भर करती है।
यह अति दुर्भाग्य का विषय है कि स्वतन्त्रता के 67 वर्ष व्यतीत होने के बावजूद भी देश की प्रशासनिक व्यवस्था एक ओर तो लचर, कमजोर, समन्वय विहीन है तो दूसरी ओर वह जनता के प्रति घोर असंवेदनशील, निष्ठुर, लापरवाह, कर्तव्य-परायणताविहीन, सत्यनिष्ठता-विरत और शासक मनोवृत्तिधारी है। यदि गहनता से देखा जाय, तो आज भी भारत की उच्च पदस्थ अफसरशाही ब्रिटिश परम्परा और मनोवृत्ति से अपने को मुक्त नहीं कर पाई है। अफसर आज भी अपने को जनता का सेवक नहीं, शासक मानते हैं और तदनुसार ही बड़ी ही संवेदनशून्यता के साथ सामान्य जनता से व्यवहार करते हैं। भारत में उच्च पदस्थ अफसरशाही की जड़े आज भी इतनी गहरी तथा मजबूत हैं कि वह विभिन्न अवसरों पर लोकतान्त्रिक निकायों और पेशेवर संस्थानों को भी आसानी से धता बता सकते हैं या धोखे में रख सकते हैं। ऐसा बहुध ा देखा जाता है कि विभिन्न लोकतान्त्रिक तथा पेशेवर प्रतिष्ठान और जन-प्रतिनिधि, इस बेहद संगठित और जटिल अफसरशाही के समक्ष हथियार डालने या उससे समझौता करने को अक्सर मजबूर हो जाते हैं।
उपरोक्त स्थिति वास्तव में दुर्भाग्यपूर्ण ही नहीं देश के स्वस्थ विकास और जनकल्याण कार्यक्रमों के क्रियान्वयन के दृष्टिकोण से बहुत घातक है। देश के लोकतान्त्रित ढंग से चुने गये शासकों को वास्तविक शक्ति स्वयं में स्थानान्तरित और निहित करने हेतु इस स्थिति का तोड़ ढूंढना ही होगा। इस समस्या के निवारण हेतु विभिन्न प्रशासनिक सुधार आयोगों की अनुशंसाओं का नये परिप्रेक्ष्य में अध्ययन करके उन्हें परिमार्जित रूप में लागू करने का प्रयास होना चाहिए। इस सम्बन्ध में अति सघन और कठोर उपाय शीघ्र लागू किये जाने चाहिए, क्योंकि वर्तमान की निरकुंश अफसरशाही के ढाँचे को संवेदनशील और जबावदेह बनाये बिना किसी प्रकार के सुधार पूर्ण रूप से फलित नहीं होंगे।
7. स्वास्थ्य सुविधाओं को विस्तारित करने तथा उनमें गुणात्मक सुधार की आवश्यकता - देश में स्वास्थ्य सुविधाओं की स्थिति बड़ी ही नाजुक है। ग्रामीण क्षेत्रों में तो यह सुविधाएँ न के बराबर ही हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य सुविधाओं की अनुपलब्धता के कारण वहाँ लोग तब तक इलाज नहीं कराते हैं जब तक कि वह बीमारी बेहद नाजुक न हो जाये। बहुत समय तक तो यह लोग झाड़-फूँक या गाँव के नीम हकीमों आदि से ही इलाज कराते रहते हैं और जब सही इलाज के लिये उन्हें उपयुक्त चिकित्सक के पास लाते हैं तब तक बहुत देर हो चुकी होती है। किन्तु शहर में भी पूर्ण विशेषज्ञ चिकित्सक पर ले जाने पर भी, वह निरीह ग्रामीण उपयुक्त चिकित्सकीय सुविधाएँ उचित मूल्य पर प्राप्त कर सके, यह आवश्यक नहीं होता है। यहाँ भी उसे पग-पग पर लूटा और ठगा जाता है। कई बार तो उसे इलाज कराने हेतु अपने घर-मकान, जानवर-जमीन-जायदाद गहने-गुरिया आदि को बेचने या गिरवी रखने को मजबूर होना पड़ता है और यहीं से उसकी बदहाली और पतन की वह कथा प्रारम्भ होती है जिसका अन्त, एक खुशहाल परिवार का एक अति दरिद्र और दुखी परिवार में बदलने के रूप में होता है। विभिन्न अर्थशास्त्रियों के अध्ययन इस तथ्य की भली भाँति पुष्टि करते हैं, जिन्होंने विभिन्न अध्ययनों के माध्यम से यह बताया है कि किस प्रकार न केवल वह परिवार जो गरीबी रेखा से थोड़े ऊपर होते हैं, बल्कि तमाम ग्रामीण मध्यम वर्गीय और भूमिधारी समृद्ध किसान परिवार के किसी सदस्य की बीमारी के कारण, इलाज कराते-कराते वह परिवार गरीबी की रेखा के नीचे फिसल जाते हैं। यहाँ ध्यान देने की बात यह भी है कि यह स्थिति तो उन ग्रामीणों की है जिनके पास बेचने या गिरबी रखने के लिये आवश्यक परिसम्पत्तियाँ हैं। किन्तु जिनके पास कुछ भी नहीं है (दैनिक मजदूरी के अतिरिक्त) या नाममात्र की परिसम्पत्तियाँ हैं, ऐसे भूमिहीन श्रमिक, लघु और सीमान्त किसान, ग्रामीण दस्तकार, पशुपालक आदि तो, जो कुछ थोड़ा बहुत उनके पास होता है उसे भी गंवा कर मृत्यु की ओर कूच कर लेते हैं।
उक्त स्थिति ग्रामीण क्षेत्रों में बहुतायत से है किन्तु इसका अर्थ यह नहीं है कि यह स्थिति शहरों में नहीं है। शहरों के गरीबों और साधनहीन लोगों की स्थिति भी लगभग उतनी ही खराब है जितनी ग्रामीण क्षेत्र के गरीबों की।
उपरोक्त स्थिति का सामना करने हेतु जिस बात की सबसे अधिक आवश्यकता है, दुर्भाग्य से उस पर अब तक सबसे कम ध्यान दिया गया है और वह है सामान्य जनता में स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता पैदा करना। यदि स्वास्थ्य और चिकित्सा के प्रति लोग जागरूक होंगे तो रोगग्रस्त लोगों की संख्या में कमी आयेगी या शुरूआत में ही लोग उस रोग का उचित इलाज करा सकेंगे। यह प्रसन्नता की बात है कि पिछले कुछ समय से बाबा रामदेव तथा विभिन्न योग गुरूओं ने लोगों को स्वास्थ्य के प्रति क्रान्तिकारी रूप से जागरूक बनाया है। अब लोगों की समझ में आने लगा है कि उचित दिनचर्या, उचित खानपान, व्यायाम, प्राकृतिक तथा आयुर्वेदिक चिकित्सा आदि से अच्छा स्वास्थ्य और दीर्घायु सुनिश्चित की जा सकती है तथा तमाम चिकित्सकीय खर्चो से बचा जा सकता है। इस जागरूकता को और अधिक व्यापक बनाने की आवश्यकता है, विशेष रूप से महिलाओं, बच्चों और ग्रामीणों के मध्य। इस जागरूकता में रोगों की प्रारम्भिक स्थिति में पहचान और उसके प्रारम्भिक निवारक चिकित्सकीय उपायों का और अधिक प्रचार-प्रसार किया जाये, तो और भी उत्तम होगा। इसके अलावा यह भी आवश्यक है कि विशेषज्ञ चिकित्सीय सेवाओं के बजाय सर्वप्रथम आवश्यक आधारभूत चिकित्सकीय सेवाओं पर अधिक व्यय करके उन्हें यथाशीघ्र विस्तारित किया जाये। इस सन्दर्भ में यह भी ध्यान रखना होगा कि जनता को निरोग रखना या रोगमुक्त करना केवल उन व्यक्तियों को कष्ट मुक्त करना ही नहीं है जो उनसे ग्रस्त हैं, बल्कि उसका सीधा और घनिष्ठ सम्बन्ध एक परिवार की उत्पादकता और विकास में उसके योगदान से भी प्रत्यक्ष रूप से जुड़ा है। अतः इस मद में जो भी व्यय किया जाता है उसे केवल कल्याणकारी व्यय के रूप में न देखकर विकास प्रकिृया में निवेश के रूप में देखना चाहिए।
8. शिक्षा व्यवस्था में गुणात्मक सुधार की आवश्यकता - स्वतन्त्रता के पश्चात् देश में साक्षरता और शिक्षा की स्थिति कोई पं्रशसनीय नहीं रही है। यही कारण है कि विश्व के प्रत्येक तीन में से लगभग दो निरक्षर भारतीय हैं। विगत कुछ समय से इस स्थिति में यद्यपि काफी सुधार हो रहा है तथा समाज के अति कमजोर और वंचित वर्गो में भी शिक्षित होने के प्रति काफी जागृति आयी है। निजीकरण के कारण विभिन्न स्तरों के शैक्षिक संस्थानों की उपलब्धता में काफी विस्तार हो चुका है। प्राथमिक शिक्षा के देश में सार्वभौमीकरण का भी दावा किया जा रहा है तथा अब माध्यमिक स्तर की शिक्षा के सार्वभौमीकरण की बात तेजी से चल रही है। किन्तु दुर्भाग्य से शिक्षा के इस विस्तार में, हम शिक्षा की गुणवत्ता का उन्नयन तो दूर, उसका ह्रास भी रोकने में बुरी तरह विफल रहे हैं। अतः आज डिग्री तो हैं लेकिन उन डिग्र्री धारियों में उत्पादकता, कार्य कुशलता, आवश्यक योग्यता का नितान्त अभाव है। जिसके चलते वे रोजगार प्राप्त करने की दृष्टि से नितान्त अनुपयुक्त (अनएम्पलोयेबेल) हैं। इस कारण एक ओर तो वे अपने परम्परागत कार्यो को छोड़ चुके हैं या डिग्रीधारी होने के कारण उन कार्यो को तुच्छ और हीन मानने लगे हैं तो दूसरी ओर वे नये प्रकार के रोजगार को भी प्राप्त करने में असमर्थ हैं, क्योंकि वे उसके लिये आवश्यक योग्यता और उत्पादकता धारण नहीं ही करते हैं।
स्वतन्त्रता के पश्चात् शिक्षा के विस्तार का एक अन्य अति दुर्भाग्य पूर्ण और बेहद निराशाजनक पक्ष यह भी है कि वर्तमान शिक्षा केवल ज्ञानार्जन और उससे भी अधिक धनार्जन का जरिया मात्र बन चुकी है। विद्यार्थियों और उनके अभिवावक यह मानते हैं कि वे पढ़-लिख कर अच्छी से अच्छी नौकरी में लग जायें। वर्तमान शिक्षा वस्तुतः अधिकाधिक रूप से यही कर भी रही है। जबकि शिक्षा का एकमात्र उद्देश्य केवल नौकरी पाना नहीं है। बल्कि शिक्षा ऐसी होनी चाहिए जो विद्यार्थियों को उच्च कोटीय संस्कारों से आभूषित कर सके, जो उन्हें श्रेष्ठ मानवीय गुणों से युक्त नागरिक बना सके। जो उन्हें समाज के प्रति गहन रूप से संवेदनशील बना सके और जिससे वे समाज और राष्ट्र के प्रति समर्पित निष्ठावान और कर्तव्य परायण नागरिक बन सकें।
9. आपदा-प्रबन्धन की आवश्यक व्यवस्था और तद्सम्बन्धी जागरूकता - स्वतन्त्रता के पश्चात् देश में जब विकास की प्रकिृया गतिमान हुई तो उसके साथ आपदा प्रबन्धन पर भी ध्यान देने की आवश्यकता थी। किन्तु इस पर आवश्यक ध्यान देने की महती आवश्यकता को प्रारम्भिक दौर की विभिन्न सरकारों ने बिल्कुल नहीं समझा। इसका परिणाम यह हुआ कि देश में आपदाएँ भी बढ़ती गयीं और उनके कारण विनाश भी।
यहाँ इस तथ्य को आंकड़ों में व्यक्त करते हुए यह बताना सम्भव नहीं है कि आपदाओं से प्रति वर्ष कितना अधिक विनाश होता है तथा इस विनाश को किस प्रकार न्यूनतम किया जा सकता है। कई वर्षो में तो आपदा से होने वाली प्रत्यक्ष हानि ही देश के सकल राष्ट्रीय उत्पादन से अधिक हो जाती है। यदि इसमें अप्रत्यक्ष और अदृश्य हानियों को भी सम्मिलित कर दिया जाये तब तो यह हानि और भी कई गुना हो सकती है।
पिछले कुछ वर्षो में सरकार ने आपदाओं से होने वाली भारी क्षति का संज्ञान लेते हुए, इस दिशा में कुछ कदम उठाये हैं। इन कदमों के अन्तर्गत राष्ट्रीय स्तर पर, ‘राष्ट्रीय आपदा प्रबन्धन प्राधिकरण तथा राष्ट्रीय आपदा प्रबन्धन संस्थान का गठन किया गया है। इसका अनुगमन करते हुए प्रत्येक राज्य में भी राज्य स्तर पर ‘राज्य आपदा प्रबन्धन प्राधिकरणों’ तथा ‘राज्य आपदा प्रबन्धन संस्थाओं का गठन किया जा रहा है। अब तक कई राज्य इस प्रकार की संस्थाओं का गठन कर भी चुके हैं तथा कई राज्यों में इनका गठन अभी होना शेष है। राज्यों के अतिरिक्त प्रत्येक जिले में भी इस प्रकार की व्यवस्था की आवश्यकता है जिससे आपदा ग्रस्त क्षेत्र को त्वरित रूप से सहायता मुहैय्या कराई जा सके।
‘आपदा’ एक प्रकार से एक ऐसी घटना होती है जो बड़े ही अचानक भी आ सकती है। अतः आपदा के प्रबन्धन के सम्बन्ध में जो सबसे आवश्यक कदम है, वह है-आपदाओं के प्रति व्यापक जागरूकता अभियान चलाना। आपदा प्रबन्धन का एक उज्जवल पक्ष यह भी है कि मात्र जागरूकता से ही विभिन्न आपदाओं से एक बहुत बड़ी सीमा तक बचा जा सकता है। केवल पेशगी मंे चेतावनी, अति अल्पकालीन प्रशिक्षण और नाममात्र के साधनों की तात्कालिक उपलब्धता (यथा रस्सी, सीढ़ी, लम्बा बांस आदि) से ही जन धन की भारी क्षति से बचा जा सकता है। अतः अब देर से ही सही, यदि समय रहते आपदा प्रबन्धन के प्रति देशव्यापी जागरूकता अभियान चलाया जाये तथा विभिन्न स्तरों पर अन्य आवश्यक कदम उठा लिये जायें, तो देश के विकास तथा जनकल्याण की दिशा में यह एक अति महत्वपूर्ण कदम होगा।
उपरोक्त बिन्दु देश के विकास और समृद्धि की दृष्टि से बहुत उपयोगी तथा प्रभावशाली बिन्दु हैं। उपरोक्त बिन्दुओं के सन्दर्भ में एक महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि इनमें से अधिकांश बिन्दु देश की उन नकारात्मक प्रवृत्तियों के निराकरण से सम्बन्धित हैं जिनके कारण देश की विकास प्रकिृया अवरूद्ध होती है तथा देश की जनता का कल्याण और खुशहाली कुप्रभावित होती है। दूसरे शब्दों में, उपरोक्त आठ बिन्दुओं में अधिकांश का सम्बन्ध सामान्य जनता की क्षमता-व ृद्धि या उनके सशक्तीकरण से है। इसमें कोई संदेह भी नहीं है कि कोई भी विकास कार्यक्रम या कल्याण कार्यक्रम की सफलता तब तक पूर्ण रूप से सम्भव नहीं है जब तक उस देश के नागरिक सशक्त नहीं होते हैं तथा उनकी क्षमता में उचित स्तर तक उन्नयन नहीं होता है। यहाँ यह स्पष्ट करना परम आवश्यक है कि जहाँ सरकार दृश्य साधनों को विकसित करने तथा उन्हें लोगों को पहुँचाने हेतु प्रयत्नशील है वहीं उसे इन ‘अदृश्य-शक्तियों या साधनों’ अर्थात् क्षमता-वृद्धि तथा सशक्तीकरण पर भी उचित ध्यान देना आवश्यक है।ं