लोक जीवन में कहावतों का विशिष्ट स्थान है। आम बोलचाल की भाषा में कहावतों का प्रयोग बहुतायत देखने को मिलता है। इसका प्रमुुख कारण है कि भारत की अधिकांश आबादी गाँवों में रहती है। कृषि हमारी प्रथम प्राथमिकता में आती है। इसी को दृष्टिगत रखते हुए राष्ट्र कवि सोहनलाल द्विवेदी ने लिखा भी है कि - ‘‘है अपना हिन्दुस्तान कहाँ वह बसा हमारे गाँवों में’’। गांँव के लोगों का लोक संस्कृति एवं लोक जीवन से गहरा नाता होता है। बातचीत में, तर्क-विर्तक में, प्रमाणिकता देने का उनका प्रमुख साधन लोकोक्तियाँ, मुहावरे एवं कुछ प्रमुख प्रचलित दोहे ही पर्याप्त होते हैं। घाघ, भड्डरी, गिरधर कविराय जैसे लोक प्रचलित कवियों के दम पर ही ये लोक जीवन से जुड़ी बड़ी-बड़ी बातें सिद्ध कर लिया करते हैं।
घाघ लोक कवि हैं। इनकी कहावतें शायद ही गांँव का कोई बुजुर्ग व्यक्ति हो जो न जानता हो। कृषक वर्ग तो इनकी कहवतों के आधार पर ही किसानी का भाग्य, फसल का भाग्य बता दिया करते थे। घाघ न सिर्फ किसानी-खेतीवारी के अतिरिक्त भी लोक जीवन से जुड़ी अनेक कहावतें कही हैं और समय-समय पर वे अच्छरशः सही भी साबित होती हैं। वर्षा को लेकर घाघ ने बहुत कहावतें कही हैं और वे प्रासांगिक भी हैं। कभी-कभी समाचार पत्रों में इन कहावतों का जिक्र भी होता है। मौसम विभाग ने भी इनका एक छोटा सा संकलन किया है। जैसे घाघ की एक कहावत है कि-
‘‘जेठ मास जो तपै निरासा।
तो जानौ बरखा की आसा।।’’
अर्थात यदि जेष्ठ मास में खूब गर्मी पड़े तो समझ लो वर्षा भी खूब होने वाली है। सम्भवतः यह कहावत इस वर्ष (2015) में सही साबित हो रही है। इसी तरह उन्होनें कई कहावतें वर्षा से सम्बन्धित कही हैं। जैसे -
‘‘पुरवा जब पुरवाई पावै।
सूखी नदियाँ नाव चलावे।।’’
यदि पूर्वा फाल्गुनी नक्षत्र में पुरवाई हवा चले तो इतनी वर्षा होगी कि सामान्य स्थानों पर भी नाव चलने लगेगी।
‘‘तपै मृगसिरा जोय, तब बरखा पूरन होय’’
यदि मृगसिरा नक्षत्र में खूब गर्मी पड़े तो समझो उस वर्ष वर्षा अच्छी होगी।
‘‘चढ़त जौ बरसे चित्रा, उतरत बरसे हस्त।
कितनौ राजा डाण्ड ले, हारे नही गृहस्त।।’’
यदि चित्रा नक्षत्र लगने पर और हस्त नक्षत्र के उतरने पर वर्षा होती है तो फसल इतनी अच्छी होगी कि राजा चाहे जितना कर ले किसान को देने में कष्ट नहीं होता। घाघ की ऐसी अनेक कहावतें हैं जो समय और मौसम के अनुसार सही साबित होती हैं। सन 1939 में डा॰ रामनरेश त्रिपाठी ने घाघ और भड्डरी की कहावतों का संकलन किया था, उनके संकलन में लोक प्रचलित कहावतें भी शामिल थीं। इधर कुछ छुटपुट कहावतों का भी संकलन हुआ, लेकिन उनमें प्रमाणिकता का अभाव देखने को मिला। अतः मैने इन लोक कवियों की कहावतों को बड़े परिश्रम से एकत्र किया और कई विशिष्ट विद्वानों से परख भी कराई तथा उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान नें सहजता से मेरे संकलन को ‘‘घाघ और भड्डरी की कहावतें’’ के नाम से प्रकाशित भी किया।
घाघ लोक कवि हैं। इनकी कहावतें शायद ही गांँव का कोई बुजुर्ग व्यक्ति हो जो न जानता हो। कृषक वर्ग तो इनकी कहवतों के आधार पर ही किसानी का भाग्य, फसल का भाग्य बता दिया करते थे। घाघ न सिर्फ किसानी-खेतीवारी के अतिरिक्त भी लोक जीवन से जुड़ी अनेक कहावतें कही हैं और समय-समय पर वे अच्छरशः सही भी साबित होती हैं। वर्षा को लेकर घाघ ने बहुत कहावतें कही हैं और वे प्रासांगिक भी हैं। कभी-कभी समाचार पत्रों में इन कहावतों का जिक्र भी होता है। मौसम विभाग ने भी इनका एक छोटा सा संकलन किया है। जैसे घाघ की एक कहावत है कि-
‘‘जेठ मास जो तपै निरासा।
तो जानौ बरखा की आसा।।’’
अर्थात यदि जेष्ठ मास में खूब गर्मी पड़े तो समझ लो वर्षा भी खूब होने वाली है। सम्भवतः यह कहावत इस वर्ष (2015) में सही साबित हो रही है। इसी तरह उन्होनें कई कहावतें वर्षा से सम्बन्धित कही हैं। जैसे -
‘‘पुरवा जब पुरवाई पावै।
सूखी नदियाँ नाव चलावे।।’’
यदि पूर्वा फाल्गुनी नक्षत्र में पुरवाई हवा चले तो इतनी वर्षा होगी कि सामान्य स्थानों पर भी नाव चलने लगेगी।
‘‘तपै मृगसिरा जोय, तब बरखा पूरन होय’’
यदि मृगसिरा नक्षत्र में खूब गर्मी पड़े तो समझो उस वर्ष वर्षा अच्छी होगी।
‘‘चढ़त जौ बरसे चित्रा, उतरत बरसे हस्त।
कितनौ राजा डाण्ड ले, हारे नही गृहस्त।।’’
यदि चित्रा नक्षत्र लगने पर और हस्त नक्षत्र के उतरने पर वर्षा होती है तो फसल इतनी अच्छी होगी कि राजा चाहे जितना कर ले किसान को देने में कष्ट नहीं होता। घाघ की ऐसी अनेक कहावतें हैं जो समय और मौसम के अनुसार सही साबित होती हैं। सन 1939 में डा॰ रामनरेश त्रिपाठी ने घाघ और भड्डरी की कहावतों का संकलन किया था, उनके संकलन में लोक प्रचलित कहावतें भी शामिल थीं। इधर कुछ छुटपुट कहावतों का भी संकलन हुआ, लेकिन उनमें प्रमाणिकता का अभाव देखने को मिला। अतः मैने इन लोक कवियों की कहावतों को बड़े परिश्रम से एकत्र किया और कई विशिष्ट विद्वानों से परख भी कराई तथा उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान नें सहजता से मेरे संकलन को ‘‘घाघ और भड्डरी की कहावतें’’ के नाम से प्रकाशित भी किया।





