Thursday, July 23, 2015

औषधीय मसाले हल्दी व सोंठ - डा॰ संगीता सचान

राष्ट्र को पीड़ा-पतन-पराभव से उबारने हेतु मानव मात्र के लिए एक ही संजीवनी है - वह है सद्ज्ञान देने वाल शिक्षण, प्रत्यक्ष या परोक्ष स्वाध्याय, चाहे व किसी भी रूप में हो। शिक्षा एवं विद्या का समन्वय-संतुलन वर्तमान समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है।
वर्तमान समय संप्रेषण और आविष्कारों का युग है। सम्पूर्ण विश्व के विकास लाभ-हानि पर अगर दृष्टिपात किया जाए तो जहाँ लाभ अपरिमित हैं वही खोज के बाद भी बीमारियों की भयावहता असीमित हुई है। ऐसे में ‘स्वास्थ्य ही धन है’ यह सर्व कल्याण के लिए आवश्यक हो गया है। भारतीय ग्रन्थों में कहा गया है ‘सर्वधर्म परित्यज्य शरीरं अनुपालयेत्’ और आरोग्य को सर्वोपरि माना गया है। स्वास्थ्य को संरक्षित, सुरक्षित और दीर्घ जीवी तथा निरोग रखना अति आवश्यक है। आज इसकी पूर्ति आयुर्वेद से ही सम्भव है क्योंकि आयुर्वेद सम्पूर्ण जीवन का विज्ञान है। ऐसे में स्वास्थ्य संरक्षण की महती आवश्यकता को देखते हुए हमने अपने लेख में कुछ औषधीय गुणों से युक्त मसालों का अध्ययन प्रस्तुत किया है।
सामान्यतः मसालें के रूप में जीरा, हल्दी, अदरक, कालीमिर्च का प्रयोग बहुत ही प्रचलित है किन्तु इन मसालों का भारतीय भोजन में शामिल होना, एक विशेष कारण को इंगित करता है। ये मसालें अपने आप में औषधीय गुणों से भरपूर हैं। इस इकाई में आप हल्दी और अदरक के औषधीय महत्व जान सकेंगे कि यह कफ को गलाते हैं, कई प्रकार के उदर रोगो को भी दूर करते है साथ ही चेहरे की सुन्दरता को भी बढ़ाते है।

हल्दी -
हल्दी का लेटिन भाषा का नाम ‘कर्कुमा लौंगा’ ;ब्नतबनउं स्वदहंद्ध एवं इसका कुल जींजीबरेसी है।
परिचय - इसका क्षुप 2-3 फुट ऊँचा हृस्वकांड होता है। पत्र आयताकार 1.5 से 2 फीट लंबे, लगभग 6 इंच चैड़े होते हैं। पत्तियाँ दोनो पृष्ठ पर चिकनी होती हैं, उन पर सूक्ष्म सफेद बिन्दु होते हैं। पुष्प दंड 6 इंच लंबा पत्र कोष से आवृत्त होता हैं, जिसमें पीतवर्ण लगभग 1.5 इंच लंबे पुष्प निकलते हैं। पुष्पदंड के पत्र हल्के रंग के होते हैं। इसके कंद अदरख के सदृश किन्तु उससे बड़े, भीतर की ओर चमकीले पीले होते हैं। शरद ऋतु में पुष्प निकलते है।
उत्पत्ति स्थान - समस्त भारत में विशेषतः पश्चिम बंगाल, मुंबई और तमिलनाडु में इसकी खेती होती है।
दोष कर्म - उष्ण वीर्य होने से यह कफ-वात शामक पित रेचक और तिक्त होने से पित शामक भी है।
दोष प्रयोग - यह वात, पित्त कफ तीनों दोषों में उत्पन्न विकारों में प्रयुक्त होता है। विशेषतः कफ-पित शामक है। हल्दी उष्ण, सौन्दर्य बढ़ाने वाली तथा रक्तशोधक है।
शोथ वेदनायुक्त विकारों में विशेषतः आघात लगने पर इसका लेप करते है। कुष्ठ, कंडू, खुजली, आदि त्वक् दोषों में इसे लगाते हैं। वर्ण को सुधारने के लिए इसका उबटन प्रयोग किया जाता है। व्रणों के पाचनार्थ इसकी पुल्टिस बाँधते हैं तथा शोधन एवं रोपण के लिए इसका चूर्ण या मरहम लगाते है। नेत्राभिष्यंद से इसका आश्चोतन (1 भाग हल्दी 10 भाग जल में पकाकर छान लेते हैं) तथा विडालक देते है। यकृत प्लीहा की वृद्धि होने पर इसका लेप उसके ऊपर करते हैं। अर्ष में भी इसका लेप लगाते है। हल्दी के टुकड़ों को अंगारों पर रखने से धूम्र निकलता है, वह मूच्र्छा, श्वास एवं हिक्का में प्रयुक्त होता है। इसके धूम्र से वृश्चिकदंश की वेदना भी शांत होती है।
यह रक्तविकार, शीतपित, पांडु एवं रक्तस्त्राव में प्रयुक्त होता हैं। शीतपित (एलर्जी) की यह उत्तम दवा हैं। यह कास एवं श्वास में कष्ट दायक हैं। प्रमेह रोग में इसका चूर्ण या स्वरस देते है प्रसव के बाद एवं स्तन्य विकारों में हल्दी का सेवन कराते हैं। शुक्रमेह में भी लाभकर है।
प्रयोग -
- प्रदर में हल्दी को गूगल के साथ देते हैं। कामला रोग में 6 माशा हल्दी को मट्ठा के साथ 2 बार  सेवन करें। भोजन मात्र दही-भात अथवा मट्ठा-भात लेते रहने से 4-5 दिन में कामला शमन हो जाता है।
- हल्दी रक्तशोधक है। शरीर पर फुन्सियाँ उठने, चकत्ता जैसी पिति उछलने में हल्दी को शहद के साथ मिलाकर चाटते रहने रहने की प्रथा है।
- खाज, खुजली, फुंसी आदि में इसका सेवन उपयोगी रहता है।
- गहरी चोट लग जाने पर हल्दी का चूर्ण दूध के साथ पिलाते है।
- अलसी तेल, नमक व हल्दी की पुल्टिस बनाकर सूजन, दर्द एवं चोट वाले स्थानों की सिकाई की जाती है।
श्वसन तंत्र - खाँसी आने पर हल्दी के टुकड़े मुँह में पड़े रहने दिये जाएँ और उन्हें धीरे-धीरे चूसते रहा जाये तो लाभ होगा।
- सरदी लगने पर हल्दी की धुनी दी जाती है।
- शिरोशूल एवं साइनुसाइटीस में हल्दी एक पाव पानी में औटाकर कपड़े से छानकर आँखों में टपकाते हैं, तो लाली जल्दी मिटती है।
- मूत्र रोगों में इसका काढ़ा बहुत आराम देता है।
- प्रमेह में हल्दी के चूर्ण को आंवले के रस के साथ देते हैं।
अदरक (सौंठ) -
इसका लैटिन भाषा का नाम जिंजिबर आॅफिसिनेल हैं एवं इसका कुल आद्र्रक-कुल जिंजीबरेसी है।
परिचय - यह बहुवर्शायु, कंदयुक्त क्षुप है। इसका कांड पत्रों से युक्त होता हैं। यह 4 फीट तक ऊँचा बढ़ सकता है। पत्र आधे से एक फीट लंबे एक इंच चैड़े होते हैं। अग्रभाग में ये क्रमशः नुकीले होते जाते हैं। इसका नीचे वाला पृष्ठ चिकना होता है।
1.5 से 3 इंच लंबे पुष्पध्वज से आधे से एक फीट लंबा पुष्पदंड निकलता है। इस पर हरिताभ पीतवर्ण के पुष्प आते हैं। इन पुष्पों का ओष्ठ भाग गहरे बैंगनी रंग का होता है। पुंकेसर भी गहरे बैंगनी रंग के होते हैं। वर्षा एवं शरद ऋतु में पुष्प आते हैं। कंद हल्के पीले रंग का सुगंधित, स्थूल और खंडयुक्त होता है।
आद्र्र कंद को आद्र्रक तथा शुष्क को शुंठी कहते है। अदरख के कंद की पतली त्वचा बाँस के तीक्ष्ण टुकड़े से अलग कर, पानी से धोकर, 8-12 दिनों तक धूप में और बाद में छाया में सुखाते हैं। इन टुकड़ों को एक दिन पानी में डुबोने के बाद 12 लीटर पानी में 1 किलो चूना डालकर बनाये गय गाढ़े घोल में रखते हैं। फिर से धूप में सुखाकर टाट के टुकड़ों से रगड़कर रख लेते हैं। इससे सफेदी और चमक आ जाती है।
उत्पŸिा स्थान - केरल, पश्चिम बंगाल, उड़ीसा, कर्नाटक, मध्य प्रदेश, तथा हिमाचल प्रदेश में इसकी खेती होती हैं।
गुण कर्म -
कफ - वात शामक, शीत प्रशमन, शोथहर, वेदना स्थापन, नाड़ी उत्तेजक, वात शामक, तृप्तिघ्न, रोचन, दीपन, पाचन, वातानुलोमन, शूलप्रशमन, अर्शोघ्न, ह्नदयोतेजक, रक्तशोधक, श्वासहर, वृश्य, ज्वरघ्न।
आमवात, संधिशोथ आदि में इसको पीसकर गरम लेप किया जाता है। शैत्य और अवसाद को दूर करने के लिए भी इसका लेप करते हैं। शुंठी तैल में मिलाकर अभ्यंग भी करते हैं। शोथ रोग में इसका चूर्ण उद्धर्शन करते है।
- भोजन से पूर्व लवण और आद्र्रक खाने से अग्नि प्रदीप्त होती है।
- आमवात में शुंठी और गोक्षुर का क्वाथ प्रतिदिन प्रातः सेवन करने से कटि शूलादि में शीघ्र लाभ होता है।
- आद्र्रक स्वरस पुराना गुड़ मिलाकर पिलाने से शीत पित में लाभ होता है।
- यह जीवनी शक्तिवर्धक, नाड़ी संस्थान के लिए उत्तेजक एवं वात शामक औषधि है।
- एन्जाइम की प्रचुरता के कारण यह कफ निस्तारक, रक्त शोधक तथा जीर्ण संधिशोथ हेतु एक श्रेष्ठ द्रव्य माना गया है। बाह्य प्रयोग में इसे पीसकर आमवात व संधिशोथ में लेपन करते हैं।
- भोजन के पूर्व लेने पर अरूचि दूर होती हैं।
- अश्वगंधा व निर्गुड़ी के साथ सौंठ मिलाकर देने से आमवात व बाजीकरण प्रयोजन हेतु दिया जाता है।