Thursday, July 23, 2015

आनन्द का उद्गम - कविता विकास

संघर्ष जीवन का अवश्यम्भावी तत्व है। जहाँ संघर्ष नहीं, वहाँ जीवन का आनन्द नहीं। रोजमर्रा की सुविधाओं में हम इतने लिप्त हैं कि हल्का सा अभाव हमारे संघर्ष की प्रकिृया को जटिल बना देता है। इसका प्रभाव दो तरह से पड़ता है - सकारात्मक और नकारात्मक। यदि संघर्ष हमें उदार, विनम्र और परिश्रमी बना देता है, तो इसे सकारात्मक प्रभाव कहा जाएगा। इसके विपरीत संघर्ष हमें तोड़ देता है, तो हम कमजोर हो जाते हैं। मनोवैज्ञानिकों के अनुसार विपरीत स्थितियों को अनुकूल करने का प्रयत्न करना ही संघर्ष है, लेकिन इसके साथ विश्वास का होना आवश्यक है। विश्वास संघर्ष की थकान को महसूस नहीं होने देता। यह एक सकारात्मक ऊर्जा से भर देता है। इसलिए संघर्ष के दौर में अपनी मेहनत पर आस्था रखनी चाहिए। साथ में ईश्वर से प्रार्थना से मिली शान्ति और संगी-साथी की सराहना मिल जाए, तो  क्या कहने। अनेक उद्योगपति, राजनेता और समाजसेवकों ने भीषण संघर्ष करते हुए अपने दिन गुजारे पर उनका विश्वास ही उनकी प्रेरणा बना। लाल बहादुर शास्त्री और राजेन्द्र प्रसाद जैसे महापुरूषों ने अभावों से संघर्ष करते हुए जीवन की गरिमा को पहचाना था। वस्तुतः इनके लिए जीवन और संघर्ष एक-दूसरे के पर्याय थे।
वास्तव में संघर्षमय जीवन में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है। जैसे आंच में तप कर सोना कुन्दन बनता है वैसे मनुष्य भी संघर्ष की आंच में तपकर मनुष्य बनता है। उसमें जीवनोपयोगी गुणों का विकास होता है, जो उसे परिवार, समाज और राष्ट्र के लिए उपयोगी बनाते हैं।
संघर्ष के बाद सफलता मिलती है, जो हमें, खुशी प्रदान करती है। चुनौती को स्वीकार किए बगैर जीतना असम्भव है। इसलिए संघर्ष दुख नहीं, दुख से बाहर आने का प्रयास है। तो क्यों न संघर्ष को आनन्द का उद्गम कहा जाए।