Thursday, July 23, 2015

जमुरिया नदी-यात्रा - रामबदन दुबे

जमुरिया नदी गोमती की सहायक नदी रेठ की एकमात्र सहायक नदी है। जमुरिया और रेठ दोनों ही नदियाँ बाराबंकी के नवावगंज तहसील में बहती हैं। जमुरिया अपने उद्गम स्थल डमौर से टेढ़े और घुमावदार 15-16 किमी॰ मार्ग से प्रवाहित होती हुई बाराबंकी शहर के बीच से होकर जगनेहटा गांव में रेठ का आलिंगन कर उसी में विलीन हो जाती है।
भार शिव राजा जस द्वारा 10वीं शताब्दी के पूर्व बसाया गया जलनौल नगर अनेको ऐतिहासिक घटनाओं से रूबरू होता हुआ लगभग 200 वर्षो से अधिक समय से बाराबंकी कहलाता है।
घाघरा और गोमती तथा बीच में कल्याणी और जमुरिया सहित रेठ के पानी से सिंचित बाराबंकी में आज भूमिगत जल स्तर चिन्ता का विषय बन गया है। वर्तमान में मेन्था, गन्ना, धान और गंेहू की व्यापक पैमाने पर खेती होती है। पूरे जिले में सिंचित भूमि 84.2 प्रतिशत है जिसमे 69 प्रतिशत भूमि की सिंचाई प्राइवेट नलकूपों से होती है। पाँच फसल प्रतिवर्ष लेने के प्रयास र्में यहाँ के भूमिगत जल का अनियन्त्रित दोहन धड़ल्ले से किया जा रहा है। झीलों, तालाबों, नदी के बहाव क्षेत्र अतिक्रमण के शिकार हैं।
कभी नवावगंज तहसील में 7 प्रतिशत क्षेत्रफल पूर्ण रूपेण जल क्षेत्र होता था। वर्षाकालीन एकत्रित जल संग्रहण से जमुरिया और रेठ तथा कुओं में सर्वदा वर्ष पर्यन्त जल भरा रहता था। लेकिन अनियोजित विकास के दौर में अदूरदर्शी कृत्यों के कारण जमुरिया का उद्गम स्थल डमौर ही अधिकतर डमौर निवासियों के स्मृति पटल से लुप्त हो गया है। चोटिल, घायल, अतिक्रमण का शिकार 15-16 किमी॰ लम्बे बहाव वाली आज जमुरिया वर्षाकाल को छोड़कर शेष पूरे वर्ष बाराबंकी शहर की मल-मूत्र वाहक गन्दा नाला बना दी जाती है। 
लखनऊ में जूना अखाड़े के मनकामेश्वर मन्दिर मठ की पूज्य श्रीमहन्त देव्या गिरी जी की प्रेरणा व स्थानीय बाराबंकी निवासियों के सक्रिय भागीदारी से 14 जून, 2015 को चिलचिलाती धूप में जमुरिया नदी यात्रा का आयोजन लोक भारती द्वारा किया गया। 
बाराबंकी में रेठ नदी के धोविया घाट पर संकल्प

हमारी यात्रा जमुरिया के उस उद््गम स्थल से प्रारम्भ हुई जहाँ पर वह अपने ही उन भूमि जल स्रोतों को ढूढ़ रही है जिनसे निकलने वाले जल से नदी का निर्माण प्रारम्भ हुआ था। वहाँ तो आज कृषि के लिए बनाए गए खेतों का कब्जा है। 
यहाँ यह विचारणीय है कि, विश्व प्रसिद्ध गंगा के बहाव को निर्मल और अविरल बनाने में अहर्निश सेवारत जमुरिया जैसे अनेकों जल धारक और जल वाहक माध्यमों को आत्मघाती, अदूरदर्शिता वाले हाथो से निरन्तर जर्जर, क्षीण व अस्तित्व विहीन किया जा रहा है।
कुआं पूजन करते हुए महंथ देव्यागिरी जी 
सामान्य से सामान्य वुद्धि इस बात की पुष्टि करती है कि बूंद-बूंद पानी इकट्ठा होने से घड़ा भरता है, जो प्यास बुझा सकता है। जमुरिया नदी और उसका जल संग्रहण क्षेत्र वर्षाकाल और शेषकाल में वही बूँद सिद्ध होता है जिससे विशाल गंगा का घड़ा निरन्तर भरा रहता है। यदि जमुरिया नदी ही नही रहेगी तो क्या रेठ नदी गोमती में निर्मल जल दे पाएगी और जब गोमती ही लड़खड़ाती, मैला ढोती हुई अपने अस्तित्व को बचाने के संकट से जूझती रहेगी तो गंगा में निर्मल और अविरल प्रवाह क्योंकर सुनिश्चित किया जा सकता है? 
क्या गंगा  ऐसी दशा में अपने तट और मैदानी क्षेत्रों में बसने वाले लगभग 40-45 करोड़ लोगों की प्यास बुझा पाएगी? क्या उनके लिए आवश्यक खद्यान्न का उत्पादन करा पाएगी? क्या गंगा जल और सहायक नदीयों के जल पर आश्रित सम्पूर्ण पर्यावरण तन्त्र को बचाए रखा जा सकता है? आज की जमुरिया नदी ऐसे ही प्रश्नों का उत्तर माँग रही है। इन्हीं प्रश्नों के उत्तर खोजने हेतु 14 जून को जमुरिया नदी की यात्रा सैकड़ों सहयात्रियों और समर्थकों के साथ सम्पन्न की गई।
स्वच्छता, वृक्षारोपण, नदी पूजन, भगीरथ सम्मान, पवित्र तालाब संकल्प, संगोष्ठी, कुआँ पूजन, गौ पूजन इस यात्रा के प्रमुख कार्य बने। जमुरिया नदी के 8 स्थानों पर ग्रामीण समुदाय के स्त्री, पुरुष, बच्चों के बीच उनकी सहभागिता से 8 बड़े कार्यक्रम सम्पन्न किए गए।
सर्वप्रथम आलापुर में रेठ के धोबिया घाट पर 400 से अधिक लोगो की सक्रिय सहभागिता से 2 घण्टे का प्रभावी भावनात्मक कार्यक्रम सम्पन्न हुआ, जिसमें सम्पूर्ण धोबिया घाट की पक्की सीढि़यों को रेठ नदी के जल से धोकर स्वच्छ किया गया। देखते-देखते सम्पूर्ण घोबी घाट कूड़े, प्लास्टिक, अनचाही घासों-झाडि़यों, शौच के सैकड़ों ढे़रो से मुक्त हो गया। सभी ने मिलकर बटुको द्वारा वेद उच्चारण के बीच रेठ नदी का पूजन और अन्जलि में जल भर कर सन्तोें ने रेठ नदी को अविरल-निर्मल बनाने का संकल्प करवाया। तत्पश्चात् घाट तट से ऊपर खाली स्थानों पर 14 वृक्ष रोपित किए गए। पूज्य श्रीमहन्त देव्या गिरी ने सामाजिक कार्य में जुटे सभी भागीरथियों का तिलक लगाकर, अंगवस्त्र ओढ़ा कर सम्मान किया।
आलापुर धोबिया घाट से चलकर यात्रा जमुरिया नदी के उद्गम स्थल डमौर पहुची जहाँ महन्त देव्या गिरी जी द्वारा जमुरिया जल में प्रवेश कर जलान्जली और धूप पुष्पान्जली व बटुकों के सस्वर वेद मन्त्र पाठ के बीच यत्रियों व स्थानीय जनता द्वारा विधिवत पूजन व संकल्प लिया गया।
परन्तु मन में पीड़ा भी हुई क्योंकि 50-60 एकड़ से ज्यादा भूभाग में कभी जमुरिया उद्गम झील हुआ करती थी जो, लुप्त हो गई है। प्रश्नों से व्यथित हम यात्रियों को बहुत बड़ा सम्बल डम्मौर (दरहरा) गाँव के पचासों सुविचारवान भाइयों और 20-30 कर्मठ माताओं और बहनों के उत्साह, भावनात्मक और पहले से कुँआ पूजन की विधिवत तैयारी स्वरूप कार्यों ने दिया, जो त्यौहार-उत्सव मनाने जैसा दृश्य उपस्थित कर रहा था। यहाँ कुँआंें को संरक्षित और निरन्तर स्वच्छ रखकर उपयोग मे लाने का संकल्प लेने वाले का भगीरथ सम्मान पूज्य श्रीमहन्त देव्या गिरी जी द्वारा किया गया। उपस्थित महिलाओं और बहनों के बीच भूमि पर बैठ कर सरलमना महन्त देव्या गिरी जी उनके बीच घुल मिल गई। अपने हाथों से खुरदुरे सीमेण्ट की सतह पर गीली रोली से स्वास्तिक चिन्ह बनाकर कुँआ पूजन कराया। गाँव मे अन्य अन्य कुँओं के पूजन, संरक्षण और उपयोग करने वाले भागीरथों का आह्वाहन भी किया गया। तत्काल दो भागीरथों ने आगे आकर अपने-अपने नियन्त्रण वाले कुँओं को पूर्णतया स्वच्छ कराकर उपयोग में लाने के लिए वचनबद्ध और संकल्पित हुए।
लगभग यही उत्साह और तैयारी समीपवर्ती दरहरा सहित सभी आठों गाँव में भी मिली। यहाँ कुँआ पूजन के बाद मातृशक्ति ने लोक गीतों से पूजन गान किया। यहाँ एक पुराने पाकड़ के पेड़ ने जमुरिया यात्री दल समेत 40-45 लोगों को छाँव दे रखा था। भाई कृष्णानन्द राय जी पर्यावरण गीतों को भोजपुरी भाषा में सस्वर सुना रहे थे। पूज्य श्रीमहन्त देव्या गिरी जी तपती धूप में जलते कुँए की सतह पर महिलाओं के बीच घिरी हुई गीली रोली से स्वास्तिक बनाकर कुँआ पूजन करारही थीं। बटुकों के वैदिक मन्त्र पाठ सस्वर गूँज रहे थे। कुँआ संरक्षण का संकल्प लिया जा रहा था। 
लगातार 3-4 घण्टों से प्रखर धूप में सक्रिय यात्रियों का ग्रामीणों से संग काफिला हजरतपुर गाँव में पहुँचा जहाँ चिलचिलाती धूप में तीव्र प्यास व भूख मिटाने की सुन्दर व्यवस्था की गई थी। वहाँ अल्पकालिक विश्राम ने शक्ति और आनन्द के साथ सभी को तरोताजा कर दिया, अतः तत्पश्चात् विश्राम स्थल के समीप ही 3/4 एकड़ के कच्चे सरोवर को पवित्र तालाव बनाने के संकल्प के साथ  पूजन व  वृक्षारोपण कराया गया।  इस गाँव की विशेषता यह रही कि यहाँ 8 कुँओं का पूजन व संकल्प 8 अलग-अलग भगीरथों द्वारा लिया गया। 
यहाँ कई दिनों से यात्रा के स्वागत की तैयारी चल रही थी। एकाध को छोड़कर सभी कुओं को पानी से धोकर पूरी सफाई की गई थी। समीपवर्ती नालियाँ को भी साफ कर प्रवाह युक्त बनाया गया था। पूजन के बाद 8वें कुएँ पर तत्सम्बन्धित परिवार वालों ने प्रसाद स्वरूप ‘‘बताशे-मिठाई-लाई’’ मुट्ठी भर-भर कर सर्व जनोें के बीच उत्साहपूर्वक वितरित का खुशी मनाई।
अगला पड़ाव मझलेपुर गाँव में था, जहाँ स्वागत की व्यवस्था देखते ही बनती थी। आश्रम के प्रांगण में 300 से अधिक बेटियों, बहनों, मातृशक्ति ने अपने सुव्यस्थित, भारतीय संस्कृति परक स्वागत, अभिषेक से यात्रियों को उत्साह से भर दिया। यहाँ कुआ पूजन के बाद यात्रा संदीपन आश्रम होती हुई बारबंकी में स्थित .....तालाब पर गौशाला में गौ पूजन के पश्चात जमुरिया-रेठ नदी संगम स्थल जगनेहटा की ओर बढ़ चली।
सूर्यास्त होने के समय शहर के कोलाहल से दूर लेकिन जमुरिया के प्रवाह के शोर की गूँज के बीच मन्ध्यम गति से बहती रेठ नदी के घास भरे किनारे पर यात्रा अपने अन्तिम पड़ाव पर सफलतापूर्वक पूर्ण हुई। इस अवसर पर श्रीमहन्त देव्या गिरी जी ने जमुरिया के जल शोधन हेतु शासन द्वारा एस॰टी॰पी॰ निर्माण कराने का विचार रखा तथा उसके बाद जगनेहटा गांव में कुआँ पूजन व भगीरथ सम्मान द्वारा अपने कर्तव्यों के प्रति समाज को संदेश दिया।
जमुरिया यात्रा का संदेश -
1. जल ही जीवन है और कुआँ उसका स्रोत  व उसके संरक्षण का प्रतीक है। 
2. कुँआ पुनर्जीवन के माध्यम से गाँव से जुड़ने और उनको प्रेरित करने की भरपूर सम्भावना है।
2. कुँओं में हैण्डपम्प लगाकर पानी के लेना, बोेरिंग करके पानी निकालने से अच्छा है। इससे जल आवश्यकता की पूर्ति एवं कुँओं का संरक्षण दोनोें कार्य एक साथ हो सकते हैं।
3. पुराने कुँओं का उपयोग वर्षा जल सम्भरण के लिए करना, जल समस्या के निराकरण में सहायक है।
4. कुँओं के साथ गाँव में पवित्र तालाब बनाये रखने की भी आवश्यकता है। जिससे गाँव के लोगों को जल संरक्षण के प्रति संस्कार के साथ-साथ भूजल भरण में भी मदद मिलेगी।
5. वृक्षारोपण से हरियाली बढ़ेगी और हरियाली से जल व भू-जल। जल से जैव विविधता का संरक्षण संवर्धन होगा जो मानवता के लिए सहायक है।