कुछ वर्ष पूर्व एक संस्थान द्वारा कराये गये सर्वेक्षण में लोगों से शासन-प्रशासन से सम्बन्धित संस्थाओं के प्रति उनकी राय पूछी गयी थी। सर्वेक्षण के निष्कर्षों के अनुसार बिजली, पानी, टेलिफोन विभाग आदि की व्यवस्थाओं में कुछ सुधार हुआ है; पर पुलिस विभाग के बारे में लोगों की धारणा अभी खराब ही है। वे पुलिस को भारत में सर्वाधिक भ्रष्ट विभाग मानते हैं।
बचपन में हम सुनते थे कि विदेश में माँ अपने बच्चे को बताती है कि यदि कहीं रास्ता भूल जाओ तो पुलिस वालों से पूछ लेना; पर भारतीय माँ इसके विपरीत बच्चे को कहती है कि चाहे जो हो; पर पुलिस वाले के पास भी मत जाना। ऐसे ही एक स्थान पर पुलिस को वर्दीधारी डाकुओं का संगठित सरकारी गिरोह बताया गया है। प्रश्न है कि पुलिस के बारे में इतनी खराब धारणा क्यों बनी और क्या उसमें सुधार और परिवर्तन की कोई गुंजाइश है?
वस्तुतः वर्तमान पुलिस-तंत्र अंग्रेजों की देन है। उन्हें कुछ ऐसे लोगों की आवश्यकता थी, जो भारतीय जनजीवन को गहराई से जानते हों। इनके माध्यम से वे शासन के विरुद्ध हो रही गतिविधियों की सूचना प्राप्त कर उनका दमन करते थे। उन्हें जनता की सहायता करने वाली नहीं, अपितु जनता को आतंकित करने वाले तंत्र की आवश्यकता थी। इसलिए उन्होंने पुलिस तंत्र को इस प्रकार से गढ़ा कि उसे देखते ही सामान्य व्यक्ति डरने लगे।
सुना है कि दरोगा के चयन के समय सर्वप्रथम यह देखा जाता है कि वह एक मिनट में कितनी और कैसी गाली दे सकता है। भले ही यह झूठ हो; पर ऐसी मान्यताओं से पुलिस के बारे में बनी धारणा को ही बल मिलता है। अंग्रेजों के जाने के बाद भी पुलिसकर्मियों की यह मानसिकता बरकरार है। इसीलिए खाकी वर्दी से लोग आज भी डरते हैं। किसी के घर में कोई पुलिसकर्मी आने-जाने लगे, तो लोग शंकित हो उठते हैं। पुलिस वालों की दुश्मनी तो खराब है ही; पर दोस्ती उससे भी अधिक खराब है। ये कहावतें निरर्थक ही नहीं बनीं। उनके पीछे कई पीढि़यों के अनुभव विद्यमान हैं।
पर इसमें सुधार कैसे हो ? पुलिस व्यवस्था में सुधार के बारे में जितने आयोग बने, वे मुख्यतः वेतनमान, काम की अच्छी स्थिति, बच्चों की शिक्षा तथा परिजनों के स्वास्थ्य आदि के बारे में ही बोलते आये हैं। यह सब अति आवश्यक है; पर इसके साथ-साथ कुछ मूलभूत सुधार इस व्यवस्था में और भी होने चाहिए।
सर्वप्रथम तो पुलिस वालों को सेना और अर्धसैनिक बलों की भाँति सतत शारीरिक और मानसिक प्रशिक्षण मिलना चाहिए। सेना में यदि व्यक्ति मोर्चे पर नहीं है, तो उसे हर दिन अनिवार्य सामूहिक व्यायाम के लिए आना ही होता है; पर पुलिस में ऐसा कुछ नहीं है। पुलिस का जैसा काम है, उसमें ऐसा सम्भव भी नहीं है। अतः इनके स्वास्थ्य, चरित्र, आदतों के अध्ययन के लिए निर्धारित अवधि पर शिविर होने अति आवश्यक हैं। उनकी पदोन्नति और पदावनति के लिए यह भी एक आधार बनाना चाहिए।
पुलिस अधिकारी अपराध मिटाने के लिए प्रायः जनसहयोग के अभाव की शिकायत करते हैं। यह बात सत्य है; पर इसका कारण भी बहुत साफ है कि सामान्य व्यक्ति थाने और कचहरी के झंझट में फंसना नहीं चाहता। यदि व्यक्ति का नाम गुप्त रखा जाये और केवल पहली बार आने के बाद उसेे फिर परेशान न किया जाये, तो अनेक लोग अपराधियों के विरुद्ध गवाही देने को तत्पर हो जाएंगे। आज तो यह स्थिति है कि दुर्घटनाग्रस्त होकर सड़क पर कोई व्यक्ति तड़प रहा हो, तब भी कोई सहयोग नहीं करता। इसका अर्थ यह नहीं कि लोग सहयोग करना नहीं चाहते। बस वे पुलिस और न्यायालय के चक्कर काटना नहीं चाहते। सुना है अब इस बारे में कोई कानून बनने वाला है।
इससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण सुधार कार्यप्रणाली और मानसिकता में अपेक्षित है। आज तो जब तक कोई व्यक्ति थाने में आकर लिखित शिकायत न करे, तब तक पुलिस कुछ नहीं करती। दुर्घटना, हत्या, डकैती जैसे अपराधों में भले ही पुलिस अपनी ओर से कुछ कार्यवाही कर ले; पर अन्य स्थानों पर तो वह चुप ही रहती है।
पर क्या केवल पुलिस का काम लड़ाई-झगड़े के समय ही सक्रिय होना है? आप पूरे भारत में कहीं भी चले जाएं, अपने घर या दुकान के आगे अनधिकृत कब्जा किये या सरकारी जमीन पर अवैध धार्मिक या मजहबी स्थल बनाकर धंधा करने वाले अवश्य मिलेंगे। धार्मिक आयोजनों के नाम पर नींद खराब करने वाले, सामाजिक या राजनीतिक जुलूस के नाम पर यातायात ठप्प करने वाले, सड़क घेरकर अपने घरेलू कार्यक्रम करने वाले, कूड़ा बाहर फेंकने वाले पूरे भारत में मिलते हैं। सज्जन लोग इनसे परेशान भी रहते हैं; पर यक्ष प्रश्न यही है कि इनकी शिकायत कर थानों के चक्कर कौन लगाये? इसलिए पुलिस व्यवस्था में ही यह मूलभूत सुधार अपेक्षित है कि क्षेत्र में भ्रमण करते समय किसी भी तरह का गलत काम करने वाले लोगों के विरुद्ध बिना किसी शिकायत के पुलिस स्वयं कार्यवाही करे। इसके लिए स्थानीय पार्षद, ग्राम प्रधान आदि को भी जिम्मेदार बनाना होगा। स्थानीय पुलिस और नेताओं को इन अवैध कामों की जानकारी होती ही है। इसलिए ऐसे कामों के लिए केवल मुख्य अपराधी को ही नहीं, इन्हें भी जेल में डालना चाहिए।
पर केवल कानून बनाने से ही सब ठीक नहीं हो जाएगा। आवश्यकता इस बात की भी है कि सभी स्तर के पुलिस व प्रशासन के अधिकारी इनकी समय-समय पर जांच करते हुए कर्तव्य पालन न करने वालों के विरुद्ध कठोर कार्यवाही करें। यद्यपि हमारी पुलिस में जैसा राजनीतिक हस्तक्षेप और भ्रष्टाचार व्याप्त है, उससे कोई जादू की छड़ी तो नहीं घूम जाएगी; फिर भी ‘बिन शिकायत कार्यवाही’ से सुधार की दिशा तो ठीक हो ही सकती है; पर इसके नाम पर निरपराध लोगों का उत्पीड़न न हो, इसका भी ध्यान रखना होगा।
- संकटमोचन आश्रम, रामकृष्णपुरम्, 6, नई दिल्ली - 110022





