परम्परागत भारतीय जीवनशैली में ऋतुओं के आगमन का स्वागत और प्रस्थान पर मंगलकामना उत्सवों तथा पर्वों के रूप में की जाती रही है। वस्तुतः भारतीय जीवन दर्शन में प्रकृति से तादात्म्य जीवनयात्रा के अविकल तथा अविरल गतिमय चक्र के लिये सदा से आवश्यक माना गया। यही कारण है कि हमारे राष्ट्र में विकास के मूलाधार के सूत्र जीवनमूल्यों से बॅंधे थे। दुर्भाग्य से प्रगति और विकास के आधुनिक मानदण्डों ने न केवल हमारी बाह्य दृष्टि को परिवर्तित किया है, अपितु हमारी विचारधारा, हमारे व्यवहार तथा लौकिक-सामाजिक परम्पराओं के अर्थ बदल दिये हैं। फलतः ऋतुओं के स्वाभाविक चक्र, उनमें परम्परागत रूप से प्रकृति से आदान-प्रदान का सामञ्जस्यपूर्ण क्रियाकलाप तथा सामान्य जन-जीवन के सहज उल्लास में चिन्ताजनक अवरोध आया है। छोटी-छोटी बातों पर यदि दृष्टिपात किया जाये, तो बरबस मन के किसी कोने से यह प्रश्न उठता है कि - कहाॅं गए वे दिन!
आज से लगभग चालीस-पचास वर्ष पहले, अपने बचपन में 7 या 8 जुलाई को विद्यालय खुलते थे, तो प्रायः पानी बरसा करता था। बस्तों में पाॅलीथीन-बरसाती में पुस्तकें रख कर स्वयं भीगते हुये विद्यालय जाना कितना सुखद लगता था। बहुत बरसात हुई, तो सिर पर बरसाती लपेट कर निकल पड़ते थे। बरसाती पानी में भीगते, स्कूली जूतों से छपाछप करते हुए आना भी हमारे लिये खेल से कम नहीं था। यदि स्कूल आरम्भ होने के समय लगातार घोर वर्षा हुई, तो वर्षावकाश (रेनी डे) हो जाता था। रह-रह कर मेघों का गरजना, बिजली का कड़कना, काली घटाओं का घिरना, दिन में भी आकाश में अॅंधेरा छा जाना हम बच्चों के लिये पिकनिक से कम नहीं होता था। तब घरों की खिड़कियों और चैखटों पर बैठकर उन काली घटाओं को देखना और पानी के धीमा होने पर कागज की नाव बना कर बाहर के ठहरे हुए पानी में तैरा कर भाई-बहिनों से प्रतिस्पद्र्धा, कि किसकी नाव देर तक तैरती है, मन को बड़ा आनन्दित करता था। यह आनन्द यों ही नहीं होता था, अपितु ज्येष्ठ की तपती धूप और लू के थपेड़ों की गर्मी झेलने के बाद का सुख था वह। आज बहुत निर्धन वर्ग के बच्चे भी उस प्रकार स्कूल जाते नहीं दिखते। सत्र के प्रथम दिन से ही पढ़ाई के नाटक में खोता बचपन उस सुख की कल्पना भी कर सकता है? इसका समय नहीं है उनके पास।
याद आती है कालिदास के मेघदूत की प्रथम पंक्ति ‘आषाढस्य प्रथमदिवसे......’, जिसमें आषाढ के प्रथम दिन पर्वतशिखर पर वर्षा के लिये तत्पर मेघ का वर्णन है। तीस वर्ष से अधिक वय के लोगों को स्मरण होगा, कि पहले आषाढ के प्रथम दिन वर्षा अवश्य होती थी। वर्षा की पहली फुहारों से मिट्टी से उठती सोंधी गन्ध मानो वर्षा के स्वागत में व्यक्त की गई प्रसन्नता का संकेत होती थी। हमारे शरीरों पर गर्मी से चुलचुलाती पनभरी घमौरियाॅं नन्हें-नन्हें मोती के दानों सी प्रायः सबके शरीरों पर देखी जा सकती थीं। वर्षा ऋतु की पहली बरसात में घर के आॅंगन, छत या बाहर निकल कर जी भर कर स्नान न केवल आनन्ददायक होता था, बल्कि उन घमौरियों की वह औषध हुआ करती थी। हल्के हाथों से खुजला कर घमौरियाॅं फोड़ना, मुल्तानी मिट्टी लगा कर वर्षा के जल में भीग कर स्नान करना शरीर की गर्मी को शान्त करने का घरेलू उपाय हुआ करता था। उनकी सूखी पपडि़यों के निकल जाने पर पुनः नई त्वचा निकलती थी और पुनः स्निग्ध त्वचा से शरीर कान्तिमान हो जाता था। यह एक स्वाभाविक प्रक्रिया थी, प्राकृतिक उपचार की। अब सुविधाओं के अति सुलभ हो जाने तथा प्रदूषण के भय के कारण घरों में पंखा तथा कूलर तो क्या, ए0सी0 भी रहता ही है। परिणामतः घमौरियाॅं कम लोगों के शरीर पर दिखाई देती हैं। भले ही इससे हमें सुख मिलता है, किन्तु पसीने द्वारा शरीर के मलनिर्गम तथा सहज रूप में शरीर के अतिरिक्त तापमान के न निकल पाने के कारण अनेक स्वास्थ्यजन्य समस्याएॅं उत्पन्न होती रहती हैं।
हमें स्मरण हैं वे दिन, जब बादलों के दिखते ही सड़कों पर कच्छा-लॅंगोट पहने नटों के ‘काले मेघा पानी दे, पानी दे गुड़धानी दे’ के ग्राम्य स्वर गूॅंजने लगते थे, जो आसन्न वर्षा का पूर्वानुमान होता था। सड़कों पर लोट-लोट कर ईश्वर से पानी और गुड़धानी की गुहार लगाना और उनके शरीरों पर प्रत्येक घर से बाल्टी दो बाल्टी पानी डाल कर कुछ अन्न आदि का दान कर मानो लोगों द्वारा उनका उत्साहवर्द्धन तथा समर्थन सामाजिक दायित्व तथा निरभिमान सामूहिक इच्छाशक्ति का हेतु होता था। याद रहे, कि भारतीय कृषि का मूलाधार वर्षाजल है तथा वर्षा के पश्चात् होने वाली मुख्य फसल, खरीफ, ईख, धान और शारदीय फसलें जल के विना किसी दशा में प्राप्त नहीं हो सकतीं। आज शायद ही कहीं ‘काले मेघा’ दिखाई देते हों।
मुझे ध्यान आता है, कि पहले कभी यात्रा करते समय सड़कों के दोंनों ओर तोरण द्वार का आकार बनाते वृक्षों की फैली हुई शाखायें छाया तो प्रदान ही करती थीं, आवश्यकता पड़ने पर मीठे फलों का स्वाद भी लिया जा सकता था, क्योंकि अधिकतर आम, जामुन फलदार वृक्ष मार्गों के दोनों ओर लगाए जाते थे। तब वृक्षों के स्वामी किसी अपरिचित को भी अपने वृक्ष के फल खिला कर सन्तुष्टि और प्रसन्नता का अनुभव करते थे। आज क्या कोई अपरिचित किसी के वृक्ष से उसके सामने फल तोड़ने का साहस कर सकता है! बीच-बीच में स्वच्छ जल से भरे तडागों और कूपों के निर्मल जल से प्यास बुछाना पथिकों के लिये दुर्लभ नहीं होता था। सड़कों के किनारे स्थित खेतों में काम करते कृषकों तथा हरे-भरे खेत देखते-देखते कब यात्रा पूर्ण हो जाती थी, पता नहीं चलता था। वर्तमान समय में राजमार्गों पर छायादार वृक्षों का स्थान प्रायः व्यावसायिक यूक्लिप्टस ने ले लिया है, जो न केवल छायाहीन होते हैं, अपितु धरती के गर्भ से अत्यधिक जल का अवशोषण कर जलस्तर को निम्न करने में कारणभूत होते हैं।
वर्षा जीवन तथा उसके लिये आहार देने वाली ऋतु है। इस दृष्टि से जब याद आते हैं वे दिन, तो फलों के राजा आम की चर्चा के विना रहा नहीं जा सकता। यद्यपि पहले भी आम की बहुत सी प्रजातियाँ हुआ करती थीं, किन्तु तुकमी देशी आम का तो एकछत्र साम्राज्य होता था। तब आज की भाँति दशहरी का बोलबाला नहीं था, अपितु गरमी आरम्भ होते ही ताजी कच्ची अमियों की चटनी और पना हर घर के भोजन का हिस्सा बनकर उसकी की शोभा बढ़ाते थे। दाल में कच्चे आम का ठोकरा बड़ा स्वादिष्ट लगता था। बरसात आरम्भ होने के साथ ही देशी आमों से लदे वृक्ष आमन्त्रण देने लगते थे। गाँवों के बाग-बगीचों तथा नगरों की हाट-बाज़ारों में देशी आम के ढेर ही ढेर दिखाई देते थे। पेड़ों से पक कर टूटे ताजे सुपाच्य आमों को पानी भरी बाल्टी में कुछ देर रख कर उनकी गर्मी निकाल कर चूसना बूढ़ों-बच्चों सबको रुचिकर लगता था। कितने ही आम चूस कर भी अपच नहीं होती थी, जबकि स्वादिष्ट दशहरी की गरिष्ठता के भय से हर व्यक्ति दस बारह आम नहीं खा सकता। टबका के रस से रोटी का स्वाद जिसने चखा होगा, उसे आज भी वह स्मरण होगा। दादी-नानी बड़े-बड़े कठौतों में आमों का गाढ़ा रस निकाल कर मोटी चादर पर फैलाकर सुखाया करती थीं, जो सूख कर अमरस कहलाता था। वर्षा के बाद भी अमरस के रूप में खटमिट्ठे आमों का स्वाद अविस्मरणीय होता था। प्रत्येक घर में कम से कम एक आम तथा नीम का पेड़ अवश्य होता था। आम की ऋतु में गाँव-घरों में ‘अपने पेड़’ के आम खिलाने में लोगों की रुचि तथा भावना सामान्य होती थी। वर्षा के आते ही घरों के बाहर बहुत सी जंगली जड़ी-बूटियाँ उग आती थीं, जिनकी पहचान प्रायः सभी महिलाओं को होती थी। शिशु को अतिसार हो गया हो या उदरपीड़ा, माताएँ इन जड़ी-बूटियों से उपचार कर लिया करती थीं। भटकट और मकोय जैसे पादप बड़े उपयोगी होते थे। आज विशेषतः नगरों में वे जड़ी-बूटियाँ न तो सुलभ हैं और न माताओं को उनकी पहचान। बल्कि, क्या नगर, क्या गाँव, एलोपैथिक चिकित्सा में विश्वास के कारण उन वनौषधियों को कोई अपने बच्चों को देना भी नहीं चाहता।
जैसा कि हमने चर्चा की कि वर्षा जीवन देने वाली ऋतु है। स्मृति में आती हैं वर्षा के समय हरी-हरी घास पर रेंगती वे मखमली लाल रंग की सुन्दर वीरबहूटियाँ, वृक्षों की फुनगियों पर चहचहाती चिडि़याँ, धरती पर रेंगते केचुए और पोखर-तालाबों के रुके हुये जल में उत्पन्न कीड़े मकोड़े, टर्-टर् करते मेढक, झंकार करते झींगुर, रात में चल दीपों से जगमगाते जुगनू, जो जीवन में उल्लास तो भरते ही थे, जैविक चक्र के नियन्त्रण में प्रकृति के सहायक भी होते थे। आज न तो वह रेंगती हुई लाल मखमल दिखती है, न चिडि़यों की चहचहाहट सुनाई देती है और न जुगनुओं का वह प्रकाश दिखाई देता है, जिन्हें देखकर ही शायद किसी कवि ने जुगनुओं से आज के कवियों की तुलना करते हुये कहा होगा- ‘‘अब के कवि खद्योत सम जहँ-तहँ करत प्रकास’’। बरसाती कीड़ों को खा कर मेढक पर्यावरण को स्वच्छ रखने में महत्त्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह करते थे। अब पहले जैसी संख्या में मेढक भी नहीं निकलते, क्योंकि वर्षाचक्र अनियमित हो गया है।
आषाढ की परेवा को वर्षा का आरम्भ और आषाढी पूर्णिमा से विधिवत् वर्षा का स्वागत विभिन्न पर्वों के रूप में साकार होने लगता था। सावन के आते ही पुराने वृक्षों की मोटी-मोटी डालों पर बड़े-बड़े पटरों को मजबूत रस्सी से बाँध कर झूले पड़ने लगते थे, जो पूरे सावन पड़े रहते थे। गाँव-घर और मुहल्लों की बालिकाएँ व महिलाएँ अवसर मिलते ही पहुँच जाती थीं, झूलों पर। एक साथ एक-दूसरे को पकड़ कर बैठना परिचित-अपरिचित का भेद मिटाकर, अनजाने ही परस्पर सुरक्षा और अपनेपन का भाव जगाता था। दोनों ओर से नवयुवक झूलों पर चढ़ कर पैंग मारते थे। रिमझिम फुहारों के बीच उन पैंगों से आकाश को छूते झूलों पर बैठे लोगों के कण्ठ से निकले कजरी और सावन के लोकगीतों के समवेत स्वर जिस उल्लास को व्यक्त करते थे, वह देखते ही बनता था। आज वह सब मञ्च के सामयिक लोकगीतों के कार्यक्रमों, आकाशवाणी तथा दूरदर्शन के प्रसारणों, तथा फिल्मी गीतों में सिमट गया है।
सावन के आगमन का अर्थ होता था मेंहदी की भीनी-भीनी सुगन्ध से वातावरण का सुगन्धयुक्त हो जाना। हरी-हरी मेंहदी की पत्तियों को सिल बट्टे पर पीस कर बालिकाएँ, वधुएँ तथा वृद्धाएँ सभी सींक-सलाई से हथेलियों तथा पैरों में चित्रकारी कर मेंहदी रचाती थीं। हरीतिमा से निकली लालिमा प्रकृति की कलात्मकता का कितना सुन्दर प्रमाण है। ललितकला, सौन्दर्यबोध तथा स्वास्थ्यचर्या का अद्भुत संगम होता था उसमें। ज्ञेय है, कि शीतकारक होने के कारण ग्रीष्म ऋतु में शरीरों के अन्दर व्याप्त उष्णता के अतिरेक को नियन्त्रित करने में हरी मेंहदी की औषधीय भूमिका होती थी। क्योंकि शरीर के तापमान का केन्द्र हथेलियाँ और तलवे होते हैं, इसी कारण मेंहदी भी इन्हीं दो स्थानों पर लगाने की परम्परा थी। तापमान को नियन्त्रित करने का यह प्राकृतिक तथा उल्लासप्रद उपाय हमारी परम्परा की वैज्ञानिक दृष्टि को व्यक्त करता है। आज उसका स्थान ब्यूटीपार्लरों तथा अन्य व्यावसायिक दूकानों में कृत्रिम रीति से तैयार की गई रचीली मेंहदी तथा उससे बनाई जाने वाली कलात्मक चित्रकारी ने ले लिया है। अब मेंहदी शीतलता के लिये नहीं, अपितु शौक के लिये लगवाई जती है।
इन चर्चाओं के प्रसंग में विशेष बात यह है, कि सावन के पर्वाें पर बालिकाओं व महिलाओं का विशेषाधिकार होता था। हरियाली तीज के दिन तो घर-घर में हरी चूडि़यों तथा हरी-धानी साडि़यों में सजी महिलाएँ और हरे वस्त्रों को रुचिपूर्वक पहन कर उल्लास प्रकट करती बालिकाएँ प्रकृति की हरियाली का हिस्सा बनकर परिवार का मंगलगीत बन जाया करती थीं। वर्षा में हरे रंग के प्रति यह लगाव एक ओर प्रकृति से तादात्म्य का बोध कराता था, तो दूसरी ओर प्रकृति के आर्तव नियोजन में सहायक भी होता था। कहना न होगा, कि हरा रंग ताप का अवशोषक होता है।
तीज के तीसरे दिन नागपंचमी के दिन प्रातः ही नागपूजा का दृश्य देखने को मिलता था। लोग, विशेषतः महिलाएँ घरों में दूध और कोयले से भूमि पर नागों के आकार बनाकर उनकी पूजा करतीं। फिर बाहर सड़क चैराहों पर दूध रख कर नागों से अपने परिवार की रक्षा की प्रार्थना करती थीं। स्थान-स्थान पर बीन बजाते, पेटारी में नाग लिये सँपेरे दिखने लगते थे। साँप दूध पीते हैं, या नहीं यह आज शोध तथा विवाद का विषय है, किन्तु इन परम्पराओं का तार्किक कारण भूमि की उर्वरा शक्ति को पोषण प्रदान करना होता था, जिसे धर्म समझ कर गृहस्थ जाने अनजाने प्रकृति के प्रति अपने दायित्व को निभाते थे। जहाँ एक ओर वर्षा-जल के साथ भूमि को अर्पित किया गया दूध मिट्टी के लिये पोषक तत्व होता था, वहीं बिल से निकले सर्पों तथा चींटी, मेढक आदि अन्य भूमिशय जीवों द्वारा पोली की गई मिट्टी कृषकों के लिये बड़ी उपयोगी हो जाती थी। अतः मनुष्य के इन अबोले मित्रों के प्रति कृतज्ञताज्ञापन एवं उनके पोषण का एक रूप होती थीं ये परम्पराएँ। साथ ही वर्षा में बिलों से बाहर निकले सर्प आदि अनजाने में कहीं किसी को डस न लें, इसलिये सँपेरे मानवबस्तियों में साँप पकड़ कर अथवा डसने पर उन्हें जड़ी बूटियों द्वारा तुरन्त उपचार कर अपने नैतिक दायित्व का निर्वाह करते थे। इसके बदले में उन्हें भिक्षा में द्रव्य तथा अन्न देना लोग अपना धर्म मानते थे। अस्तु! नागपंचमी की संध्या भाई-बहिनों के नाम होती थी। गोधूली के समय चैराहों पर नये वस्त्रों में सजी बालिकाएँ गेहूँ चने की घुघरी तथा हल्दी अथवा पीले रंग से रंगे वस्त्र की हस्तनिर्मित गुडि़यों को लेकर पहुँच जाती थीं। बालिकाएँ गुडि़याँ डालती थीं और बालक रंग-बिरंगी छडि़यों से उन्हें इस भावना से पीटते थे, कि उनकी ‘बहिनों’ पर कोई विपत्ति न आये। बन्धुवत्सलता का यह भावात्मक संस्कार कहीं गहरे अचेतन में बालिकाओं के प्रति बालकों की सुरक्षा सथा सम्मान की प्रवृत्ति को सुरक्षित रखता था। आज बालिकाओं के प्रति होने वाले अत्याचारों तथा क्रूरतम की कोटि में आने वाले अपराधों को देख कर याद आते हैं नागपंचमी के वे दृश्य।
इसी प्रकार रक्षाबन्धन के दिन भाई की कलाई में राखी बाँधती बहिनों के मन में भाई की दीर्घायुकामना एवं सुरक्षा का भाव होता था तथा भाई उस राखी का मूल्य हर प्रकार से बहिन की रक्षा तथा उसके प्रति न्याय का संकल्प करता था। आज राखी के मूल्य भी बदल गये हैं और यह एक औपचारिक लेन देन का पर्व बन कर रह गया है।
इतना ही नहीं, विकास तथा आधुनिकता ने हमें जहाँ पहुँचा दिया है, उसकी धुन्ध में छिप गया है हमारा अतीत। सोचती हूँ, कहाँ गए वे दिन! कभी लौट कर आयेंगे वे दिन!......





