हमारे देश के प्रायः सभी प्राचीन तीर्थस्थल नदियों के किनारे स्थित हैं। इन स्थलों पर अनेक सरकारी विभागों एवं संस्थाओं द्वारा समय-समय पर व्यापक रूप से वृक्षारोपण कार्य किया गया है। वृक्षारोपण कार्य जो बडे़ परिश्रम के साथ कराया जा रहा है, उसकी देखभाल हेतु पर्याप्त उपाय नहीं हो पा रहा है। ऐसी स्थिति में विचार आता है कि स्थानीय जनमानस द्वारा सहयोग प्राप्त करके वृक्षारोपण की सफलता सुनिश्चित की जाये। आदर्श स्थिति वह होगी जब स्थानीय जनता द्वारा स्वयं के द्वारा स्वयं के लिये वृक्षारोपण किया जायेगा। स्वामी विवेकानन्द जी ने कहा था कि भारत में जन सहयोग प्राप्त करने का सबसे प्रभावी उपाय उसे धर्म से जोड़ना है। इन बिन्दुओं को ध्यान में रखकर स्थानीय मन्दिरों के पर्यावरण विकास हेतु किये गये प्रयास (वृक्षारोपण, स्वच्छता अभियान, पाॅलीथीन मुक्ति, चढ़ाये गये फूलों का उपयोग एवं जलस्रोतों में फूलों एवं मूर्तियों के विसर्जन को हतोत्साहित करना आदि) का संक्षिप्त विवरण निम्नवत् है -
1. माँ चन्द्रिका देवी मन्दिर -
लखनऊ से लगभग 30 कि॰मी॰ दूर बख्शी का तालाब के आगे माँ चन्द्रिका देवी शक्तिपीठ परिसर स्थित है। मन्दिर समिति एवं स्थानीय लोगों के सहयोग से परिसर को पालीथीन मुक्त करने की दिशा में वर्ष-2011 में आस-पास के कुम्हारों के साथ बैठक कर कुल्हड़ आपूर्ति की व्यवस्था का गई। पालीथीन थैली के विकल्प रूप में दुकानदारों को कागज एवं वैकल्पिक थैले उपलब्ध कराये गये। प्रथम चरण में दुकानों पर पालीथीन कप के स्थान पर कुल्हड़ लाये गये तथा पालीथीन थैलियों के स्थान पर कागज एवं अन्य थैलों का प्रयोग प्रारम्भ किया गया। इस कार्य को स्थायित्व प्रदान करने के लिये स्थानीय ग्रामवासियों, मन्दिर समिति के लोगों एवं दुकानदारों को दिनाँक 28.09.2011 को नवरात्रि के प्रथम दिवस पर मन्दिर परिसर में मेरे आध्यात्मिक गुरु सन्त स्वामी महेशानन्द जी द्वारा परिसर को पालीथीन मुक्त करने की शपथ दिलाई गई। फलस्वरूप इस समय तक परिसर में दुकानों को पालीथीन मुक्त किया जा चुका है। श्रद्धालुओं एवं भक्तों द्वारा पालीथीन का प्रयोग रुकवाने एवं मेला के दिनों में बाहर से आने वालों सेे पालीथीन रुकवाने की दिशा में मन्दिर समिति के सहयोग से प्रयास जारी है।
दिनाँक 28.09.2011 को ही स्वामी जी द्वारा कृष्णवट का रोपण कर परिसर में वृक्षारोपण का शुभारम्भ कर दिया गया जो अब वृक्ष का रूप ले रहे हैं। गोमती तट पर जल भराव वाले क्षेत्र में अर्जुन का रोपण किया गया एवं मन्दिर के आस-पास पीपल, पाकड़ एवं बरगद के साथ- साथ कैथ, बड़हर एवं आमरा जैसी अनेक लुप्त हो रही प्रजातियों को रोपित किया गया। धार्मिक महत्व को देखते हुये यहाँ कल्पवृक्ष, रुद्राक्ष, सिन्दूर का भी रोपण किया गया है। सभी प्रजातियाँ न केवल जीवित हैं बल्कि अच्छी दशा में चल रही हैं।
यहाँ पर चाय आदि की दुकानों पर मिट्टी के कुल्हड़, चाट की दुकानों पर पत्तल एवं अन्य दुकानों पर कागज के थैलों का व्यापक प्रयोग किया जा रहा है। इससे वहाँ होने वाली गन्दगी में कमी आयी है। मन्दिर परिसर में चढ़ाए गए फूलों से अगरबत्ती एवं धूपबत्ती बनाने का कार्य किया जा रहा है। अन्य मन्दिर से जुड़े लोगों को दिखाकर यह कार्य अन्यत्र भी प्रारम्भ किया जाना चाहिये। यहाँ पर अनेक बार सफाई कार्यक्रम चलाया गया।
2. नैमिषारण्य -
उत्तर प्रदेश के सीतापुर जनपद में स्थित नैमिषारण्य एक प्रसिद्ध एवं प्राचीन तीर्थस्थल है। यह प्राचीन ऋषियों की तपस्थली रही है। परिक्रमा पथ पर स्थानीय लोगों एवं वन विभाग के सहयोग से 88000 ऋषियों की स्मृति में 88000 पौधों का रोपण कराया गया। दिनाँक 29 दिसम्बर, 2012 को नैमिषारण्य के प्रमुख साधु सन्त, व्यापार मण्डल के प्रतिनिधि गण एवं गणमान्य लोगों द्वारा माँ चन्द्रिका देवी मन्दिर परिसर में आकर वहाँ पर पालीथीन के विकल्प प्रयोग तथा वहाँ गोमती नदी के किनारे किये जा रहे रोपण कार्य को देखा गया। दिनाँक 27 जनवरी, 2013 को पालीथीन के विकल्प के विक्रेता के साथ मैं नैमिषारण्य पहुँचा। इस सभा में ‘पहला’ आश्रम के महन्त जी एवं अन्य कई लोगों ने पालीथीन के विकल्प के रूप में प्रयोग की जाने वाली थैलियाँ खरीदीं। दिनाँक 8 मार्च, 2013 को माँ ललिता देवी परिसर को पालीथीन मुक्त करने का आदेश रिसीवर से निर्गत होने से पालीथीन मुक्ति की दिशा में एक सार्थक प्रयास हुआ।
गोमती के तट पर श्मशानघाट के निकट वन विभाग द्वारा स्थानीय गणमान्य नागरिकों के सहयोग से भूमि का प्रस्ताव प्राप्त कर वृक्षारोपण कार्य भी प्रारम्भ कर दिया गया। यह वह भूमि है जिस पर लगातार अतिक्रमण होता जा रहा था। नदी तट स्थित इस संवेदनशील भूमि पर 05 हे॰ क्षेत्र में वन विभाग एवं स्थानीय लोगों के सहयोग से विधिवत् पौधारोपण कार्य कराया गया। इसके अतिरिक्त बालाजी मन्दिर परिसर में पंचवटी, नवग्रह वाटिका एवं नक्षत्र वाटिका की स्थापना कराई गई।
उक्त के अतिरिक्त गोमतीपार क्षेत्र स्थित पहला आश्रम की भूमि पर भी व्यापक रोपण कराया गया। नैमिषारण्य से थोड़ी दूर स्थित रुद्रावर्त मन्दिर के पास हरिशंकरी स्थापित की गई। यहाँ पर रोपित सभी पौध सुरक्षित एवं प्रफुल्लित हैं।
3. धौम्य ऋषि आश्रम, धोबियाघाट, हरदोई -
हरदोई जनपद में गोमती के तट पर स्थित धोबियाघाट एक अद्भुत स्थान है। यह दो कारणों से अद्भुत है - पहला यहाँ भूमि स अनेक पानी के स्रोते निकलते हैं जो बाद में गोमती नदी में मिलते हैं तथा दूसरा गोमती के तट पर स्थित मन्दिर के सघन वन क्षेत्र को देखकर प्राचीन आश्रमों की परिकल्पना साकार रूप लेती है। पालीथीन बन्द करने का अभियान यहाँ भी प्रारम्भ हो गया।
4. सैलानी माता मन्दिर -
लखनऊ से लगभग 20 कि॰मी॰ दूर बाराबंकी जिले में गोमती नदी के तट पर सैलानी माता का मन्दिर स्थित है। वर्ष 2014 वर्षाकाल में यहाँ पर धार्मिक महत्व के एवं लुप्त हो रही वृक्ष प्रजातियों के व्यापक पौधारोपण की योजना बनायी गयी। उक्त पौधा रोपण हेतु मन्दिर समिति द्वारा यहाँ पर रोपण हेतु वृत्ताकार खाईं खुदवाई गयी। दिनाँक 04.05.2014 को मन्दिर समिति के अध्यक्ष श्री रामदुलारे यादव एवं मन्दिर के मुख्य पुजारी श्री वासुदेव जी द्वारा रुद्राक्ष के पौधे का रोपण कर पौध रोपण का शुभारम्भ किया गया। दिनाँक 20.07.2014 को सैलानी माता मन्दिर परिसर में कल्पवृक्ष, पारिजात (हरसिंगार), हरिशंकरी (पीपल, पाकड़ एवं बरगद), कैथ, खिरनी, कनकचम्पा, मौलश्री, खैर, बड़हल, गूलर आदि प्रजातियों का रोपण किया गया।
सैलानी माता मन्दिर परिसर में माह अप्रैल-2015 में ‘‘स्मृति-वन’’ की स्थापना की गयी है जिसमें प्रबुद्ध लोगों द्वारा अपने स्मृतिशेष परिजनों के नाम पर पौधारोपण किया गया।
प्रस्तावित कार्यक्रम -
अ . सैलानी माता मन्दिर - इस परिसर मंे माह अप्रैल-2015 में स्थापित ‘स्मृति-वन’ में रोपित सभी पौधे न केवल जीवित हैं बल्कि प्रफुल्लित हैं। मई और जून-2015 की विकट गर्मी में बिना किसी सरकारी संसाधन के मन्दिर समिति द्वारा दुर्लभ प्रजाति के रोपित पौधों को लगातार सिंचाई करके बचाया गया है। इससे प्रेरित होकर वर्षाकाल-2015 में ‘स्मृति-वन’ के द्वितीय चरण के अन्तर्गत पुनः लखनऊ के प्रबुद्ध लोगों द्वारा अपने प्रियजनों की






