‘‘कर्मणो ह्यापि बोधव्यं बोध्व्यं च विकर्मणः।
अकर्मणश्च बोधव्यं गहना कर्मणो गतिः।।
‘‘अर्थांत कर्म का स्वरूप भी जानना चाहिए और अकर्म का स्वरूप भी जानना चाहिए तथा विकर्म का स्वरूप भी जानना चाहिए, क्योंकि कर्म की गति गहन है।’’
इसीलिए कहा है, जीवन विज्ञान भी है और कला भी। अतः जीवन यात्रा प्रारम्भ करते समय बहुत ही सावधानी की आवश्यकता है। क्योंकि प्रत्येक कर्म और अकर्म के अनुसार ही हमारे भावी जीवन की दिशा तय होती है।
इसे समझने के लिए एक सुन्दर कथा है। एक घने जंगल में गुजरते हुए एक यात्री को चार सुन्दर युवतियाँ मिलीं। शिष्टाचारवश उसने उन्हें अभिवादन कर अपना परिचय दिया। प्रत्युत्तर में उनमें से लम्बी छरहरी सुन्दरी आगे बढ़ी और अपना नाम ‘बुद्धि’ बताया तथा कहा मेरा निवास स्थान ‘‘मनुष्य का मस्तिष्क है।’’
फिर बहुत भली सी दिखने वाली एवं सुन्दर आँखों वाली दूसरी सुन्दरी आगे बढ़ी और उसने अपना नाम ‘लज्जा’ बताया तथा कहा ‘‘मैं मनुष्य की आँखों में शील बनकर रहती हूँ।’’ मानव स्वभाव की गरिमा, शालीनता मेरे ही कारण है।
अब लम्बे कद और सुगठित शरीर वाली तीसरी सुन्दरी ने अपना परिचय ‘साहस’ के रूप में देते हुए बताया कि मेरा सर्वविदित निवास मनुष्य का हृदय है।
अन्त में चैथी सुन्दरी जो अत्यन्त रूपवती थी, और अपने आस-पास ताजगी की हवा बिखेर रही थी। उसने बताया मेरा नाम स्वास्थ्य है और मनुष्य का पेट ही उसका निवास है। यात्री उन चारो सुन्दरियों से मिलकर बहुत प्रभावित हुआ और सबको धन्यवाद देकर घने जंगल के बीच अपनी यात्रा पर आगे बढ़ चला।
जंगल के अन्तिम छोर पर पहुँचने पर यात्री को चार युवक मिले। यात्री ने बड़ी विनम्रता पूर्वक उन्हें अभिवादन करके, अपना परिचय दिया। इस पर तराशे हुए चेहरे और घनी भौहों वाले सबसे सुन्दर नौजवान ने स्वयं को ‘‘क्रोध’ या गुस्सा बताया और कहा मै मनुष्य के मस्तिष्क में रहता हूँ। इस पर यात्री को आश्चर्य हुआ और कहा, मस्तिष्क में तो उस सुन्दरी ‘‘बुद्धि’’ ने अपना स्थान बताया था। दोनो एक स्थान पर कैसे रह सकते हो? इस पर क्रोध ने कहा, जब मैं मस्तिष्क में प्रवेश करता हूँ तो बुद्धि तत्काल वहाँ से बाहर निकल जाती है। इस उत्तर से यात्री निरूत्तर हो गया और सहमत भी दिखाई लगा।
दूसरे युवक जो स्वभाव से क्रूर व घमण्डी दिखाई पड़ रहा था, उसने अपना परिचय ‘‘लोभ’’ या ‘‘लालच’’ दिया और अपना निवास लोगों की आँखों में बताया। यात्री ने कहा, ऐसा तो लज्जा ने बताया था। इस पर ‘‘लोभ’’ बोला ‘‘हाँ, पर जैसे ही आँखों में मेरा प्रवेश होता है, बुद्धि मेरे वशीभूत हो जाती है और ‘लज्जा’ वहाँ से उडन-छू हो जाती है।
तीसरा युवक दुबला-पतला और कमजोर सा दिख रहा था। उसने अपना नाम ‘‘भय’’ और निवास मनुष्य का हृदय स्थान बताया। यात्री बोला, ‘‘वहाँ तो ‘साहस’ रहता है, तुम वहाँ कैसे रह सकते हो?’’ भय ने कहा, ‘‘आप सच कहते हो, वहाँ ‘साहस’ रहता है। पर! वह तब तक ही वहाँ रहता है, जब तक मेरा वहाँ प्रवेश नहीं होता। एक बार हृदय में भय का प्रवेश हुआ नहीं कि, ‘‘साहस’’ अन्तध्र्यान हो जाता है।
अब तक यात्री बड़ा चकरा चुका था,। बड़े संकोच के साथ उसने चैथे युवक से परिचय पूछा, जो देखने में मोटा-तगड़ा लग रहा था। उसने अपना नाम ‘‘रोग’’ बताया तथा पेट को अपना निवास बताया और कहा ‘‘अविवेक पूर्ण खान-पान और अव्यवस्थित दिनचर्या द्वारा अधिकांश लोग रोग या बीमारी का ही पेट भरते रहते हैं, जिससे अपने आप ‘स्वास्थ्य’ को वह अपने स्थान से हटा देता है।’’
इस कहानी का संदेश स्पष्ट है - जब हम अपने कर्तव्य को भूलकर अकर्तव्य के वशीभूत हो जाते हैं, तो हमारे जीवन के सभी मानवीय सद्गुण और आनन्द विलुप्त होने लगते हैं और उनका स्थान लिए अकर्तव्य हमारे दुखों का कारण बनते हैं।
इसीलिए कहा गया है, ‘‘कर्तव्य के साथ रहो, आनन्द के साथ रहो।’’





