बन वीर स्वदेश से प्रेम करो,
रण-प्रांगण से रिपु मार भगाओ।
धन-धान्य भरो शुचि सौख्य लहो,
हर गेह में स्वर्ण व रत्न सजाओ।।
गुरू भारत देश बने फिर से,
जग-मध्य पुनीत मशाल जलाओ।
नव शोध ‘अबोध’ जवान करें,
समता सुविचार सदा अपनाओ।। (1)
प्रिय! योग करो तन-रोग भगें,
बलवान व पुष्ट शरीर दृढ़ाओ।
मत औषधि का उपयोग करो,
कर योग सभी निज स्वास्थ्य बनाओ।।
अब योग में धर्म समाज व वर्ग को
बाधक बन्धु कभी न बनाओ।
गहो हर क्षेत्र में जीत सदा,
ध्वज भारत का जग में लहराओ।। (2)
अनुराग - तड़ाग करो अवगाहन,
प्रेम पुनीत महान बड़ा है।
नित द्वैष कलेश बढ़ा तम तोम-
लिए विपदा अब द्वार खड़ा है।।
जग में प्रिय! प्रेम जिसे उसका,
भगवान सहायक ही तगड़ा है।
सुख भोग ‘अबोध’ वही करता,
जिसके मन प्रेम सनेह बड़ा है।। (3)
- ‘चन्द्रा-मण्डप’ 370/27 हाता नूरबेग,
संगम लाला बीथिका, सआदतगंज, लखनऊ-03
रण-प्रांगण से रिपु मार भगाओ।
धन-धान्य भरो शुचि सौख्य लहो,
हर गेह में स्वर्ण व रत्न सजाओ।।
गुरू भारत देश बने फिर से,
जग-मध्य पुनीत मशाल जलाओ।
नव शोध ‘अबोध’ जवान करें,
समता सुविचार सदा अपनाओ।। (1)
प्रिय! योग करो तन-रोग भगें,
बलवान व पुष्ट शरीर दृढ़ाओ।
मत औषधि का उपयोग करो,
कर योग सभी निज स्वास्थ्य बनाओ।।
अब योग में धर्म समाज व वर्ग को
बाधक बन्धु कभी न बनाओ।
गहो हर क्षेत्र में जीत सदा,
ध्वज भारत का जग में लहराओ।। (2)
अनुराग - तड़ाग करो अवगाहन,
प्रेम पुनीत महान बड़ा है।
नित द्वैष कलेश बढ़ा तम तोम-
लिए विपदा अब द्वार खड़ा है।।
जग में प्रिय! प्रेम जिसे उसका,
भगवान सहायक ही तगड़ा है।
सुख भोग ‘अबोध’ वही करता,
जिसके मन प्रेम सनेह बड़ा है।। (3)
- ‘चन्द्रा-मण्डप’ 370/27 हाता नूरबेग,
संगम लाला बीथिका, सआदतगंज, लखनऊ-03





