सृष्टि के रचना के साथ ही पृथ्वी पर जीवन सम्भव हो, इस हेतु विधाता ने अनेक चीजें उत्पन्न की, जिसको एक शब्द में व्यक्त करें तो उसका नाम ‘‘प्रकृति’ है। जिन तत्वों से प्रकृति का निर्माण हुआ उन्हीं तत्वों से मानव शरीर का निर्माण हुआ है। जहाँ सृष्टि के निर्माण में अग्नि, जल, वायु, पृथ्वी, आकाश तत्वों का समावेश है। वहीं मानव शरीर भी उन्हीं से बना है। इसे गोस्वामी तुलसी दास ने राम चरित मानस में भी लिखा है:-
छिति जल पावक गगन समीरा,
पंच रचित यह अधम शरीरा।।
(किस्किन्धा काण्ड -11)
इसलिए यह सृष्टि तथा मानव शरीर सुचारू तथा ढ़ंग से कार्य करें इसके लिए आवश्यक है कि प्रभु के द्वारा बनाए गए इस पृथ्वी के साथ उत्पन्न चीजों को जिसमें नदी, वन, पर्वत, भू-भाग (भूमि), वायु, जल का हम उतना ही उपयोग करें जितना आवश्यक है। साथ ही यह भी प्रयास होता रहे कि इसका संरक्षण एवं संवर्धन होता रहे ताकि आने वाले समय में यह प्रचुर एवं शुद्ध रूप से उपलब्ध हों, क्योंकि यह अकाट्य सत्य है कि इसके बिना जीवन सम्भव ही नहीं हो सकता है। इनमें से किसी तत्व की कमी या दूषित होने से मानव जीवन सीधे प्रभावित होगा।
वर्तमान भौतिकवादी व्यवस्था में प्रकृति का जो दोहन व शोषण हो रहा है, उसके परिणाम स्वरूप पर्यावरणीय गम्भीर संकट उत्पन्न होता जा रहा है। उनमे वनों के अत्यधिक कटने से शुद्ध वायु की कमी व वर्षा का कम होना, असमय होना, अत्यधिक होना तथा उद्योगों के अन्धाधुन्ध अनियोजित विकास व उसके द्वारा उत्पन्न धुआँ-धूल से वायु प्रदूषण व अन्य उत्सर्जन से जल प्रदूषण, नदी प्रदूषण हो रहा है। वहीं शहर, कस्बों के नालों का पानी भी नदियों को प्रदूषित करता है। इसके साथ ही प्रदूषण के अन्य कारकों में नदियों के किनारे की मिट्टी तथा वनों का कम होना, मनुष्यों द्वारा जल में सीधे विसर्जित किए जाने वाले शव, मूर्तियाँ, पूजन सामग्री, कपड़ों का धोना आदि प्रमुख रूप से जिम्मेदार हैं।
अनेकानेक शोधों व खोजों से यह ज्ञात हो रहा है कि वर्तमान समय में पर्यावरणीय प्रदूषण भयंकर रूप लेता जा रहा है। जोकि न सिर्फ वर्तमान मानव जीवन को प्रभावित कर रहा है, बल्कि आने वाली पीढि़यों के लिए एक चुनौती के रूप में प्रकट हो रहा है, जो प्रमुखतया ग्लोबल वार्मिंग, तापमान का बढ़ना, ऋतु चक्र में परिवर्तन आदि के रूप में देखने को मिल रहा है।
इसलिए हमारा सामाजिक तथा नैतिक कर्तव्य बनता है कि हम अपने जीवन जीने की पद्यति में या दिनचर्या में कुछ ऐसा करें जिससे जल, वायु, मिट्टी, खनिज, ईंधन आदि का कम से कम उपयोग हो। जिससेे इनकी बचत भी होगी तथा प्रदूषण में भी कमी आयेगी। साथ ही उपयोग करते समय भी यह ध्यान रहे कि प्रदूषण से कैसे बचाव हो सकता है एवं पर्यावरण का संरक्षण-संवर्धन कैसे होता रहे।
भारत वर्ष कृषि प्रधान देश है और असली भारत गांँव में बसता है, जिसकी 60 प्रतिशत के लगभग जनसंख्या गाँवों में रहती है। आज भी कृषि करने वाले लोग प्रकृति पर निर्भर रहते हैं, अतः वर्षा का कम होना या नहीं होना, अधिक होना या असमय होना हमारे कृषि कार्य को सीधे प्रभावित करती है।
इसके साथ ही वर्षा काल में प्रमुखतया वानिकी, जल संचयन, संरक्षण, मिट्टी को कटने-बहने से रोकने व मिट्टी का शोधन आदि कायों के साथ-साथ कीट-पतंगों, जीव-जन्तुओं का भी प्रजनन होता है, जो प्रकृति के महत्वपूर्ण अंग हैं। स्मरणीय यह है कि, उपरोक्त पर्यावरणीय कार्य बरसा काल में ही हो सकता है, इसीलिए कहा है कि -
‘‘का बरसा जब कृषी सुखानी,
समय चूकि पुनि का पछितानी।’’
अतः बिना चूके, दूसरों को जागरुक करते हुए इस वर्षा काल में हम कुछ ऐसा करें जिससे मनुष्य तथा प्रकृति का सुखद साथ आने वाले समय में मिलता रहे।





