Thursday, July 23, 2015

अपने परिवेश को भी समझो - डाॅ॰ सुरचना त्रिवेदी

कोई भक्त राजा एक महात्मा की पर्णकुटी पर जाया करते थे। उन्होंने एक बार महात्मा को अपने महल  में पधारने के लिए कहा, पर महात्मा ने यह कह कर टाल दिया कि ‘मुझे तुम्हारे महल में बड़ी दुर्गन्ध आती है इसलिए मैं नहीं जा सकता। राजा को बड़ा आश्चर्य हुआ। उन्होंने मन ही मन सोचा - ‘महल में तो इत्र-फूलेल छिड़का रहता है, वहाँ दुर्गन्ध का क्या काम। महात्मा जी कैसे कहते हैं? पता नहीं! ....... राजा ने फिर संकोच में कुछ नहीं कहा। एक दिन महात्मा जी राजा को लेकर साथ घूमने निकले, घूमते-घूमते वह एक मलिन बस्ती में पहुँच गए ओैर वहाँ एक पीपल वृक्ष की छाया में खड़े हो गए। उस बस्ती के लगभग हर घर में कहीं चमड़ा कमाया जा रहा था, कहीं सूख रहा था और कहीं ताजा चमड़ा तैयार किया जा जा रहा था...... हर घर में चमड़ा था और उसमें से बड़ी दुर्गन्ध आ रही थी। हवा के साथ आती दुर्गन्ध से राजा परेशान हो गए। उन्होंने महात्मा जी से कहा......भगवन! दुर्गन्ध के मारेे खड़ा नहीं रहा जाता, जल्दी चलिए।’ महात्मा जी बोले - ‘तुम्हीं को दुर्गन्ध आती है।’ देखो इन घरों की ओर - कितने पुरुष, महिलाएँ और बाल-बच्चे हैं, कोई काम कर रहे हैं, कोई हंस-खेल रहे हैं। किसी को तो दुर्गन्ध नहीं आती, फिर तुम्हीं को क्यों आने लगी?
राजा ने कहा - ‘चमड़ा कमाते-कमाते तथा चमड़े में रहते-रहते इनका अभ्यास हो गया है। इनकी नाक ही ऐसी हो गई है कि इन्हें चमड़े की दुर्गन्ध नहीं आती, पर मैं तो इसका अभ्यासी नहीं हूँ। जल्दी चलिए, अब तो एक क्षण भी यहांँ रूका नहीं जाता।’’....महात्मा ने हँस कर कहा - ‘‘भाई! यही हाल तुम्हारे राज महल का भी है। विषय-भोगों में रहते-रहते तुम्हें उसमें दुर्गन्ध नहीं आती,.... तुम्हारा अभ्यास हो गया है, पर मुझको तो विषय देखते ही उल्टी सी आती है। इसी से मैं तुम्हारे महल में नहीं जाता था।’’ राजा ने रहस्य समझ लिया कि विषय-वासनाओं में दुर्गन्ध है। महात्मा हँसकर राजा को साथ लिए वहाँ से चल दिए।
- असिस्टेन्ट प्रोफेसर संस्कृत, आर्यकन्या स्नातक महाविद्यालय, लखीमपुर।