Thursday, July 23, 2015

आसन, प्राणायाम एवं ध्यान- डाॅ॰ अंजलि सिंह

‘21 जून 2015’ प्रथम विश्व योग दिवस के रूप में मनाया गया, यह बात हम सभी भारतीयों के लिए गर्व का विषय है। इस उपलक्ष्य में मेरा आप सभी पाठकों से यह अनुरोध है कि आज जब सम्पूर्ण विश्व योग के महत्व को स्वीकार कर रहा है तो हमें भी अपनी व्यस्त दिनचर्या में से कुछ समय योग-साधना हेतु अवश्य ही निकलना चाहिए। योग शब्द का अर्थ होता है जोड़ तथा शरीर, श्वास एवं मन का संयोग, योग-साधना है।
आसन - ‘योगासन’ शारीरिक क्रियामात्र नहीं है योगासन, साँस के द्वारा शरीर के अंदर, मन की यात्रा है, योगासन क्रिया में यदि मन और सांसों का योग न हो तो वह क्रिया किसी भी आम कर्म के समान ही रहेगी अपितु साँस के माध्यम से जब मन, शरीर की क्रियाओं को देखता है तो योग क्रिया का प्रभाव सहस्त्र गुना बढ़ जाता है। शरीर के प्रत्येक अंग के लिए भिन्न-भिन्न आसन होते हैं। तीन माह से अधिक एक स्वस्थ बच्चे को यदि हम देखें तो उसकी बाल सुलभ क्रियाओं में अनेक योग-क्रियाएँ होती हैं योग-क्रिया करने के पूर्व स्नानादि नित्य क्रियाओं से निवृत्त हो जाना वांछनीय है, योगासन हेतु प्रातःकाल की बेला सर्वथा सुयोग्य है। योग-क्रिया के उपरान्त ध्यान करने से व्यक्ति पर योग का प्रभाव अतुलनीय होता है।
प्राणायाम - प्राणायाम अर्थात् अपनी प्राण उर्जा को आयाम प्रदान करना है। श्वांस ही हमारी प्राण उर्जा है तथा श्वांस को साधना ही प्राणायाम है। यदि हम किसी रुग्ण व्यक्ति की श्वांसों पर ध्यान दें तो वह उच्छ्वास (छोटी सांसे मुँह से) लेता हुआ दिखेगा और जब हमें क्रोध आता है तो हमारी सांसे तेज एवं उखड़ी सी होती हैं। कहने का तात्पर्य यह है कि बीमारी एवं क्रोध दोनों ही अवस्थाओं में हम सामान्य सांसे नहीं लेते तथा हमारी ऊर्जा क्षीण होती है। इसके स्थान पर यदि हम आनन्द के पलों का स्मरण करें तो हमारी सांसे लम्बी गहरी होती हैं और हमारा शरीर ऊर्जावान होता है। श्वांस (प्राण) की गति को आयाम प्रदान करने की क्रिया ही प्राणायाम है यदि सांसों का प्रभाव अपने आप पर और अच्छे से समझना है तो याद करिये कि क्रोध के समय आपकी मुख मुद्रा कैसी हो जाती है? जब हम दुखी होते हैं तो हमारी प्राण ऊर्जा और भी कम हो जाती है। एक तथ्य उल्लेखनीय है कि हम अपने फेफड़ें का मात्र 30 प्रतिशत ही प्रयोग करते हैं, अतः जब भी कभी थकावट का एहसास हो तो लम्बी गहरी साँस ले कर प्राण ऊर्जा को बढ़ा सकते हैं। लम्बी गहरी सांसे सर्वोचित तथा सबसे सरल प्राणायाम है, जो शरीर में ऊर्जा भर देता है।
ध्यान - ‘मन अन्ते तन अन्ते नैना बसे आकास’ जीवन की सतत प्रकिृया में हमारा मन सदैव भटकता रहता है। मन की चंचलता का परिणाम है असंतुष्टि, तथा  ‘ध्यान’ चंचल मन के साथ रहने का अभ्यास है। जिस प्रकार कोई नया काम करते समय हमारा सारा ध्यान उसी कार्य में केन्द्रित हो जाता है, किन्तु नित्य क्रिया अथवा रोजमर्रा के काम करते हुए हम कुछ भी सोच रहें होते है और क्रियाएँ यंत्रवत होती हैं। जब कोई नया साधक ध्यान करने हेतु निमित्त करता है तो उसका प्रयास अपने मन को बांधकर रखने का होता है। ऐसा करने से हम ध्यान नहीं कर पाते बस निमित्त ही करते रह जाते हैं। वहीं जब हम रात्रि पहर में सोने लेटते हैं तो कुछ सोचते-सोचते नींद आ जाती हैं, अर्थात् ध्यान के लिए मन को पकड़ने के बजाये उसे स्वतंत्र छोड़ने की आवश्यकता है। मन को स्वतंत्र छोड़ देने से एक बिन्दु ऐसा आता है जब हमारा मन अपने पास वापस आने लग जाता है और हमें कोई प्रयास नही करना पड़ता, ऐसा करना बहुत सरल नहीं किन्तु किसी निश्चित समय में एक नियत स्थान पर प्रतिदिन अभ्यास करते रहने से ध्यान स्वतः ही लगने लग जाता है। प्रातः वन्दन, संध्या वन्दन की परम्परा हमारी संस्कृति में ध्यान परम्परा की साक्षी है।
इस अंक में योगासन, ध्यान, प्राणायाम का परस्पर महत्व एवं सही अर्थ स्पष्ट किया गया। इस पत्रिका के आने वाले अंकों में विभिन्न योग-क्रियाओं तथा प्राणायाम की विधि बताई जाएगी। आशा है कि यह लेख पाठकों की जिज्ञासाओं को संतुष्ट कर पायेगा। आपके योग-क्रिया, प्राणायाम तथा ध्यान सम्बन्धी प्रश्नों का स्वागत है।