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Thursday, July 23, 2015

लोक सम्मान का आगामी अँक - ‘युवा शक्ति’ विशेषाँक

इस अँक में भारत की युवा शक्ति के राष्ट्रोत्थान में योगदान सम्बन्धी विभिन्न विषयों के साथ वर्तमान में चर्चा के निम्न विषय भी रहेंगे -
1. स्किल डेवलपमेन्ट
2. डिजिटल इण्डिया
3. मेक इन इण्डिया
4. स्र्माट सिटी व स्र्माट गाँव
5. भारत युवाओं का देश
6. भारत सम्भावनाओं का देश

समाज जीवन की दो महत्वपूर्ण व्यवस्थायें कुआँ और तालाब - गोपाल उपाध्याय

प्रकृति के साथ सुन्दर समन्वय बनाते हुए जीवन जीने की कला हमारे पूर्वजों ने विकसित की और उसे दैनन्दिन संस्कारों के साथ निरन्तर जिया भी। आज जब हम कहते हैं, ‘‘जल है, तो कल है’’ या ‘‘जल ही जीवन है’’, तो अत्यन्त गर्व होता है कि, हमारे पूर्वजों ने जल के महत्व को बहुत पहले ही समझ लिया था और उसके अनुसार जल के साथ समाज का रिश्ता कैसा रहे,  इसकी उपयुक्त व्यवस्था भी बनाई और उसका घर-घर में स्वस्फूर्त पालन भी सुनिश्चिित किया।
हमारे समाज का मूल आधार परिवार है और परिवार की महत्वपूर्ण कड़ी दाम्पत्य जीवन की पवित्रता है। किसी भी भारतीय परिवार में जब विवाह संस्कार होता है, तो कन्या पूजन के साथ ही कुआँ पूजन का भी विधान है। जब तक कुआँ पूजन नहीं होता, तब तक विवाह भी सम्पन्न नहीं होता, ऐसी कुएँ के प्रति दृढ़ संस्कार व्यवस्था सुनिश्चित की गई थी। इसके कारण कुआँ स्वच्छ पेय जल स्रोत के रूप में सदैव जीवन्त रहते थे।
समय चक्र बदला, तो जहांँ व्यवस्थाओं में परिवर्तन हुआ वहीं संस्कारों की व्यवस्थायें भी केवल परम्परा बन कर रह गईं। उनके संस्कार के मूल तत्व पक्ष को भुला दिया गया। दैनन्दिनि जीवन में कँुओं का स्थान हैण्डपम्प ने ले लिया, अतः सामाजिक मानस में कुँओं की उपयोगिता घटती गई और वे पटते गए।
जल के प्रति सामाजिक संस्कार घटने से गाँवों में तालाबों के साथ भी कुँओं जैसा ही व्यवहार होने लगा और वह पटते-कटते-घटते व सिमटते चले गए। परिणामतः वर्षा जल का संचयन होना बन्द हो गया और भू-गर्भ जल स्तर घटने लगा, सोते और छोटी नदियाँ सूख र्गइंं। भयावह जल संकट खड़ा होता दिखाई देने लगा।
लोक भारती द्वारा गोमती अलख यात्रा-2015 के समय उपरोक्त विसंगतियों को निकट से देखा समझा गया और उसके अनुसार समाजिक सरोकार के साथ जल समस्या समाधान हेतु ‘‘जीवन्त कुआँ और पवित्र तालाब’’ सरंक्षण अभियान प्रारम्भ किया किया गया। इसमें संरक्षण के संकल्प के साथ कार्य करने वाले लोगों को समाज में प्रतिष्ठा दिलाने हेतु ‘‘भगीरथ’’ सम्मान से सम्मनित भी किया किया जाने लगा। प्रारम्भिक चरण के कुछ उदाहरण प्रस्तुत हैं -
5 जुलाई, 2015, भगीरथ सम्मान - हरदोई जिले के भरावन क्षेत्र में तुलसीपुर घाट क्षेत्र के निकट चार  कुओं का संकल्प लेने वाले उन लोगों का भगीरथ सम्मान महन्त देव्यागिरी द्वारा किया गया, जिन्होनें संकल्प लेने के बाद अपने कुओं की सफाई की और जिनमें अब पानी है। उनमें से (1) सांरगपुर गाँव के कमलेश व (2) रमेश तथा (3) राजापुर गाँव में बैजनाथ, (4) तुलसीपुर गाँव में राम रतन के नाम प्रेरणा देने योग्य संकल्पवान भगीरथों के हैं।
इस अवसर पर क्षेत्र के कर्मठ कार्यकर्ता विनोद सिंह परमार ने आगामी एक वर्ष में 51 कुओं के पुर्नजीवन का संकल्प महन्त देव्यागिरि के आशीर्वाद के साथ लिया, जो अत्यन्त प्रेरक है। इस कार्य में सहयोग श्री प्रेम शंकर अवस्थी तथा डा॰ प्रज्ञज्योति जी करेंगे।
इसके अतिरिक्त तुलसीपुर गाँव के (1) श्री विकेश सिंह, - 9044230770, छावन गाँव के (2) संतोष अवस्थी व (3) निर्मल - 9918952270 तथा राजपुर गाँव के (4) राकेश कुमार, दुल्हा नगर के (5) रजनीश कुमार, गौढ़ी गाँव के (6) ब्रजकिशोर - 8188857312 जैसे वे संकल्पवान लोग हैं जिन्हें अपना कुँआ स्वच्छ करना है।
नैमिषारण में कुओं की सफाई का उत्साहजनक परिणाम - सीतापुर जिले के प्रसिद्ध तीर्थ नैमिषारण्य के आश्रमों में श्री प्रेमशंकर अवस्थी के प्रयत्न से दो कुओं की सफाई कराई गई, जिनमें से एक ट्रक से अधिक कूड़ा-कचरा निकाला गया। यहाँ उत्साह की बात यह है कि दोनो कुओं में 20 फुट से अधिक स्वच्छ जल आ गया है।
सुल्तानपुर (कूडेभार) -  (1) अनिल पाण्डे, औदहा-कुआँ, 8423527770 (2) मोहन त्यागी, फत्तेपुर - कुआँ, 9956141140 (3) हरित सिंह, गौतमपुर,-कुआँ (4) मुरारी सिंह, कोथरा खुर्द-कुआँ (5) दिनेश कुमार, अन्तरसभा कला, 2-कुआँ एवं 1-तालाब (6) रामयज्ञ दुबे, तिवारीपुर,-तालाब, 9559478087 (7) दिनेश कुमार-2 कुआँ, 1-तालाब, 9794711621 (8) राम प्रताप दुबे, सरैया भरथी-कुआँ, 9451685868 (9) शिवाकान्त मिश्रा, अगई, कुआँ-9451176863 (10) भगवान तिवारी- तिवारीपुर - कुआँ, 9559478087 सहित कुल 12 कुआँ व 3 पवित्र तालाबों का संकल्प लिया गया।
18 कुआँ व तीन पवित्र तालाबों का संकल्प -   बाराबंकी जिले में रेठ नदी की सहायक जमुरिया नदी क्षेत्र में एकदिवसंकलित एवं एक घाट को स्वच्छ रखने का संकल्प लिया गया तथा संकल्पवान सभी लोगों को पूज्य महन्त देव्या गिरी द्वारा अंगवस्त्र भेंट कर सम्मानित किया गया, जिनका विस्तृत विवरण जमुरिया यात्रा विवरण में दिया गया है। 

तो जानौ बरखा की आस - डाॅ॰ रमेश प्रताप सिंह

लोक जीवन में कहावतों का विशिष्ट स्थान है। आम बोलचाल की भाषा में कहावतों का प्रयोग बहुतायत देखने को मिलता है। इसका प्रमुुख कारण है कि भारत की अधिकांश आबादी गाँवों में रहती है। कृषि हमारी प्रथम प्राथमिकता में आती है। इसी को दृष्टिगत रखते हुए राष्ट्र कवि सोहनलाल द्विवेदी ने लिखा भी है कि - ‘‘है अपना हिन्दुस्तान कहाँ वह बसा हमारे गाँवों में’’। गांँव के लोगों का लोक संस्कृति एवं लोक जीवन से गहरा नाता होता है। बातचीत में, तर्क-विर्तक में, प्रमाणिकता देने का उनका प्रमुख साधन लोकोक्तियाँ, मुहावरे एवं कुछ प्रमुख प्रचलित दोहे ही पर्याप्त होते हैं। घाघ, भड्डरी, गिरधर कविराय जैसे लोक प्रचलित कवियों के दम पर ही ये लोक जीवन से जुड़ी बड़ी-बड़ी बातें सिद्ध कर लिया करते हैं।
घाघ लोक कवि हैं। इनकी कहावतें शायद ही गांँव का कोई बुजुर्ग व्यक्ति हो जो न जानता हो। कृषक वर्ग तो इनकी कहवतों के आधार पर ही किसानी का भाग्य, फसल का भाग्य बता दिया करते थे। घाघ न सिर्फ किसानी-खेतीवारी के अतिरिक्त भी लोक जीवन से जुड़ी अनेक कहावतें कही हैं और समय-समय पर वे अच्छरशः सही भी साबित होती हैं। वर्षा को लेकर घाघ ने बहुत कहावतें कही हैं और वे प्रासांगिक भी हैं। कभी-कभी समाचार पत्रों में इन कहावतों का जिक्र भी होता है। मौसम विभाग ने भी इनका एक छोटा सा संकलन किया है। जैसे घाघ की एक कहावत है कि-
‘‘जेठ मास जो तपै निरासा।
तो जानौ बरखा की आसा।।’’
अर्थात यदि जेष्ठ मास में खूब गर्मी पड़े तो समझ लो वर्षा भी खूब होने वाली है। सम्भवतः यह कहावत इस वर्ष (2015) में सही साबित हो रही है। इसी तरह उन्होनें कई कहावतें वर्षा से सम्बन्धित कही हैं। जैसे -
‘‘पुरवा जब पुरवाई पावै।
सूखी नदियाँ नाव चलावे।।’’
यदि पूर्वा फाल्गुनी नक्षत्र में पुरवाई हवा चले तो इतनी वर्षा होगी कि सामान्य स्थानों पर भी नाव चलने लगेगी।
‘‘तपै मृगसिरा जोय, तब बरखा पूरन होय’’
यदि मृगसिरा नक्षत्र में खूब गर्मी पड़े तो समझो उस वर्ष वर्षा अच्छी होगी।
‘‘चढ़त जौ बरसे चित्रा, उतरत बरसे हस्त।
कितनौ राजा डाण्ड ले, हारे नही गृहस्त।।’’
यदि चित्रा नक्षत्र लगने पर और हस्त नक्षत्र के उतरने पर वर्षा होती है तो फसल इतनी अच्छी होगी कि राजा चाहे जितना कर ले किसान को देने में कष्ट नहीं होता। घाघ की ऐसी अनेक कहावतें हैं जो समय और मौसम के अनुसार सही साबित होती हैं। सन 1939 में डा॰ रामनरेश त्रिपाठी ने घाघ और भड्डरी की कहावतों का संकलन किया था, उनके संकलन में लोक प्रचलित कहावतें भी शामिल थीं। इधर कुछ छुटपुट कहावतों का भी संकलन हुआ, लेकिन उनमें प्रमाणिकता का अभाव देखने को मिला। अतः मैने इन लोक कवियों की कहावतों को बड़े परिश्रम से एकत्र किया और कई विशिष्ट विद्वानों से परख भी कराई तथा उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान नें सहजता से मेरे संकलन को ‘‘घाघ और भड्डरी की कहावतें’’ के नाम से प्रकाशित भी किया।

पर्यावरण - देवकी नन्दन ‘शान्त’

पर्यावरण के नाम पर हम एक तो हुए,
जो भी हैं अब इरादे चलो नेक तो हुए।
उठा कहीं से होगा यकीनन ये शुभ विचार,
हम ‘शान्त’ एक से चलो अनेक तो हुए।
पर्यावरण का अर्थ है,
होना प्रकृति के साथ।
जीना प्रकृति की गोद में,
सोना प्रकृति के साथ।
जल, अग्नि, वायु, माटी,
गगन के शरीर को।
हँसना प्रकृति के साथ है,
रोना प्रकृति के साथ।
वृक्षों को काटिए नहीं,
देते जो प्राण वायु।
जीता है श्वास-श्वास का कोना,
हरदम प्रकृति के साथ।
भूलों से भी न कीजिए,
कुदरत से छेड़छाड़।
अपना ये मन, ये तन-वदन,
धोना प्रकृति के साथ।
हमने तो जो भी चाहा,
प्रकृति ने दिया है ‘शान्त’।
पाया स्वभाव से है जो,
होना प्रकृति के साथ।
- ‘शान्तम्’ 10/3/2, इन्दिरा नगर, लखनऊ।

काटे जा रहे वृक्षों की पीड़ा - डाॅ॰ सुरेश पति त्रिपाठी

विकास की आँधी में आधुनिक तकनीकी से निर्माण की जा रही सड़कों के नाम पर उनके किनारे लगे वृक्षों को एक तरफ से काटा जा रहा है। कट रहे वृक्षों की पीड़ा हृदय विदारक है। गत माह में सुल्तानपुर रोड पर कई बार जाने का अवसर मिला, वहाँ देखा कि जिन सड़कों पर चलने से शीतलता मिलती थी, अब वे तप रहीं हैं। लगता है, सड़कों का सुहाग छिन गया है, उनकी उदासी मूक स्वर में रोती-बिलखती हुयी अपनी व्यथा प्रकट कर रहीं हैं। पशु-पक्षियों का आश्रय विनष्ट हो गया है।
वृक्ष प्राणवायु देते हैं, जल संरक्षण करते हैं, मिट्टी के कटाव को रोकते हैं, अतिवृष्टि-अनावृष्टि की भयावहता का शमन करते हैं, यही नहीं भूमि की उर्वरा शक्ति को बढ़ाने में वृक्षों का विशेष योगदान रहता है। डाॅ0 महेन्द्र प्रताप सिंह की कविता ‘वन और मन’ में वृक्ष कहता है-
मैं हूँ तरूवर धरा तुम्हारे,
मैं हूँ सबका सभी हमारे।
जीवों की स्वास का मैं प्रदाता,
पेड़ को स्थान्तरित करने वाली हाइड्रोलिक मशीन
फूल-फल काष्ठ औषधि का दाता।
वृक्ष जो मानव जीवन के सर्वांगीण विकास की आधार शिला है, उन्हें निर्ममता से काट कर नष्ट करना मनुष्य ही नहीं प्राणि मात्र के जीवन के लिए खतरनाक है। सड़कांे को चैड़ी करने अथवा किसी सार्वजनिक प्रतिष्ठान को स्थापित करने में यदि वृक्ष बाधा बने हुए हैं तो उन्हें नयी तकनीकी द्वारा स्थानान्तरित करने की व्यवस्था की जानी चाहिए, जिसकी सुविधा विकसित हो चुकी है। फिर भी किसी विषम परिस्थति में वृक्ष को काटना पड़े तो एक वृक्ष के स्थान पर कम से कम पाँच वृक्ष लगाने और उनके संरक्षण का संकल्प किया जाना चाहिए।
हमारी संस्कृति व परम्परायें पूर्ण वैज्ञानिक हैं जहाँ वे वृक्ष जो वायु शोधक और अधिक मात्रा में आॅक्सीजन देने वाले हैं उनकी पूजा होती है- जैसे पीपल, नीम, तुलसी आदि। इसलिए हमें खाली स्थानों पर नीम, पीपल जैसे वृक्षों को लगाने और लगे हुए वृक्षों के संरक्षण के लिए जन मानस को संस्कारित करना चाहिए।
वृक्षों के संरक्षण व संर्वधन के अभियान में लोक भारती संस्था वर्षों से लगी हुयी है जो आषाढ़ पूर्णिमा (गुरुपूर्णिमा) से सावन की हरियाली तीज तक हरियाली पखवाड़ा मनाते हुए वृक्षों का भण्डारा करती है और फलदार तथा औषधीय वृक्षों को लगाने के लिए प्रेरित करने का सफल कार्यक्रम करती है। इसीक्रम में 4 जुलाई, 2015 को गाँधी प्रतिमा (जी॰पी॰ओ॰) के सामने वृक्षों के धरने का आयोजन किया गया। यह कार्यक्रम शासन व आम नागरिकों को जागरुक करने का प्रभावी अभियान रहा। इस धरने द्वारा यह संदेश दिया गया कि वृक्ष अनुपातिक आधार पर लगाये जायें और उनकों काटने से रोका जाय, तभी जीवन स्वस्थ और सुरक्षित रह सकता है। इसकी सफलता में चन्द्र भूषण तिवारी, सन्त कबीरा, डा॰ पार्थ एवं अजय प्रकाश (हरियाली पखवारा संयोजक) सहित सैकड़ों कार्यकर्ताओं का का योगदान रहा।
वृ़क्ष धरने को सम्बोधित करते हुए मनकामेश्वर मन्दिर के श्रीमहन्त देव्या गिरी ने कहा कि ‘‘वृक्ष काटने वाले लोग पितृदोष के भागी होते हैं और वृक्ष लगाने वाले पितृ ऋण से मुक्त हो जाते हैं और घर में स्वतः समृद्धि आती है।’’ समापन पर आगन्तुकों को संतों द्वारा प्रसाद रूप में पौधे दिये गये।
अंत में यह चेतावनी है कि- ‘‘‘वृक्ष हमारा जीवन है, अतः हम अपने ही हाथों अपने जीवन का विनाश न करें।’ यह हमारा कर्तव्य है कि हम वृक्षों का संरक्षण करें और हरियाली क्षेत्र बढ़ाने के लिए पौधे लगायें व दूसरों को निरन्तर प्रेरित करते रहें।
- 53 मानस विहार, सर्वोदय नगर, लखनऊ।
मोबाइल: 9415787101

रबी में गन्ने की सहफसली खेती - हिमांशु गंगवार

खेती किसानी में समस्यायें विगत कुछ वर्षों से गुणात्मक रूप से बढ़ रही हैं। लेकिन यह सभी समस्यायें मनुष्य द्वारा निर्मित हैं। मनुष्य के तीन कार्य हैं - धरती का संरक्षण, संवर्धन और सदुपयोग, लेकिन मनुष्य ने समस्त कार्य इसके विपरीत किये हैं और दुःखभोग रहे हैं। कृषि के क्षेत्र में जो भी समस्यायें किसान झेल रहे हैं वो सभी वैज्ञानिकों की ही देन हैं, जिन्होंनें प्रकृति की व्यवस्था के बिलकुल विपरीत किसानों को खेती करने की सलाह दी, जिसका परिणाम यह हुआ कि हमारा पूरा भोजन ही विषाक्त हो गया और पूरा का पूरा पर्यावरण प्रदूषित हो गया, और हमारे देश के 98.6 प्रतिशत लोग बीमार रहने लगे। लेकिन मैं यह लेख सिर्फ समस्यायें गिनाने के लिए नहीं लिख रहा हूँ, अपितु उपरोक्त सभी समस्याओं के समाधान में सहायक है।
चै मासे नही बरसते, दो मासे पानी बरसते हैं, वो भी अनिश्चित रूप से कभी एक दिन में ही इतना पानी बरस जाता है कि बाढ़ की स्थिति उत्पन्न हो जाती है और कभी-कभी पूरे समय सिर्फ फुहार ही पड़ती रहती है। लेकिन वर्तमान समस्याओं का समाधान शून्य लागत प्राकृतिक कृषि से सम्भव है। जिसमें अनावृष्टि और अतिवृष्टि, सूख और पाले से किसानों को बहुत कम नुकसान होता है और पर्यावरण भी शुद्ध होने लगता है।
इस निमित्त यहाँ पर केबल रवि के समय गन्ने की सहफसली खेती की शून्य लागत प्राकृतिक विधि प्रस्तुत है। शून्य लागत प्राकृतिक खेती की बेसिक जानकारी ‘लोक सम्मान’ के पिछले अंकों में विस्तार से दी गयी है। यहाँ पर हम यह चर्चा करेंगे कि रवी के समय बोई जाने बाली गन्ने के साथ कौन सी फसलें ले सकते हैं। जलवायु परिवर्तन के कारण बारिश उ॰प्र॰ के ज्यादा हिस्सों में अगस्त के अन्तिम सप्ताह तक ही होती और अब किसान 7-8 सितम्बर से अगैती आलू, अगैती लाही, मूंग की फसल लेते हैं। इन सभी फसलों में गन्ने की फसल ले सकते हैं, या यों कहें कि इस समय बोये गन्ने के साथ यह सभी फसले ली जा सकती हैं। 
शून्य लागत प्राकृतिक कृषि में सभी फसलें मेड़ विधि से लगायी जाती हैं। अब आलू, लाही, मटर आदि मेड़ों के ऊपर लगाते हैं तथा गन्ना नालियों में बोया जाता है। लाइन से लाइन गन्ने की दूरी 8 या 9 फीट की रखते है तथा पौधे से पौधे की दूरी 2,4,6 या 8 फीट रखते हैं। इसके बाद किसान भाई अक्टूबर माह के प्रथम सप्ताह में भी आलू, चना, मटर, मसूर, अलसी की गन्ने के साथ बुवाई कर सकते हैं।
इसके अतिरिक्त अगैती गेंहू जो कि नवम्बर के प्रथम सप्ताह में बोया जाता है उसमें भी गन्ने की फसल ली जा सकती है। इस विधि में गेंहूँ भी मेंड़ विधि से बोया जाता है। इसके साथ दलहनी, तिलहनी व मसाले वाली फसलें (चना, मटर, मसूर, सरसों, अलसी, धनियाँ, सौंफ, मेथी आदि) भी ली जा सकती हैं, जिनमें सिंचाई की बहुत कम आवश्यकता होती है। अतः जिस नाली में गन्ना बोया गया उसी में पानी देना है। बाकी नालियों में पानी नहीं देते है। आलू की फसल में भी पानी कम दिया जाता है लेकिन 10 दिन में एक बार दिया जाता है। अतः आलू के साथ गन्ने में कोई विशेष सावधानी की आवश्यकता नहीं है। इस खेती में गन्ने की नाली में वरसीम तथा खेत के चारो ओर दो लाइन अलसी बोना उपयोगी रहेगा। अलसी को कोई जानवर नहीं खाता, इसलिए खेत में जानवर घुस कर नुकसान नहीं करेंगे। वरसीम से जहां हरा चारा मिलेगा वहीं खेत में अच्छादन रहेगा जिससे घास नहीं होगी और साथ ही नाट्रोजन भी मिलेगी। गन्ने की सह फसलें जब कट जायें तो उनके स्थान पर उपयुक्त जायद की भी फसलें ली जायेंगी, जिनमें अरवी, लोबिया, मक्का, मूंग, टमाटर, प्याज एवं अन्य शब्जियाँ ली जा सकती हैं।
शून्य लागत प्राकृतिक कृषि के किसान कुछ न कुछ नया प्रयोग करते रहते हैं। अलीगढ़ के किसान श्री सुरेन्द्र सिंह ने आलू के साथ मसूर का सफल प्रयोग किया और उसी के साथ गन्ना लगाया। मेरे ग्राम कुइयाँधीर में गन्ने के साथ रबी की फसल में मटर, आलू, अलसी, गेंहूँ आदि फसलें सफलतापूर्वक ली जाती हैं। परन्तु किसानों को सहफसली का चयन अपने खेत की मिट्टी, जलवायु आदि के आधार पर 
अपने विवेक से करना चाहिए।
इस विधि से गन्नें में एक एकड़ के लिए केवल 70 गन्ने (700 गन्ने के टुकड़े) लगते हैं, जबकि सामान्य विधि से 8-10 कुन्तल गन्ना चाहिए। इस विधि में बइयर गन्ने के एक किल्ले से 10-20 किल्ले निकलते हैं, जबकि पेड़ी में 50-60 तक किल्ले निकलते हैं। अर्थात एक एकड़ में (700गुणा 50) 35000 हजार गन्नें और एक गन्ने का बजन 1.5 किलो तक होता है। सह फसलों का लाभ अलग। 
अन्तः मैं कह सकती हूँ कि किसानों और सभी मानव जाति की समस्याओं का समाधान शून्य लागत प्राकृतिक कृषि में निहित है। अधिक जानकारी के लिए इस नम्बर पर सम्पर्क कर सकते हैं (9319856993)।

जमुरिया नदी-यात्रा - रामबदन दुबे

जमुरिया नदी गोमती की सहायक नदी रेठ की एकमात्र सहायक नदी है। जमुरिया और रेठ दोनों ही नदियाँ बाराबंकी के नवावगंज तहसील में बहती हैं। जमुरिया अपने उद्गम स्थल डमौर से टेढ़े और घुमावदार 15-16 किमी॰ मार्ग से प्रवाहित होती हुई बाराबंकी शहर के बीच से होकर जगनेहटा गांव में रेठ का आलिंगन कर उसी में विलीन हो जाती है।
भार शिव राजा जस द्वारा 10वीं शताब्दी के पूर्व बसाया गया जलनौल नगर अनेको ऐतिहासिक घटनाओं से रूबरू होता हुआ लगभग 200 वर्षो से अधिक समय से बाराबंकी कहलाता है।
घाघरा और गोमती तथा बीच में कल्याणी और जमुरिया सहित रेठ के पानी से सिंचित बाराबंकी में आज भूमिगत जल स्तर चिन्ता का विषय बन गया है। वर्तमान में मेन्था, गन्ना, धान और गंेहू की व्यापक पैमाने पर खेती होती है। पूरे जिले में सिंचित भूमि 84.2 प्रतिशत है जिसमे 69 प्रतिशत भूमि की सिंचाई प्राइवेट नलकूपों से होती है। पाँच फसल प्रतिवर्ष लेने के प्रयास र्में यहाँ के भूमिगत जल का अनियन्त्रित दोहन धड़ल्ले से किया जा रहा है। झीलों, तालाबों, नदी के बहाव क्षेत्र अतिक्रमण के शिकार हैं।
कभी नवावगंज तहसील में 7 प्रतिशत क्षेत्रफल पूर्ण रूपेण जल क्षेत्र होता था। वर्षाकालीन एकत्रित जल संग्रहण से जमुरिया और रेठ तथा कुओं में सर्वदा वर्ष पर्यन्त जल भरा रहता था। लेकिन अनियोजित विकास के दौर में अदूरदर्शी कृत्यों के कारण जमुरिया का उद्गम स्थल डमौर ही अधिकतर डमौर निवासियों के स्मृति पटल से लुप्त हो गया है। चोटिल, घायल, अतिक्रमण का शिकार 15-16 किमी॰ लम्बे बहाव वाली आज जमुरिया वर्षाकाल को छोड़कर शेष पूरे वर्ष बाराबंकी शहर की मल-मूत्र वाहक गन्दा नाला बना दी जाती है। 
लखनऊ में जूना अखाड़े के मनकामेश्वर मन्दिर मठ की पूज्य श्रीमहन्त देव्या गिरी जी की प्रेरणा व स्थानीय बाराबंकी निवासियों के सक्रिय भागीदारी से 14 जून, 2015 को चिलचिलाती धूप में जमुरिया नदी यात्रा का आयोजन लोक भारती द्वारा किया गया। 
बाराबंकी में रेठ नदी के धोविया घाट पर संकल्प

हमारी यात्रा जमुरिया के उस उद््गम स्थल से प्रारम्भ हुई जहाँ पर वह अपने ही उन भूमि जल स्रोतों को ढूढ़ रही है जिनसे निकलने वाले जल से नदी का निर्माण प्रारम्भ हुआ था। वहाँ तो आज कृषि के लिए बनाए गए खेतों का कब्जा है। 
यहाँ यह विचारणीय है कि, विश्व प्रसिद्ध गंगा के बहाव को निर्मल और अविरल बनाने में अहर्निश सेवारत जमुरिया जैसे अनेकों जल धारक और जल वाहक माध्यमों को आत्मघाती, अदूरदर्शिता वाले हाथो से निरन्तर जर्जर, क्षीण व अस्तित्व विहीन किया जा रहा है।
कुआं पूजन करते हुए महंथ देव्यागिरी जी 
सामान्य से सामान्य वुद्धि इस बात की पुष्टि करती है कि बूंद-बूंद पानी इकट्ठा होने से घड़ा भरता है, जो प्यास बुझा सकता है। जमुरिया नदी और उसका जल संग्रहण क्षेत्र वर्षाकाल और शेषकाल में वही बूँद सिद्ध होता है जिससे विशाल गंगा का घड़ा निरन्तर भरा रहता है। यदि जमुरिया नदी ही नही रहेगी तो क्या रेठ नदी गोमती में निर्मल जल दे पाएगी और जब गोमती ही लड़खड़ाती, मैला ढोती हुई अपने अस्तित्व को बचाने के संकट से जूझती रहेगी तो गंगा में निर्मल और अविरल प्रवाह क्योंकर सुनिश्चित किया जा सकता है? 
क्या गंगा  ऐसी दशा में अपने तट और मैदानी क्षेत्रों में बसने वाले लगभग 40-45 करोड़ लोगों की प्यास बुझा पाएगी? क्या उनके लिए आवश्यक खद्यान्न का उत्पादन करा पाएगी? क्या गंगा जल और सहायक नदीयों के जल पर आश्रित सम्पूर्ण पर्यावरण तन्त्र को बचाए रखा जा सकता है? आज की जमुरिया नदी ऐसे ही प्रश्नों का उत्तर माँग रही है। इन्हीं प्रश्नों के उत्तर खोजने हेतु 14 जून को जमुरिया नदी की यात्रा सैकड़ों सहयात्रियों और समर्थकों के साथ सम्पन्न की गई।
स्वच्छता, वृक्षारोपण, नदी पूजन, भगीरथ सम्मान, पवित्र तालाब संकल्प, संगोष्ठी, कुआँ पूजन, गौ पूजन इस यात्रा के प्रमुख कार्य बने। जमुरिया नदी के 8 स्थानों पर ग्रामीण समुदाय के स्त्री, पुरुष, बच्चों के बीच उनकी सहभागिता से 8 बड़े कार्यक्रम सम्पन्न किए गए।
सर्वप्रथम आलापुर में रेठ के धोबिया घाट पर 400 से अधिक लोगो की सक्रिय सहभागिता से 2 घण्टे का प्रभावी भावनात्मक कार्यक्रम सम्पन्न हुआ, जिसमें सम्पूर्ण धोबिया घाट की पक्की सीढि़यों को रेठ नदी के जल से धोकर स्वच्छ किया गया। देखते-देखते सम्पूर्ण घोबी घाट कूड़े, प्लास्टिक, अनचाही घासों-झाडि़यों, शौच के सैकड़ों ढे़रो से मुक्त हो गया। सभी ने मिलकर बटुको द्वारा वेद उच्चारण के बीच रेठ नदी का पूजन और अन्जलि में जल भर कर सन्तोें ने रेठ नदी को अविरल-निर्मल बनाने का संकल्प करवाया। तत्पश्चात् घाट तट से ऊपर खाली स्थानों पर 14 वृक्ष रोपित किए गए। पूज्य श्रीमहन्त देव्या गिरी ने सामाजिक कार्य में जुटे सभी भागीरथियों का तिलक लगाकर, अंगवस्त्र ओढ़ा कर सम्मान किया।
आलापुर धोबिया घाट से चलकर यात्रा जमुरिया नदी के उद्गम स्थल डमौर पहुची जहाँ महन्त देव्या गिरी जी द्वारा जमुरिया जल में प्रवेश कर जलान्जली और धूप पुष्पान्जली व बटुकों के सस्वर वेद मन्त्र पाठ के बीच यत्रियों व स्थानीय जनता द्वारा विधिवत पूजन व संकल्प लिया गया।
परन्तु मन में पीड़ा भी हुई क्योंकि 50-60 एकड़ से ज्यादा भूभाग में कभी जमुरिया उद्गम झील हुआ करती थी जो, लुप्त हो गई है। प्रश्नों से व्यथित हम यात्रियों को बहुत बड़ा सम्बल डम्मौर (दरहरा) गाँव के पचासों सुविचारवान भाइयों और 20-30 कर्मठ माताओं और बहनों के उत्साह, भावनात्मक और पहले से कुँआ पूजन की विधिवत तैयारी स्वरूप कार्यों ने दिया, जो त्यौहार-उत्सव मनाने जैसा दृश्य उपस्थित कर रहा था। यहाँ कुँआंें को संरक्षित और निरन्तर स्वच्छ रखकर उपयोग मे लाने का संकल्प लेने वाले का भगीरथ सम्मान पूज्य श्रीमहन्त देव्या गिरी जी द्वारा किया गया। उपस्थित महिलाओं और बहनों के बीच भूमि पर बैठ कर सरलमना महन्त देव्या गिरी जी उनके बीच घुल मिल गई। अपने हाथों से खुरदुरे सीमेण्ट की सतह पर गीली रोली से स्वास्तिक चिन्ह बनाकर कुँआ पूजन कराया। गाँव मे अन्य अन्य कुँओं के पूजन, संरक्षण और उपयोग करने वाले भागीरथों का आह्वाहन भी किया गया। तत्काल दो भागीरथों ने आगे आकर अपने-अपने नियन्त्रण वाले कुँओं को पूर्णतया स्वच्छ कराकर उपयोग में लाने के लिए वचनबद्ध और संकल्पित हुए।
लगभग यही उत्साह और तैयारी समीपवर्ती दरहरा सहित सभी आठों गाँव में भी मिली। यहाँ कुँआ पूजन के बाद मातृशक्ति ने लोक गीतों से पूजन गान किया। यहाँ एक पुराने पाकड़ के पेड़ ने जमुरिया यात्री दल समेत 40-45 लोगों को छाँव दे रखा था। भाई कृष्णानन्द राय जी पर्यावरण गीतों को भोजपुरी भाषा में सस्वर सुना रहे थे। पूज्य श्रीमहन्त देव्या गिरी जी तपती धूप में जलते कुँए की सतह पर महिलाओं के बीच घिरी हुई गीली रोली से स्वास्तिक बनाकर कुँआ पूजन करारही थीं। बटुकों के वैदिक मन्त्र पाठ सस्वर गूँज रहे थे। कुँआ संरक्षण का संकल्प लिया जा रहा था। 
लगातार 3-4 घण्टों से प्रखर धूप में सक्रिय यात्रियों का ग्रामीणों से संग काफिला हजरतपुर गाँव में पहुँचा जहाँ चिलचिलाती धूप में तीव्र प्यास व भूख मिटाने की सुन्दर व्यवस्था की गई थी। वहाँ अल्पकालिक विश्राम ने शक्ति और आनन्द के साथ सभी को तरोताजा कर दिया, अतः तत्पश्चात् विश्राम स्थल के समीप ही 3/4 एकड़ के कच्चे सरोवर को पवित्र तालाव बनाने के संकल्प के साथ  पूजन व  वृक्षारोपण कराया गया।  इस गाँव की विशेषता यह रही कि यहाँ 8 कुँओं का पूजन व संकल्प 8 अलग-अलग भगीरथों द्वारा लिया गया। 
यहाँ कई दिनों से यात्रा के स्वागत की तैयारी चल रही थी। एकाध को छोड़कर सभी कुओं को पानी से धोकर पूरी सफाई की गई थी। समीपवर्ती नालियाँ को भी साफ कर प्रवाह युक्त बनाया गया था। पूजन के बाद 8वें कुएँ पर तत्सम्बन्धित परिवार वालों ने प्रसाद स्वरूप ‘‘बताशे-मिठाई-लाई’’ मुट्ठी भर-भर कर सर्व जनोें के बीच उत्साहपूर्वक वितरित का खुशी मनाई।
अगला पड़ाव मझलेपुर गाँव में था, जहाँ स्वागत की व्यवस्था देखते ही बनती थी। आश्रम के प्रांगण में 300 से अधिक बेटियों, बहनों, मातृशक्ति ने अपने सुव्यस्थित, भारतीय संस्कृति परक स्वागत, अभिषेक से यात्रियों को उत्साह से भर दिया। यहाँ कुआ पूजन के बाद यात्रा संदीपन आश्रम होती हुई बारबंकी में स्थित .....तालाब पर गौशाला में गौ पूजन के पश्चात जमुरिया-रेठ नदी संगम स्थल जगनेहटा की ओर बढ़ चली।
सूर्यास्त होने के समय शहर के कोलाहल से दूर लेकिन जमुरिया के प्रवाह के शोर की गूँज के बीच मन्ध्यम गति से बहती रेठ नदी के घास भरे किनारे पर यात्रा अपने अन्तिम पड़ाव पर सफलतापूर्वक पूर्ण हुई। इस अवसर पर श्रीमहन्त देव्या गिरी जी ने जमुरिया के जल शोधन हेतु शासन द्वारा एस॰टी॰पी॰ निर्माण कराने का विचार रखा तथा उसके बाद जगनेहटा गांव में कुआँ पूजन व भगीरथ सम्मान द्वारा अपने कर्तव्यों के प्रति समाज को संदेश दिया।
जमुरिया यात्रा का संदेश -
1. जल ही जीवन है और कुआँ उसका स्रोत  व उसके संरक्षण का प्रतीक है। 
2. कुँआ पुनर्जीवन के माध्यम से गाँव से जुड़ने और उनको प्रेरित करने की भरपूर सम्भावना है।
2. कुँओं में हैण्डपम्प लगाकर पानी के लेना, बोेरिंग करके पानी निकालने से अच्छा है। इससे जल आवश्यकता की पूर्ति एवं कुँओं का संरक्षण दोनोें कार्य एक साथ हो सकते हैं।
3. पुराने कुँओं का उपयोग वर्षा जल सम्भरण के लिए करना, जल समस्या के निराकरण में सहायक है।
4. कुँओं के साथ गाँव में पवित्र तालाब बनाये रखने की भी आवश्यकता है। जिससे गाँव के लोगों को जल संरक्षण के प्रति संस्कार के साथ-साथ भूजल भरण में भी मदद मिलेगी।
5. वृक्षारोपण से हरियाली बढ़ेगी और हरियाली से जल व भू-जल। जल से जैव विविधता का संरक्षण संवर्धन होगा जो मानवता के लिए सहायक है।

पुलिस: मानसिकता और व्यवस्था में सुधार आवश्यक - विजय कुमार

कुछ वर्ष पूर्व एक संस्थान द्वारा कराये गये सर्वेक्षण में लोगों से शासन-प्रशासन से सम्बन्धित संस्थाओं के प्रति उनकी राय पूछी गयी थी। सर्वेक्षण के निष्कर्षों के अनुसार बिजली, पानी, टेलिफोन विभाग आदि की व्यवस्थाओं में कुछ सुधार हुआ है; पर पुलिस विभाग के बारे में लोगों की धारणा अभी खराब ही है। वे पुलिस को भारत में सर्वाधिक भ्रष्ट विभाग मानते हैं।
बचपन में हम सुनते थे कि विदेश में माँ अपने बच्चे को बताती है कि यदि कहीं रास्ता भूल जाओ तो पुलिस वालों से पूछ लेना; पर भारतीय माँ इसके विपरीत बच्चे को कहती है कि चाहे जो हो; पर पुलिस वाले के पास भी मत जाना। ऐसे ही एक स्थान पर पुलिस को वर्दीधारी डाकुओं का संगठित सरकारी गिरोह बताया गया है। प्रश्न है कि पुलिस के बारे में इतनी खराब धारणा क्यों बनी और क्या उसमें सुधार और परिवर्तन की कोई गुंजाइश है?
वस्तुतः वर्तमान पुलिस-तंत्र अंग्रेजों की देन है। उन्हें कुछ ऐसे लोगों की आवश्यकता थी, जो भारतीय जनजीवन को गहराई से जानते हों। इनके माध्यम से वे शासन के विरुद्ध हो रही गतिविधियों की सूचना प्राप्त कर उनका दमन करते थे। उन्हें जनता की सहायता करने वाली नहीं, अपितु जनता को आतंकित करने वाले तंत्र की आवश्यकता थी। इसलिए उन्होंने पुलिस तंत्र को इस प्रकार से गढ़ा कि उसे देखते ही सामान्य व्यक्ति डरने लगे।
सुना है कि दरोगा के चयन के समय सर्वप्रथम यह देखा जाता है कि वह एक मिनट में कितनी और कैसी गाली दे सकता है। भले ही यह झूठ हो; पर ऐसी मान्यताओं से पुलिस के बारे में बनी धारणा को ही बल मिलता है। अंग्रेजों के जाने के बाद भी पुलिसकर्मियों की यह मानसिकता बरकरार है। इसीलिए खाकी वर्दी से लोग आज भी डरते हैं। किसी के घर में कोई पुलिसकर्मी आने-जाने लगे, तो लोग शंकित हो उठते हैं। पुलिस वालों की दुश्मनी तो खराब है ही; पर दोस्ती उससे भी अधिक खराब है। ये कहावतें निरर्थक ही नहीं बनीं। उनके पीछे कई पीढि़यों के अनुभव विद्यमान हैं।
पर इसमें सुधार कैसे हो ? पुलिस व्यवस्था में सुधार के बारे में जितने आयोग बने, वे मुख्यतः वेतनमान, काम की अच्छी स्थिति, बच्चों की शिक्षा तथा परिजनों के स्वास्थ्य आदि के बारे में ही बोलते आये हैं। यह सब अति आवश्यक है; पर इसके साथ-साथ कुछ मूलभूत सुधार इस व्यवस्था में और भी होने चाहिए।
सर्वप्रथम तो पुलिस वालों को सेना और अर्धसैनिक बलों की भाँति सतत शारीरिक और मानसिक प्रशिक्षण मिलना चाहिए। सेना में यदि व्यक्ति मोर्चे पर नहीं है, तो उसे हर दिन अनिवार्य सामूहिक व्यायाम के लिए आना ही होता है; पर पुलिस में ऐसा कुछ नहीं है। पुलिस  का जैसा काम है, उसमें ऐसा सम्भव भी नहीं है। अतः इनके स्वास्थ्य, चरित्र, आदतों के अध्ययन के लिए निर्धारित अवधि पर शिविर होने अति आवश्यक हैं। उनकी पदोन्नति और पदावनति के लिए यह भी एक आधार बनाना चाहिए।
पुलिस अधिकारी अपराध मिटाने के लिए प्रायः जनसहयोग के अभाव की शिकायत करते हैं। यह बात सत्य है; पर इसका कारण भी बहुत साफ है कि सामान्य व्यक्ति थाने और कचहरी के झंझट में फंसना नहीं चाहता। यदि व्यक्ति का नाम गुप्त रखा जाये और केवल पहली बार आने के बाद उसेे फिर परेशान न किया जाये, तो अनेक लोग अपराधियों के विरुद्ध गवाही देने को तत्पर हो जाएंगे। आज तो यह स्थिति है कि दुर्घटनाग्रस्त होकर सड़क पर कोई व्यक्ति तड़प रहा हो, तब भी कोई सहयोग नहीं करता। इसका अर्थ यह नहीं कि लोग सहयोग करना नहीं चाहते। बस वे पुलिस और न्यायालय के चक्कर काटना नहीं चाहते। सुना है अब इस बारे में कोई कानून बनने वाला है।
इससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण सुधार कार्यप्रणाली और मानसिकता में अपेक्षित है। आज तो जब तक कोई व्यक्ति थाने में आकर लिखित शिकायत न करे, तब तक पुलिस कुछ नहीं करती। दुर्घटना, हत्या, डकैती जैसे अपराधों में भले ही पुलिस अपनी ओर से कुछ कार्यवाही कर ले; पर अन्य स्थानों पर तो वह चुप ही रहती है।
पर क्या केवल पुलिस का काम लड़ाई-झगड़े के समय ही सक्रिय होना है? आप पूरे भारत में कहीं भी चले जाएं, अपने घर या दुकान के आगे अनधिकृत कब्जा किये या सरकारी जमीन पर अवैध धार्मिक या मजहबी स्थल बनाकर धंधा करने वाले अवश्य मिलेंगे। धार्मिक आयोजनों के नाम पर नींद खराब करने वाले, सामाजिक या राजनीतिक जुलूस के नाम पर यातायात ठप्प करने वाले, सड़क घेरकर अपने घरेलू कार्यक्रम करने वाले, कूड़ा बाहर फेंकने वाले पूरे भारत में मिलते हैं। सज्जन लोग इनसे परेशान भी रहते हैं; पर यक्ष प्रश्न यही है कि इनकी शिकायत कर थानों के चक्कर कौन लगाये? इसलिए पुलिस व्यवस्था में ही यह मूलभूत सुधार अपेक्षित है कि क्षेत्र में भ्रमण करते समय किसी भी तरह का गलत काम करने वाले लोगों के विरुद्ध बिना किसी शिकायत के पुलिस स्वयं कार्यवाही करे। इसके लिए स्थानीय पार्षद, ग्राम प्रधान आदि को भी जिम्मेदार बनाना होगा। स्थानीय पुलिस और नेताओं को इन अवैध कामों की जानकारी होती ही है। इसलिए ऐसे कामों के लिए केवल मुख्य अपराधी को ही नहीं, इन्हें भी जेल में डालना चाहिए।
पर केवल कानून बनाने से ही सब ठीक नहीं हो जाएगा। आवश्यकता इस बात की भी है कि सभी स्तर के पुलिस व प्रशासन के अधिकारी इनकी समय-समय पर जांच करते हुए कर्तव्य पालन न करने वालों के विरुद्ध कठोर कार्यवाही करें। यद्यपि हमारी पुलिस में जैसा राजनीतिक हस्तक्षेप और भ्रष्टाचार व्याप्त है, उससे कोई जादू की छड़ी तो नहीं घूम जाएगी; फिर भी ‘बिन शिकायत कार्यवाही’ से सुधार की दिशा तो ठीक हो ही सकती है; पर इसके नाम पर निरपराध लोगों का उत्पीड़न न हो, इसका भी ध्यान रखना होगा।
- संकटमोचन आश्रम, रामकृष्णपुरम्, 6, नई दिल्ली - 110022

जन सहभागिता से नदियों के किनारे स्थित तीर्थों पर वृक्षारोपण - डाॅ॰ महेन्द्र प्रताप सिंह

हमारे देश के प्रायः सभी प्राचीन तीर्थस्थल नदियों के किनारे स्थित हैं। इन स्थलों पर अनेक सरकारी विभागों एवं संस्थाओं द्वारा समय-समय पर व्यापक रूप से वृक्षारोपण कार्य किया गया है। वृक्षारोपण कार्य जो बडे़ परिश्रम के साथ कराया जा रहा है, उसकी देखभाल हेतु पर्याप्त उपाय नहीं हो पा रहा है। ऐसी स्थिति में विचार आता है कि स्थानीय जनमानस द्वारा सहयोग प्राप्त करके वृक्षारोपण की सफलता सुनिश्चित की जाये। आदर्श स्थिति वह होगी जब स्थानीय जनता द्वारा स्वयं के द्वारा स्वयं के लिये वृक्षारोपण किया जायेगा। स्वामी विवेकानन्द जी ने कहा था कि भारत में जन सहयोग प्राप्त करने का सबसे प्रभावी उपाय उसे धर्म से जोड़ना है। इन बिन्दुओं को ध्यान में रखकर स्थानीय मन्दिरों के पर्यावरण विकास हेतु किये गये प्रयास (वृक्षारोपण, स्वच्छता अभियान, पाॅलीथीन मुक्ति, चढ़ाये गये फूलों का उपयोग एवं जलस्रोतों में फूलों एवं मूर्तियों के विसर्जन को हतोत्साहित करना आदि) का संक्षिप्त विवरण निम्नवत् है -
1. माँ चन्द्रिका देवी मन्दिर -
लखनऊ से लगभग 30 कि॰मी॰ दूर बख्शी का तालाब के आगे माँ चन्द्रिका देवी शक्तिपीठ परिसर स्थित है। मन्दिर समिति एवं स्थानीय लोगों के सहयोग से परिसर को पालीथीन मुक्त करने की दिशा में वर्ष-2011 में आस-पास के कुम्हारों के साथ बैठक कर कुल्हड़ आपूर्ति की व्यवस्था का गई। पालीथीन थैली के विकल्प रूप में दुकानदारों को कागज एवं वैकल्पिक थैले उपलब्ध कराये गये। प्रथम चरण में दुकानों पर पालीथीन कप के स्थान पर कुल्हड़ लाये गये तथा पालीथीन थैलियों के स्थान पर कागज एवं अन्य थैलों का प्रयोग प्रारम्भ किया गया। इस कार्य को स्थायित्व प्रदान करने के लिये  स्थानीय ग्रामवासियों, मन्दिर समिति के लोगों एवं दुकानदारों को दिनाँक 28.09.2011 को नवरात्रि के प्रथम दिवस पर मन्दिर परिसर में मेरे आध्यात्मिक गुरु सन्त स्वामी महेशानन्द जी द्वारा परिसर को पालीथीन मुक्त करने की शपथ दिलाई गई। फलस्वरूप इस समय तक परिसर में दुकानों को पालीथीन मुक्त किया जा चुका है। श्रद्धालुओं एवं भक्तों द्वारा पालीथीन का प्रयोग रुकवाने एवं मेला के दिनों में बाहर से आने वालों सेे पालीथीन रुकवाने की दिशा में मन्दिर समिति के सहयोग से प्रयास जारी है।
दिनाँक 28.09.2011 को ही स्वामी जी द्वारा कृष्णवट का रोपण कर परिसर में वृक्षारोपण का शुभारम्भ कर दिया गया जो अब वृक्ष का रूप ले रहे हैं। गोमती तट पर जल भराव वाले क्षेत्र में अर्जुन का रोपण किया गया एवं मन्दिर के आस-पास पीपल, पाकड़ एवं बरगद के साथ- साथ कैथ, बड़हर एवं आमरा जैसी अनेक लुप्त हो रही प्रजातियों को रोपित किया गया। धार्मिक महत्व को देखते हुये यहाँ कल्पवृक्ष, रुद्राक्ष, सिन्दूर का भी रोपण किया गया है। सभी प्रजातियाँ न केवल जीवित हैं बल्कि अच्छी दशा में चल रही हैं।
यहाँ पर चाय आदि की दुकानों पर मिट्टी के कुल्हड़, चाट की दुकानों पर पत्तल एवं अन्य दुकानों पर कागज के थैलों का व्यापक प्रयोग किया जा रहा है। इससे वहाँ होने वाली गन्दगी में कमी आयी है। मन्दिर परिसर में चढ़ाए गए फूलों से अगरबत्ती एवं धूपबत्ती बनाने का कार्य किया जा रहा है। अन्य मन्दिर से जुड़े लोगों को दिखाकर यह कार्य अन्यत्र भी प्रारम्भ किया जाना चाहिये। यहाँ पर अनेक बार सफाई कार्यक्रम चलाया गया।
2. नैमिषारण्य -
उत्तर प्रदेश के सीतापुर जनपद में स्थित नैमिषारण्य एक प्रसिद्ध एवं प्राचीन तीर्थस्थल है। यह प्राचीन ऋषियों की तपस्थली रही है। परिक्रमा पथ पर स्थानीय लोगों एवं वन विभाग के सहयोग से 88000 ऋषियों की स्मृति में 88000 पौधों का रोपण कराया गया। दिनाँक 29 दिसम्बर, 2012 को नैमिषारण्य के प्रमुख साधु सन्त, व्यापार मण्डल के प्रतिनिधि गण एवं गणमान्य लोगों द्वारा माँ चन्द्रिका देवी मन्दिर परिसर में आकर वहाँ पर पालीथीन के विकल्प प्रयोग तथा वहाँ गोमती नदी के किनारे किये जा रहे रोपण कार्य को देखा गया। दिनाँक 27 जनवरी, 2013 को पालीथीन के विकल्प के विक्रेता के साथ मैं नैमिषारण्य पहुँचा। इस सभा में ‘पहला’ आश्रम के महन्त जी एवं अन्य कई लोगों ने पालीथीन के विकल्प के रूप में प्रयोग की जाने वाली थैलियाँ खरीदीं। दिनाँक 8 मार्च, 2013 को माँ ललिता देवी परिसर को पालीथीन मुक्त करने का आदेश रिसीवर से निर्गत होने से पालीथीन मुक्ति की दिशा में एक सार्थक प्रयास हुआ।
गोमती के तट पर श्मशानघाट के निकट वन विभाग द्वारा स्थानीय गणमान्य नागरिकों के सहयोग से भूमि का प्रस्ताव प्राप्त कर वृक्षारोपण कार्य भी प्रारम्भ कर दिया गया। यह वह भूमि है जिस पर लगातार अतिक्रमण होता जा रहा था। नदी तट स्थित इस संवेदनशील भूमि पर 05 हे॰ क्षेत्र में वन विभाग एवं स्थानीय लोगों के सहयोग से विधिवत् पौधारोपण कार्य कराया गया। इसके अतिरिक्त बालाजी मन्दिर परिसर में पंचवटी, नवग्रह वाटिका एवं नक्षत्र वाटिका की स्थापना कराई गई।
उक्त के अतिरिक्त गोमतीपार क्षेत्र स्थित पहला आश्रम की भूमि पर भी व्यापक रोपण कराया गया। नैमिषारण्य से थोड़ी दूर स्थित रुद्रावर्त मन्दिर के पास हरिशंकरी स्थापित की गई। यहाँ पर रोपित सभी पौध सुरक्षित एवं प्रफुल्लित हैं।
3. धौम्य ऋषि आश्रम, धोबियाघाट, हरदोई -
हरदोई जनपद में गोमती के तट पर स्थित धोबियाघाट एक अद्भुत स्थान है। यह दो कारणों से अद्भुत है - पहला यहाँ भूमि स अनेक पानी के स्रोते निकलते हैं जो बाद में गोमती नदी में मिलते हैं तथा दूसरा गोमती के तट पर स्थित मन्दिर के सघन वन क्षेत्र को देखकर प्राचीन आश्रमों की परिकल्पना साकार रूप लेती है। पालीथीन बन्द करने का अभियान यहाँ भी प्रारम्भ हो गया।
4. सैलानी माता मन्दिर -
लखनऊ से लगभग 20 कि॰मी॰ दूर बाराबंकी जिले में गोमती नदी के तट पर सैलानी माता का मन्दिर स्थित है। वर्ष 2014 वर्षाकाल में यहाँ पर धार्मिक महत्व के एवं लुप्त हो रही वृक्ष प्रजातियों के व्यापक पौधारोपण की योजना बनायी गयी। उक्त पौधा रोपण हेतु मन्दिर समिति द्वारा यहाँ पर रोपण हेतु वृत्ताकार खाईं खुदवाई गयी। दिनाँक 04.05.2014 को मन्दिर समिति के अध्यक्ष श्री रामदुलारे यादव एवं मन्दिर के मुख्य पुजारी श्री वासुदेव जी द्वारा रुद्राक्ष के पौधे का रोपण कर पौध रोपण का शुभारम्भ किया गया। दिनाँक 20.07.2014 को सैलानी माता मन्दिर परिसर में कल्पवृक्ष, पारिजात (हरसिंगार), हरिशंकरी (पीपल, पाकड़ एवं बरगद), कैथ, खिरनी, कनकचम्पा, मौलश्री, खैर, बड़हल, गूलर आदि प्रजातियों का रोपण किया गया।
सैलानी माता मन्दिर परिसर में माह अप्रैल-2015 में ‘‘स्मृति-वन’’ की स्थापना की गयी है जिसमें प्रबुद्ध लोगों द्वारा अपने स्मृतिशेष परिजनों के नाम पर पौधारोपण किया गया।
प्रस्तावित कार्यक्रम -
अ . सैलानी माता मन्दिर - इस परिसर मंे माह अप्रैल-2015 में स्थापित ‘स्मृति-वन’ में रोपित सभी पौधे न केवल जीवित हैं बल्कि प्रफुल्लित हैं। मई और जून-2015 की विकट गर्मी में बिना किसी सरकारी संसाधन के मन्दिर समिति द्वारा दुर्लभ प्रजाति के रोपित पौधों को लगातार सिंचाई करके बचाया गया है। इससे प्रेरित होकर वर्षाकाल-2015 में ‘स्मृति-वन’ के द्वितीय चरण के अन्तर्गत पुनः लखनऊ के प्रबुद्ध लोगों द्वारा अपने प्रियजनों की 

प्रकृति तथा मानव सम्बन्ध - डाॅ॰ ओम प्रकाश सिंह

सृष्टि के रचना के साथ ही पृथ्वी पर जीवन सम्भव हो, इस हेतु विधाता ने अनेक चीजें उत्पन्न की, जिसको एक शब्द में व्यक्त करें तो उसका नाम ‘‘प्रकृति’ है। जिन तत्वों से प्रकृति का निर्माण हुआ उन्हीं तत्वों से मानव शरीर का निर्माण हुआ है। जहाँ सृष्टि के निर्माण में अग्नि, जल, वायु, पृथ्वी, आकाश तत्वों का समावेश है। वहीं मानव शरीर भी उन्हीं से बना है। इसे गोस्वामी तुलसी दास ने राम चरित मानस में भी लिखा है:-
छिति जल पावक गगन समीरा,
पंच रचित यह अधम शरीरा।। 
(किस्किन्धा काण्ड -11)
इसलिए यह सृष्टि तथा मानव शरीर सुचारू तथा ढ़ंग से कार्य करें इसके लिए आवश्यक है कि प्रभु के द्वारा बनाए गए इस पृथ्वी के साथ उत्पन्न चीजों को जिसमें नदी, वन, पर्वत, भू-भाग (भूमि), वायु, जल का हम उतना ही उपयोग करें जितना आवश्यक है। साथ ही यह भी प्रयास होता रहे कि इसका संरक्षण एवं संवर्धन होता रहे ताकि आने वाले समय में यह प्रचुर एवं शुद्ध रूप से उपलब्ध हों, क्योंकि यह अकाट्य सत्य है कि इसके बिना जीवन सम्भव ही नहीं हो सकता है। इनमें से किसी तत्व की कमी या दूषित होने से मानव जीवन सीधे प्रभावित होगा।
वर्तमान भौतिकवादी व्यवस्था में प्रकृति का जो दोहन व शोषण हो रहा है, उसके परिणाम स्वरूप पर्यावरणीय गम्भीर संकट उत्पन्न होता जा रहा है। उनमे वनों के अत्यधिक कटने से शुद्ध वायु की कमी व वर्षा का कम होना, असमय होना, अत्यधिक होना तथा उद्योगों के अन्धाधुन्ध अनियोजित विकास व उसके द्वारा उत्पन्न धुआँ-धूल से वायु प्रदूषण व अन्य उत्सर्जन से जल प्रदूषण, नदी प्रदूषण हो रहा है। वहीं शहर, कस्बों के नालों का पानी भी नदियों को प्रदूषित करता है। इसके साथ ही प्रदूषण के अन्य कारकों में नदियों के किनारे की मिट्टी तथा वनों का कम होना, मनुष्यों द्वारा जल में सीधे विसर्जित किए जाने वाले शव, मूर्तियाँ, पूजन सामग्री, कपड़ों का धोना आदि प्रमुख रूप से जिम्मेदार हैं।
अनेकानेक शोधों व खोजों से यह ज्ञात हो रहा है कि वर्तमान समय में पर्यावरणीय प्रदूषण भयंकर रूप लेता जा रहा है। जोकि न सिर्फ वर्तमान मानव जीवन को प्रभावित कर रहा है, बल्कि आने वाली पीढि़यों के लिए एक चुनौती के रूप में प्रकट हो रहा है, जो प्रमुखतया ग्लोबल वार्मिंग, तापमान का बढ़ना, ऋतु चक्र में परिवर्तन आदि के रूप में देखने को मिल रहा है।
इसलिए हमारा सामाजिक तथा नैतिक कर्तव्य बनता है कि हम अपने जीवन जीने की पद्यति में या दिनचर्या में कुछ ऐसा करें जिससे जल, वायु, मिट्टी, खनिज, ईंधन आदि का कम से कम उपयोग हो। जिससेे इनकी बचत भी होगी तथा प्रदूषण में भी कमी आयेगी। साथ ही उपयोग करते समय भी यह ध्यान रहे कि प्रदूषण से कैसे बचाव हो सकता है एवं पर्यावरण का संरक्षण-संवर्धन कैसे होता रहे।
भारत वर्ष कृषि प्रधान देश है और असली भारत गांँव में बसता है, जिसकी 60 प्रतिशत के लगभग जनसंख्या गाँवों में रहती है। आज भी कृषि करने वाले लोग प्रकृति पर निर्भर रहते हैं, अतः वर्षा का कम होना या नहीं होना, अधिक होना या असमय होना हमारे कृषि कार्य को सीधे प्रभावित करती है।
इसके साथ ही वर्षा काल में प्रमुखतया वानिकी, जल संचयन, संरक्षण, मिट्टी को कटने-बहने से रोकने व मिट्टी का शोधन आदि कायों के साथ-साथ कीट-पतंगों, जीव-जन्तुओं का भी प्रजनन होता है, जो प्रकृति के महत्वपूर्ण अंग हैं। स्मरणीय यह है कि, उपरोक्त पर्यावरणीय कार्य बरसा काल में ही हो सकता है, इसीलिए कहा है कि -
‘‘का बरसा जब कृषी सुखानी,
समय चूकि पुनि का पछितानी।’’
अतः बिना चूके, दूसरों को जागरुक करते हुए इस वर्षा काल में हम कुछ ऐसा करें जिससे मनुष्य तथा प्रकृति का सुखद साथ आने वाले समय में मिलता रहे।

विचारों का सदुपयोग - अवध बिहारी शुक्ल

इस संसार में हम जो कुछ देखते हैं वह सब हमारे विचारों का ही मूर्त रूप है। यह समस्त सृष्टि विचारों का ही चमत्कार है। किसी भी कार्य की सफलता-असफलता, अच्छाई-बुराई और उच्चता-न्यूनता के लिए मनुष्य के अपने विचार ही उत्तरदायी होते हैं। जिस प्रकार के विचार होंगे, सृजन भी उसी प्रकार का होगा। विचार अपने आप में ऐसी शक्ति है, जिसकी तुलना में संसार की समस्त शक्तियों का समन्वय भी हल्का पड़ता है। विचारों का दुरूपयोग स्वयं और संसार का विनाश भी कर सकता है। सूर्य की किरणें जब शीशे द्वारा एक ही केन्द्र पर डाली जाती हैं तो अग्नि उत्पन्न हो  जाती है। इसी प्रकार विचार एक केन्द्र पर एकाग्र होने से बलवान बनते हैं। आशय यह है कि हमारे विचारों की ताकत हमारे मन की एकाग्रता पर निर्भर करती है। एकाग्रता के बगैर मन में बल नहीं आ सकता। परमार्थ के क्षेत्र में ही नहीं, बल्कि संसार के व्यावहारिक कार्यों में भी एकाग्रता की बड़ी आवश्यकता पड़ती है। जो मनुष्य जैसा विचार करता है, वैसा ही कार्य करता है। फिर वैसी ही उसकी आदत बन जाती है और अन्त में वैसा ही उसका स्वभाव बन जाता है। ऐसा ही गीता में भी कहा गया है कि जैसा सोचता, वैसा ही बन जाता है। यदि आप उत्तम जीवन जीना चाहते हैं तो आपको वैसा ही विचार करने का अभ्यास करना चाहिए। विचारों के सदुपयोग से मनुष्य विश्व विजयी हो सकता है। हजारों अविष्कार उन्हीं अच्छे विचारों के परिणाम हैं। विचार करते समय सकारात्मक बातों, दृश्यों, वस्तुओं और पदार्थों के बारे में ही चिंतन करना चाहिए जिससे कि हमारे मन में आनन्दपूर्ण विचारों का ही प्रवाह बहेगा और उदासीनता के विचार मेरे पास फटकने तक न पाएंगे। 

आसन, प्राणायाम एवं ध्यान- डाॅ॰ अंजलि सिंह

‘21 जून 2015’ प्रथम विश्व योग दिवस के रूप में मनाया गया, यह बात हम सभी भारतीयों के लिए गर्व का विषय है। इस उपलक्ष्य में मेरा आप सभी पाठकों से यह अनुरोध है कि आज जब सम्पूर्ण विश्व योग के महत्व को स्वीकार कर रहा है तो हमें भी अपनी व्यस्त दिनचर्या में से कुछ समय योग-साधना हेतु अवश्य ही निकलना चाहिए। योग शब्द का अर्थ होता है जोड़ तथा शरीर, श्वास एवं मन का संयोग, योग-साधना है।
आसन - ‘योगासन’ शारीरिक क्रियामात्र नहीं है योगासन, साँस के द्वारा शरीर के अंदर, मन की यात्रा है, योगासन क्रिया में यदि मन और सांसों का योग न हो तो वह क्रिया किसी भी आम कर्म के समान ही रहेगी अपितु साँस के माध्यम से जब मन, शरीर की क्रियाओं को देखता है तो योग क्रिया का प्रभाव सहस्त्र गुना बढ़ जाता है। शरीर के प्रत्येक अंग के लिए भिन्न-भिन्न आसन होते हैं। तीन माह से अधिक एक स्वस्थ बच्चे को यदि हम देखें तो उसकी बाल सुलभ क्रियाओं में अनेक योग-क्रियाएँ होती हैं योग-क्रिया करने के पूर्व स्नानादि नित्य क्रियाओं से निवृत्त हो जाना वांछनीय है, योगासन हेतु प्रातःकाल की बेला सर्वथा सुयोग्य है। योग-क्रिया के उपरान्त ध्यान करने से व्यक्ति पर योग का प्रभाव अतुलनीय होता है।
प्राणायाम - प्राणायाम अर्थात् अपनी प्राण उर्जा को आयाम प्रदान करना है। श्वांस ही हमारी प्राण उर्जा है तथा श्वांस को साधना ही प्राणायाम है। यदि हम किसी रुग्ण व्यक्ति की श्वांसों पर ध्यान दें तो वह उच्छ्वास (छोटी सांसे मुँह से) लेता हुआ दिखेगा और जब हमें क्रोध आता है तो हमारी सांसे तेज एवं उखड़ी सी होती हैं। कहने का तात्पर्य यह है कि बीमारी एवं क्रोध दोनों ही अवस्थाओं में हम सामान्य सांसे नहीं लेते तथा हमारी ऊर्जा क्षीण होती है। इसके स्थान पर यदि हम आनन्द के पलों का स्मरण करें तो हमारी सांसे लम्बी गहरी होती हैं और हमारा शरीर ऊर्जावान होता है। श्वांस (प्राण) की गति को आयाम प्रदान करने की क्रिया ही प्राणायाम है यदि सांसों का प्रभाव अपने आप पर और अच्छे से समझना है तो याद करिये कि क्रोध के समय आपकी मुख मुद्रा कैसी हो जाती है? जब हम दुखी होते हैं तो हमारी प्राण ऊर्जा और भी कम हो जाती है। एक तथ्य उल्लेखनीय है कि हम अपने फेफड़ें का मात्र 30 प्रतिशत ही प्रयोग करते हैं, अतः जब भी कभी थकावट का एहसास हो तो लम्बी गहरी साँस ले कर प्राण ऊर्जा को बढ़ा सकते हैं। लम्बी गहरी सांसे सर्वोचित तथा सबसे सरल प्राणायाम है, जो शरीर में ऊर्जा भर देता है।
ध्यान - ‘मन अन्ते तन अन्ते नैना बसे आकास’ जीवन की सतत प्रकिृया में हमारा मन सदैव भटकता रहता है। मन की चंचलता का परिणाम है असंतुष्टि, तथा  ‘ध्यान’ चंचल मन के साथ रहने का अभ्यास है। जिस प्रकार कोई नया काम करते समय हमारा सारा ध्यान उसी कार्य में केन्द्रित हो जाता है, किन्तु नित्य क्रिया अथवा रोजमर्रा के काम करते हुए हम कुछ भी सोच रहें होते है और क्रियाएँ यंत्रवत होती हैं। जब कोई नया साधक ध्यान करने हेतु निमित्त करता है तो उसका प्रयास अपने मन को बांधकर रखने का होता है। ऐसा करने से हम ध्यान नहीं कर पाते बस निमित्त ही करते रह जाते हैं। वहीं जब हम रात्रि पहर में सोने लेटते हैं तो कुछ सोचते-सोचते नींद आ जाती हैं, अर्थात् ध्यान के लिए मन को पकड़ने के बजाये उसे स्वतंत्र छोड़ने की आवश्यकता है। मन को स्वतंत्र छोड़ देने से एक बिन्दु ऐसा आता है जब हमारा मन अपने पास वापस आने लग जाता है और हमें कोई प्रयास नही करना पड़ता, ऐसा करना बहुत सरल नहीं किन्तु किसी निश्चित समय में एक नियत स्थान पर प्रतिदिन अभ्यास करते रहने से ध्यान स्वतः ही लगने लग जाता है। प्रातः वन्दन, संध्या वन्दन की परम्परा हमारी संस्कृति में ध्यान परम्परा की साक्षी है।
इस अंक में योगासन, ध्यान, प्राणायाम का परस्पर महत्व एवं सही अर्थ स्पष्ट किया गया। इस पत्रिका के आने वाले अंकों में विभिन्न योग-क्रियाओं तथा प्राणायाम की विधि बताई जाएगी। आशा है कि यह लेख पाठकों की जिज्ञासाओं को संतुष्ट कर पायेगा। आपके योग-क्रिया, प्राणायाम तथा ध्यान सम्बन्धी प्रश्नों का स्वागत है।



आनन्द का उद्गम - कविता विकास

संघर्ष जीवन का अवश्यम्भावी तत्व है। जहाँ संघर्ष नहीं, वहाँ जीवन का आनन्द नहीं। रोजमर्रा की सुविधाओं में हम इतने लिप्त हैं कि हल्का सा अभाव हमारे संघर्ष की प्रकिृया को जटिल बना देता है। इसका प्रभाव दो तरह से पड़ता है - सकारात्मक और नकारात्मक। यदि संघर्ष हमें उदार, विनम्र और परिश्रमी बना देता है, तो इसे सकारात्मक प्रभाव कहा जाएगा। इसके विपरीत संघर्ष हमें तोड़ देता है, तो हम कमजोर हो जाते हैं। मनोवैज्ञानिकों के अनुसार विपरीत स्थितियों को अनुकूल करने का प्रयत्न करना ही संघर्ष है, लेकिन इसके साथ विश्वास का होना आवश्यक है। विश्वास संघर्ष की थकान को महसूस नहीं होने देता। यह एक सकारात्मक ऊर्जा से भर देता है। इसलिए संघर्ष के दौर में अपनी मेहनत पर आस्था रखनी चाहिए। साथ में ईश्वर से प्रार्थना से मिली शान्ति और संगी-साथी की सराहना मिल जाए, तो  क्या कहने। अनेक उद्योगपति, राजनेता और समाजसेवकों ने भीषण संघर्ष करते हुए अपने दिन गुजारे पर उनका विश्वास ही उनकी प्रेरणा बना। लाल बहादुर शास्त्री और राजेन्द्र प्रसाद जैसे महापुरूषों ने अभावों से संघर्ष करते हुए जीवन की गरिमा को पहचाना था। वस्तुतः इनके लिए जीवन और संघर्ष एक-दूसरे के पर्याय थे।
वास्तव में संघर्षमय जीवन में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है। जैसे आंच में तप कर सोना कुन्दन बनता है वैसे मनुष्य भी संघर्ष की आंच में तपकर मनुष्य बनता है। उसमें जीवनोपयोगी गुणों का विकास होता है, जो उसे परिवार, समाज और राष्ट्र के लिए उपयोगी बनाते हैं।
संघर्ष के बाद सफलता मिलती है, जो हमें, खुशी प्रदान करती है। चुनौती को स्वीकार किए बगैर जीतना असम्भव है। इसलिए संघर्ष दुख नहीं, दुख से बाहर आने का प्रयास है। तो क्यों न संघर्ष को आनन्द का उद्गम कहा जाए। 

लोक भारती आगामी कार्यक्रम

हरियाली अभियान - 4 जुलाई वृक्षों के धरने से  प्रारम्भ होकर हरियाली तीज - 17 अगस्त तक वृक्षारोपण, वृक्ष भण्डारे एवं जागरुकता के कार्यक्रम होंगे।
सौर ऊर्जा गाँव - 19 जुलाई को सीतापुर जिले में खैराबाद के निकट ककरहिया गाँव में वृक्षारोपण, पवित्र तालाब संरक्षण एवं सौर ऊर्जा परियोजना का निरीक्षण होगा।
शून्य लागत प्राकृतिक कृषि वर्ग -
एक - 31 जुलाई सायं से 1 व 2 अगस्त को बरेली में प्रशिक्षण वर्ग का आयोजन है, जिसमें आचार्य रवीन्द्र जी रहेंगे।
दो - 9 अगस्त को शाहजहाँपुर जिले के जेवां गाँव में शून्य लागत कृषकों का एक दिवसीय अभ्यास वर्ग।
तीन - 27 फरवरी, 2016 से 4 मार्च, 2016 तक पटना, बिहार में प्रशिक्षण वर्ग का आयोजन है।

औषधीय मसाले हल्दी व सोंठ - डा॰ संगीता सचान

राष्ट्र को पीड़ा-पतन-पराभव से उबारने हेतु मानव मात्र के लिए एक ही संजीवनी है - वह है सद्ज्ञान देने वाल शिक्षण, प्रत्यक्ष या परोक्ष स्वाध्याय, चाहे व किसी भी रूप में हो। शिक्षा एवं विद्या का समन्वय-संतुलन वर्तमान समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है।
वर्तमान समय संप्रेषण और आविष्कारों का युग है। सम्पूर्ण विश्व के विकास लाभ-हानि पर अगर दृष्टिपात किया जाए तो जहाँ लाभ अपरिमित हैं वही खोज के बाद भी बीमारियों की भयावहता असीमित हुई है। ऐसे में ‘स्वास्थ्य ही धन है’ यह सर्व कल्याण के लिए आवश्यक हो गया है। भारतीय ग्रन्थों में कहा गया है ‘सर्वधर्म परित्यज्य शरीरं अनुपालयेत्’ और आरोग्य को सर्वोपरि माना गया है। स्वास्थ्य को संरक्षित, सुरक्षित और दीर्घ जीवी तथा निरोग रखना अति आवश्यक है। आज इसकी पूर्ति आयुर्वेद से ही सम्भव है क्योंकि आयुर्वेद सम्पूर्ण जीवन का विज्ञान है। ऐसे में स्वास्थ्य संरक्षण की महती आवश्यकता को देखते हुए हमने अपने लेख में कुछ औषधीय गुणों से युक्त मसालों का अध्ययन प्रस्तुत किया है।
सामान्यतः मसालें के रूप में जीरा, हल्दी, अदरक, कालीमिर्च का प्रयोग बहुत ही प्रचलित है किन्तु इन मसालों का भारतीय भोजन में शामिल होना, एक विशेष कारण को इंगित करता है। ये मसालें अपने आप में औषधीय गुणों से भरपूर हैं। इस इकाई में आप हल्दी और अदरक के औषधीय महत्व जान सकेंगे कि यह कफ को गलाते हैं, कई प्रकार के उदर रोगो को भी दूर करते है साथ ही चेहरे की सुन्दरता को भी बढ़ाते है।

हल्दी -
हल्दी का लेटिन भाषा का नाम ‘कर्कुमा लौंगा’ ;ब्नतबनउं स्वदहंद्ध एवं इसका कुल जींजीबरेसी है।
परिचय - इसका क्षुप 2-3 फुट ऊँचा हृस्वकांड होता है। पत्र आयताकार 1.5 से 2 फीट लंबे, लगभग 6 इंच चैड़े होते हैं। पत्तियाँ दोनो पृष्ठ पर चिकनी होती हैं, उन पर सूक्ष्म सफेद बिन्दु होते हैं। पुष्प दंड 6 इंच लंबा पत्र कोष से आवृत्त होता हैं, जिसमें पीतवर्ण लगभग 1.5 इंच लंबे पुष्प निकलते हैं। पुष्पदंड के पत्र हल्के रंग के होते हैं। इसके कंद अदरख के सदृश किन्तु उससे बड़े, भीतर की ओर चमकीले पीले होते हैं। शरद ऋतु में पुष्प निकलते है।
उत्पत्ति स्थान - समस्त भारत में विशेषतः पश्चिम बंगाल, मुंबई और तमिलनाडु में इसकी खेती होती है।
दोष कर्म - उष्ण वीर्य होने से यह कफ-वात शामक पित रेचक और तिक्त होने से पित शामक भी है।
दोष प्रयोग - यह वात, पित्त कफ तीनों दोषों में उत्पन्न विकारों में प्रयुक्त होता है। विशेषतः कफ-पित शामक है। हल्दी उष्ण, सौन्दर्य बढ़ाने वाली तथा रक्तशोधक है।
शोथ वेदनायुक्त विकारों में विशेषतः आघात लगने पर इसका लेप करते है। कुष्ठ, कंडू, खुजली, आदि त्वक् दोषों में इसे लगाते हैं। वर्ण को सुधारने के लिए इसका उबटन प्रयोग किया जाता है। व्रणों के पाचनार्थ इसकी पुल्टिस बाँधते हैं तथा शोधन एवं रोपण के लिए इसका चूर्ण या मरहम लगाते है। नेत्राभिष्यंद से इसका आश्चोतन (1 भाग हल्दी 10 भाग जल में पकाकर छान लेते हैं) तथा विडालक देते है। यकृत प्लीहा की वृद्धि होने पर इसका लेप उसके ऊपर करते हैं। अर्ष में भी इसका लेप लगाते है। हल्दी के टुकड़ों को अंगारों पर रखने से धूम्र निकलता है, वह मूच्र्छा, श्वास एवं हिक्का में प्रयुक्त होता है। इसके धूम्र से वृश्चिकदंश की वेदना भी शांत होती है।
यह रक्तविकार, शीतपित, पांडु एवं रक्तस्त्राव में प्रयुक्त होता हैं। शीतपित (एलर्जी) की यह उत्तम दवा हैं। यह कास एवं श्वास में कष्ट दायक हैं। प्रमेह रोग में इसका चूर्ण या स्वरस देते है प्रसव के बाद एवं स्तन्य विकारों में हल्दी का सेवन कराते हैं। शुक्रमेह में भी लाभकर है।
प्रयोग -
- प्रदर में हल्दी को गूगल के साथ देते हैं। कामला रोग में 6 माशा हल्दी को मट्ठा के साथ 2 बार  सेवन करें। भोजन मात्र दही-भात अथवा मट्ठा-भात लेते रहने से 4-5 दिन में कामला शमन हो जाता है।
- हल्दी रक्तशोधक है। शरीर पर फुन्सियाँ उठने, चकत्ता जैसी पिति उछलने में हल्दी को शहद के साथ मिलाकर चाटते रहने रहने की प्रथा है।
- खाज, खुजली, फुंसी आदि में इसका सेवन उपयोगी रहता है।
- गहरी चोट लग जाने पर हल्दी का चूर्ण दूध के साथ पिलाते है।
- अलसी तेल, नमक व हल्दी की पुल्टिस बनाकर सूजन, दर्द एवं चोट वाले स्थानों की सिकाई की जाती है।
श्वसन तंत्र - खाँसी आने पर हल्दी के टुकड़े मुँह में पड़े रहने दिये जाएँ और उन्हें धीरे-धीरे चूसते रहा जाये तो लाभ होगा।
- सरदी लगने पर हल्दी की धुनी दी जाती है।
- शिरोशूल एवं साइनुसाइटीस में हल्दी एक पाव पानी में औटाकर कपड़े से छानकर आँखों में टपकाते हैं, तो लाली जल्दी मिटती है।
- मूत्र रोगों में इसका काढ़ा बहुत आराम देता है।
- प्रमेह में हल्दी के चूर्ण को आंवले के रस के साथ देते हैं।
अदरक (सौंठ) -
इसका लैटिन भाषा का नाम जिंजिबर आॅफिसिनेल हैं एवं इसका कुल आद्र्रक-कुल जिंजीबरेसी है।
परिचय - यह बहुवर्शायु, कंदयुक्त क्षुप है। इसका कांड पत्रों से युक्त होता हैं। यह 4 फीट तक ऊँचा बढ़ सकता है। पत्र आधे से एक फीट लंबे एक इंच चैड़े होते हैं। अग्रभाग में ये क्रमशः नुकीले होते जाते हैं। इसका नीचे वाला पृष्ठ चिकना होता है।
1.5 से 3 इंच लंबे पुष्पध्वज से आधे से एक फीट लंबा पुष्पदंड निकलता है। इस पर हरिताभ पीतवर्ण के पुष्प आते हैं। इन पुष्पों का ओष्ठ भाग गहरे बैंगनी रंग का होता है। पुंकेसर भी गहरे बैंगनी रंग के होते हैं। वर्षा एवं शरद ऋतु में पुष्प आते हैं। कंद हल्के पीले रंग का सुगंधित, स्थूल और खंडयुक्त होता है।
आद्र्र कंद को आद्र्रक तथा शुष्क को शुंठी कहते है। अदरख के कंद की पतली त्वचा बाँस के तीक्ष्ण टुकड़े से अलग कर, पानी से धोकर, 8-12 दिनों तक धूप में और बाद में छाया में सुखाते हैं। इन टुकड़ों को एक दिन पानी में डुबोने के बाद 12 लीटर पानी में 1 किलो चूना डालकर बनाये गय गाढ़े घोल में रखते हैं। फिर से धूप में सुखाकर टाट के टुकड़ों से रगड़कर रख लेते हैं। इससे सफेदी और चमक आ जाती है।
उत्पŸिा स्थान - केरल, पश्चिम बंगाल, उड़ीसा, कर्नाटक, मध्य प्रदेश, तथा हिमाचल प्रदेश में इसकी खेती होती हैं।
गुण कर्म -
कफ - वात शामक, शीत प्रशमन, शोथहर, वेदना स्थापन, नाड़ी उत्तेजक, वात शामक, तृप्तिघ्न, रोचन, दीपन, पाचन, वातानुलोमन, शूलप्रशमन, अर्शोघ्न, ह्नदयोतेजक, रक्तशोधक, श्वासहर, वृश्य, ज्वरघ्न।
आमवात, संधिशोथ आदि में इसको पीसकर गरम लेप किया जाता है। शैत्य और अवसाद को दूर करने के लिए भी इसका लेप करते हैं। शुंठी तैल में मिलाकर अभ्यंग भी करते हैं। शोथ रोग में इसका चूर्ण उद्धर्शन करते है।
- भोजन से पूर्व लवण और आद्र्रक खाने से अग्नि प्रदीप्त होती है।
- आमवात में शुंठी और गोक्षुर का क्वाथ प्रतिदिन प्रातः सेवन करने से कटि शूलादि में शीघ्र लाभ होता है।
- आद्र्रक स्वरस पुराना गुड़ मिलाकर पिलाने से शीत पित में लाभ होता है।
- यह जीवनी शक्तिवर्धक, नाड़ी संस्थान के लिए उत्तेजक एवं वात शामक औषधि है।
- एन्जाइम की प्रचुरता के कारण यह कफ निस्तारक, रक्त शोधक तथा जीर्ण संधिशोथ हेतु एक श्रेष्ठ द्रव्य माना गया है। बाह्य प्रयोग में इसे पीसकर आमवात व संधिशोथ में लेपन करते हैं।
- भोजन के पूर्व लेने पर अरूचि दूर होती हैं।
- अश्वगंधा व निर्गुड़ी के साथ सौंठ मिलाकर देने से आमवात व बाजीकरण प्रयोजन हेतु दिया जाता है।

कर्तव्य के साथ रहो आनन्द के साथ रहो - जय शंकर मिश्र

‘‘कर्मणो ह्यापि बोधव्यं बोध्व्यं च विकर्मणः।
अकर्मणश्च बोधव्यं गहना कर्मणो गतिः।।
‘‘अर्थांत कर्म का स्वरूप भी जानना चाहिए और अकर्म का स्वरूप भी जानना चाहिए तथा विकर्म का स्वरूप भी जानना चाहिए, क्योंकि कर्म की गति गहन है।’’
इसीलिए कहा है, जीवन विज्ञान भी है और कला भी। अतः जीवन यात्रा प्रारम्भ करते समय बहुत ही सावधानी की आवश्यकता है। क्योंकि प्रत्येक कर्म और अकर्म के अनुसार ही हमारे भावी जीवन की दिशा तय होती है।
इसे समझने के लिए एक सुन्दर कथा है। एक घने जंगल में गुजरते हुए एक यात्री को चार सुन्दर युवतियाँ मिलीं। शिष्टाचारवश उसने उन्हें अभिवादन कर अपना परिचय दिया। प्रत्युत्तर में उनमें से लम्बी छरहरी सुन्दरी आगे बढ़ी और अपना नाम ‘बुद्धि’ बताया तथा कहा मेरा निवास स्थान ‘‘मनुष्य का मस्तिष्क है।’’
फिर बहुत भली सी दिखने वाली एवं सुन्दर आँखों वाली दूसरी सुन्दरी आगे बढ़ी और उसने अपना नाम ‘लज्जा’ बताया तथा कहा ‘‘मैं मनुष्य की आँखों में शील बनकर रहती हूँ।’’ मानव स्वभाव की गरिमा, शालीनता मेरे ही कारण है।
अब लम्बे कद और सुगठित शरीर वाली तीसरी सुन्दरी ने अपना परिचय ‘साहस’ के रूप में देते हुए बताया कि मेरा सर्वविदित निवास मनुष्य का हृदय है।
अन्त में चैथी सुन्दरी जो अत्यन्त रूपवती थी, और अपने आस-पास ताजगी की हवा बिखेर रही थी।  उसने बताया मेरा नाम स्वास्थ्य है और मनुष्य का पेट ही उसका निवास है। यात्री उन चारो सुन्दरियों से मिलकर बहुत प्रभावित हुआ और सबको धन्यवाद देकर घने जंगल के बीच अपनी यात्रा पर आगे बढ़ चला।
जंगल के अन्तिम छोर पर पहुँचने पर यात्री को चार युवक मिले। यात्री ने बड़ी विनम्रता पूर्वक उन्हें अभिवादन करके, अपना परिचय दिया। इस पर तराशे हुए चेहरे और घनी भौहों वाले सबसे सुन्दर नौजवान ने स्वयं को ‘‘क्रोध’ या गुस्सा बताया और कहा मै मनुष्य के मस्तिष्क में रहता हूँ। इस पर यात्री को आश्चर्य हुआ और कहा, मस्तिष्क में तो उस सुन्दरी ‘‘बुद्धि’’ ने अपना स्थान बताया था। दोनो एक स्थान पर कैसे रह सकते हो? इस पर क्रोध ने कहा, जब मैं मस्तिष्क में प्रवेश करता हूँ तो बुद्धि तत्काल वहाँ से बाहर निकल जाती है। इस उत्तर से यात्री निरूत्तर हो गया और सहमत भी दिखाई लगा।
दूसरे युवक जो स्वभाव से क्रूर व घमण्डी दिखाई पड़ रहा था, उसने अपना परिचय ‘‘लोभ’’ या ‘‘लालच’’ दिया और अपना निवास लोगों की आँखों में बताया।  यात्री ने कहा, ऐसा तो लज्जा ने बताया था। इस पर  ‘‘लोभ’’ बोला ‘‘हाँ, पर जैसे ही आँखों में मेरा प्रवेश होता है, बुद्धि मेरे वशीभूत हो जाती है और ‘लज्जा’ वहाँ से उडन-छू हो जाती है।
तीसरा युवक दुबला-पतला और कमजोर सा दिख रहा था। उसने अपना नाम ‘‘भय’’ और निवास मनुष्य का हृदय स्थान बताया। यात्री बोला, ‘‘वहाँ तो ‘साहस’ रहता है, तुम वहाँ कैसे रह सकते हो?’’ भय ने कहा, ‘‘आप सच कहते हो, वहाँ ‘साहस’ रहता है। पर! वह तब तक ही वहाँ रहता है, जब तक मेरा वहाँ प्रवेश नहीं होता। एक बार हृदय में भय का प्रवेश हुआ नहीं कि, ‘‘साहस’’ अन्तध्र्यान हो जाता है।
अब तक यात्री बड़ा चकरा चुका था,। बड़े संकोच के साथ उसने चैथे युवक से परिचय पूछा, जो देखने में मोटा-तगड़ा लग रहा था। उसने अपना नाम ‘‘रोग’’ बताया तथा पेट को अपना निवास बताया और कहा ‘‘अविवेक पूर्ण खान-पान और अव्यवस्थित दिनचर्या द्वारा अधिकांश लोग रोग या बीमारी का ही पेट भरते रहते हैं, जिससे अपने आप ‘स्वास्थ्य’ को वह अपने स्थान से हटा देता है।’’
इस कहानी का संदेश स्पष्ट है - जब हम अपने कर्तव्य को भूलकर अकर्तव्य के वशीभूत हो जाते हैं, तो हमारे जीवन के सभी मानवीय सद्गुण और आनन्द विलुप्त होने लगते हैं और उनका स्थान लिए अकर्तव्य हमारे दुखों का कारण बनते हैं।
इसीलिए कहा गया है, ‘‘कर्तव्य के साथ रहो, आनन्द के साथ रहो।’’

अपने परिवेश को भी समझो - डाॅ॰ सुरचना त्रिवेदी

कोई भक्त राजा एक महात्मा की पर्णकुटी पर जाया करते थे। उन्होंने एक बार महात्मा को अपने महल  में पधारने के लिए कहा, पर महात्मा ने यह कह कर टाल दिया कि ‘मुझे तुम्हारे महल में बड़ी दुर्गन्ध आती है इसलिए मैं नहीं जा सकता। राजा को बड़ा आश्चर्य हुआ। उन्होंने मन ही मन सोचा - ‘महल में तो इत्र-फूलेल छिड़का रहता है, वहाँ दुर्गन्ध का क्या काम। महात्मा जी कैसे कहते हैं? पता नहीं! ....... राजा ने फिर संकोच में कुछ नहीं कहा। एक दिन महात्मा जी राजा को लेकर साथ घूमने निकले, घूमते-घूमते वह एक मलिन बस्ती में पहुँच गए ओैर वहाँ एक पीपल वृक्ष की छाया में खड़े हो गए। उस बस्ती के लगभग हर घर में कहीं चमड़ा कमाया जा रहा था, कहीं सूख रहा था और कहीं ताजा चमड़ा तैयार किया जा जा रहा था...... हर घर में चमड़ा था और उसमें से बड़ी दुर्गन्ध आ रही थी। हवा के साथ आती दुर्गन्ध से राजा परेशान हो गए। उन्होंने महात्मा जी से कहा......भगवन! दुर्गन्ध के मारेे खड़ा नहीं रहा जाता, जल्दी चलिए।’ महात्मा जी बोले - ‘तुम्हीं को दुर्गन्ध आती है।’ देखो इन घरों की ओर - कितने पुरुष, महिलाएँ और बाल-बच्चे हैं, कोई काम कर रहे हैं, कोई हंस-खेल रहे हैं। किसी को तो दुर्गन्ध नहीं आती, फिर तुम्हीं को क्यों आने लगी?
राजा ने कहा - ‘चमड़ा कमाते-कमाते तथा चमड़े में रहते-रहते इनका अभ्यास हो गया है। इनकी नाक ही ऐसी हो गई है कि इन्हें चमड़े की दुर्गन्ध नहीं आती, पर मैं तो इसका अभ्यासी नहीं हूँ। जल्दी चलिए, अब तो एक क्षण भी यहांँ रूका नहीं जाता।’’....महात्मा ने हँस कर कहा - ‘‘भाई! यही हाल तुम्हारे राज महल का भी है। विषय-भोगों में रहते-रहते तुम्हें उसमें दुर्गन्ध नहीं आती,.... तुम्हारा अभ्यास हो गया है, पर मुझको तो विषय देखते ही उल्टी सी आती है। इसी से मैं तुम्हारे महल में नहीं जाता था।’’ राजा ने रहस्य समझ लिया कि विषय-वासनाओं में दुर्गन्ध है। महात्मा हँसकर राजा को साथ लिए वहाँ से चल दिए।
- असिस्टेन्ट प्रोफेसर संस्कृत, आर्यकन्या स्नातक महाविद्यालय, लखीमपुर।

डिजिटल इण्डिया भारत के विकास के लिए वरदान 18 लाख नौकरियाँ सृजित होंगी? - अरूण कुमार

भारत को विश्व में अग्रणी भूमिका निभाने के लिए ई-गवर्नेंस से आगे एम-गवर्नेंस अर्थात मोबाइल गवर्नेंस पर जाना होगा। इस विचार को साकार करने के लिए भारत सरकार द्वारा 1 जुलाई, 2015 को डिजिटल इण्डिया सप्ताह की शुरूआत की गई, जिसकी मुख्य बातें इस प्रकार हैं -
1. गरीब तक इन्टरनेट - अमीर-गरीब, शहर-गाँव की खाई को पाटते हुए गरीब से गरीब व्यक्ति तक यह सुविधा पहुँचाने की योजना। जब कि 20-30 करोड़ लोग भारत में इन्टरनेट इस्तेमाल करते हैं। इससे गाँव-गाँव तक बिजली अनिवार्य रूप से पहुँचेगी।
2. ग्राम पंचायतों तक इन्टरनेट - देश की 25 लाख ग्राम पंचायतों को इन्टरनेट से जोड़ने की योजना है। इसके लिए प्रत्येक ग्राम पंचायत में एक वाईफाई कनेक्शन लगाया जायेगा, जो प्रतिदिन एक घंटे के लिए फ्री रहेगी। इसके उपयोग के लिए प्रत्येक पंचायत में एक कामन सर्विस सेन्टर स्थापित किया जायेगा। अभी तक इस सुविधा से केवल 20 हजार ग्राम पंचायतें ही जुड़ी है।
3. सुविधाओं की निशुल्क उपलब्धता - स्कूलों, स्वास्थ्य केन्द्रों व कौशल विकास केन्द्रों को निशुल्क सुविधा उपलब्ध कराई जायेगी।
4. रोजगार सृजन - इस योजना के क्रियान्वयन से लगभग 18 लाख लोगों को रोजगार मिलेगा, जिससे देश के समग्र विकास में गति आयेगी।
5. मेक इन इण्डिया को गति - इस योजना के क्रियान्वयन के लिए फाइवर केबल तथा अनेक उपकरणों की आवश्यकता होगी, जिनका अभी तक आयात होता है, उसमें से अधिकांश का निर्माण अब भारत में ही सम्भव हो सकेगा।
6. स्मार्ट गाँव की दिशा में एक कदम - इस योजना से गाँव के विकास में आधारभूत परिवर्तन आयेगा। वर्तमान में स्मार्ट सिटी की जहांँ योजना हो रही है, वहीं स्मार्ट गाँव की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम होगा। गाँव के पलायन में भी कमी आयेगी।
6. सामाजिक चिन्तन में क्रान्ति - जब समाज का प्रत्येक तबका सम्पूर्ण विश्व से जुड़ जायेगा, उसके सोचने व निर्णय लेने की गति तेज, व्यापक व संतुलित हो जायेगी। सामाजिक दूरियांँ मिटेंगी, सशक्त व समर्थ समाज के निर्माण को गति मिलेगी।
7. विकास की प्रतिस्पर्धा - इस योजना से राज्यों के मध्य विकास की प्रतिस्पर्धा का निर्माण होगा, जिससे आधाभूत ढ़ाँचे का स्थापन और रोजगार सृजन में गति आयेगी। समाज व राजनैतिक दलों के कार्यकर्ताओं में सकारात्मक सोच बढ़ेगी।
8. मोबाइल ही व्यक्ति की पहचान - इस अभियान से प्रत्येक व्यक्ति का मोबाइल उसके आधार कार्ड से जुड़ जायेगा अतः उसका मोबाइल ही उसकी पहचान का माध्यम बन जायेगा। उसका पूरे देश में एक ही मोबाइल नम्बर रहेगा, जो स्थान या ऐजेन्सी बदलने से नहीं बदलेगा।
इस योजना के अन्तर्गत निम्न सुविधायें उपलब्ध कराने की योजना है।
1. ई-हेल्थ - बड़े अस्पतालों में मरीज लाइन में न लगकर आनलाइन आवेदन कर सकेंगे।
2. ई-लाॅकर - जरूरी दस्तावेज रखने व उन्हें आनलाइन भेजने की सुविधा होगी, जिससे अब उन्हें साथ लेकर चलने के झंझट से मुक्ति मिलेगी।
3. ई - बस्ता - छात्रों को अब किताबों का बोझ साथ लेकर नहीं चलना पड़ेगा, वह अब अपने पाठ्क्रम की पुस्तकें आनलाइन कहीं से भी डाउनलोड करके पढ़ सकेगा।
4. ब्राडबैण्ड सुविधा - इस व्यवस्था की उपलब्धता से सभी कार्यों की गति बढ़ जायेगी।
5. पारदर्शिता निर्धारण एवं भ्रष्टाचार मुक्ति की दिशा में एक कदम - सरकारी समस्त योजनायें व उनका क्रियान्वयन आॅनलाइन हो जाने से कार्य में पारदर्शिता आयेगी और उससे भ्रष्टाचार पर लगाम लगेगी।
प्र्रधानमन्त्री के महत्वपूर्ण पांँच सूत्र -
1. अगर हम नहीं समझेंगे तो किसी कोने में पड़े रह जायेंग, दुनियांँ कहीं दूर निकल जायेगी।
2. अब दुनियांँ वहांँ बसेगी, जहाँ से आप्टिकल फाइबर गुजरता है।
3. अब विरासत के साथ आधुनिक विज्ञान और तकनीक को आत्मसात करना होगा।
4. अगर देश का एक तबका डिजटिल क्रान्ति से वंचित रह जाता है तो वह खाई गरीब-अमीर की खाई से भी बहुत ज्यादा चैड़ी होगी।
5. भारत साइबर सिक्योरिटी का कवच दुनियाँ को देने में अहं भूमिका निभायेगा। 

समृद्ध भारत!

कहते हैं, भारत की रीढ़ गाँव और मस्तिष्क शहर हैं? पर! रीढ़ कमजोर रही तो, मस्तिष्क का क्या अर्थ। परन्तु, स्थिति यही है। अब तक की योजनाओं ने शहरों को ही पल्लवित-पुष्पित किया है। इसके निराकरण हेतु अभी हाल ही में नीति नियन्ताओं को सुझाव देते हुए कहा गया है, कि- ‘‘खेती को एक आधुनिक, भरपूर ज्ञान से सम्पन्न, टेक-सेवी, उद्यम गतिविधि’’ के रूप में लिया जाये। इसके अतिरिक्त गाँव में लघु उद्योग, अच्छी सड़कें, बिजली, पानी, शिक्षा, स्वास्थ्य, सुविधा युक्त घर, बैंकिंग एवं डिजिटल सुविधाओं के साथ-साथ युवाओं के लिए गाँव के निकट ही रोजगार के साधन विकसित किए जायें। यहीं से समृद्ध भारत का उदय होगा और विश्व में स्थापित होने के लिए, भारत का वैशिष्ट्य भाव ‘‘वसुधैव कुटुम्बकम्’’ भी सिद्ध होगा।

Wednesday, July 22, 2015

हडसन नदी संरक्षण की कहानी - मीनाक्षी आरोड़ा एवं पाॅल गैल

डच जहाजी ‘डेविड हडसन‘ लाल-भारतीयों (रेड इंडियन) के देश अमेरिका में जिस नदी के रास्ते घुसे थे, उस नदी का नाम ‘हडसन‘ है। हडसन नदी भारत की गंगा और नर्मदा जैसी बड़ी नदी नहीं है। इसकी लम्बाई सिर्फ 507 किलोमीटर है और यह एडिरौंडेक पर्वत श्रृंखला से निकलती है और न्यूयार्क सिटी, न्यूजर्सी जैसे कई बड़े शहरों के किनारे होती हुई अटलांटिक सागर में गिर जाती है। इसकी गहराई और प्रवाह इतना है कि इसमें जहाज चलते हैं। पानी इतना साफ है कि बिना फिल्टर किए सीधे न्यूयार्क वासियों के घरों में हडसन का पानी पहुँचता है।
ऐसा नहीं है कि यह नदी हमेशा से इतनी शुद्ध रही है। नदी ने काफी बुरे दिन देखे हैं। 1947-77 तक के दौर को नदी के सबसे प्रदूषित कालखण्ड के रूप में याद किया जाता है। विभिन्न औद्योगिक कारखानों और ‘जनरल इलेक्ट्रिक‘ के कारखाने से निकला कचरा ‘पोलीक्लोराईनेटेड र्बाइ फिनाइल‘ हडसन के प्रदूषण में सबसे ज्यादा जिम्मेवार था। साथ ही शहरों के सीवेज हालात को और बद से बदतर कर रहे थे। नदी का बढ़ता प्रदूषण जलीय-जीवों के लिए खतरा तो था ही, हडसन की मछलियों को खाने वाले भी बुरी तरह से बीमार हो रहे थे। इन्हीं कारणों से यह सीवर का गंदा नाला समझी जाने लगी थी। प्रदूषण और बदबू से लोेग नदी से दूर रहने लगे और यह लगने लगा था कि हडसन अब महज कहने के लिए एक नदी रह जाएगी।
लेकिन नदी का यह दर्द हडसन के मछुआरों से देखा नहीं गया। उनका दर्द इस गाने के रूप में सामने आता है - ‘‘कहाँ गए हमारे सारे फूल, जो लड़कियाँ फूल उठाती थीं, वे कहाँ गईं, वो नौजवान कहाँ गए, जो फूलों के आसपास घूमते थे।‘’
मछुआरों का दिन-रात का रिश्ता हडसन से था। उन्हें अपने अस्तित्व पर खतरा दिखने लगा। मछुआरे खड़े हुए। यह नदी की ही नहीं उनकी रोजी-रोटी की लड़ाई भी थी, लड़ाई धीरे-धीरे अमेरिका के न्यायालयों से लेकर मैदान तक में हुई। इसी संघर्ष के दौरान एक विश्वप्रसिद्ध गीत ‘हम होंगे कामयाब’ ‘(वी शैल ओवरकम)‘ की रचना हुई। मैदान में लड़ रहे मछुआरों को न्यायालय में बहादुर वकीलों की जरुरत थी, क्योंकि लड़ाई बड़े काॅरपोरेट्स जाइंट ‘जनरल इलेक्ट्रिक‘ जैसी कम्पनियों से थी। कम्पनियों के पैसे, पैरोकारों के आतंक का जवाब देने के लिए आगे आए अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति ‘जान एफ कैनेडी‘ के पोते और वकील जूनियर कैनेडी। हडसन की लड़ाई के लिए मछुआरों और वकीलों की एक समर्पित टीम बनी, जिन्हें हडसन का समाज ‘रिवरकीपर (नदी-प्रहरी)‘ नाम से जानता है। हडसन के जल-जीवों के अधिकार और उन पर आश्रित समाज की ओर से न्यायालय में मुकदमा दायर किया गया। अमेरिकी इतिहास में पर्यावरण को लेकर यह पहला कानूनी मुकदमा था।
अदालत में लोगों ने सरकारी नीतियाँ खासकर सीवेेज नीति के खिलाफ गुहार लगाई। हडसन के इस सामुदायिक संघर्ष का देशव्यापी असर पड़ा। सरकार नेशनल इनवायरमेंट पालिसी रिव्यू एक्ट (नीपा) पारित करने पर मजबूर हुई। इसी के साथ सन् 1972 में क्लीन वाटर एक्ट (सीडब्लूए) पारित हुआ। इस कानून के चलते परमिट के बिना, प्रदूषण करने वाले तत्वों को, चाहे वे ठोस हों या द्रव, नदी में प्रवाहित करना गैरकानूनी करार कर दिया गया। ‘रिवर मंे सीवर’ किसी कीमत पर मंजूर नहीं था। इस फैसले का लब्बो-लुआब यह है कि इस फैसले और कानून ने कमाल कर दिया। कानूनी सख्ती के कारण हडसन और उसकी सहायक नदियों में निर्बाध रूप से कचरा डालने पर लगाम लगी। कई प्रदूषक कारखाने बंद हुए। उद्योगों और नगरपालिकाओं को नदी में गंदे पानी का प्रवाह बिल्कुल रोकना पड़ा। यह हडसन के समाज की बड़ी जीत थी।
गंदा नाला बन चुकी हडसन एक बार फिर चमक उठी और हडसन में दोबारा जान आ गई। मछलियों की संख्या तेजी से बढ़ी। मछुआरों की आजीविका की रक्षा हुई। मछुआरे, केवट और नहाने वाले लोग फिर नदी का आनंद लेने उतर पड़े। लेकिन असली सवाल था इस उपलब्धि को बचाए रखने का। हडसन का समाज ‘हाथ-पर-हाथ‘ रखकर बैठा नहीं रहा, वह चैकस है। नदी ने जो कुछ हासिल किया है वह बचा रहे, इसके लिए लगातार चैकसी जारी है।
हडसन का समाज जानता है कि शहरी इलाकों से बहने वाला नदी का हिस्सा अभी भी खतरे की जद में है। वजह साफ है कि उन इलाकों में अंधाधुंध विकास हो रहा है। भरोसा नही विकास कब विनाश का रूप ले ले और नदी उसकी जद में आ जाए। यह खतरा ऐसे में और बढ़ जाता है, जब राज्य और संघीय सरकारों के स्तर पर पर्यावरण कानूनों के पालन में लगातार उदासी और निकम्मेपन का भाव बढ़ता जा रहा हो। रिवर-वालंटियर्स अपनी नौकाएं लेकर अभी भी दिन-रात नदी में ही रहते हैं। वहीं नावों पर ही उन्होंने ‘रिवर वाटर क्वालिटी‘ लैब बना रखे हैं। कहीं से भी लगा कि नदी में कोई प्रदूषण आ रहा है, तो तुरन्त उसकी जाँच करना और गड़बड़ी पकड़े जाने पर मैदान से माननीय अदालतों तक की कार्यवाही में जुट जाना, उनका रोजमर्रा का काम है। हडसन के रिवर-वालंटियर्स का एक महत्वपूर्ण अभियान है ‘फिशेबल रिवर कैंपेन‘। इस अभियान के तहत कार्यकर्ता लगे हैं कि जिन मछलियों के लिए हडसन पहचानी जाती है उनकी घटती तादाद को रोक जा सके। अभियान उन तमाम विपरीत परिस्थितियों को ठीक करने में लगा है जो कि मछलियों के खिलाफ हैं जैसे कि उनकी आवासीय स्थितियों का क्षरण, सीवेज का ओवरफ्लो, बिजलीघरों से निकलने वाला प्रदूषण, हमलावर प्रजातियों का बढ़ना, नदी में मछलियों का अंधाधुंध शिकार।
हडसन के नदी-स्वयंसेवक हर साल एक बड़ा जलसा करते हैं। हजारों की संख्या में हडसन नदी-स्वयंसेवी इकट्ठा होते हैं। ‘क्लीयर वाटर फेस्टिवल‘ नाम से होने वाले जलसे का मकसद है कि नदी लोगों के हृदय में जिन्दा रहे। हडसन के लिए खूब गीत रचे गए है। पीट सीगर के गानों का एक एलबम है- ‘क्लीयर वाटर‘। इस उत्सव के दौरान लोगों को हडसन की मदद हेतु आगे आने के लिए प्रेरित किया जाता है। पीट सीगर द्वारा शुरु किया गया ‘क्लीयर वाटर फेस्टिवल‘ आज अमेरिका का सबसे बड़ा ‘पर्यावरणीय समारोह‘ बन चुका है। पीट सीगर का ख्वाब था कि ‘हडसन और मेरे देश की हर नदी में साफ पानी बहे।‘
जाहिर है हडसन जैसी तमाम नदियों की बहाली और सुरक्षा के लिये समाज की सक्रियता ही सबसे अहम चीज है। यह कार्य हमंे अपने देश की नदियों को स्वच्छ रखने के लिए भी करना होगा।

कहाँ गये वे दिन - डा॰ नवलता

परम्परागत भारतीय जीवनशैली में ऋतुओं के आगमन का स्वागत और प्रस्थान पर मंगलकामना उत्सवों तथा पर्वों के रूप में की जाती रही है। वस्तुतः भारतीय जीवन दर्शन में प्रकृति से तादात्म्य जीवनयात्रा के अविकल तथा अविरल गतिमय चक्र के लिये सदा से आवश्यक माना गया। यही कारण है कि हमारे राष्ट्र में विकास के मूलाधार के सूत्र जीवनमूल्यों से बॅंधे थे। दुर्भाग्य से प्रगति और विकास के आधुनिक मानदण्डों ने न केवल हमारी बाह्य दृष्टि को परिवर्तित किया है, अपितु हमारी विचारधारा, हमारे व्यवहार तथा लौकिक-सामाजिक परम्पराओं के अर्थ बदल दिये हैं। फलतः ऋतुओं के स्वाभाविक चक्र, उनमें परम्परागत रूप से प्रकृति से आदान-प्रदान का सामञ्जस्यपूर्ण क्रियाकलाप तथा सामान्य जन-जीवन के सहज उल्लास में चिन्ताजनक अवरोध आया है। छोटी-छोटी बातों पर यदि दृष्टिपात किया जाये, तो बरबस मन के किसी कोने से यह प्रश्न उठता है कि - कहाॅं गए वे दिन!
आज से लगभग चालीस-पचास वर्ष पहले, अपने बचपन में 7 या 8 जुलाई को विद्यालय खुलते थे, तो प्रायः पानी बरसा करता था। बस्तों में पाॅलीथीन-बरसाती में पुस्तकें रख कर स्वयं भीगते हुये विद्यालय जाना कितना सुखद लगता था। बहुत बरसात हुई, तो सिर पर बरसाती लपेट कर निकल पड़ते थे। बरसाती पानी में भीगते, स्कूली जूतों से छपाछप करते हुए आना भी हमारे लिये खेल से कम नहीं था। यदि स्कूल आरम्भ होने के समय लगातार घोर वर्षा हुई, तो वर्षावकाश (रेनी डे) हो जाता था। रह-रह कर मेघों का गरजना, बिजली का कड़कना, काली घटाओं का घिरना, दिन में भी आकाश में अॅंधेरा छा जाना हम बच्चों के लिये पिकनिक से कम नहीं होता था। तब घरों की खिड़कियों और चैखटों पर बैठकर उन काली घटाओं को देखना और पानी के धीमा होने पर कागज की नाव बना कर बाहर के ठहरे हुए पानी में तैरा कर भाई-बहिनों से प्रतिस्पद्र्धा, कि किसकी नाव देर तक तैरती है, मन को बड़ा आनन्दित करता था। यह आनन्द यों ही नहीं होता था, अपितु ज्येष्ठ की तपती धूप और लू के थपेड़ों की गर्मी झेलने के बाद का सुख था वह। आज बहुत निर्धन वर्ग के बच्चे भी उस प्रकार स्कूल जाते नहीं दिखते। सत्र के प्रथम दिन से ही पढ़ाई के नाटक में खोता बचपन उस सुख की कल्पना भी कर सकता है? इसका समय नहीं है उनके पास। 
याद आती है कालिदास के मेघदूत की प्रथम पंक्ति ‘आषाढस्य प्रथमदिवसे......’, जिसमें आषाढ के प्रथम दिन पर्वतशिखर पर वर्षा के लिये तत्पर मेघ का वर्णन है। तीस वर्ष से अधिक वय के लोगों को स्मरण होगा, कि पहले आषाढ के प्रथम दिन वर्षा अवश्य होती थी। वर्षा की पहली फुहारों से मिट्टी से उठती सोंधी गन्ध मानो वर्षा के स्वागत में व्यक्त की गई प्रसन्नता का संकेत होती थी। हमारे शरीरों पर गर्मी से चुलचुलाती पनभरी घमौरियाॅं नन्हें-नन्हें मोती के दानों सी प्रायः सबके शरीरों पर देखी जा सकती थीं। वर्षा ऋतु की पहली बरसात में घर के आॅंगन, छत या बाहर निकल कर जी भर कर स्नान न केवल आनन्ददायक होता था, बल्कि उन घमौरियों की वह औषध हुआ करती थी। हल्के हाथों से खुजला कर घमौरियाॅं फोड़ना, मुल्तानी मिट्टी लगा कर वर्षा के जल में भीग कर स्नान करना शरीर की गर्मी को शान्त करने का घरेलू उपाय हुआ करता था। उनकी सूखी पपडि़यों के निकल जाने पर पुनः नई त्वचा निकलती थी और पुनः स्निग्ध त्वचा से शरीर कान्तिमान हो जाता था। यह एक स्वाभाविक प्रक्रिया थी, प्राकृतिक उपचार की। अब सुविधाओं के अति सुलभ हो जाने तथा प्रदूषण के भय के कारण घरों में पंखा तथा कूलर तो क्या, ए0सी0 भी रहता ही है। परिणामतः घमौरियाॅं कम लोगों के शरीर पर दिखाई देती हैं। भले ही इससे हमें सुख मिलता है, किन्तु पसीने द्वारा शरीर के मलनिर्गम तथा सहज रूप में शरीर के अतिरिक्त तापमान के न निकल पाने के कारण अनेक स्वास्थ्यजन्य समस्याएॅं उत्पन्न होती रहती हैं। 
हमें स्मरण हैं वे दिन, जब बादलों के दिखते ही सड़कों पर कच्छा-लॅंगोट पहने नटों के ‘काले मेघा पानी दे, पानी दे गुड़धानी दे’ के ग्राम्य स्वर गूॅंजने लगते थे, जो आसन्न वर्षा का पूर्वानुमान होता था। सड़कों पर लोट-लोट कर ईश्वर से पानी और गुड़धानी की गुहार लगाना और उनके शरीरों पर प्रत्येक घर से बाल्टी दो बाल्टी पानी डाल कर कुछ अन्न आदि का दान कर मानो लोगों द्वारा उनका उत्साहवर्द्धन तथा समर्थन सामाजिक दायित्व तथा निरभिमान सामूहिक इच्छाशक्ति का हेतु होता था। याद रहे, कि भारतीय कृषि का मूलाधार वर्षाजल है तथा वर्षा के पश्चात् होने वाली मुख्य  फसल, खरीफ, ईख, धान और शारदीय फसलें जल के विना किसी दशा में प्राप्त नहीं हो सकतीं। आज शायद ही कहीं ‘काले मेघा’ दिखाई देते हों। 
मुझे ध्यान आता है, कि पहले कभी यात्रा करते समय सड़कों के दोंनों ओर तोरण द्वार का आकार बनाते वृक्षों की फैली हुई शाखायें छाया तो प्रदान ही करती थीं, आवश्यकता पड़ने पर मीठे फलों का स्वाद भी लिया जा सकता था, क्योंकि अधिकतर आम, जामुन फलदार वृक्ष मार्गों के दोनों ओर लगाए जाते थे। तब वृक्षों के स्वामी किसी अपरिचित को भी अपने वृक्ष के फल खिला कर सन्तुष्टि और प्रसन्नता का अनुभव करते थे। आज क्या कोई अपरिचित किसी के वृक्ष से उसके सामने फल तोड़ने का साहस कर सकता है! बीच-बीच में स्वच्छ जल से भरे तडागों और कूपों के निर्मल जल से प्यास बुछाना पथिकों के लिये दुर्लभ नहीं होता था। सड़कों के किनारे स्थित खेतों में काम करते कृषकों तथा हरे-भरे खेत देखते-देखते कब यात्रा पूर्ण हो जाती थी, पता नहीं चलता था। वर्तमान समय में राजमार्गों पर छायादार वृक्षों का स्थान प्रायः व्यावसायिक यूक्लिप्टस ने ले लिया है, जो न केवल छायाहीन होते हैं, अपितु धरती के गर्भ से अत्यधिक जल का अवशोषण कर जलस्तर को निम्न करने में कारणभूत होते हैं।
वर्षा जीवन तथा उसके लिये आहार देने वाली ऋतु है। इस दृष्टि से जब याद आते हैं वे दिन, तो फलों के राजा आम की चर्चा के विना रहा नहीं जा सकता। यद्यपि पहले भी आम की बहुत सी प्रजातियाँ हुआ करती थीं, किन्तु तुकमी देशी आम का तो एकछत्र साम्राज्य होता था। तब आज की भाँति दशहरी का बोलबाला नहीं था, अपितु गरमी आरम्भ होते ही ताजी कच्ची अमियों की चटनी और पना हर घर के भोजन का हिस्सा बनकर उसकी की शोभा बढ़ाते थे। दाल में कच्चे आम का ठोकरा बड़ा स्वादिष्ट लगता था। बरसात आरम्भ होने के साथ ही देशी आमों से लदे वृक्ष आमन्त्रण देने लगते थे। गाँवों के बाग-बगीचों तथा नगरों की हाट-बाज़ारों में देशी आम के ढेर ही ढेर दिखाई देते थे। पेड़ों से पक कर टूटे ताजे सुपाच्य आमों को पानी भरी बाल्टी में कुछ देर रख कर उनकी गर्मी निकाल कर चूसना बूढ़ों-बच्चों सबको रुचिकर लगता था। कितने ही आम चूस कर भी अपच नहीं होती थी, जबकि स्वादिष्ट दशहरी की गरिष्ठता के भय से हर व्यक्ति दस बारह आम नहीं खा सकता। टबका के रस से रोटी का स्वाद जिसने चखा होगा, उसे आज भी वह स्मरण होगा। दादी-नानी बड़े-बड़े कठौतों में आमों का गाढ़ा रस निकाल कर मोटी चादर पर फैलाकर सुखाया करती थीं, जो सूख कर अमरस कहलाता था। वर्षा के बाद भी अमरस के रूप में खटमिट्ठे आमों का स्वाद अविस्मरणीय होता था। प्रत्येक घर में कम से कम एक आम तथा नीम का पेड़ अवश्य होता था। आम की ऋतु में गाँव-घरों में ‘अपने पेड़’ के आम खिलाने में लोगों की रुचि तथा भावना सामान्य होती थी। वर्षा के आते ही घरों के बाहर बहुत सी जंगली जड़ी-बूटियाँ उग आती थीं, जिनकी पहचान प्रायः सभी महिलाओं को होती थी। शिशु को अतिसार हो गया हो या उदरपीड़ा, माताएँ इन जड़ी-बूटियों से उपचार कर लिया करती थीं। भटकट और मकोय जैसे पादप बड़े उपयोगी होते थे। आज विशेषतः नगरों में वे जड़ी-बूटियाँ न तो सुलभ हैं और न माताओं को उनकी पहचान। बल्कि, क्या नगर, क्या गाँव, एलोपैथिक चिकित्सा में विश्वास के कारण उन वनौषधियों को कोई अपने बच्चों को देना भी नहीं चाहता।
जैसा कि हमने चर्चा की कि वर्षा जीवन देने वाली ऋतु है। स्मृति में आती हैं वर्षा के समय हरी-हरी घास पर रेंगती वे मखमली लाल रंग की सुन्दर वीरबहूटियाँ, वृक्षों की फुनगियों पर चहचहाती चिडि़याँ, धरती पर रेंगते केचुए और पोखर-तालाबों के रुके हुये जल में उत्पन्न कीड़े मकोड़े, टर्-टर् करते मेढक, झंकार करते झींगुर, रात में चल दीपों से जगमगाते जुगनू, जो जीवन में उल्लास तो भरते ही थे, जैविक चक्र के नियन्त्रण में प्रकृति के सहायक भी होते थे। आज न तो वह रेंगती हुई लाल मखमल दिखती है, न चिडि़यों की चहचहाहट सुनाई देती है और न जुगनुओं का वह प्रकाश दिखाई देता है, जिन्हें देखकर ही शायद किसी कवि ने जुगनुओं से आज के कवियों की तुलना करते हुये कहा होगा- ‘‘अब के कवि खद्योत सम जहँ-तहँ करत प्रकास’’। बरसाती कीड़ों को खा कर मेढक पर्यावरण को स्वच्छ रखने में महत्त्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह करते थे। अब पहले जैसी संख्या में मेढक भी नहीं निकलते, क्योंकि वर्षाचक्र अनियमित हो गया है।
आषाढ की परेवा को वर्षा का आरम्भ और आषाढी पूर्णिमा से विधिवत् वर्षा का स्वागत विभिन्न पर्वों के रूप में साकार होने लगता था। सावन के आते ही पुराने वृक्षों की मोटी-मोटी डालों पर बड़े-बड़े पटरों को मजबूत रस्सी से बाँध कर झूले पड़ने लगते थे, जो पूरे सावन पड़े रहते थे। गाँव-घर और मुहल्लों की बालिकाएँ व महिलाएँ अवसर मिलते ही पहुँच जाती थीं, झूलों पर। एक साथ एक-दूसरे को पकड़ कर बैठना परिचित-अपरिचित का भेद मिटाकर, अनजाने ही परस्पर सुरक्षा और अपनेपन का भाव जगाता था। दोनों ओर से नवयुवक झूलों पर चढ़ कर पैंग मारते थे। रिमझिम फुहारों के बीच उन पैंगों से आकाश को छूते झूलों पर बैठे लोगों के कण्ठ से निकले कजरी और सावन के लोकगीतों के समवेत स्वर जिस उल्लास को व्यक्त करते थे, वह देखते ही बनता था। आज वह सब मञ्च के सामयिक लोकगीतों के कार्यक्रमों, आकाशवाणी तथा दूरदर्शन के प्रसारणों, तथा फिल्मी गीतों में सिमट गया है।
सावन के आगमन का अर्थ होता था मेंहदी की भीनी-भीनी सुगन्ध से वातावरण का सुगन्धयुक्त हो जाना। हरी-हरी मेंहदी की पत्तियों को सिल बट्टे पर पीस कर बालिकाएँ, वधुएँ तथा वृद्धाएँ सभी सींक-सलाई से हथेलियों तथा पैरों में चित्रकारी कर मेंहदी रचाती थीं। हरीतिमा से निकली लालिमा प्रकृति की कलात्मकता का कितना सुन्दर प्रमाण है। ललितकला, सौन्दर्यबोध तथा स्वास्थ्यचर्या का अद्भुत संगम होता था उसमें। ज्ञेय है, कि शीतकारक होने के कारण ग्रीष्म ऋतु में शरीरों के अन्दर व्याप्त उष्णता के अतिरेक को नियन्त्रित करने में हरी मेंहदी की औषधीय भूमिका होती थी। क्योंकि शरीर के तापमान का केन्द्र हथेलियाँ और तलवे होते हैं, इसी कारण मेंहदी भी इन्हीं दो स्थानों पर लगाने की परम्परा थी। तापमान को नियन्त्रित करने का यह प्राकृतिक तथा उल्लासप्रद उपाय हमारी परम्परा की वैज्ञानिक दृष्टि को व्यक्त करता है। आज उसका स्थान ब्यूटीपार्लरों तथा अन्य व्यावसायिक दूकानों में कृत्रिम रीति से तैयार की गई रचीली मेंहदी तथा उससे बनाई जाने वाली कलात्मक चित्रकारी ने ले लिया है। अब मेंहदी शीतलता के लिये नहीं, अपितु शौक के लिये लगवाई जती है।
इन चर्चाओं के प्रसंग में विशेष बात यह है, कि सावन के पर्वाें पर बालिकाओं व महिलाओं का विशेषाधिकार होता था। हरियाली तीज के दिन तो घर-घर में हरी चूडि़यों तथा हरी-धानी साडि़यों में सजी महिलाएँ और हरे वस्त्रों को रुचिपूर्वक पहन कर उल्लास प्रकट करती बालिकाएँ प्रकृति की हरियाली का हिस्सा बनकर परिवार का मंगलगीत बन जाया करती थीं। वर्षा में हरे रंग के प्रति यह लगाव एक ओर प्रकृति से तादात्म्य का बोध कराता था, तो दूसरी ओर प्रकृति के आर्तव नियोजन में सहायक भी होता था। कहना न होगा, कि हरा रंग ताप का अवशोषक होता है।
तीज के तीसरे दिन नागपंचमी के दिन प्रातः ही नागपूजा का दृश्य देखने को मिलता था। लोग, विशेषतः महिलाएँ घरों में दूध और कोयले से भूमि पर नागों के आकार बनाकर उनकी पूजा करतीं। फिर बाहर सड़क चैराहों पर दूध रख कर नागों से अपने परिवार की रक्षा की प्रार्थना करती थीं। स्थान-स्थान पर बीन बजाते, पेटारी में नाग लिये सँपेरे दिखने लगते थे। साँप दूध पीते हैं, या नहीं यह आज शोध तथा विवाद का विषय है, किन्तु इन परम्पराओं का तार्किक कारण भूमि की उर्वरा शक्ति को पोषण प्रदान करना होता था, जिसे धर्म समझ कर गृहस्थ जाने अनजाने प्रकृति के प्रति अपने दायित्व को निभाते थे। जहाँ एक ओर वर्षा-जल के साथ भूमि को अर्पित किया गया दूध मिट्टी के लिये पोषक तत्व होता था, वहीं बिल से निकले सर्पों तथा चींटी, मेढक आदि अन्य भूमिशय जीवों द्वारा पोली की गई मिट्टी कृषकों के लिये बड़ी उपयोगी हो जाती थी। अतः मनुष्य के इन अबोले मित्रों के प्रति कृतज्ञताज्ञापन एवं उनके पोषण का एक रूप होती थीं ये परम्पराएँ। साथ ही वर्षा में बिलों से बाहर निकले सर्प आदि अनजाने में कहीं किसी को डस न लें, इसलिये सँपेरे मानवबस्तियों में साँप पकड़ कर अथवा डसने पर उन्हें जड़ी बूटियों द्वारा तुरन्त उपचार कर अपने नैतिक दायित्व का निर्वाह करते थे। इसके बदले में उन्हें भिक्षा में द्रव्य तथा अन्न देना लोग अपना धर्म मानते थे। अस्तु! नागपंचमी की संध्या भाई-बहिनों के नाम होती थी। गोधूली के समय चैराहों पर नये वस्त्रों में सजी बालिकाएँ गेहूँ चने की घुघरी तथा हल्दी अथवा पीले रंग से रंगे वस्त्र की हस्तनिर्मित गुडि़यों को लेकर पहुँच जाती थीं। बालिकाएँ गुडि़याँ डालती थीं और बालक रंग-बिरंगी छडि़यों से उन्हें इस भावना से पीटते थे, कि उनकी ‘बहिनों’ पर कोई विपत्ति न आये। बन्धुवत्सलता का यह भावात्मक संस्कार कहीं गहरे अचेतन में बालिकाओं के प्रति बालकों की सुरक्षा सथा सम्मान की प्रवृत्ति को सुरक्षित रखता था। आज बालिकाओं के प्रति होने वाले अत्याचारों तथा क्रूरतम की कोटि में आने वाले अपराधों को देख कर याद आते हैं नागपंचमी के वे दृश्य।
इसी प्रकार रक्षाबन्धन के दिन भाई की कलाई में राखी बाँधती बहिनों के मन में भाई की दीर्घायुकामना एवं सुरक्षा का भाव होता था तथा भाई उस राखी का मूल्य हर प्रकार से बहिन की रक्षा तथा उसके प्रति न्याय का संकल्प करता था। आज राखी के मूल्य भी बदल गये हैं और यह एक औपचारिक लेन देन का पर्व बन कर रह गया है।
इतना ही नहीं, विकास तथा आधुनिकता ने हमें जहाँ पहुँचा दिया है, उसकी धुन्ध में छिप गया है हमारा अतीत। सोचती हूँ, कहाँ गए वे दिन! कभी लौट कर आयेंगे वे दिन!......

सम्पादकीय- डाॅ॰ भारती पाण्डेय

‘‘हरियाली’’ सृष्टि का शाश्वत तत्व है। यह सनातन है। यह प्राणदायिनी है। यह अत्यन्त आनन्द प्रदायिनी है। इसका स्वभाव सरस व निर्मल है। यह जड़, चेतन, जीव, जन्तु, पेड़, पौधों की वत्सला है। यह दैहिक, दैविक एवं भैतिक जीवन की आद्याशक्ति है। लहलहाती फसलें, पेड़ व जंगल जीवन में समाये हुए हैं। विकास के दौर में भैतिकावादी समाज ने सर्वाधिक अन्याय प्रकृति के साथ किया। विकास के नाम पर पेड़-पौधों की बलि दी जा रही है। स्वतन्त्रता से पूर्व हमारा वनावरण 45 प्रतिशत था जो अब घअ कर मात्र 20 प्रतिश्त है, जबकि उत्तर प्रदेश में मात्र 6 प्रतिशत वनावरण शेष बचा है। पेड़ों की कटान से एक ओर ‘हरियाली’ पर आघात हो रहा है तो दूसरी ओर प्रकृति की कोप दृष्टि का भाजन समाज को भूस्खलन, चक्रवात एवं अकाल-सूखा जैसे दुष्परिणामों के रूप में झेलना पड़ रहा है। त्वरित लोलुपता ने आज मानव को अंधा बना दिया है। प्रकृति-मैत्रिय पोषणीय विकास हेतु हमें ईप्सा पर नियन्त्रण करना ही होगा। भारतीय चिन्तन एवं परम्परा पर आधृत पोषणीय अभ्युदय लोक भारती का निष्कंप सरोकार रहा है। इसी अनुक्रम में लोक भारती ने 4 जुलाई 2015 को लखनऊ स्थित ‘गाँधी प्रतिमा’ परिसर में पेड़ों के स्थानान्तरण से सम्बन्धित ‘पेड़ों का धरना’ देकर सरकार और समाज को जागरुक किया। ‘हरियाली’ गुहार लगा रही है कि सरकार मशीनों के माध्यम से पेड़ों का स्थानान्तरण कर पुनः स्थापित करे, न कि उनका कटान, जिसका संज्ञान प्रदेश के मुख्य सचिव के वक्तव्य में परिलक्ष्ति हो रहा है। ‘हरियाली’ चाहती है कि गाँवों से नगरों को अंधाधुंध पलायन थमे। ग्रामीण युवा नगरों की चकाचैंध की तरफ भाग रहा है। गाँवों का नम्र एवं पोषणीय जीवन उसे रास नहीं आ रहा है। गाँवों को भी नगरीय चकाचैंध से आप्लावित करने की अपवित्र चेष्टा से लोक भारती आहत व चिन्तित है।
अपनी ‘लोक सम्मान’ पत्रिका के माध्यम से हमारा सतत् प्रयास जैविक कृषि पद्धतियों को पुनः प्रतिष्ठित करने का है। ‘शून्य लागत कृषि’ की विचारणा के प्रचार-प्रसार हेतु लोक भारती प्रतिबद्ध एवं प्रयासरत है। इसके अतिरिक्त पेड़ों, नदियों, कुआँ, जलाशयों के संरक्षण से जुड़े विभिन्न पहलुओं को उठाना और तृणमूल स्तर पर कार्य-सम्पादन हमारी प्राथमिकता है। प्रस्तुत अँक से हम भारतीय लोक जीवन से जुड़ी ‘घाघ भड्डरी’ की कहवतों को भी एक स्तम्भ के रूप में प्रारम्भ कर रहे हैं। हमारा प्रयास रहेगा कि भारतीय दृष्टि से प्राणित व सुविचारित लेखों के माध्यम से प्राकृतिक विकास को आत्म्सात करने की प्रतिबद्धता को सुदृढ़ कर सकें।
लोक सम्मान का आगामी अँक ‘युवा शक्ति’ विशेषांक के रूप में प्रकाशित होगा। हमारा प्रयास रहेगा कि हमारे भारत का भविष्य ‘युवा शक्ति’ से जुड़े समस्त पहलुओं पर सकारात्मक दृष्टि से युक्त पे्ररक कार्य, योजनायें, लेख, कहानी, कविता व विचार प्रकाशित हों, जिससे हम अपने राष्ट्र के सभी स्तम्भों में उनके प्रति कर्तव्य भावना जाग्रत कर ने की दिशा में सार्थक पहल कर सकें। सुधी पाठक जनों की भूमिका भी उसमें महत्वपूर्ण है, जिसके लिए वह स्वयं जाग्रत हैं।
शाश्वत हरियाली की हार्दिक मंगल कामनाओं के सहित प्रकृति केन्द्रित विकास की आकांक्षी।

दो शब्द- विश्वनाथ खेमका

स्वर ब्रह्म है, निराकार है। शब्द साकार है, संसार है, संस्कार है और अभिव्यक्ति का सशक्त आधार है। उस आधार के आधार से ही ‘‘लोक सम्मान’’ है। ‘लोक’ अथार्त समस्त सृष्टि। ‘सम्मान’ अर्थात सहअस्तित्व पूर्ण व्यवहार। सम्मान के लिए सामाजिक सुरक्षा व विकास के साथ-साथ जड़ चेतन के संरक्षण-संवर्धन की अवधारणा का संदेश जन-जन तक पहुँचे, यही पत्रिका का उद्देश्य है। जिसका मूलभाव है, ‘‘सब एक दूसरे के पूरक हैं तथा सबको सामंजस्य के साथ सुख-शान्ति से जीने का हक है।
भारत सुजलाम-सुफलाम की कामनाओं, भावनाओं एवं परम्पराओं का देश है, यहाँ माँ गंगा जैसी पवित्र नदियाँ, देवात्मा हिमालय जैसी उत्तुंग पर्वत श्रंखलाएं तथा मानसरोवर जैसी निर्मल-पावन झीलें हैं, जो राष्ट्रीय एकात्मता की संवाहक, संरक्षक व संधारक हैं। सनातन संस्कृति का बोध इसके कण-कण में समाहित है। यहाँ सामाजिक जीवन व संस्कारों में प्रकृति भाव व्याप्त है। जल-स्रोत, कुँआ, तालाब, नदी, पेड़, पहाड़, जीव, जड़-चेतन सभी उसके जीवन में माला की भाँति गुंथे हुए हैं। सभी देते है इसलिए पूज्य हैं। उनका संरक्षण संवर्धन हमारे सुखी-समृद्ध भविष्य के लिए आवश्यक है।
इसी भाव, विचार और उद्देश्य की संवाहक ‘लोक सम्मान’ जो आपकी अपनी पत्रिका हैै। इसके द्वारा उपयुक्त विषय-वस्तु एवं नियमित संदेश जन-जन तक समय से पहुँच सके, इस हेतु आप की भूमिका अत्यन्त महत्वपूर्ण है। आप स्वयं समर्थ हैं, विचार, अनुभूति, निर्णय और अभिव्यक्ति में।
आपका स्नेह हमारा संबल है। आपका सहयोग हमारी प्रेरणा है। हमें प्रतीक्षा है, आपके सुझावों, विचारों, संदेशों और सहयोग भरे उत्तर की। आप lokbharti@yahoo.com पर ई-मेल कर सकते हैं। संस्था आपकी अत्यन्त आभारी रहेगी।

गुरू भारत देश बने फिर से -दयानन्द जडि़या ‘अबोध’

बन वीर स्वदेश से प्रेम करो,
रण-प्रांगण से रिपु मार भगाओ।
धन-धान्य भरो शुचि सौख्य लहो,
हर गेह में स्वर्ण व रत्न सजाओ।।
गुरू भारत देश बने फिर से,
जग-मध्य पुनीत मशाल जलाओ।
नव शोध ‘अबोध’ जवान करें,
समता सुविचार सदा अपनाओ।। (1)
प्रिय! योग करो तन-रोग भगें,
बलवान व पुष्ट शरीर दृढ़ाओ।
मत औषधि का उपयोग करो,
कर योग सभी निज स्वास्थ्य बनाओ।।
अब योग में धर्म समाज व वर्ग को
बाधक बन्धु कभी न बनाओ।
गहो हर क्षेत्र में जीत सदा,
ध्वज भारत का जग में लहराओ।। (2)
अनुराग - तड़ाग करो अवगाहन,
प्रेम पुनीत महान बड़ा है।
नित द्वैष कलेश बढ़ा तम तोम-
लिए विपदा अब द्वार खड़ा है।।
जग में प्रिय! प्रेम जिसे उसका,
भगवान सहायक ही तगड़ा है।
सुख भोग ‘अबोध’ वही करता,
जिसके मन प्रेम सनेह बड़ा है।। (3)
- ‘चन्द्रा-मण्डप’ 370/27 हाता नूरबेग,
संगम लाला बीथिका, सआदतगंज, लखनऊ-03