Friday, May 29, 2015

समग्र विकास - विशेषांक, मई 2015

सम्पादकीय -
समग्र विकास एक अन्योनाश्रित सहअस्तित्व के वातावरण को स्वीकार करते हुए प्रत्यक्ष या परोक्ष लगभग समान मात्रा में लेनदेन या क्षतिपूर्ति की सुनिश्चित व्यवस्था के पालन करने से ही सम्भव हो पाता है। सामान्य बोलचाल की भाषा में एक हाथ दे और दूसरे हाथ ले वाली कहावत समग्र विकास के लिए अक्षरशः सत्य होती है। उदाहरण के लिए खेत के लिए आवश्यक पोषक, जल, शुद्ध वायु एव भरपूर प्रकाश की व्यवस्था करनेे पर, उससे हमें भरपूर फसल का उत्पादन उपलब्ध होता है। इस सिद्धान्त के अनुपालन में जाने या अनजाने में की गई भूल, शिथिलता, उपेक्षा, निष्क्रियता या विपरीत कार्य से विपरीत व विनाशकारी प्रभाव उत्पन्न होता है।
ग्लोबल वार्मिंग, भूस्खलन, चक्रवात जैसे प्रकृति के भीषण विनाशकारी परिणाम समाज द्वारा प्रकृति से एक हाथ से नहीं हजारों-हजार हाथों से निरन्तर लेने और बदले में दूसरे हाथ से कुछ भी न लौटाने की दुष्प्रवृŸिा के दुष्परिणाम हैं। वस्तुतः प्रकृति के सभी घटक निम्नलिखित चित्र की भाँति एक-दूसरे से क्रमबद्ध जुड़े हैं। उसके क्रम में कहीं पर भी छेड़छाड़ करने, अवरूद्ध करने, तोड़ने या किसी भी प्रकार की क्रिया करने का प्र्रभाव समग्र पर पड़ता है, क्योंकि प्रकृति टुकड़ों या अलग-अलग घेरों में विभक्त नहीं है। अतः हमारे द्वारा किया गया कोई भी कार्य समग्रता को प्रभावित करेगा। अतएव समग्र विकास का कार्य भी इसी सिद्धान्त के प्रकाश में किया जाना चाहिए।
भारतीय दर्शन में इसीलिए मनुष्य के साथ ही प्रकृति के समस्त घटकों को महत्वपूर्ण स्थान व सबके साथ सहअस्तित्व पूर्ण व्यवहार की व्यवस्था भी की गई थी। जबकि पश्चिमी चिन्तन में सहअस्तित्व के स्थान पर मनुष्य को वरीयता पर रखते हुए अन्य समस्त घटकांे का टुकड़ों में विचार किया गया है, जिसका दुष्परिणाम अब विभिन्न रूपों में परिलक्ष्ति होने लगा है।
भारतीय ऋषियों ने प्राकृतिक पारिस्थितिकी को संस्कृति में स्थान देकर दैनिक जीवन के व्यवहारों, मन्त्रों, पूजा एवं रीति रिवाजों के माध्यम से निरन्तर स्मरण कराया और उसके अनुरूप कार्य कराया। ऋषि चेतना से ऐसे अविष्कार कराए और ऐसी व्यवस्थाएं व मान्यताएं सुनिश्चित की, जिनसे प्रकृति के शोषण या भोगने की पश्चिमी प्रवृŸिा के बजाय मात्र आवश्यकता पूर्ति के निमिŸा माँ के स्तन से दूध पीना, गाय से उसके बछड़े के लिए आवश्यक दूध छोड़ कर ही दुहने और उपयोग करने का हमारा व्यवहार हमारे आचरण व संस्कारों में  समाहित हो गया है।
इसे कहते हैं- ‘सिम्पिलसिटी इज द साइन आॅफ डेवलपमेन्ट’, अर्थात् सरलतमता ही विकास का चिन्ह है। जबकि पश्चिमी विचार के अनुसार ‘काम्पलेक्सिटी इज द शाइन आॅफ डेवलपमेन्ट’ अर्थात् जटिलता ही विकास का चिन्ह है। इसका सरल उदाहरण है, यदि आप ने कुछ भी अपने उपयोग की वस्तु उत्पादित की, उसका प्रसंस्करण किया और स्वयं, अपने परिवार व मित्रों द्वारा उसका प्रयोग किया गया तो उसका राष्ट्रीय आय (जी॰डी॰पी॰) में कोई स्थान नहीं। अर्थात् सरल विधि से किया गया उत्पादन और उसके उपयोग से कोई विकास का कार्य नहीं हुआ। परन्तु यदि आप ने टेढ़े मार्ग पर चलकर पहले उत्पादित वस्तु उदाहरण के लिए गेहूँ  बाजार में बेच दिया और फिर अपने उपयोग के लिए मिल में तैयार आटा, दलिया या बे्रड खरीद कर उपयोग किया, तो आप का उत्पादन विकास (जी॰डी॰पी॰) में जुड़ेगा।
अतः भारत के समग्र विकास में भारतीय विकास दर्शन एवं चिन्तन के आधार पर सभी दिशाओं में आगे बढ़ने की आवश्यकता है, यथार्थ में वही विकास सार्थक व विश्व के लिए मार्गदर्शक होग