हमे हजारों बलिदानों के बाद मिली स्वतन्त्रता के 67 वर्ष व्यतीत हो चुके हैं। जो स्वतन्त्रता भारतीय सांस्कृतिक परम्पराओं के ताने-बाने में गुंथी हुई अपनी एक अलग पहचान से युक्त थी, इसका हमें बोध था। आरम्भ में राष्ट्रीय भावना से ओत-प्रोत जय घोषों व देश भक्ति के गीतों से वातावरण गूँजित तथा ‘‘राष्ट्रवाद’’ मन-मष्तिस्क में हिलोरें भरता रहता था। परन्तु विकास की अंधी दौड़ ने प्रत्यक्ष या परोक्ष भविष्य की अनेकों चुनौतियों की तपन में हम भारतीयों को एक निर्णायक मोड़ पर ला कर खड़ा कर दिया है।
स्वतन्त्रता के साथ रामराज्य की कल्पना की गई थी, पर आज उस पर प्रश्न उठाये जा रहे हैं। राजनीति में ‘राज’ का वर्चस्व है और नीति मानो गौढ़ हो गई है। चन्द लोग संकल्प बद्ध हैं, अन्य लोग उनकी आलोचना-प्रत्यालोचना की होड़ में शामिल हैं।
हमारा देश ऐसी सांस्कृतिक विरासत को आज धारण किए हुए है, जिसमें भाषा-साहित्य-वेषभूषा, धार्मिक विश्वास-आस्थाएँ अपनी मजबूत जड़ों के साथ हिली हुई हैं। देश की संस्कृति पर विदेशी प्रभाव इस कदर हावी होता जा रहा है कि सर्वत्र मात्र कृत्रिमता का वातावरण ही लक्षित होता है।
कहा जाता है कि परिवर्तन समय की माँग है, और कुछ लोग जो हो रहा है वह समय की माँग का ही परिणाम है, यह तर्क दे सकते हैं। पर मेरा मानना है कि कोई भी विकास परम्पराओं को त्याग कर सफल नहीं हो सकता। भविष्य का स्वप्न बुनने के लिए जो नया है वह तो आकर्षित करता है परन्तु परम्परा की आधारशिला उसे सुदृढ़ बनाने का महŸार कार्य करती है। इसलिए स्वतन्त्रता के इतने वर्षों बाद हम संकल्प लें कि विकास के परम बिन्दु पर पहुँचने पर भी अपनी विरासत व परम्पराओं की रक्षा करेंगे।





