Friday, May 29, 2015

करें समग्र विकास - दयानन्द जडि़या ‘अबोध’


उच्च ज्ञान विज्ञान से, करें समग्र विकास।
विश्व व्योंम पर भानुवत, दिखे देश सोल्लास।।
गली ग्राम गृह नगर सब, होवें विकसित भव्य।
कृषि पशुपालन वणिज से, पायें अतुलित दृव्य।।
नीर नदी निर्मल दिखे, जलचर रहें प्रसन्न।
वृक्ष लताओं से धरा, हो सज्जित सम्पन्न।।
बनें अगर अट्टालिका, तो निर्धन का भी गेह।
शिक्षित हो जन वर्ग सब, पर न घटे उर-स्नेह।।
स्वास्थ्य सुरक्षा हेतु हों, अस्पताल हर ठौर।
दिखे नवल तकनीक से, राष्ट्र-मध्य नव दौर।।
वन में पशु रक्षित रहें, पक्षी करें किलोल।
टेरे पपीहा ‘पिउ कहाँ’, कोकिल कुह-कुह बोल।।
करते रहे अतीत में, हम नव ग्रह की सैर।
शशि मंगल पर फिर धरें, जा यानों के पैर।।
जल, थल, नभ त्रय वाहिनी, बनें सुदृढ़ भरपूर।
नव आयुध अवलोक कर, हों अरि सपने चूर।।
साधन यातायात के, रेल कार, बस, यान।
सुख सुविधा संयुक्त हों, हो न कष्ट अनुमान।।
कल उद्योग स्वदेश में, लाऐं प्रगति-प्रभात।
हों भारत में तीब्रतम, मुद्रा की बरसात।।
ध्यान रहे इस बात का, हो इस भाँति विकास।
कटु विनाश मुख खोल निज, आये स्वल्प न पास।।
हो सब ओर विकास की, आभा प्रादुर्भूत। 
पर ‘अबोध’ गह नीति सद्, बनें शान्ति के दूत।।
सम्पर्क-चन्द्रा मण्डप, 370/27 हाता नूरबेग, संगमलाल वीथिका,
सआदतगंज, लखनऊ-226003