Friday, May 29, 2015

समग्र विकास की हमारी दृष्टि - डाॅ॰ अनिल प्रकाश जोशी

समग्र विकास में गाँवों का महत्व - प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने पिछले दिनों गाँवों की बदलती तस्वीर में वैज्ञानिकों की भूमिका पर टिप्पणी कर देश में संस्थानों के दायित्वों की तरफ अहम इशारा किया है। यह बात पूरी तरह सच है कि ये संस्थान इस देश को इण्डिया बनाने में चिंतित रहे, न कि भारत। आज भी हमारे छह लाख गावों में देश की 70 प्रतिशत आबादी रहती है। इस बड़ी आबादी के वे सभी अधिकार उतने ही महत्वपूर्ण और जरुरी है जितने कि शहरी आबादी के। बड़ी बात तो यह है कि देश में जो भी आर्थिक गतिविधियाँ हैं उनका मूल स्रोत गाँव ही है। वर्तमान आर्थिक तंत्र का 90 प्रतिशत हिस्सा गाँवों के संसाधनों से सबल होता है। देश में शायद ही ऐसे गाँव हो जो आज आर्थिक स्वतंत्रता का दम भर सकते हों। एक समय गाँवों में सतत् विकास दिखता था। सब कुछ गाँवों में ही होता था। श्रम व संसाधानों का बड़ा गहरा गठजोड़ था, लेकिन नई तकनीकें गाँवों में पैठ नहीं बना सकी जबकि आज गाँवों में शहरी उत्पादों ने पूरी जगह बना ली है।
असल में नए विज्ञान ने गाँवों के ज्ञान को विस्थापित किया है। इसका उद्देश्य होना चाहिए था कि गाँवों की दक्षता को नए विज्ञान के साथ जोड़कर मजबूत करे, लेकिन हुआ इसके विपरीत। देश में आज गाँव मात्र उत्पादक के रूप में जाने जाते हैं। दूसरी ओर शहर गाँवों में उत्पादित वस्तुओं का शोधन कर लाभ कमा रहे हैं।  शहरी उद्योग इन्हीं कृषि उत्पादों का शोधन कर और अधिक लाभ उठाते हैं। इससे उत्पादक और उपभोक्ता दोनों ही दुखी है। एक को कम दाम मिलते हैं और दूसरे को ज्यादा दाम देने पड़ते है और सब इसलिए ही सम्भव हुआ, क्योंकि हमने विज्ञान को ग्रामोन्मुखी नहीं बनाया। देश के बड़े संस्थान चाहे वे कृषि से जुडे हों या फिर अन्य संसाधनों से, गाँवों से अभी भी बहुत दूर ही हैं। देश का सबसे बड़ा हिस्सा खेती में जुटा है और इसके लिए भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद व इसके 105 संस्थान व 55 कृषि विश्वविद्यालय गाँवों के लिए ही समर्पित होने चाहिए थे। पर क्या देश में खेती व किसान के हालात बेहतर कहे जा सकते हैं? प्रौद्योगिकी व उद्योग शोध परिषद यानी सीएसआइआर और इससे जुड़े 20 से अधिक संस्थान ग्राम्य तकनीक पर काम करनेे का दावा करते हैं। ऐसे ही देश में आइआइटी व एनआइटी व सैकड़ों विज्ञान संस्थान कार्यरत है, लेकिन गाँवों के हालात बद-से-बदतर ही हुए हैं। विज्ञान संस्थानोें और लाखों वैज्ञानिकों से भरा ये देश मंगल पर तो चला गया, पर गाँवों में मंगल कार्य आज तक अछूूते ही रहे।
ऐसे में प्रधानमंत्री का विज्ञान कांग्रेस में वैज्ञानिकों का आवाहन बहुत महत्व रखता है। दुर्भाग्य से हमारे देश में कागजी शोध का बड़ा महत्व है। हमारे वैज्ञानिक अपने विज्ञान काल में कितने शोध-पत्र छापते हैं। उनके शोधपत्र का प्रकाशन ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाता है, न कि यह कि वह शोध कितना जमीन पर उतरा। यही हमारे देश के विज्ञान संस्थानों व वैज्ञानिकों की ज्यादा बड़ी कमी रही है। देश के सभी संस्थानों में होने वाले शोध अधिकतर अव्यवहारिक होते हैं। बाकी जो शोध ठीक-ठाक होतंे भी हैं तो उनमें से कई कभी बाहर ही नहीं निकले और जो कुछ निकल कर आए भी तो उनमें से कई तोे जमीन पर उतरे ही नहीं। इसका कारण हमारी शोध करने की संकुचित पहल है। किसी भी तरह के शोध को दिशाहीन व अव्यवहारिक नहीं होना चाहिए। हमारे वैज्ञानिक संस्थानों व वैज्ञानिकों के पास स्पष्ट संदेश होना चाहिए कि शोध व्यावहारिकता के आधार पर तय हो, न कि शोध पत्रों पर।
विज्ञान व वैज्ञानिकों का एक बड़ा दायित्व है कि वे विज्ञान में असमानता से बचें और ग्रामोन्मुखी विज्ञान को प्राथमिकता दें। हमें नहीं भूलना चाहिए कि विज्ञान के पहले हकदार गाँव है, जहाँ से मूल उत्पादन की नींव पड़ी है। अगर उनका दायित्व मात्र उत्पादन के रूप में ही देखा जाएगा तो वे बड़े लाभ के हिस्सेदार नहीं बन पाएंगे और लाभ ही तय करेगा कि उनका झुकाव कृषि या अन्य उत्पादों की तरफ विश्वास के योग्य है भी या नहीं। गत दो-तीन दशकों में गाँवों व किसानों की अपनी खेती और उत्पादों के विश्वास में कमी आई है। कारण साफ है कि स्थानीय उत्पादों से लाभ लागत के भी नीचे पहुँच गया है। मजबूरी व विकल्प का अभाव उन्हें इस श्रम से जोड़े हुए है। वरना जिन्हें अवसर मिला उन्होंने अक्सर इसे त्यागना ही बेहतर समझा। लेकिन अगर जल्दी सब कुछ नहीं संभला तो हम बड़े संकट में घिर जाएंगे। गाँवों का शहरों की तरफ ़रुख हमारे प्राथमिक उत्पादन पर बड़ा असर डालेगा।
अब यह जरूरी हो गया है कि हमारी विज्ञान नीति ऐसी हो जो गाँवों से जुड़ी हो। मंगलयान पर पहुँचने वाले वैज्ञानिक अगर प्रधानमंत्री के वाह-वाही के पात्र हों तो लोक विज्ञानी को भी उसी श्रेणी में रखा जाए और उसे भी राष्ट्रीय सम्मान की दृष्टि से देखा जाए। गाँवों में कार्य करने वाले वैज्ञानिकों को उत्साहित करना होगा। बड़े-बड़े संस्थानों में कार्य करने वाले वैज्ञानिकों को ही प्रथामिकता न मिले, बल्कि ग्रामीण विज्ञान के कार्य को भी बड़े स्तर का योगदान माना जाए। अंतरिक्ष, न्युक्लियर जैसे बड़े शोध, जिनका घर-गाँव से सीधा सम्बन्ध नहीं है, आज प्रमुखता से जाने जाते हंै। इनके विज्ञानी ही प्रधानमंत्री कार्यालय की शोभा ब़ढ़ाते हैं। दूसरी तरफ लोक विज्ञानी को ऐसा सम्मान नहीं मिलता। हम जब तक ग्राम विज्ञान की आवश्यकता को देश के अन्य विज्ञान की आवश्यकताओं के समानान्तर नहीं देखेंगे तब तक विज्ञान को ग्रामोन्मुखी नहीं बना पाएंगे। अब देखना यह है कि देश के विज्ञान संस्थान व वैज्ञानिक प्रधानमंत्री की इस सलाह को कितनी गम्भीरता से लेते है।
पर्यावरण के साथ ही समग्र विकास सम्भव - पर्यावरण और विकास एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। जहाँ एक तरफ मूल संसाधन हवा, पानी व मिट्टी के बिना जीवन सम्भव नहीं। वहीं दूसरी तरफ जीवन के लिए न्यूनतम सुविधाओं को जुटाना सभ्यता का भी प्रतीक है।
दरअसल यह जानना जरूरी है कि स्थायी आर्थिक स्रोत भी स्थायी पारिस्थितिकी है। पारिस्थितिकी के उत्पाद, प्राकृतिक संसाधनों के बिना आर्थिक ढांचे को कतई भी संभाला नहीं जा सकता और ना ही बेहतर किया जा सकता है। क्योंकि आर्थिक के आधार प्राकृतिक संसाधन ही हंै। विकास और पर्यावरण को बराबर का महत्व देना होगा। जिस शैली में उद्योगों को आर्थिक का आधार बनाया है, उसी सुर में पारिस्थितिकी की बेहतरी के कदम भी बढ़ाने होंगे। मसलन, अगर शहर उद्योगों के केन्द्र हैं तो गाँव व वनवासियों का आर्थिक आधार पारिस्थितिकी को बेहतर करना होगा। वन उद्योग व जल उद्योग  जैसे पारिस्थितिकी उद्योग को भी वह ही दर्जा मिले जो अन्य उद्योगों को है। जब देश-दुनिया का एक बड़ा हिस्सा उद्योग पर आधारित आर्थिक से बेहतर जीवनयापन कर सकता है, तो गाँवों के पारिस्थितिकी उद्योग से क्यों नही। यह पहल जहाँ पर्यावरण के ढ़ाचे को देश-दुनियाँ के लिए सुधारेंगे पर साथ इससे गाँवों की आमदनी भी जुटा पायेंगी। मसलन मृदा, जल व वन संरक्षण एक सतत् रोजगार के रूप में आ जाने से गाँवों की आर्थिकी तो बढ़ेगी ही और साथ में पलायन भी रुकेगा। हम एक सतत् विकास की ओर अग्रसर हो जाएंगे। अगर शहर और सरकार जहाँ एक तरफ सुविधाएं व उद्योगों को बेहिचक आगे बढ़ाएंगी, वहाँ ही पारिस्थितिकी रोजगार पर्यावरण को तो सुरक्षित रखेगी ही, गाँवों में भी पारिस्थितिकी की शक्ल में आर्थिक क्रान्ति जन्म लेगी। तभी पर्यावरण व विकास एक ही मंच पर होंगे।
पृथ्वी पर जितना भेगो, उनतना जोड़ों - इंसान की यह आम वृत्ति होती है कि जब तक वह किसी चीज को प्रत्यक्ष रूप से देख-सुन, जान-समझ  एवं भोग नहीं लेता, तब तक कहे पर यकीन नहीं करता। यही बात धरती के संकट को लेकर भी है। हमारे पूर्वजों ने धरती  को माॅँ कहा, पर आज हम उस कथन को भोग कर मानने पर उतारू हैं। 1896 में पहली वार स्वीडन वैज्ञानिक स्वांते ने बताया कि जीवाश्म ईंधन के इस्तेमाल से धरती का औसत तापमान बढ़ रहा है, परन्तु मानव लोभ से उस सबके साथ धरती के संसाधनों का क्षय और क्षरण  आज भी अनवरत जारी है। प्राणवायु दमघोटू हो चली है, अमृत समान जल रोगों और मौतों की बड़ी बजह बन चुका है, पृथ्वी की स्वभाविक उर्वराशक्ति को विषैले रसायन चाट चुके हैं, मौसम चक्र बदल और विगड़ रहा है, समुद्र तल ऊपर उठ रहा है, वैश्वविक तापमान बढ़ रहा है और प्राकृतिक आपदाओं की आवृत्ति में इजाफा हो रहा है।
परन्तु यह कहाबत ‘जब चोट लगी (भोगा) तब दर्द का अहसास हुआ’’, सिद्ध हो रही है। जो लोग पहले धरती को हो रहे नुकसान को सिरे से खारिज करते थे, वे आज उसको बचाने की अगुआई कर रहे हैं। क्योंकि, पृथ्वी हमारे जीवन का केन्द्र है। अगर प्रतिदिन इस पृथ्वी को जीते व भोगते हैं तो हर दिन पृथ्वी के प्रति दायित्वों का निर्वहन भी होना चाहिए।
पृथ्वी के प्रति दायित्व को समझने का सीधा और सरल समीकरण है- ‘‘जितना भोगो, उतना जोड़ो।’’ परन्तु, हमने धरती को भोगने की कलाएं खूब पनपाईं, लेकिन इसे संवारने की बारी पूरी तरह भटक गए। पहली बात हमें समझ जाना चाहिए कि ये पृथ्वी मात्र सरकारों या समाज विशेष का दायित्व नहीं है, बल्कि यह सामूहिक कर्तव्य का विषय हेै।
यदि हम अपने स्तर पर मनन करें कि, अपने पूरे जीवन में हम पृथ्वी से क्या-क्या लेते हैं -वे पानी, वायु, मिट्टी तो सब समान रूप से ही भोगते हैं, पर उस ऋण का छोटा सा हिस्सा भी पृथ्वी को वापस करने की नहीं सोच पाते। अतः आवश्यकता है कि हम पृथ्वी के इस ऋण को महसूस करें व करवायें और किसी भी रूप में इसे चुकाएं, यही समाधान है। यही हमारा कर्तव्य है।
इसके लिए हमें अपनी जरूरतों को सीमित करना होगा व साथ ही वर्तमान विकास माण्डल का पुर्नमूल्यांकन करना होगा, जिसके अंधेपन ने हमें पृथ्वी व इसकी संवेदनशीलता से दूर कर दिया है। इस हेतु तत्काल प्रभाव से कुछ महत्वपूर्ण कदम उठा सकते हैं - हर पारिवारिक पर्वों में पर्यावरण को जोड़कर देखें। स्कूली शिक्षा में व्यवहारिकता पूर्ण पर्यावरण की शिक्षा जोड़ें। सरकार को चाहिए कि विकास को मात्र आर्थिक विकास से ही जोड़कर नहीं देखें, अपितु पर्यावरण को भी विकास का मूल आधार बनाएँ। यह तय करना होगा कि हम हर वर्ष कितने वन, पानी, हवा को बेहतर कर पाये और उसमें कितना स्थायित्व ला पाये, यही हमारे विकास की कसौटी होगी। ु
- (लेखक जाने माने पर्यावरणविद् हैं।)