ऋषि.मुनियों ने प्रार्थना की.जीवेम शरदः शतम्। आशय था. हम सौ सालों तक जिएं। स्वस्थ रहें। हमारा समाज दीर्घजीवी हो और समाज के निर्माण तथा विकास में संलग्न रहंेए योगदान करते रहें। व्यक्तिए समुदाय और संस्थाओं के जीवन में 25 वर्ष ;रजत जयंतीद्धए 50 वर्ष ;स्वर्ण जयंतीद्धए 60 वर्ष से 75 वर्ष ;हीरक और कौस्तुभ जयंतीद्ध के साथ.साथ शताब्दी यानी 100 वर्षों कीे जीवन यात्रा और वह भी सार्थक जीवन यात्रा काफी कुछ मायने रखती है। काशी हिन्दु विश्वविद्यालय के शताब्दी वर्ष में प्रवेश के अनेक सार्थक संदेश हैं। देश की शीर्ष शिक्षा संस्थाओं में भी अग्रणी काशी हिन्दु विश्वविद्यालय के शताब्दी वर्ष में प्रवेश करने पर हर्षातिरेक स्वाभाविक है। कोई सौ साल पहले एक सामान्य गरीब परिवार के 23 साल उम्र के भविष्यदृष्टा ने एक सपना देखा. विश्वविद्यालय बनाने का सपना। उस समय तक देश में सरकार द्वारा स्थापित पाँच विश्वविद्यालय देश के पाँच क्षेत्रों. मद्रासए कलकत्ताए इलाहाबादए मुम्बई और लाहौर में मूर्त रूप ले रहे थे। पश्चिम की उच्च शिक्षा प्रणाली और पद्धति को स्थापित करने की अंग्रजों की कोशिश के सामने मदन मोहन मानवीय ने भारतीय मनीषा और नालंदा.तक्षशिला विरासत को नए सिरे से सहेजने.संवारने और आगे बढ़ाने का बीड़ा उठाया। लोग इस युवक को सिरफिरा से मानने लगेए लेकिन दो दशकों की लम्बी साधना के बाद 1904 में मदन मोहन मालवीय अपने प्रयासों की सफलता में पहली सीढ़ी तक पहुँचने में कामयाब हो गए।
मालवीय जी थे तो इलाहाबाद केए पर शायद लुप्त सरस्वती की खोज में उन्हें काशी आना पड़ा। मालवीय जी काशी आए और काशी हिन्दु विश्वविद्यालय के रूप में यहाँ ज्ञान की एक गंगोत्री. गोमुख की स्थापना की। लगभग दो दशकों की अनवरत तपस्याए साधनाए यात्रा और भिक्षाटन का परिणाम विश्वविद्यालय के तौर पर रूप लेने लगा। मालवीय जी की कल्पना.लोक साकार हो उठा। 4 फरवरीए 1916 को महात्मा गाँधी की प्रेरक उपस्थिति में गंगातट पर आयोजित भव्य समारोह में वेदों के मंत्रोच्चार के बीच भारत के तत्कालीन गवर्नर जनरल लार्ड हार्डिंग ने विश्वविद्यालय की आधारशिला रखी। देश की पचास से अधिक रियायतों के राजा.महाराजाए रईसए समाजसेवी और शिक्षा क्षेत्र के विद्वान साधकों की उपस्थिति ने इस समारोह को ऐतिहासिक बना दिया। बाद में 8 फरवरीए 1916 को बसंत पंचमी पर्व पर शिलान्यास के धार्मिक आयोेजन सम्पन्न हुए। पीपीपी माॅडल की इस समय बहुत चर्चा और माँग है। महामना मालवीय ने भारत में संभवतः सबसे पहले उच्च शिक्षा के क्षेत्र में इस माॅडल का पहला तथा अत्यन्त सफल प्रयोग किया। काशी हिन्दु विश्वविद्यालय की स्थापना से पहले भारत में स्थित सभी पाँचों विश्वविद्यालय की स्थापना सरकार ने की थीए काशी हिन्दु विश्वविद्यालय केवल जन सहयोग से स्थापित उच्च शिक्षा संस्थान बना। धनवान ही नहीं निर्धनए कामगारए बेरोजगार सभी ने विश्वविद्यालय की स्थापना में योगदान किया। 1300 एकड़ के विस्तृत परिसर में स्थापित इस विश्वविद्यालय के लिए भूमि काशी राज्य के तत्कालीन महाराजा प्रभु नारायण सिंह ने सहर्ष दान में दे दी। फिर क्या थाए इसके बाद सहायता की झड़ी लग गई।
मालवीय जी की संकल्पना इस विश्वविद्यालय को प्राचीन भारतीय ज्ञान.विज्ञान के संरक्षण और शोध के साथ ही आधुुनिक विज्ञान के पठन.पाठन के एक वैश्विक केन्द्र के रूप में विकसित करने की थी। यहाँ आपको विज्ञान की आधुनिकतम विधाओं के साथ.साथ प्राचीन भारतीय ज्ञान.विज्ञान की धारा का अद्भुत संगम देखने को मिलेगा। महामना के संकल्प की पवित्रता और सुचिता का आभास विश्वविद्यालय के गंगातट पर बसे अर्धचन्द्राकार परिसर में प्रवेश करते ही हो जाता है। भारतीय स्थापत्य कला के विशिष्ट भवनों और हरे.भरे मैदानों के साथ ही पूरा परिसर आकर्षित करता है। समूची दुनिया से छात्र.शोधार्थी और विद्वान ज्ञानार्जन और शोध के लिए यहाँ आते रहते हैं। विद्वानों के लिए यह वैश्विक ज्ञानार्जन का केन्द्र बन चुका है। काशी हिन्दु विश्वविद्यालय के 30 हजार छात्र.छात्राएं और दो हजार शिक्षकए हजारों कर्मचारी सभी उसी परम्परा के अंग हैए जिस परम्परा में शिक्षा धनार्जन का माध्यम नहींए बल्कि त्याग और समर्पण का क्षेत्र है। प्रश्न यह है.देश के वर्तमान साढ़े तीन सौ से अधिक विश्वविद्यालयों की भीड़ में काशी हिन्दु विश्वविद्यालय क्यों और कैसे अनूठा हैघ् उत्तर ढ़ूंढ़ने में देर नहीं लगेगी। सीधा सा उत्तर हैए शिक्षा यहाँ बाजार से प्रभावित नहीं है। पूरे विश्वविद्यालय के हर क्षेत्र मेंए़़ हर गतिविधि में हम महामना मालवीय की मिशनरी भावना को महसूस कर सकते है। यह मिशनरी भावना थी. चरित्रवानए अच्छेए कुशल नागरिक का निर्माण शायद इसीलिए इस विश्वविद्यालय को एशिया के सबसे बड़े विश्वविद्यालय की मान्यता मिली और इसे ष्हार्वर्ड आॅफ ईस्टष् कहा गया।
बनारस पूरे विश्व का आकर्षण का केन्द्र है। विदेशी विद्वानों ने भी निर्विवाद रूप से इसे ष्ज्ञान की नगरी यानी सिटी आॅफ नालेजष् माना। प्रसिद्ध अमेरिकी लेखिका डायना एलेक अपनी पुस्तक ष्बनारस.द सिटी आॅफ लाइटष् में काशी हिन्दु विश्वविद्यालय जैसी संस्थाओं से प्रवाहित ज्ञान के प्रकाश के कारण ही वाराणसी को ज्योतिपुंज मानती है। मालवीय जी को विश्वविद्यालय के धन संग्रह के दौर में कटु आलोचनाओं और उपहास का सामना करना पड़ाए लेकिन वे अडिग रहे। आज की नई पीढ़ी के लिए काशी हिन्दु विश्वविद्यालय और इसके संस्थापक मालवीय जी के जीवन का यही सबसे बड़ा संदेश है कि स्वप्न ऊँचा रखोए आलोचनाओं और विपत्तियों से घबराओं नहींए आगे बढ़तेे रहो। सफलता तुम्हारे कदम चूमेगी। मालवीजी का पूरा जीवन और उनकी अनूठी कृति जैसा पूरी दुनिया में दूसरा कोई उदाहरण नहीं। भारत के समग्र विकास में मालवीय जी की महत्वपूर्ण भूमिका अविस्मरणीय है।
. ;लेखक काशी हिन्दु विश्वविद्यालय से जुड़े रहे है।
मालवीय जी थे तो इलाहाबाद केए पर शायद लुप्त सरस्वती की खोज में उन्हें काशी आना पड़ा। मालवीय जी काशी आए और काशी हिन्दु विश्वविद्यालय के रूप में यहाँ ज्ञान की एक गंगोत्री. गोमुख की स्थापना की। लगभग दो दशकों की अनवरत तपस्याए साधनाए यात्रा और भिक्षाटन का परिणाम विश्वविद्यालय के तौर पर रूप लेने लगा। मालवीय जी की कल्पना.लोक साकार हो उठा। 4 फरवरीए 1916 को महात्मा गाँधी की प्रेरक उपस्थिति में गंगातट पर आयोजित भव्य समारोह में वेदों के मंत्रोच्चार के बीच भारत के तत्कालीन गवर्नर जनरल लार्ड हार्डिंग ने विश्वविद्यालय की आधारशिला रखी। देश की पचास से अधिक रियायतों के राजा.महाराजाए रईसए समाजसेवी और शिक्षा क्षेत्र के विद्वान साधकों की उपस्थिति ने इस समारोह को ऐतिहासिक बना दिया। बाद में 8 फरवरीए 1916 को बसंत पंचमी पर्व पर शिलान्यास के धार्मिक आयोेजन सम्पन्न हुए। पीपीपी माॅडल की इस समय बहुत चर्चा और माँग है। महामना मालवीय ने भारत में संभवतः सबसे पहले उच्च शिक्षा के क्षेत्र में इस माॅडल का पहला तथा अत्यन्त सफल प्रयोग किया। काशी हिन्दु विश्वविद्यालय की स्थापना से पहले भारत में स्थित सभी पाँचों विश्वविद्यालय की स्थापना सरकार ने की थीए काशी हिन्दु विश्वविद्यालय केवल जन सहयोग से स्थापित उच्च शिक्षा संस्थान बना। धनवान ही नहीं निर्धनए कामगारए बेरोजगार सभी ने विश्वविद्यालय की स्थापना में योगदान किया। 1300 एकड़ के विस्तृत परिसर में स्थापित इस विश्वविद्यालय के लिए भूमि काशी राज्य के तत्कालीन महाराजा प्रभु नारायण सिंह ने सहर्ष दान में दे दी। फिर क्या थाए इसके बाद सहायता की झड़ी लग गई।
मालवीय जी की संकल्पना इस विश्वविद्यालय को प्राचीन भारतीय ज्ञान.विज्ञान के संरक्षण और शोध के साथ ही आधुुनिक विज्ञान के पठन.पाठन के एक वैश्विक केन्द्र के रूप में विकसित करने की थी। यहाँ आपको विज्ञान की आधुनिकतम विधाओं के साथ.साथ प्राचीन भारतीय ज्ञान.विज्ञान की धारा का अद्भुत संगम देखने को मिलेगा। महामना के संकल्प की पवित्रता और सुचिता का आभास विश्वविद्यालय के गंगातट पर बसे अर्धचन्द्राकार परिसर में प्रवेश करते ही हो जाता है। भारतीय स्थापत्य कला के विशिष्ट भवनों और हरे.भरे मैदानों के साथ ही पूरा परिसर आकर्षित करता है। समूची दुनिया से छात्र.शोधार्थी और विद्वान ज्ञानार्जन और शोध के लिए यहाँ आते रहते हैं। विद्वानों के लिए यह वैश्विक ज्ञानार्जन का केन्द्र बन चुका है। काशी हिन्दु विश्वविद्यालय के 30 हजार छात्र.छात्राएं और दो हजार शिक्षकए हजारों कर्मचारी सभी उसी परम्परा के अंग हैए जिस परम्परा में शिक्षा धनार्जन का माध्यम नहींए बल्कि त्याग और समर्पण का क्षेत्र है। प्रश्न यह है.देश के वर्तमान साढ़े तीन सौ से अधिक विश्वविद्यालयों की भीड़ में काशी हिन्दु विश्वविद्यालय क्यों और कैसे अनूठा हैघ् उत्तर ढ़ूंढ़ने में देर नहीं लगेगी। सीधा सा उत्तर हैए शिक्षा यहाँ बाजार से प्रभावित नहीं है। पूरे विश्वविद्यालय के हर क्षेत्र मेंए़़ हर गतिविधि में हम महामना मालवीय की मिशनरी भावना को महसूस कर सकते है। यह मिशनरी भावना थी. चरित्रवानए अच्छेए कुशल नागरिक का निर्माण शायद इसीलिए इस विश्वविद्यालय को एशिया के सबसे बड़े विश्वविद्यालय की मान्यता मिली और इसे ष्हार्वर्ड आॅफ ईस्टष् कहा गया।
बनारस पूरे विश्व का आकर्षण का केन्द्र है। विदेशी विद्वानों ने भी निर्विवाद रूप से इसे ष्ज्ञान की नगरी यानी सिटी आॅफ नालेजष् माना। प्रसिद्ध अमेरिकी लेखिका डायना एलेक अपनी पुस्तक ष्बनारस.द सिटी आॅफ लाइटष् में काशी हिन्दु विश्वविद्यालय जैसी संस्थाओं से प्रवाहित ज्ञान के प्रकाश के कारण ही वाराणसी को ज्योतिपुंज मानती है। मालवीय जी को विश्वविद्यालय के धन संग्रह के दौर में कटु आलोचनाओं और उपहास का सामना करना पड़ाए लेकिन वे अडिग रहे। आज की नई पीढ़ी के लिए काशी हिन्दु विश्वविद्यालय और इसके संस्थापक मालवीय जी के जीवन का यही सबसे बड़ा संदेश है कि स्वप्न ऊँचा रखोए आलोचनाओं और विपत्तियों से घबराओं नहींए आगे बढ़तेे रहो। सफलता तुम्हारे कदम चूमेगी। मालवीजी का पूरा जीवन और उनकी अनूठी कृति जैसा पूरी दुनिया में दूसरा कोई उदाहरण नहीं। भारत के समग्र विकास में मालवीय जी की महत्वपूर्ण भूमिका अविस्मरणीय है।
. ;लेखक काशी हिन्दु विश्वविद्यालय से जुड़े रहे है।





