Friday, May 29, 2015

समग्र विकास में भूमि का महत्व . (बदलती परिस्थितियों में समझं और समझाएं) - शशि शेखर

भागलपुर से पटना लौटते समय मेरे सहयोगी डाॅक्टर वीर विजय सिंह बोले कि बड़हिया में कुछ देर रुकते हैं। वहाँ का रसगुल्ला मशहूर है और चाय भी अच्छी मिलती है। अन्य साथियों के चेहरे पर सहमति के भाव देख मैंने हामी भर दी।
जलपान के दौरान देखा के आसपास की टेबल पर कुछ लोग आ जमे और वे कौतुहल से हमारी ओर देख रहे हैं। वे प्रस्तावित भूमि अधिग्रहण कानून के बारे में जानना चाह रहे थे। उन्होंने कहा कि हम लांेगो ने अन्ना जी का भाषण सुना। वह कह रहे हैं कि सरकार यदि जमीन अधिग्रहण करेगी, तो उसके खिलाफ किसानों को अब अदालत में जाने का मौका नहीं मिलेगा। ऐसा तो अंग्रेजों ने भी नहीं किया। लोकतंत्र में कोई कानूनी लड़ाई लड़ने का हक कैसे छीन सकता है।
मैंने उनसे कहा कि आप इतनी जल्दी किसी निष्कर्ष पर मत पहुँचिए। यह किसानों का देश है और उनके हक-हुकूक कोई भी सरकार नहीं छीनना चाहेगी। वे सबसे बड़ा ‘वोट बैंक’ हैं। उनकी कटुता राजनीतिक दलों पर भारी पड़ सकती है। आपको एक बार इस प्रस्तावित अध्यादेश को पढ़ना चाहिए। किसी निष्कर्ष पर पहुँचने से पहले खुद सोचिए कि विकास के लिए जरूरी भूमि कहीं बाहर से नहीं लाई जा सकती। उसके लिए हम सबको सहयोग करना होगा। इस पर उनका जवाब था कि आप सही कह रहे हैं। किसानों के मामले में हमेशा राजनीति होती है और सही बात हम तक नहीं पहुँचती।
पटना जल्दी पहुँना था, लिहाजा मैंने हाथ जोड़कर उनसे विदा माँग ली। शेष रास्ते सड़क से ज्यादा हिचकोले विचारों ने दिए। ये भारत के किसान ही तो थे, जिन्होंने नई परम्परा को पोसा और दलित को पुजारी का दर्जा दिया। धार्मिक कट्टरता के जाले में उलझती जा रही दुनिया क्योें नहीं इससे सबक लेती? किसान, जिन्हें नेता सिर्फ ‘वोट बैंक’ मानते हैं, उन तक सच क्यों नहीं पहुँचता? वे भले ही डिग्री शुदा न हों, पर मनीषा और जागृती के मामले में किसी से कम नहीं। फिर उन्हें ‘गिनी पिग’ की तरह इस्तेमाल क्यों किया जाता है? इस विचार श्रंखला को साथ चल रहे संजय सिन्हा ने नया आयाम दिया। उन्होंने कहा कि कई विद्वान अब लोकतंत्र की उपयोगिता पर सवाल उठा रहे हैं। चीन का उदाहरण देते हुए ‘द इकोनाॅमिसट’ ने कहा है कि वहाँ विकास इसलिए हो रहा है, क्योंकि वहाँ भूमि अधिग्रहण जैसे मामलों में कोई रोड़ा नहीं अटकाता। भारत में लोकतंत्र है, और वह भी ऐसा कि सौ करोड़ लोगों के पास ‘वीटो पावर’ है। हम भले ही संसार का सबसे बड़ा लोकतंत्र हों, पर विकास के लिए जरूरी फैसलों में अड़ंगेबाजी ने गुड़ को गोबर कर दिया है।
जवाब में मैंने कहा कि लोकतंत्र बनाम साम्यवादी तानाशाही की बहस बहुत पुरानी है। सोवियत संघ को मानने वाले अक्सर अमेरिका की तौहीन करते थे। 1961 में माॅस्को ने जब यूरी गागरिन को अंतरिक्ष में भेजा, तो वहाँ के अखबारों ने छापा कि साम्यवाद की उड़ान अब धरती की कक्षा को पार कर गई है। बताने की जरूरत नहीं कि गागरिन अंतरिक्ष की सैर करने वाले पहले इंसान भले ही साबित हुए, पर सोवियत उपलब्धियों के पांव अधर में थे। उन्होंने कुछ क्षेत्रों में बढ़त जरूर हासिल की, पर उसे कायम न रख सके। इसीलिए आज अमेरिका शीर्ष पर है और सोवियत संघ को बिखरे हुए चैथाई सदी बीतने को आई। हम अमेरिकी नीतियोें के खिलाफ हो सकते हैं, पर जम्हूरियत अपनी तमाम खामियों के बावजूद सर्वोत्तम शासन प्रणाली साबित हुई है।
बाद में पटना से दिल्ली की उड़ान के दौरान डेढ़ घंटा लगातार किसानों के बारे में सोचता रहा, जिनके बीच से मैं आता हूँ। इस देश में भूमि का अधिग्रहण एक जनवरी, 2014 से पहले अंग्रेजों के बनाए ‘लैण्ड एक्विजिशन ऐक्ट आॅफ-1894’ के तहत होता था। कांग्रेस की सरकार ने इसे बदला और इस दौरान खुद पार्टी के अन्दर वैचारिक टकराव उजागर हुए।
केन्द्र में इस वक्त नरेन्द्र मोदी की अगुवाई वाली सरकार है। मोदी ‘जय जवान और जय किसान’ के नारे को नए तरीके से पेश कर सत्ता में पहुँचे हैं। अब तक उनकी सरकार की जिम्मेदारी है कि वह कृषकों तक इस कानून की खूबियों को पहुँचाएं और यदि कुछ खामियों पर असहमति बनती है, तो उन्हें हटाए। यह अच्छी बात है कि कई वरिष्ठ मंत्री इस मुद्दे पर विपक्षी नेताओं से बात कर रहे हैं। लोकसभा में खुद नरेन्द्र मोदी ने आह्वान किया कि किसानों के मामले में राजनीति न की जाए। अगले ही दिन आम बजट में किसानों को कई तरह की सहूलियत देकर वित्त मंत्री अरुण जेटली ने सरकार के इरादों को जाहिर कर दिया। क्या सियासी दल इस बेहद संवेदनशील मुद्दे पर आमराय बना सकेंगे?
कहने की जरूरत नहीं कि देश के 70 फीसदी लोग अब भी खेती-किसानी पर निर्भर हैं। उनके हक-हुकूक पर सहानुभूतिपूर्वक विचार करना जरूरी है। हजारों साल से हमारा राष्ट्र कृषि पर निर्भर रहा है। अब वक्त बदल गया है। 21वीं शती में फलने-फूलने के लिए हमें राजमार्ग, फैक्टरियाँ और नौजवानों के लिए रोजगार चाहिए। फिर हमारी सीमा-सुरक्षा की अपनी आवश्यकताएं हैं। इसके लिए यदि जमीन की जरूरत पड़ती हैं, तो उसे मुहैया कराना ही होगा। मुझे नहीं लगता कि किसान प्रगति के खिलाफ हैं। जरूरत है उनके हृदय में भरोसा जगाने की, इसमें लोकतंत्र बाधक कहाँ साबित होता है?
भूलिए मत जनतंत्र हमारी रगों में है और इसका सबसे बड़ा तत्व है- आम सहमति। उम्मीद है हमारे सत्तानायक इस तथ्य को समझने में भूल नहीं करेंगे। ु