Friday, May 29, 2015

विद्या और शिक्षा में अन्तर - हरिबाबू द्विवेदी

विद्या से मिलती विनम्रता,
शिक्षा घमण्ड की जननी है।
विद्या देती है संस्कार,
शिक्षा पथ भ्रष्ट कराती है।
शिक्षा के द्वारा मिली हमें,
जग की चिकनी चुपड़ी बातें।
जिसके कारण हम फिसल गए,
अपना ली पश्चिम की थाती।
उस थाती को ही किरण समझ,
हम आगे बढ़ते चले गए।
रख दिया रेहन निज संस्कृति को,
मानवता सारी भूल गए।
जो पाठ पढ़ा था बचपन में,
आदर्श राम का रख करके।
धीरे-धीरे सब भूल गए,
आदर्श सभी निज संस्कृति के।
जिसके कारण पथ भ्रष्ट हुए,
मानवता नष्ट-भ्रष्ट कर दी।
चीत्कार उठी धरती माता,
निज संस्कृति तहस-नहस कर दी।
क्या अब भी तुम को होश नहीं,
निज गौरव का भी ध्यान नहीं।
देखो हम कैसे चलते थे,
क्या अब वह मेरी चाल नहीं।
देखो अतीत को मनन करो,
उर में शक्ति संवरण करो।
चल पड़ो पवन सुत के समान,
निज संस्कृति का अनुसरण करो।
पावन बेला वह आयेगी,
फिर मंजिल भी मिल जायेगी।
प्रकृति भी हँस हँस कर अपना,
तुमको सर्वस्व लुटायेगी।
मानव मानव बन जायेगा,
विद्या का पाकर अमरदान।
भारत फिर से सिर मौर बने,
ऐ ही है मेरा लक्ष्य महान। ु