हम विकास के पावन क्षण में,
युग चरित्र निर्माण न भूलें।
स्वार्थ साधना की आँधी में,
वसुधा का कल्याण न भूलें।।
माना कठिन विपरीत राह है,
संघर्षों का पार नहीं है।
किन्तु भूलकर मझधारों में,
विकृत सृजन स्वीकार नहीं है।
जटिल समस्या सुलझाने को,
नूतन अनुसंधान न भूलें।।
शील विनय आदर्श शिष्टता,
तार बिना झंकार नहीं है।
शिक्षा क्या स्वर साध सकेगी,
यदि नैतिक आधार नहीं है।
कीर्ति कौमुदी की गरिमा में,
संस्कृति का उत्थान न भूलें।।
आविष्कारों की कृतियों में,
यदि मानव का प्यार नहीं है।
सृजनहीन विज्ञान व्यर्थ है,
प्राणी का उपकार नहीं है।
भौतिकता के उत्थानों में,
जीवन का उत्थान न भूलें।।
युग चरित्र निर्माण न भूलें।
स्वार्थ साधना की आँधी में,
वसुधा का कल्याण न भूलें।।
माना कठिन विपरीत राह है,
संघर्षों का पार नहीं है।
किन्तु भूलकर मझधारों में,
विकृत सृजन स्वीकार नहीं है।
जटिल समस्या सुलझाने को,
नूतन अनुसंधान न भूलें।।
शील विनय आदर्श शिष्टता,
तार बिना झंकार नहीं है।
शिक्षा क्या स्वर साध सकेगी,
यदि नैतिक आधार नहीं है।
कीर्ति कौमुदी की गरिमा में,
संस्कृति का उत्थान न भूलें।।
आविष्कारों की कृतियों में,
यदि मानव का प्यार नहीं है।
सृजनहीन विज्ञान व्यर्थ है,
प्राणी का उपकार नहीं है।
भौतिकता के उत्थानों में,
जीवन का उत्थान न भूलें।।





