Friday, May 29, 2015

समग्र विकास में ग्लोबल वार्मिंग एक समस्या औरं उसका निदान?

मानव की अदूरदर्शी व संकीर्ण प्रवृत्ति से प्रकृति के अन्धाधुन्ध शोषण के प्रयास आज समग्र विकास के मार्ग में प्रमुख प्रतिगामी घटना बन गये जो, ग्लोबल वार्मिंग एवं निदान पर प्रस्तुत चर्चा से स्पष्ट होता है।
अन्तरराष्ट्रीय संस्था आईपीसीसी के अध्ययन के मुताबिक पिछली सदी के दौरान धरती का औसत तापमान 1.4 फाॅरेनहाइट बढ़ चुका है जो अगले सौ साल में बढ़कर 2 से 11.5 फाॅरेनहाइट होने का अनुमान है। धरती के औसत तापमान में हो रही यह मामूली वृद्धि हमारी पृथ्वी  की जलवायु और मौसम प्रणाली में व्यापक रूप से विनाशकारी बदलाव ला सकती है। जिसके मौसम और जलवायु में परिवर्तन के साक्ष्य, बारिस की पद्धति में बदलाव, गम्भीर बाढ़, सूखा, तेज बारिश, अक्सर लू चलने की प्रवृत्तियाँ दिखने लगी है। महासागर गर्म होकर अधिक अम्लीय हो रहे हैं। हिमाच्छादित चोटियांँ और ग्लैशियर पिघल रहे हैं। समुद्र तल बढ़ रहा है। जैसे-जैसे दुष्परिणाम मजबूत होंगे जीवन मुश्किल होता जायेगा।
पिछली सदी के दौरान इन्सानी गतिविधियों के चलते वायुमण्डल में बड़ी मात्रा में कार्बन डाईआक्साइड समेत अन्य ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन हुआ। ऊर्जा उत्पादन में जलाए गए जीवाश्म ईंधनों से बहुतायत में ये ग्रीन हाउस गैसें पैदा हुईं। बढ़ता औद्योगीकरण, कटते जंगल और कुछ कृषि पद्धतियां भी इन गैसों के उत्सर्जन के लिए जिम्मेदार रही हैं। आईपीसीसी के अनुसार पिछले 250 साल के दौरान हुई इन्सानी कारगुजारियाँं 90 फीसदी से ज्यादा जिम्मेदार रही हैं। पिछले 150 साल में औद्योगिक गतिविधियों के चलते कार्बन डाईआक्साइड का स्तर 280 पीपीएम से बढ़कर 379 पीपीएम हो चुका है। 6 मार्च से 12 अप्रैल, 2015 के बीच पृथ्वी के वातावरण में कार्बन डाइ आक्साइड का स्तर 404.01 पाट्र्रस प्रति मिलियन (पीपीएम) पहुँच गया। जो अब तक के मानव इतिहास में सर्वाधिक है। इसी के अनुपात में गर्मी, वर्षा और कृषि उत्पादन में अभूतपूर्व संकट की आशंका भी बलवती हो गई है।
ग्रीनहाउस गैसें धरती के चारो तरफ लिपटी हुई चादर की तरह काम करती हैं। सूर्य से आने वाली प्रकाशीय ऊर्जा का अधिकांश हिस्सा धरती अवशोषित कर लेती है। इसका कुछ भाग वह वायुमण्डल में उत्सर्जित करती है। चंूकि धरती के चारो तरफ ऐसी ग्रीनहाउस गैसों की परत लिपटी है और उत्सर्जित ऊर्जा उसे भेदकर वायुमण्डल में विलीन होने में असमर्थ है। लिहाजा सबकी सब यह वायुमण्डल में ही एकत्र हो रही है। इससे धरती का तापमान बढ़ रहा है। इसे ग्रीनहाउस इफेक्ट कहा जाता है।
यद्यपि कार्बन डाई आक्साइड की गैर मौजूदगी में कायनात की कल्पना ही नहीं की जा सकती है। जीवन के लिए यह बेहद अहम है। पौधे अपनी खुराक प्रकाश की उपस्थिति में इसी के मध्यम से बनाने में सक्षम होते हैं। प्रत्युत्तर में यही पौधे इन्सानी जीवन के लिए प्राणवायु वायुमण्डल में छोड़ते हैं। लेकिन आज अनेकों कृत्रिम माध्यमों, फैक्ट्रियों, मनुष्य की अदूरदर्शी करतूतांे के कारण इस गैस का इतना अधिक उत्सर्जन होने लगा है कि उसकी खपत नहीं हो पा रही है। फलस्वरूप वायुमण्डल में विद्यमान रहकर यही गैस उसे गर्म करने में पूरा सहयोग करती है।
हमारे घरों में गर्मी, ठंड ऊर्जा पहुँचाने व  औद्योगिक इकाइयों के लिए जिस प्रकार ऊर्जा का उपयोग किया जा रहा है, जलवायु परिवर्तन में इसका बड़ा योगदान है। ऐसे में एनर्जी एफिशियेंट उत्पादों के जरिए कम ऊर्जा में जरूरतें पूरी करने के प्रयास किए जाने चाहिए। परिवहन के चलते वायुमण्डल में कार्बन का उत्सर्जन दिन व दिन बढ़ रहा है। ऐसे में सार्वजनिक परिवहन की सेवाओं में बढ़ोत्तरी की आवश्यकता है, जिससे सड़कों पर निजी बाहनों की संख्या घटाई जा सके।
वायु और भू-तापीय ऊर्जा के स्रोत दुनियाँ भर में मौजूद हैं। अध्ययन बताते हैं कि इन स्रोतों में हमारी विस्तृत ऊर्जा जरूरतें पूरी करने की क्षमता तो मौजूद है।  कोयला और अन्य जीवाश्म पर आधारित ईंधन का विकल्प तलाशने के बाद अब आगे इसका इस्तेमाल बन्द किया जाये। परमाणु ऊर्जा एक विकल्प हो सकता है, पर इसके अन्य खतरे हैं। वर्तमान में एक ऐसी तकनीक का प्रयोग किया जा रहा है, जिसके तहत कार्वन उत्सर्जन को जमीन के अन्दर इकट्ठा किया जा सकता है। तकनीक काफी किफयती मानी जा रही है लिहाजा इसे अपनाने में कोई नुकसान नहीं, यह समय ही बतायेगा।
भविष्य में कार्बन उत्सर्जन घटाने में कार्बन रहित न्यूनतम कार्बन उत्सर्जन पर आधारित तकनीकों की बड़ी भूमिका रहने वाली है। ऐसे में बैटरी, सोलर, शैवाल से ऊर्जा तकनीक मददगार साबित हो सकती है।
इसी सन्दर्भ में ओजोन परत सम्बन्धी इस चर्चा को भी समझना आवश्यक मार्ग दर्शन करा सकता है।
पिछली सदी में ओजोन परत में क्षरण के अलावा बड़े पैमाने पर पर्यावरण क्षरण देखा गया और इसको इंसानी  गतिविधियों और उपभोग के स्तर के साथ जोड़ कर देखा गया जो कि विकासशील देशों में भी विस्तारित होता जा रहा है। हालांकि यह कहा जा सकता हैं कि पर्यावरणीय क्षति का कुछ हिस्सा अनजाने में हुआ, लेकिन अब इस विषय में अनजाना नहीं रहा जा सकता है।
1992 में रियो सम्मेलन में 100 देशों के राष्ट्र प्रमुखों ने एकत्र होकर टिकाऊ विकास के एजेन्डे पर सहमति प्रकट की और जलवायु परिवर्तन की समस्या को पहचानते हुए इसको रोकने बाले समझौते पर हस्ताक्षर किए। उस समय यह तथ्य सामने आये थे कि 80 प्रतिशत उपभोग की वस्तुएं मसलन जीवाष्म ईंधन से लेकर स्टील, अल्मोनियम, तांवा जैसे खनिजों और कार जैसी चीजों का उपयोग विकसित देशों की 20 प्रतिशत आवादी कर रही है। इन्हीं सब का नतीजा जलवायु परिवर्तन और ओजोन परत के क्षरण के रूप में दिखाई दे रहा है। अब उपभोग की वही प्रवृत्तियां विकासशील देशों में विशेषकर चीन के उदय के बाद देखी जा रही  हैं और इसके चलते अब विकासशील देशों का हिस्सा उत्पादों और वस्तुओं के उपभोग के लिहाज से 35 प्रतिशत से अधिक हो गया है। उसके नतीजे इस सदी की नई पीढ़ी को भुगतने पड़ रहे हैं तथा उस रास्ते से दूर हटते हुए समाधान तलाशने की कोशिशें करनी पड़ रही हैं - कम उत्सर्जन वाले परिवहन साधनों, नवीकरणीय ऊर्जा के समाधान के रूप में देखा जा सकता है।
कार्बन डाई आक्साइड उत्सर्जन (2011 के अनुसार)-
रैंक देश कुल उत्र्जन /व्यक्ति उत्सर्जन
(दसलाख टन में) (टन में)
1. चीन 8715.31 6.52
2. अमेरिका 5490.63 17.62
3. रूस 1788.14 12.55
4. भारत 1725.76 1.45
5. जापान 1180.62 9.26
6. जर्मनी 748.49 9.19
7. ईरान 624.86 8.02
8. द॰ कोरिया 610.95 12.53
9. कनाडा 552.56 16.24
10. साउदी अरब 513.53 19.65
हालांकि पिछली सदी के अन्त तक सुधार के कई प्रस्ताव पेश हुए और उनका अमलीजामा पहनाना भी सुनिश्चित किया गया। ओजोन परत दुरूस्त करने की दिशा में मांट्रियल प्रोटोकाॅल के तहत सीएफसी (क्लोरोफ्लो कार्बन) के उत्सर्जन को प्रतिबन्धित किया गया है। अभी बहुत कुछ किया जाना बाकी है। कठिन प्राकृतिक विरासत के साथ 21वीं सदी शुरू हुई है। हालांकि इस संकट के समाधान के लिए कुछ समय के भीतर ही नए रास्ते तलाशे गए हैं।
कम उर्जा खपत और कम कार्बन उत्सर्जन टेक्नालाॅजी जैसे एलईडी लैम्प का इस्तेमाल शुरू हुआ है, जिसमें उतने ही प्रकाश उत्पन्न करने के लिए ऊर्जा के दसवें हिस्से की जरूरत होती है। पवन और सौर ऊर्जा, इन्टरनेट अर्थव्यवस्था शुरू हुई है, जिससे पेपर और परिवहन की बचत होती है। परन्तु निराकरण केबल तकनीकों के जरिए ही संभव नहीं है, इसके लिए सबसे जरूरी समाज के प्रति नए दृष्टिकोण की है जो समावेशी और हर एक की बुनियादी जरूरतों को पूरा करने से संबन्धित है। इसके लिए उपभोग की पुरानी प्रवृत्ति को छोड़ना होगा और सनातन मान्यता ‘अपरिग्रह’ को अपनाना होगा।
इसका आशय प्रकृति से लालच की बजाय केबल जरूरत के मुताबिक लेने को प्रोत्साहित करने से है। इसकी बानगी गांधी जी से ली जा सकती है, जो नदी किनारे बैठकर भी मुंह धोने के लिए केबल एक कप पानी लेते थे। नई पीढ़ी के समक्ष कठिन चुनौतियां हैं और उनको सावधानी पूर्वक ऐसे संतुलित विकल्पों को अपनाना चाहिए, जिसमें तकनीक पर निर्भरता के साथ विवेक का इस्तेमाल करते हुए गरीबों के प्रति सहानुभूति का भी भाव हो। ु