Friday, May 29, 2015

विकास की अनजान दौड़ - गिरीश्वर मिश्र

विकास आधुनिक जीवन का सबसे आकर्षक शब्द बन गया है और इसी के इर्द-गिर्द हर व्यक्ति और देश, सबकी चिंताएं डूब-उतरा रही हैं। यह शब्द सुनते ही हमारे कान खड़े हो जाते हंै और मन में कमी का एक तीखा अहसास पैदा होता है। अविकसित होना असभ्यता की निशानी मानी जाती है और हम विकास की अनजान दौड़ में शामिल होने को व्यग्र और आतुर हो उठते हैं। अपने को अविकसित मानने का अर्थ होता है कि हम जो भी हंै पहले उसे नकारंे, क्योंकि वह न तो श्रेयस्कर है और न पर्याप्त ही। उसके बदले कहीं और पहुँचना है,  इसकी पहचान हमें कोई और कराता है। आज मीडिया यह काम कर रहा है और वह बाजार के नजरिए को परोस रहा है। हमारे दृृष्टिपथ पर प्रासंगिक या अप्रासंगिक कुछ भी हो, उसकी प्रस्तुती इतनी सजीव और मनलुभावन होती है कि हर किसी का दिल उस पर आ जाता है। शरीर को सुन्दर दिखने-दिखाने के नुस्खों से लेकर चीजों की खरीद-फरोख्त, व्यापार करने, रुपया कमाने तक की तरकीब बिना पूछे हाजिर रहती है। सुन्दर और आकर्षण विज्ञापनों से हमारी भावनाओं को उभार कर सौदा करने का शास्त्र आज तेजी से आगे बढ़ रहा है और उसकी कोशिशों के चलते हमारी आकांक्षाएं न केवल प्रबल होती जाती हैं, बल्कि उनका वेग भी तीव्र हो जाता है। हम कहाँ हैं? हमारी स्थिति क्या है? और जहाँ हैं वहाँ से आगे कहाँ जाना हैं? इन सबके बीच की दूरी खास तौर पर महत्वपूर्ण हो जाती है, पर मुश्किल यह है कि इनमें कोई भी स्थिर नहीं है। हम जहाँ पहुँचना चाहते हैं वह लक्ष्य भी आगे खिसक जाता है और हम फिर पिछड़ जाते हैं। इस क्रम में अन्तर सदैव बना ही रहता है। दौड़ चलती रहती है। दौड़ तो जीवन में होनी चाहिए पर इस तरह की अंधी, अर्थहीन और अंतहीन दौड़ बेमानी है।
विकास कर अंधी दौड़ में शामिल होने के लिए मुख्य उद्दीपन केवल सामाजिक-आर्थिक विषमता से ही नहीं पैदा होता है, वह बहुत हद तक दूसरों के साथ वांछित-अवांछित, जायज-नाजायज बेमतलब की तुलना से भी उपजता और प्रेरित होता है। पर हम यह अक्सर भूल जाते हैं कि सिर्फ बदलाव ही पर्याप्त नहीं है। हमें उसके आशय और प्रयोजन से बेखबर नहीं रहना चाहिए। हमें यह भी जानना चाहिए कि बदलाव कैसा है, किसलिए है और किसके द्वारा लाया जा रहा है और उसका निहितार्थ क्या है? इससे इन्कार नहीं किया जा सकता कि शिक्षा, व्यापार, स्वास्थ्य और कृषि आदि के क्षेत्रों में विगत दशकों में हुए तमाम आर्थिक परिवर्तनों के पीछे पश्चिम विकास की अवधारणा काम करती है। ऐसा करते हुए यहाँ के समाज की प्रकृति को नहीं समझा गया और हम बहुत कुछ बाहर से लाकर आरोपित करते चले गए। स्वाभाविक जीवन छोड़ और प्रकृति से खिलवाड़ का नतीजा उत्तराखण्ड, किन्नौर, जम्मू-कश्मीर आदि में हम देख रहे हैं। वहाँ विकास की परिणति हमारे अस्तित्व से ही भिड़ गई और उसका विनाशकारी परिणाम सबने महसूस किया।
आज के बदलाव का महानायक टेक्नोलाॅजी ज्ञान है। आज तकनीकि उपाय से कहीं अधिक बढ़कर हमारी स्वामी बनती जा रही है। अब हमारा पूरा का पूरा जीवन ही उस पर निर्भर होने लगा है। जन्म, जीवन, स्वास्थ्य, शिक्षा, व्यापार हर जगह तकनीक निर्णायक होती जा रही है और उसका निर्बाध प्रवेश है। हम अपने को कैसा दिखाना चाहते हैं, क्या करना चाहते है, यह सब उसी पैमाने पर वर्तमान का नकार और स्वयं का अस्वीकार करने में जुट गए हैं। अनुभव खंडित हो रहा है। उसमें सातत्य या निरन्तरता के स्थान पर विच्छिन्नता का ही बोलबाला है। ऊँची तकनीक से हम अब नए तरह के जहरीले कूड़े-कचरे का अकूत उत्पादन कर रहे हैं। कठिनाई यह भी है कि इसमें बहुत सा कूड़ा इस तरह का है जो असमाप्य है। वह बायोडिग्रेडेबल नहीं है। यह कूड़ा संभाले नहीं संभल रहा है। नाभिकीय कचरा तो ऐसा होता है कि वह कभी समाप्त ही नहीं होगा और उसकी सदैव रक्षा करनी होगी ताकि, उससे मनुष्य का सम्पर्क न हो।
विकास की भेंट, तकनीक आज हमें निरन्तर प्रकृति से दूर करती जा रही है। हम बड़े ही कृत्रिम पर्यावरण में सांस लेने को मजबूर हो रहे हैं। अब हमें खाद्य पदार्थ भी प्राकृतिक नहीं मिलते। आर्गेनिक खाद्य महंगा होता है। साग-सब्जी में क्या मिला रहता है इसका पता नहीं। दूध, दवा, खाद्य पदार्थ सबमें मिलावट आज लाभ के व्यापार का अप्रतिम उपहार है। मिलावट लाभ कमाने और कम लागत से ज्यादा धनार्जन करने के लिए ही की जाती है। ऐसा करते हुए हम अपनी जान का भी ख्याल नहीं करते। पुरानी दवा, मिलावटी नकली रक्त, नकली शराब के चलतेे जानंे कितनी जानें नियमित रूप से जा रही हैं। विकास के फलस्वरूप पर्यावरण का प्रदूषण बढ़ता ही जा रहा है। आज वायु और जल जैसे जीवनदायी तत्वों  की गुणवत्ता में तेजी से गिरावट आ रही है। राजधानी दिल्ली सबसे प्रदूषित नगर बन गया है। उद्योग विकसित हो रहे शहरों के कारण दिन-प्रतिदिन नदियाँ प्रदूषित होती जा रही हैं और उनका जल जहरीला हो रहा है। विकास की हमारी अवधारणा में गुणवत्ता पर कम और वृद्धि या ग्रोथ पर ज्यादा जोर दिया जा रहा है, जबकि अपने मूल अर्थ में विकास गुणात्मक परिवर्तन को ही बताता है। विकास ने हमारी जरूरतें बढ़ाई और हमें मात्र उपभोक्ता या कंज्यूमर बना कर छोड़ा है।
विकास ने गलाकाट प्रतिस्पर्धा को तरजीह दी उसके चलते हर तरफ नैतिक मूल्यों का ह्रास हो रहा है। आज विकास की अंधी दौड़ एकागी मनुष्यता का सृजन कर रही है। इस तरह का विकास अपर्याप्त ही नहीं असंगत भी है। विकास को सर्वसमावेशी बनाना होगा और पर्यावरण ह्रास पर लगाम लगानी होगी। विकास का लक्ष्य प्रकृति के साथ-साथ रहना सीखना होेगा। सामंजस्य स्थापित करना उसके ऊपर नियंत्रण नहीं, प्रकृति का विरोध और विजय की आकांक्षा नहीं उससे विनम्रता से पाने का उपाय ही लाभकर होगा। ु
- (लेखक महात्मा गाँधी हिन्दी विश्वविद्यालय, वर्धा के कुलपति है।)