Friday, May 29, 2015

तपती धरती के दौर में खेती-किसानी. - अनंता वशिष्ठ

समग्र विकास के मार्ग की तलाश
इस बार मार्च और अप्रैल में बारिश कुछ ज्यादा ही हुई, जिसकी वजह से खेतों में खड़ी रबी की फसल को कई जगहोेें पर काफी नुकसान पहुँचा। इससे मौसम चक्र में बदलाव को लेकर अटकलों का दौर भी शुरू हो गया। बेशक, मौसम में बदलाव साफ तौर पर दिख रहे हैं। जैसे इस साल देश के कई हिस्सों में बेमौसम बारिश हुई, कई इलाकों में बसंत आया ही नहीं। इसी तरह, पिछले कुछ वर्षों में बरसात के मौसम में बदलाव दिखा। जैसे, बरसात के मौसम को छोटा हो जाना और कम समय-अवधि में ही ज्यादा बारिश का होना। लेकिन क्या ये बदलाव स्थायी है? क्या हमारा मौसम चक्र वास्तव में बदल गया है? इस पर अभी कोई टिप्पणी जल्दबाजी होगी, क्योंकि इसके लिए कई वर्षों के मौसम चक्र का विस्तृत अध्ययन और तमाम रिर्पोंट चाहिए, जो हमारे पास नहीं हैं। इसीलिए अभी जो बदलाव दिख रहे हैं, उनको फिलहाल मौसम विविधता माना जा रहा है। अगर यह रुझान अगले कई वर्षों तक बरकरार रहा, तभी यह माना जा सकेगा कि मौसम चक्र बदल गया है। लेकिन यह सच है कि जलयावु परिवर्तन के कारण मौसम की विविधता में लगातार बढ़ोत्तरी हो रही है। प्रदूषण, ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन, वनों की कटाई, जनसंख्या वृद्धि और लगातार बढ़ता औद्योगीकरण, ये सभी जलवायु परिवर्तन के कारण माने जाते हैं। कुछ और चीजें हैं, जो बताती हैं कि पर्यावरण में बदलाव हो रहा है। जैसे, वातावरण के तापमान और कार्बन डाइआॅक्साइड के स्तर में वृ द्धि।
मौसम की विविधता का कृषि कार्यों से काफी गहरा रिश्ता होता है। फसलों की पैदावार और गुणवत्ता पर जलवायु परिवर्तन का सीधा असर पड़ता है। भारत में उगाई जाने वाली फसलों के उत्पादन पर यह असर कुछ ज्यादा ही दिखता है। फसल को अंकुरित होने से लेकर पकने तक एक उपयुक्त मौसम की जरूरत पड़ती है। अंकुरण के समय उपयुक्त तापमान नहीं मिला, तो अंकुरण ठीक से नहीं होगा। फसल में दाना बनने के दौरान तापमान में अचानक वृद्धि होने से अनाज जल्दी पकने लगता है। अतः दाना बनने की अवधि में कमी आ जाती है, जिससे उत्पादन में कमी आती है। साथ ही उपज की गुणवत्ता भी खराब हो जाती है।
हालांकि, कृषि वैज्ञानिकों ने उपज बढ़ाने के लिए कई तरह की तकनीक का विकास किया है। लेकिन इनकी सफलता असमान्य मौसम बढ़ोत्तरी की वजह से कम हो रही है। ऐसी स्थिति में मौसम पूर्वानुमान तथा मौसम आधारित कृषि सलाह की जानकारी किसानों के लिए बहुत लाभकारी होती है। इससे कृषि में मौसम द्वारा होने वाले नुकसान को कुछ हद तक कम भी किया जा सकता हैं।
अभी हम बारिश की वजह से फसलों को होने वाले नुकसान को लेकर परेशान हैं, लेकिन सच है कि फसलांे को सबसे ज्यादा नुकसान सूखे से होता है। भारतीय कृषि मानसून पर निर्भर है तथा मानसून में देरी या विफलता के कारण खरीफ के मौसम में सूखा हो जाता है। यदि हमें मानसून के आने तथा इसके सामान्य रहने की जानकारी का पूर्वानुमान हो, तो हम खरीफ फसलों की बुवाई सही समय पर आरम्भ कर सकते हैं। यदि मानसून की शुरु में देरी या विफलता आती है, तो इस स्थिति में बुवाई तथा रोपाई में देरी की जा सकती है। मानसून में ज्यादा देरी होने से कम अवधि में तैयार होने वाली धान की प्रजातियाँ लगाई जा सकती हैं। जल्दी तथा मध्य सूखे के लिए मौजूदा फसलों को छोड़ दिया जाता है तथा कम समय और कम पानी की आवश्यकता वाली फसलों, जैसे बाजरा या दलहनी फसलों को लगाया जा सकता है। इसके अलावा, सूखे के लिए भंडारित किए गए पानी से भी सिंचाई की जा सकती है। खरीफ की विभिन्न फसलों का चुनाव और अन्य तैयारियाँ इस बात पर निर्भर करती हैं कि कम से कम पानी के निजी या सरकारी साधन उपलब्ध होने के बावजूद दक्षिण-पश्चिम मानसून द्वारा कब तथा कितनी वर्षा किसी क्षेत्र में होने की सम्भावना है। यदि सामान्य से अधिक वर्षा होने की सम्भावना है, तब धान के लिए अधिक क्षेत्रफल किया जा सकता है। ये तरीके काफी हद तक नुकसान को रोक सकते हैं।
वर्षा होने की सम्भावना से फसलों की सिंचाई की संख्या में कमी लाई जा सकती है, जिससे बिजली तथा डीज़ल पर होने वाले व्यय को भी कम किया जा सकता है। अधिक वर्षा होने पर धान के खेतों में मेड़ों  को मजबूत बना सकते हैं, जिससे ज्यादा पानी खेतों में रुक सके, जबकि अन्य फसलों (दलहनी, मक्का और सब्जियों) में जल निकास का प्रबन्धन कर सकते हैं। अधिक वर्षा होने पर खेत के किसी भाग में वर्षा के पानी को संरक्षित करने की व्यवस्था कर सकते हैं, जिसका उपयोग वर्षा न होने के दौरान फसलों की उचित समय पर सिंचाई के लिए किया जा सकता है।
ध्यान देने की बात यह भी है कि हर व्यवसाय की तरह कृषि पर भी मंहगाई का असर काफी पड़ा है। रासायनिक खाद, खर-पतवार नाशक, कीटनाशक, फंफूदनाशक वगैरह के दाम पिछले कुछ वर्षों में काफी बढ़े हैं। कृषि मजदूरों पर होने वाला खर्च भी इस दौरान काफी बढ़ गया है। जब हम किसानांे का नुकसान कम करने की बात करते हैं, तब हमें इन सभी बातों का ध्यान रखना होगा। यदि किसानों को समय रहते ही बता दिया जाए कि बुवाई के लिए अनुकूल मौसम नहीं है, तो बीज, खाद, बिजली, डीज़ल, समय और मजदूरी पर होने वाले खर्च को बरबाद होने से रोका जा सकता है। अगर मौसम अनुकूल है, तब इन सभी का फसलों पर अच्छा प्रभाव पड़ सकता है तथा खर्च में कमी आ सकती है।
मौसम के पूर्वानुमान से फसलों को कैसे बचाया जा सकता है या नुकसान को कैसेे कम किया जा सकता है, इसके ढेर सारे उदाहरण दिए जा सकते हैं। यह ऐसा काम है, जो हर स्थिति में किया जाना चाहिए, लेकिन जलवायु परिवर्तन के दौर में ऐसे पूर्वानुमान तैयार करने और जानकारी को किसानों तक पहुँचाए जाने की जरूरत और बढ़ गई है। तपती धरती के बदलते मौसम को शायद हम ज्यादा नहीं रोक सकते, लेकिन हम इस दौर में कृषि के जरूरी और समय रहते प्रबन्धन का सिलसिला जरूर शुरू कर सकते है। ु
- सीनियर साइंटिस्ट, आईएआरआई