इसे मुफ्ती मुहम्मद सईद को स्टेट्समैनशिप कहा जाएगा जिसकी बदौलत आज यह असम्भव सी सरकार खड़ी हुई। यह सच्चे अर्थों में ‘जम्मू और कश्मीर’ की सरकार है। समस्या सरकार चलाने की ही नहीं, बल्कि यह संयुक्त वैचारिक आधार तलाशने की भी है जिस पर खड़ा हुआ जा सके। यह प्रयोग हुर्रियत को हाशिए पर धकेल देगा। कश्मीर प्रवास के दौरान सवाल कौंधता रहा कि आखिर इस अन्तर्विरोधी कश्मीरी सांस्कृतिक-सामाजिक परिदृश्य का निष्कर्ष क्या है? कश्मीरी बुद्धिजीवीयों की क्या राय बनती है? डल झील के किनारे श्रीनगर विश्वविद्यालय का खूबसूरत परिसर है। वहाँ ‘सेन्टर फाॅर सेन्ट्रल एशियन स्टडीज’ द्वारा लाल देद और नन्द ऋषी उर्फ शेख नूरुद्दीन वली की फिलासफी पर एक सेमीनार आयोेजित किया गया था। श्रीनगर से प्रस्थान के अन्तिम दिन उस विभाग में जाने का अवसर मिला। कई सवाल बनते थे। कश्मीर के उस इतिहास का क्या होगा जो कल्हण की राजतरंगिणी की धारा के साथ प्रवाहमान है? एक सूफी इस्लाम है जो कश्मीरी संस्कृति के रचबस गया है। दूसरा वहाबी, कट्टर इस्लाम है जो आतंक का सहारा लेकर घाटी में हावी होना चाहता है।
हिन्दु-बौद्ध काल के कश्मीर की कोई हैसियत आज नहीं रह गई है, लेकिन बुलबुलशाह, शाह हमदान जो कश्मीर का इस्लाम से परिचय कराने वाले सूफी थे, उनकी परम्पराओं का क्या होगा? कश्मीरी भाषा का भविष्य क्या है? 80 के दशक के पूर्व घाटी में हिन्दु भी थे और धर्मनिरपेक्षता की बातें थीं। साझा संस्कृति की बात भली लगती थी। तब संस्कृति की दरिया के दो किनारें थे। एक था शैव मतावलम्बियों का हिन्दु कश्मीर दूसरा सिकन्दर बुतशिकन का कश्मीर। सिकन्दर वह सुल्तान है जिसने बलपूर्वक कश्मीरी पंडितों को बलपूर्वक मुसलमान बनाया और न मानने वाले लाखों का कत्ल किया। इन दोनों सीमाओं के बीच साझा संस्कृतियों की राह को कश्मीरियत के नाम से नवाजा गया। यह कश्मीर की उस सांस्कृतिक पहचान का प्रतीक है जिसके बगैर कश्मीर, कश्मीर नहीं है। शैव और सूफी परम्पराएं कश्मीरियत की इसी झील में आकर समाहित होती है। लाल देद और शेख नूरुद्दीन इसी कश्मीरियत की साझा संस्कृति के पथ प्रदर्शक हैं।
विपरीत ध्रुवों से बनी इस सरकार को वैसेे ही बचाना पड़ेगा जैसे कोई तूफान में चरागों की लौ को बचाता है। आज वे सूत्र कमजोर हैं जो कश्मीर को भारत से जोड़ते हैं। चैदहवीं सदी से पहले कश्मीर हिन्दु धर्म का प्रमुख केन्द्र था। वह सांस्कृतिक इतिहास जैसे आज महत्वहीन हो चुका है। दिल्ली में अब तक जो नेतृत्व रहा है उसका हिन्दुस्तानपरस्ती से कोई खास सरोकार नहीं रहा। एकता के बिन्दुओं की निशानदेही नहीं की गई। आम कश्मीरी न तो दहशतगर्द है, न ही हिन्दु विरोधी। वह तो एक सीधी-सरल सोच का आदमी है, जिसे हालात ने मजबूर बना दिया। बातचीत में कई लोगों ने कहा कि हम लोग अपने नाम के साथ इस्लाम से पहले के दिनों की अपनी जातीय पहचान जैसे भट्ट, वानी, रैना, पंडित, टाक, लोन, गुरू क्यों लिखते हैं? जाहिर है, हम अपनी विरासत भूलना नहीं चाहते। हमारे कल्चर में बहुत कुछ न भूलने लायक है। कश्मीर घाटी में लाल देद या माँ लालेश्वरी एवं उनके मानस पुत्र शेख नुरुद्दीन वली या नन्द ऋषि की परम्परा मजहब और संस्कृति के आपसी संवाद का प्रतीक है। उनकी मजार चरारेशरीफ का आतंकियों द्वारा जलाया जाना दरअसल कश्मीरियत पर हमला था। अपनी प्रार्थनाओं में शिव से वरदान मांगते दिखते हैं। भेड़ चराता वह चरवाहा/क्षणमात्र में बुला लिया गया/अचानक/और हरमुख से सीधे उड़ गया स्वर्ग को/हे शिव! मुझे भी वरदान दो। लाल देद ने कहा-शिव हैं व्याप्त सर्वत्र/ध्यान की गहनता में/स्वयं में पहचानो अपने स्वत्व को।
अब कश्मीर की हिन्दुविहीन घाटी में लाल देद और शेख नूरुद्दीन रचित शिव की स्तुतियों का भला अर्थ क्या रह जाता है? ऐसी स्थिति में लाल देद और शेख नूरुद्दीन की साझा संस्कृति हाशिये पर न चली जाएगी? आज जिहादी सोच कश्मीर को उसकी रिवायत, संस्कृति, भाषा से पूरी तरह से काट कर एक उन्मादी मजहबी राज्य बनाने पर अमादा है। कश्मीर शेष भारत से अलगाव महसूस करता है। हमारे नेताओं ने कश्मीर को लेन-देन का सामान बना दिया है। कश्मीर कोई जीता हुआ इलाका नहीं, बल्कि हमारे वजूद का हिस्सा है। जाहिर, है, हमारे नेताओं से गलतियाँ हुई हैं। कश्मीरियत की इसी साझी विरासत के लिए ही सही, घाटी में पंडितों की वापसी बेहद जरूरी है। अब जब वहाबियों के द्वारा यह सूफी परम्परा ही गैर इस्लामी करार दी जा रही है तो उस मुस्लिम समाज की क्या हैसियत बनेगी जिसे सूफियों ने इस्लाम में दीक्षित किया है? कल इन्हें भी अहमदियों की श्रेणी में खड़ा कर दिया जाएगा। कश्मीरियत के बहुत से रंग कश्मीरी भाषा के सबसे लोकप्रिय कवि गुलाम अहमद महाजूर की शायरी में भी पेज दर पेज बिखरे हुए हैं।
पहाड़ों से आते झरनों की तरह झरती माहजूर की शायरी कश्मीर की झीलों, विचारों, चिनारोें, विरासतों और मुहब्बतों की बातें करती है। कश्मीरी भाषा ही कश्मीरियत, कश्मीरी संस्कृति की सच्ची वाहक है। अब इसे पीरपंजाल के पर्वतों से नीचे उतरते हुए डोगरी को भी स्पर्श करने की जरूरत है। कश्मीरियत तो कश्मीर को शेष भारत से जुड़ने का सबसे मजबूत पुल है। सम्पूर्ण कश्मीर घाटी कश्यप ऋ़षी के वंशज कश्मीरी पंडितों की थी। किसे पता था कि ऐसा वक्त भी आएगा जब कश्यप ऋषि के वंशजों को अपना धर्म बदलने को मजबूर होना पड़ेगा। इन वंशजों को अपना इतिहास भूल जाने को बाध्य कर दिया गया। जो कश्मीरी पंडित सदियों के नरसंहार और बलपूर्वक धर्म परिवर्तन से किसी तरह जीवित बचे हैं वे आज अपने घरों से बेदखल हैं। उनकी वापसी हो। वीरान, खण्डहर हो चुके मन्दिरों को उनकी पूर्व स्थितियों में लाया जाए। आज जो मस्जिदें हैं वे भी कश्यप ऋषि के वंशजों की ही हैं। कश्मीर की सुबहों में मस्जिद से उठती अजान के साथ पहले की तरह भक्तों के जयकारें और घंटों का निनाद शामिल हो, यही कामना है। इंशाअल्लाह! यही कश्मीरियत का तकाजा भी है। ु
- (लेखक भारतीय प्रशासनिक सेवा में हैं।)





