Friday, May 29, 2015

मानव विकास की समग्र दृष्टि - .डाॅ॰ नवलता

विकास का सामान्य अर्थ है खिलना। अन्तहनिहित शक्तियों का इस प्रकार प्रकट होना, कि उसका विस्तार उपयोगी व सकारात्मक दिशा में हो, विकास कहा जाएगा। विश्व की विकासात्मक अवधारणा का मूलाधार यही विस्तार है। जब किसी वस्तु के विकास की बात की जाती है तो उसमें दो बातें होती हैैं। एक तो वह वस्तु, जो अपने मूल अस्तित्व में स्थिर है, तथा दूसरा उस वस्तु की स्वरूपगत तथा क्रियागत अभिव्यक्ति। दूसरे शब्दों में वस्तु की स्थिति और गति विकास का निर्धारण करती हैं। भारतीय ऋषियों ने सत्य तथा ऋत के रूप में इन दोनों को परिभाषित किया है। समस्त जगत् सत्ता की दृष्टि से सत्य है और गति की दृष्टि से ऋत है। सत्य और ऋत मिलकर ही जगत् को पूर्ण बनाते हैं। किन्तु ध्यातव्य है, कि ऋत स्वच्छन्द गति न होकर एक ऐसी गति है, जो नैतिक तथा उत्कर्षपरक नियमों से नियन्त्रित हो। निरन्तर मानव और मानवता को श्रेष्ठता की ओर ले जाने वाला तत्त्व ऋत है। अतः मूलतः ऋत ही विकास का मूल मन्त्र है।
धर्म और संस्कार इस ऋतमूलक विकास के प्राणतत्त्व है। विशेषतः जब समग्रविकास की चर्चा की जाती है, तो यह अवश्य विचारणीय हो जाता है, कि समग्रता सर्वांग तथा सर्वतोन्मुखी दृष्टि का सूचक है। व्यावहारिक रूप से व्यक्ति और राष्ट्र दोनों का समग्र विकास धर्म और संस्कार के बिना सम्भव नहीं।
यद्यपि ये दोनों शब्द वर्तमान समय में बड़े विवादास्पद हैं। विशेषतः भारत में धर्म और संस्कार दोनों का जो अर्थ आज समझा जाने लगा है, वह न केवल विकास में अवरोधक है, अपितु ह्रास और पतन की ओर ले जाने वाला है। स्पष्ट करना आवश्यक है, कि धर्म का अर्थ सम्प्रदाय विशेष की आचारगत आस्थाओं के आधार पर निश्चित नहीं किया जा सकता। अपितु सभी सम्प्रदाय, सभी वर्ग, समाज व राष्ट्र मूलभूत रूप में जिन मानवीय मूल्यों को मानते हैं, वही धर्म है। मनुस्मृति में धर्म के जो दस लक्षण बतलाए गए हैं, उन पर विचार किया जाय, तो यह बात स्पष्ट हो जाएगी। ये दस लक्षण हैं - धृृति, क्षमा, दम, अस्तेय, शौच, इन्द्रिय निग्रह, धी, विद्या, सत्य तथा अक्रोध।
क्या कोई ऐसा वर्ग या सम्प्रदाय है, जो इन्हें न स्वीकार करता हो? धृति का अर्थ है धारण करना। लोक व्यवहार में धैर्य ही धृति है। कहना न होगा, कि विकास के लिए निश्चित समय अपेक्षित होता है। कोई शिशु जन्म लेते ही बड़ा नहीं हो जाता। इसी प्रकार हम जिस रूप में तथा जिस प्रकार विकास की अपेक्षा करते हैं, उसके लिए कुछ समय आवश्यक है। अतः सही दिशा में प्रयास करते हुए धैर्यपूर्वक अपने लक्ष्य पर केन्द्रित होना ही धृति है, जो समग्रविकास की प्रथम व मूल आवश्यकता है।
दूसरा तत्त्व है क्षमा। इस जगत् में सभी व्यक्ति तथा राष्ट्र विकास चाहते है तथा उसके लिए प्रयास भी करते हैं, किन्तु जो क्षमाशील होता है, वह आगे बढ़ जाता है। अनजाने में अथवा प्रथम बार की गई प्रत्येक त्रुटि के लिए क्षमा करना नीतिसम्मत है। इसी प्रकार कुण्ठाग्रस्त होकर केवल विरोध के लिए विरोध करने वालों को उपेक्षित कर तटस्थ रहना भी क्षमा का ही दूसरा रूप है। वस्तुतः क्षमाशील व्यक्ति विकास की दिशा में इसलिए अग्रसर हो पाता है, क्योंकि वह व्यर्थ के कामों तथा मिथ्या प्रपन्चों में अपनी ऊर्जा नष्ट नहीं करता।
दम का अर्थ है इन्द्रियों को विषयों में आसक्त होने से रोकना। इन्द्रियों का कार्य है विषयों की ओर भागना। किन्तु उन्हें नियन्त्रित कर सही दिशा में लगाकर विकास में सम्भावित अवरोध तथा भटकाव को रोकना महत्वपूर्ण होता है। विकास का चैथा मन्त्र है अस्तेय। स्तेय या चैर्य दो प्रकार का हो सकता है - आन्तरिेक तथा बाह्य। जब हम स्वयं अपने प्रति बेईमानी करते हैं। अपनी प्रकृति का गोपन करते हैं, तो अपनी दिशा का बोध नहीं कर पाते। सच्चे विकास के लिए आवश्यक है, कि व्यक्ति स्वयं अपने स्वभाव (मानवीय गुणों) के प्रति निष्ठावान् रहे। यदि ऐसा हो जाए, तो बाह्य वस्तुओं, विषयों, दूसरों के अधिकारों आदि की चोरी नहीं करंेगे।
शौच मनसा, वाचा, कर्मणा पवित्रता अथवा निष्कलुशता है। यह निष्कलुशता व्यक्ति को खुले आकाश में बिना किसी से भयभीत हुए तथा बिना किसी को भयभीत किये उड़ने का सामथ्र्य प्रदान करती है। पवित्रता भय का नाश करती है और भयरहित वातावरण विकास के लिए सबसे उपयुक्त अवसर प्रदान करती है।
इन्द्रियनिग्रह अनावश्यक विषयों की ओर भागती इन्द्रियों को नियन्त्रित करने का नाम है। इन्द्रियनिग्रह व्यक्ति को लक्ष्य पर केन्द्रित होने में सहायता करता है। धी का अर्थ है बुद्धि, जो विवेक की क्षमता प्रदान करता है। समग्र विकास के लिए जिस सन्तुलन, समायोजन तथा प्रबन्धन की आवश्यकता होती है, वह विवेक के बिना सम्भव नहीं। विद्या जहाँ विषयों का तथ्यात्मक ज्ञान कराती है, वहीं उनके प्रति कर्तव्याकर्तव्य की दृष्टि भी देती है, जिसे जागरूकता कहा जा सकता है। जो व्यक्ति तथा जो राष्ट्र अतीत को स्मरण रखता हुआ उससे सीख लेता है तथा भविष्य के लिए सजग होता है, वह वर्तमान में सही निर्णय लेता है। भर्तृहरि ने नीतिशतक में कहा है, कि विद्या विनय देती है, विनय से पात्रता आती है, पात्रता से धन, धन से धर्म तथा धर्म से सुख प्राप्त होता है।
विनय का तात्पर्य केवल विनम्रता नहीं, अपितु विशेष नय (नीति) का ज्ञान। विषय विशेष के शास्त्र सम्मत अथवा लोकसम्मत ज्ञान से जो योग्यता आती है, वही, धर्मपूर्वक धनार्जन का सुख प्रदान कर सकती है। यह विद्या व्यक्ति को सत्य का ज्ञान कराती है। सत्यनिष्ठ व्यक्ति क्रोध पर नियन्त्रण कर अपने चारों ओर की प्रतिकूल परिंिस्थतियों को जीत लेता है, जबकि अनुकूल परिस्थितियों का लाभ उठाता है।
उक्त प्रकार से धर्म विकास का मूल है, यह स्वीकार करने में संकोच नहीं होना चाहिए। विकास का अत्यन्त महत्वपूर्ण अंग है संस्कार। संस्कार का सामान्य अर्थ है सम्यक् निर्माण। परिभाषित अर्थ में किसी व्यक्ति में किसी विशेष अथवा सामान्य योग्यता का आधान करने की युक्ति संस्कार कहलाती है। जिस प्रकार व्यक्ति के जीवन में समय पर कभी माता-पिता द्वारा तो कभी आचार्य शिक्षकों द्वारा अथवा कभी स्वयं अपनी अन्तर्दृष्टि से उत्तरोत्तर उच्च से उच्चतर अवस्था को प्राप्त करना सम्भव होता है, उसी प्रकार किसी राष्ट्र के विकास में राजनेताओं, जनता के प्रबुद्धवर्ग तथा राष्ट्र का प्रतिनिधित्व करने वाले शीर्ष प्रमुखों के द्वारा निरन्तर विकास के स्वरूप के समग्र विश्लेषण एवं सुधार की अपेक्षा होती है।
उक्त सन्दर्भ में सबको एकजुट होकर राजनीतिक धार्मिक सम्प्रदायगत तथा वैयक्तिक स्वार्थों से ऊपर उठकर विकास की दिशा निर्धारित करनी चाहिए। विशेषतः भारत के परिप्रेक्ष्य में विकास की समग्रता का केन्द्र केवल बाह्य विषय नहीं हैं अपितु आभ्यन्तर विकास भी है।
भारत अध्यात्म प्रधान राष्ट्र है, जिसकी शाशक्त दृष्टि समग्रतावादी रही है। जैसा कि पूर्व प्रसंग में चर्चा की गई, कि धर्म और संस्कार समग्र विकास का मूलमन्त्र हैं। ये शब्द तथा उनके अर्थ स्वयं समग्रता के सूचक हैं।
वर्तमान भारत विकास की जिस वैश्विक यात्रा का पथिक है, उसके मार्ग में सबसे बड़ी बाधा उसकी पारम्परिक समग्रदृष्टि का पीछे छूट जाना है। आज जब सबको साथ लेकर सबके विकास की चर्चा की जाती है, तो समग्र विकास को दृष्टि में रख कर बार-बार समग्रता का स्वरूप स्पष्ट करने की आवश्यकता है। जब तक धर्म तथा संस्कार विकास के आधार में नहीं होंगे समग्रविकास की कल्पना व्यर्थ है। ु