Friday, May 29, 2015

पारदर्शिता के उच्च शिखर पर भारत - डाॅ॰ विशेष गुप्ता

हाल ही में अंतरराष्ट्रीय संगठन वल्र्ड जस्टिस प्रोजेक्ट्स (डब्ल्यूजेवी) की ओपन गवर्नमेन्ट इंडेक्स-2015 की प्रकाशित रिपोर्ट में 102 देशों की सूची में भारत को 37वाँ स्थान मिला है। इस रिपोर्ट में नागरिक भागीदारी, शिकायत तंत्र, कानूनों और सरकारी आॅकड़ों के प्रचार-प्रसार की स्थिति व सूचना का अधिकार जैसे बिन्दु सर्वे के आधार स्तम्भ रहे हैं। इन चार कसौटियों को आधार बनाकर विभिन्न देशों की सरकारों के काम-काज में पारदर्शिता के स्तर को मापने वाला सूचकांक तैयार किया गया है। इस सूचकांक के विश्लेषण में शून्य से लेकर एक तक के अंक प्रदान किये गये हैं। इस सूचकांक का जो पैमाना तैयार किया गया है उसमें एक अंक का मिलना सरकार के सबसे अधिक खुलेपन का सूचक रहा है। मुम्बई, दिल्ली और बंगलुरु में किये गये इस सर्वे रिपोर्ट की खास बात यह रही है कि भारत अपने दक्षिण एशियाई पड़ोसी देशों यानि पाकिस्तान, रुस व चीन को पछाड़कर सरकारी काम काज के खुलेपन में इन सबसे आगे निकल गया।
रिपोर्ट यह भी खुलासा करती है कि इसमें ब्रिक्स के सहयोगी देश ब्राजील को 38वाँ, रुस को 67वाँ तथा चीन को 87वाँ स्थान मिला है। सूचकांक में शीर्ष तीन स्थान पाने वाले देशों में क्रमशः स्वीडन, न्यूजीलैंड व नार्वे रहे हैं। दूसरी ओर जिम्बाब्वे, उज्बेकिस्तान व म्यांमार सूचकांक के निचले तीन पायदान पर रहे हैं। सूचकांक के इसी क्रम में ब्रिटेन को 8वाँ तथा अमेरिका को 11वाँ स्थान मिला है। जहाँ तक सूचकांक के मानकों पर खरा उतरने का सवाल है तो इसके तहत कानूनों और सरकारी आॅकड़ों के प्रचार-प्रसार की कसौटी पर भारत 0.54 अंक के साथ में सभी देशों की सूची में 27वें स्थान पर रहा। 
सरकार के काम-काज की पारदर्शिता से जुड़ी इस रिपोर्ट में खास बात यह उभरकर सामने आयी कि जिन देशों के पास जितने बढि़या भौतिक संसाधन और सूचना तकनीक का ढ़ाॅचा रहा वे देश सरकार के खुलेपन और अन्य जानकारियों के मामले में बेहतर रहे। दूसरी ओर उच्च आय से जुड़े देशों को इस सूची से निकाल देने के बाद बाकी देशों में प्रति व्यक्ति सकल घरेलू आय और सरकार के काम-काज में खुलेपन का सहसम्बन्ध टूटता नजर आया। इससे जुड़ा विश्लेषण यह भी बताता है कि चीन दुनिया के देशों के बीच उच्च मध्यम आय समूह में आता है, जबकि भारत की गिनती निम्न मध्यम आय समूह से जुड़ें देशों में होती है। इसके बावजूद भी भारत काम-काज की बेहतरी के मामले में चीन से आगे निकल गया। इस रिपोर्ट से जुड़े आॅकड़े यह भी बताते हैं कि जर्मनी व अमेरिका जैसे विकसित देशों में सूचना के अधिकार की स्थिति भारत के मुकाबले खराब है। साथ ही सुशासन के मामले में भारत दुनिया के कई विकसित देशों के मुकाबले बहुत अच्छी स्थिति में है। 
सन्दर्भवश पिछले दिनों चर्चा में आयी ‘ग्लोबल गवर्नेस-2025’ नामक रिपोर्ट भी गौरतलब है। इस रिपोर्ट में भी अमेरिका और चीन के बाद भारत को सबसे शक्तिशाली देश के रूप में स्वीकार किया गया था। इस रिपोर्ट में यहाँ तक कहा गया था कि भारत और चीन के साथ ब्राजील जैसे देशों की ताकत 2025 तक बहुत अधिक बढ़ जायेगी । इस रिपोर्ट में आगे बिल्कुल साफ किया गया था कि भारत के पास 8 फीसदी की वैश्विक शक्ति के साथ यह दुनिया का तीसरा सबसे शक्तिशाली राष्ट्र होगा। जापान, रूस और ब्राजील के पास 5 फीसदी से भी कम की वैश्विक शक्ति होगी।  रिपोर्ट के ही अनुसार 2025 में भी अमेरिका दुनिया का सबसे शक्तिशाली देश तो होगा, परन्तु वैश्विक शक्ति में उसकी हिस्सेदारी घटकर 18 फीसदी के आस-पास रह जायेगीं। रिपोर्ट में अनुमान लगाया गया है कि डेढ़ दशक पश्चात अमेरिका के बाद चीन की भागीदारी 16 फीसदी, यूरोपीय संघ की 14 फीसदी तथा भारत की हिस्सेदारी 10 फीसदी होते हुये भी यह विश्व शक्ति में तीसरे स्थान पर होगा। 
आज विश्व की प्रमुख शक्ति के रूप में भारत के विषय में यह आंकलन अनायास ही नहीं है। देश की आजादी के बाद जनसंख्या की रफ्तार तेज होते हुये भी भारत ने चहुँमुखी विकास किया है। ऐसा नहीं है कि भारत के समक्ष चुनौतियाँ नही हैं। लेकिन इन सबके बावजूद भी भारत निरन्तर प्रगति के पथ पर है। अगर हम इसकी प्रगतिवादी अर्थव्यवस्था के बारे में बात करें तो ज्ञात होता है कि 1991 के बाद विगत ढ़ाई दशकों में विकासशील राष्ट्रों के बीच भारत सबसे धनी अर्थव्यवस्था बनकर उभरा है। आज भारत यदि अपनी सकल घरेलू उत्पाद को 8-9 फीसदी रखने का प्रयास कर रहा है तो यह भारत की बढ़ती हुई अर्थव्यवस्था के विषय में शुभ संकेत ही हैं। भारत के तीस हजारी सैंसेक्स से पूरी दुनिया में यहाँ की उभरती अर्थव्यवस्था का श्रेष्ठ संदेश गया है। अभी कुछ दिनों पूर्व अमेरिका की ब्लूमवर्ग संस्था के सर्वेंक्षण से ज्ञात हुआ था कि पूंजी निवेश के क्षेत्र में अमेरिका व चीन के बाद भारत पूंजी निवेशकों का सबसे अधिक प्रिय देश बन कर उभर रहा है। केवल इतना ही नहीं भारत की सवा अरब जनसंख्या होने के बावजूद भी यह दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है तथा सकल घरेलू उत्पाद के मामले में अमेरिका, यूरोपियन यूनियन तथा चीन के बाद भारत चैथे पायदान पर स्थिर है। साथ ही पूरे विश्व की अर्थव्यवस्था में इसकी लगभग 2 फीसदी से भी अधिक हिस्सेदारी है तथा विदेशी मुद्रा के संचय के मामले में चीन, जापान, रूस और ताईवान के बाद भारत पाँचवी पायदान पर है।
वैश्विक स्तर पर सुशासन और पारदर्शिता को लेकर भारत का जो वस्तुनिष्ठ मूल्यांकन किया गया है हमारे लिए यह सम्मान की बात है। परन्तु ऐसा भी नहीं है कि भारत ने अपनी यह स्थिति किसी से उधार में ली है। अतीत में भी भारत विश्व गुरू की उपाधि से विभूषित रहा है परन्तु भारत की प्रगति को गुलामी के ग्रहण ने डस लिया। यही वजह रही कि भारत को अपनी स्वायत्ता वापस लाने के लिए सैंकड़ो वर्ष प्रतीक्षा करनी पड़ी। सच यह है कि उस समय भी भारत की सामाजिक, आर्थिक और शैक्षिक ढ़ाॅचा बेहतर स्थिति में था। इस सच्चाई को यहाँ प्रस्तुत करने में कोई हिचक नहीं है कि देश की आजादी के बाद भारत के एक शक्तिशाली राष्ट्र के रूप में उभरने के जो स्वप्न स्वतन्त्रता संग्राम सेनानियों एवं राष्ट्र के निर्माताओं ने देखे थे, उनके पूर्ण होने में काफी कुछ सफलता भी मिली। परन्तु यह तकलीफदेय है कि इण्डिया और भारत के बीच एक स्पष्ट विभाजन रेखा भी खिंचती चली गयी। एक ओर यदि राष्ट्र की अर्थव्यवस्था ने लोगों की क्रय क्षमता बढ़ायी, तो दूसरी ओर इसी व्यवस्था से एक ऐसा वर्ग भी पनपा जो अभी भी अपनी बुनियादी जरूरतों से जूझ रहा है। गरीबी पर लगातार जारी बहस किसी से छिपी नहीं है। इसके साथ-साथ धार्मिक कट्टरता, उभरता जातिवाद, नक्सलवाद, सवर्ण, पिछड़ों और दलितों के बीच उभरते मतभेद, मनभेद व आरक्षण से जुड़े मुद्दे भी सामाजिक चुनौतियों के रूप में सामने आ रहे हैं। यही ज्वलंत देश की कानून व्यवस्था के लिए ही नहीं बल्कि कभी-कभी देश की संसद के लिये भी बड़ी चुनौती बन जाते हैं। हम सहिष्णुता का पाठ पढ़ाते हुये नहीं थकते। परन्तु इस समय कौन से सामाजिक विष हमारे राष्ट्रीय हित को अपनी चपेट में ले लेगा, इसके शाश्वत उपाय होने अभी बाकी हैं। बढ़ती हुयी भौतिक आवश्यकतायें लोगों को शार्टकट उपाय अपनाने को मजबूर कर रही हैं।  इसी का परिणाम है कि देश में भ्रष्टाचार फलित हो रहा है और अच्छे लोग इसकी बली चढ़ रहे हैं। इसके बावजूद भी इसे काबू करने में अपेक्षित सफलता नहीं मिल पा रही है। आज जो विकसित देश भारत के सुशासन और यहाँ की सरकार के  काम-काज और कानूनों की पारदर्शिता की तारीफ कर रहे है, वे देश ही हमसे सीधी प्रतिस्पर्धा भी रखते  हैं। आज चीन का उदाहरण हम सबके सामने है। यदि भारत को विश्व में अपनी कार्य संस्कृति, कानूनों और सरकारी आॅकड़ों में पारदर्शिता के साथ में देश में नागरिक सहभागिता को बढ़ाना है तो उसे घरेलू स्तर पर गरीबी, धार्मिक कट्टरता, महिला हिंसा, जातिवाद, आतंकवाद और नक्सलवाद जैसी सामाजिक-धार्मिक, चुनौतियों का सामना करने के लिए अपनी बिखरी हुयी राष्ट्रीय शक्ति को एकीकृत करना होगा। तभी हम आने वाले दशकों में अपने सत्त विकास लक्ष्य को हासिल करने के साथ-साथ विश्व मेें अपना परचम लहराने में कामयाब होंगे। 

- एसोसिऐट प्रोफेसर, समाजशास्त्र 
एम॰एच॰पी॰जी॰ काॅलेज, मुरादाबाद।