‘‘यदि किसी विषय को समझना है तो उसके निकट जाओ। यदि किसी समस्या का कारण व निराकरण जानना हो तो उन समस्याओं की जड़ तक जाओ।’’ - उपरोक्त सूत्रों को ध्यान में रख कर लोक भारती द्वारा गोमती पर दो यात्रायें की गईं, जिनका संक्षिप्त विवरण प्रस्तुत है -
आदि गंगा गोमती, 2020 तक ‘‘जल युक्त- प्रदूषण मुक्त’’ हो जाय, यह विचार, प्रथम ‘‘गोमती अध्ययन यात्रा, 2011’’ (28 मार्च से 3 अप्रैल, 2011) में आया था। लोक भारती तब से निरन्तर इस विचार को साकार करने की दिशा में प्रयत्नशील है, जिससे कई क्षेत्रों में अनुकूल व उत्साहवर्धक परिणाम भी आये। इसी विचार को जन-जन तक पहुँचाने तथा गति व शक्ति देते हुए, उसके लिए कार्य करने हेतु समर्पित कार्यकर्ताओं को जोड़ने व आवश्यक कार्य योजना बनाने हेतु ‘‘गोमती अलख यात्रा-2015’’ का आयोजन किया गया।
गोमती अलख यात्रा, 2015 का शुभारम्भ 10 अप्रैल को प्रातः 11 बजे से 12.30 तक कुडि़याघाट, गोमती तट, लखनऊ से महन्त देव्यागिरि (अधिष्ठाता मनकामेश्वर नाथ पीठ, लखनऊ), स्वामी विज्ञानानन्द सरस्वती (गंगा एवं ससुर खदेरी के प्रणेता, फतेहपुर), शिया धर्मगुरू मौलाना कल्बे सादिक, नवाब मीरजाफर, वरिष्ठ पत्रकार योगेश मिश्र, अक्षयपात्र वृन्दावन के सन्त स्वामी अनन्तवीर्य दास एवं गंगा समग्र के मार्गदर्शक मधुभाई कुलकर्णी के उद्बोधन, गोमती पूजन व यात्रा को पताका दिखाकर हुआ।
यात्रा विवरण - 10 अप्रैल से 16 अप्रैल तक गोमती अलख यात्रा गोमती के प्रवाह क्षेत्र के 12 जिलों में 960 किमी॰ हेतु उद्गम स्थल गोमत ताल, माधौटाण्डा पीलीभीत से गोमती-गंगा संगम स्थल कैथी घाट, वाराणसी में सम्पन्न हुई, जिसके अन्तर्गगत 35 स्थानों पर गोमती मित्र मण्डलों का गठन हुआ, जिसमें 500 से अधिक स्थानीय कार्यकर्ता कार्य के लिए आगे आये। इस यात्रा में गोमती केे साथ गोमती की सभी 22 सहायक नदियों को भी जौड़ा गया तथा उनके जल का भी संग्रहण हुआ।
कार्य दिशा एवं कार्ययोजना -
गोमती अलख यात्रा-2015 भविष्य की दृष्टि से ‘गोमती समग्र’ की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है, जो अपनी पूर्ण सार्थकता के साथ 10 अप्रैल से 16 अप्रैल, 2015 तक सम्पन्न हुई। इस यात्रा का सम्बन्ध गोमती के साथ-साथ गोमती की समस्त 22 सहायक नदियों तक था, जिन्हें जलयुक्त एवं प्रदूषण मुक्त करने पर ही, गोमती का संरक्षण सम्भव है। जिसके लिए अनेक प्रकार के कार्य करने होंगे, जिन्हें तीन भागों में (1) सामाजिक, (2) संयुक्त, (3) सरकारी प्रबन्धन के रूप में चिन्हित किया जा सकता है। यहांँ पर सामाजिक सरोकारों सम्बन्धी विवरण प्रस्तुत है - सामाजिक प्रबन्धन:
अ. जलयुक्त गोमती - गोमती व उसकी सभी सहायक नदियाँ वर्षा काल के अतिरिक्त भू-जल स्रोतों पर निर्भर हैं। भू-जल स्रोतों का प्रवाह, भू-जल स्तर पर निर्भर करता है। अर्थात् गोमती को जल युक्त रखने के लिए, भू-जल स्तर ठीक रखने का कार्य करना होगा। वे कार्य होंगे -
(1) पवित्र तालाब - गाँव में जल की आवश्यकता, जल की पवित्रता और जल का प्रबन्धन यह तीनों विषय वहाँ के जनजीवन के कर्तव्य और संस्कार बन जायँ, इसके लिए प्रत्येक गाँव में एक तालाब का चयन कर उसे पवित्र तालाब या गोमती/गंगा तालाब का रूप देना होगा। सर्वप्रथम गाँव के द्वारा उनके पवित्र तालाब का चयन, उसकी आवश्यक खुदाई एव सफाई की व्यवस्था, वर्षा जल आने की व्यवस्था, स्वच्छता बनाये रखने की व्यवस्था, तालाब में सम्भव हो तो कमल, चारो ओर किनारों पर वृक्षारोपण, आस्था केन्द्र का निर्माण। तालाब के किनारे स्वच्छ रहें इस हेतु गाँव में संस्कार विकसित करना होगा कि अब कोई भी व्यक्ति तालाब के निकट शौच क्रिया के लिए नहीं जायेगा। इस तालाब के प्रति पवित्रता का भाव, संस्कार और कर्तव्य जगाने हेतु किसी शुभ अवसर पर गाँव द्वारा गंगा-जल या गोमती का जल लाकर तालाब में अर्पितकर तालाब संस्कार कार्यक्रम करना उपयुक्त होगा। वर्षा काल में आषाढ़ पूर्णिमा (गुरूपूर्णिमा) से हरियाली तीज तक हरियाली पखवारा मनाते हुए वृृक्षारोपण करना व उन्हें सुरक्षित रखने की व्यवस्था करना होगी।
(2) जीवन्त कुआंँ - हमारे विवाह संस्कार के समय कुआँ पूजने की परम्परा है। इसके पीछे नव वर-वधू को जल व कुआँ के महत्व
से अवगत करते हुए, उसे बचाये व बनाये रखना उसका दायित्व है, यह संस्कार भी सम्मिलित था। परन्तु अब भी कुआंँ पूजन की परम्परा का निर्वहन हेता है, पर उसमें जीवन्तता न होकर लकीर के फकीर का भाव ही शेष बचा है। अनेक स्थानों पर कुआँ पुजन में यह भी नहीं देखा जाता कि उस कुएँ में पानी है भी, कि नहीं। कई स्थानों पर कुआँ के अभाव में किसी को ही कुआँ मानकर पूजन करा दिया जाता है। आज इस परम्परा को पुनः जीवन्त करने की आवश्यकता है। अतः प्रत्येक गाँव में कम से कम एक कुआँ का चयन कर उसे जीवन्त बनाये रखा जाये। गाँव में कई लोग होंगे जिनके पूर्वजों ने कुआँ बनवाया होगा, वे उनकी स्मृति का जीवन्त रखने के लिए उस कुएँ को जीवन्त रखने के लिए सहज प्ररित हो सकते हैं। आवश्यकता उन के मन को जगाने की है। इसके अतिरिक्त शेष कुओं को बंद करने की अपेक्षा उनको रिचार्जिंग-बेल के रूप में प्रयोग किया जा सकता है। गुजरात में स्वाध्याय मण्डल द्वारा वर्षा जल भण्डारण एवं संचयन के लिए इस दिशा में सराहनीय कार्य हुआ है।
(3) उद्गम झील/तालाब का पुनरोदय - गोमती व उसकी सभी सहायक नदियाँ किसी न किसी झील या तालाब से निकली हैं। यदि उनकी वर्षा जल
भण्डारण क्षमता बढ़ा दी जाये और उन्हें स्वच्छ रखा जाये तो नदी में भी जल प्रवाह बढ़ाने में सहायक होगा। इसके लिए झील/तालाब मित्र मण्डल बनाकर, उसके द्वारा सामाजिक जागरण व श्रमदान के साथ-साथ ग्राम प्रधान, विकास खण्ड अधिकारी, जिला पंचायत व मनरेगा आदि योजनाओं के द्वारा कार्य सम्पन्न करा कर नदी के पुर्नजीवन की दिशा में एक सार्थक पहल हो सकती है।
(4) चेकडैम निर्माण - वर्षा जल जहांँ-जहाँ रोक कर भण्डार किया जा सकता हो वहाँ-वहाँ चेकडैम बनाने का कार्य उपयोगी होगा। चेकडैम तालाबों के प्रवाह मार्ग व नदियों में स्थान-स्थान पर बनाने से वर्षा जल पहले उस स्तर तक रुक कर दूर तक भण्डार बनायेगा और अतिरिक्त जल बहकर आगे चला जायेगा। इस
से वर्षा काल में रिचार्जिंग होगी वहीं वर्षा के बाद अधिक समय तक जल बना रहने से जहाँ भूजल स्तर बढ़ाने में मदद मिलगी वहीं पम्पिंग सेट द्वारा सिंचाई के साथ ही जंगली जीवों के लिए पानी की उपलब्धता बनी रहेगी।
(5) रिचार्जिग वेल - खेतों में वर्षा जल-प्रवाह मार्गों पर, पुराने कुओं में तथा प्राथमिकता पर स्कूलों में रिचार्जिग वेल बनाने का कार्य सामाजिक जागरूकता से सम्भव है। समाज को यह बताना आवश्यक है कि भूमि से जितना पानी हम लेते हैं, उतना उसे लोटायें भी। ए॰टी॰एम॰ में कार्ड द्वारा जब चाहे, जहाँ चाहे पैसा निकालने की सुविधा उपलब्ध है। यदि बैंक उस ए॰टी॰एम॰ में पैसा डालना बंद कर दें तो क्या कार्ड का
म करेगा। यही स्थिति भूगर्भ की भी है। पिछले पचास साल से जमीन से पानी निकालने व उसके उपभोग की हमने महारत हासिल कर ली हैं, पर उसमें पानी कहाँ से आयेगा, यह कभी नहीं सोचा। अब जमीन की कोख पानी से खाली हो रही है। अतः प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य बनाता है, वह जितना पानी लेता है, उतना पानी जमीन में पहुँचाये भी। पर! यहाँ पर विशेष सावधानी की आवश्यकता होगी कि हमारे कार्य द्वारा प्रदूषित जल भूगर्भ में न जाने पाये।
(6) वृक्षारोपण/नदीवन - व्यक्तिगत व सामूहिक स्तर पर वृक्षारोपण को प्रोत्साहित किया जाये व आयोजित किया जाये। जहांँ खाली जमीन उपलब्ध हो वहाँ पर वन विभाग के सहयोग से नदी/गाँव वन लगाया जाये। वृक्षों का सम्बन्ध जहांँ वर्षा को आकर्षित करने से है, वहीं जल को सहेजने से भी है। मध्य व दक्षिण भारत की नदियाँ हिमालय/ग्लैशियर से नहीं बहतीं, उनके प्रवाह का स्रोत वहांँ की पहाडि़यों से निकलने वाले छोटे-छोटे झरने ही होते हैं। यह झरने उन पहाडि़यों पर खड़े जंगलों द्वारा सहेजे गये वर्षा जल से ही प्रवाहित होते हैं। जिन पहाडि़यों पर जंगल काट दिये गये उनके झरने भी सूख गये। अतः जंगलों, पेड़-पौधों का अत्यन्त महत्व भूजल के लिए भी है, वहीं जैव विविधता व पर्यावरण संरक्षण-संवर्धन के लिए भी है। इसके लिए आषाढ़ पूर्णिमा (गुरू पूर्णिमा) से हरियाली तीज तक हरियाली पखवारे में व्यापक वृक्षारोपण अभियान संचालित करना होगा।
(7) पर्यावरण अनकूल कालेज संरचना - युवा पीढ़ी के जागरण से ही समस्या का समाधान होगा, अतः ऐसे विद्यालयों का चयन कर कार्ययोजना के साथ जोड़ना, जो अपने परिसर को पर्यावरण के अनुरूप बनाने की पहल करें, जिसमें स्वच्छता, कचरा प्रबन्धन, वर्षा जल संचयन एवं रिचार्जिंग, पौधशाला, वृक्षारोपण, जागरूकता कार्यक्रम, नदी तट पर जाकर श्रम साधना तथा मेले आदि के समय मेला प्रबन्धन में छात्रों को जोड़ना आवश्यक है।
(8) शून्य लागत प्राकृतिक खेती - भूजल का सर्वाधिक दोहन वर्तमान खेती-पद्धति के कारण हो रहा है। वर्तमान रासायनिक खेती व अपनाये गये फसल चक्र में अधिकाधिक पानी की आवश्यकता होती है। अतः इस समस्या के समाधान के लिए शून्य लागत प्राकृतिक खेती प्रारम्भ कराने का प्र
यत्न करना होगा। इस पद्धति से 50 से 90 प्रतिशत तक जल उपयोग में कमी आयेगी, जिससे भूगर्भ जल स्तर बढ़ेगा। रसायनों का प्रयोग न होने और परम्परागत विधियों के उपयोग से खेतों में केंचुवा काम करने लगेगा, जिससे जमीन की पानी सोखने की क्षमता में वृद्धि होगी।
ब. प्रदूषण मुक्त गोमती -
घाट स्वच्छता व संस्कार - नदी पर जाने वाले आस्थावान लोगों के द्वारा अनेक प्रकार का प्रदूषण नदियों में होता है। इसमें परम्परागत विसर्जन, नहाने के बाद पहने हुए कपड़े नदी तट पर ही छोड़ने की परम्परा, पालीथीन का प्रयोग, खाने पीने के पाउच, दोने, पत्तल, गिलास व साबुन आदि का प्रयोग आते हैं। इस निमित्त सामाजिक जागरूकता, प्रशिक्षण, विकल्प व्यवस्था बनाने के साथ ही पुरोहित, तीर्थ पुरोहित, कथा वाचक, पण्डा, नाविक व स्थानीय दुकानदारों को भी जोड़ना व प्रेरित करना होगा।
स्वच्छ व संस्कार युक्त शमशान घाट - नदी तट पर शवदाह परम्परा है। परन्तु शवदाह के बाद उसकी अस्थि भस्म के अतिरिक्त अन्य सामग्री नदी में न जाये, इसका प्रबन्ध विकसित करना होगा।
शव विसर्जन पर रोक - अब नदियों में शव संस्कार व मरे हुए पशुओं को नदी में बहाना भी रोकना आवश्यक है, क्योंकि नदियों के जल प्रवाह में कमी तथा उसमें शव खाने वाले जीव कछुआ, मगरमच्छ, घडि़याल व मछलियों की कमी हो गई है। परिस्थिति परिवर्तन के कारण पहले जो आवश्यक था वह अब अनावश्यक हो गया है।
केवट समाज में जागरण - नदियों में मछलियाँ पकड़ने के लिए अनेक स्थानों पर रसायनों का प्रयोग होत देखा गया है जिससे उस क्षेत्र की समूल मछलियों की मृत्यु हो जाती है। बड़ी मछलियांँ तो मछुआरे व मछली सेवन करने वाले लोग निकाल लेते हैं, लेकिन छोटी मछलियाँ पानी में ही सड़कर पूरी नदी को प्रदूषित करती हैं। वहीं पानी साफ रखने का कार्य जो मछलियों द्वारा होता हैं, वह भी बाधित होता है। इस हेतु सम्बन्धित समूहों को बताना व उसकी पुनरावृत्ति रोकने का कार्य करना होगा।
तटवर्ती सब्जी उत्पादक किसान प्रशिक्षण - नदियों के किनारे सब्जियों की खेती होती है, जिसमें अब रासायनिक खादों के साथ रासायनिक कीट नाशकों का भी प्रयोग होने लगा है, जिससे प्रयोग के बाद वह हानिकारक रसायन नदी के जल में पहुँच कर नदी जीवों को हानि पहुँचाते हैं, जिससे जल शुद्धिकरण प्राकृतिक प्रकिृया बाधित होती है। अतः ऐसे उत्पादकों को शून्य लागत प्राकृतिक खेती की से जोड़ना व प्रशिक्षित कराना होगा।
औद्योगिक प्रदूषण निगरानी - नदियों के निकटवर्ती उद्योगों के कचरे व प्रदूषित जल प्रवाह की जानकारी रखना, लिखित सूचना देना तथा उचित कार्यवाही करनें के लिए स्थानीय समाज को जागृत व संगठित करना भी आवश्यक है।
घरेलू व नगरीय कचरे/सीवर/नालों का प्रबन्धन - हमारे घर का कचरा नाले व तालाब में न जाये, गाँव व नगर के गंदे नाले व सीवर नदी में न जायें। इसकी जानकारी रखना, उपयुक्त व्यवस्था बनवाने का प्रयत्न करना, प्रतिरोध करना, तथा आवश्यक कार्यवाही करना आज की आवश्यकता है।
स. गोमती मित्र मण्डल (कार्यकर्ता समूह) - किसी भी कार्य के लिए प्रथम आवश्यकता कार्यकताओं की टोली होती है। अतः इस अभियान में गोमती व सहायक नदियों के मित्र मण्डलों का गठन किया गया है। उन्हें प्रशिक्षित करना व सक्रिय रखना महत्वपूर्ण है। गोमती मित्र मण्डलों की सक्रियता से विद्यालय, कृषि एवं घाट आदि के मित्र मण्डल भी सक्रिय हो सकेंगे।
द. आस्था एवं संस्कार कार्यक्रम - कार्यकर्ताओं की सक्रिय भूमिका सुनिश्चित करने हेतु मित्र मण्डल द्वारा घाट केन्द्रित नियमित अन्तराल पर कोई न कोई कार्यक्रम सुनिश्चित होना चाहिए, जिसमें आरती, श्रमदान, स्वच्छता, सुन्दर काण्ड या हनुमान चालीसा का पाठ आदि हो सकते हैं। इसके अतिरिक्त समय-समय पर होने वाले कार्यक्रमों जैसे - गंगा दशहरा, अमावस्या, गंगा स्नान, मकर संक्रान्ति आदि पर्वों में व्यवस्था प्रबन्ध का कार्य करके नदी को स्वच्छ रखने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की जा सकती है।
संयुक्त प्रबन्धन:
कुछ कार्य ऐसे होते हैं, जिनमें शासन और समाज दोनों को प्रयत्न करना होता है, उसमें से गोमती संरक्षण के लिए महत्वपूर्ण है ‘उद्यमिता आधारित गोमती वन पट्टी’ का विकास।
उद्यमिता आधारित गोमती वन पट्टी विकास - नदी को जलयुक्त रखने के साथ ही उसे प्रदूषण मुक्त व जैैव विविधता युक्त रखने के लिए उसके किनारे वन क्षेत्र का होना आवश्यक है। पहले गोमती के किनारे सघन वन क्षेत्र था, परन्तु बढ़ती आबादी और विकास प्रक्रिया के कारण वनों का विनाश होता गया, जिसके दुष्परिणाम अब स्पष्ट परिलक्षित होने लगे हैं। वहीं यह भी विचारणीय है, कि अब आबादी की आवश्यकता और नदी के प्राकृतिक प्रवाह के बीच में संतुलन कैसे बनाया जाये। इसी समस्या का समाधान है ‘उद्यमिता आधारित गोमती वन पट्टी’। इसके अन्तर्गत किसानों को प्रोत्साहित किया जाये और सरकार उसमें उनकी मदद करे, जिसमें नदी के दोनों ओर 500 मीटर तक क्षेत्रफल में परम्परागत खेती के स्थान पर गोमती वन पट्टी विकसित की जाये, जिसमें अलग-अलग स्थानों के भूमि एवं जलवायु के अनुसार ऐसे जंगल के वृक्षों का रोपण करके निम्न प्रकार के पर्यावरण, जल एवं जैवविविधता संरक्षक उद्यमिता का श्रीगणेश कर सकते हैं।
मधुमक्खी, रेशम, लाख की खेती - इसके लिए पलास, बेर, बबूल, सहतूत, अर्जुन, शीशम, पीपल, पाकड, बरगद, गूलर, नीम आदि का रोपण करके अलग-अलग स्थानों पर अलग-अलग विधि की खेती करके उनके लधु उद्योग विकसित किए जा सकते है।
परवल जैसी बेल आधारित खेती - बडे़ पैमाने पर परवल जैसी बेल आधारित खेती की जा सकती है, जो किसान का निरन्तर आय का स्रोत बन सकता है।
चटाई, फर्नीचरी उत्पाद खेती - गोमती के किनारे व पटेरा (चटाई), बेंत (फर्नीचार), नरकुल, सरकण्डा (विविध), खस (तेल, चटाई, कूलर) आदि के उद्यम स्थापित हो सकते हैं।
फल एवं टोकरी - फालसा, सहतूत एवं खजूर के वृक्षारोपण से पौष्टिक फलों के साथ ही टोकरी उद्योग फलफूल सकता है।
बान - नदी के किनारे के जंगल में रामाबांस, बैब एवं कांस अपने आप होती है, जिससे बान बनाने का बड़ा रोजगार बन सकता है।
वनौषधि - जंगल होने से अपने आप विविध प्रकार की वन औषधियांें का व्यवसाय प्रारम्भ हो सकता है। जिसमें नीम से कीटरोधी खल व तेल, झरबेर के बेरों से पेट रोगों का चूर्ण, पलास, बबूल, बरगद, पाकड़, पीपल, गूलर से गोंद प्राप्त किया जा सकता है, जो विभिन्न औषधियों में उपयोग किया जाता है।
प्राकृतिक रंग एवं दोने, पत्तल - पलास के पत्तों से दोने व पत्तलें बनते हैं तथा उसके फूल से प्राकृतिक लाल रंग मिलता है।
मेडेड वुड एवं कोयला - झाडि़यों को गलाकर उनसे लकड़ी तथा बबूल से कोयला बन सकता है।
गौ पालन एवं संवर्धन केन्द्र - वन होने से उसमें विविध प्रकार का चारा भी उपलब्ध होगा, अतः उनके मध्य गौ पालन व संवर्धन केन्द्र स्थापित किए जायें, जिनसे दूध के साथ ही कृषि के लिए जीवामृत, घन जीवामृत का उत्पादन कर नदी तटवर्ती खेती को जहरमुक्त बनाया जा सकता है।
सरकार से अपेक्षायें:
लोक भारती द्वारा 10 अप्रैल से 16 अप्रैल, 2015 तक गोमती अलख यात्रा-2015 का आयोजन किया गया। प्रथम गोमती यात्रा 28 मार्च से 3 अप्रैल, 2011 में अध्ययन यात्रा एवं जागरूकता के लिए थी। जबकि यह दूसरी ‘‘गोमती अलख यात्रा-2015’’ गोमती संरक्षण की कार्ययोजना एवं उसको सम्पन्न करने में सहायक हाथ खोजने व जोड़ने के लिए हुई, जिसमें गोमती की सभी 22 सहायक नदियों को भी सम्मिलित किया गया।
प्रथम यात्रा का कार्य - पहली अध्ययन यात्रा और उसके बाद सम्पन्न कार्यों का परिणाम आज दिखाई देने लगा है। उसमें से एक महत्वपूर्ण कार्य यात्रा के तत्काल बाद नैमिष को नैमिषारण्य बनाने के लिए उसके चैरासी कोसी परिक्रमा पथ के 108 ग्रामों में एक माह की ‘देववृक्ष अभियान’ जागरूकता यात्रा हुई थी जिसके परिणाम स्वरूप अट्ठासी हजार ऋषियों की स्मृति में 88 हजार पौधारोपण का लक्ष्य लेकर कार्य प्रारम्भ हुआ और अब तक लगभग 60 हजार पौधे लगने के बाद वृक्ष का रूप ले चुके हैं।
परिणाम - वर्तमान सरकार भी उसी दिशा में आगे बढ़ रही है, जो अच्छी बात है। इस समय शासन की योजना प्रदेश के पाँच परिक्रमा पथों - (1) नैमिषारण्य, (2) मथुरा, (3) चित्रकूट, (4) अयोध्या एवं (5) विन्यवासिनी क्षेत्र।
गोमती अलख यात्रा, 2015 के निश्कर्ष -
1. सम्पूर्ण गोमत ताल को चिन्हित कर, विकास प्रक्रिया में सड़क आदि के कारण ठुकड़ों में बंँटे हुए भाग को एकीकृत किया जाये तथा खुदाई व सफाई कराई जाये।
2. पीलीभीत जिले में 2011 के अधूरे छूटे कार्य- 47 किमी॰ गोमती का चिन्हांकन, खुदाई, सफाई का कार्य तत्काल पूर्ण कराया जाये, जिससे गोमती यथार्थ रूप में सुरक्षित रह सके।
3. पीलीभीत की सीमा पर जंगल में स्थित एकोत्तरनाथ झील की खुदाई व सफाई कराई जाये जिससे अधिकतम वर्षा जल संजोने व भूगर्भ स्रोतों के प्रवाह को बल मिल सके।
4. पीलीभीत जिले में घाटमपुर में स्थित त्रिवेणी घाट पर छोटी झील का रूप देते हुए घाट का पुनरोद्धार कराया जाये।
5. पीलीभीत जिले में गोमती निरन्तर बहती रहे, उसके लिए तात्कालिक व्यवस्था हेतु गोमत ताल को शारदा नहर से जोड़ा जाये।
6. गोमती व उसकी समस्त सहायक 22 नदियाँ भूगर्भ जल स्रोतों से ही बहती हैं, अतः - उनके उद्गम स्थल की झीलों का पुनरोद्धार किया जाये।
7. सभी सहायक नदियों पर वर्षा जल संचयन हेतु उपयोगिता के आधार पर चेकडैम बनाये जायें।
8. शाहजहाँंपुर में तरेउना व भैंसी नदियों का प्रवाह 80 प्रतिशत सूख चुका है, वहीं लखीमपुर जिले के मोहम्मदी व पसगवां विकास खण्ड के (1) छोहा, (2) अंधरा छोहा एवं (3) सई के उद्गम स्थल पनई झाबर पूरी तरह सूख गये हैं। इन सभी उद्गम स्थलों के पुनरोद्धार की आवश्यकता है।
(अ) पीलीभीत, शाहजहाँपुर व लखीमपुर जिले के गोमती क्षेत्र में गर्मी के मौसम में उगाये जा रहे साठा धान एवं उसके भूगर्भ जल स्तर पर प्रभाव के अध्ययन एवं उसके अनुसार निर्णय की आवश्यकता है।
(ब) कम जल-खपत वाली फसलों को प्रोत्साहित किया जाये।
(स) रसायन मुक्त खेती पर बल दिया जाये।
(द) वर्षाजल संचयन एवं रिचार्जिंग की व्यवस्था विकसित की जाये।(य) पर्याप्त वर्षा के लिए सघन वृक्षारोपण कराया जाये।










