Friday, May 29, 2015

समग्र विकास के रोड़े और उनके सम्भावित समाधान - डा॰ वेद प्रकाश त्रिपाठी

डा० वेद प्रकाश त्रिपाठी
भारत को स्वतन्त्रता हुए 68 वर्ष हो गए, किसी देश की दृष्टि से यह बहुत लम्बा समय नहीं होता है, तथापि यह कालावधि किसी राष्ट्र की दृष्टि से बहुत छोटी भी नहीं है। इतने लम्बे कालखण्ड में कम से कम दो सक्रिय आयुवर्ग की पीढि़याँ गुजर जाती हैं या गुजरने के कगार पर होती हैं। अतः यह कालावधि किसी भी देश की प्रगति का मूल्यांकन करने हेतु या उस देश में नागरिकों के जीवन की गुणवत्ता में उन्नयन का आकलन करने हेतु पूर्ण रूप से पर्याप्त अवधि है।
किसी देश में जब कोई बहुत बड़ी सकारात्मक क्रान्ति होती है, जब सत्ता-शासन में कोई बहुत बड़ा उलट-फेर होता है या व्यापक सुधारों का कोई आवेग आता है, जिससे देश में वांक्षित दिशा में समग्र विकास का लाभ मिलता है, सामान्यतः नागरिक उसके प्रति उत्साहित होते हैं तथा नवीन सुधारों हेतु सहयोग प्रदान करने के लिए आतुर रहते हैं, उस हेतु त्याग करते हैं और बदले में  उसके फल प्राप्त करने हेतु प्रतीक्षा भी करते हैं। किन्तु यह प्रतीक्षा अनवरत तो नहीं हो सकती है। एक लम्बे समय में यदि राजसत्ता समग्र विकास के लक्ष्यों को प्राप्त करती हुई नागरिकों के जीवन की गुणवत्ता में आवश्यक उन्नयन करने में असफल रहती है तो बेचैनी, नैराश्य और प्रतिक्रियावश विघटनकारी मनोवृŸिायों के आवेग उन्हीं जनता के बीच क्रमशः जड़ जमाने लगते हैं, जो पजातन्त्र के लिए अभिशाप बन जाते हैं।  परन्तु अपनी तमाम कमी-बेसियों के बावजूद भी भारत में राजनीतिक स्थिरता है तथा लोकतान्त्रिक व्यवस्था कायम है, और विकास की ओर बढ़ रही है। 
गत 68 वर्षो में क्या-क्या और कितना-कितना हो जाना चाहिए था तथा इसके साथ ही यह प्रश्न भी जुड़ा है क्या जितना होना आवश्यक था और हो जाना चाहिए था, वह क्यों नहीं हुआ और क्या उतना सम्भव होने के लिये पर्याप्त साधन और सम्भावनाएँ थीं? विचारणीय है और अग्रिम शीर्षकों में इन्हीं कुछ बिन्दुओं पर विचार किया गया है।
1. जनसहभागिता और जन सहयोग - स्वतन्त्रता के तुरन्त बाद तथा विशेष रूप से सरदार बल्लभ भाई पटेल के अवसान के बाद भारत में समाजवाद का नारा बड़े ही जोर-शोर से बुलन्द होने लगा। वर्ष 1953 में जवाहरलाल नेहरू ने अवाड़ी में कांग्रेस पार्टी के अधिवेशन में देश में ‘समाजवादी ढंग के समाज’ गढने की संकल्पना को घोषित किया। इसके पश्चात् देश में नियोजन की प्रकिृया सोवियत संघ की भाँति बेहद केन्द्रीकृत हो गयीं। ऐसी केन्द्रीकृत व्यवस्थाओं से सामान्य नागरिक और स्थानीय इकाईयाँ तो दूर, देश के विभिन्न राज्यों और मुख्यमंत्रियों तक की भागीदारी लगभग नकार दी गयी। इस स्थिति ने देश में एक ऐसे वातावरण का सृजन कर दिया, जिससे लगे कि जैसे जो कुछ भी विकास होगा वह ऊपर से आयेगा। इस स्थिति ने आम नागरिक को बेपरवाह, गैर जिम्मेदार और बेहद परजीवी बना दिया। आम नागरिक हर छोटे से छोटे विषय में सरकार का मुँह ताकने लगे अन्यथा हाथ पर हाथ धरे बैठे रहने के आदी होने लगे। यह स्थिति वस्तुतः बहुत बुरी थी। 
यह प्रसन्नता का विषय है कि वर्तमान सरकार ने इस बीमारी को और सर्वोच्च स्तर से सुधार की शुरूआत कर दी है। 
2. कर्तव्यों से अधिक अधिकारों पर बल - देश की स्वतन्त्रता के पश्चात् तथा विशेष रूप से विगत दो-तीन दशकों से मानवाधिकारों की बातें बड़े ही जोर-शोर से उठ रहीं हैं। इससे देश का भला कम और बुरा अधिक होता है। वस्तुतः मानवाधिकार का कोई भी मुद्दा अलग-थलग रूप से नहीं देखा जा सकता है। उसे उसके सम्पूर्ण परिप्रेक्ष्य में समग्रता के साथ देखा जाना अति-आवश्यक है और एक अच्छे नागरिक की भाँति हमें राष्ट्र और समाज के प्रति अपने कर्तव्य का बोध  होना चाहिए? 
जब केबल अधिकारों की बात होती है तो प्रत्येक व्यक्ति या समूह की माँग का दायरा बढ़ता जाता है और वह दूसरे व्यक्ति या समूहों से टकराता और उनकी सीमा में अतिक्रमण करता है। इसके विपरीत जहाँ व्यक्ति या समूह में कर्तव्य की भावना बलवती होती है, वहाँ किसी की सीमा में अतिक्रमण या टकराव का प्रश्न ही नहीं होता है। वहाँ तो प्रेम, सद्भाव, सौहार्द और साथ ही अधिकारों का संरक्षण स्वयमेव ही हो जाता है।
3. समाज में समरसता के स्थान पर श्रेणीकरण और विभाजन - स्वतन्त्रता के पश्चात् समाज को व्यवहारिक रूप से, अधिकांश स्थितियों में बांटकर अथवा श्रेणीगत तरीके से देखने की प्रवृत्ति बढ़ी है। इसमे ग्रामीण-नगरीय, महिला-पुरूष,  अल्पसंख्यक-बहुसंख्यक, उत्पादक-मजदूर, व्यापारी ग्राहक आदि को अलग-अलग वर्गों में इस प्रकार प्रदर्शित किया जाता रहा है, जैसे उन सबके हित परस्पर विराधी हों। यह उचित नहीं है।
4. स्थानीय स्वशासन व्यवस्था की दिशाहीनता - स्थानीय स्वशासी संस्थाओं का सृजन तथा 73वें और 74वें संविधान सशोधन के माध्यम से उनका सशक्तीकरण निश्चित ही एक स्वागत योग्य कदम था। किन्तु इन संस्थाओं के माध्यम से जिस प्रकार की जनसहभागिता, धरातलीय स्तर पर स्थानिक आवश्यकताओं के अनुरूप नियोजन, स्थानिक संसाधनों का विकास, स्थानीय स्तर पर समस्याओं का तात्कालिक निराकरण, सामाजिक सौहाद्र, स्थानीय संस्कृति तथा धरोहर संरक्षण आदि प्रकार की जो अपेक्षाएं की गयीं थीं, वे या तो बिल्कुल पूरी न हो सकीं या केवल आंशिक रूप से पूरी हुई। स्थानीय स्वशासी संस्थाएँ, विशेष रूप से ग्रामीण क्षेत्रों में, विकास की वाहक बनने के बजाय या विकास की अनूठी पहल करने वाली संस्थाओं के बजाय, ग्रामीण समाज में एक नयी रणस्थली बनती जा रही हैं।  अतः इस व्यवस्था पर एक नये सिरे से चिन्तन करके इसे परिमार्जित किया जाये तथा इस हेतु इन स्थानीय संस्थाओं के जनप्रतिनिधियों को प्रशिक्षण, प्रोत्साहन, प्रेरणा और पुरस्कार की एक कार्यनीति तैयार करनी होगी और साथ ही उनको निर्वाचित करने वाली जनता को भी उन प्रतिनिधियों पर दबाव बनाये रखने के लिये जागरूक करना होगा। 
5. न्याय प्रक्रिया में गुणात्मक बदलाव की आवश्यकता - स्वतन्त्रता के पश्चात् से यह समस्या निरन्तर बढती ही जा रही है। त्वरित एवं उचित न्याय निरन्तर दूर होता जा रहा है। न्याय प्रक्रिया में इतना विलम्ब होता है कि न्याय मिलना न मिलने के बराबर हो जाता है। यद्यपि कहा तो यह जाता है कि ‘जस्टिस डिलेड इज जस्टिस डिनायड’, लेकिन इस दिशा में कोई प्रभावशाली कदम नहीं उठाये जाते हैं।
देश में लाखों परिवार ऐसे हैं जिनकी एक से अधिक पीढ़ी मुकदमों में ही खप गयी। लाखों की संख्या में ऐसे मुकदमें हैं, जिन्हें चलते-चलते 50 वर्ष यानी आधी शताब्दी बीत गयी है तथा उनमें से बहुत बड़ी संख्या ऐसी है जिन्हें चलते एक शताब्दी बीत चुकी है।
उपरोक्त तथ्यों के आलोक में यह स्वय सिद्ध है कि देश की न्याय व्यवस्था को सुदृढ़, संवेदनशील और त्वरित बनाना बहुत आवश्यक है।
6. प्रशासनिक व्यवस्था को चुस्त, जवाबदेह और संवेदनशील बनाने की आवश्यकता - देश की प्रशासनिक व्यवस्था के माध्यम से ही देश में विभिन्न नीतियों और कार्यक्रमों को लागू किया जाता है तथा सम्बन्धित नीतियों या कार्यक्रमों की सफलता और असफलता अति प्रमुख रूप से इसी प्रशासनिक मशीनरी के सहयोग और व्यवहार पर निर्भर करती है।
अतः इस सम्बन्ध में सुधार हेतु अति सघन और कठोर उपाय शीघ्र लागू किये जाने की आवश्यकता है।  
7. स्वास्थ्य सुविधाओं को विस्तारित करने तथा उनमें गुणात्मक सुधार की आवश्यकता - इस हेतु व्यवस्थाओं में सुधार के साथ सामान्य जनता में स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता पैदा करना आवश्यक है।  यह प्र्रसन्नता की बात है कि पिछले कुछ समय से बाबा रामदेव तथा विभिन्न योग गुरूओं ने लोगों को स्वास्थ्य के प्रति क्रान्तिकारी रूप से जागरूक बनाया है। अब लोगों की समझ में आने लगा है कि उचित दिनचर्या, उचित खानपान, व्यायाम, प्राकृतिक तथा आयुर्वेदिक चिकित्सा आदि से अच्छा स्वास्थ्य और दीर्घायु सुनिश्चित की जा सकती है तथा तमाम चिकित्सकीय खर्चो से बचा जा सकता है। इस सन्दर्भ में यह भी ध्यान रखना होगा कि जनता को निरोग रखना या रोगमुक्त करना केवल उन व्यक्तियों को कष्ट मुक्त करना ही नहीं है जो उनसे ग्रस्त हैं, बल्कि उसका सीधा और घनिष्ठ सम्बन्ध एक परिवार की उत्पादकता और विकास में उसके योगदान से भी प्रत्यक्ष रूप से जुड़ा है। अतः इस मद में जो भी व्यय किया जाता है उसे केवल कल्याणकारी व्यय के रूप में न देखकर विकास प्रक्रिया में निवेश के रूप में देखना चाहिए।
8. शिक्षा व्यवस्था में गुणात्मक सुधार की आवश्यकता - यह कड़वा सच है कि, वर्तमान समय में विश्व के प्रत्येक तीन में से लगभग दो निरक्षर भारतीय हैं। आज डिग्री तो हैं लेकिन उन डिग्र्री धारियों में उत्पादकता, कार्य कुशलता, आवश्यक योग्यता का नितान्त अभाव है। 
शिक्षा का एकमात्र उद्देश्य केवल नौकरी पाना नहीं, बल्कि विद्यार्थियों को उच्च कोटीय संस्कारों, श्रेष्ठ मानवीय गुणों से युक्त नागरिक बना सके। जो उन्हें समाज के प्रति गहन रूप से संवेदनशील बना सके और जिससे वे समाज और राष्ट्र के प्रति समर्पित निष्ठावान और कर्तव्य परायण नागरिक बन सकें।
9. आपदा-प्रबन्धन - ‘आपदा’ एक प्रकार से एक ऐसी घटना होती है जो बड़े ही अचानक भी आ सकती है। अतः आपदा के प्रबन्धन के सम्बन्ध में जो सबसे आवश्यक कदम है, वह है-आपदाओं के प्रति व्यापक जागरूकता अभियान चलाना। आपदा प्रबन्धन का एक उज्जवल पक्ष यह भी है कि मात्र जागरूकता से ही विभिन्न आपदाओं से एक बहुत बड़ी सीमा तक बचा जा सकता है।  
 उपरोक्त नौ बिन्दुओं में अधिकांश का सम्बन्ध सामान्य जनता की क्षमता-वृद्धि या उनके सशक्तीकरण से है, अतः इस दिशा में  उचित ध्यान देना आवश्यक है। ु