Saturday, May 30, 2015
Friday, May 29, 2015
गोमती अलख यात्रा-2015
‘‘यदि किसी विषय को समझना है तो उसके निकट जाओ। यदि किसी समस्या का कारण व निराकरण जानना हो तो उन समस्याओं की जड़ तक जाओ।’’ - उपरोक्त सूत्रों को ध्यान में रख कर लोक भारती द्वारा गोमती पर दो यात्रायें की गईं, जिनका संक्षिप्त विवरण प्रस्तुत है -
आदि गंगा गोमती, 2020 तक ‘‘जल युक्त- प्रदूषण मुक्त’’ हो जाय, यह विचार, प्रथम ‘‘गोमती अध्ययन यात्रा, 2011’’ (28 मार्च से 3 अप्रैल, 2011) में आया था। लोक भारती तब से निरन्तर इस विचार को साकार करने की दिशा में प्रयत्नशील है, जिससे कई क्षेत्रों में अनुकूल व उत्साहवर्धक परिणाम भी आये। इसी विचार को जन-जन तक पहुँचाने तथा गति व शक्ति देते हुए, उसके लिए कार्य करने हेतु समर्पित कार्यकर्ताओं को जोड़ने व आवश्यक कार्य योजना बनाने हेतु ‘‘गोमती अलख यात्रा-2015’’ का आयोजन किया गया।
गोमती अलख यात्रा, 2015 का शुभारम्भ 10 अप्रैल को प्रातः 11 बजे से 12.30 तक कुडि़याघाट, गोमती तट, लखनऊ से महन्त देव्यागिरि (अधिष्ठाता मनकामेश्वर नाथ पीठ, लखनऊ), स्वामी विज्ञानानन्द सरस्वती (गंगा एवं ससुर खदेरी के प्रणेता, फतेहपुर), शिया धर्मगुरू मौलाना कल्बे सादिक, नवाब मीरजाफर, वरिष्ठ पत्रकार योगेश मिश्र, अक्षयपात्र वृन्दावन के सन्त स्वामी अनन्तवीर्य दास एवं गंगा समग्र के मार्गदर्शक मधुभाई कुलकर्णी के उद्बोधन, गोमती पूजन व यात्रा को पताका दिखाकर हुआ।
यात्रा विवरण - 10 अप्रैल से 16 अप्रैल तक गोमती अलख यात्रा गोमती के प्रवाह क्षेत्र के 12 जिलों में 960 किमी॰ हेतु उद्गम स्थल गोमत ताल, माधौटाण्डा पीलीभीत से गोमती-गंगा संगम स्थल कैथी घाट, वाराणसी में सम्पन्न हुई, जिसके अन्तर्गगत 35 स्थानों पर गोमती मित्र मण्डलों का गठन हुआ, जिसमें 500 से अधिक स्थानीय कार्यकर्ता कार्य के लिए आगे आये। इस यात्रा में गोमती केे साथ गोमती की सभी 22 सहायक नदियों को भी जौड़ा गया तथा उनके जल का भी संग्रहण हुआ।
कार्य दिशा एवं कार्ययोजना -
गोमती अलख यात्रा-2015 भविष्य की दृष्टि से ‘गोमती समग्र’ की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है, जो अपनी पूर्ण सार्थकता के साथ 10 अप्रैल से 16 अप्रैल, 2015 तक सम्पन्न हुई। इस यात्रा का सम्बन्ध गोमती के साथ-साथ गोमती की समस्त 22 सहायक नदियों तक था, जिन्हें जलयुक्त एवं प्रदूषण मुक्त करने पर ही, गोमती का संरक्षण सम्भव है। जिसके लिए अनेक प्रकार के कार्य करने होंगे, जिन्हें तीन भागों में (1) सामाजिक, (2) संयुक्त, (3) सरकारी प्रबन्धन के रूप में चिन्हित किया जा सकता है। यहांँ पर सामाजिक सरोकारों सम्बन्धी विवरण प्रस्तुत है - सामाजिक प्रबन्धन:
अ. जलयुक्त गोमती - गोमती व उसकी सभी सहायक नदियाँ वर्षा काल के अतिरिक्त भू-जल स्रोतों पर निर्भर हैं। भू-जल स्रोतों का प्रवाह, भू-जल स्तर पर निर्भर करता है। अर्थात् गोमती को जल युक्त रखने के लिए, भू-जल स्तर ठीक रखने का कार्य करना होगा। वे कार्य होंगे -
(1) पवित्र तालाब - गाँव में जल की आवश्यकता, जल की पवित्रता और जल का प्रबन्धन यह तीनों विषय वहाँ के जनजीवन के कर्तव्य और संस्कार बन जायँ, इसके लिए प्रत्येक गाँव में एक तालाब का चयन कर उसे पवित्र तालाब या गोमती/गंगा तालाब का रूप देना होगा। सर्वप्रथम गाँव के द्वारा उनके पवित्र तालाब का चयन, उसकी आवश्यक खुदाई एव सफाई की व्यवस्था, वर्षा जल आने की व्यवस्था, स्वच्छता बनाये रखने की व्यवस्था, तालाब में सम्भव हो तो कमल, चारो ओर किनारों पर वृक्षारोपण, आस्था केन्द्र का निर्माण। तालाब के किनारे स्वच्छ रहें इस हेतु गाँव में संस्कार विकसित करना होगा कि अब कोई भी व्यक्ति तालाब के निकट शौच क्रिया के लिए नहीं जायेगा। इस तालाब के प्रति पवित्रता का भाव, संस्कार और कर्तव्य जगाने हेतु किसी शुभ अवसर पर गाँव द्वारा गंगा-जल या गोमती का जल लाकर तालाब में अर्पितकर तालाब संस्कार कार्यक्रम करना उपयुक्त होगा। वर्षा काल में आषाढ़ पूर्णिमा (गुरूपूर्णिमा) से हरियाली तीज तक हरियाली पखवारा मनाते हुए वृृक्षारोपण करना व उन्हें सुरक्षित रखने की व्यवस्था करना होगी।
(2) जीवन्त कुआंँ - हमारे विवाह संस्कार के समय कुआँ पूजने की परम्परा है। इसके पीछे नव वर-वधू को जल व कुआँ के महत्व
से अवगत करते हुए, उसे बचाये व बनाये रखना उसका दायित्व है, यह संस्कार भी सम्मिलित था। परन्तु अब भी कुआंँ पूजन की परम्परा का निर्वहन हेता है, पर उसमें जीवन्तता न होकर लकीर के फकीर का भाव ही शेष बचा है। अनेक स्थानों पर कुआँ पुजन में यह भी नहीं देखा जाता कि उस कुएँ में पानी है भी, कि नहीं। कई स्थानों पर कुआँ के अभाव में किसी को ही कुआँ मानकर पूजन करा दिया जाता है। आज इस परम्परा को पुनः जीवन्त करने की आवश्यकता है। अतः प्रत्येक गाँव में कम से कम एक कुआँ का चयन कर उसे जीवन्त बनाये रखा जाये। गाँव में कई लोग होंगे जिनके पूर्वजों ने कुआँ बनवाया होगा, वे उनकी स्मृति का जीवन्त रखने के लिए उस कुएँ को जीवन्त रखने के लिए सहज प्ररित हो सकते हैं। आवश्यकता उन के मन को जगाने की है। इसके अतिरिक्त शेष कुओं को बंद करने की अपेक्षा उनको रिचार्जिंग-बेल के रूप में प्रयोग किया जा सकता है। गुजरात में स्वाध्याय मण्डल द्वारा वर्षा जल भण्डारण एवं संचयन के लिए इस दिशा में सराहनीय कार्य हुआ है।
(3) उद्गम झील/तालाब का पुनरोदय - गोमती व उसकी सभी सहायक नदियाँ किसी न किसी झील या तालाब से निकली हैं। यदि उनकी वर्षा जल
भण्डारण क्षमता बढ़ा दी जाये और उन्हें स्वच्छ रखा जाये तो नदी में भी जल प्रवाह बढ़ाने में सहायक होगा। इसके लिए झील/तालाब मित्र मण्डल बनाकर, उसके द्वारा सामाजिक जागरण व श्रमदान के साथ-साथ ग्राम प्रधान, विकास खण्ड अधिकारी, जिला पंचायत व मनरेगा आदि योजनाओं के द्वारा कार्य सम्पन्न करा कर नदी के पुर्नजीवन की दिशा में एक सार्थक पहल हो सकती है।
(4) चेकडैम निर्माण - वर्षा जल जहांँ-जहाँ रोक कर भण्डार किया जा सकता हो वहाँ-वहाँ चेकडैम बनाने का कार्य उपयोगी होगा। चेकडैम तालाबों के प्रवाह मार्ग व नदियों में स्थान-स्थान पर बनाने से वर्षा जल पहले उस स्तर तक रुक कर दूर तक भण्डार बनायेगा और अतिरिक्त जल बहकर आगे चला जायेगा। इस
से वर्षा काल में रिचार्जिंग होगी वहीं वर्षा के बाद अधिक समय तक जल बना रहने से जहाँ भूजल स्तर बढ़ाने में मदद मिलगी वहीं पम्पिंग सेट द्वारा सिंचाई के साथ ही जंगली जीवों के लिए पानी की उपलब्धता बनी रहेगी।
(5) रिचार्जिग वेल - खेतों में वर्षा जल-प्रवाह मार्गों पर, पुराने कुओं में तथा प्राथमिकता पर स्कूलों में रिचार्जिग वेल बनाने का कार्य सामाजिक जागरूकता से सम्भव है। समाज को यह बताना आवश्यक है कि भूमि से जितना पानी हम लेते हैं, उतना उसे लोटायें भी। ए॰टी॰एम॰ में कार्ड द्वारा जब चाहे, जहाँ चाहे पैसा निकालने की सुविधा उपलब्ध है। यदि बैंक उस ए॰टी॰एम॰ में पैसा डालना बंद कर दें तो क्या कार्ड का
म करेगा। यही स्थिति भूगर्भ की भी है। पिछले पचास साल से जमीन से पानी निकालने व उसके उपभोग की हमने महारत हासिल कर ली हैं, पर उसमें पानी कहाँ से आयेगा, यह कभी नहीं सोचा। अब जमीन की कोख पानी से खाली हो रही है। अतः प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य बनाता है, वह जितना पानी लेता है, उतना पानी जमीन में पहुँचाये भी। पर! यहाँ पर विशेष सावधानी की आवश्यकता होगी कि हमारे कार्य द्वारा प्रदूषित जल भूगर्भ में न जाने पाये।
(6) वृक्षारोपण/नदीवन - व्यक्तिगत व सामूहिक स्तर पर वृक्षारोपण को प्रोत्साहित किया जाये व आयोजित किया जाये। जहांँ खाली जमीन उपलब्ध हो वहाँ पर वन विभाग के सहयोग से नदी/गाँव वन लगाया जाये। वृक्षों का सम्बन्ध जहांँ वर्षा को आकर्षित करने से है, वहीं जल को सहेजने से भी है। मध्य व दक्षिण भारत की नदियाँ हिमालय/ग्लैशियर से नहीं बहतीं, उनके प्रवाह का स्रोत वहांँ की पहाडि़यों से निकलने वाले छोटे-छोटे झरने ही होते हैं। यह झरने उन पहाडि़यों पर खड़े जंगलों द्वारा सहेजे गये वर्षा जल से ही प्रवाहित होते हैं। जिन पहाडि़यों पर जंगल काट दिये गये उनके झरने भी सूख गये। अतः जंगलों, पेड़-पौधों का अत्यन्त महत्व भूजल के लिए भी है, वहीं जैव विविधता व पर्यावरण संरक्षण-संवर्धन के लिए भी है। इसके लिए आषाढ़ पूर्णिमा (गुरू पूर्णिमा) से हरियाली तीज तक हरियाली पखवारे में व्यापक वृक्षारोपण अभियान संचालित करना होगा।
(7) पर्यावरण अनकूल कालेज संरचना - युवा पीढ़ी के जागरण से ही समस्या का समाधान होगा, अतः ऐसे विद्यालयों का चयन कर कार्ययोजना के साथ जोड़ना, जो अपने परिसर को पर्यावरण के अनुरूप बनाने की पहल करें, जिसमें स्वच्छता, कचरा प्रबन्धन, वर्षा जल संचयन एवं रिचार्जिंग, पौधशाला, वृक्षारोपण, जागरूकता कार्यक्रम, नदी तट पर जाकर श्रम साधना तथा मेले आदि के समय मेला प्रबन्धन में छात्रों को जोड़ना आवश्यक है।
(8) शून्य लागत प्राकृतिक खेती - भूजल का सर्वाधिक दोहन वर्तमान खेती-पद्धति के कारण हो रहा है। वर्तमान रासायनिक खेती व अपनाये गये फसल चक्र में अधिकाधिक पानी की आवश्यकता होती है। अतः इस समस्या के समाधान के लिए शून्य लागत प्राकृतिक खेती प्रारम्भ कराने का प्र
यत्न करना होगा। इस पद्धति से 50 से 90 प्रतिशत तक जल उपयोग में कमी आयेगी, जिससे भूगर्भ जल स्तर बढ़ेगा। रसायनों का प्रयोग न होने और परम्परागत विधियों के उपयोग से खेतों में केंचुवा काम करने लगेगा, जिससे जमीन की पानी सोखने की क्षमता में वृद्धि होगी।
ब. प्रदूषण मुक्त गोमती -
घाट स्वच्छता व संस्कार - नदी पर जाने वाले आस्थावान लोगों के द्वारा अनेक प्रकार का प्रदूषण नदियों में होता है। इसमें परम्परागत विसर्जन, नहाने के बाद पहने हुए कपड़े नदी तट पर ही छोड़ने की परम्परा, पालीथीन का प्रयोग, खाने पीने के पाउच, दोने, पत्तल, गिलास व साबुन आदि का प्रयोग आते हैं। इस निमित्त सामाजिक जागरूकता, प्रशिक्षण, विकल्प व्यवस्था बनाने के साथ ही पुरोहित, तीर्थ पुरोहित, कथा वाचक, पण्डा, नाविक व स्थानीय दुकानदारों को भी जोड़ना व प्रेरित करना होगा।
स्वच्छ व संस्कार युक्त शमशान घाट - नदी तट पर शवदाह परम्परा है। परन्तु शवदाह के बाद उसकी अस्थि भस्म के अतिरिक्त अन्य सामग्री नदी में न जाये, इसका प्रबन्ध विकसित करना होगा।
शव विसर्जन पर रोक - अब नदियों में शव संस्कार व मरे हुए पशुओं को नदी में बहाना भी रोकना आवश्यक है, क्योंकि नदियों के जल प्रवाह में कमी तथा उसमें शव खाने वाले जीव कछुआ, मगरमच्छ, घडि़याल व मछलियों की कमी हो गई है। परिस्थिति परिवर्तन के कारण पहले जो आवश्यक था वह अब अनावश्यक हो गया है।
केवट समाज में जागरण - नदियों में मछलियाँ पकड़ने के लिए अनेक स्थानों पर रसायनों का प्रयोग होत देखा गया है जिससे उस क्षेत्र की समूल मछलियों की मृत्यु हो जाती है। बड़ी मछलियांँ तो मछुआरे व मछली सेवन करने वाले लोग निकाल लेते हैं, लेकिन छोटी मछलियाँ पानी में ही सड़कर पूरी नदी को प्रदूषित करती हैं। वहीं पानी साफ रखने का कार्य जो मछलियों द्वारा होता हैं, वह भी बाधित होता है। इस हेतु सम्बन्धित समूहों को बताना व उसकी पुनरावृत्ति रोकने का कार्य करना होगा।
तटवर्ती सब्जी उत्पादक किसान प्रशिक्षण - नदियों के किनारे सब्जियों की खेती होती है, जिसमें अब रासायनिक खादों के साथ रासायनिक कीट नाशकों का भी प्रयोग होने लगा है, जिससे प्रयोग के बाद वह हानिकारक रसायन नदी के जल में पहुँच कर नदी जीवों को हानि पहुँचाते हैं, जिससे जल शुद्धिकरण प्राकृतिक प्रकिृया बाधित होती है। अतः ऐसे उत्पादकों को शून्य लागत प्राकृतिक खेती की से जोड़ना व प्रशिक्षित कराना होगा।
औद्योगिक प्रदूषण निगरानी - नदियों के निकटवर्ती उद्योगों के कचरे व प्रदूषित जल प्रवाह की जानकारी रखना, लिखित सूचना देना तथा उचित कार्यवाही करनें के लिए स्थानीय समाज को जागृत व संगठित करना भी आवश्यक है।
घरेलू व नगरीय कचरे/सीवर/नालों का प्रबन्धन - हमारे घर का कचरा नाले व तालाब में न जाये, गाँव व नगर के गंदे नाले व सीवर नदी में न जायें। इसकी जानकारी रखना, उपयुक्त व्यवस्था बनवाने का प्रयत्न करना, प्रतिरोध करना, तथा आवश्यक कार्यवाही करना आज की आवश्यकता है।
स. गोमती मित्र मण्डल (कार्यकर्ता समूह) - किसी भी कार्य के लिए प्रथम आवश्यकता कार्यकताओं की टोली होती है। अतः इस अभियान में गोमती व सहायक नदियों के मित्र मण्डलों का गठन किया गया है। उन्हें प्रशिक्षित करना व सक्रिय रखना महत्वपूर्ण है। गोमती मित्र मण्डलों की सक्रियता से विद्यालय, कृषि एवं घाट आदि के मित्र मण्डल भी सक्रिय हो सकेंगे।
द. आस्था एवं संस्कार कार्यक्रम - कार्यकर्ताओं की सक्रिय भूमिका सुनिश्चित करने हेतु मित्र मण्डल द्वारा घाट केन्द्रित नियमित अन्तराल पर कोई न कोई कार्यक्रम सुनिश्चित होना चाहिए, जिसमें आरती, श्रमदान, स्वच्छता, सुन्दर काण्ड या हनुमान चालीसा का पाठ आदि हो सकते हैं। इसके अतिरिक्त समय-समय पर होने वाले कार्यक्रमों जैसे - गंगा दशहरा, अमावस्या, गंगा स्नान, मकर संक्रान्ति आदि पर्वों में व्यवस्था प्रबन्ध का कार्य करके नदी को स्वच्छ रखने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की जा सकती है।
संयुक्त प्रबन्धन:
कुछ कार्य ऐसे होते हैं, जिनमें शासन और समाज दोनों को प्रयत्न करना होता है, उसमें से गोमती संरक्षण के लिए महत्वपूर्ण है ‘उद्यमिता आधारित गोमती वन पट्टी’ का विकास।
उद्यमिता आधारित गोमती वन पट्टी विकास - नदी को जलयुक्त रखने के साथ ही उसे प्रदूषण मुक्त व जैैव विविधता युक्त रखने के लिए उसके किनारे वन क्षेत्र का होना आवश्यक है। पहले गोमती के किनारे सघन वन क्षेत्र था, परन्तु बढ़ती आबादी और विकास प्रक्रिया के कारण वनों का विनाश होता गया, जिसके दुष्परिणाम अब स्पष्ट परिलक्षित होने लगे हैं। वहीं यह भी विचारणीय है, कि अब आबादी की आवश्यकता और नदी के प्राकृतिक प्रवाह के बीच में संतुलन कैसे बनाया जाये। इसी समस्या का समाधान है ‘उद्यमिता आधारित गोमती वन पट्टी’। इसके अन्तर्गत किसानों को प्रोत्साहित किया जाये और सरकार उसमें उनकी मदद करे, जिसमें नदी के दोनों ओर 500 मीटर तक क्षेत्रफल में परम्परागत खेती के स्थान पर गोमती वन पट्टी विकसित की जाये, जिसमें अलग-अलग स्थानों के भूमि एवं जलवायु के अनुसार ऐसे जंगल के वृक्षों का रोपण करके निम्न प्रकार के पर्यावरण, जल एवं जैवविविधता संरक्षक उद्यमिता का श्रीगणेश कर सकते हैं।
मधुमक्खी, रेशम, लाख की खेती - इसके लिए पलास, बेर, बबूल, सहतूत, अर्जुन, शीशम, पीपल, पाकड, बरगद, गूलर, नीम आदि का रोपण करके अलग-अलग स्थानों पर अलग-अलग विधि की खेती करके उनके लधु उद्योग विकसित किए जा सकते है।
परवल जैसी बेल आधारित खेती - बडे़ पैमाने पर परवल जैसी बेल आधारित खेती की जा सकती है, जो किसान का निरन्तर आय का स्रोत बन सकता है।
चटाई, फर्नीचरी उत्पाद खेती - गोमती के किनारे व पटेरा (चटाई), बेंत (फर्नीचार), नरकुल, सरकण्डा (विविध), खस (तेल, चटाई, कूलर) आदि के उद्यम स्थापित हो सकते हैं।
फल एवं टोकरी - फालसा, सहतूत एवं खजूर के वृक्षारोपण से पौष्टिक फलों के साथ ही टोकरी उद्योग फलफूल सकता है।
बान - नदी के किनारे के जंगल में रामाबांस, बैब एवं कांस अपने आप होती है, जिससे बान बनाने का बड़ा रोजगार बन सकता है।
वनौषधि - जंगल होने से अपने आप विविध प्रकार की वन औषधियांें का व्यवसाय प्रारम्भ हो सकता है। जिसमें नीम से कीटरोधी खल व तेल, झरबेर के बेरों से पेट रोगों का चूर्ण, पलास, बबूल, बरगद, पाकड़, पीपल, गूलर से गोंद प्राप्त किया जा सकता है, जो विभिन्न औषधियों में उपयोग किया जाता है।
प्राकृतिक रंग एवं दोने, पत्तल - पलास के पत्तों से दोने व पत्तलें बनते हैं तथा उसके फूल से प्राकृतिक लाल रंग मिलता है।
मेडेड वुड एवं कोयला - झाडि़यों को गलाकर उनसे लकड़ी तथा बबूल से कोयला बन सकता है।
गौ पालन एवं संवर्धन केन्द्र - वन होने से उसमें विविध प्रकार का चारा भी उपलब्ध होगा, अतः उनके मध्य गौ पालन व संवर्धन केन्द्र स्थापित किए जायें, जिनसे दूध के साथ ही कृषि के लिए जीवामृत, घन जीवामृत का उत्पादन कर नदी तटवर्ती खेती को जहरमुक्त बनाया जा सकता है।
सरकार से अपेक्षायें:
लोक भारती द्वारा 10 अप्रैल से 16 अप्रैल, 2015 तक गोमती अलख यात्रा-2015 का आयोजन किया गया। प्रथम गोमती यात्रा 28 मार्च से 3 अप्रैल, 2011 में अध्ययन यात्रा एवं जागरूकता के लिए थी। जबकि यह दूसरी ‘‘गोमती अलख यात्रा-2015’’ गोमती संरक्षण की कार्ययोजना एवं उसको सम्पन्न करने में सहायक हाथ खोजने व जोड़ने के लिए हुई, जिसमें गोमती की सभी 22 सहायक नदियों को भी सम्मिलित किया गया।
प्रथम यात्रा का कार्य - पहली अध्ययन यात्रा और उसके बाद सम्पन्न कार्यों का परिणाम आज दिखाई देने लगा है। उसमें से एक महत्वपूर्ण कार्य यात्रा के तत्काल बाद नैमिष को नैमिषारण्य बनाने के लिए उसके चैरासी कोसी परिक्रमा पथ के 108 ग्रामों में एक माह की ‘देववृक्ष अभियान’ जागरूकता यात्रा हुई थी जिसके परिणाम स्वरूप अट्ठासी हजार ऋषियों की स्मृति में 88 हजार पौधारोपण का लक्ष्य लेकर कार्य प्रारम्भ हुआ और अब तक लगभग 60 हजार पौधे लगने के बाद वृक्ष का रूप ले चुके हैं।
परिणाम - वर्तमान सरकार भी उसी दिशा में आगे बढ़ रही है, जो अच्छी बात है। इस समय शासन की योजना प्रदेश के पाँच परिक्रमा पथों - (1) नैमिषारण्य, (2) मथुरा, (3) चित्रकूट, (4) अयोध्या एवं (5) विन्यवासिनी क्षेत्र।
गोमती अलख यात्रा, 2015 के निश्कर्ष -
1. सम्पूर्ण गोमत ताल को चिन्हित कर, विकास प्रक्रिया में सड़क आदि के कारण ठुकड़ों में बंँटे हुए भाग को एकीकृत किया जाये तथा खुदाई व सफाई कराई जाये।
2. पीलीभीत जिले में 2011 के अधूरे छूटे कार्य- 47 किमी॰ गोमती का चिन्हांकन, खुदाई, सफाई का कार्य तत्काल पूर्ण कराया जाये, जिससे गोमती यथार्थ रूप में सुरक्षित रह सके।
3. पीलीभीत की सीमा पर जंगल में स्थित एकोत्तरनाथ झील की खुदाई व सफाई कराई जाये जिससे अधिकतम वर्षा जल संजोने व भूगर्भ स्रोतों के प्रवाह को बल मिल सके।
4. पीलीभीत जिले में घाटमपुर में स्थित त्रिवेणी घाट पर छोटी झील का रूप देते हुए घाट का पुनरोद्धार कराया जाये।
5. पीलीभीत जिले में गोमती निरन्तर बहती रहे, उसके लिए तात्कालिक व्यवस्था हेतु गोमत ताल को शारदा नहर से जोड़ा जाये।
6. गोमती व उसकी समस्त सहायक 22 नदियाँ भूगर्भ जल स्रोतों से ही बहती हैं, अतः - उनके उद्गम स्थल की झीलों का पुनरोद्धार किया जाये।
7. सभी सहायक नदियों पर वर्षा जल संचयन हेतु उपयोगिता के आधार पर चेकडैम बनाये जायें।
8. शाहजहाँंपुर में तरेउना व भैंसी नदियों का प्रवाह 80 प्रतिशत सूख चुका है, वहीं लखीमपुर जिले के मोहम्मदी व पसगवां विकास खण्ड के (1) छोहा, (2) अंधरा छोहा एवं (3) सई के उद्गम स्थल पनई झाबर पूरी तरह सूख गये हैं। इन सभी उद्गम स्थलों के पुनरोद्धार की आवश्यकता है।
(अ) पीलीभीत, शाहजहाँपुर व लखीमपुर जिले के गोमती क्षेत्र में गर्मी के मौसम में उगाये जा रहे साठा धान एवं उसके भूगर्भ जल स्तर पर प्रभाव के अध्ययन एवं उसके अनुसार निर्णय की आवश्यकता है।
(ब) कम जल-खपत वाली फसलों को प्रोत्साहित किया जाये।
(स) रसायन मुक्त खेती पर बल दिया जाये।
(द) वर्षाजल संचयन एवं रिचार्जिंग की व्यवस्था विकसित की जाये।(य) पर्याप्त वर्षा के लिए सघन वृक्षारोपण कराया जाये।
पारदर्शिता के उच्च शिखर पर भारत - डाॅ॰ विशेष गुप्ता
रिपोर्ट यह भी खुलासा करती है कि इसमें ब्रिक्स के सहयोगी देश ब्राजील को 38वाँ, रुस को 67वाँ तथा चीन को 87वाँ स्थान मिला है। सूचकांक में शीर्ष तीन स्थान पाने वाले देशों में क्रमशः स्वीडन, न्यूजीलैंड व नार्वे रहे हैं। दूसरी ओर जिम्बाब्वे, उज्बेकिस्तान व म्यांमार सूचकांक के निचले तीन पायदान पर रहे हैं। सूचकांक के इसी क्रम में ब्रिटेन को 8वाँ तथा अमेरिका को 11वाँ स्थान मिला है। जहाँ तक सूचकांक के मानकों पर खरा उतरने का सवाल है तो इसके तहत कानूनों और सरकारी आॅकड़ों के प्रचार-प्रसार की कसौटी पर भारत 0.54 अंक के साथ में सभी देशों की सूची में 27वें स्थान पर रहा।
सरकार के काम-काज की पारदर्शिता से जुड़ी इस रिपोर्ट में खास बात यह उभरकर सामने आयी कि जिन देशों के पास जितने बढि़या भौतिक संसाधन और सूचना तकनीक का ढ़ाॅचा रहा वे देश सरकार के खुलेपन और अन्य जानकारियों के मामले में बेहतर रहे। दूसरी ओर उच्च आय से जुड़े देशों को इस सूची से निकाल देने के बाद बाकी देशों में प्रति व्यक्ति सकल घरेलू आय और सरकार के काम-काज में खुलेपन का सहसम्बन्ध टूटता नजर आया। इससे जुड़ा विश्लेषण यह भी बताता है कि चीन दुनिया के देशों के बीच उच्च मध्यम आय समूह में आता है, जबकि भारत की गिनती निम्न मध्यम आय समूह से जुड़ें देशों में होती है। इसके बावजूद भी भारत काम-काज की बेहतरी के मामले में चीन से आगे निकल गया। इस रिपोर्ट से जुड़े आॅकड़े यह भी बताते हैं कि जर्मनी व अमेरिका जैसे विकसित देशों में सूचना के अधिकार की स्थिति भारत के मुकाबले खराब है। साथ ही सुशासन के मामले में भारत दुनिया के कई विकसित देशों के मुकाबले बहुत अच्छी स्थिति में है।
सन्दर्भवश पिछले दिनों चर्चा में आयी ‘ग्लोबल गवर्नेस-2025’ नामक रिपोर्ट भी गौरतलब है। इस रिपोर्ट में भी अमेरिका और चीन के बाद भारत को सबसे शक्तिशाली देश के रूप में स्वीकार किया गया था। इस रिपोर्ट में यहाँ तक कहा गया था कि भारत और चीन के साथ ब्राजील जैसे देशों की ताकत 2025 तक बहुत अधिक बढ़ जायेगी । इस रिपोर्ट में आगे बिल्कुल साफ किया गया था कि भारत के पास 8 फीसदी की वैश्विक शक्ति के साथ यह दुनिया का तीसरा सबसे शक्तिशाली राष्ट्र होगा। जापान, रूस और ब्राजील के पास 5 फीसदी से भी कम की वैश्विक शक्ति होगी। रिपोर्ट के ही अनुसार 2025 में भी अमेरिका दुनिया का सबसे शक्तिशाली देश तो होगा, परन्तु वैश्विक शक्ति में उसकी हिस्सेदारी घटकर 18 फीसदी के आस-पास रह जायेगीं। रिपोर्ट में अनुमान लगाया गया है कि डेढ़ दशक पश्चात अमेरिका के बाद चीन की भागीदारी 16 फीसदी, यूरोपीय संघ की 14 फीसदी तथा भारत की हिस्सेदारी 10 फीसदी होते हुये भी यह विश्व शक्ति में तीसरे स्थान पर होगा।
आज विश्व की प्रमुख शक्ति के रूप में भारत के विषय में यह आंकलन अनायास ही नहीं है। देश की आजादी के बाद जनसंख्या की रफ्तार तेज होते हुये भी भारत ने चहुँमुखी विकास किया है। ऐसा नहीं है कि भारत के समक्ष चुनौतियाँ नही हैं। लेकिन इन सबके बावजूद भी भारत निरन्तर प्रगति के पथ पर है। अगर हम इसकी प्रगतिवादी अर्थव्यवस्था के बारे में बात करें तो ज्ञात होता है कि 1991 के बाद विगत ढ़ाई दशकों में विकासशील राष्ट्रों के बीच भारत सबसे धनी अर्थव्यवस्था बनकर उभरा है। आज भारत यदि अपनी सकल घरेलू उत्पाद को 8-9 फीसदी रखने का प्रयास कर रहा है तो यह भारत की बढ़ती हुई अर्थव्यवस्था के विषय में शुभ संकेत ही हैं। भारत के तीस हजारी सैंसेक्स से पूरी दुनिया में यहाँ की उभरती अर्थव्यवस्था का श्रेष्ठ संदेश गया है। अभी कुछ दिनों पूर्व अमेरिका की ब्लूमवर्ग संस्था के सर्वेंक्षण से ज्ञात हुआ था कि पूंजी निवेश के क्षेत्र में अमेरिका व चीन के बाद भारत पूंजी निवेशकों का सबसे अधिक प्रिय देश बन कर उभर रहा है। केवल इतना ही नहीं भारत की सवा अरब जनसंख्या होने के बावजूद भी यह दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है तथा सकल घरेलू उत्पाद के मामले में अमेरिका, यूरोपियन यूनियन तथा चीन के बाद भारत चैथे पायदान पर स्थिर है। साथ ही पूरे विश्व की अर्थव्यवस्था में इसकी लगभग 2 फीसदी से भी अधिक हिस्सेदारी है तथा विदेशी मुद्रा के संचय के मामले में चीन, जापान, रूस और ताईवान के बाद भारत पाँचवी पायदान पर है।
वैश्विक स्तर पर सुशासन और पारदर्शिता को लेकर भारत का जो वस्तुनिष्ठ मूल्यांकन किया गया है हमारे लिए यह सम्मान की बात है। परन्तु ऐसा भी नहीं है कि भारत ने अपनी यह स्थिति किसी से उधार में ली है। अतीत में भी भारत विश्व गुरू की उपाधि से विभूषित रहा है परन्तु भारत की प्रगति को गुलामी के ग्रहण ने डस लिया। यही वजह रही कि भारत को अपनी स्वायत्ता वापस लाने के लिए सैंकड़ो वर्ष प्रतीक्षा करनी पड़ी। सच यह है कि उस समय भी भारत की सामाजिक, आर्थिक और शैक्षिक ढ़ाॅचा बेहतर स्थिति में था। इस सच्चाई को यहाँ प्रस्तुत करने में कोई हिचक नहीं है कि देश की आजादी के बाद भारत के एक शक्तिशाली राष्ट्र के रूप में उभरने के जो स्वप्न स्वतन्त्रता संग्राम सेनानियों एवं राष्ट्र के निर्माताओं ने देखे थे, उनके पूर्ण होने में काफी कुछ सफलता भी मिली। परन्तु यह तकलीफदेय है कि इण्डिया और भारत के बीच एक स्पष्ट विभाजन रेखा भी खिंचती चली गयी। एक ओर यदि राष्ट्र की अर्थव्यवस्था ने लोगों की क्रय क्षमता बढ़ायी, तो दूसरी ओर इसी व्यवस्था से एक ऐसा वर्ग भी पनपा जो अभी भी अपनी बुनियादी जरूरतों से जूझ रहा है। गरीबी पर लगातार जारी बहस किसी से छिपी नहीं है। इसके साथ-साथ धार्मिक कट्टरता, उभरता जातिवाद, नक्सलवाद, सवर्ण, पिछड़ों और दलितों के बीच उभरते मतभेद, मनभेद व आरक्षण से जुड़े मुद्दे भी सामाजिक चुनौतियों के रूप में सामने आ रहे हैं। यही ज्वलंत देश की कानून व्यवस्था के लिए ही नहीं बल्कि कभी-कभी देश की संसद के लिये भी बड़ी चुनौती बन जाते हैं। हम सहिष्णुता का पाठ पढ़ाते हुये नहीं थकते। परन्तु इस समय कौन से सामाजिक विष हमारे राष्ट्रीय हित को अपनी चपेट में ले लेगा, इसके शाश्वत उपाय होने अभी बाकी हैं। बढ़ती हुयी भौतिक आवश्यकतायें लोगों को शार्टकट उपाय अपनाने को मजबूर कर रही हैं। इसी का परिणाम है कि देश में भ्रष्टाचार फलित हो रहा है और अच्छे लोग इसकी बली चढ़ रहे हैं। इसके बावजूद भी इसे काबू करने में अपेक्षित सफलता नहीं मिल पा रही है। आज जो विकसित देश भारत के सुशासन और यहाँ की सरकार के काम-काज और कानूनों की पारदर्शिता की तारीफ कर रहे है, वे देश ही हमसे सीधी प्रतिस्पर्धा भी रखते हैं। आज चीन का उदाहरण हम सबके सामने है। यदि भारत को विश्व में अपनी कार्य संस्कृति, कानूनों और सरकारी आॅकड़ों में पारदर्शिता के साथ में देश में नागरिक सहभागिता को बढ़ाना है तो उसे घरेलू स्तर पर गरीबी, धार्मिक कट्टरता, महिला हिंसा, जातिवाद, आतंकवाद और नक्सलवाद जैसी सामाजिक-धार्मिक, चुनौतियों का सामना करने के लिए अपनी बिखरी हुयी राष्ट्रीय शक्ति को एकीकृत करना होगा। तभी हम आने वाले दशकों में अपने सत्त विकास लक्ष्य को हासिल करने के साथ-साथ विश्व मेें अपना परचम लहराने में कामयाब होंगे।
एम॰एच॰पी॰जी॰ काॅलेज, मुरादाबाद।
समग्र विकास में कश्मीरियत का तकाजा - कैप्टन आर विक्रम सिंह
इसे मुफ्ती मुहम्मद सईद को स्टेट्समैनशिप कहा जाएगा जिसकी बदौलत आज यह असम्भव सी सरकार खड़ी हुई। यह सच्चे अर्थों में ‘जम्मू और कश्मीर’ की सरकार है। समस्या सरकार चलाने की ही नहीं, बल्कि यह संयुक्त वैचारिक आधार तलाशने की भी है जिस पर खड़ा हुआ जा सके। यह प्रयोग हुर्रियत को हाशिए पर धकेल देगा। कश्मीर प्रवास के दौरान सवाल कौंधता रहा कि आखिर इस अन्तर्विरोधी कश्मीरी सांस्कृतिक-सामाजिक परिदृश्य का निष्कर्ष क्या है? कश्मीरी बुद्धिजीवीयों की क्या राय बनती है? डल झील के किनारे श्रीनगर विश्वविद्यालय का खूबसूरत परिसर है। वहाँ ‘सेन्टर फाॅर सेन्ट्रल एशियन स्टडीज’ द्वारा लाल देद और नन्द ऋषी उर्फ शेख नूरुद्दीन वली की फिलासफी पर एक सेमीनार आयोेजित किया गया था। श्रीनगर से प्रस्थान के अन्तिम दिन उस विभाग में जाने का अवसर मिला। कई सवाल बनते थे। कश्मीर के उस इतिहास का क्या होगा जो कल्हण की राजतरंगिणी की धारा के साथ प्रवाहमान है? एक सूफी इस्लाम है जो कश्मीरी संस्कृति के रचबस गया है। दूसरा वहाबी, कट्टर इस्लाम है जो आतंक का सहारा लेकर घाटी में हावी होना चाहता है।
हिन्दु-बौद्ध काल के कश्मीर की कोई हैसियत आज नहीं रह गई है, लेकिन बुलबुलशाह, शाह हमदान जो कश्मीर का इस्लाम से परिचय कराने वाले सूफी थे, उनकी परम्पराओं का क्या होगा? कश्मीरी भाषा का भविष्य क्या है? 80 के दशक के पूर्व घाटी में हिन्दु भी थे और धर्मनिरपेक्षता की बातें थीं। साझा संस्कृति की बात भली लगती थी। तब संस्कृति की दरिया के दो किनारें थे। एक था शैव मतावलम्बियों का हिन्दु कश्मीर दूसरा सिकन्दर बुतशिकन का कश्मीर। सिकन्दर वह सुल्तान है जिसने बलपूर्वक कश्मीरी पंडितों को बलपूर्वक मुसलमान बनाया और न मानने वाले लाखों का कत्ल किया। इन दोनों सीमाओं के बीच साझा संस्कृतियों की राह को कश्मीरियत के नाम से नवाजा गया। यह कश्मीर की उस सांस्कृतिक पहचान का प्रतीक है जिसके बगैर कश्मीर, कश्मीर नहीं है। शैव और सूफी परम्पराएं कश्मीरियत की इसी झील में आकर समाहित होती है। लाल देद और शेख नूरुद्दीन इसी कश्मीरियत की साझा संस्कृति के पथ प्रदर्शक हैं।
विपरीत ध्रुवों से बनी इस सरकार को वैसेे ही बचाना पड़ेगा जैसे कोई तूफान में चरागों की लौ को बचाता है। आज वे सूत्र कमजोर हैं जो कश्मीर को भारत से जोड़ते हैं। चैदहवीं सदी से पहले कश्मीर हिन्दु धर्म का प्रमुख केन्द्र था। वह सांस्कृतिक इतिहास जैसे आज महत्वहीन हो चुका है। दिल्ली में अब तक जो नेतृत्व रहा है उसका हिन्दुस्तानपरस्ती से कोई खास सरोकार नहीं रहा। एकता के बिन्दुओं की निशानदेही नहीं की गई। आम कश्मीरी न तो दहशतगर्द है, न ही हिन्दु विरोधी। वह तो एक सीधी-सरल सोच का आदमी है, जिसे हालात ने मजबूर बना दिया। बातचीत में कई लोगों ने कहा कि हम लोग अपने नाम के साथ इस्लाम से पहले के दिनों की अपनी जातीय पहचान जैसे भट्ट, वानी, रैना, पंडित, टाक, लोन, गुरू क्यों लिखते हैं? जाहिर है, हम अपनी विरासत भूलना नहीं चाहते। हमारे कल्चर में बहुत कुछ न भूलने लायक है। कश्मीर घाटी में लाल देद या माँ लालेश्वरी एवं उनके मानस पुत्र शेख नुरुद्दीन वली या नन्द ऋषि की परम्परा मजहब और संस्कृति के आपसी संवाद का प्रतीक है। उनकी मजार चरारेशरीफ का आतंकियों द्वारा जलाया जाना दरअसल कश्मीरियत पर हमला था। अपनी प्रार्थनाओं में शिव से वरदान मांगते दिखते हैं। भेड़ चराता वह चरवाहा/क्षणमात्र में बुला लिया गया/अचानक/और हरमुख से सीधे उड़ गया स्वर्ग को/हे शिव! मुझे भी वरदान दो। लाल देद ने कहा-शिव हैं व्याप्त सर्वत्र/ध्यान की गहनता में/स्वयं में पहचानो अपने स्वत्व को।
अब कश्मीर की हिन्दुविहीन घाटी में लाल देद और शेख नूरुद्दीन रचित शिव की स्तुतियों का भला अर्थ क्या रह जाता है? ऐसी स्थिति में लाल देद और शेख नूरुद्दीन की साझा संस्कृति हाशिये पर न चली जाएगी? आज जिहादी सोच कश्मीर को उसकी रिवायत, संस्कृति, भाषा से पूरी तरह से काट कर एक उन्मादी मजहबी राज्य बनाने पर अमादा है। कश्मीर शेष भारत से अलगाव महसूस करता है। हमारे नेताओं ने कश्मीर को लेन-देन का सामान बना दिया है। कश्मीर कोई जीता हुआ इलाका नहीं, बल्कि हमारे वजूद का हिस्सा है। जाहिर, है, हमारे नेताओं से गलतियाँ हुई हैं। कश्मीरियत की इसी साझी विरासत के लिए ही सही, घाटी में पंडितों की वापसी बेहद जरूरी है। अब जब वहाबियों के द्वारा यह सूफी परम्परा ही गैर इस्लामी करार दी जा रही है तो उस मुस्लिम समाज की क्या हैसियत बनेगी जिसे सूफियों ने इस्लाम में दीक्षित किया है? कल इन्हें भी अहमदियों की श्रेणी में खड़ा कर दिया जाएगा। कश्मीरियत के बहुत से रंग कश्मीरी भाषा के सबसे लोकप्रिय कवि गुलाम अहमद महाजूर की शायरी में भी पेज दर पेज बिखरे हुए हैं।
पहाड़ों से आते झरनों की तरह झरती माहजूर की शायरी कश्मीर की झीलों, विचारों, चिनारोें, विरासतों और मुहब्बतों की बातें करती है। कश्मीरी भाषा ही कश्मीरियत, कश्मीरी संस्कृति की सच्ची वाहक है। अब इसे पीरपंजाल के पर्वतों से नीचे उतरते हुए डोगरी को भी स्पर्श करने की जरूरत है। कश्मीरियत तो कश्मीर को शेष भारत से जुड़ने का सबसे मजबूत पुल है। सम्पूर्ण कश्मीर घाटी कश्यप ऋ़षी के वंशज कश्मीरी पंडितों की थी। किसे पता था कि ऐसा वक्त भी आएगा जब कश्यप ऋषि के वंशजों को अपना धर्म बदलने को मजबूर होना पड़ेगा। इन वंशजों को अपना इतिहास भूल जाने को बाध्य कर दिया गया। जो कश्मीरी पंडित सदियों के नरसंहार और बलपूर्वक धर्म परिवर्तन से किसी तरह जीवित बचे हैं वे आज अपने घरों से बेदखल हैं। उनकी वापसी हो। वीरान, खण्डहर हो चुके मन्दिरों को उनकी पूर्व स्थितियों में लाया जाए। आज जो मस्जिदें हैं वे भी कश्यप ऋषि के वंशजों की ही हैं। कश्मीर की सुबहों में मस्जिद से उठती अजान के साथ पहले की तरह भक्तों के जयकारें और घंटों का निनाद शामिल हो, यही कामना है। इंशाअल्लाह! यही कश्मीरियत का तकाजा भी है। ु
- (लेखक भारतीय प्रशासनिक सेवा में हैं।)
भारत के समग्र विकास में मालवीय जी की महत्वपूर्ण भूमिका - प्रो॰ राममोहन पाठक
ऋषि.मुनियों ने प्रार्थना की.जीवेम शरदः शतम्। आशय था. हम सौ सालों तक जिएं। स्वस्थ रहें। हमारा समाज दीर्घजीवी हो और समाज के निर्माण तथा विकास में संलग्न रहंेए योगदान करते रहें। व्यक्तिए समुदाय और संस्थाओं के जीवन में 25 वर्ष ;रजत जयंतीद्धए 50 वर्ष ;स्वर्ण जयंतीद्धए 60 वर्ष से 75 वर्ष ;हीरक और कौस्तुभ जयंतीद्ध के साथ.साथ शताब्दी यानी 100 वर्षों कीे जीवन यात्रा और वह भी सार्थक जीवन यात्रा काफी कुछ मायने रखती है। काशी हिन्दु विश्वविद्यालय के शताब्दी वर्ष में प्रवेश के अनेक सार्थक संदेश हैं। देश की शीर्ष शिक्षा संस्थाओं में भी अग्रणी काशी हिन्दु विश्वविद्यालय के शताब्दी वर्ष में प्रवेश करने पर हर्षातिरेक स्वाभाविक है। कोई सौ साल पहले एक सामान्य गरीब परिवार के 23 साल उम्र के भविष्यदृष्टा ने एक सपना देखा. विश्वविद्यालय बनाने का सपना। उस समय तक देश में सरकार द्वारा स्थापित पाँच विश्वविद्यालय देश के पाँच क्षेत्रों. मद्रासए कलकत्ताए इलाहाबादए मुम्बई और लाहौर में मूर्त रूप ले रहे थे। पश्चिम की उच्च शिक्षा प्रणाली और पद्धति को स्थापित करने की अंग्रजों की कोशिश के सामने मदन मोहन मानवीय ने भारतीय मनीषा और नालंदा.तक्षशिला विरासत को नए सिरे से सहेजने.संवारने और आगे बढ़ाने का बीड़ा उठाया। लोग इस युवक को सिरफिरा से मानने लगेए लेकिन दो दशकों की लम्बी साधना के बाद 1904 में मदन मोहन मालवीय अपने प्रयासों की सफलता में पहली सीढ़ी तक पहुँचने में कामयाब हो गए।
मालवीय जी थे तो इलाहाबाद केए पर शायद लुप्त सरस्वती की खोज में उन्हें काशी आना पड़ा। मालवीय जी काशी आए और काशी हिन्दु विश्वविद्यालय के रूप में यहाँ ज्ञान की एक गंगोत्री. गोमुख की स्थापना की। लगभग दो दशकों की अनवरत तपस्याए साधनाए यात्रा और भिक्षाटन का परिणाम विश्वविद्यालय के तौर पर रूप लेने लगा। मालवीय जी की कल्पना.लोक साकार हो उठा। 4 फरवरीए 1916 को महात्मा गाँधी की प्रेरक उपस्थिति में गंगातट पर आयोजित भव्य समारोह में वेदों के मंत्रोच्चार के बीच भारत के तत्कालीन गवर्नर जनरल लार्ड हार्डिंग ने विश्वविद्यालय की आधारशिला रखी। देश की पचास से अधिक रियायतों के राजा.महाराजाए रईसए समाजसेवी और शिक्षा क्षेत्र के विद्वान साधकों की उपस्थिति ने इस समारोह को ऐतिहासिक बना दिया। बाद में 8 फरवरीए 1916 को बसंत पंचमी पर्व पर शिलान्यास के धार्मिक आयोेजन सम्पन्न हुए। पीपीपी माॅडल की इस समय बहुत चर्चा और माँग है। महामना मालवीय ने भारत में संभवतः सबसे पहले उच्च शिक्षा के क्षेत्र में इस माॅडल का पहला तथा अत्यन्त सफल प्रयोग किया। काशी हिन्दु विश्वविद्यालय की स्थापना से पहले भारत में स्थित सभी पाँचों विश्वविद्यालय की स्थापना सरकार ने की थीए काशी हिन्दु विश्वविद्यालय केवल जन सहयोग से स्थापित उच्च शिक्षा संस्थान बना। धनवान ही नहीं निर्धनए कामगारए बेरोजगार सभी ने विश्वविद्यालय की स्थापना में योगदान किया। 1300 एकड़ के विस्तृत परिसर में स्थापित इस विश्वविद्यालय के लिए भूमि काशी राज्य के तत्कालीन महाराजा प्रभु नारायण सिंह ने सहर्ष दान में दे दी। फिर क्या थाए इसके बाद सहायता की झड़ी लग गई।
मालवीय जी की संकल्पना इस विश्वविद्यालय को प्राचीन भारतीय ज्ञान.विज्ञान के संरक्षण और शोध के साथ ही आधुुनिक विज्ञान के पठन.पाठन के एक वैश्विक केन्द्र के रूप में विकसित करने की थी। यहाँ आपको विज्ञान की आधुनिकतम विधाओं के साथ.साथ प्राचीन भारतीय ज्ञान.विज्ञान की धारा का अद्भुत संगम देखने को मिलेगा। महामना के संकल्प की पवित्रता और सुचिता का आभास विश्वविद्यालय के गंगातट पर बसे अर्धचन्द्राकार परिसर में प्रवेश करते ही हो जाता है। भारतीय स्थापत्य कला के विशिष्ट भवनों और हरे.भरे मैदानों के साथ ही पूरा परिसर आकर्षित करता है। समूची दुनिया से छात्र.शोधार्थी और विद्वान ज्ञानार्जन और शोध के लिए यहाँ आते रहते हैं। विद्वानों के लिए यह वैश्विक ज्ञानार्जन का केन्द्र बन चुका है। काशी हिन्दु विश्वविद्यालय के 30 हजार छात्र.छात्राएं और दो हजार शिक्षकए हजारों कर्मचारी सभी उसी परम्परा के अंग हैए जिस परम्परा में शिक्षा धनार्जन का माध्यम नहींए बल्कि त्याग और समर्पण का क्षेत्र है। प्रश्न यह है.देश के वर्तमान साढ़े तीन सौ से अधिक विश्वविद्यालयों की भीड़ में काशी हिन्दु विश्वविद्यालय क्यों और कैसे अनूठा हैघ् उत्तर ढ़ूंढ़ने में देर नहीं लगेगी। सीधा सा उत्तर हैए शिक्षा यहाँ बाजार से प्रभावित नहीं है। पूरे विश्वविद्यालय के हर क्षेत्र मेंए़़ हर गतिविधि में हम महामना मालवीय की मिशनरी भावना को महसूस कर सकते है। यह मिशनरी भावना थी. चरित्रवानए अच्छेए कुशल नागरिक का निर्माण शायद इसीलिए इस विश्वविद्यालय को एशिया के सबसे बड़े विश्वविद्यालय की मान्यता मिली और इसे ष्हार्वर्ड आॅफ ईस्टष् कहा गया।
बनारस पूरे विश्व का आकर्षण का केन्द्र है। विदेशी विद्वानों ने भी निर्विवाद रूप से इसे ष्ज्ञान की नगरी यानी सिटी आॅफ नालेजष् माना। प्रसिद्ध अमेरिकी लेखिका डायना एलेक अपनी पुस्तक ष्बनारस.द सिटी आॅफ लाइटष् में काशी हिन्दु विश्वविद्यालय जैसी संस्थाओं से प्रवाहित ज्ञान के प्रकाश के कारण ही वाराणसी को ज्योतिपुंज मानती है। मालवीय जी को विश्वविद्यालय के धन संग्रह के दौर में कटु आलोचनाओं और उपहास का सामना करना पड़ाए लेकिन वे अडिग रहे। आज की नई पीढ़ी के लिए काशी हिन्दु विश्वविद्यालय और इसके संस्थापक मालवीय जी के जीवन का यही सबसे बड़ा संदेश है कि स्वप्न ऊँचा रखोए आलोचनाओं और विपत्तियों से घबराओं नहींए आगे बढ़तेे रहो। सफलता तुम्हारे कदम चूमेगी। मालवीजी का पूरा जीवन और उनकी अनूठी कृति जैसा पूरी दुनिया में दूसरा कोई उदाहरण नहीं। भारत के समग्र विकास में मालवीय जी की महत्वपूर्ण भूमिका अविस्मरणीय है।
. ;लेखक काशी हिन्दु विश्वविद्यालय से जुड़े रहे है।
मालवीय जी थे तो इलाहाबाद केए पर शायद लुप्त सरस्वती की खोज में उन्हें काशी आना पड़ा। मालवीय जी काशी आए और काशी हिन्दु विश्वविद्यालय के रूप में यहाँ ज्ञान की एक गंगोत्री. गोमुख की स्थापना की। लगभग दो दशकों की अनवरत तपस्याए साधनाए यात्रा और भिक्षाटन का परिणाम विश्वविद्यालय के तौर पर रूप लेने लगा। मालवीय जी की कल्पना.लोक साकार हो उठा। 4 फरवरीए 1916 को महात्मा गाँधी की प्रेरक उपस्थिति में गंगातट पर आयोजित भव्य समारोह में वेदों के मंत्रोच्चार के बीच भारत के तत्कालीन गवर्नर जनरल लार्ड हार्डिंग ने विश्वविद्यालय की आधारशिला रखी। देश की पचास से अधिक रियायतों के राजा.महाराजाए रईसए समाजसेवी और शिक्षा क्षेत्र के विद्वान साधकों की उपस्थिति ने इस समारोह को ऐतिहासिक बना दिया। बाद में 8 फरवरीए 1916 को बसंत पंचमी पर्व पर शिलान्यास के धार्मिक आयोेजन सम्पन्न हुए। पीपीपी माॅडल की इस समय बहुत चर्चा और माँग है। महामना मालवीय ने भारत में संभवतः सबसे पहले उच्च शिक्षा के क्षेत्र में इस माॅडल का पहला तथा अत्यन्त सफल प्रयोग किया। काशी हिन्दु विश्वविद्यालय की स्थापना से पहले भारत में स्थित सभी पाँचों विश्वविद्यालय की स्थापना सरकार ने की थीए काशी हिन्दु विश्वविद्यालय केवल जन सहयोग से स्थापित उच्च शिक्षा संस्थान बना। धनवान ही नहीं निर्धनए कामगारए बेरोजगार सभी ने विश्वविद्यालय की स्थापना में योगदान किया। 1300 एकड़ के विस्तृत परिसर में स्थापित इस विश्वविद्यालय के लिए भूमि काशी राज्य के तत्कालीन महाराजा प्रभु नारायण सिंह ने सहर्ष दान में दे दी। फिर क्या थाए इसके बाद सहायता की झड़ी लग गई।
मालवीय जी की संकल्पना इस विश्वविद्यालय को प्राचीन भारतीय ज्ञान.विज्ञान के संरक्षण और शोध के साथ ही आधुुनिक विज्ञान के पठन.पाठन के एक वैश्विक केन्द्र के रूप में विकसित करने की थी। यहाँ आपको विज्ञान की आधुनिकतम विधाओं के साथ.साथ प्राचीन भारतीय ज्ञान.विज्ञान की धारा का अद्भुत संगम देखने को मिलेगा। महामना के संकल्प की पवित्रता और सुचिता का आभास विश्वविद्यालय के गंगातट पर बसे अर्धचन्द्राकार परिसर में प्रवेश करते ही हो जाता है। भारतीय स्थापत्य कला के विशिष्ट भवनों और हरे.भरे मैदानों के साथ ही पूरा परिसर आकर्षित करता है। समूची दुनिया से छात्र.शोधार्थी और विद्वान ज्ञानार्जन और शोध के लिए यहाँ आते रहते हैं। विद्वानों के लिए यह वैश्विक ज्ञानार्जन का केन्द्र बन चुका है। काशी हिन्दु विश्वविद्यालय के 30 हजार छात्र.छात्राएं और दो हजार शिक्षकए हजारों कर्मचारी सभी उसी परम्परा के अंग हैए जिस परम्परा में शिक्षा धनार्जन का माध्यम नहींए बल्कि त्याग और समर्पण का क्षेत्र है। प्रश्न यह है.देश के वर्तमान साढ़े तीन सौ से अधिक विश्वविद्यालयों की भीड़ में काशी हिन्दु विश्वविद्यालय क्यों और कैसे अनूठा हैघ् उत्तर ढ़ूंढ़ने में देर नहीं लगेगी। सीधा सा उत्तर हैए शिक्षा यहाँ बाजार से प्रभावित नहीं है। पूरे विश्वविद्यालय के हर क्षेत्र मेंए़़ हर गतिविधि में हम महामना मालवीय की मिशनरी भावना को महसूस कर सकते है। यह मिशनरी भावना थी. चरित्रवानए अच्छेए कुशल नागरिक का निर्माण शायद इसीलिए इस विश्वविद्यालय को एशिया के सबसे बड़े विश्वविद्यालय की मान्यता मिली और इसे ष्हार्वर्ड आॅफ ईस्टष् कहा गया।
बनारस पूरे विश्व का आकर्षण का केन्द्र है। विदेशी विद्वानों ने भी निर्विवाद रूप से इसे ष्ज्ञान की नगरी यानी सिटी आॅफ नालेजष् माना। प्रसिद्ध अमेरिकी लेखिका डायना एलेक अपनी पुस्तक ष्बनारस.द सिटी आॅफ लाइटष् में काशी हिन्दु विश्वविद्यालय जैसी संस्थाओं से प्रवाहित ज्ञान के प्रकाश के कारण ही वाराणसी को ज्योतिपुंज मानती है। मालवीय जी को विश्वविद्यालय के धन संग्रह के दौर में कटु आलोचनाओं और उपहास का सामना करना पड़ाए लेकिन वे अडिग रहे। आज की नई पीढ़ी के लिए काशी हिन्दु विश्वविद्यालय और इसके संस्थापक मालवीय जी के जीवन का यही सबसे बड़ा संदेश है कि स्वप्न ऊँचा रखोए आलोचनाओं और विपत्तियों से घबराओं नहींए आगे बढ़तेे रहो। सफलता तुम्हारे कदम चूमेगी। मालवीजी का पूरा जीवन और उनकी अनूठी कृति जैसा पूरी दुनिया में दूसरा कोई उदाहरण नहीं। भारत के समग्र विकास में मालवीय जी की महत्वपूर्ण भूमिका अविस्मरणीय है।
. ;लेखक काशी हिन्दु विश्वविद्यालय से जुड़े रहे है।
तपती धरती के दौर में खेती-किसानी. - अनंता वशिष्ठ
समग्र विकास के मार्ग की तलाश
इस बार मार्च और अप्रैल में बारिश कुछ ज्यादा ही हुई, जिसकी वजह से खेतों में खड़ी रबी की फसल को कई जगहोेें पर काफी नुकसान पहुँचा। इससे मौसम चक्र में बदलाव को लेकर अटकलों का दौर भी शुरू हो गया। बेशक, मौसम में बदलाव साफ तौर पर दिख रहे हैं। जैसे इस साल देश के कई हिस्सों में बेमौसम बारिश हुई, कई इलाकों में बसंत आया ही नहीं। इसी तरह, पिछले कुछ वर्षों में बरसात के मौसम में बदलाव दिखा। जैसे, बरसात के मौसम को छोटा हो जाना और कम समय-अवधि में ही ज्यादा बारिश का होना। लेकिन क्या ये बदलाव स्थायी है? क्या हमारा मौसम चक्र वास्तव में बदल गया है? इस पर अभी कोई टिप्पणी जल्दबाजी होगी, क्योंकि इसके लिए कई वर्षों के मौसम चक्र का विस्तृत अध्ययन और तमाम रिर्पोंट चाहिए, जो हमारे पास नहीं हैं। इसीलिए अभी जो बदलाव दिख रहे हैं, उनको फिलहाल मौसम विविधता माना जा रहा है। अगर यह रुझान अगले कई वर्षों तक बरकरार रहा, तभी यह माना जा सकेगा कि मौसम चक्र बदल गया है। लेकिन यह सच है कि जलयावु परिवर्तन के कारण मौसम की विविधता में लगातार बढ़ोत्तरी हो रही है। प्रदूषण, ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन, वनों की कटाई, जनसंख्या वृद्धि और लगातार बढ़ता औद्योगीकरण, ये सभी जलवायु परिवर्तन के कारण माने जाते हैं। कुछ और चीजें हैं, जो बताती हैं कि पर्यावरण में बदलाव हो रहा है। जैसे, वातावरण के तापमान और कार्बन डाइआॅक्साइड के स्तर में वृ द्धि।
मौसम की विविधता का कृषि कार्यों से काफी गहरा रिश्ता होता है। फसलों की पैदावार और गुणवत्ता पर जलवायु परिवर्तन का सीधा असर पड़ता है। भारत में उगाई जाने वाली फसलों के उत्पादन पर यह असर कुछ ज्यादा ही दिखता है। फसल को अंकुरित होने से लेकर पकने तक एक उपयुक्त मौसम की जरूरत पड़ती है। अंकुरण के समय उपयुक्त तापमान नहीं मिला, तो अंकुरण ठीक से नहीं होगा। फसल में दाना बनने के दौरान तापमान में अचानक वृद्धि होने से अनाज जल्दी पकने लगता है। अतः दाना बनने की अवधि में कमी आ जाती है, जिससे उत्पादन में कमी आती है। साथ ही उपज की गुणवत्ता भी खराब हो जाती है।
हालांकि, कृषि वैज्ञानिकों ने उपज बढ़ाने के लिए कई तरह की तकनीक का विकास किया है। लेकिन इनकी सफलता असमान्य मौसम बढ़ोत्तरी की वजह से कम हो रही है। ऐसी स्थिति में मौसम पूर्वानुमान तथा मौसम आधारित कृषि सलाह की जानकारी किसानों के लिए बहुत लाभकारी होती है। इससे कृषि में मौसम द्वारा होने वाले नुकसान को कुछ हद तक कम भी किया जा सकता हैं।
अभी हम बारिश की वजह से फसलों को होने वाले नुकसान को लेकर परेशान हैं, लेकिन सच है कि फसलांे को सबसे ज्यादा नुकसान सूखे से होता है। भारतीय कृषि मानसून पर निर्भर है तथा मानसून में देरी या विफलता के कारण खरीफ के मौसम में सूखा हो जाता है। यदि हमें मानसून के आने तथा इसके सामान्य रहने की जानकारी का पूर्वानुमान हो, तो हम खरीफ फसलों की बुवाई सही समय पर आरम्भ कर सकते हैं। यदि मानसून की शुरु में देरी या विफलता आती है, तो इस स्थिति में बुवाई तथा रोपाई में देरी की जा सकती है। मानसून में ज्यादा देरी होने से कम अवधि में तैयार होने वाली धान की प्रजातियाँ लगाई जा सकती हैं। जल्दी तथा मध्य सूखे के लिए मौजूदा फसलों को छोड़ दिया जाता है तथा कम समय और कम पानी की आवश्यकता वाली फसलों, जैसे बाजरा या दलहनी फसलों को लगाया जा सकता है। इसके अलावा, सूखे के लिए भंडारित किए गए पानी से भी सिंचाई की जा सकती है। खरीफ की विभिन्न फसलों का चुनाव और अन्य तैयारियाँ इस बात पर निर्भर करती हैं कि कम से कम पानी के निजी या सरकारी साधन उपलब्ध होने के बावजूद दक्षिण-पश्चिम मानसून द्वारा कब तथा कितनी वर्षा किसी क्षेत्र में होने की सम्भावना है। यदि सामान्य से अधिक वर्षा होने की सम्भावना है, तब धान के लिए अधिक क्षेत्रफल किया जा सकता है। ये तरीके काफी हद तक नुकसान को रोक सकते हैं।
वर्षा होने की सम्भावना से फसलों की सिंचाई की संख्या में कमी लाई जा सकती है, जिससे बिजली तथा डीज़ल पर होने वाले व्यय को भी कम किया जा सकता है। अधिक वर्षा होने पर धान के खेतों में मेड़ों को मजबूत बना सकते हैं, जिससे ज्यादा पानी खेतों में रुक सके, जबकि अन्य फसलों (दलहनी, मक्का और सब्जियों) में जल निकास का प्रबन्धन कर सकते हैं। अधिक वर्षा होने पर खेत के किसी भाग में वर्षा के पानी को संरक्षित करने की व्यवस्था कर सकते हैं, जिसका उपयोग वर्षा न होने के दौरान फसलों की उचित समय पर सिंचाई के लिए किया जा सकता है।
ध्यान देने की बात यह भी है कि हर व्यवसाय की तरह कृषि पर भी मंहगाई का असर काफी पड़ा है। रासायनिक खाद, खर-पतवार नाशक, कीटनाशक, फंफूदनाशक वगैरह के दाम पिछले कुछ वर्षों में काफी बढ़े हैं। कृषि मजदूरों पर होने वाला खर्च भी इस दौरान काफी बढ़ गया है। जब हम किसानांे का नुकसान कम करने की बात करते हैं, तब हमें इन सभी बातों का ध्यान रखना होगा। यदि किसानों को समय रहते ही बता दिया जाए कि बुवाई के लिए अनुकूल मौसम नहीं है, तो बीज, खाद, बिजली, डीज़ल, समय और मजदूरी पर होने वाले खर्च को बरबाद होने से रोका जा सकता है। अगर मौसम अनुकूल है, तब इन सभी का फसलों पर अच्छा प्रभाव पड़ सकता है तथा खर्च में कमी आ सकती है।
मौसम के पूर्वानुमान से फसलों को कैसे बचाया जा सकता है या नुकसान को कैसेे कम किया जा सकता है, इसके ढेर सारे उदाहरण दिए जा सकते हैं। यह ऐसा काम है, जो हर स्थिति में किया जाना चाहिए, लेकिन जलवायु परिवर्तन के दौर में ऐसे पूर्वानुमान तैयार करने और जानकारी को किसानों तक पहुँचाए जाने की जरूरत और बढ़ गई है। तपती धरती के बदलते मौसम को शायद हम ज्यादा नहीं रोक सकते, लेकिन हम इस दौर में कृषि के जरूरी और समय रहते प्रबन्धन का सिलसिला जरूर शुरू कर सकते है। ु
- सीनियर साइंटिस्ट, आईएआरआई
हम क्या थे, क्या हो गये? - डा॰ सुरचना त्रिवेदी
हमे हजारों बलिदानों के बाद मिली स्वतन्त्रता के 67 वर्ष व्यतीत हो चुके हैं। जो स्वतन्त्रता भारतीय सांस्कृतिक परम्पराओं के ताने-बाने में गुंथी हुई अपनी एक अलग पहचान से युक्त थी, इसका हमें बोध था। आरम्भ में राष्ट्रीय भावना से ओत-प्रोत जय घोषों व देश भक्ति के गीतों से वातावरण गूँजित तथा ‘‘राष्ट्रवाद’’ मन-मष्तिस्क में हिलोरें भरता रहता था। परन्तु विकास की अंधी दौड़ ने प्रत्यक्ष या परोक्ष भविष्य की अनेकों चुनौतियों की तपन में हम भारतीयों को एक निर्णायक मोड़ पर ला कर खड़ा कर दिया है।
स्वतन्त्रता के साथ रामराज्य की कल्पना की गई थी, पर आज उस पर प्रश्न उठाये जा रहे हैं। राजनीति में ‘राज’ का वर्चस्व है और नीति मानो गौढ़ हो गई है। चन्द लोग संकल्प बद्ध हैं, अन्य लोग उनकी आलोचना-प्रत्यालोचना की होड़ में शामिल हैं।
हमारा देश ऐसी सांस्कृतिक विरासत को आज धारण किए हुए है, जिसमें भाषा-साहित्य-वेषभूषा, धार्मिक विश्वास-आस्थाएँ अपनी मजबूत जड़ों के साथ हिली हुई हैं। देश की संस्कृति पर विदेशी प्रभाव इस कदर हावी होता जा रहा है कि सर्वत्र मात्र कृत्रिमता का वातावरण ही लक्षित होता है।
कहा जाता है कि परिवर्तन समय की माँग है, और कुछ लोग जो हो रहा है वह समय की माँग का ही परिणाम है, यह तर्क दे सकते हैं। पर मेरा मानना है कि कोई भी विकास परम्पराओं को त्याग कर सफल नहीं हो सकता। भविष्य का स्वप्न बुनने के लिए जो नया है वह तो आकर्षित करता है परन्तु परम्परा की आधारशिला उसे सुदृढ़ बनाने का महŸार कार्य करती है। इसलिए स्वतन्त्रता के इतने वर्षों बाद हम संकल्प लें कि विकास के परम बिन्दु पर पहुँचने पर भी अपनी विरासत व परम्पराओं की रक्षा करेंगे।
समग्र विकास की हमारी दृष्टि - डाॅ॰ अनिल प्रकाश जोशी
समग्र विकास में गाँवों का महत्व - प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने पिछले दिनों गाँवों की बदलती तस्वीर में वैज्ञानिकों की भूमिका पर टिप्पणी कर देश में संस्थानों के दायित्वों की तरफ अहम इशारा किया है। यह बात पूरी तरह सच है कि ये संस्थान इस देश को इण्डिया बनाने में चिंतित रहे, न कि भारत। आज भी हमारे छह लाख गावों में देश की 70 प्रतिशत आबादी रहती है। इस बड़ी आबादी के वे सभी अधिकार उतने ही महत्वपूर्ण और जरुरी है जितने कि शहरी आबादी के। बड़ी बात तो यह है कि देश में जो भी आर्थिक गतिविधियाँ हैं उनका मूल स्रोत गाँव ही है। वर्तमान आर्थिक तंत्र का 90 प्रतिशत हिस्सा गाँवों के संसाधनों से सबल होता है। देश में शायद ही ऐसे गाँव हो जो आज आर्थिक स्वतंत्रता का दम भर सकते हों। एक समय गाँवों में सतत् विकास दिखता था। सब कुछ गाँवों में ही होता था। श्रम व संसाधानों का बड़ा गहरा गठजोड़ था, लेकिन नई तकनीकें गाँवों में पैठ नहीं बना सकी जबकि आज गाँवों में शहरी उत्पादों ने पूरी जगह बना ली है।
असल में नए विज्ञान ने गाँवों के ज्ञान को विस्थापित किया है। इसका उद्देश्य होना चाहिए था कि गाँवों की दक्षता को नए विज्ञान के साथ जोड़कर मजबूत करे, लेकिन हुआ इसके विपरीत। देश में आज गाँव मात्र उत्पादक के रूप में जाने जाते हैं। दूसरी ओर शहर गाँवों में उत्पादित वस्तुओं का शोधन कर लाभ कमा रहे हैं। शहरी उद्योग इन्हीं कृषि उत्पादों का शोधन कर और अधिक लाभ उठाते हैं। इससे उत्पादक और उपभोक्ता दोनों ही दुखी है। एक को कम दाम मिलते हैं और दूसरे को ज्यादा दाम देने पड़ते है और सब इसलिए ही सम्भव हुआ, क्योंकि हमने विज्ञान को ग्रामोन्मुखी नहीं बनाया। देश के बड़े संस्थान चाहे वे कृषि से जुडे हों या फिर अन्य संसाधनों से, गाँवों से अभी भी बहुत दूर ही हैं। देश का सबसे बड़ा हिस्सा खेती में जुटा है और इसके लिए भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद व इसके 105 संस्थान व 55 कृषि विश्वविद्यालय गाँवों के लिए ही समर्पित होने चाहिए थे। पर क्या देश में खेती व किसान के हालात बेहतर कहे जा सकते हैं? प्रौद्योगिकी व उद्योग शोध परिषद यानी सीएसआइआर और इससे जुड़े 20 से अधिक संस्थान ग्राम्य तकनीक पर काम करनेे का दावा करते हैं। ऐसे ही देश में आइआइटी व एनआइटी व सैकड़ों विज्ञान संस्थान कार्यरत है, लेकिन गाँवों के हालात बद-से-बदतर ही हुए हैं। विज्ञान संस्थानोें और लाखों वैज्ञानिकों से भरा ये देश मंगल पर तो चला गया, पर गाँवों में मंगल कार्य आज तक अछूूते ही रहे।
ऐसे में प्रधानमंत्री का विज्ञान कांग्रेस में वैज्ञानिकों का आवाहन बहुत महत्व रखता है। दुर्भाग्य से हमारे देश में कागजी शोध का बड़ा महत्व है। हमारे वैज्ञानिक अपने विज्ञान काल में कितने शोध-पत्र छापते हैं। उनके शोधपत्र का प्रकाशन ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाता है, न कि यह कि वह शोध कितना जमीन पर उतरा। यही हमारे देश के विज्ञान संस्थानों व वैज्ञानिकों की ज्यादा बड़ी कमी रही है। देश के सभी संस्थानों में होने वाले शोध अधिकतर अव्यवहारिक होते हैं। बाकी जो शोध ठीक-ठाक होतंे भी हैं तो उनमें से कई कभी बाहर ही नहीं निकले और जो कुछ निकल कर आए भी तो उनमें से कई तोे जमीन पर उतरे ही नहीं। इसका कारण हमारी शोध करने की संकुचित पहल है। किसी भी तरह के शोध को दिशाहीन व अव्यवहारिक नहीं होना चाहिए। हमारे वैज्ञानिक संस्थानों व वैज्ञानिकों के पास स्पष्ट संदेश होना चाहिए कि शोध व्यावहारिकता के आधार पर तय हो, न कि शोध पत्रों पर।
विज्ञान व वैज्ञानिकों का एक बड़ा दायित्व है कि वे विज्ञान में असमानता से बचें और ग्रामोन्मुखी विज्ञान को प्राथमिकता दें। हमें नहीं भूलना चाहिए कि विज्ञान के पहले हकदार गाँव है, जहाँ से मूल उत्पादन की नींव पड़ी है। अगर उनका दायित्व मात्र उत्पादन के रूप में ही देखा जाएगा तो वे बड़े लाभ के हिस्सेदार नहीं बन पाएंगे और लाभ ही तय करेगा कि उनका झुकाव कृषि या अन्य उत्पादों की तरफ विश्वास के योग्य है भी या नहीं। गत दो-तीन दशकों में गाँवों व किसानों की अपनी खेती और उत्पादों के विश्वास में कमी आई है। कारण साफ है कि स्थानीय उत्पादों से लाभ लागत के भी नीचे पहुँच गया है। मजबूरी व विकल्प का अभाव उन्हें इस श्रम से जोड़े हुए है। वरना जिन्हें अवसर मिला उन्होंने अक्सर इसे त्यागना ही बेहतर समझा। लेकिन अगर जल्दी सब कुछ नहीं संभला तो हम बड़े संकट में घिर जाएंगे। गाँवों का शहरों की तरफ ़रुख हमारे प्राथमिक उत्पादन पर बड़ा असर डालेगा।
अब यह जरूरी हो गया है कि हमारी विज्ञान नीति ऐसी हो जो गाँवों से जुड़ी हो। मंगलयान पर पहुँचने वाले वैज्ञानिक अगर प्रधानमंत्री के वाह-वाही के पात्र हों तो लोक विज्ञानी को भी उसी श्रेणी में रखा जाए और उसे भी राष्ट्रीय सम्मान की दृष्टि से देखा जाए। गाँवों में कार्य करने वाले वैज्ञानिकों को उत्साहित करना होगा। बड़े-बड़े संस्थानों में कार्य करने वाले वैज्ञानिकों को ही प्रथामिकता न मिले, बल्कि ग्रामीण विज्ञान के कार्य को भी बड़े स्तर का योगदान माना जाए। अंतरिक्ष, न्युक्लियर जैसे बड़े शोध, जिनका घर-गाँव से सीधा सम्बन्ध नहीं है, आज प्रमुखता से जाने जाते हंै। इनके विज्ञानी ही प्रधानमंत्री कार्यालय की शोभा ब़ढ़ाते हैं। दूसरी तरफ लोक विज्ञानी को ऐसा सम्मान नहीं मिलता। हम जब तक ग्राम विज्ञान की आवश्यकता को देश के अन्य विज्ञान की आवश्यकताओं के समानान्तर नहीं देखेंगे तब तक विज्ञान को ग्रामोन्मुखी नहीं बना पाएंगे। अब देखना यह है कि देश के विज्ञान संस्थान व वैज्ञानिक प्रधानमंत्री की इस सलाह को कितनी गम्भीरता से लेते है।
पर्यावरण के साथ ही समग्र विकास सम्भव - पर्यावरण और विकास एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। जहाँ एक तरफ मूल संसाधन हवा, पानी व मिट्टी के बिना जीवन सम्भव नहीं। वहीं दूसरी तरफ जीवन के लिए न्यूनतम सुविधाओं को जुटाना सभ्यता का भी प्रतीक है।
दरअसल यह जानना जरूरी है कि स्थायी आर्थिक स्रोत भी स्थायी पारिस्थितिकी है। पारिस्थितिकी के उत्पाद, प्राकृतिक संसाधनों के बिना आर्थिक ढांचे को कतई भी संभाला नहीं जा सकता और ना ही बेहतर किया जा सकता है। क्योंकि आर्थिक के आधार प्राकृतिक संसाधन ही हंै। विकास और पर्यावरण को बराबर का महत्व देना होगा। जिस शैली में उद्योगों को आर्थिक का आधार बनाया है, उसी सुर में पारिस्थितिकी की बेहतरी के कदम भी बढ़ाने होंगे। मसलन, अगर शहर उद्योगों के केन्द्र हैं तो गाँव व वनवासियों का आर्थिक आधार पारिस्थितिकी को बेहतर करना होगा। वन उद्योग व जल उद्योग जैसे पारिस्थितिकी उद्योग को भी वह ही दर्जा मिले जो अन्य उद्योगों को है। जब देश-दुनिया का एक बड़ा हिस्सा उद्योग पर आधारित आर्थिक से बेहतर जीवनयापन कर सकता है, तो गाँवों के पारिस्थितिकी उद्योग से क्यों नही। यह पहल जहाँ पर्यावरण के ढ़ाचे को देश-दुनियाँ के लिए सुधारेंगे पर साथ इससे गाँवों की आमदनी भी जुटा पायेंगी। मसलन मृदा, जल व वन संरक्षण एक सतत् रोजगार के रूप में आ जाने से गाँवों की आर्थिकी तो बढ़ेगी ही और साथ में पलायन भी रुकेगा। हम एक सतत् विकास की ओर अग्रसर हो जाएंगे। अगर शहर और सरकार जहाँ एक तरफ सुविधाएं व उद्योगों को बेहिचक आगे बढ़ाएंगी, वहाँ ही पारिस्थितिकी रोजगार पर्यावरण को तो सुरक्षित रखेगी ही, गाँवों में भी पारिस्थितिकी की शक्ल में आर्थिक क्रान्ति जन्म लेगी। तभी पर्यावरण व विकास एक ही मंच पर होंगे।
पृथ्वी पर जितना भेगो, उनतना जोड़ों - इंसान की यह आम वृत्ति होती है कि जब तक वह किसी चीज को प्रत्यक्ष रूप से देख-सुन, जान-समझ एवं भोग नहीं लेता, तब तक कहे पर यकीन नहीं करता। यही बात धरती के संकट को लेकर भी है। हमारे पूर्वजों ने धरती को माॅँ कहा, पर आज हम उस कथन को भोग कर मानने पर उतारू हैं। 1896 में पहली वार स्वीडन वैज्ञानिक स्वांते ने बताया कि जीवाश्म ईंधन के इस्तेमाल से धरती का औसत तापमान बढ़ रहा है, परन्तु मानव लोभ से उस सबके साथ धरती के संसाधनों का क्षय और क्षरण आज भी अनवरत जारी है। प्राणवायु दमघोटू हो चली है, अमृत समान जल रोगों और मौतों की बड़ी बजह बन चुका है, पृथ्वी की स्वभाविक उर्वराशक्ति को विषैले रसायन चाट चुके हैं, मौसम चक्र बदल और विगड़ रहा है, समुद्र तल ऊपर उठ रहा है, वैश्वविक तापमान बढ़ रहा है और प्राकृतिक आपदाओं की आवृत्ति में इजाफा हो रहा है।
परन्तु यह कहाबत ‘जब चोट लगी (भोगा) तब दर्द का अहसास हुआ’’, सिद्ध हो रही है। जो लोग पहले धरती को हो रहे नुकसान को सिरे से खारिज करते थे, वे आज उसको बचाने की अगुआई कर रहे हैं। क्योंकि, पृथ्वी हमारे जीवन का केन्द्र है। अगर प्रतिदिन इस पृथ्वी को जीते व भोगते हैं तो हर दिन पृथ्वी के प्रति दायित्वों का निर्वहन भी होना चाहिए।
पृथ्वी के प्रति दायित्व को समझने का सीधा और सरल समीकरण है- ‘‘जितना भोगो, उतना जोड़ो।’’ परन्तु, हमने धरती को भोगने की कलाएं खूब पनपाईं, लेकिन इसे संवारने की बारी पूरी तरह भटक गए। पहली बात हमें समझ जाना चाहिए कि ये पृथ्वी मात्र सरकारों या समाज विशेष का दायित्व नहीं है, बल्कि यह सामूहिक कर्तव्य का विषय हेै।
यदि हम अपने स्तर पर मनन करें कि, अपने पूरे जीवन में हम पृथ्वी से क्या-क्या लेते हैं -वे पानी, वायु, मिट्टी तो सब समान रूप से ही भोगते हैं, पर उस ऋण का छोटा सा हिस्सा भी पृथ्वी को वापस करने की नहीं सोच पाते। अतः आवश्यकता है कि हम पृथ्वी के इस ऋण को महसूस करें व करवायें और किसी भी रूप में इसे चुकाएं, यही समाधान है। यही हमारा कर्तव्य है।
इसके लिए हमें अपनी जरूरतों को सीमित करना होगा व साथ ही वर्तमान विकास माण्डल का पुर्नमूल्यांकन करना होगा, जिसके अंधेपन ने हमें पृथ्वी व इसकी संवेदनशीलता से दूर कर दिया है। इस हेतु तत्काल प्रभाव से कुछ महत्वपूर्ण कदम उठा सकते हैं - हर पारिवारिक पर्वों में पर्यावरण को जोड़कर देखें। स्कूली शिक्षा में व्यवहारिकता पूर्ण पर्यावरण की शिक्षा जोड़ें। सरकार को चाहिए कि विकास को मात्र आर्थिक विकास से ही जोड़कर नहीं देखें, अपितु पर्यावरण को भी विकास का मूल आधार बनाएँ। यह तय करना होगा कि हम हर वर्ष कितने वन, पानी, हवा को बेहतर कर पाये और उसमें कितना स्थायित्व ला पाये, यही हमारे विकास की कसौटी होगी। ु
- (लेखक जाने माने पर्यावरणविद् हैं।)
असल में नए विज्ञान ने गाँवों के ज्ञान को विस्थापित किया है। इसका उद्देश्य होना चाहिए था कि गाँवों की दक्षता को नए विज्ञान के साथ जोड़कर मजबूत करे, लेकिन हुआ इसके विपरीत। देश में आज गाँव मात्र उत्पादक के रूप में जाने जाते हैं। दूसरी ओर शहर गाँवों में उत्पादित वस्तुओं का शोधन कर लाभ कमा रहे हैं। शहरी उद्योग इन्हीं कृषि उत्पादों का शोधन कर और अधिक लाभ उठाते हैं। इससे उत्पादक और उपभोक्ता दोनों ही दुखी है। एक को कम दाम मिलते हैं और दूसरे को ज्यादा दाम देने पड़ते है और सब इसलिए ही सम्भव हुआ, क्योंकि हमने विज्ञान को ग्रामोन्मुखी नहीं बनाया। देश के बड़े संस्थान चाहे वे कृषि से जुडे हों या फिर अन्य संसाधनों से, गाँवों से अभी भी बहुत दूर ही हैं। देश का सबसे बड़ा हिस्सा खेती में जुटा है और इसके लिए भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद व इसके 105 संस्थान व 55 कृषि विश्वविद्यालय गाँवों के लिए ही समर्पित होने चाहिए थे। पर क्या देश में खेती व किसान के हालात बेहतर कहे जा सकते हैं? प्रौद्योगिकी व उद्योग शोध परिषद यानी सीएसआइआर और इससे जुड़े 20 से अधिक संस्थान ग्राम्य तकनीक पर काम करनेे का दावा करते हैं। ऐसे ही देश में आइआइटी व एनआइटी व सैकड़ों विज्ञान संस्थान कार्यरत है, लेकिन गाँवों के हालात बद-से-बदतर ही हुए हैं। विज्ञान संस्थानोें और लाखों वैज्ञानिकों से भरा ये देश मंगल पर तो चला गया, पर गाँवों में मंगल कार्य आज तक अछूूते ही रहे।
ऐसे में प्रधानमंत्री का विज्ञान कांग्रेस में वैज्ञानिकों का आवाहन बहुत महत्व रखता है। दुर्भाग्य से हमारे देश में कागजी शोध का बड़ा महत्व है। हमारे वैज्ञानिक अपने विज्ञान काल में कितने शोध-पत्र छापते हैं। उनके शोधपत्र का प्रकाशन ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाता है, न कि यह कि वह शोध कितना जमीन पर उतरा। यही हमारे देश के विज्ञान संस्थानों व वैज्ञानिकों की ज्यादा बड़ी कमी रही है। देश के सभी संस्थानों में होने वाले शोध अधिकतर अव्यवहारिक होते हैं। बाकी जो शोध ठीक-ठाक होतंे भी हैं तो उनमें से कई कभी बाहर ही नहीं निकले और जो कुछ निकल कर आए भी तो उनमें से कई तोे जमीन पर उतरे ही नहीं। इसका कारण हमारी शोध करने की संकुचित पहल है। किसी भी तरह के शोध को दिशाहीन व अव्यवहारिक नहीं होना चाहिए। हमारे वैज्ञानिक संस्थानों व वैज्ञानिकों के पास स्पष्ट संदेश होना चाहिए कि शोध व्यावहारिकता के आधार पर तय हो, न कि शोध पत्रों पर।
विज्ञान व वैज्ञानिकों का एक बड़ा दायित्व है कि वे विज्ञान में असमानता से बचें और ग्रामोन्मुखी विज्ञान को प्राथमिकता दें। हमें नहीं भूलना चाहिए कि विज्ञान के पहले हकदार गाँव है, जहाँ से मूल उत्पादन की नींव पड़ी है। अगर उनका दायित्व मात्र उत्पादन के रूप में ही देखा जाएगा तो वे बड़े लाभ के हिस्सेदार नहीं बन पाएंगे और लाभ ही तय करेगा कि उनका झुकाव कृषि या अन्य उत्पादों की तरफ विश्वास के योग्य है भी या नहीं। गत दो-तीन दशकों में गाँवों व किसानों की अपनी खेती और उत्पादों के विश्वास में कमी आई है। कारण साफ है कि स्थानीय उत्पादों से लाभ लागत के भी नीचे पहुँच गया है। मजबूरी व विकल्प का अभाव उन्हें इस श्रम से जोड़े हुए है। वरना जिन्हें अवसर मिला उन्होंने अक्सर इसे त्यागना ही बेहतर समझा। लेकिन अगर जल्दी सब कुछ नहीं संभला तो हम बड़े संकट में घिर जाएंगे। गाँवों का शहरों की तरफ ़रुख हमारे प्राथमिक उत्पादन पर बड़ा असर डालेगा।
अब यह जरूरी हो गया है कि हमारी विज्ञान नीति ऐसी हो जो गाँवों से जुड़ी हो। मंगलयान पर पहुँचने वाले वैज्ञानिक अगर प्रधानमंत्री के वाह-वाही के पात्र हों तो लोक विज्ञानी को भी उसी श्रेणी में रखा जाए और उसे भी राष्ट्रीय सम्मान की दृष्टि से देखा जाए। गाँवों में कार्य करने वाले वैज्ञानिकों को उत्साहित करना होगा। बड़े-बड़े संस्थानों में कार्य करने वाले वैज्ञानिकों को ही प्रथामिकता न मिले, बल्कि ग्रामीण विज्ञान के कार्य को भी बड़े स्तर का योगदान माना जाए। अंतरिक्ष, न्युक्लियर जैसे बड़े शोध, जिनका घर-गाँव से सीधा सम्बन्ध नहीं है, आज प्रमुखता से जाने जाते हंै। इनके विज्ञानी ही प्रधानमंत्री कार्यालय की शोभा ब़ढ़ाते हैं। दूसरी तरफ लोक विज्ञानी को ऐसा सम्मान नहीं मिलता। हम जब तक ग्राम विज्ञान की आवश्यकता को देश के अन्य विज्ञान की आवश्यकताओं के समानान्तर नहीं देखेंगे तब तक विज्ञान को ग्रामोन्मुखी नहीं बना पाएंगे। अब देखना यह है कि देश के विज्ञान संस्थान व वैज्ञानिक प्रधानमंत्री की इस सलाह को कितनी गम्भीरता से लेते है।
पर्यावरण के साथ ही समग्र विकास सम्भव - पर्यावरण और विकास एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। जहाँ एक तरफ मूल संसाधन हवा, पानी व मिट्टी के बिना जीवन सम्भव नहीं। वहीं दूसरी तरफ जीवन के लिए न्यूनतम सुविधाओं को जुटाना सभ्यता का भी प्रतीक है।
दरअसल यह जानना जरूरी है कि स्थायी आर्थिक स्रोत भी स्थायी पारिस्थितिकी है। पारिस्थितिकी के उत्पाद, प्राकृतिक संसाधनों के बिना आर्थिक ढांचे को कतई भी संभाला नहीं जा सकता और ना ही बेहतर किया जा सकता है। क्योंकि आर्थिक के आधार प्राकृतिक संसाधन ही हंै। विकास और पर्यावरण को बराबर का महत्व देना होगा। जिस शैली में उद्योगों को आर्थिक का आधार बनाया है, उसी सुर में पारिस्थितिकी की बेहतरी के कदम भी बढ़ाने होंगे। मसलन, अगर शहर उद्योगों के केन्द्र हैं तो गाँव व वनवासियों का आर्थिक आधार पारिस्थितिकी को बेहतर करना होगा। वन उद्योग व जल उद्योग जैसे पारिस्थितिकी उद्योग को भी वह ही दर्जा मिले जो अन्य उद्योगों को है। जब देश-दुनिया का एक बड़ा हिस्सा उद्योग पर आधारित आर्थिक से बेहतर जीवनयापन कर सकता है, तो गाँवों के पारिस्थितिकी उद्योग से क्यों नही। यह पहल जहाँ पर्यावरण के ढ़ाचे को देश-दुनियाँ के लिए सुधारेंगे पर साथ इससे गाँवों की आमदनी भी जुटा पायेंगी। मसलन मृदा, जल व वन संरक्षण एक सतत् रोजगार के रूप में आ जाने से गाँवों की आर्थिकी तो बढ़ेगी ही और साथ में पलायन भी रुकेगा। हम एक सतत् विकास की ओर अग्रसर हो जाएंगे। अगर शहर और सरकार जहाँ एक तरफ सुविधाएं व उद्योगों को बेहिचक आगे बढ़ाएंगी, वहाँ ही पारिस्थितिकी रोजगार पर्यावरण को तो सुरक्षित रखेगी ही, गाँवों में भी पारिस्थितिकी की शक्ल में आर्थिक क्रान्ति जन्म लेगी। तभी पर्यावरण व विकास एक ही मंच पर होंगे।
पृथ्वी पर जितना भेगो, उनतना जोड़ों - इंसान की यह आम वृत्ति होती है कि जब तक वह किसी चीज को प्रत्यक्ष रूप से देख-सुन, जान-समझ एवं भोग नहीं लेता, तब तक कहे पर यकीन नहीं करता। यही बात धरती के संकट को लेकर भी है। हमारे पूर्वजों ने धरती को माॅँ कहा, पर आज हम उस कथन को भोग कर मानने पर उतारू हैं। 1896 में पहली वार स्वीडन वैज्ञानिक स्वांते ने बताया कि जीवाश्म ईंधन के इस्तेमाल से धरती का औसत तापमान बढ़ रहा है, परन्तु मानव लोभ से उस सबके साथ धरती के संसाधनों का क्षय और क्षरण आज भी अनवरत जारी है। प्राणवायु दमघोटू हो चली है, अमृत समान जल रोगों और मौतों की बड़ी बजह बन चुका है, पृथ्वी की स्वभाविक उर्वराशक्ति को विषैले रसायन चाट चुके हैं, मौसम चक्र बदल और विगड़ रहा है, समुद्र तल ऊपर उठ रहा है, वैश्वविक तापमान बढ़ रहा है और प्राकृतिक आपदाओं की आवृत्ति में इजाफा हो रहा है।
परन्तु यह कहाबत ‘जब चोट लगी (भोगा) तब दर्द का अहसास हुआ’’, सिद्ध हो रही है। जो लोग पहले धरती को हो रहे नुकसान को सिरे से खारिज करते थे, वे आज उसको बचाने की अगुआई कर रहे हैं। क्योंकि, पृथ्वी हमारे जीवन का केन्द्र है। अगर प्रतिदिन इस पृथ्वी को जीते व भोगते हैं तो हर दिन पृथ्वी के प्रति दायित्वों का निर्वहन भी होना चाहिए।
पृथ्वी के प्रति दायित्व को समझने का सीधा और सरल समीकरण है- ‘‘जितना भोगो, उतना जोड़ो।’’ परन्तु, हमने धरती को भोगने की कलाएं खूब पनपाईं, लेकिन इसे संवारने की बारी पूरी तरह भटक गए। पहली बात हमें समझ जाना चाहिए कि ये पृथ्वी मात्र सरकारों या समाज विशेष का दायित्व नहीं है, बल्कि यह सामूहिक कर्तव्य का विषय हेै।
यदि हम अपने स्तर पर मनन करें कि, अपने पूरे जीवन में हम पृथ्वी से क्या-क्या लेते हैं -वे पानी, वायु, मिट्टी तो सब समान रूप से ही भोगते हैं, पर उस ऋण का छोटा सा हिस्सा भी पृथ्वी को वापस करने की नहीं सोच पाते। अतः आवश्यकता है कि हम पृथ्वी के इस ऋण को महसूस करें व करवायें और किसी भी रूप में इसे चुकाएं, यही समाधान है। यही हमारा कर्तव्य है।
इसके लिए हमें अपनी जरूरतों को सीमित करना होगा व साथ ही वर्तमान विकास माण्डल का पुर्नमूल्यांकन करना होगा, जिसके अंधेपन ने हमें पृथ्वी व इसकी संवेदनशीलता से दूर कर दिया है। इस हेतु तत्काल प्रभाव से कुछ महत्वपूर्ण कदम उठा सकते हैं - हर पारिवारिक पर्वों में पर्यावरण को जोड़कर देखें। स्कूली शिक्षा में व्यवहारिकता पूर्ण पर्यावरण की शिक्षा जोड़ें। सरकार को चाहिए कि विकास को मात्र आर्थिक विकास से ही जोड़कर नहीं देखें, अपितु पर्यावरण को भी विकास का मूल आधार बनाएँ। यह तय करना होगा कि हम हर वर्ष कितने वन, पानी, हवा को बेहतर कर पाये और उसमें कितना स्थायित्व ला पाये, यही हमारे विकास की कसौटी होगी। ु
- (लेखक जाने माने पर्यावरणविद् हैं।)
समग्र विकास में भूमि का महत्व . (बदलती परिस्थितियों में समझं और समझाएं) - शशि शेखर
भागलपुर से पटना लौटते समय मेरे सहयोगी डाॅक्टर वीर विजय सिंह बोले कि बड़हिया में कुछ देर रुकते हैं। वहाँ का रसगुल्ला मशहूर है और चाय भी अच्छी मिलती है। अन्य साथियों के चेहरे पर सहमति के भाव देख मैंने हामी भर दी।
जलपान के दौरान देखा के आसपास की टेबल पर कुछ लोग आ जमे और वे कौतुहल से हमारी ओर देख रहे हैं। वे प्रस्तावित भूमि अधिग्रहण कानून के बारे में जानना चाह रहे थे। उन्होंने कहा कि हम लांेगो ने अन्ना जी का भाषण सुना। वह कह रहे हैं कि सरकार यदि जमीन अधिग्रहण करेगी, तो उसके खिलाफ किसानों को अब अदालत में जाने का मौका नहीं मिलेगा। ऐसा तो अंग्रेजों ने भी नहीं किया। लोकतंत्र में कोई कानूनी लड़ाई लड़ने का हक कैसे छीन सकता है।
मैंने उनसे कहा कि आप इतनी जल्दी किसी निष्कर्ष पर मत पहुँचिए। यह किसानों का देश है और उनके हक-हुकूक कोई भी सरकार नहीं छीनना चाहेगी। वे सबसे बड़ा ‘वोट बैंक’ हैं। उनकी कटुता राजनीतिक दलों पर भारी पड़ सकती है। आपको एक बार इस प्रस्तावित अध्यादेश को पढ़ना चाहिए। किसी निष्कर्ष पर पहुँचने से पहले खुद सोचिए कि विकास के लिए जरूरी भूमि कहीं बाहर से नहीं लाई जा सकती। उसके लिए हम सबको सहयोग करना होगा। इस पर उनका जवाब था कि आप सही कह रहे हैं। किसानों के मामले में हमेशा राजनीति होती है और सही बात हम तक नहीं पहुँचती।
पटना जल्दी पहुँना था, लिहाजा मैंने हाथ जोड़कर उनसे विदा माँग ली। शेष रास्ते सड़क से ज्यादा हिचकोले विचारों ने दिए। ये भारत के किसान ही तो थे, जिन्होंने नई परम्परा को पोसा और दलित को पुजारी का दर्जा दिया। धार्मिक कट्टरता के जाले में उलझती जा रही दुनिया क्योें नहीं इससे सबक लेती? किसान, जिन्हें नेता सिर्फ ‘वोट बैंक’ मानते हैं, उन तक सच क्यों नहीं पहुँचता? वे भले ही डिग्री शुदा न हों, पर मनीषा और जागृती के मामले में किसी से कम नहीं। फिर उन्हें ‘गिनी पिग’ की तरह इस्तेमाल क्यों किया जाता है? इस विचार श्रंखला को साथ चल रहे संजय सिन्हा ने नया आयाम दिया। उन्होंने कहा कि कई विद्वान अब लोकतंत्र की उपयोगिता पर सवाल उठा रहे हैं। चीन का उदाहरण देते हुए ‘द इकोनाॅमिसट’ ने कहा है कि वहाँ विकास इसलिए हो रहा है, क्योंकि वहाँ भूमि अधिग्रहण जैसे मामलों में कोई रोड़ा नहीं अटकाता। भारत में लोकतंत्र है, और वह भी ऐसा कि सौ करोड़ लोगों के पास ‘वीटो पावर’ है। हम भले ही संसार का सबसे बड़ा लोकतंत्र हों, पर विकास के लिए जरूरी फैसलों में अड़ंगेबाजी ने गुड़ को गोबर कर दिया है।
जवाब में मैंने कहा कि लोकतंत्र बनाम साम्यवादी तानाशाही की बहस बहुत पुरानी है। सोवियत संघ को मानने वाले अक्सर अमेरिका की तौहीन करते थे। 1961 में माॅस्को ने जब यूरी गागरिन को अंतरिक्ष में भेजा, तो वहाँ के अखबारों ने छापा कि साम्यवाद की उड़ान अब धरती की कक्षा को पार कर गई है। बताने की जरूरत नहीं कि गागरिन अंतरिक्ष की सैर करने वाले पहले इंसान भले ही साबित हुए, पर सोवियत उपलब्धियों के पांव अधर में थे। उन्होंने कुछ क्षेत्रों में बढ़त जरूर हासिल की, पर उसे कायम न रख सके। इसीलिए आज अमेरिका शीर्ष पर है और सोवियत संघ को बिखरे हुए चैथाई सदी बीतने को आई। हम अमेरिकी नीतियोें के खिलाफ हो सकते हैं, पर जम्हूरियत अपनी तमाम खामियों के बावजूद सर्वोत्तम शासन प्रणाली साबित हुई है।
बाद में पटना से दिल्ली की उड़ान के दौरान डेढ़ घंटा लगातार किसानों के बारे में सोचता रहा, जिनके बीच से मैं आता हूँ। इस देश में भूमि का अधिग्रहण एक जनवरी, 2014 से पहले अंग्रेजों के बनाए ‘लैण्ड एक्विजिशन ऐक्ट आॅफ-1894’ के तहत होता था। कांग्रेस की सरकार ने इसे बदला और इस दौरान खुद पार्टी के अन्दर वैचारिक टकराव उजागर हुए।
केन्द्र में इस वक्त नरेन्द्र मोदी की अगुवाई वाली सरकार है। मोदी ‘जय जवान और जय किसान’ के नारे को नए तरीके से पेश कर सत्ता में पहुँचे हैं। अब तक उनकी सरकार की जिम्मेदारी है कि वह कृषकों तक इस कानून की खूबियों को पहुँचाएं और यदि कुछ खामियों पर असहमति बनती है, तो उन्हें हटाए। यह अच्छी बात है कि कई वरिष्ठ मंत्री इस मुद्दे पर विपक्षी नेताओं से बात कर रहे हैं। लोकसभा में खुद नरेन्द्र मोदी ने आह्वान किया कि किसानों के मामले में राजनीति न की जाए। अगले ही दिन आम बजट में किसानों को कई तरह की सहूलियत देकर वित्त मंत्री अरुण जेटली ने सरकार के इरादों को जाहिर कर दिया। क्या सियासी दल इस बेहद संवेदनशील मुद्दे पर आमराय बना सकेंगे?
कहने की जरूरत नहीं कि देश के 70 फीसदी लोग अब भी खेती-किसानी पर निर्भर हैं। उनके हक-हुकूक पर सहानुभूतिपूर्वक विचार करना जरूरी है। हजारों साल से हमारा राष्ट्र कृषि पर निर्भर रहा है। अब वक्त बदल गया है। 21वीं शती में फलने-फूलने के लिए हमें राजमार्ग, फैक्टरियाँ और नौजवानों के लिए रोजगार चाहिए। फिर हमारी सीमा-सुरक्षा की अपनी आवश्यकताएं हैं। इसके लिए यदि जमीन की जरूरत पड़ती हैं, तो उसे मुहैया कराना ही होगा। मुझे नहीं लगता कि किसान प्रगति के खिलाफ हैं। जरूरत है उनके हृदय में भरोसा जगाने की, इसमें लोकतंत्र बाधक कहाँ साबित होता है?
भूलिए मत जनतंत्र हमारी रगों में है और इसका सबसे बड़ा तत्व है- आम सहमति। उम्मीद है हमारे सत्तानायक इस तथ्य को समझने में भूल नहीं करेंगे। ु
समग्र विकास में ग्लोबल वार्मिंग एक समस्या औरं उसका निदान?
मानव की अदूरदर्शी व संकीर्ण प्रवृत्ति से प्रकृति के अन्धाधुन्ध शोषण के प्रयास आज समग्र विकास के मार्ग में प्रमुख प्रतिगामी घटना बन गये जो, ग्लोबल वार्मिंग एवं निदान पर प्रस्तुत चर्चा से स्पष्ट होता है।
अन्तरराष्ट्रीय संस्था आईपीसीसी के अध्ययन के मुताबिक पिछली सदी के दौरान धरती का औसत तापमान 1.4 फाॅरेनहाइट बढ़ चुका है जो अगले सौ साल में बढ़कर 2 से 11.5 फाॅरेनहाइट होने का अनुमान है। धरती के औसत तापमान में हो रही यह मामूली वृद्धि हमारी पृथ्वी की जलवायु और मौसम प्रणाली में व्यापक रूप से विनाशकारी बदलाव ला सकती है। जिसके मौसम और जलवायु में परिवर्तन के साक्ष्य, बारिस की पद्धति में बदलाव, गम्भीर बाढ़, सूखा, तेज बारिश, अक्सर लू चलने की प्रवृत्तियाँ दिखने लगी है। महासागर गर्म होकर अधिक अम्लीय हो रहे हैं। हिमाच्छादित चोटियांँ और ग्लैशियर पिघल रहे हैं। समुद्र तल बढ़ रहा है। जैसे-जैसे दुष्परिणाम मजबूत होंगे जीवन मुश्किल होता जायेगा।
पिछली सदी के दौरान इन्सानी गतिविधियों के चलते वायुमण्डल में बड़ी मात्रा में कार्बन डाईआक्साइड समेत अन्य ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन हुआ। ऊर्जा उत्पादन में जलाए गए जीवाश्म ईंधनों से बहुतायत में ये ग्रीन हाउस गैसें पैदा हुईं। बढ़ता औद्योगीकरण, कटते जंगल और कुछ कृषि पद्धतियां भी इन गैसों के उत्सर्जन के लिए जिम्मेदार रही हैं। आईपीसीसी के अनुसार पिछले 250 साल के दौरान हुई इन्सानी कारगुजारियाँं 90 फीसदी से ज्यादा जिम्मेदार रही हैं। पिछले 150 साल में औद्योगिक गतिविधियों के चलते कार्बन डाईआक्साइड का स्तर 280 पीपीएम से बढ़कर 379 पीपीएम हो चुका है। 6 मार्च से 12 अप्रैल, 2015 के बीच पृथ्वी के वातावरण में कार्बन डाइ आक्साइड का स्तर 404.01 पाट्र्रस प्रति मिलियन (पीपीएम) पहुँच गया। जो अब तक के मानव इतिहास में सर्वाधिक है। इसी के अनुपात में गर्मी, वर्षा और कृषि उत्पादन में अभूतपूर्व संकट की आशंका भी बलवती हो गई है।
ग्रीनहाउस गैसें धरती के चारो तरफ लिपटी हुई चादर की तरह काम करती हैं। सूर्य से आने वाली प्रकाशीय ऊर्जा का अधिकांश हिस्सा धरती अवशोषित कर लेती है। इसका कुछ भाग वह वायुमण्डल में उत्सर्जित करती है। चंूकि धरती के चारो तरफ ऐसी ग्रीनहाउस गैसों की परत लिपटी है और उत्सर्जित ऊर्जा उसे भेदकर वायुमण्डल में विलीन होने में असमर्थ है। लिहाजा सबकी सब यह वायुमण्डल में ही एकत्र हो रही है। इससे धरती का तापमान बढ़ रहा है। इसे ग्रीनहाउस इफेक्ट कहा जाता है।
यद्यपि कार्बन डाई आक्साइड की गैर मौजूदगी में कायनात की कल्पना ही नहीं की जा सकती है। जीवन के लिए यह बेहद अहम है। पौधे अपनी खुराक प्रकाश की उपस्थिति में इसी के मध्यम से बनाने में सक्षम होते हैं। प्रत्युत्तर में यही पौधे इन्सानी जीवन के लिए प्राणवायु वायुमण्डल में छोड़ते हैं। लेकिन आज अनेकों कृत्रिम माध्यमों, फैक्ट्रियों, मनुष्य की अदूरदर्शी करतूतांे के कारण इस गैस का इतना अधिक उत्सर्जन होने लगा है कि उसकी खपत नहीं हो पा रही है। फलस्वरूप वायुमण्डल में विद्यमान रहकर यही गैस उसे गर्म करने में पूरा सहयोग करती है।
हमारे घरों में गर्मी, ठंड ऊर्जा पहुँचाने व औद्योगिक इकाइयों के लिए जिस प्रकार ऊर्जा का उपयोग किया जा रहा है, जलवायु परिवर्तन में इसका बड़ा योगदान है। ऐसे में एनर्जी एफिशियेंट उत्पादों के जरिए कम ऊर्जा में जरूरतें पूरी करने के प्रयास किए जाने चाहिए। परिवहन के चलते वायुमण्डल में कार्बन का उत्सर्जन दिन व दिन बढ़ रहा है। ऐसे में सार्वजनिक परिवहन की सेवाओं में बढ़ोत्तरी की आवश्यकता है, जिससे सड़कों पर निजी बाहनों की संख्या घटाई जा सके।
वायु और भू-तापीय ऊर्जा के स्रोत दुनियाँ भर में मौजूद हैं। अध्ययन बताते हैं कि इन स्रोतों में हमारी विस्तृत ऊर्जा जरूरतें पूरी करने की क्षमता तो मौजूद है। कोयला और अन्य जीवाश्म पर आधारित ईंधन का विकल्प तलाशने के बाद अब आगे इसका इस्तेमाल बन्द किया जाये। परमाणु ऊर्जा एक विकल्प हो सकता है, पर इसके अन्य खतरे हैं। वर्तमान में एक ऐसी तकनीक का प्रयोग किया जा रहा है, जिसके तहत कार्वन उत्सर्जन को जमीन के अन्दर इकट्ठा किया जा सकता है। तकनीक काफी किफयती मानी जा रही है लिहाजा इसे अपनाने में कोई नुकसान नहीं, यह समय ही बतायेगा।
भविष्य में कार्बन उत्सर्जन घटाने में कार्बन रहित न्यूनतम कार्बन उत्सर्जन पर आधारित तकनीकों की बड़ी भूमिका रहने वाली है। ऐसे में बैटरी, सोलर, शैवाल से ऊर्जा तकनीक मददगार साबित हो सकती है।
इसी सन्दर्भ में ओजोन परत सम्बन्धी इस चर्चा को भी समझना आवश्यक मार्ग दर्शन करा सकता है।
पिछली सदी में ओजोन परत में क्षरण के अलावा बड़े पैमाने पर पर्यावरण क्षरण देखा गया और इसको इंसानी गतिविधियों और उपभोग के स्तर के साथ जोड़ कर देखा गया जो कि विकासशील देशों में भी विस्तारित होता जा रहा है। हालांकि यह कहा जा सकता हैं कि पर्यावरणीय क्षति का कुछ हिस्सा अनजाने में हुआ, लेकिन अब इस विषय में अनजाना नहीं रहा जा सकता है।
1992 में रियो सम्मेलन में 100 देशों के राष्ट्र प्रमुखों ने एकत्र होकर टिकाऊ विकास के एजेन्डे पर सहमति प्रकट की और जलवायु परिवर्तन की समस्या को पहचानते हुए इसको रोकने बाले समझौते पर हस्ताक्षर किए। उस समय यह तथ्य सामने आये थे कि 80 प्रतिशत उपभोग की वस्तुएं मसलन जीवाष्म ईंधन से लेकर स्टील, अल्मोनियम, तांवा जैसे खनिजों और कार जैसी चीजों का उपयोग विकसित देशों की 20 प्रतिशत आवादी कर रही है। इन्हीं सब का नतीजा जलवायु परिवर्तन और ओजोन परत के क्षरण के रूप में दिखाई दे रहा है। अब उपभोग की वही प्रवृत्तियां विकासशील देशों में विशेषकर चीन के उदय के बाद देखी जा रही हैं और इसके चलते अब विकासशील देशों का हिस्सा उत्पादों और वस्तुओं के उपभोग के लिहाज से 35 प्रतिशत से अधिक हो गया है। उसके नतीजे इस सदी की नई पीढ़ी को भुगतने पड़ रहे हैं तथा उस रास्ते से दूर हटते हुए समाधान तलाशने की कोशिशें करनी पड़ रही हैं - कम उत्सर्जन वाले परिवहन साधनों, नवीकरणीय ऊर्जा के समाधान के रूप में देखा जा सकता है।
कार्बन डाई आक्साइड उत्सर्जन (2011 के अनुसार)-
रैंक देश कुल उत्र्जन /व्यक्ति उत्सर्जन
(दसलाख टन में) (टन में)
1. चीन 8715.31 6.52
2. अमेरिका 5490.63 17.62
3. रूस 1788.14 12.55
4. भारत 1725.76 1.45
5. जापान 1180.62 9.26
6. जर्मनी 748.49 9.19
7. ईरान 624.86 8.02
8. द॰ कोरिया 610.95 12.53
9. कनाडा 552.56 16.24
10. साउदी अरब 513.53 19.65
हालांकि पिछली सदी के अन्त तक सुधार के कई प्रस्ताव पेश हुए और उनका अमलीजामा पहनाना भी सुनिश्चित किया गया। ओजोन परत दुरूस्त करने की दिशा में मांट्रियल प्रोटोकाॅल के तहत सीएफसी (क्लोरोफ्लो कार्बन) के उत्सर्जन को प्रतिबन्धित किया गया है। अभी बहुत कुछ किया जाना बाकी है। कठिन प्राकृतिक विरासत के साथ 21वीं सदी शुरू हुई है। हालांकि इस संकट के समाधान के लिए कुछ समय के भीतर ही नए रास्ते तलाशे गए हैं।
कम उर्जा खपत और कम कार्बन उत्सर्जन टेक्नालाॅजी जैसे एलईडी लैम्प का इस्तेमाल शुरू हुआ है, जिसमें उतने ही प्रकाश उत्पन्न करने के लिए ऊर्जा के दसवें हिस्से की जरूरत होती है। पवन और सौर ऊर्जा, इन्टरनेट अर्थव्यवस्था शुरू हुई है, जिससे पेपर और परिवहन की बचत होती है। परन्तु निराकरण केबल तकनीकों के जरिए ही संभव नहीं है, इसके लिए सबसे जरूरी समाज के प्रति नए दृष्टिकोण की है जो समावेशी और हर एक की बुनियादी जरूरतों को पूरा करने से संबन्धित है। इसके लिए उपभोग की पुरानी प्रवृत्ति को छोड़ना होगा और सनातन मान्यता ‘अपरिग्रह’ को अपनाना होगा।
इसका आशय प्रकृति से लालच की बजाय केबल जरूरत के मुताबिक लेने को प्रोत्साहित करने से है। इसकी बानगी गांधी जी से ली जा सकती है, जो नदी किनारे बैठकर भी मुंह धोने के लिए केबल एक कप पानी लेते थे। नई पीढ़ी के समक्ष कठिन चुनौतियां हैं और उनको सावधानी पूर्वक ऐसे संतुलित विकल्पों को अपनाना चाहिए, जिसमें तकनीक पर निर्भरता के साथ विवेक का इस्तेमाल करते हुए गरीबों के प्रति सहानुभूति का भी भाव हो। ु
समग्र विकास और प्रजातन्त्र - जी॰एन॰ वाजपेयी
वैश्विक स्तर पर स्वीकार्य और अनुभवसिद्ध तमाम शोध इस बात की पुष्टि करते हैं कि लोकतंत्र किसी भी समाज को सुशासन देने के लिए एक बेहतर विकल्प है। यह किसी भी अन्य प्रणाली की तुलना में कहीं अधिक प्रभावशाली है। एक लम्बे अर्से से लोकतंत्र ने बड़ी संख्या में अच्छी चीजंे दी हैं। यही लोकतंत्र का वरदान है। लोकतंत्र विचार-विमर्श का अवसर मुहैया कराता है। इसमें असहमति की आवाज के साथ-साथ अन्य विकल्प भी होते हैं, जो कि सभी समुदायों के व्यापक हित में होता है। हालांकि कभी-कभी आम सहमति पर पहुँचने के लोकतांत्रिक तौर-तरीके अथवा उपाय विलम्ब का कारण बनते हंै और अक्सर ये तौर-तरीके संकीर्ण सोच तथा स्वार्थ को आगे बढ़ाते हैं। जब भी ऐसा होता है तो लोकतंत्र एक अभिशाप में बदल जाता है। आजाद भारत की प्रथम पीढ़ी के नेताओं की बुद्धिमत्ता, दूरदर्शिता और उनके साहस को श्रेय देना होगा कि उन्होंने लोकतंत्र (संसदीय) का चुनाव किया जिसमें शासन संचालन के लिए मताधिकार को आधार बनाया गया।
आजाद भारत की यात्रा में तमाम उथल-पुथल के बावजूद लोकतंत्र न केवल बचा रहा, बल्कि फलता-फूलता भी रहा। प्रत्येक लोकतंत्र में होने वाले राजनेताओं और राजनीतिज्ञों की तरह हमारे यहाँ भी इस तरह के लोग हैं। राजनीतिक विज्ञान के साहित्य में राजनेता उसे कहा गया है जो सिद्धान्तों विचारों के लिए कार्य करता है, जबकि राजनीतिज्ञ वह होता है जो अपने निहित स्वार्थों की पूर्ती में अधिकाधिक लगा रहता है। आजाद भारत में जो तमाम वादे किए गए उनमें सर्वाधिक महत्वपूर्ण था देश के लाखों लोगों को आर्थिक तौर पर सशक्त करना। दुर्भाग्य से इस दिशा में प्रगति बहुत धीमी रही या कहें अपर्याप्त और निराशाजनक रही। आज का युवा भारत इस मामले में बहुत अधीर है, वह बहुत इंतजार करने को तैयार नहीं है। अप्रत्यक्ष तौर पर कहा जाए तो और इंतजार की स्थापित मान्यता अब स्वीकार्य नहीं रह गई है। इसे पिछले वर्ष मई माह में आए चुनाव के परिणामों से भी समझ सकते हैं। नई सरकार का चुनाव ही इस जनादेश के साथ किया गया है कि वो समृद्धि लाने वाले उपायों पर काम करेगी, गरीबी और दरिद्रता का उन्मूलन करेगी। हालांकि इसमें समय लगेगा और पटरी से उतरी हुई अर्थव्यवस्था को ऊपर उठाने के लिए बहुत सारे प्रयास करने होंगे। यह एक चुनौती पूर्ण कार्य है। इसलिए और भी क्योंकि मौजूदा समय अर्थव्यवस्था वृहद आर्थिक अस्थिरता, राजकोषीय फिजूलखर्जी और सरकारी घाटे के बोझ तले दबी हुई है।
राजनीतिक कर्ता-धर्ता भले ही बहुत तेजी से स्थितियों को न बदल सकंे, लेकिन उन्हें मतदाताओं को अपनी ईमानदारी के प्रति भरोसा दिलाना होगा और टिकाऊ आर्थिक विकास के लिए समग्रतावादी नजरिया अपनाना होगा। हमारे नीति-नियंताओं को अपने विचारों को बेहतर तरीके से जनता के बीच रखना होगा और उन्हें बताना होगा कि अर्थव्यवस्था में सुधार के लिए क्या-क्या जरूरी है। हालांकि राज्यों और भारतीय अर्थव्यवस्था के सन्दर्भ में समग्रतावादी नजरिए का परिणाम आने में समय लगेगा। इस बीच सरकार की ईमानदारी और उसकी योग्यता-नीयत को लेकर किसी तरह का संदेह नहीं होना चाहिए। इसके लिए सरकार कई मोर्चों पर काम कर रही है तथा कई एक कदम उठाए गए हैं जिसमें कई ऐसे विधेयक प्रस्तावित किए गए है जिससे देश में व्यवसाय के प्रति माहौल बना है और प्रक्रियाएं सरलीकृत हुई हैं। संसद के पिछले सत्र में केन्द्र सरकार ने अधीर भारत की बेचैनी को दूर करने के लिए अध्यादेशों के माध्यम से आर्थिक सुधारोें की गति को तेजी देने की कोशिश की ताकि स्थिति में बदलाव हो सके। इसके लिए सरकार ने भूमि अधिग्रहण विधेयक को पेश किया, कोयला, खदानों और खनिजों जैसी राष्ट्रीय सम्पदा की पारदर्शी बिक्री को सुनिश्चित किया और बीमा क्षेत्र में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की सीमा में वृद्धि को अनुमति देने का काम किया।
कार्यपालिका के पास लोकहित में अध्यादेशों को जारी करने की शक्ति संविधान में मिली हुई है। इन अध्यादेशोें को संसद में पारित करा पाना सरकार के लिए बड़ी राजनीतिक परीक्षा है। दुर्भाग्य से इस मुद्दे पर राजनीतिज्ञ अपने-अपने हितों के लिहाज से राजनीति कर रहे हैं और अपने संकीर्ण राजनीतिक स्वार्थों के कारण इसे विफल बनाने की कोशिश कर रहे हैं। हालांकि एक वर्ग अप्रत्यक्ष तौर पर इसे सहारा भी दे रहा है। सच्चाई यही है कि यह राजनीतिज्ञों की राजनीति है, न कि राजनेताओं की। इन लोगों ने ही आर्थिक विकास की गति को धीमा किया है और इस समय भी इसे विफल बनाने की कोशिश कर रहे हैं। हालांकि यह भी सच है कि भारत के पास आर्थिक विकास की दिशा में आगे बढ़ने के लिए एक बेहतर अवसर है। पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्थाआंें में जब गिरावट का दौर है तो भारत उम्मीद की एक नई ऊँचाई पर है। वैश्विक पूँजी बाजार को भारत में बेहतर लाभ मिलने की अपेक्षा है। कुछ सुधारों के साथ भारत अपनी नीतियों में बदलाव की घोषाणाएं करके व्यावसायिक सुशासन को दिशा दे सकता है। विशेषकर कर ढ़ाचे में सुधार और अनुपयुक्त नीतियों का त्याग करके। यह कदम वित्तीय पूँजी के लिहाज से आवश्यक है। वर्तमान में निजी क्षेत्र और सार्वजनिक क्षेत्रों की बैंकिंग स्थिति खराब है और यह भारी एनपीए यानी गैर-निष्पादन सम्पत्ति के बोझ तले दबी हुई है। वास्तविकता यही है कि भारत का राजकोषीय संसाधन वृहद तौर पर कमजोर बुनियादी ढ़ाचे को इस रूप में सहारा देने के लिए अपर्याप्त है कि उच्च जीडीपी विकास दर का लक्ष्य हासिल किया जा सके और विशाल युवा आबादी के लिए देश को समृद्धि-सम्पन्नता की भूमि में बदला जा सके। इस क्रम मेें देश का नया मतदाता वर्ग क्षेत्रवाद अथवा सामाजिक इंजीनियरिंग से बहुत कम प्रभावित है। आज का आकांक्षी भारत इन बातों को अच्छे से समझता और जानता है कि नियंत्रित अर्थव्यवस्था उसके लिए बेहतर नहीं है।
उदारीकरण, वैश्वीकरण और आधुनिकीकरण के माध्यम से दुनिया में आर्थिक बेहतरी की खबरों को मीडिया ने बखूबी पेश किया है। देश का युवा चाहता है कि हमारी जीडीपी का विकास इस स्तर पर हो कि उसकी आर्थिक सम्भावनाओं में इजाफा हो और लोगों की जीवन दशा अच्छी हो सके। यह भी सच्चाई है कि सामाजिक असंतोष और असमानता के कारण देश में नक्सल प्रभावित क्षेत्रों का विस्तार हुआ है। राजनीतिक व्यवस्था की प्रासंगिकता का परीक्षण समाज की मौजूदा आकांक्षाओं को पूरा करने के लिए उसकी दृढ़ता से ही हो सकेगा। क्रियान्वन में देरी राजनीतिक व्यवस्था को भी प्रभावित करेगी। मौजूदा समय में भारत बदलाव के दौर में है। प्रार्थना करें और उम्मीद रखें कि समावेशी आर्थिक विकास में विफलता और सामाजिक असंतोष की आग हमारे लोकतांत्रिक ढांचे के लिए खतरा नहीं बने। ु
- (लेखक सेबी और एलआइसी के पूर्व अध्यक्ष है।)
विद्या और शिक्षा में अन्तर - हरिबाबू द्विवेदी
विद्या से मिलती विनम्रता,
शिक्षा घमण्ड की जननी है।
विद्या देती है संस्कार,
शिक्षा पथ भ्रष्ट कराती है।
शिक्षा के द्वारा मिली हमें,
जग की चिकनी चुपड़ी बातें।
जिसके कारण हम फिसल गए,
अपना ली पश्चिम की थाती।
उस थाती को ही किरण समझ,
हम आगे बढ़ते चले गए।
रख दिया रेहन निज संस्कृति को,
मानवता सारी भूल गए।
जो पाठ पढ़ा था बचपन में,
आदर्श राम का रख करके।
धीरे-धीरे सब भूल गए,
आदर्श सभी निज संस्कृति के।
जिसके कारण पथ भ्रष्ट हुए,
मानवता नष्ट-भ्रष्ट कर दी।
चीत्कार उठी धरती माता,
निज संस्कृति तहस-नहस कर दी।
क्या अब भी तुम को होश नहीं,
निज गौरव का भी ध्यान नहीं।
देखो हम कैसे चलते थे,
क्या अब वह मेरी चाल नहीं।
देखो अतीत को मनन करो,
उर में शक्ति संवरण करो।
चल पड़ो पवन सुत के समान,
निज संस्कृति का अनुसरण करो।
पावन बेला वह आयेगी,
फिर मंजिल भी मिल जायेगी।
प्रकृति भी हँस हँस कर अपना,
तुमको सर्वस्व लुटायेगी।
मानव मानव बन जायेगा,
विद्या का पाकर अमरदान।
भारत फिर से सिर मौर बने,
ऐ ही है मेरा लक्ष्य महान। ु
शिक्षा घमण्ड की जननी है।
विद्या देती है संस्कार,
शिक्षा पथ भ्रष्ट कराती है।
शिक्षा के द्वारा मिली हमें,
जग की चिकनी चुपड़ी बातें।
जिसके कारण हम फिसल गए,
अपना ली पश्चिम की थाती।
उस थाती को ही किरण समझ,
हम आगे बढ़ते चले गए।
रख दिया रेहन निज संस्कृति को,
मानवता सारी भूल गए।
जो पाठ पढ़ा था बचपन में,
आदर्श राम का रख करके।
धीरे-धीरे सब भूल गए,
आदर्श सभी निज संस्कृति के।
जिसके कारण पथ भ्रष्ट हुए,
मानवता नष्ट-भ्रष्ट कर दी।
चीत्कार उठी धरती माता,
निज संस्कृति तहस-नहस कर दी।
क्या अब भी तुम को होश नहीं,
निज गौरव का भी ध्यान नहीं।
देखो हम कैसे चलते थे,
क्या अब वह मेरी चाल नहीं।
देखो अतीत को मनन करो,
उर में शक्ति संवरण करो।
चल पड़ो पवन सुत के समान,
निज संस्कृति का अनुसरण करो।
पावन बेला वह आयेगी,
फिर मंजिल भी मिल जायेगी।
प्रकृति भी हँस हँस कर अपना,
तुमको सर्वस्व लुटायेगी।
मानव मानव बन जायेगा,
विद्या का पाकर अमरदान।
भारत फिर से सिर मौर बने,
ऐ ही है मेरा लक्ष्य महान। ु
कर्तव्य से बनता है देश - आचार्य शिवेन्द्र नागर
अमेरिका में भूतपूर्व राष्ट्रपति जे॰एफ॰ कैनेडी ने कहा था - ‘यह मत सोचो कि देश आपको क्या देता है, बल्कि यह सोचो कि देश को आपने क्या दिया है......’। बात स्लोगनों की नहीं है, बात नारों की नहीं है, बात विचार की है। विचार यह है कि क्या मै देश के सामने याचक बन कर आता हूँ या देश के लिए कुछ करने की इच्छा से जीता हूँ?
आमतौर पर लोग देश से अपेक्षाएं रखते है, स्वतंत्रता से अपेक्षाएं रखते है, लेकिन खुद से कोई अपेक्षा नहीं रखते। यह जानते हुए भी कि हमसे ही बनता है देश। हम हमेशा शिकायत करते रहते है कि स्वतंत्रता के इतने सालों बाद हमें यह नहीं मिला, हमें वह नहीं मिला, लेकिन हम यह नहीं देखते कि हमने देश को क्या दिया। यदि उन लोगों की बात को सही भी मान लें कि देश गर्त में जा रहा है, तो क्या उसके जिम्मेदार हम नहीं है? हम देश के लिए कुछ नहीं करते, उसकी आर्थिक, सांस्कृतिक समृद्धि में कोई योगदान नहीं करते और देश से अपेक्षा करते है कि वह हमारे लिए करे। हमसे ही देश बनता है। हमारे कार्यों से ही वह प्रगति के रास्ते पर जाएगा।
स्वतंत्रता दिवस के समय जरूर हम लोगों में देश के प्रति देशभक्ति उजागर होने लगती है। रेडियों, टेलीविजन में देशभक्ति के गाने हमें कुछ समय के लिए अपने कर्तव्यों के लिए प्रोत्साहित करते हैं। परन्तु कुछ समय बाद हमारा मन भी कुछ और चीजों में उलझ जाता है।
दरअसल, व्यक्ति पाँच स्तरों पर जीता है। आर्थिक, शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक तथा आध्यात्मिक स्तरोें पर। हर स्तर में देश की एक प्रमुख भूमिका होती है। हम सब पर देश का उधार है। देश ने हमारी झोली में इतना कुछ दिया है, फिर भी हम देश के सामने भीख का कटोरा लेकर खड़े रहते हैं। अंग्रेजी में एक कहावत है, जैसा आप सोचते है, वैसे ही हो जाएंगे अर्थात् आपकी सोच ही आपको बनाती है। अपने आसपास देखिए। अधिकतर लोग आपको याचक बने नजर आएंगे। माँ-बाप बच्चों के सामने बैठे हैं कि मेरी झोली में सम्मान डाल दो। कर्मचारी मालिक के सामने याचक बना बैठा है कि मुझे प्रमोशन दे दो। मालिक सरकार के सामने याचक बना बैठा है कि हमें टैक्स में छूट दे दो।
हमें सोच को व्यापक बनाना चाहिए। छोटा सोचेंगे तो हम छोटे ही रह जाएंगे। हमारे मन में देने का भाव हो न कि लेने का। देश को जब हम देते है, उसी का प्रतिफल देश हमें देता है, इसे याद रखें। जैसे ही हमारे अन्दर देने का भाव पैदा होता है, अपने आप हम दाता के रूप में स्थापित हो जाते है, वहीं जब मन में लेने का भाव होता है, तो हम याचक बन जाते है। स्वामी रामतीर्थ जी ने एक नियम बताया था, ‘द वे टु गेन एनीथिंग इज टू लूज इट’ अर्थात् कोई भी चींज प्राप्त करना चाहते हो तो उसको देना शुरू कर दो। यदि आप ज्ञान चाहते हो, तो आप ज्ञान देना शुरू कर दो। जितना ज्ञान आप लोगों को दोगे, उतना आपका ज्ञान बढ़ेगा। यदि आप चाहते है कि आपको सम्मान मिले तो अन्य लोगों को सम्मान देना शुरू कर दीजिए। यदि आप सेवा चाहते हैं तो दूसरों की सेवा शुरू कर दीजिए।
परिवार, समाज और ईश्वर तक तो यह बात हमें शायद समझ में आ जाए, परन्तु जब देश की बात होती है तो हम सब लोगों में अधिकतर लूटने, हड़पने, छीननेे का विचार आ जाता है। हम अपने काम से दूसरे शहर जाते हंै, तो एक-एक पैसा संभाल कर खर्च करते हंै, परन्तु कभी सरकारी खर्च पर कहीं जाने का अवसर मिल गया, तो अनाप-शनाप खर्च करने लगते हंै। आमतौर पर लोग कहते हैं, ‘सब चोरी करते हैं तो हम क्यों न करें’। यह तो वही बात हुई कि, सब कुएँ में कूद रहे हैं तो हम क्यों न कूदें।
यह मानकर चलें कि ईश्वर परमपिता है, यानी वह सबका पिता है। कोई भी पिता नहीं चाहता कि उसके पुत्र लोगों से याचना करें। हम सब ‘अमृतस्य पुत्रम’ हैं। सारे संसार के सामने याचक बने भीख का कटोरा लिए बैठे हैं। ईश्वर सोचते होंगे, ‘मैंने मनुष्य को कर्तव्य करनेे के लिए बनाया था और यह तो याचक बन गया।’
कर्तव्य का भाव किसी अवसर का मोहताज नहीं होता, यह हमारे भीतर का स्थायी भाव होना चाहिए। कर्तव्य का मतलब देश से अपेक्षा करना नहीं, बल्कि देश के लिए कुछ करने की प्रवृत्ति पैदा होना है।
विकास की अनजान दौड़ - गिरीश्वर मिश्र
विकास आधुनिक जीवन का सबसे आकर्षक शब्द बन गया है और इसी के इर्द-गिर्द हर व्यक्ति और देश, सबकी चिंताएं डूब-उतरा रही हैं। यह शब्द सुनते ही हमारे कान खड़े हो जाते हंै और मन में कमी का एक तीखा अहसास पैदा होता है। अविकसित होना असभ्यता की निशानी मानी जाती है और हम विकास की अनजान दौड़ में शामिल होने को व्यग्र और आतुर हो उठते हैं। अपने को अविकसित मानने का अर्थ होता है कि हम जो भी हंै पहले उसे नकारंे, क्योंकि वह न तो श्रेयस्कर है और न पर्याप्त ही। उसके बदले कहीं और पहुँचना है, इसकी पहचान हमें कोई और कराता है। आज मीडिया यह काम कर रहा है और वह बाजार के नजरिए को परोस रहा है। हमारे दृृष्टिपथ पर प्रासंगिक या अप्रासंगिक कुछ भी हो, उसकी प्रस्तुती इतनी सजीव और मनलुभावन होती है कि हर किसी का दिल उस पर आ जाता है। शरीर को सुन्दर दिखने-दिखाने के नुस्खों से लेकर चीजों की खरीद-फरोख्त, व्यापार करने, रुपया कमाने तक की तरकीब बिना पूछे हाजिर रहती है। सुन्दर और आकर्षण विज्ञापनों से हमारी भावनाओं को उभार कर सौदा करने का शास्त्र आज तेजी से आगे बढ़ रहा है और उसकी कोशिशों के चलते हमारी आकांक्षाएं न केवल प्रबल होती जाती हैं, बल्कि उनका वेग भी तीव्र हो जाता है। हम कहाँ हैं? हमारी स्थिति क्या है? और जहाँ हैं वहाँ से आगे कहाँ जाना हैं? इन सबके बीच की दूरी खास तौर पर महत्वपूर्ण हो जाती है, पर मुश्किल यह है कि इनमें कोई भी स्थिर नहीं है। हम जहाँ पहुँचना चाहते हैं वह लक्ष्य भी आगे खिसक जाता है और हम फिर पिछड़ जाते हैं। इस क्रम में अन्तर सदैव बना ही रहता है। दौड़ चलती रहती है। दौड़ तो जीवन में होनी चाहिए पर इस तरह की अंधी, अर्थहीन और अंतहीन दौड़ बेमानी है।
विकास कर अंधी दौड़ में शामिल होने के लिए मुख्य उद्दीपन केवल सामाजिक-आर्थिक विषमता से ही नहीं पैदा होता है, वह बहुत हद तक दूसरों के साथ वांछित-अवांछित, जायज-नाजायज बेमतलब की तुलना से भी उपजता और प्रेरित होता है। पर हम यह अक्सर भूल जाते हैं कि सिर्फ बदलाव ही पर्याप्त नहीं है। हमें उसके आशय और प्रयोजन से बेखबर नहीं रहना चाहिए। हमें यह भी जानना चाहिए कि बदलाव कैसा है, किसलिए है और किसके द्वारा लाया जा रहा है और उसका निहितार्थ क्या है? इससे इन्कार नहीं किया जा सकता कि शिक्षा, व्यापार, स्वास्थ्य और कृषि आदि के क्षेत्रों में विगत दशकों में हुए तमाम आर्थिक परिवर्तनों के पीछे पश्चिम विकास की अवधारणा काम करती है। ऐसा करते हुए यहाँ के समाज की प्रकृति को नहीं समझा गया और हम बहुत कुछ बाहर से लाकर आरोपित करते चले गए। स्वाभाविक जीवन छोड़ और प्रकृति से खिलवाड़ का नतीजा उत्तराखण्ड, किन्नौर, जम्मू-कश्मीर आदि में हम देख रहे हैं। वहाँ विकास की परिणति हमारे अस्तित्व से ही भिड़ गई और उसका विनाशकारी परिणाम सबने महसूस किया।
आज के बदलाव का महानायक टेक्नोलाॅजी ज्ञान है। आज तकनीकि उपाय से कहीं अधिक बढ़कर हमारी स्वामी बनती जा रही है। अब हमारा पूरा का पूरा जीवन ही उस पर निर्भर होने लगा है। जन्म, जीवन, स्वास्थ्य, शिक्षा, व्यापार हर जगह तकनीक निर्णायक होती जा रही है और उसका निर्बाध प्रवेश है। हम अपने को कैसा दिखाना चाहते हैं, क्या करना चाहते है, यह सब उसी पैमाने पर वर्तमान का नकार और स्वयं का अस्वीकार करने में जुट गए हैं। अनुभव खंडित हो रहा है। उसमें सातत्य या निरन्तरता के स्थान पर विच्छिन्नता का ही बोलबाला है। ऊँची तकनीक से हम अब नए तरह के जहरीले कूड़े-कचरे का अकूत उत्पादन कर रहे हैं। कठिनाई यह भी है कि इसमें बहुत सा कूड़ा इस तरह का है जो असमाप्य है। वह बायोडिग्रेडेबल नहीं है। यह कूड़ा संभाले नहीं संभल रहा है। नाभिकीय कचरा तो ऐसा होता है कि वह कभी समाप्त ही नहीं होगा और उसकी सदैव रक्षा करनी होगी ताकि, उससे मनुष्य का सम्पर्क न हो।
विकास की भेंट, तकनीक आज हमें निरन्तर प्रकृति से दूर करती जा रही है। हम बड़े ही कृत्रिम पर्यावरण में सांस लेने को मजबूर हो रहे हैं। अब हमें खाद्य पदार्थ भी प्राकृतिक नहीं मिलते। आर्गेनिक खाद्य महंगा होता है। साग-सब्जी में क्या मिला रहता है इसका पता नहीं। दूध, दवा, खाद्य पदार्थ सबमें मिलावट आज लाभ के व्यापार का अप्रतिम उपहार है। मिलावट लाभ कमाने और कम लागत से ज्यादा धनार्जन करने के लिए ही की जाती है। ऐसा करते हुए हम अपनी जान का भी ख्याल नहीं करते। पुरानी दवा, मिलावटी नकली रक्त, नकली शराब के चलतेे जानंे कितनी जानें नियमित रूप से जा रही हैं। विकास के फलस्वरूप पर्यावरण का प्रदूषण बढ़ता ही जा रहा है। आज वायु और जल जैसे जीवनदायी तत्वों की गुणवत्ता में तेजी से गिरावट आ रही है। राजधानी दिल्ली सबसे प्रदूषित नगर बन गया है। उद्योग विकसित हो रहे शहरों के कारण दिन-प्रतिदिन नदियाँ प्रदूषित होती जा रही हैं और उनका जल जहरीला हो रहा है। विकास की हमारी अवधारणा में गुणवत्ता पर कम और वृद्धि या ग्रोथ पर ज्यादा जोर दिया जा रहा है, जबकि अपने मूल अर्थ में विकास गुणात्मक परिवर्तन को ही बताता है। विकास ने हमारी जरूरतें बढ़ाई और हमें मात्र उपभोक्ता या कंज्यूमर बना कर छोड़ा है।
विकास ने गलाकाट प्रतिस्पर्धा को तरजीह दी उसके चलते हर तरफ नैतिक मूल्यों का ह्रास हो रहा है। आज विकास की अंधी दौड़ एकागी मनुष्यता का सृजन कर रही है। इस तरह का विकास अपर्याप्त ही नहीं असंगत भी है। विकास को सर्वसमावेशी बनाना होगा और पर्यावरण ह्रास पर लगाम लगानी होगी। विकास का लक्ष्य प्रकृति के साथ-साथ रहना सीखना होेगा। सामंजस्य स्थापित करना उसके ऊपर नियंत्रण नहीं, प्रकृति का विरोध और विजय की आकांक्षा नहीं उससे विनम्रता से पाने का उपाय ही लाभकर होगा। ु
- (लेखक महात्मा गाँधी हिन्दी विश्वविद्यालय, वर्धा के कुलपति है।)
समग्र विकास के रोड़े और उनके सम्भावित समाधान - डा॰ वेद प्रकाश त्रिपाठी
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| डा० वेद प्रकाश त्रिपाठी |
किसी देश में जब कोई बहुत बड़ी सकारात्मक क्रान्ति होती है, जब सत्ता-शासन में कोई बहुत बड़ा उलट-फेर होता है या व्यापक सुधारों का कोई आवेग आता है, जिससे देश में वांक्षित दिशा में समग्र विकास का लाभ मिलता है, सामान्यतः नागरिक उसके प्रति उत्साहित होते हैं तथा नवीन सुधारों हेतु सहयोग प्रदान करने के लिए आतुर रहते हैं, उस हेतु त्याग करते हैं और बदले में उसके फल प्राप्त करने हेतु प्रतीक्षा भी करते हैं। किन्तु यह प्रतीक्षा अनवरत तो नहीं हो सकती है। एक लम्बे समय में यदि राजसत्ता समग्र विकास के लक्ष्यों को प्राप्त करती हुई नागरिकों के जीवन की गुणवत्ता में आवश्यक उन्नयन करने में असफल रहती है तो बेचैनी, नैराश्य और प्रतिक्रियावश विघटनकारी मनोवृŸिायों के आवेग उन्हीं जनता के बीच क्रमशः जड़ जमाने लगते हैं, जो पजातन्त्र के लिए अभिशाप बन जाते हैं। परन्तु अपनी तमाम कमी-बेसियों के बावजूद भी भारत में राजनीतिक स्थिरता है तथा लोकतान्त्रिक व्यवस्था कायम है, और विकास की ओर बढ़ रही है।
गत 68 वर्षो में क्या-क्या और कितना-कितना हो जाना चाहिए था तथा इसके साथ ही यह प्रश्न भी जुड़ा है क्या जितना होना आवश्यक था और हो जाना चाहिए था, वह क्यों नहीं हुआ और क्या उतना सम्भव होने के लिये पर्याप्त साधन और सम्भावनाएँ थीं? विचारणीय है और अग्रिम शीर्षकों में इन्हीं कुछ बिन्दुओं पर विचार किया गया है।
1. जनसहभागिता और जन सहयोग - स्वतन्त्रता के तुरन्त बाद तथा विशेष रूप से सरदार बल्लभ भाई पटेल के अवसान के बाद भारत में समाजवाद का नारा बड़े ही जोर-शोर से बुलन्द होने लगा। वर्ष 1953 में जवाहरलाल नेहरू ने अवाड़ी में कांग्रेस पार्टी के अधिवेशन में देश में ‘समाजवादी ढंग के समाज’ गढने की संकल्पना को घोषित किया। इसके पश्चात् देश में नियोजन की प्रकिृया सोवियत संघ की भाँति बेहद केन्द्रीकृत हो गयीं। ऐसी केन्द्रीकृत व्यवस्थाओं से सामान्य नागरिक और स्थानीय इकाईयाँ तो दूर, देश के विभिन्न राज्यों और मुख्यमंत्रियों तक की भागीदारी लगभग नकार दी गयी। इस स्थिति ने देश में एक ऐसे वातावरण का सृजन कर दिया, जिससे लगे कि जैसे जो कुछ भी विकास होगा वह ऊपर से आयेगा। इस स्थिति ने आम नागरिक को बेपरवाह, गैर जिम्मेदार और बेहद परजीवी बना दिया। आम नागरिक हर छोटे से छोटे विषय में सरकार का मुँह ताकने लगे अन्यथा हाथ पर हाथ धरे बैठे रहने के आदी होने लगे। यह स्थिति वस्तुतः बहुत बुरी थी।
यह प्रसन्नता का विषय है कि वर्तमान सरकार ने इस बीमारी को और सर्वोच्च स्तर से सुधार की शुरूआत कर दी है।
2. कर्तव्यों से अधिक अधिकारों पर बल - देश की स्वतन्त्रता के पश्चात् तथा विशेष रूप से विगत दो-तीन दशकों से मानवाधिकारों की बातें बड़े ही जोर-शोर से उठ रहीं हैं। इससे देश का भला कम और बुरा अधिक होता है। वस्तुतः मानवाधिकार का कोई भी मुद्दा अलग-थलग रूप से नहीं देखा जा सकता है। उसे उसके सम्पूर्ण परिप्रेक्ष्य में समग्रता के साथ देखा जाना अति-आवश्यक है और एक अच्छे नागरिक की भाँति हमें राष्ट्र और समाज के प्रति अपने कर्तव्य का बोध होना चाहिए?
जब केबल अधिकारों की बात होती है तो प्रत्येक व्यक्ति या समूह की माँग का दायरा बढ़ता जाता है और वह दूसरे व्यक्ति या समूहों से टकराता और उनकी सीमा में अतिक्रमण करता है। इसके विपरीत जहाँ व्यक्ति या समूह में कर्तव्य की भावना बलवती होती है, वहाँ किसी की सीमा में अतिक्रमण या टकराव का प्रश्न ही नहीं होता है। वहाँ तो प्रेम, सद्भाव, सौहार्द और साथ ही अधिकारों का संरक्षण स्वयमेव ही हो जाता है।
3. समाज में समरसता के स्थान पर श्रेणीकरण और विभाजन - स्वतन्त्रता के पश्चात् समाज को व्यवहारिक रूप से, अधिकांश स्थितियों में बांटकर अथवा श्रेणीगत तरीके से देखने की प्रवृत्ति बढ़ी है। इसमे ग्रामीण-नगरीय, महिला-पुरूष, अल्पसंख्यक-बहुसंख्यक, उत्पादक-मजदूर, व्यापारी ग्राहक आदि को अलग-अलग वर्गों में इस प्रकार प्रदर्शित किया जाता रहा है, जैसे उन सबके हित परस्पर विराधी हों। यह उचित नहीं है।
4. स्थानीय स्वशासन व्यवस्था की दिशाहीनता - स्थानीय स्वशासी संस्थाओं का सृजन तथा 73वें और 74वें संविधान सशोधन के माध्यम से उनका सशक्तीकरण निश्चित ही एक स्वागत योग्य कदम था। किन्तु इन संस्थाओं के माध्यम से जिस प्रकार की जनसहभागिता, धरातलीय स्तर पर स्थानिक आवश्यकताओं के अनुरूप नियोजन, स्थानिक संसाधनों का विकास, स्थानीय स्तर पर समस्याओं का तात्कालिक निराकरण, सामाजिक सौहाद्र, स्थानीय संस्कृति तथा धरोहर संरक्षण आदि प्रकार की जो अपेक्षाएं की गयीं थीं, वे या तो बिल्कुल पूरी न हो सकीं या केवल आंशिक रूप से पूरी हुई। स्थानीय स्वशासी संस्थाएँ, विशेष रूप से ग्रामीण क्षेत्रों में, विकास की वाहक बनने के बजाय या विकास की अनूठी पहल करने वाली संस्थाओं के बजाय, ग्रामीण समाज में एक नयी रणस्थली बनती जा रही हैं। अतः इस व्यवस्था पर एक नये सिरे से चिन्तन करके इसे परिमार्जित किया जाये तथा इस हेतु इन स्थानीय संस्थाओं के जनप्रतिनिधियों को प्रशिक्षण, प्रोत्साहन, प्रेरणा और पुरस्कार की एक कार्यनीति तैयार करनी होगी और साथ ही उनको निर्वाचित करने वाली जनता को भी उन प्रतिनिधियों पर दबाव बनाये रखने के लिये जागरूक करना होगा।
5. न्याय प्रक्रिया में गुणात्मक बदलाव की आवश्यकता - स्वतन्त्रता के पश्चात् से यह समस्या निरन्तर बढती ही जा रही है। त्वरित एवं उचित न्याय निरन्तर दूर होता जा रहा है। न्याय प्रक्रिया में इतना विलम्ब होता है कि न्याय मिलना न मिलने के बराबर हो जाता है। यद्यपि कहा तो यह जाता है कि ‘जस्टिस डिलेड इज जस्टिस डिनायड’, लेकिन इस दिशा में कोई प्रभावशाली कदम नहीं उठाये जाते हैं।
देश में लाखों परिवार ऐसे हैं जिनकी एक से अधिक पीढ़ी मुकदमों में ही खप गयी। लाखों की संख्या में ऐसे मुकदमें हैं, जिन्हें चलते-चलते 50 वर्ष यानी आधी शताब्दी बीत गयी है तथा उनमें से बहुत बड़ी संख्या ऐसी है जिन्हें चलते एक शताब्दी बीत चुकी है।
उपरोक्त तथ्यों के आलोक में यह स्वय सिद्ध है कि देश की न्याय व्यवस्था को सुदृढ़, संवेदनशील और त्वरित बनाना बहुत आवश्यक है।
6. प्रशासनिक व्यवस्था को चुस्त, जवाबदेह और संवेदनशील बनाने की आवश्यकता - देश की प्रशासनिक व्यवस्था के माध्यम से ही देश में विभिन्न नीतियों और कार्यक्रमों को लागू किया जाता है तथा सम्बन्धित नीतियों या कार्यक्रमों की सफलता और असफलता अति प्रमुख रूप से इसी प्रशासनिक मशीनरी के सहयोग और व्यवहार पर निर्भर करती है।
अतः इस सम्बन्ध में सुधार हेतु अति सघन और कठोर उपाय शीघ्र लागू किये जाने की आवश्यकता है।
7. स्वास्थ्य सुविधाओं को विस्तारित करने तथा उनमें गुणात्मक सुधार की आवश्यकता - इस हेतु व्यवस्थाओं में सुधार के साथ सामान्य जनता में स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता पैदा करना आवश्यक है। यह प्र्रसन्नता की बात है कि पिछले कुछ समय से बाबा रामदेव तथा विभिन्न योग गुरूओं ने लोगों को स्वास्थ्य के प्रति क्रान्तिकारी रूप से जागरूक बनाया है। अब लोगों की समझ में आने लगा है कि उचित दिनचर्या, उचित खानपान, व्यायाम, प्राकृतिक तथा आयुर्वेदिक चिकित्सा आदि से अच्छा स्वास्थ्य और दीर्घायु सुनिश्चित की जा सकती है तथा तमाम चिकित्सकीय खर्चो से बचा जा सकता है। इस सन्दर्भ में यह भी ध्यान रखना होगा कि जनता को निरोग रखना या रोगमुक्त करना केवल उन व्यक्तियों को कष्ट मुक्त करना ही नहीं है जो उनसे ग्रस्त हैं, बल्कि उसका सीधा और घनिष्ठ सम्बन्ध एक परिवार की उत्पादकता और विकास में उसके योगदान से भी प्रत्यक्ष रूप से जुड़ा है। अतः इस मद में जो भी व्यय किया जाता है उसे केवल कल्याणकारी व्यय के रूप में न देखकर विकास प्रक्रिया में निवेश के रूप में देखना चाहिए।
8. शिक्षा व्यवस्था में गुणात्मक सुधार की आवश्यकता - यह कड़वा सच है कि, वर्तमान समय में विश्व के प्रत्येक तीन में से लगभग दो निरक्षर भारतीय हैं। आज डिग्री तो हैं लेकिन उन डिग्र्री धारियों में उत्पादकता, कार्य कुशलता, आवश्यक योग्यता का नितान्त अभाव है।
शिक्षा का एकमात्र उद्देश्य केवल नौकरी पाना नहीं, बल्कि विद्यार्थियों को उच्च कोटीय संस्कारों, श्रेष्ठ मानवीय गुणों से युक्त नागरिक बना सके। जो उन्हें समाज के प्रति गहन रूप से संवेदनशील बना सके और जिससे वे समाज और राष्ट्र के प्रति समर्पित निष्ठावान और कर्तव्य परायण नागरिक बन सकें।
9. आपदा-प्रबन्धन - ‘आपदा’ एक प्रकार से एक ऐसी घटना होती है जो बड़े ही अचानक भी आ सकती है। अतः आपदा के प्रबन्धन के सम्बन्ध में जो सबसे आवश्यक कदम है, वह है-आपदाओं के प्रति व्यापक जागरूकता अभियान चलाना। आपदा प्रबन्धन का एक उज्जवल पक्ष यह भी है कि मात्र जागरूकता से ही विभिन्न आपदाओं से एक बहुत बड़ी सीमा तक बचा जा सकता है।
उपरोक्त नौ बिन्दुओं में अधिकांश का सम्बन्ध सामान्य जनता की क्षमता-वृद्धि या उनके सशक्तीकरण से है, अतः इस दिशा में उचित ध्यान देना आवश्यक है। ु
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