This is default featured slide 1 title

Go to Blogger edit html and find these sentences.Now replace these sentences with your own descriptions.

This is default featured slide 2 title

Go to Blogger edit html and find these sentences.Now replace these sentences with your own descriptions.

This is default featured slide 3 title

Go to Blogger edit html and find these sentences.Now replace these sentences with your own descriptions.

This is default featured slide 4 title

Go to Blogger edit html and find these sentences.Now replace these sentences with your own descriptions.

This is default featured slide 5 title

Go to Blogger edit html and find these sentences.Now replace these sentences with your own descriptions.

Friday, May 29, 2015

विकास की अनजान दौड़ - गिरीश्वर मिश्र

विकास आधुनिक जीवन का सबसे आकर्षक शब्द बन गया है और इसी के इर्द-गिर्द हर व्यक्ति और देश, सबकी चिंताएं डूब-उतरा रही हैं। यह शब्द सुनते ही हमारे कान खड़े हो जाते हंै और मन में कमी का एक तीखा अहसास पैदा होता है। अविकसित होना असभ्यता की निशानी मानी जाती है और हम विकास की अनजान दौड़ में शामिल होने को व्यग्र और आतुर हो उठते हैं। अपने को अविकसित मानने का अर्थ होता है कि हम जो भी हंै पहले उसे नकारंे, क्योंकि वह न तो श्रेयस्कर है और न पर्याप्त ही। उसके बदले कहीं और पहुँचना है,  इसकी पहचान हमें कोई और कराता है। आज मीडिया यह काम कर रहा है और वह बाजार के नजरिए को परोस रहा है। हमारे दृृष्टिपथ पर प्रासंगिक या अप्रासंगिक कुछ भी हो, उसकी प्रस्तुती इतनी सजीव और मनलुभावन होती है कि हर किसी का दिल उस पर आ जाता है। शरीर को सुन्दर दिखने-दिखाने के नुस्खों से लेकर चीजों की खरीद-फरोख्त, व्यापार करने, रुपया कमाने तक की तरकीब बिना पूछे हाजिर रहती है। सुन्दर और आकर्षण विज्ञापनों से हमारी भावनाओं को उभार कर सौदा करने का शास्त्र आज तेजी से आगे बढ़ रहा है और उसकी कोशिशों के चलते हमारी आकांक्षाएं न केवल प्रबल होती जाती हैं, बल्कि उनका वेग भी तीव्र हो जाता है। हम कहाँ हैं? हमारी स्थिति क्या है? और जहाँ हैं वहाँ से आगे कहाँ जाना हैं? इन सबके बीच की दूरी खास तौर पर महत्वपूर्ण हो जाती है, पर मुश्किल यह है कि इनमें कोई भी स्थिर नहीं है। हम जहाँ पहुँचना चाहते हैं वह लक्ष्य भी आगे खिसक जाता है और हम फिर पिछड़ जाते हैं। इस क्रम में अन्तर सदैव बना ही रहता है। दौड़ चलती रहती है। दौड़ तो जीवन में होनी चाहिए पर इस तरह की अंधी, अर्थहीन और अंतहीन दौड़ बेमानी है।
विकास कर अंधी दौड़ में शामिल होने के लिए मुख्य उद्दीपन केवल सामाजिक-आर्थिक विषमता से ही नहीं पैदा होता है, वह बहुत हद तक दूसरों के साथ वांछित-अवांछित, जायज-नाजायज बेमतलब की तुलना से भी उपजता और प्रेरित होता है। पर हम यह अक्सर भूल जाते हैं कि सिर्फ बदलाव ही पर्याप्त नहीं है। हमें उसके आशय और प्रयोजन से बेखबर नहीं रहना चाहिए। हमें यह भी जानना चाहिए कि बदलाव कैसा है, किसलिए है और किसके द्वारा लाया जा रहा है और उसका निहितार्थ क्या है? इससे इन्कार नहीं किया जा सकता कि शिक्षा, व्यापार, स्वास्थ्य और कृषि आदि के क्षेत्रों में विगत दशकों में हुए तमाम आर्थिक परिवर्तनों के पीछे पश्चिम विकास की अवधारणा काम करती है। ऐसा करते हुए यहाँ के समाज की प्रकृति को नहीं समझा गया और हम बहुत कुछ बाहर से लाकर आरोपित करते चले गए। स्वाभाविक जीवन छोड़ और प्रकृति से खिलवाड़ का नतीजा उत्तराखण्ड, किन्नौर, जम्मू-कश्मीर आदि में हम देख रहे हैं। वहाँ विकास की परिणति हमारे अस्तित्व से ही भिड़ गई और उसका विनाशकारी परिणाम सबने महसूस किया।
आज के बदलाव का महानायक टेक्नोलाॅजी ज्ञान है। आज तकनीकि उपाय से कहीं अधिक बढ़कर हमारी स्वामी बनती जा रही है। अब हमारा पूरा का पूरा जीवन ही उस पर निर्भर होने लगा है। जन्म, जीवन, स्वास्थ्य, शिक्षा, व्यापार हर जगह तकनीक निर्णायक होती जा रही है और उसका निर्बाध प्रवेश है। हम अपने को कैसा दिखाना चाहते हैं, क्या करना चाहते है, यह सब उसी पैमाने पर वर्तमान का नकार और स्वयं का अस्वीकार करने में जुट गए हैं। अनुभव खंडित हो रहा है। उसमें सातत्य या निरन्तरता के स्थान पर विच्छिन्नता का ही बोलबाला है। ऊँची तकनीक से हम अब नए तरह के जहरीले कूड़े-कचरे का अकूत उत्पादन कर रहे हैं। कठिनाई यह भी है कि इसमें बहुत सा कूड़ा इस तरह का है जो असमाप्य है। वह बायोडिग्रेडेबल नहीं है। यह कूड़ा संभाले नहीं संभल रहा है। नाभिकीय कचरा तो ऐसा होता है कि वह कभी समाप्त ही नहीं होगा और उसकी सदैव रक्षा करनी होगी ताकि, उससे मनुष्य का सम्पर्क न हो।
विकास की भेंट, तकनीक आज हमें निरन्तर प्रकृति से दूर करती जा रही है। हम बड़े ही कृत्रिम पर्यावरण में सांस लेने को मजबूर हो रहे हैं। अब हमें खाद्य पदार्थ भी प्राकृतिक नहीं मिलते। आर्गेनिक खाद्य महंगा होता है। साग-सब्जी में क्या मिला रहता है इसका पता नहीं। दूध, दवा, खाद्य पदार्थ सबमें मिलावट आज लाभ के व्यापार का अप्रतिम उपहार है। मिलावट लाभ कमाने और कम लागत से ज्यादा धनार्जन करने के लिए ही की जाती है। ऐसा करते हुए हम अपनी जान का भी ख्याल नहीं करते। पुरानी दवा, मिलावटी नकली रक्त, नकली शराब के चलतेे जानंे कितनी जानें नियमित रूप से जा रही हैं। विकास के फलस्वरूप पर्यावरण का प्रदूषण बढ़ता ही जा रहा है। आज वायु और जल जैसे जीवनदायी तत्वों  की गुणवत्ता में तेजी से गिरावट आ रही है। राजधानी दिल्ली सबसे प्रदूषित नगर बन गया है। उद्योग विकसित हो रहे शहरों के कारण दिन-प्रतिदिन नदियाँ प्रदूषित होती जा रही हैं और उनका जल जहरीला हो रहा है। विकास की हमारी अवधारणा में गुणवत्ता पर कम और वृद्धि या ग्रोथ पर ज्यादा जोर दिया जा रहा है, जबकि अपने मूल अर्थ में विकास गुणात्मक परिवर्तन को ही बताता है। विकास ने हमारी जरूरतें बढ़ाई और हमें मात्र उपभोक्ता या कंज्यूमर बना कर छोड़ा है।
विकास ने गलाकाट प्रतिस्पर्धा को तरजीह दी उसके चलते हर तरफ नैतिक मूल्यों का ह्रास हो रहा है। आज विकास की अंधी दौड़ एकागी मनुष्यता का सृजन कर रही है। इस तरह का विकास अपर्याप्त ही नहीं असंगत भी है। विकास को सर्वसमावेशी बनाना होगा और पर्यावरण ह्रास पर लगाम लगानी होगी। विकास का लक्ष्य प्रकृति के साथ-साथ रहना सीखना होेगा। सामंजस्य स्थापित करना उसके ऊपर नियंत्रण नहीं, प्रकृति का विरोध और विजय की आकांक्षा नहीं उससे विनम्रता से पाने का उपाय ही लाभकर होगा। ु
- (लेखक महात्मा गाँधी हिन्दी विश्वविद्यालय, वर्धा के कुलपति है।)

समग्र विकास के रोड़े और उनके सम्भावित समाधान - डा॰ वेद प्रकाश त्रिपाठी

डा० वेद प्रकाश त्रिपाठी
भारत को स्वतन्त्रता हुए 68 वर्ष हो गए, किसी देश की दृष्टि से यह बहुत लम्बा समय नहीं होता है, तथापि यह कालावधि किसी राष्ट्र की दृष्टि से बहुत छोटी भी नहीं है। इतने लम्बे कालखण्ड में कम से कम दो सक्रिय आयुवर्ग की पीढि़याँ गुजर जाती हैं या गुजरने के कगार पर होती हैं। अतः यह कालावधि किसी भी देश की प्रगति का मूल्यांकन करने हेतु या उस देश में नागरिकों के जीवन की गुणवत्ता में उन्नयन का आकलन करने हेतु पूर्ण रूप से पर्याप्त अवधि है।
किसी देश में जब कोई बहुत बड़ी सकारात्मक क्रान्ति होती है, जब सत्ता-शासन में कोई बहुत बड़ा उलट-फेर होता है या व्यापक सुधारों का कोई आवेग आता है, जिससे देश में वांक्षित दिशा में समग्र विकास का लाभ मिलता है, सामान्यतः नागरिक उसके प्रति उत्साहित होते हैं तथा नवीन सुधारों हेतु सहयोग प्रदान करने के लिए आतुर रहते हैं, उस हेतु त्याग करते हैं और बदले में  उसके फल प्राप्त करने हेतु प्रतीक्षा भी करते हैं। किन्तु यह प्रतीक्षा अनवरत तो नहीं हो सकती है। एक लम्बे समय में यदि राजसत्ता समग्र विकास के लक्ष्यों को प्राप्त करती हुई नागरिकों के जीवन की गुणवत्ता में आवश्यक उन्नयन करने में असफल रहती है तो बेचैनी, नैराश्य और प्रतिक्रियावश विघटनकारी मनोवृŸिायों के आवेग उन्हीं जनता के बीच क्रमशः जड़ जमाने लगते हैं, जो पजातन्त्र के लिए अभिशाप बन जाते हैं।  परन्तु अपनी तमाम कमी-बेसियों के बावजूद भी भारत में राजनीतिक स्थिरता है तथा लोकतान्त्रिक व्यवस्था कायम है, और विकास की ओर बढ़ रही है। 
गत 68 वर्षो में क्या-क्या और कितना-कितना हो जाना चाहिए था तथा इसके साथ ही यह प्रश्न भी जुड़ा है क्या जितना होना आवश्यक था और हो जाना चाहिए था, वह क्यों नहीं हुआ और क्या उतना सम्भव होने के लिये पर्याप्त साधन और सम्भावनाएँ थीं? विचारणीय है और अग्रिम शीर्षकों में इन्हीं कुछ बिन्दुओं पर विचार किया गया है।
1. जनसहभागिता और जन सहयोग - स्वतन्त्रता के तुरन्त बाद तथा विशेष रूप से सरदार बल्लभ भाई पटेल के अवसान के बाद भारत में समाजवाद का नारा बड़े ही जोर-शोर से बुलन्द होने लगा। वर्ष 1953 में जवाहरलाल नेहरू ने अवाड़ी में कांग्रेस पार्टी के अधिवेशन में देश में ‘समाजवादी ढंग के समाज’ गढने की संकल्पना को घोषित किया। इसके पश्चात् देश में नियोजन की प्रकिृया सोवियत संघ की भाँति बेहद केन्द्रीकृत हो गयीं। ऐसी केन्द्रीकृत व्यवस्थाओं से सामान्य नागरिक और स्थानीय इकाईयाँ तो दूर, देश के विभिन्न राज्यों और मुख्यमंत्रियों तक की भागीदारी लगभग नकार दी गयी। इस स्थिति ने देश में एक ऐसे वातावरण का सृजन कर दिया, जिससे लगे कि जैसे जो कुछ भी विकास होगा वह ऊपर से आयेगा। इस स्थिति ने आम नागरिक को बेपरवाह, गैर जिम्मेदार और बेहद परजीवी बना दिया। आम नागरिक हर छोटे से छोटे विषय में सरकार का मुँह ताकने लगे अन्यथा हाथ पर हाथ धरे बैठे रहने के आदी होने लगे। यह स्थिति वस्तुतः बहुत बुरी थी। 
यह प्रसन्नता का विषय है कि वर्तमान सरकार ने इस बीमारी को और सर्वोच्च स्तर से सुधार की शुरूआत कर दी है। 
2. कर्तव्यों से अधिक अधिकारों पर बल - देश की स्वतन्त्रता के पश्चात् तथा विशेष रूप से विगत दो-तीन दशकों से मानवाधिकारों की बातें बड़े ही जोर-शोर से उठ रहीं हैं। इससे देश का भला कम और बुरा अधिक होता है। वस्तुतः मानवाधिकार का कोई भी मुद्दा अलग-थलग रूप से नहीं देखा जा सकता है। उसे उसके सम्पूर्ण परिप्रेक्ष्य में समग्रता के साथ देखा जाना अति-आवश्यक है और एक अच्छे नागरिक की भाँति हमें राष्ट्र और समाज के प्रति अपने कर्तव्य का बोध  होना चाहिए? 
जब केबल अधिकारों की बात होती है तो प्रत्येक व्यक्ति या समूह की माँग का दायरा बढ़ता जाता है और वह दूसरे व्यक्ति या समूहों से टकराता और उनकी सीमा में अतिक्रमण करता है। इसके विपरीत जहाँ व्यक्ति या समूह में कर्तव्य की भावना बलवती होती है, वहाँ किसी की सीमा में अतिक्रमण या टकराव का प्रश्न ही नहीं होता है। वहाँ तो प्रेम, सद्भाव, सौहार्द और साथ ही अधिकारों का संरक्षण स्वयमेव ही हो जाता है।
3. समाज में समरसता के स्थान पर श्रेणीकरण और विभाजन - स्वतन्त्रता के पश्चात् समाज को व्यवहारिक रूप से, अधिकांश स्थितियों में बांटकर अथवा श्रेणीगत तरीके से देखने की प्रवृत्ति बढ़ी है। इसमे ग्रामीण-नगरीय, महिला-पुरूष,  अल्पसंख्यक-बहुसंख्यक, उत्पादक-मजदूर, व्यापारी ग्राहक आदि को अलग-अलग वर्गों में इस प्रकार प्रदर्शित किया जाता रहा है, जैसे उन सबके हित परस्पर विराधी हों। यह उचित नहीं है।
4. स्थानीय स्वशासन व्यवस्था की दिशाहीनता - स्थानीय स्वशासी संस्थाओं का सृजन तथा 73वें और 74वें संविधान सशोधन के माध्यम से उनका सशक्तीकरण निश्चित ही एक स्वागत योग्य कदम था। किन्तु इन संस्थाओं के माध्यम से जिस प्रकार की जनसहभागिता, धरातलीय स्तर पर स्थानिक आवश्यकताओं के अनुरूप नियोजन, स्थानिक संसाधनों का विकास, स्थानीय स्तर पर समस्याओं का तात्कालिक निराकरण, सामाजिक सौहाद्र, स्थानीय संस्कृति तथा धरोहर संरक्षण आदि प्रकार की जो अपेक्षाएं की गयीं थीं, वे या तो बिल्कुल पूरी न हो सकीं या केवल आंशिक रूप से पूरी हुई। स्थानीय स्वशासी संस्थाएँ, विशेष रूप से ग्रामीण क्षेत्रों में, विकास की वाहक बनने के बजाय या विकास की अनूठी पहल करने वाली संस्थाओं के बजाय, ग्रामीण समाज में एक नयी रणस्थली बनती जा रही हैं।  अतः इस व्यवस्था पर एक नये सिरे से चिन्तन करके इसे परिमार्जित किया जाये तथा इस हेतु इन स्थानीय संस्थाओं के जनप्रतिनिधियों को प्रशिक्षण, प्रोत्साहन, प्रेरणा और पुरस्कार की एक कार्यनीति तैयार करनी होगी और साथ ही उनको निर्वाचित करने वाली जनता को भी उन प्रतिनिधियों पर दबाव बनाये रखने के लिये जागरूक करना होगा। 
5. न्याय प्रक्रिया में गुणात्मक बदलाव की आवश्यकता - स्वतन्त्रता के पश्चात् से यह समस्या निरन्तर बढती ही जा रही है। त्वरित एवं उचित न्याय निरन्तर दूर होता जा रहा है। न्याय प्रक्रिया में इतना विलम्ब होता है कि न्याय मिलना न मिलने के बराबर हो जाता है। यद्यपि कहा तो यह जाता है कि ‘जस्टिस डिलेड इज जस्टिस डिनायड’, लेकिन इस दिशा में कोई प्रभावशाली कदम नहीं उठाये जाते हैं।
देश में लाखों परिवार ऐसे हैं जिनकी एक से अधिक पीढ़ी मुकदमों में ही खप गयी। लाखों की संख्या में ऐसे मुकदमें हैं, जिन्हें चलते-चलते 50 वर्ष यानी आधी शताब्दी बीत गयी है तथा उनमें से बहुत बड़ी संख्या ऐसी है जिन्हें चलते एक शताब्दी बीत चुकी है।
उपरोक्त तथ्यों के आलोक में यह स्वय सिद्ध है कि देश की न्याय व्यवस्था को सुदृढ़, संवेदनशील और त्वरित बनाना बहुत आवश्यक है।
6. प्रशासनिक व्यवस्था को चुस्त, जवाबदेह और संवेदनशील बनाने की आवश्यकता - देश की प्रशासनिक व्यवस्था के माध्यम से ही देश में विभिन्न नीतियों और कार्यक्रमों को लागू किया जाता है तथा सम्बन्धित नीतियों या कार्यक्रमों की सफलता और असफलता अति प्रमुख रूप से इसी प्रशासनिक मशीनरी के सहयोग और व्यवहार पर निर्भर करती है।
अतः इस सम्बन्ध में सुधार हेतु अति सघन और कठोर उपाय शीघ्र लागू किये जाने की आवश्यकता है।  
7. स्वास्थ्य सुविधाओं को विस्तारित करने तथा उनमें गुणात्मक सुधार की आवश्यकता - इस हेतु व्यवस्थाओं में सुधार के साथ सामान्य जनता में स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता पैदा करना आवश्यक है।  यह प्र्रसन्नता की बात है कि पिछले कुछ समय से बाबा रामदेव तथा विभिन्न योग गुरूओं ने लोगों को स्वास्थ्य के प्रति क्रान्तिकारी रूप से जागरूक बनाया है। अब लोगों की समझ में आने लगा है कि उचित दिनचर्या, उचित खानपान, व्यायाम, प्राकृतिक तथा आयुर्वेदिक चिकित्सा आदि से अच्छा स्वास्थ्य और दीर्घायु सुनिश्चित की जा सकती है तथा तमाम चिकित्सकीय खर्चो से बचा जा सकता है। इस सन्दर्भ में यह भी ध्यान रखना होगा कि जनता को निरोग रखना या रोगमुक्त करना केवल उन व्यक्तियों को कष्ट मुक्त करना ही नहीं है जो उनसे ग्रस्त हैं, बल्कि उसका सीधा और घनिष्ठ सम्बन्ध एक परिवार की उत्पादकता और विकास में उसके योगदान से भी प्रत्यक्ष रूप से जुड़ा है। अतः इस मद में जो भी व्यय किया जाता है उसे केवल कल्याणकारी व्यय के रूप में न देखकर विकास प्रक्रिया में निवेश के रूप में देखना चाहिए।
8. शिक्षा व्यवस्था में गुणात्मक सुधार की आवश्यकता - यह कड़वा सच है कि, वर्तमान समय में विश्व के प्रत्येक तीन में से लगभग दो निरक्षर भारतीय हैं। आज डिग्री तो हैं लेकिन उन डिग्र्री धारियों में उत्पादकता, कार्य कुशलता, आवश्यक योग्यता का नितान्त अभाव है। 
शिक्षा का एकमात्र उद्देश्य केवल नौकरी पाना नहीं, बल्कि विद्यार्थियों को उच्च कोटीय संस्कारों, श्रेष्ठ मानवीय गुणों से युक्त नागरिक बना सके। जो उन्हें समाज के प्रति गहन रूप से संवेदनशील बना सके और जिससे वे समाज और राष्ट्र के प्रति समर्पित निष्ठावान और कर्तव्य परायण नागरिक बन सकें।
9. आपदा-प्रबन्धन - ‘आपदा’ एक प्रकार से एक ऐसी घटना होती है जो बड़े ही अचानक भी आ सकती है। अतः आपदा के प्रबन्धन के सम्बन्ध में जो सबसे आवश्यक कदम है, वह है-आपदाओं के प्रति व्यापक जागरूकता अभियान चलाना। आपदा प्रबन्धन का एक उज्जवल पक्ष यह भी है कि मात्र जागरूकता से ही विभिन्न आपदाओं से एक बहुत बड़ी सीमा तक बचा जा सकता है।  
 उपरोक्त नौ बिन्दुओं में अधिकांश का सम्बन्ध सामान्य जनता की क्षमता-वृद्धि या उनके सशक्तीकरण से है, अतः इस दिशा में  उचित ध्यान देना आवश्यक है। ु

मानव विकास की समग्र दृष्टि - .डाॅ॰ नवलता

विकास का सामान्य अर्थ है खिलना। अन्तहनिहित शक्तियों का इस प्रकार प्रकट होना, कि उसका विस्तार उपयोगी व सकारात्मक दिशा में हो, विकास कहा जाएगा। विश्व की विकासात्मक अवधारणा का मूलाधार यही विस्तार है। जब किसी वस्तु के विकास की बात की जाती है तो उसमें दो बातें होती हैैं। एक तो वह वस्तु, जो अपने मूल अस्तित्व में स्थिर है, तथा दूसरा उस वस्तु की स्वरूपगत तथा क्रियागत अभिव्यक्ति। दूसरे शब्दों में वस्तु की स्थिति और गति विकास का निर्धारण करती हैं। भारतीय ऋषियों ने सत्य तथा ऋत के रूप में इन दोनों को परिभाषित किया है। समस्त जगत् सत्ता की दृष्टि से सत्य है और गति की दृष्टि से ऋत है। सत्य और ऋत मिलकर ही जगत् को पूर्ण बनाते हैं। किन्तु ध्यातव्य है, कि ऋत स्वच्छन्द गति न होकर एक ऐसी गति है, जो नैतिक तथा उत्कर्षपरक नियमों से नियन्त्रित हो। निरन्तर मानव और मानवता को श्रेष्ठता की ओर ले जाने वाला तत्त्व ऋत है। अतः मूलतः ऋत ही विकास का मूल मन्त्र है।
धर्म और संस्कार इस ऋतमूलक विकास के प्राणतत्त्व है। विशेषतः जब समग्रविकास की चर्चा की जाती है, तो यह अवश्य विचारणीय हो जाता है, कि समग्रता सर्वांग तथा सर्वतोन्मुखी दृष्टि का सूचक है। व्यावहारिक रूप से व्यक्ति और राष्ट्र दोनों का समग्र विकास धर्म और संस्कार के बिना सम्भव नहीं।
यद्यपि ये दोनों शब्द वर्तमान समय में बड़े विवादास्पद हैं। विशेषतः भारत में धर्म और संस्कार दोनों का जो अर्थ आज समझा जाने लगा है, वह न केवल विकास में अवरोधक है, अपितु ह्रास और पतन की ओर ले जाने वाला है। स्पष्ट करना आवश्यक है, कि धर्म का अर्थ सम्प्रदाय विशेष की आचारगत आस्थाओं के आधार पर निश्चित नहीं किया जा सकता। अपितु सभी सम्प्रदाय, सभी वर्ग, समाज व राष्ट्र मूलभूत रूप में जिन मानवीय मूल्यों को मानते हैं, वही धर्म है। मनुस्मृति में धर्म के जो दस लक्षण बतलाए गए हैं, उन पर विचार किया जाय, तो यह बात स्पष्ट हो जाएगी। ये दस लक्षण हैं - धृृति, क्षमा, दम, अस्तेय, शौच, इन्द्रिय निग्रह, धी, विद्या, सत्य तथा अक्रोध।
क्या कोई ऐसा वर्ग या सम्प्रदाय है, जो इन्हें न स्वीकार करता हो? धृति का अर्थ है धारण करना। लोक व्यवहार में धैर्य ही धृति है। कहना न होगा, कि विकास के लिए निश्चित समय अपेक्षित होता है। कोई शिशु जन्म लेते ही बड़ा नहीं हो जाता। इसी प्रकार हम जिस रूप में तथा जिस प्रकार विकास की अपेक्षा करते हैं, उसके लिए कुछ समय आवश्यक है। अतः सही दिशा में प्रयास करते हुए धैर्यपूर्वक अपने लक्ष्य पर केन्द्रित होना ही धृति है, जो समग्रविकास की प्रथम व मूल आवश्यकता है।
दूसरा तत्त्व है क्षमा। इस जगत् में सभी व्यक्ति तथा राष्ट्र विकास चाहते है तथा उसके लिए प्रयास भी करते हैं, किन्तु जो क्षमाशील होता है, वह आगे बढ़ जाता है। अनजाने में अथवा प्रथम बार की गई प्रत्येक त्रुटि के लिए क्षमा करना नीतिसम्मत है। इसी प्रकार कुण्ठाग्रस्त होकर केवल विरोध के लिए विरोध करने वालों को उपेक्षित कर तटस्थ रहना भी क्षमा का ही दूसरा रूप है। वस्तुतः क्षमाशील व्यक्ति विकास की दिशा में इसलिए अग्रसर हो पाता है, क्योंकि वह व्यर्थ के कामों तथा मिथ्या प्रपन्चों में अपनी ऊर्जा नष्ट नहीं करता।
दम का अर्थ है इन्द्रियों को विषयों में आसक्त होने से रोकना। इन्द्रियों का कार्य है विषयों की ओर भागना। किन्तु उन्हें नियन्त्रित कर सही दिशा में लगाकर विकास में सम्भावित अवरोध तथा भटकाव को रोकना महत्वपूर्ण होता है। विकास का चैथा मन्त्र है अस्तेय। स्तेय या चैर्य दो प्रकार का हो सकता है - आन्तरिेक तथा बाह्य। जब हम स्वयं अपने प्रति बेईमानी करते हैं। अपनी प्रकृति का गोपन करते हैं, तो अपनी दिशा का बोध नहीं कर पाते। सच्चे विकास के लिए आवश्यक है, कि व्यक्ति स्वयं अपने स्वभाव (मानवीय गुणों) के प्रति निष्ठावान् रहे। यदि ऐसा हो जाए, तो बाह्य वस्तुओं, विषयों, दूसरों के अधिकारों आदि की चोरी नहीं करंेगे।
शौच मनसा, वाचा, कर्मणा पवित्रता अथवा निष्कलुशता है। यह निष्कलुशता व्यक्ति को खुले आकाश में बिना किसी से भयभीत हुए तथा बिना किसी को भयभीत किये उड़ने का सामथ्र्य प्रदान करती है। पवित्रता भय का नाश करती है और भयरहित वातावरण विकास के लिए सबसे उपयुक्त अवसर प्रदान करती है।
इन्द्रियनिग्रह अनावश्यक विषयों की ओर भागती इन्द्रियों को नियन्त्रित करने का नाम है। इन्द्रियनिग्रह व्यक्ति को लक्ष्य पर केन्द्रित होने में सहायता करता है। धी का अर्थ है बुद्धि, जो विवेक की क्षमता प्रदान करता है। समग्र विकास के लिए जिस सन्तुलन, समायोजन तथा प्रबन्धन की आवश्यकता होती है, वह विवेक के बिना सम्भव नहीं। विद्या जहाँ विषयों का तथ्यात्मक ज्ञान कराती है, वहीं उनके प्रति कर्तव्याकर्तव्य की दृष्टि भी देती है, जिसे जागरूकता कहा जा सकता है। जो व्यक्ति तथा जो राष्ट्र अतीत को स्मरण रखता हुआ उससे सीख लेता है तथा भविष्य के लिए सजग होता है, वह वर्तमान में सही निर्णय लेता है। भर्तृहरि ने नीतिशतक में कहा है, कि विद्या विनय देती है, विनय से पात्रता आती है, पात्रता से धन, धन से धर्म तथा धर्म से सुख प्राप्त होता है।
विनय का तात्पर्य केवल विनम्रता नहीं, अपितु विशेष नय (नीति) का ज्ञान। विषय विशेष के शास्त्र सम्मत अथवा लोकसम्मत ज्ञान से जो योग्यता आती है, वही, धर्मपूर्वक धनार्जन का सुख प्रदान कर सकती है। यह विद्या व्यक्ति को सत्य का ज्ञान कराती है। सत्यनिष्ठ व्यक्ति क्रोध पर नियन्त्रण कर अपने चारों ओर की प्रतिकूल परिंिस्थतियों को जीत लेता है, जबकि अनुकूल परिस्थितियों का लाभ उठाता है।
उक्त प्रकार से धर्म विकास का मूल है, यह स्वीकार करने में संकोच नहीं होना चाहिए। विकास का अत्यन्त महत्वपूर्ण अंग है संस्कार। संस्कार का सामान्य अर्थ है सम्यक् निर्माण। परिभाषित अर्थ में किसी व्यक्ति में किसी विशेष अथवा सामान्य योग्यता का आधान करने की युक्ति संस्कार कहलाती है। जिस प्रकार व्यक्ति के जीवन में समय पर कभी माता-पिता द्वारा तो कभी आचार्य शिक्षकों द्वारा अथवा कभी स्वयं अपनी अन्तर्दृष्टि से उत्तरोत्तर उच्च से उच्चतर अवस्था को प्राप्त करना सम्भव होता है, उसी प्रकार किसी राष्ट्र के विकास में राजनेताओं, जनता के प्रबुद्धवर्ग तथा राष्ट्र का प्रतिनिधित्व करने वाले शीर्ष प्रमुखों के द्वारा निरन्तर विकास के स्वरूप के समग्र विश्लेषण एवं सुधार की अपेक्षा होती है।
उक्त सन्दर्भ में सबको एकजुट होकर राजनीतिक धार्मिक सम्प्रदायगत तथा वैयक्तिक स्वार्थों से ऊपर उठकर विकास की दिशा निर्धारित करनी चाहिए। विशेषतः भारत के परिप्रेक्ष्य में विकास की समग्रता का केन्द्र केवल बाह्य विषय नहीं हैं अपितु आभ्यन्तर विकास भी है।
भारत अध्यात्म प्रधान राष्ट्र है, जिसकी शाशक्त दृष्टि समग्रतावादी रही है। जैसा कि पूर्व प्रसंग में चर्चा की गई, कि धर्म और संस्कार समग्र विकास का मूलमन्त्र हैं। ये शब्द तथा उनके अर्थ स्वयं समग्रता के सूचक हैं।
वर्तमान भारत विकास की जिस वैश्विक यात्रा का पथिक है, उसके मार्ग में सबसे बड़ी बाधा उसकी पारम्परिक समग्रदृष्टि का पीछे छूट जाना है। आज जब सबको साथ लेकर सबके विकास की चर्चा की जाती है, तो समग्र विकास को दृष्टि में रख कर बार-बार समग्रता का स्वरूप स्पष्ट करने की आवश्यकता है। जब तक धर्म तथा संस्कार विकास के आधार में नहीं होंगे समग्रविकास की कल्पना व्यर्थ है। ु

करें समग्र विकास - दयानन्द जडि़या ‘अबोध’


उच्च ज्ञान विज्ञान से, करें समग्र विकास।
विश्व व्योंम पर भानुवत, दिखे देश सोल्लास।।
गली ग्राम गृह नगर सब, होवें विकसित भव्य।
कृषि पशुपालन वणिज से, पायें अतुलित दृव्य।।
नीर नदी निर्मल दिखे, जलचर रहें प्रसन्न।
वृक्ष लताओं से धरा, हो सज्जित सम्पन्न।।
बनें अगर अट्टालिका, तो निर्धन का भी गेह।
शिक्षित हो जन वर्ग सब, पर न घटे उर-स्नेह।।
स्वास्थ्य सुरक्षा हेतु हों, अस्पताल हर ठौर।
दिखे नवल तकनीक से, राष्ट्र-मध्य नव दौर।।
वन में पशु रक्षित रहें, पक्षी करें किलोल।
टेरे पपीहा ‘पिउ कहाँ’, कोकिल कुह-कुह बोल।।
करते रहे अतीत में, हम नव ग्रह की सैर।
शशि मंगल पर फिर धरें, जा यानों के पैर।।
जल, थल, नभ त्रय वाहिनी, बनें सुदृढ़ भरपूर।
नव आयुध अवलोक कर, हों अरि सपने चूर।।
साधन यातायात के, रेल कार, बस, यान।
सुख सुविधा संयुक्त हों, हो न कष्ट अनुमान।।
कल उद्योग स्वदेश में, लाऐं प्रगति-प्रभात।
हों भारत में तीब्रतम, मुद्रा की बरसात।।
ध्यान रहे इस बात का, हो इस भाँति विकास।
कटु विनाश मुख खोल निज, आये स्वल्प न पास।।
हो सब ओर विकास की, आभा प्रादुर्भूत। 
पर ‘अबोध’ गह नीति सद्, बनें शान्ति के दूत।।
सम्पर्क-चन्द्रा मण्डप, 370/27 हाता नूरबेग, संगमलाल वीथिका,
सआदतगंज, लखनऊ-226003

वसुधा का कल्याण न भूलें- कविता

हम विकास के पावन क्षण में,
युग चरित्र निर्माण न भूलें।
स्वार्थ साधना की आँधी में,
वसुधा का कल्याण न भूलें।।

माना कठिन विपरीत राह है,
संघर्षों का पार नहीं है।
किन्तु भूलकर मझधारों में,
विकृत सृजन स्वीकार नहीं है।
जटिल समस्या सुलझाने को,
नूतन अनुसंधान न भूलें।।

शील विनय आदर्श शिष्टता,
तार बिना झंकार नहीं है।
शिक्षा क्या स्वर साध सकेगी,
यदि नैतिक आधार नहीं है।
कीर्ति कौमुदी की गरिमा में,
संस्कृति का उत्थान न भूलें।।

आविष्कारों की कृतियों में,
यदि मानव का प्यार नहीं है।
सृजनहीन विज्ञान व्यर्थ है,
प्राणी का उपकार नहीं है।
भौतिकता के उत्थानों में,
जीवन का उत्थान न भूलें।।

समग्र विकास - विशेषांक, मई 2015

सम्पादकीय -
समग्र विकास एक अन्योनाश्रित सहअस्तित्व के वातावरण को स्वीकार करते हुए प्रत्यक्ष या परोक्ष लगभग समान मात्रा में लेनदेन या क्षतिपूर्ति की सुनिश्चित व्यवस्था के पालन करने से ही सम्भव हो पाता है। सामान्य बोलचाल की भाषा में एक हाथ दे और दूसरे हाथ ले वाली कहावत समग्र विकास के लिए अक्षरशः सत्य होती है। उदाहरण के लिए खेत के लिए आवश्यक पोषक, जल, शुद्ध वायु एव भरपूर प्रकाश की व्यवस्था करनेे पर, उससे हमें भरपूर फसल का उत्पादन उपलब्ध होता है। इस सिद्धान्त के अनुपालन में जाने या अनजाने में की गई भूल, शिथिलता, उपेक्षा, निष्क्रियता या विपरीत कार्य से विपरीत व विनाशकारी प्रभाव उत्पन्न होता है।
ग्लोबल वार्मिंग, भूस्खलन, चक्रवात जैसे प्रकृति के भीषण विनाशकारी परिणाम समाज द्वारा प्रकृति से एक हाथ से नहीं हजारों-हजार हाथों से निरन्तर लेने और बदले में दूसरे हाथ से कुछ भी न लौटाने की दुष्प्रवृŸिा के दुष्परिणाम हैं। वस्तुतः प्रकृति के सभी घटक निम्नलिखित चित्र की भाँति एक-दूसरे से क्रमबद्ध जुड़े हैं। उसके क्रम में कहीं पर भी छेड़छाड़ करने, अवरूद्ध करने, तोड़ने या किसी भी प्रकार की क्रिया करने का प्र्रभाव समग्र पर पड़ता है, क्योंकि प्रकृति टुकड़ों या अलग-अलग घेरों में विभक्त नहीं है। अतः हमारे द्वारा किया गया कोई भी कार्य समग्रता को प्रभावित करेगा। अतएव समग्र विकास का कार्य भी इसी सिद्धान्त के प्रकाश में किया जाना चाहिए।
भारतीय दर्शन में इसीलिए मनुष्य के साथ ही प्रकृति के समस्त घटकों को महत्वपूर्ण स्थान व सबके साथ सहअस्तित्व पूर्ण व्यवहार की व्यवस्था भी की गई थी। जबकि पश्चिमी चिन्तन में सहअस्तित्व के स्थान पर मनुष्य को वरीयता पर रखते हुए अन्य समस्त घटकांे का टुकड़ों में विचार किया गया है, जिसका दुष्परिणाम अब विभिन्न रूपों में परिलक्ष्ति होने लगा है।
भारतीय ऋषियों ने प्राकृतिक पारिस्थितिकी को संस्कृति में स्थान देकर दैनिक जीवन के व्यवहारों, मन्त्रों, पूजा एवं रीति रिवाजों के माध्यम से निरन्तर स्मरण कराया और उसके अनुरूप कार्य कराया। ऋषि चेतना से ऐसे अविष्कार कराए और ऐसी व्यवस्थाएं व मान्यताएं सुनिश्चित की, जिनसे प्रकृति के शोषण या भोगने की पश्चिमी प्रवृŸिा के बजाय मात्र आवश्यकता पूर्ति के निमिŸा माँ के स्तन से दूध पीना, गाय से उसके बछड़े के लिए आवश्यक दूध छोड़ कर ही दुहने और उपयोग करने का हमारा व्यवहार हमारे आचरण व संस्कारों में  समाहित हो गया है।
इसे कहते हैं- ‘सिम्पिलसिटी इज द साइन आॅफ डेवलपमेन्ट’, अर्थात् सरलतमता ही विकास का चिन्ह है। जबकि पश्चिमी विचार के अनुसार ‘काम्पलेक्सिटी इज द शाइन आॅफ डेवलपमेन्ट’ अर्थात् जटिलता ही विकास का चिन्ह है। इसका सरल उदाहरण है, यदि आप ने कुछ भी अपने उपयोग की वस्तु उत्पादित की, उसका प्रसंस्करण किया और स्वयं, अपने परिवार व मित्रों द्वारा उसका प्रयोग किया गया तो उसका राष्ट्रीय आय (जी॰डी॰पी॰) में कोई स्थान नहीं। अर्थात् सरल विधि से किया गया उत्पादन और उसके उपयोग से कोई विकास का कार्य नहीं हुआ। परन्तु यदि आप ने टेढ़े मार्ग पर चलकर पहले उत्पादित वस्तु उदाहरण के लिए गेहूँ  बाजार में बेच दिया और फिर अपने उपयोग के लिए मिल में तैयार आटा, दलिया या बे्रड खरीद कर उपयोग किया, तो आप का उत्पादन विकास (जी॰डी॰पी॰) में जुड़ेगा।
अतः भारत के समग्र विकास में भारतीय विकास दर्शन एवं चिन्तन के आधार पर सभी दिशाओं में आगे बढ़ने की आवश्यकता है, यथार्थ में वही विकास सार्थक व विश्व के लिए मार्गदर्शक होग

Sunday, January 11, 2015