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Saturday, September 6, 2014

हमारे राष्ट्रीय ध्वज की कहानी

आजादी की पहली लड़ाई यानी 1857 में बहादुर शाह जफर के झण्डे का रंग हरा था। इस पर खिलते हुए कमल के फूल का भी एक चित्र छपा था और झण्डे के दूसरे हिस्से में रोटी की तस्वीर थी।
आइरिश महिला सिस्टर निवेदिता ने पहली बार भारत के राष्ट्रीय झण्डे की अवधारणा दी। साल 1905 को प्रस्तावित इस झण्डे को आज कोलकता के आचार्य भवन म्युजियम में रखा गया है। 
प्रथम राष्ट्रीय ध्वज 7 अगस्त 1906 को पारसी बागान चैक (ग्रीन पार्क) कलकŸाा में फहराया गया। जिसे अब कोलकता कहते हैं। इस ध्वज को लाल, पीले और हरे रंग की क्षैतिज पट्टियों से बनाया गया था। 
द्वितीय ध्वज को पेरिस में मैडम कामा और 1907 में उनके साथ निर्वासित किए गये कुछ क्रान्तिकारियों द्वारा फहराया गया था।
वर्ष 1931 ध्वज के इतिहास में एक यादगार वर्ष है। तिरंगे ध्वज को हमारे राष्ट्रीय ध्वज के रूप में अपनाने के लिए एक प्रस्ताव पारित किया गया। यह ध्वज केसरिया, सफेद और मध्य में चलते हुए चरखे के साथ था।  
स्वतन्त्रता मिलने के बाद ध्वज में चरखे के स्थान पर सम्राट अशोक के धर्मचक्र को दिखाया गया। इस प्रकार तिरंगा भारत का राष्ट्रीय ध्वज बना।
स्वतन्त्र भारत की संविधान सभा ने राष्ट्रीय ध्वज तिरंगे का वर्तमान प्रारूप 22 जुलाई 1947 को अपनाया।
गुजरात की स्वतन्त्रता संग्राम सेनानी महिला हंसा मेहता ने 14-15 अगस्त, 1947 की मध्यरात्रि जिस समय आजादी की आधिकारिक घोषणा हुई, संविधान सभा के चेयरमैन राजेन्द्र प्रसाद को पहला तिरंगा पेश किया।
फ्लैग फाउन्डेशन आफ इण्डिया के सौजन्य से राजधानी दिल्ली के कनाट प्लेस में देश के सबसे बडे आकार का (90 गुणे 60 फिट) राष्ट्रीय ध्वज स्थापित किया गया है, जो 24 घंटे फहराता रहता है। इसकी ऊँचाई 207 फिट है। इतनी उँचाई के तिरंगे देश के कई अन्य स्थानों पर भी स्थापित किए गये हैं। ु

असली आजादी की तलाश.प्रो - पुष्पेन्द्र पंत

आजकल अखिल भारतीय एडमिनिस्ट्रेटिव सर्विस यानी आम आदमी की बोली में आईएएस की प्रवेश परीक्षा के पाठ्यक्रम में बदलाव को लेकर जो बवंडर उठा उसके सिलसिले में सामान्य ज्ञान का पर्चा नम्बर दो सीसैट ही सारे बवाल की जड़ है और प्रमुख मुद्दा आसानी से मान लिया जा रहा है। कभी इसे हिन्दी/अन्य भारतीय भाषाओं बनाम अंगे्रजी की लड़ाई बनाकर पेश किया जाता है तो कभी देहात और शहर का शास्वत संग्राम। किसी को इसमें विज्ञान और तकनीक के छात्रों को मानविकी एवं समाज शास्त्र के विद्यार्थियों पर तरजीह देने की साजिश दिखाई देती है।
बरहाल! हमारी समझ में असली समस्या ‘सीसैट’ नहीं बल्कि गुलामी के दौर से चली आ रही सदियों पुरानी प्रशासनिक सेवा को आजादी के बाद किसी न किसी बहाने पैबन्द लगा, पंचर ठीक करवा, जोड़-जंतर-जुगाड़ से काम चलाऊ बनाए रखने से पैदा हुई है। हम इसे बहुत आसानी से और खतरनाक तरीके से भुला चुके हैं, कि जिस बापू ने आजादी के वक्त कांग्रेस पार्टी के विलय-विसर्जन की बात सुझाई थी वैसे ही कुछ समझदार लोगों ने ‘आईसीएस’ से निजात पाने को असली आजादी से जोड़ा था।
भले ही इसको अंग्रेज हाकिम और उनके पिट्ठू ‘आईएएस’ ऐसा इस्पाती ढ़ाँचा बताते थे जिसके अभाव में हिन्दुस्तान की एकता, अखण्डता, शान्ति और सुव्यवस्था बरकरार नहीं रह सकती थी। हकीकत यह थी कि खुद देवदŸा अधिकार से शासक बने प्रशंसकों की इस बिरादरी ने तरह-तरह के मिथकों से महिमामण्डित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी। यह हरफनमौला (पहले अंगे्रज फिर उनके नकलची भूरे साहिब) कभी जिलाधीश बन जाते तो कभी जज या राजदूत। देशी रियासतों के रेजीडेन्टों की भूमिका भी इनके सिवा कौन निभा सकता था? सिर्फ फौज वाले इनसे महफूज रहे। यह ना भूलें कि साढ़े पाँच सौ रजवाड़ों-रियासतों में इनकी हस्ती सीधे ब्रिटेन द्वारा शासित इलाके जैसी नहीं थी। अतः यह सोचना गलत है कि औपनिवेशिक दौर में सारा देश यही चलाते थे।
दूसरे महायुद्ध तक ‘आईसीएस’ की प्रवेश परीक्षा विलायत में ही होती थी। अतः इसमें बेहद सम्पन्न परिवार के कुलदीपक ही हिस्सा ले सकते थे। रवीन्द्रनाथ ठाकुर ‘आईसीएस’ में कामयाब होने वाले पहले हिन्दुस्तानी थे और यह वैतरणी पार करने के लिए वह बरसों विलायत में रहकर अपना चोला बदल चुके थे। यह भी भुलाना कठिन है कि कांगे्रस पार्टी का जन्म जिस ‘आन्दोलन’ की प्रसव वेदना के वाद हुआ, उसका मकसद ‘आईसीएस’ परीक्षा में भारतीय उम्मीदवारों की आयु सीमा बढ़वाने की माँग था। मजेदार बात यह है कि उस जमाने में भी महत्वाकांक्षी अभिभावक संतान के उज्जवल भविष्य के लिए उसे ‘आईसीएस’ बनाने पर अमादा रहते थे, परन्तु स्वाभिमानी संतानें स्वेच्छा से तरक्की की राह को तज देती थीं। योगी अरविन्द घोष से लेकर नेता जी सुभाष चन्द्र बोस तक के नाम इस सिलसिले में आते हैं जो असाधारण प्रतिभा के बावजूद जानबूझकर परीक्षा में फेल हुए। वह विलायती मोल वाली देशी मुर्गी बनने को राजी नहीं हो सके।
आजादी के साथ आया देश का विभाजन। तत्कालीन गृहमन्त्री सरदार पटेल के सामने विकराल चुनौती थी दंगों को काबू पाना, शरणार्थियो को फिर से बसाना और फिर रियासतों-रजवाड़ों को भारतीय जनतन्त्र में विलय करना। इस कारण जर्जर और जंग लगे ही सही नाममात्र के ‘इस्पाती ढ़ांचे’ को गिराना सम्भव नहीं था। कुछ पल की मोहलत पाने से इन हाकिमों को लंबी राहत मिल गई। अंग्रेजों और अंगे्रजीपरस्त नेहरू को यह समझाते इन सलाहकारों को देर नहीं लगी कि वह तो मजबूरी में अंग्रेजों की खिदमत कर रहे थे। बदले निजाम में वह अपनी बहुमूल्य सेवाएं आजाद भारत के नागरिकों को मालिक मान देने लगेंगे। तब से राजनेताओं को पटाने के इन हुनरमंद लोगों ने पीछे पलटकर नहीं देखा। शासक कोई भी हो राज यहाँ आला अफसर व संतरी ही करते हैं। पैंसठ-सŸार बरस में हाल बद से बदतर होता गया है।
‘आईसीएस’ से रूपान्तरित ‘आईएएस’ इस्पाती ढ़ांचे का रूपान्तरण एक ऐसी व्यवस्था में हो चुका है, जिसकी चोटी पर विराजते हैं ‘आईएएस’ अधिकारी  और फिर क्रमशः अन्य अपेक्षाकृत पिछड़े जो महज कुछ नम्बरों की कमी से वंचित रह जाते हैं। सबसे बड़ा दुर्भाग्य इस देश का यह है कि मशहूर समाजशास्त्री एमएन श्रीनिवासन की संस्कृतीकरण की अवधारणा यहाँ भी असरदार दिखती है। जो प्रत्याशी वंचित-देहाती तबके से संयोगवश, आरक्षण की व्यवस्था और मलाईदार परत के संयोग से, या असाधारण प्रतिभा के धनी होने के कारण एक बार आला अफसर बन जाते हैं वह नए जमाने के ‘द्विज’ बन अपनों से और आम आदमी से कट जाते हैं। ऐसे ‘पुरोहितो’ से यह आशा कैसे की जा सकती है कि वह कोई वास्तव में जनतान्त्रिक जनहितकारी परिवर्तन का सूत्रपात करेंगे।
जब-जब संघ लोक सेवा आयोग नई जरूरतों के अनुसार किसी रचनात्मक परिवर्तन का अभियान छेड़ता है उसकी कमान इन्हीं भीष्म पितामह महारथियों को सौंपी जाती है जो धर्म-अधर्म, नीति-अनीति से परे सरशैया पर लेटे उपदेश ही दे सकते हैं। अखिल भारतीय सेवाओं में निश्चय ही नगण्य संख्या में ही सही ईमानदार, सुयोग्य, अनुभवी तथा देशप्रेमी अधिकारी हैं पर वह अपवाद है। उन्हें जीवनपर्यन्त उपेक्षा-प्रताणना का शिकार होना पड़ता है। यदि वह किसी प्रकार टूटने से बचे रहते हैं तो इसके लिए अखिल भारतीय परीक्षा का पाठ्यक्रम या मसूरी में प्राप्त प्रशिक्षण नहीं वरन् उनका अपना जमीर और मूल्य ही निर्णायक महत्व के समझे जाने चाहिए। यह बहस ‘सीसैट’ तक सीमित न रहनी चाहिए। आजाद हिन्दुस्तान में औपनिवेसिक नौकरशाही के तिलिस्म को तोड़ने की माँग से जोड़ी जानी चाहिए। तत्काल।
- स्कूल आफ इंटरनेशनल स्टडीज,जेएनयू

आखिर क्यों अलग है यह स्वतन्त्रता दिवस - अनिल पद्यमनाभन

देश को आजाद हुए सड़सठ साल हो गए हैं और देश अब अपनी आजादी का 68वाँ स्वतन्त्रता दिवस मना रहा है। इस बार का स्वाधीनता दिवस कुछ अलग है और इसके पीछे पाँच बदली हुई परिस्थितियाँ हैं। पहला तो यही कि पिछले दस वर्षों से लाल किले की प्राचीर से कांगे्रसी प्रधानमन्त्री मनमोहन सिंह राष्ट्र को सम्बोधित करते आ रहे थे। इस बार यह क्रम टूट रहा है, क्योंकि इस एतिहासिक प्राचीर से स्वतन्त्रता के बाद जन्में पहले प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी सम्बोधित करेंगे। वही नरेन्द्र मोदी,  जिन्होने आलोचकों के साथ समर्थकों को भी चैंकाते हुए इस मंच पर पहुंँचने का गौरव प्राप्त किया। उन्हें यह कामयावी कांग्रेस के भारी नुकसान के कारण मिली है, जो महज 44 सीटों पर सिमट कर रह गई, बल्कि लोकसभा में विपक्ष के नेता की हैसियत के लायक नम्बर भी नहीं पा सकी। कांग्रेस की यह अपमानजनक स्थिति कुछ-कुछ वैसी ही है, जैसी 2004 में भाजपा की थी, जो चुनाव हार चुकी थी, मगर उसे स्वीकारने को तैयार नहीं थी। जिस समय उसे आत्मचिन्तन की जरूरत है, वह अपने नेतृत्व के बचाव में जुटी है। एक राष्ट्रीय पार्टी के तौर पर इसके पास देश के राजनीतिक विपक्ष की भूमिका निभाने के साधन हैं। मगर इस समय वह खीज की स्थिति में है। 1994 के बाद आज तक विपक्ष को इतना असहाय कभी नहीं देखा गया।
दूसरी, शायद यह पहली सरकार है, जिससे लोगों ने बेशुमार उम्मीदें पाल ली हैं। नरेन्द्र मोदी ने अपनी चुनावी फतह लोगों की इन्हीं उम्मीदों को अपने सांचे में ढ़ालकर हासिल की व नौजवानों को सपने देखने के लिए प्रेरित किया। हिन्दुस्तान की 65 फीसदी आबादी 35 साल से कम उम्र के लोगों की है। लेकिन सपने बेचने की भी एक कीमत होती है। जिन सरकारों ने अपने वादे पूरे नहीं किए, लोगों ने उन्हे माफ भी नहीं किया। गौर कीजिए यह अपेक्षाएं एक जैसी नहीं हैं और अपेक्षाओं का जिन्न दिन-ब-दिन बढ़ता है।
तीसरी, इस सरकार की शुरूआती 75 दिनों ने यह दर्शाया है कि वह लोगों को हकदार बनाने के आगे उनके सशक्तीकरण की तरफ बढ़ रही है। लेकिन इसमें काफी सतर्कता की जरूरत है।
चैथी, जिस तत्परता से मोदी सरकार के शपथ-ग्रहण समारोह में पड़ोसी देश के नेता उमड़े, उससे दक्षिण एशिया में शान्ति की चाहत को बल मिला है। सिर्फ भारत व उसके पड़ोसी मुल्क नहीं, पूरी दुनियाँ आर्थिक असमानता व बेरोजगारी की समस्या से जूझ रही है। अवाम को युद्धोन्मादी बनाकर बहुत दिनों तक बहलाया नहीं जा सकता।
पाचंवी, डव्ल्यूटीओ में व्यापार को सुगम बनाने से सम्बन्धित करार के मामले में हम उहापोह में फंसे रहे हैं। पर जैसा कि मोदी ने भी भाजपा के राष्ट्रीय सम्मेलन में पिछले दिनों कहा है, दुनियाँ एक बहुमत सरकार की तरफ उम्मीद भरी नजरों से देख रही है। जिस तरह से मोदी ने चुनाव अभियान के दौरान अपनी छाप छोड़ी, आज वह मौका है, कि इसे वह अपने नाम कर लें। ु
- डिप्टी मैनेजिंग एड़ीटर, मिन्ट

सुशासन का मूलमन्त्र समर्थ दण्डनीति - डा॰ नवलता

विश्व के किसी भी राष्ट्र, चाहें वहाँ राजतन्त्र हो अथवा लोकतन्त्र, में शासन प्रणाली का उद्देश्य लोकहित तथा लोकोन्नति रहा है। भारतीय मनीषियों ने तो ‘राजा प्रजारन्जनात्’ कहकर राजा का राजतत्व ही प्रजा के सन्तोष के कारण माना। भारतीय लोकतन्त्र में, जहाँ शासक भी स्वच्छन्द न होेकर लोकमर्यादा में बँधा हुआ कहा गया, वहाँ राजधर्म का सर्वोपरि आदर्श एक ऐसे राज्य की संरचना करना रहा है, जहाँ प्रथम से लेकर अन्तिम नागरिक तक निर्बाध योगक्षेम को प्राप्त करे। प्रेम, सौहार्द तथा विश्वास के बल पर प्रत्येक प्रजाजन आत्मोत्थान के मार्ग पर चलता हुआ राष्ट्र के अभ्युदय में सहायक हो। हमारे पूर्वज ऋषियों की राष्ट्र संकल्पना का आधार यजुर्वेद का वह मन्त्र है, जिसमें ईश्वर से एक  ऐसे राष्ट्र की कामना की गई है, जिसमें ईश्वर सशक्त वर्ग-व्यवस्था (कर्मणा) हो, सबल पशुधन हो, बलवान तथा सभ्य योद्धा हों, चरित्रवति नारियाँ एवं संस्कारित युवक हों। मानव तथा प्रकृति के मध्य ऐसा सामन्जस्यपूर्ण सह सम्बन्ध हो, जिससे मानव स्वास्थ्य और राष्ट्र के आर्थिक विकास में सहायक प्रचुर धन धान्य उपलब्ध हो।
सुख और समृद्धि के साधक इन घटकों की स्थायी उपलब्धता में समस्त मानव संसाधन का नीतिपूर्ण सदुपयोग तथा यथासमय यथायोग्य सामाजिक-आर्थिक नीतिनिर्धारण व नियन्त्रण शासन का दायित्व है। जहाँ शासनतन्त्र अहर्निश प्रजा के कल्याण में लगा रहे तथा प्रजा सर्वतोभावेन राष्ट्र तथा राष्ट्रनायक के प्रति श्रद्धा और समर्पण में रन्चमात्र प्रमाद न करे, वहीं आदर्श तथा अग्रणी समाज की संरचना सम्भव है। यह सब ‘सुशासन’ द्वारा सम्भव है।
यद्यपि ‘शासन’ शब्द स्वयं ही उक्त अभिप्राय को व्यक्त करता है, किन्तु ‘सु’ उपसर्ग लगाने की आवश्यकता तब पड़ती है जब राज्य में अनियन्त्रण तथा असामन्जस्य की स्थिति सीमा पार करने लगे। शासन का आधार अनुशासन है तथा सुशासन का आधार धर्म होता है। अनुशासन तथा धर्म एक ही सिक्के के दो पटल कहे जा सकते हैं। अथवा यह कह लिया जाए, कि अनुशासन का मूल धर्म है तथा धर्म का मूल अनुशासन है। अनुशासन को वाह्य नियन्त्रण का व्यावहारिक परिदृश्य कहा जा सकता है, तो धर्म आत्मनियन्त्रित देशकाल परिस्थिति के अनुकूल इष्ट आचरण। अनुशासन तथा धर्म दोनों सुशासन के सन्दर्भ में एक दूसरे के अनुपूरक होते हुए दण्डनीति का पर्याय हैं।
उक्त अर्थ में दण्ड ही प्रजा के नियन्त्रण, अनुरक्षण तथा अभिवृद्धि का आधार है। दण्ड को धर्म का पर्याय बताते हुए स्मृतिकारों नंे सत्य ही कहा है -
दण्ड शास्ति प्रजाः सर्वा दण्ड एवाभिरक्षति।
दण्डः सुप्तेपु जागर्ति दण्डं धर्म विदुर्वुधाः।।
अर्थात् दण्ड ही प्रजा को अनुशासित करता है, दण्ड ही सबकी रक्षा करता है। प्रजा के अजागरूक (सुप्त) होने पर दण्ड ही जगाता है। इस प्रकार विद्वानों ने दण्ड को ही धर्म कहा है। धर्म दण्ड के प्रमुख कार्य हैं- अवान्छित तथा सुरक्षित शान्त जीवन में बाधा उत्पन्न करने वाले लोगों का नियन्त्रण एवं उसके द्वारा प्रजा की रक्षा। जब दण्ड सजग होता है, तब प्रजा निश्चिन्त सो सकती है। इस दण्डरूप धर्म की संस्थापना के लिए ही कृष्ण जैसे ईश्वर अथवा महापुरूष जन्म लेते हैं जिनका उद्धोष ‘परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृतां, धर्मसंस्थापनार्थाय...............’ होता है।
इस दृष्टि से दण्ड का अर्थ अपराधी को दमित करना मात्र नहीं, अपितु निरपराध की रक्षा तथा अपराधरहित समाज की रचना करना भी है। दण्डनीति का निर्धारण करने वाले धर्म शास्त्रियों तथा अर्थ शास्त्रियों की दृष्टि सदा इस प्रयोजन पर रही है। इसी कारण दण्डनीति धर्मशास्त्र तथा अर्थशास्त्र दोनों का प्रतिपाद्य रहा है। यद्यपि प्रतिपाद्य की दृष्टि से दोनों शास्त्र एक ही दिशा में प्रवृत्त होते हैं, किन्तु अधिकार की सीमा दोनों को एक दूसरे से पृथक करती है। उल्लेख करना आवश्यक होगा, कि अर्थशास्त्र का क्षेत्र प्रधानतः राजदायित्व तथा राजधर्म के अन्तर्गत आता है, जबकि धर्मशास्त्र का प्रधान क्षेत्र सामाजिक व्यवस्था का निदर्शन करना है। राज्य की प्राप्ति, रक्षा, वृद्धि तथा वृद्ध संसाधनों का नियोजन अर्थशास्त्र का विषय है, तो वर्ण, पुरूषार्थ तथा आश्रम के कर्तव्याधिकारों का समुद्वेश धर्मशास्त्र का विषय है।
उक्त उल्लेख इस दृष्टि से प्रासंगिक है, कि सुशासन की संस्थापना के लिए दोनों का समान रूप से अन्योऽन्याश्रयत्व तथा महत्व है। यहाँ यह उल्लेख भी प्रासंगिक प्रतीत होता है, कि धर्मशास्त्र की मर्यादाएँ पाप और प्रायश्चित् के रूप में प्रकारान्तर से दण्डनीति का समर्थन करती हैं। पाप और प्रायश्चित अपराध तथा दण्ड के आत्मनियन्त्रित रूप हैं। किन्तु, धर्म की मर्यादाओं का उल्लंघन करने वाले पापियों (सामाजिक-सांस्कृतिक अपराधियों) के लिए धर्मशास्त्र भी निष्पक्ष तथा निश्चित दण्ड का यथायोग्य प्रावधान करता है। सभी परिस्थितियों में समग्र दण्डनीति का सार्थक्य उसके यथोचित तथा यथासम्भव क्रियान्वयन में है, जिससे प्रजा की संरक्षा-सुरक्षा, अपराधनियन्त्रण तथा अपराधियों का दण्डन इस प्रकार हो, कि समाज में न्याय एवं सर्वहितरक्षण हो सके।
विश्व के सबसे बड़े लोकतन्त्र भारत में राज्य व्यवस्था का आरम्भ ही दण्डनीति के साथ हुआ था। समय-समय पर नीतिकारों ने राजाओं को सुशासन का मार्ग निर्दिष्ट किया है। जहाँ ‘स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः’ कह कर प्रजा को स्वधर्म में प्रवृत्त होने का निर्देश किया गया, जहाँ ‘सर्वेषां हि शौचानामर्थशौचं पर स्मृतम्’ कह कर आर्थिक पवित्रता का पाठ पढ़ाया गया, जहाँ ‘यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः’ कहकर स्त्री सम्मान को देवत्व (दैवी गुणों) की प्राप्ति का साधन बतलाया गया, वहाँ आज धर्म, अर्थ तथा काम का जो उपहास हो रहा है, वह अकल्पनीय तथा अवर्णनीय है।
भ्रष्टाचार के ताण्डव से त्राही-त्राही करती जनता की इच्छाशक्ति टूटती दिखाई दे रही है। नैतिकता, निष्ठा तथा ईमानदारी को मूर्खता या निर्बलता का लक्षण समझा जाने लगा है। घूसखोरी का दानव सरकारी कार्यालयों से लेकर वणिक् के व्यवसाय तक अपना आतंक फैला रहा है। प्रतिभा का हनन हो रहा है तथा अयोग्यों को पदों पर अभिषिक्त किया जा रहा है। भाई-भतीजा-वाद अब कालातीत हो गया है। पिता पुत्र से तथा पुत्र पिता से लाभ हानि की बात सोचने लगा है। विद्यालयी शिक्षा से लेकर व्यावसायिक शिक्षा तक ‘समर्थ’ लोगों का एकछत्र साम्राज्य बढ़ता जा रहा है, जिसका परिणाम करूणाहीन चिकित्सकों, अर्थलोलुप अभियन्ताओं विद्या का व्यापार करने वाले शिक्षकों, एक-एक पत्रावली का सुविधा शुल्क निर्धारित करने वाले लिपिकों, हस्ताक्षर का ‘मूल्य’ वसूल करने वाले अधिकारियों, मिलावटखोर खाद्यव्यापारियों तथा मृत्यु का प्रच्छन्न व्यापार करने वाले सफेदपोश कर्णधारों के रूप में प्रतिक्षण दिखाई दे रहा है। काले धन की अपरिमित खानों में निरन्तर वृद्धि हो रही है। कुल मिला कर जो जहाँ है, वहाँ नेत्र बन्द कर बहती गंगा में हाथ धो रहा है। परिवारों के सम्बन्ध स्वार्थ के पाश में जकड़े हुए पैतृक सम्पत्ति तथा अपने अघोषित अधिकारों के लिए एक दूसरे के रक्त के प्यासे हो रहे हैं।
स्त्री जाति के प्रति अपराध तथा दमन की सीमा मनोविक्षिप्त के रूप में दिखाई दे रही है। स्वतन्त्र राष्ट्र की राजधानियों में भी किसी भी जाति, वर्ग, अवस्था की स्त्री घर-बाहर सुरक्षित नहीं है। कभी भी किसी के साथ कोई घटना घट सकती है। लूटपाट, चोरी-डकैती तो शायद अपराध की कोटि में समझें ही नहीं जाते।
राष्ट्र की रक्षा प्रणाली भी भ्रष्टाचार के कलंक से दूषित हो गई है। कोई भी सूचना, कोई भी योजना अथवा कोई भी प्रकल्प गुप्त नहीं है। पुलिस सेना तथा न्यायाधिकरण जैसे प्रजारक्षण के लिए उत्तरदायी विभागों तक में छोटे स्तर के कर्मचारी से लेकर न्याय के मन्च पर बैठे न्यायाधिकारी तक किसी अपराध से अछूते नहीं हैं। ेइस समग्र परिदृश्य का मूल कारण है, कानून व्यवस्था का छिन्न-भिन्न होना। जब रक्षक ही भक्षक बन जाये, तो कैसे हो रक्षा समाज की! जब शासन तन्त्र केे मखमली वस्त्र में छिद्र हों, तो कैसे बच पाएगी शासित प्रजा की लाज?
जैसा कि ऊपर चर्चा की गई, कि भारतीय लोकतन्त्र एक सबल लोकतन्त्र समझा जाता है, जहाँ प्रजा को अपना राजा चुनने तथा अपदस्थ करने का पूरा अधिकार है, किन्तु प्रजा के समक्ष योग्य व्यक्ति को चुनना बड़ी चुनौती होती है, क्योंकि निवार्चन प्रणाली को भी बहुत प्रभावपूर्ण नहीं कहा जा सकता। उससे भी बड़ी चुनौती है निर्वाचित शासन तन्त्र को सुशासन की दिशा में प्रवृत्त होने का मनोबल प्रदान करना तथा सहयोग करना, क्योंकि आज मँहगाई, भ्रष्टाचार, असुरक्षा आदि समस्याओं से जूझती जनता त्रस्त होकर धैर्य खो बैठी है। सुशासन का स्वप्न साकार करने के लिए जनता को कुछ धैर्य तथा विवेक का परिचय अवश्य देना होगा।
दूसरी ओर वर्तमान केन्द्रीय तथा राज्य-सरकारों के परिप्रेक्ष्य में सुशासन पर विचार किया जाए, तो निर्विवाद यह कहा जा सकता है, कि प्रजा की तात्कालिक अपेक्षा उक्त तीन क्षेत्रों- मँहगाई, भ्रष्टाचार तथा सुरक्षा सम्बन्धी समस्याओं के निवारण में है। प्रायः जनता के कुछ ‘सुविज्ञ’ जन कहते हैं, कि ‘अच्छे दिन आने वाले हैं’ इस घोष वाक्य के साथ विकास का जो वादा किया था वर्तमान प्रधानमन्त्री ने, वह कब पूरा होगा? इस सन्दर्भ में हमें विचार करना चाहिए, कि नखशिख तक कलंक के पंक में सनी भ्रष्ट सामाजिक संरचना को धोकर स्वच्छ करने में सामूहिक इच्छाशक्ति तथा धीरे-धीरे एक-एक अंग की मलिनता दूर करने की आवश्यकता है। तात्पर्य यह है कि प्राथमिकता का स्तर निश्चित कर तदनुसार कार्ययोजना से सुशासन का मार्ग सरल होगा।
उल्लेखनीय है, कि पाँच वर्ष का समय एक संक्रामक रोग के समूल उपचार के लिए कम नहीं तो अधिक भी नहीं है। लोकतन्त्र में जनता शासक की अपेक्षा अधिक बलवती होती है, इसमें सन्देह नहीं, किन्तु जब जनता स्वयं दिगभ्रमित हो जाए, तो उसको अनुशासित करना शासक का धर्म है। प्रजा के रक्षण के लिए आतताइयों के मूलोच्छेद में शासन को भय अथवा प्रमाद से ग्रस्त नहीं होना चाहिए।
धर्मशास्त्रीय सिद्धान्तों के पोषक वर्तमान भारतीय संविधान को विश्व के उत्कृष्ट संविधानों में से एक समझा जाता है। सैद्धान्तिक रूप से यह मानव तथा मानवाधिकार की रक्षा करने वाला मूल्यनिष्ठ संविधान है, किन्तु क्रियात्मक दृष्टि से यह अत्यन्त शिथिल तथा विरोधाभासों से युक्त दण्डनीति को प्रस्तुत करता है। यहाँ दण्ड प्रक्रिया की व्याख्या नहीं की जा रही है, किन्तु दण्डनीति का सामथ्र्य क्या है? एक समर्थ दण्डनीति कैसी हो सकती है यह अवश्य विचारणीय है। सूत्र रूप में कहा जाए, तो दण्डनीति का सामथ्र्य त्वरित तथा सुनिश्चित न्याय प्रक्रिया पर निर्भर है। यदि आतंकवादी के वादनिर्णय में मानवाधिकार की दुहाई देकर उसके अभियोग को सिद्ध करने व दण्डित करने में समय की कोई सीमा निर्धारित नहीं की जाती, यदि बलात्कार जैसे जघन्य अपराध में फास्ट ट्रैक कोर्ट की व्यवस्था के पश्चात् भी अभियुक्त को यथा समय दण्ड नहीं मिल पाता, तो इस प्रकार की घटनाओं में वृद्धि तो निश्चित है।
चाहे खाद्य वस्तुओं में मिलावट का विषय हो, या घटतौली की प्रवृत्ति, अथवा वस्तुओं के अनावश्यक भण्डारण की बात, मनमाने मूल्यों पर वस्तु के विक्रय पर रोक लगनी ही चाहिए। किन्तु अभियोजन विभाग स्वयं कितना ईमानदार है, सब जानते हैं। ऐसी स्थिति में अपराध नियन्त्रण के लिए उत्तरदायी विभागों पर राज  अंकुश अत्यावश्यक है।
प्रश्न यह है कि एक नितान्त ईमानदार राष्ट्रनिष्ठ तथा प्रबल सत्व वाला शासक भी बिना अपने जैसी मनोवृत्ति तथा मानसिकता वाले सहयोगियों के अधिक सफल नहीं हो सकता। अतः शासक को निर्भीक होकर सच्चाई एवं नैतिकता का मार्ग अपनाने वाले सहयोगियों का दल बना कर जनता के अनुशासन तथा दण्ड की समुचित व्यवस्था करनी चाहिए। ऐसे दृढ़ इच्छा शक्ति वाले निष्ठावान् नेतृवर्ग के अथक प्रयास तथा ‘कड़े फैसलों’ के बिना ‘सुशासन’ के मार्ग की बाधाएँ नहीं दूर हो सकतीं।
निश्चित रूप से सुशासन का स्थायी उपाय शिक्षा, संस्कार तथा राष्ट्रीय भावना का विकास करने वाली नीतियों एवं कार्ययोजनाओं द्वारा प्रजा को जाग्रत तथा समर्थ बनाना है, किन्तु तात्कालिक रूप से किसी भी मूल्य पर भारतीय दण्डनीति के मूल्यपरक पक्ष को उद्बुध कर न्यायक्रिया को समर्थ तथा गतिशील बनाने की नितान्त आवश्यकता है, अन्यथा भ्रष्टाचार का कैंसर राष्ट्र के ‘जीवन’ को कहीं इतना संकटापन्न न कर दे, कि मानवता का बीज ही नष्ट हो जाए।
- के-680, आशियाना, लखनऊ।

गंगा बचाओ अभियान - श्रेयस्कर गौड़

जकड़ बेडि़यों में डाला गंगा बेहाल हुई है,
नालों का मैला ढ़ो-ढ़ो कर गंगा बदहाल हुई है।
पापों को धोने वाली असहाय सी हमें पुकारे,
करें भगीरथ सा प्रयास, आओ गंगा उद्धारें।

गंगा पुकारे, चलो रे चलो रे।
गंगा पुकारे, मिलके चलो रे।
चलो चलो गंगा को बचाने चले चलो,
प्रण करके गंगा को बचाने चले चलो।

अब ना हम कूड़ा करकट माँ की झोली में डालें,
इतने वर्षो तक जो मैला हुआ है उसे निकालें।
जीवनदायनी माँ गंगा के अंचल की हरियाली,
जल जीवों के जीवन को आओ मिलकर के उबारें।

गंगा पुकारे, चलो रे चलो रे।
गंगा पुकारे, मिलके चलो रे।
चलो चलो गंगा को बचाने चले चलो,

प्रण करके गंगा को बचाने चले चलो।
गंगा केवल नदी नहीं, निजसंस्कृति की गरिमा है,
प्रयाग, काशी, हरिद्वार, गाते जिसकी महिमा हैं।
माँ गोदी में नहलाकर पापों को हर लेती है,
छोटे बड़े अनगिनत जीवों को जीवन देती है।
आज वही गंगा अपनी दुुर्दशा देख रोती है,
हैं दुष्कर्म हमारे पर वो अपने सर ढोती है।

गंगा पुकारे, चलो रे चलो रे।
गंगा पुकारे, मिलके चलो रे।
चलो चलो गंगा को बचाने चले चलो,
प्रण करके गंगा को बचाने चले चलो। ु
- (गीतकार, संगीतकार व गायक)

लाल किले की प्राचीर से 68वें स्वतन्त्रता दिवस का ऐतिहासिक संदेश - आशीष वशिष्ठ

लाल किला हमारे पिछले 67 स्वतन्त्रता समारोहों का गवाह है, परन्तु इस साल 15 अगस्त को 68वें स्वतन्त्रता दिवस के समारोह में लाल किले ने वह देखा-सुना! जो उसने पहले कभी नहीं देखा-सुना था।
1. इस स्वतन्त्रता के मौके पर आजाद भारत में जन्मे पहले प्रधानमन्त्री के रूप में नरेन्द्र मोदी नेे लाल किले पर अपने विशिष्ट अन्दाज में झण्डा फहराया।
2. राष्ट्रीय स्वाभिमान, संस्कृति और विकास की प्रतीक परम्परागत पगड़ी नरेन्द्र मोदी ने पहनी हुई थी, जिसमें भारतीय संस्कृति के केसरिया रंग में समाई सफेद बिन्दियां विविधता में राष्ट्रीय एकात्मता तथा हरे-धानी रंग की कलंगी मानो विकास का प्रतिनिधित्व कर रही थी।
3. आजादी के पावन पर्व पर देशवासियों को भारत के प्रधान सेवक की अनेक-अनेक शुभ कामनाएं देते हुए जब उन्होनंे कहा ‘मै आपके बीच में प्रधानमन्त्री के रूप में नहीं प्रधान सेवक के रूप में उपस्थित हूँ।’ यह सम्बोधन अपने आप में महत्वपूर्ण कार्य सांस्कृतिक परिवर्तन का द्योतक है।
4. लिखित भाषण की प्रचलित परम्परा को तोड़ प्रधानमन्त्री ने अपने सम्बोधन से सीधे जन-संवाद स्थापित कर, यह संदेश दिया, कि हम आप से विशिष्ट व अलग नहीं हैं।
5. स्वतन्त्रता दिवस पर पहली बार विशिष्ट नागरिकांे के साथ देश की जनता की प्रत्यक्ष भागीदारी सुनिश्चित की गई।
6. स्वतन्त्रता दिवस के अवसर पर राष्ट्र गीत के साथ पहली बार वंदेमातरम का मन्त्र गूँजा।
7. भाषण के बाद वापसी के लिए कार में बैठे प्रधानमन्त्री जब 68वें स्वतन्त्रा दिवस को आकार दे रहे बच्चों के पास पहुंँचे, तो कार से उतर कर सीधे बच्चों के बीच पहुँच गए और उनसे हाथ मिलाए।
68वें स्वतन्त्रता दिवस के ऐतिहासिक अवसर पर लाल किले की प्राचीर से अपनी जनता के बीच खड़े इस जननेता के संवाद में सारा जोर पुराने ढ़र्रे की कई दीवारें गिरानें और राष्ट्र निर्माण का नया खाका सामने रखने पर था। नियति, नीति और नजरिए की पुरानी दीवारें गिराकर ‘एक भारत-श्रेष्ठ भारत’ का सपना साकार करने पर उन्होनें बल दिया।
जनमत की ताकत से लालकिले तक पहुँचे मोदी ने सुनिश्चित किया कि स्वाधीनता दिवस सम्बोधन के दौरान उनके और जनता के बीच बुलेटपू्रफ काँच की कोई भी दीवार न रहे और उन्होने यह कर दिखाया।
योजनायंे केवल राजनेताओं के नाम पर ही न चलें, तो इसमें सीधी भागीदारी जन प्रतिनिधियों की सुनिश्चित करते हुए ‘सांसद आदर्श ग्राम योजना’ की घोषणा ही नहीं की तो सांसद विकास निधि का उपयोग स्कूलों में शौचालय निर्माण तथा प्रतिवर्ष 3 से 5 हजार आबादी वाले एक गाँव को आदर्श बनाने पर व्यय हो, इस हेतू 11 अक्टूबर जयप्रकाश नारायण जयन्ती पर इसकी स्पष्ट रूपरेखा देने का भी संकेत किया।
केवल राजनेता, जनप्रतिनिधि और शासक, प्रशासक ही नहीं तो जन-जन की राष्ट्रीय विकास में भागीदारी हो, इसके लिए गाँधी जयन्ती, 2 अक्टूबर से स्वच्छ भारत अभियान की घोषणा की, जिसके अन्र्तगत 2019 तक गाँव, शहर, मोहल्ला, अस्पताल, स्कूल, मन्दिर सभी क्षेत्रों को गंदगी मुक्त बनाने का लक्ष्य, एक महत्वपूर्ण कदम है।
कोई भी राष्ट्र तभी सामथ्र्यवान हो सकता है, जब उसका जन-जन सामथ्र्यवान हो, इस विचार को मूर्तरूप देने के लिए प्रधानमन्त्री जन-धन योजना की भी घोषणा की गई। जिसके अन्र्तगत प्रत्येक भारतवासी का बैंक में एक खाता, एक डेविट कार्ड और एक लाख रूपये तक के बीमें का प्रावधान होगा।
किसी भी राष्ट्र के विकास के लिए वहाँ के सम्पूर्ण समाज की गहरी भागीदारी सुनिश्चित करना आवश्यक है। इसके लिए उन्होनें सरकार में बैठे हुए लोगों की सामथर््य को जगाते हुए कहा ‘मेरा क्या, मुझे क्या’, की भावना से मुक्त होकर भारत की नियति ‘राष्ट्र-कल्याण की भावना’ से कार्य करें।
विकास का पहिया उद्योगों से घूमता है, जिसके लिए मोदी के नए मन्त्र ‘मेक इन इण्डिया’ ने देश व दुनियाँ का ध्यान खींचा, वहीं उसके लिए उन्होंने भारतीय उद्यमियों को विकास की विश्वनीयता व प्राकृतिक संरक्षण की दूरगामी नीति ‘जीरो डिफेक्ट व जीरो इफेक्ट’ का संदेश देकर अपने कार्य की दिशा व दशा का भी परिचय दे दिया।
‘नैतिक जीवन मूल्य’ विकास क्रम में सबसे महत्वपूर्ण व सबसे ऊपर हंै, यह कार्य सरकारों पर नहीं तो मोदी ने अभिभावकों को सौंपा और प्रश्न किया, क्या वह अपने बेटों से पूछताछ करते हैं, कि उनका बेटा क्या कर रहा है, कहाँ जा रहा है? क्योंकि युवा ही भारत का भविष्य है और उसके राष्ट्रीय चरित्र का निर्माण परिवार से ही सम्भव है, जिससे मांँ-बहन-बेटियों के सम्मान व सुरक्षा की गारन्टी सुनिश्चित होगी।
मोदी ने भारत को गरीबी के अभिशाप से मुक्ति के लिए गरीबी उन्मूलन नहीं, गरीबी निर्मूलन के महामन्त्र के साथ, पड़ोसी देशों से शान्ति व प्रगति के लिए साथ-साथ चलने का अह्वान कर, अपनी प्राथमिकताएं बता दीं। राजनीतिक परिदृश्य में मोदी दूसरे नेताओं से काफी अलग हैं। वास्तव में वह राजनीति को राष्ट्र निर्माण की जागृति का हिस्सा मानते हैं, क्योंकि वह विवेकानन्द के उस आध्यात्मिक और राष्ट्रीय भाव से प्रेरित हैं, जैसा कि 19वीं शताब्दी के अन्तिम दशक में उन्होनंे कहा था। वास्तव में मोदी खुद को अपने पद से अलग रखते हुए, भारत को वैश्विक शक्ति से जोड़ रहे हंै। वह चीजों को बदलने में दक्ष हैं और अपने नियम खुद तय करते हैं। यही कारण है कि स्वाधीनता दिवस के अवसर पर लालकिले से दिये प्रधानमन्त्री के भाषण ने बड़ी तादाद में लोगों को प्रभावित किया। ु

जन-गण-मन की अनुभूति- हृदयनारायण दीक्षित

सामूहिकता प्राणी की प्रकृति है। मनुष्य और प्रकृति के सम्बन्ध अंगांगी हैं। प्रकृति में अनेक प्राणी हैं, मनुष्य भी प्रकृति का भाग है। मनुष्य और प्रकृति की आत्मीयता में आनंदरस है लेकिन तमाम अन्तर्विरोध भी हैं। तमाम प्राकृतिक आपदांए आती हैं। मनुष्य पीडि़त होते हैं। सामूहिकता ऐसे अन्तर्विरोधों से लड़ने की शक्ति देती है। इसलिए आदिम मनुष्य सामूहिक जीवन की राह चला। सामूहिक होने के लिए एक समान मन जरूरी है। सामूहिकता में सहमन की विशेष भूमिका है। आदिम मनुष्य की सामूहिकता का पहला नाम पड़ा - गण। ऋग्वेद विश्व मानवता का प्रथम ज्ञान अभिलेख है। ऋग्वेद में ‘गण’ की अनेकशः चर्चा है। ऋग्वेद के समय का समाज गण-सामूहिकता से आगे बढ़ गया है। देवोपासना, प्रीति प्यार, रीति रिवाज, विवाह आदि सामाजिक सांस्कृतिक कारणों से गण टूटते रहे और गण से बड़ी इकाई ‘जन’ का विकास हुआ। ऋग्वेद में गण समाज की स्मृतियां हैं और गण के साथ जन-समाज की भी प्रतिष्ठा है। ऋषियों ने मरूतांे को मरूद्गण कहा है। देवों के समूह भी गण कहे गये हैं। आदर्श सामाजिकता का मार्ग सामूहिकता से होकर ही जाता है। गण समूह के सदस्य परस्पर स्नेही हैं। ऋग्वेद के ऋषि पूषा देव से स्तुति करते हैं “गायों के खोजी इस गण का मार्ग प्रशस्त करो - इमं गवेषणं गणम्।” यहाँ व्यक्ति नहीं गण ही गायों का पता लगा रहे हैं।
‘गण सामूहिकता के पर्याय हैं लेकिन ऋग्वेद में उनकी कई विशेषताएं हैं। गणों के अपने उपास्य देव भी हैं। गणेष गण-ईश हैं। वे गणपति हैं और गणों में श्रेष्ठ भी। वैदिक इन्द्र भी किसी एक या तमाम गणों के देवता रहे होंगे। ऋषि इन्द्र से कहते हैं “मरूत्गण आपके हैं।” गण के भीतर कुछ व्यक्ति महत्वपूर्ण भी रहे होंगे। ऋषि ‘गणों में हंस’ की उपमा देते हैं। जान पड़ता है कि गण स्वच्छंद विचरण वाले स्वतंत्र चेता समूह थे। ऋग्वेद में संकेत हैं कि वे स्वंय अपने शासक हैं। आधुनिक गणतंत्र वैदिक काल और उसके पूर्व के स्वशासित गण की परम्परा का विकास हो सकता है। अग्नि ऋग्वेद के लाडले देवता हैं। ऋषि उनसे स्तुति करते हैं “आओ! हमारे गण के बीच आसन ग्रहण करो - गणे अ निशध। गण तमाम देवों की स्तुति करते थे। गणों की भी स्तुति थी - गणं स्तुषे। गण प्राचीनतम मानव समूह हैं। गण सदस्यों में परस्पर भेदभाव नहीं है। वे साथ-साथ रहते हैं। उत्पादन भी प्रायः सामूहिक है। व्यक्तिगत सम्पत्ति का विशेष प्रादुर्भाव गण काल में नहीं है। गणों की यही विशेषता मरूत देव को मरूत्-गण बनाती है।
मरूत्-गण उपास्य हैं। ऋग्वेद में उन्हें रूद्र का पुत्र बताया है। पौराणिक गणेश भी शिव पुत्र कहे गये हैं। शिव गण प्रेमी हैं। उनसे बड़ा गणप्रेमी देवता दूसरा है ही नहीं। महाभारत अनुशासन पर्व में शिव के गण प्रेम का प्यारा उल्लेख है। शिव अपने गणों के साथ गाते, नाचते और विशेष प्रकार के वाद्ययंत्र भी बजाते हैं - वाद्यत्यति वाद्यानि विचित्राणि गणैमुताः। शिव प्रतीक बड़ा आनंदी है। शिव का अर्थ है - लोककल्याण और लोककल्याण बढ़ता है सामूहिकता में। शिव स्वाभाविक ही गण, गणपति गणेश प्रिय हैं। गणों का गठन और विकास एक समान सामूहिक जीवन की इच्छा से हुआ। समान विचार और समान अभिलाषा वाले लोगों ने अपना जीवन सामूहिक बनाया। प्राचीन भारत में अनेक गण थे। गण छोटे समूह थे। सांस्कृतिक आर्थिक कारणवश गणों में परस्पर सम्पर्क बढ़ा। प्रगाढ़ प्रेम और आत्मीयता भी बढ़ी। अनेक गण मिलकर बड़ी इकाई में संगठित हुए। गणों से भिन्न इस सामूहिक इकाई का नाम ‘जन’ पड़ा। ऋग्वेद में ‘पंच जन’ का उल्लेख है। अदिति देव हैं। वे धरती आकाश माता पिता व पुत्र भी है और पंचजनाः भी। एक वैदिक देव हैं मित्र। मित्र देव को आहुतियां देने वाले भी यही पांच जन हैं।
सामान्यतया 5 जन का अर्थ पांच व्यक्ति भी हो सकता है। लेकिन अनेक मंत्रों में पंचजनाः का प्रयोग व्यापक अर्थ में ही हुआ है। इन्द्र बड़े देवता हैं। ऋग्वेद में “इन्द्र की व्यापकता पंचजनो” तक विस्तृत है। ये पांच जन पांच बड़े मानव समूह है और सरस्वती आदि नदियों के तट पर आनंदमगन जीवन जीते हैं। सरस्वती पंचजातावर्द्धयन्ती है। पांचजनों को समृद्धि देती है। वैदिक साहित्य में पांचजनों का उल्लेख कई बार आया है। अथर्ववेद में वे पंचजनाः के साथ पंचमानवाः है। ऋग्वेद में वे पंचजनाः हैं लेकिन पंच मानुषा व पंचकृष्टया भी हैं। जन वस्तुतः समूह ही हैं। ग्रिफ्थ, मैक्डनल और तिस्मर जेसे विद्वानों ने जन को समूह ही बताया है और तुर्वस, यदु, अनु, दु्रह्य और पुरू को पांच जन समूह बताया है। परवर्ती कुछेक भारतीय विद्वानों ने इन्हें चार वर्ण और पांचवा निषाद बताया है। लेकिन पांच जन वर्ण नहीं जान पड़ते। ऋग्वेद में स्तुति है कि पांच जन हमारे यज्ञ में पधारें। जन और भी थे। लेकिन पांच जन मुख्य थे। अथर्ववेद में भी पांचजनों की समृद्धि मांगी गयी है। गण प्राचीन समूह थे, सम्भवतः छोटे थे और जन का विकास बड़े समूहों के रूप में हुआ। जन, गण भारतीय समाज के मुख्य घटक हैं। जन और विशेष भूखण्ड के निवास की इकाई जनपद के रूप में प्रतिष्ठित हुई।
मन, भारतीय चिन्तन और दर्शन का प्रीतिपूर्ण विषय है। मन वैयक्तिक होता है। सांस्कृतिक सामूहिकता व्यक्तिगत मन को सामूहिक बनाती है। मन सभी संकल्पों और गतिविधियों का केन्द्र है। गण-समूह का विकास व्यक्तियों की सामूहिक मानसिक प्यास से ही हुआ। मन मिलता है, तो सामूहिक इच्छाएं व्यक्तिगत इच्छाओं पर भारी पड़ती है। ऋग्वेद में सामूहिक मन की स्तुतियां है। जन-गण का एक मन ऋग्वैदिक ऋषियों की प्यास है। सामूहिक मन से ही लोकमंगल के काम होते हैं। हरेक व्यक्ति स्वभाव से व्यक्तिगत है और व्यक्तिगत दृष्टिकोण भी रखता है लेकिन जन या गण के सदस्य अपने व्यक्तिगत को सामूहिकता के लिए छोटा या कम करते है। जन गण अपने आप में पर्याप्त नहीं है। जनगण के साथ मन जरूरी है। मन भी अपने आप में परिपूर्ण नहीं है। आनंददाता तो कतई नहीं। जनगणमन एक होकर ही लोकमंगल और लोक आनन्द के सर्जक हैं। जनगणमन इन्द्रधनुषी है। मधुरस परिपूरित है। भारत का मन रस जनगण-मधुकरों के ही श्रम तप मंे मधुमय है। भारत के भारत होने और विश्व में विशेष प्रतिष्ठित होने के उद्यम में जनगणमन की भूमिका है। भारत के मधुकलश को जनगणमन ही भरता है और वही उसका रसपान भी करता है। विश्व कवि रवीन्द्र नाथ टैगोर ने उचित ही ‘जनगणमन’ का एक साथ प्रयोग किया है।
संविधान की उद्देषिका में ‘हम भारत के लोग - वी दि पिपुल आॅफ इण्डिया’ है। यह लोग भारत के हैं। भारत का अन्तरंग सांस्कृतिक है। इस संस्कृति में ढेर सारे देवता हैं। ईश्वर एक है, उपासनाएं अनेक हैं। देवता भी अनेक हैं, देवोपासनाएं भी अनेक हैं। ऋग्वेद की उदात्त घोषणा है कि सत्य एक है। विद्वान उसे इन्द्र अग्नि आदि नामों से पुकारते हैं। यहां गण हैं, जन हैं। इस जनगण की सामूहिक चेतना है। यह चेतना सत्य अभीप्सु है। मुक्त चिन्तन, प्रश्न प्रतिप्रश्न पर आधारित यह जनगण चेतना ‘जनगणमन’ के सामूहिक रूपक में इन्द्र धनुष बनती है। भारतीय जनगणमन विश्व समृद्धि, विश्व शान्ति का मंगलकामी है। जनगणमन के लिए विश्व एक परिवार है। इस मन के अंतरंग में सृष्टि का परस्परावलम्बन है और अद्वैत की अनुभूति। विश्व, ब्रह्माण्ड एक है। रूप और नाम अलग हैं बावजूद इसके सब एक है। एक ही सृष्टि के अंग। जनगणमन नमस्कारों के योग्य है। ु