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Tuesday, March 25, 2014

सेना को प्रणाम! - प्रेम बड़ाकोटी

सेना जहाँ एक ओर सीमाओं की सुरक्षा के लिये सन्नद्ध है, वहीं आन्तरिक सुरक्षा तथा प्राकृतिक आपदाओं में भी उसकी अहम भूमिका है। जहाँ कहीं भी कठिन परिस्थिति निर्माण होती है, तथा हालात नियन्त्रण से बाहर होते हैं, उस समय यह कहा जाता है कि इसे अब सेना के हवाले कर दिया गया है। उत्तराखण्ड में आई इस प्राकृतिक आपदा में स्थानीय प्रशासन से भी कहीं अधिक सब प्रकार के जोखिम भरे कार्यों में सेना की अतुलनीय भूमिका रही है। यह सीमान्त का क्षेत्र है, सेना के पास अपना सुगठित तन्त्र है, तथा समय-समय पर सेना में विशेष प्रशिक्षणों की व्यवस्था है, इसी कारण किसी भी आपात स्थिति में सेना के द्वारा कार्य को योग्य परिणाम प्राप्त होता है।
हम वर्तमान परिस्थिति में जब सेना की चर्चा कर रहे हैं तो उसके अन्तर्गत प्रत्यक्षतः जल-थल-नभ, एन॰डी॰आर॰एफ॰, आई॰टी॰बी॰पी॰, बी॰एस॰एफ॰, सीमा सड़क संगठन आदि सभी की प्रमुख भूमिका है। यदि यह कहा जाए कि राहत तथा बचाव कार्य में सेना ने विशेष भूमिका निभाई है तो यह इन कर्मवीरों के प्रति योग्यतम टिप्पणी होगी। बीहड़ क्षेत्रों में यत्र-तत्र फंसे हुए लोगों को निकालना, छोटी बड़ी नदियों पर पुल बनाकर सम्पर्क मार्ग को जोड़ना, त्रासदी में फंसे लोगों को सुरक्षित स्थानों तक पहुँचाना, सुदूरवर्ती क्षेत्र में रसद लेकर जाना, यह एक बड़ा अभियान सेना सम्पन्न किया है। वायुसेना ने इस सब कार्य में कारगो विमान का भी प्रयोग किया। रसद सामग्री के लिये आई॰एल॰ 76 और 3 एन॰एन॰के॰ बत्तीस विमानों का सहयोग लिया। इन्हीं के माध्यम से यात्रियों को भी पहुँचाया गया। सीमा सड़क संगठन (बी॰आर॰ओ॰) ऋषिकेश से बदरीनाथ तथा गंगोत्री तक की सड़क के लिये सदैव सजग है। कई स्थानों पर निरन्तर हो रहे भूस्खलन में भी उसके जवान सड़क खोलने का कार्य कर रहे हैं। वर्षाकाल में यह टास्क एक बड़ी चुनौती है।
इन सब अभियान के रूप में सेना के 8000 जवान, 10 मैरामिलिट्री दस्ते व एन॰डी॰आर॰एफ॰ की 2 बटालियनें लगी रहीं। वायुसेना ने कुल मिलाकर 2500 तक उड़ानें भरीं।
अलकनन्दा, मन्दाकिनी तथा भागीरथी घाटी के यात्रा मार्गों के ध्वस्त हो जाने के बाद सैनानियों ने पहाड़ की दुर्गम ऊँचाईयों पर चलने योग्य जो वैकल्पिक मार्ग बनाए, यह एक अत्यधिक साहसिक कार्य था। अनेक स्थानों पर पानी, बिजली तथा प्रशासन से सम्बन्धित अनिवार्य व्यवस्थाओं में भी सेना का महत्वपूर्ण योगदान है।
यह विशेष उल्लेखनीय है कि आपदा कार्यों के लिये गठित एन॰डी॰आर॰एफ॰ के सैनानी सबसे पहले राहत के लिये पहँुचे। केदारनाथ में 14 जून से हवाई सेवा बन्द थी। 16, 17 जून को जो तबाही हुई इसकी सर्वप्रथम सूचना कैप्टन भूपेन्द्र सिंह, योगेन्द्र राणा तथा बृजमोहन बिष्ट ने प्रशासन को दी। 17 जून की सायंकाल उन्होंने केदारनाथ के लिये उड़ान भरी थी। मौसम खराब होने के कारण वे केदारनाथ तो नहीं पहुँच पाये किन्तु रामबाड़ा में तबाही देखकर उन्हें आपदा का अनुमान लग गया। इतना ही नहीं तो सीमा सुरक्षा बल ने 10 करोड़ रूपये की धनराशि राहत हेतु तथा 6 करोड़ की राशि केदारघाटी के पाँच ग्रामों के पुनर्वास हेतु उत्तराखण्ड सरकार को सौंपी है।
इस रेस्क्यू आपरेशन के मध्य सेना को एक बड़ा आघात भी सहना पडा। वायुसेना, आई॰टी॰बी॰पी॰ तथा एन॰डी॰आर॰एफ॰ के 20 जवान तथा अधिकारी गौरीकुण्ड के निकट वायुसेना के हैलीकाप्टर के दुर्घटनाग्रस्त होने के कारण शहीद हो गये। कठिनाई से उनके शवों को निकाला गया तथा राष्ट्र ने उनको श्रद्धांजलि अर्पित की।
उल्लेखनीय है कि सेना का सहयोगी भाव और सौहार्दपूर्ण व्यवहार इस सब कार्य में प्रदर्शित हुआ। कमान सम्भल रहे ले॰ जनरल व कमाण्ड कर रहे अधिकारियों के वक्तव्य विश्वास से भरे थे। सदैव उन्होंने जो बात व्यक्त की उसमें उनका संकल्प झलकता था। तीर्थयात्री, स्थानीय समाज तथा राज्य का शासन/प्रशासन सभी के मन पर उनकी कर्मशीलता की अमिट छाप अंकित रहेगी।
गंगोत्री मार्ग पर सेना का हर्शिल केन्द्र राहत का एक बड़ा कार्य कर रहा था। यहाँ आर्मी मेडिकल कोर के कर्नल डा0॰ अरूण सिंह ने यात्रियों को सब प्रकार की चिकित्सा सुविधा प्रदान की व अपने मुख्यालय को लौटते समय उत्तरांचल दैवी आपदा पीडि़त सहायता समिति के केन्द्र मनेरी सेवा आश्रम में भी पधारे। उन्होंने कहा कि आप लोग एक स्वयंसेवी संगठन के नाते इस त्रासदी में यात्रियों की जो सेवा कर रहे हैं, यह एक बड़ा पुण्य का काम है। - लेखक लोक भारती के उपाध्यक्ष तथा उत्तरांचल दैवी आपदा पीडि़त सहायता समिति के प्रमुख कार्यकता हैं और इस आपदा के समय आपदा प्रबन्धन में संलग्न रहे।

‘नगाधिराज’ क्यों हैं ‘नाराज’!!

राज्य निर्माण के बाद से ही उत्तराखण्ड के राजनैतिक तबके में विकास माडल के दृष्टिकोण का सर्वथा अभाव और स्वार्थप्रेरित विकास की अंधी होड़ ही है इस आपदा की मुख्य जनक-
देवभूमि उत्तराखण्ड में चार धाम यात्रा को प्रारम्भ हुए अभी एक माह भी नहीं बीता कि बरसात की पहली दस्तक ने भीषण तबाही का रूप धारण कर लिया और एक साथ नगाधिराज हिमालय की केदारनाथ, बद्रीनाथ और गंगोत्री घाटियों में तबाही का वज्रपात हुआ, साथ ही यमुनोत्री से काली नदी तक भीषण आपदा का रूप देखने में सामने आया। आपदाओं के दर्ज इतिहास में पहली बार चार धाम यात्रा के गंगा-क्षेत्र में इतनी बड़ी विनाशलीला को दुनियाँ ने देखा। विगत वर्षों से देखने में आ रहा है कि गंगा के क्षेत्र में लगातार बादल फटने, भूस्खलन, भू-धंसाव की घटनाएं बढ़ती जा रही थी। 2010 के बरसात में आई बाढ़, 2011 में भारी भूस्खलन और नुकसान के बाद पिछले वर्ष 2012 में तो बादल फटने से आई बाढ़ में गंगोत्री घाटी में असी गंगा और केदारघाटी के उखीमठ में भारी तबाही के साथ ही कई जाने गई और इस प्रकार विगत वर्ष से ही पहाड़वासी में एक असुरक्षा और भय की भावना घर करने लगी थी। वर्ष 2006 से लगातार गंगा व हिमालय संरक्षण का प्रश्न गहराता रहा, गंगोत्री घाटी में बांधों के निर्माण के चलते सुरंग खुदान, विस्फोटों जैसी गतिविधियाँ व गंगा को रोके जाने का विरोध जोर पकड़ा व 2008 में राज्य को अपनी दों बाँध परियोजनाएं पाला-मनेरी व भैरोंघाटी बंद करनी पड़ी, इसके बाद केन्द्र में गंगा प्राधिकरण व पर्यावरण मंत्रालय ने गंभीर संज्ञान लेते हुए 600 करोड़ खर्च हो जाने के बावजूद लोहारीनाग-पाला बाँध परियोजना को भी 2010 में निरस्त कर दिया व गंगोत्री घाटी को इको-सेंसिटिव जोन बनाने की एक महत्वपूर्ण एवं आवश्यक पहल की। बावजूद इसके यहाँ राजनीतिक सूबा नहीं चेता और संस्कृतिक-पर्यावरणीय सरकारों को सिरे से नजरअंदाज कर बड़ी-बड़ी कम्पनियों को उत्तराखण्ड का दामाद बना उन्हें गंगा व हिमालय के संवेदनशील क्षेत्र सौंप कर अधाधुंध विकास की होड़ में अपना निजी स्वार्थ साधता रहा।
हिमालय अभी कच्चा पहाड़ है, भूकम्प एवं भूस्खलन के प्रति अत्यन्त संवेदनशील जोन है, जलश्रोतों एवं नदियों से भरपूर है, दिव्य वन एवं औषधियों का भण्डार है, साथ ही सदियों से ऋषि-मुनियों एवं अध्यात्म मार्ग पर चलने वालों की साधनास्थली रही है। यह सब विशेषता ही गंगा के इस क्षेत्र को अत्यन्त पवित्र एवं आस्था का केन्द्र बनाती है, किन्तु पिछले कुछ समय से पर्यावरण एवं संस्कृति की कीमत पर विकास करने वाले तथाकथित विकासवादी राज्य के मुखिया का स्वर इतना कटु हो चुका था कि उनके कई वक्तव्य अखबारांे की सुर्खियों में देखे जा सकते हैं, जैसे .........पर्यावरण को विकास के आड़े नहीं आने देंगे............. आस्था को विकास में बाधा नहीं बनने देंगे........आदि। यहाॅं तक कि गंगा हिमालय की रक्षा हेतु आवाज उठाने वाले जनों को उत्तराखण्ड से बाहर का पता, राज्य के भीतर टकराहट और अराजकता का वातावरण पैदा करवा यहाॅं की शांत संस्कृति को भी कलंकित करने का कार्य वर्तमान सरकार के कार्यकाल में हुआ है। जिसका ज्वलंत उदाहरण विगत माह चार-धाम यात्रा प्रारंभ के दिन अक्षय-तृतीया को जब हम धारी देवी मंदिर में दुर्गा-सप्तशती पाठ कर रहें थे, तो षड़यन्त्र पूर्वक प्रशासन की नाक के नीचे दिन-दहाड़े शराब पीकर मंदिर परिसर में घुस आये बाध कंपनी के गुण्डों से उत्पाद करवाकर हमारा पाठ भंग करवाया गया, अभद्रता के साथ ही जान से मारने की नियत से हमले भी हम पर हुए, जिसके विरूद्व दर्ज हमारी एफ.आई.आर. के बावजूद राजनीतिक शह के चलते अभी तक ये आरोपी खुले घूम रहे हैं। इस व्यवसायिक खिलवाड़ द्वारा अपमानित व तिरस्कृत होती हमारी संस्कृति के प्रतीक के रूप में पीडि़त की जा रही धारी माॅं के स्थान को खण्डित करते ही जैसे केदार शिव ने अपना तीसरा नेत्र खोल दिया हो। राज्य के झूठे विकास की पैरवी करते यहा के मुखिया और राजनेता राज्य से बाहर के गंगा प्रेमियों को यहा का विकास रोकने हेतु दोषी ठहराते रहे हैं। शायद इसी आस्था के अनादर का ही एक रूप यह भी है कि आज प्रकृति उन्हीं राजनेताओं को राज्य के बाहर से आये श्रद्धालुओं की रक्षा-सुरक्षा और त्रासदी के भार की कठिन जिम्मेदारी का अनुभव भी करवा रही है।
यदि पिछले वर्षों की त्रासदियों पर नजर डालें तो टिहरी बाध सहित, मनेरी भाली, कोटेश्वर और विष्णुप्रयाग बांधों के बनने के बाद से ही इन बांधों के प्रभाव में आने वाले उत्तरकाशी से लेकर रूद्रप्रयाग और चमोली जिले तक के क्षेत्र में भीषण भूस्खलन, भूधंसाव, बादल फटने जैसी घटनाओं ने सर्वाधिक तबाही मचाई है। यही वह क्षेत्र भी है जहाँ गंगा-भागीरथी सहित अलकनंदा और मंदाकिनी पर दर्जनों बाध परियोंजनाएं प्रस्तावित है तथा कई बांध परियोजनाओं जैसे श्रीनगर, सिंगोली-भटवाडी, फाटा-ब्युंग, विष्णुगाड-पीपलकोटी, तपोवन-विष्णुगाड आदि इसी क्षेत्र में निर्माणाधीन हैं। टिहरी बांध का विशालकाय जलाशय, सुरंगों में डाली जा रही गंगा की धाराएं, बेतरतीब सड़कों और भवनों को निर्माण, अवैध वन कटान, खनन आदि हिमालय के पर्यावरण को दुष्प्रभावित कर रहे हैं। लेकिन इन सबको नजरंअदाज कर सुरंग और जलाशय युक्त बाँधों के निर्माण की होड़ मची है जिसके चलते उत्तराखण्ड के गंगा क्षेत्र में निर्मम वन कटान, विस्फोटों, सुरंगों के खुदान और भारी भरकम निर्माण व मशीनी गतिबिधियां संवेदनशील पारिस्थितिकीय तंत्र पर निश्चित रूप से गंभीर दुष्प्रभाव उत्पन्न कर रही हैं। इन क्षेत्रों में जहाॅं पानी के प्राकृतिक श्रोत व झरनों को सुखाती जा रही हैं वहीं भूस्खलन, भूधंसाव के साथ ही बादल फटने से आई बाढ़ का रूप लेकर भीषण तबाही का पर्याय भी ये मानवीय गतिविधियांँ बनती जा रही हैं।
यह मात्र संयोग नहीं हो सकता कि यह वही क्षेत्र है जहां टिहरी और मनेरी बांध निर्माण के नक्शे में आने के समय से ही 1978 में आई उत्तरकाशी की विनाशकारी बाढ़ के रूप में प्रकृति ने यह स्पष्ट संकेत किया। इसके बाद से ही जगह-जगह भूस्खलन, 1991 में उत्तरकाशी व 1998 में चमोली के विनाशकारी भूकंप, 2003 में वरूणावत त्रासद और हालिया वर्षों में तो उत्तरकाशी के भटवाडी, टिहरी में कोटेश्वर से लगे गावों जोशीमठ के चाई गाँव सहित कई कस्बों के जमींजोद हो जाने के साथ ही बादल फटने की घटनाओं ने व्यापक और विनाशकारी रूप गंगा के इस क्षेत्र में ले लिया है। जिन्होंने भी गंगा के इस क्षेत्र का निरीक्षण किया है वे यह जानते हैं कि सम्पूर्ण क्षेत्र में भारी तादात में वनों का कटान हुआ है, सुरंगों के खुदान और विस्फोटों के दुश्प्रभाव से जल-श्रोत सूख गये हैं, चारा-चुगान और वनस्पतियों का नाश और स्थानीय संस्कृति एवं परम्पराओं को गंभीर रूप से क्षति पहुंची है। कई किलोमीटर तक गंगा, अलकनंदा की धाराएं बांधों की सुरंगों और जलाशयों में बांधे जाने के कारण सूख गयी हैं, वर्षा काल को छोड़कर अन्य समय तो वहाॅं इतना पानी भी उपलब्ध नहीं रहता कि लोग आचमन ले सकें, मृतकों के अंतिम संस्कार हेतु जल के लिए भी ग्रामीणों को बाॅंध कंपनियों से जल छोड़ने की गुहार लगानी पड़ती है और अब 70 बाॅध केवल गंगा के इसी क्षेत्र में गंगा-भागीरथी, अलकनंदा और मंदाकिनी पर लादे जाने की तैयारियां चल रही है। विगत वर्षों से गंगा-हिमालय संरक्षण हेतु चल रहे आन्दोलन और इन बांधों के प्रबल वैचारिक और सैद्धंातिक विराध के उपरान्त भी राज्य के सभी प्रमुख राजनीतिक दल बांधों के निर्माण की पुरजोर पैरवी करते रहे हैं। वर्तमान राज्य सरकार के मुखिया को तो इस कदर विकास की काली पट्टी बाॅंध अधे हो चुके हैं कि उन्हें बाधों के निर्माण के सिवाय राज्य के विकास का और कोई रास्ता ही नही सूझता, तभी तो वे न केवल दल-बल के साथ गंगोत्री घाटी को इको जोन बनाये जाने की अधिसूचना के विरूद्ध अपने ही दल के प्रधानमंत्री के पास शिकायत लेकर पहुँच जाते हैं वरन बांधों के निर्माण को पहाड़ के विकास के लिए अति आवश्यक बताते हुए केन्द्र द्वारा निरस्त की गयी गंगोत्री घाटी की बाध परियोजनाओं को पुनःचालू करवाने की भी निर्लज्जता पूर्वक पैरवी भी करते हैं।
वास्तव में उत्तराखंड राज्य निर्माण के बाद से यहा के राजनीतिक तबके के अधिकांश लोग यहाॅं की संस्कृति से जुड़े दिव्य पर्यावरण और संसाधनों को केवल अपने राजनीतिक व आर्थिक स्वार्थों की पूर्ति का पर्याय मात्र देखते रहे हैं। इस क्षेत्र सहित सारे राज्य की प्रतिष्ठा के रूप में विश्व में चार धाम यात्रा को देखा जाता है, लाखों लोगों का रोजगार एवं राज्य की आय का महत्वपूर्ण अंश भी इससे जुड़ा है। देश-विदेश के करोड़ों जनों को यह यात्रा संस्कृति के एक सूत्र में पिरोती आई है, किन्तु दुर्भाग्यपूर्ण रूप से चार-धाम यात्रा सहित पर्वतीय क्षेत्र के अनुकूल विकास के माडल का सर्वथा अभाव हमारे राजनीतिक दृष्टिकोण में पाया जाता है और राज्य निर्माण के बाद से किसी भी राजनीतिक दल अथवा नेता ने इसमें कोई रूचि नहीं दिखाई। इसीलिए बेतरतीब सड़कों का निर्माण, अवैध वनों का कटान, खनन, अतिक्रमण आदि में भी राज्य निर्माण के बाद चिंताजनक बढ़ोत्तरी होती रही, देव भूमि की संस्कृति एवं पर्यावरण के प्रति अनादर एवं संवेदनहीनता का ही परिणाम था कि सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय से पूर्व ही विवादास्पद श्रीनगर बाँध परियोजना के मार्ग में रोड़ा बन रही माँ धारी देवी सिद्ध पीठ को 16 जून, 2013 की शाम को खंडित कर प्रतिमा को विस्थापित कर दिया, एवं केदारनाथ के इस रौद्र तांडव का समय भी संयोगवश उसी शाम से प्रारम्भ हुआ।
यहाँ की संस्कृति एवं पर्यावरण को मद्देनजर रखते हुए जहाँ देव-भूमि के अनुकूल विकास नीति का निर्माण होना चाहिए, उसके विपरीत यहाँ की सरकारंे और राजनेता संस्कृति और पर्यावरण की कीमत पर बनाए जा रहे बांधों को ही एक मात्र विकास का रोजगार का साधन देखती हैं। वर्तमान आपदा इसी खोखली और विनाशकारी सोच के साथ गंगा-हिमालय से किये जा रहे व्यावसायिक खिलवाड़ का दुष्परिणाम है। इसी व्यावसायिक नजरिये से प्रेरित नदी तटों के किनारे निर्मित भवन, सड़के, रिर्सोट आदि ने तबाही को और अधिक बढ़ा दिया, जिसके मुख्य दोषी के रूप में इस क्षेत्र की नीति निर्धारक सरकारें, योजना आयोग व राजनेता हैं, जो देव-भूमि उत्तराखण्ड के मूल स्वरूप और संस्कृति को बदलकर इसे बाँध-भूमि (ऊर्जा-प्रदेश) बनाने पर अमादा है। वैज्ञानिक शब्दावली में कहें तो, यहाँ के पर्यावरण, संस्कृति एवं सामाजिक ताने-बाने के महत्व के प्रति उदासीन व संवेदनहीन हुए लोग देव-भूमि का डी॰एन॰ए॰ परिवर्तन कर इसे बाँध-भूमि बनाने को विकास समझ रहे हैं। वास्तव में मानव द्वारा प्रकृति के साथ मोल लिए द्वन्द का परिणाम इस भीषण तबाही के रूप में नजर आ रहा है।
हमारे नीति-निर्धारको को समझना होगा कि यदि भारत-भूमि की संस्कृति व आस्था के प्रतीक ‘गंगा-हिमालय’ के साथ आदर पूर्वक व्यवहार किया जाता, बांधों में बाँधने का खिलवाड़ न किया होता, नदियों के किनारे इस प्रकार व्यावसायिक अतिक्रमण का शिखर न होते, यात्रा के स्वरूप को पर्यटन के बजाय तीर्थाटन के रूप में विकसित किया जाता तो कदाचित नगाधिराज यों नाराज न होते।

अपने हित में हिमालय और उसकी पीड़ा को समझें - संकलित

1. उत्पत्ति - हिमालय की उत्पत्ति प्लेटटेक्टोनिक सिद्धान्त के अनुसार इण्डो-आस्टेलियन और यूरेशियन प्लेट की टकराहट के चलते हुई है। करीब सात करोड़ साल पहले इण्डो-आस्टेलियन प्लेट उत्तर की ओर हर साल 15 सेमी की दर से खिसक रही थी। बाद में इसने टेथीस सागर को पूरी तरह खत्म कर दिया। यहां तक कि उत्तर-पूर्व में अभी तक भी जमीन के नीचे समुद्री जीवन के अवशेष मिल जाते हैं। अभी भी प्लेटों के दबाव की वजह से हिमालय की ऊंँचाई लगातार बढ़ रही है। धरती पर हिमालय सबसे युवा पर्वत श्रंखला है और सेन्डीमेटरी व मेटामार्फिक चट्टानों से निर्मित है। पश्चिम में सिंन्धु नदी के पास नागा पर्वत से लेकर, पूर्व में व्रह्मपुत्र नदी के निकट नमचा बरवा तक इसका विस्तार है।
2.श्रेणियां- हिमालय को मोटे तौर पर तीन श्रेणियों में बांटा जा सकता है -
अ. बृहत्तर (ग्रेटर) हिमालय - पर्वत श्रंखला का सबसे ऊँंचा और उउत्तरी हिस्सा। इसका विस्तार पाकिस्तान, उउत्तरी भारत, नेपाल, भूटान से लेकर पूर्व में अरूणांचल प्रदेश तक है। उउत्तर में यह पूरी लम्बाई में तिब्बत स्वायŸा के दक्षिणी हिस्से से सटा हुआ है। इसकी कुल लम्बाई लगभग 2500 किमी और औसत ऊंचाई 6,100 मी॰ से अधिक है। इस पर दुनियाँं की सबसे ऊंची चोटी माउन्ट एवरेस्ट (8,848 मी॰) है।
ब. लोअर हिमालय - इसे लघु हिमालय या महाभारत श्रंखला भी कहा जाता है। 1800-4,600 मी॰  ऊंची पूर्व-पश्चिम दिशा में ग्रेटर हिमालय के समानान्तर  सिन्धु नदी से लेकर उŸारी भारत, नेपाल और सिक्किम से होती हुई भूटान के पूर्व में ब्रह्मपुत्र नदी के आस-पास तक है।
स. शिवालिक हिमालय - इसको बाहरी हिमालय या सब हिमालय रेंज भी कहा जाता है। इनकी औसत ऊंँचाई 1500-2000 मी॰ और चैड़ाई 10-15 किमी है। यह हिमालय का सबसे दक्षिणी हिस्सा है। इनका विस्तार कश्मीर, हिमांचल, उŸाराखण्ड, नेपाल, पश्चिम बंगाल, भूटान और अरूणांचल प्रदेश तक है।
3.पारिस्थितिकी -हिमालय की पारिस्थितिकी अत्यन्त नाजुक व विविधता से परिपूर्ण है। प्राकृतिक भू-सम्पदा, औषधीय सम्पदा, जंगल, वन्यजीव, पादप प्रजातियाँं, जैवविविधता, ग्लैशियर और जल स्रोत आदि विशेषतायें इसको खास बनाती हैं। इसकी अपनी एक जलवायु है, जो एशिया की अधिकांश जलवायु को प्रभावित करती है। इसके टिकाऊपन पर एशिया के 1.3 अरब लोगों की आजीविका निर्भर है।
4. परिवर्तन - पारिस्थितिकी तन्त्र नाजुक होने के कारण हिमालय पर किसी भी प्रकार का गैर टिकाऊ बदलाव भारत सहित पूरे एशिया सहित 130 करोड़ लोगों को प्रभावित कर सकता है। जलवायु परिवर्तन से ग्लोबल वार्मिंग होगी, जिससे तापमान में वृद्धि और ग्लेशियरों पर प्रभाव होगा और उससे नदियों के अस्तित्व पर संकट खड़ा हो जायेगा। नदियों के प्रभावित होने से वह बड़ा भू-भाग व वहां के निवासी प्रभावित होगे, जिसे नदियां सींचकर धनधान्य से परिपूर्ण करती हैं। आईपीसीसी के अनुसार अगले 100 साल में दुनियां का औसत तापमान 1.6 से 3 डिग्री सेल्शियस तक बढ सकता है।
5. विस्तार - भारतीय क्षेत्र में हिमालय का भौगोलिक विस्तार 5.3 लाख वर्ग किमी तक फैला है। इसके अन्र्तगत व्यापक पर्वत श्रंखलायें सिन्धु और ब्रह्मपुत्र नदी तन्त्र के बीच 2500 किमी तक फैली हैं। हिमालय 80 से 300 किमी तक चैड़ाई के क्षेत्र में फैला है, जिसकी ऊंँचाई 8 हजार मीटर तक है और उसकी जलवायु भारतीय क्षेत्र के एक बड़े भू-भाग को प्रभावित करती है। यह भारत के समस्त उत्तरी सीमा का प्रहरी है, जिसके भौगोलिक क्षेत्र का 41.5 फीसदी हिस्सा वनों से आच्छादित है, जो देश के कुल वन क्षेत्र का एक तिहाई है और अच्छे वन के रूप में इसकी हिस्सेदारी लगभग आधी (47 फीसदी) है। इसके वन क्षेत्र में पुष्पीय पौधों की 8000 प्रजातियां, 816 से अधिक वृक्षों की प्रजातियां, 775 खाने योग्य पौधे और 1740 के करीब औषधीय महत्व की प्रजातियां हैं। इसका विस्तृत हरियाली से आच्छादित क्षेत्र कार्बन डाईआक्साइड अवशोषण का एक बड़ा स्रोत्र है। इसका हमेशा बर्फ से ढ़का रहने वाला ग्लैशियर क्षेत्र 17 फीसदी और मौसमी बर्फ से ढ़का रहने वाला क्षेत्र 30-40 फीसदी है। देश की करीब चार फीसदी आबादी भारतीय हिमालयी क्षेत्र में निवास करती है, जिसकी आजीविका इसी हिमालय पर निर्भर है। इसके कैलाश पर्वत के निकट से निकने वाली दुनियांे की तीन प्रमुख नदियां सिन्धु, गंगा और ब्रह्मपुत्र हिमालय को पार करती हैं और इनके सामूहिक अपवाह तन्त्र से करीब 60 करोड़ लोग जुड़े हैं।
6. परिणाम - भौगोलिक कारणों, आबादी के बढ़ते दबाब, विकास की अंधी दौड़, संसाधनों के अत्यधिक दोहन तथा हिमालयीन अन्य चुनौतियों नें हिमालय को अत्यन्त संवेदनशील तथा जलवायु परिवर्तन की समस्या ने इन कारकों को और भयावह कर दिया है। मानव जनित कारकों और जलवायु परिवर्तन से हिमालयीन पारिस्थितिकी के सामने संकट खड़ा हो चुका है। परिणामस्वरूप अनियमित और असंतुलित वर्षा, भू-स्खलन, नदियों के पानी और बहाव में अनियमितता, जैव विविधता कां क्षरण, सिकुड़ते ग्लेशियर, घटते और कटते जंगल,  प्राकृतिक आपदाओं में वृद्धि, पलायन और हिमालयी पारिस्थितिकी पर आश्रित जनजीवन के दरबदर जैसी समस्यायें दिखाई दे रही हैं, निदान खोजना है। 
दूर से देखने पर पहाड़ जितने कठोर प्रतीत होते है, अन्दर से वे उतने ही नाजुक होते हैं। उनकी पारिस्थितिकी छुई-मुई जैसी होती है। इसकी पारिस्थतिकी तन्त्रों के बीच एक तादातम्य स्थापित होता है। इस पारिस्थितिकी तन्त्र के तहत पहाड, झरने, झील, छोटी-बड़ी नदियांँ, जंगल जीव-जन्तु एवं वनस्पितियांँ आदि आती हैं। इस तन्त्र में से अगर किसी एक को भी छेड़ा जाता है तो पूरा पारिस्थितिकी तन्त्र गड़बड़ा जाता है। वर्तमान हिमालयीन ‘सुनामी’ पारिस्थितिकी तन्त्र के साथ किए जा रहे खिलवाड़ का परिणाम है।
पहाड़ अपने आकार के बराबर ही लाभकारी हैं। इनकी पारिस्थितिकी को बिगाड़ कर इन्सान सोने के अण्डे देने वाली मुर्गी को मार कर एक बार में ही सभी अण्डे लेने के उपक्रम कर रहा  है।

प्रलय संकेतों पर गौर कीजिए - हृदय नारायण दीक्षित

प्रकृति की शक्तियां देवता हैं, हिमालय देवालय और उत्तराखंड देवभूमि है। फिर, क्या वजह हो सकती है - इन्द्र के कोप की? ऋगवेद के इन्द्र अविरल जल प्रवाह में आनन्दित होते हैं। वृत्ति जल प्रवाह रोकते हैं। इन्द्र उनका वध करते हैं।
वैदिक ऋषियों नें जल की आराधना की है। उन्हे जल माताएं कहा है। बीच में आ गये जल अवरोधक शत्रु। नदियों पर जगह-जगह बांँध बने। जहां नदियां बहती थीं, मन्त्र गूंजते थे, योग, ध्यान और उपासनाएं चलती थीं, वहांँ नदी क्षेत्र में होटल बने। जल, जंगल और जमीन आधुनिक वृत्तासुर अपने कब्जे में लेने लगे।
भगीरथ का तप था कि गंगा उतरीं। यहां वन संरक्षित थे। कथित विकास के नाम पर वन काटे, पहाड़ उजाड़े। डायनामाइट चलाकर पहाड़ और धरती का अन्तस्थल छलनी किया। अर्थववेद के भूमिसूक्त में अर्थवा ने पृथ्वी से कहा ‘हे माता! यज्ञ और मंगल कार्योंं के लिए आपको खोदते हैं, अपको चोट न लगे। हम क्षमा प्रार्थी हैं। पर आज प्रकृति बिरूद्ध जो कुछ हो रह है, हम सबने इसे विकास कहा। वही विकास विनाश के रूप में सामने है।
प्रकृति को जल अवरोध स्वीकार नहीं। ऋगुवेद का ‘वृत्त’ प्रतीक ध्यान देने योग्य है। एक मन्त्र में ‘वृत्त’ का शरीर बहुत व्यापक बताया है। मुनाफाखोर सभ्यता का शरीर भी बहुत बड़ा है। ऋगुवेद (1.52 व 8.12) के अनुसार इन्द्र उनका वध करते हैं और नदी प्रवाह के अवरोध हटाकर बहाव सुनिश्चित करते हैं। हमारे पूर्वजों का ध्यान जल की हर एक गतिविधि पर था। मेंघों पर, मेंघों में दमकती विद्युत पर, वर्षा की बूंदों पर, नदियों और समुद्रो पर भी, लेकिन आधुनिक विकास के मालिकों का ध्यान सिर्फ मुनाफे पर ही है।
शिव ने रोका था गंगा के उद्दाम वेग को और जितना जरूरी था भगीरथी का उतना प्रवाह ही नीचे आया। आज उस संस्कृति के मर्म को समझने हेतु भारत के प्रथम प्रज्ञा पुरूष मनु का संदेश ध्यान देने योग्य है। वह कहते हैं- ‘‘प्रकृति के सभी जीवों, शक्तियों और नियमों का सम्मान करना ही होगा।’’ हम सब भारतवासी इसी प्रकाश में देव भूमि पर आये प्रलय संकेतों को समझें ंऔर आगे का मार्ग प्रशस्त करें।

प्रकृति चेतावनी देती है, मगर हम चेतते नहीं - वी॰के॰ जोशी

देवभूमि माना जानेवाला राज्य उŸाराखण्ड़ इन दिनों जबरदस्त त्रासदी से गुजर रहा है। हालात यह है कि जनता सरकार को और सरकार प्रकृति को दोषी ठहरा रही है। दोष प्रत्यारोपण की बजाय यह समझना आवश्यक है कि प्रकृति का यह कहर क्यों बरपा और इसमें हमारा कितना हाथ है। साथ ही भविष्य में बचाव की रणनीति पर भी विचार करने की आवश्यकता है।
आज से मात्र 5 करोड़ वर्ष पूर्व भारतीय प्लेट की तिब्बती प्लेट से हुई जबरदस्त टक्कर के कारण जन्मा हमारा हिमालय है। आज भी भारतीय प्लेट, तिब्बती प्लेट के अन्दर 5 सेमी प्रति वर्ष की दर से धंसती जा रही है।  जिसके फलस्वरूप हिमालय के गर्भ में हर समय तनाव एवं संवेदनशीलता बनी रहती है। ध्यान देने वाली बात यह भी है कि हिमालय की भू-वैज्ञानिक एवं भू-आकृतिक परिस्थितियां ऐसी हैं कि वे हिमस्खलन, भूस्खलन, भूकम्प एवं अचानक वाढ़ आदि प्रकृतिक आपदाओं से कभी भी ग्रसित हो सकती हैं। अतः हिमालय में कोई भी विकास योजना बनाने से पूर्व इन बातों को जेहन में रखना आवश्यक है।
जहांँ तक प्रकृति के प्रकोप की बात है, तो उसे रोका नहीं जा सकता और आने वाले समय में इस प्रकार की घटनाओं की पुनरावृत्ति नकारी नहीं जा सकती। कुछ प्राकृतिक आपदायें हिमस्खलन, भूस्खलन एवं बाढ़ का पूर्वनुमान संभव है, परन्तु भूकम्प का नहीं। प्रसिद्ध भूवैज्ञानिक प्रो॰खड़गसिंह वल्दिया एवं प्रसिद्ध अमेरिकी भूकम्पविद रोगर विल्हैम के मुताविक केन्द्रीय कुमाऊंँ क्षेत्र जिसमें वागेश्वर और अल्मोड़ा भी आते हैं, बड़े भूकम्प की आशंका है। परन्तु कब यह भूकम्प आयेगा, कोई नहीं कह सकता। परन्तु शायद हम इन चेतावनियो से अनभिज्ञ हैं।
यदि हम कुछ पुराने भूस्खलनों की बात यहाँं दोहरायें तो अनुचित न होगा। सैलानियों के स्वर्ग नैनीताल को अंग्रेज व्यापारी तथा शिकारी पी॰बैरन नें 1841 में चुना और 1858 तक नैनीताल में अंग्रेजों की भरमार हो गई। पर तभी 1867 नैना पीक की ओर से हुए भूस्खलन से पिलग्रिम के घर का कुछ भाग भी ध्वस्त हो गया। आनन-फानन में अंग्रजों ने नैनीताल में जल निकासी के लिए नालों का जाल फैला दिया। तभी 1880 में शेर का डांडा की ओर से हुए भूस्खलन के कारण 193 लोग मारे गये तथा झील का एक भाग आज के फ्लैट्स के रूप में आ गया। इसके बाबजूद नैनीताल में निर्माण पर कोई रोक नहीं लगी। आज भी शेर का डांडा उतना ही खतरनाक है जितना 1880 में था।
दूसरा उदाहरण है उत्तरकाशी का। 2003 में उŸारकाशी के वरूणाव्रत पर्वत पर कार्य कर रहे भारतीय भूवैज्ञानिकों ने सर्वेक्षण में देखा, चोटी से धीरे-धीरे भूस्खलन हो रहा है। उन्होने तुरन्त जिलाधिकारी को सूचित किया और सरकारी तन्त्र ने तत्काल नीचे बसी आबादी को सुरक्षित स्थानों में भेज दिया। लगातार वर्षा हो रही थी और पानी के दवाव से 24 सितम्बर को बरूणाव्रत पर्वत पूरे जोर-शोर के साथ नीचे चल दिया और अपने साथ ले गया 40 से 50 हजार क्युविक मीटर मलबा। जान का नुकसान तो बच गया लेकिन नीचे सड़क के किनारे बने घर, होटल सब ध्वस्त हो गये। शायद हमारी याददास्त बहुत ही कमजोर है और उससे भी घनी आबादी जोखिम भरे क्षेत्र में फिर से बस गई। इतिहास गवाह है कि वरूणाव्रत पर्वत से पूर्व में ताम्बाखाण्डी तथा ज्ञानसू में भी इसी प्रकार के भयंकर भूस्लखलन हो चुके हैं।
ऐसे उदाहरण अनेक हैं, जैसे 1893 में गौना में पर्वत गिरने से बिरही गंगा अवरूद्ध हो गई थी और वन गया था गौना ताल। अंगे्रज भूवैज्ञानिक टीएच हालैण्ड ने हरिद्वार से 160 मील की पैदल (उस समय हैलीकैप्टर नहीं होते थे) यात्रा करके रिपोर्ट में लिखा था कि 25-26 अगस्त 1984 तक बांध टूट जायेगा और नियत समय पर बांध टूटा जिससे चमौली में नदी का जल स्तर 160 फिट तथा हरिद्वार में 1 फिट चढ़ा। चूंकि उस समय भूवैज्ञानिकों की रिपोर्ट को गंभीरता से लिया जाता था, सरकार ने बन्दोवस्त कर रखा था और जान का नुकसान नहीं हुआ।
अब विज्ञान का युग है और पूर्वानुमान के लिए सेटेलाइट हैं, जिसके माध्यम से इस क्षेत्र में हो रहे हर क्षण हो रहे बदलाव पर नजर रखी जा सकती है। स्वचालित मौसम सूचना एकत्रित करने के सैकड़ों केन्द्र स्थापित कर समस्त सूचना मौसम के पूर्वानुमान लगा रहे केन्द्रों को पे्रषित की जानी चाहिए। जहांँ से समस्त जिलाधिकारियों को नित्य मौसम की बुलेटिन भेजी जा सकती है और वह आवश्यकतानुसार तैयारी कर सकते हैं।
हमारे पर्वत जितने विशाल और स्थितिप्रज्ञ दिखते हैं, उतने हैं नहीं। इन पर निर्माण से पूर्व स्थापत्य एवं जल निकासी आदि का ध्यान रखना आवश्यक है। पिछले दशक में उŸाराखण्ड में अन्धाधुन्ध निर्माण हुआ है, पर क्या सारा निर्माण पर्यावरण सुरक्षा को मद्देनजर रख कर किया गया है? शायद नहीं। इस प्रकार के निर्माण पर ंस्थानीय सरकार को सख्ती से रोक लगानी होगी तथा स्थानीय निवासियों को स्वनुशासन का पालन करना होगा तभी शायद देवभूमि भविष्य में सही मायनों में ‘देवभूमि सिद्ध’ हो सकेगी। -प्रसिद्ध पर्यावरणविद।

अपने हाथों रची गई तबाही - कौशल किशोर

उत्तराखंड की भीषण आपदा और भयानक तबाही ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया है। यह प्रकृतिक आपदा नहीं, बल्कि अन्धाधुन्ध विकास के नाम पर प्रकृति के साथ किए गये अत्याचार का प्रतिकार है। विकास के नाम पर उपजी परियोजनाओं ने पर्वत के नैसर्गिक स्वरूप को बिगाड़ दिया जिसने मौसम का मिजाज बदलने में अहं भूमिका निभाई। प्रकृति अपनी नैसर्गिक अवस्था में वायुमण्डल में जमा वाष्प को समान रूप से वितरित करती है, परन्तु मानवीय हस्तक्षेप से इसमें बाधा उत्पन्न होती है और उसका नतीजा बादलों के फटने के रूप में सामने आता है।
हिमालय क्षेत्र में उत्तर भारत का सदावहार व सघन वन था, जो अब नष्ट हो चुका है। भूमि को सहेजने और संवारने में कारगर वनस्पतियों का विनाश 10वीं सदी में फ्रेडरिक बिल्सन के समय ही शुरू हो गया था, जब हिमालयन वृक्ष बांझ को नष्ट कर उसकी जगह चीड़़ के जंगलों में तब्दील कर दिया गया। परिणामस्वरूप मृदा की गुणवत्ता नष्ट हुई, वर्षा जल को संजोने की क्षमता घटी और उसके कारण धीरे-धीरे पहाड़ी नाले व झरने कमजोर पड़ते गये, उपयोगी वनस्पितियांँ नष्ट प्राय हो गईं, अन्ततः जैवविविधता की अपूरणीय क्षति हुई।
हिमालय का सौंदर्य और ऐश्वर्य ही उसका सबसे बड़ा दुश्मन साबित हुआ। विकास के लिए बड़े पैमाने पर जंगलों का सफाया किया, विस्फोंटों का बेतहाशा इस्तेमाल कर पहाड़ काटे व लम्बी सुरंगें बनाई गईं। वर्तमान समय उŸाराखण्ड़ में 70 से अधिक परियोजनाओं पर काम चल रहा है, जिनके और बढ़ने की सम्भावना है।
यह सब पहाड़ों को कमजोर करने के लिए काफी था। वस्तुतः यह स्वार्थ, लालच और भ्रष्टाचार के बोये बीज की उपज है। पर अब! यह सरकार और समाज के चेतने और जागने का वक्त है। प्रकृति और उसकी धाराओं के साथ छेड़-छाड़ बंद कर सृजन के अविरल और निर्मल मार्ग को अपनाना ही उपयुक्त निदान है। - पर्यावरण विशेषज्ञ

विकास की विभीषिका - भरत झुनझुनवाला

मई, २०१३ को उत्तराखण्ड में आई विभीषिका का प्रत्यक्ष कारण ग्लोबल वार्मिंग दिखता है। धरती का तापमान बढ़ने से बरसात तेज और कम समय में हो रही है। भीषण बरसात और सूखे के दौरे पड़ रहे हैं। वायुमण्डल की विशेष परिस्थिति में बादल फटते हैं। सामान्य परिस्थिति में हवा पानी की बूंदों को लेकर ऊपर उठती रहती है। छोटी बूंदे बड़ी होती जाती हैं। तापमान कम होता है तो यह बूंदें बर्फ बन जाती है और ओले का रूप धारण कर लेती हैं। विशेष परिस्थितियों में हवा ऊपर नहीं उठ पाती, परन्तु पानी की बूंदें बड़ी होती जाती हैं और ये बड़ी बूंदें एकदम से गिर पड़ती हैं, जिसे बादल फटना कहते है।
गिरने वाले इस पानी को यदि पहाड़ सहन कर लेता है तो विशेष नुकसान नहीं होता है। पहाड़ कमजोर हो तो वही पानी विभीषिका का रूप धारण कर लेता है। बड़ी मात्रा में पेड़ लगे हों तो पानी उनकी जड़ों के सहारे पहाड़ के अन्दर तालाबों में समा जाता है, जिन्हे एक्वीफर कहते हैं। पेड़ न हों तो वही पानी सीधी धारा बनाकर नीचे गिरता है और तब उफनती नदी अपनें साथ पेड़ों और पत्थरोें को लेकर बहती है। इनकी टक्कर से मकान और पुल घ्वस्त हो जाते है, जैसा कि हाल में हुआ है।
केदारनाथ के नीचे फाटा व्यूंग और सिंगोली भटवारी जल विद्युत परियोजनाएंँ बनाई जा रही हंै। इनमें लगभग 30 किलोमीटर की सुरंग खोदी जा रही है। भारी मात्रा में डायनामाईट का प्रयोग किया जा रहा है। इन विस्फोटों से पहाड़ के एक्वीफर फूट रहे हंै और जमा पानी रिस कर सुरंग के रास्ते निकल रहा है। जिससे पहाड़ के जल स्रोत सूख रहे हैं। पेड़ों को पानी नहीं मिल रहा है और वे कमजोर हो रहे हैं। धमाकों से पहाड़ कमजोर व जर्जर हो रहे हैं। फलस्वरूप पानी बरसने से चट्टानें धसक रही हंै तथा पत्थर नीचे आ रहे हैं। मैने सूचना के अधिकार के अन्तर्गत डाइरेक्टर जनरल आफ माइन सेफ्टी से पूछा कि विस्फोट की मात्रा के निर्धारण संम्बन्धी फाईल मुझे उपलब्ध कराई जाए। उत्तर दिया गया कि फाईल गुम हो गई है। इससे ज्ञात होता है कि कम्पनियांँ विस्फोटों पर परदा डालना चाहती हैं। वर्तमान विभीषिका में श्रीनगर परियोजना का विशेष योगदान रहा है। कम्पनी ने भारी मात्रा में मिट्टी को नदी के किनारे डाल दिया था। जलस्तर बढ़ने पर यह मिट्टी नदी के साथ बहकर घरों में घुस गई और राष्ट्रीय राजमार्ग पर जमा हो गई। राजमार्ग सात दिनों से बंद है।
सारांश है कि बादल फटना सामान्य बात है, परन्तु गिरे पानी को ग्रहण करने की धरती की शक्ति को हमने जलविद्युत परियोजनाआंें को बनाने के लिए किए जा रहे विस्फोटों से कमजोर बना दिया है। ऐसा ही प्रभाव सड़कों को बनाने के लिए गए विस्फोटों और गैरकानूनी खनन का होता है। नदी के पाट पर किए जा रहे अतिक्रमण से व्यक्ति अपने को बाढ़ के मुंह में डालता है।
जल विद्युत परियाजनाओं से उत्पन्न विद्युत का लाभ शहरी उपभोक्ताओं को होता है। उत्तराखण्ड के पास अपनी जरूरत भर बिजली उपलब्ध है, लेकिन राजस्व कमाने के लिए राज्य सरकार प्रत्येक नदी के प्रत्येक इंच के बहाव पर जल विद्युत परियोजना बनाने का प्रयास कर रही है। इन परियोजनाओं से राज्य को 12 प्रतिशत बिजली फ्री मिलती है। इसे बेचकर सरकार राजस्व कमाती है। इस राजस्व में आधा सरकारी कर्मियों के वेतन को जाता है। शेष में बड़ा हिस्सा अन्य प्रशासनिक खर्चों में जाता है, जैसे गाड़ी इत्यादि में। बची रकम विकास कार्यों में खर्च की जाती है। इसमें 20 से 50 प्रतिशत घूस में जाता है। आम आदमी को राजस्व का केवल 20-25 प्रतिशत ही मिलता है, लेकिन परियोजना के 100 प्रतिशत दुष्परिणाम को आम आदमी झेलता है। उसकी बालू-मछली से होने वाली आय बंद हो जाती है। परियोजना में उत्पन्न मच्छरों से आम आदमी की मृत्यु होती है। विस्फोटों से आई विभीषिका का ठीकरा भी आम आदमी के सिर ही फूटता है।
इसी प्रकार का प्रभाव दूसरे विकास कार्यों का होता है। अंधाधुंध खनन से लाभ खनन माफिया को होता है। खनिज का उपयोग मुख्य रूप अमीरों की इमारत बनाने के लिए किया जाता है। सरकार को अवैद्य खनन से राजस्व कम और सरकारी कर्मियों को घूस ज्यादा मिलती है। नदी के पाट में अतिक्रमण का प्रभाव भी ऐसा ही है। अतिक्रमण प्रभावी वर्ग ही करता है। अमीर को सस्ती भूमि मिल जाती है। सरकार को रजिस्ट्रेशन शुल्क नहीं मिलता है। हाँं घूस भरपूर मिलती है। इनके कार्यों के विपरीत सड़क निर्माण का आम आदमी पर सुप्रभाव पड़ता है। उसके लिए आवागमन सुगम हो जाता है। कालेज, अस्पताल और साफ्टवेयर पार्क बनाने का आधार बनता है। इनसे दीर्घकालीन और उच्चकोटि के रोजगार स्थापित होते हैं, जैसे लेक्चरर या साइंटिस्ट के।
समग्र दृष्टि से देखने पर विभीषिका के कारणों में मात्र सड़क बनाना ही लाभप्रद दिखता है। सड़क निर्माण से आपदा में वृद्धि न हो, इसके लिए डायनामाइट का उपयोग अपरिर्हाय स्थिति में ही किया जाए। छेनी और सब्बल से ही पहाड़ काटना चाहिए। हां इससे निर्माण कार्य धीमी गति से होगा, पर पहाड़ जर्जर होने से बच जाएंगे।
अवैध खनन, अतिक्रमण और जल विद्युत परियोजनाएँं इस विभीषिका के कारण हंै। इन परियोजनाओं में घूस वसूलने के पर्याप्त अवसर उपलब्ध हैं। जानकार बताते हैं कि जल विद्युत परियोजनाओं के अनुबन्ध पर दस्तखत करने की एक करोड़ रूपये प्रति मेगावाट की घूस दी जाती है?
उत्तराखण्ड में 40,000 मेगावाट की सम्भावना को देखते हुए घूस की इस विशाल राशि का अनुमान लगाया जा सकता है। इन कार्यों से राज्य सरकार गरीब पर आपदा डालकर अमीर को लाभ पहुँचा रही है और इस पाप में अपना हिस्सा बटोर रही है। (लेखक आर्थिक मामलों के विशेषज्ञ हैं।)
गम्भीर गुनाह
बादल फटना सामान्य बात है, परन्तु गिरे पानी को ग्रहण करने की धरती की शक्ति को हमने परियोजनाओं को बनाने के लिए किए जा रहे विस्फोटों से कमजोर बना दिया है।