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Tuesday, December 29, 2015

सह-अस्तित्व विकास की सबसे बड़ी पूँजी - एन॰ रघुरामन

नाॅलेज सीरीज के व्याख्यानों के बाद जब मैं मंुबई में अपने दोस्त के घर पहुँचा तो उनका 6 वर्ष का वेटा अंशुमान अपने आयातित खिलौने के साथ खेल रहा था, जिसमें सब कुछ था - एक अच्छे भवन की अलग-अलग प्रकार की दीवारें, फर्श, छत, गार्डन के लिए कई प्रकार के पेड़, कार पार्किंग, बच्चों के खेलने का क्षेत्र, किचेन, कई प्रकार के फर्नीचर, गिलहरी, कुŸो, बिल्ली जैसे पालतू जानवर तथा और भी ऐसी बहुत सी चीजें जो समान्यतः समृद्ध परिवारों में दिखाई देती हैं। वेशक यह बहुत बुद्धिमानी से बनाया गया खिलौने का सेट था जिसमें बच्चे को अपने सपने का घर बनाने की सुविधा थी। कल्पनाशीलता से भरे हुए बच्चों के लिए इससे बढ़िया खिलौना नहीं हो सकता।
वह बच्चा जब भी कोई उस खिलौने से डिजायिन बनाता और अपने माता-पिता को दिखाता तो वह उसमें कोई न कोई कमी और कारण बताते। वे कहते, घर के पीछे कार क्यों खड़ी की, हमे आफिस जाना होगा तो कार लेने के लिए पीछे जाना पड़ेगा। माँ कहती फ्रिज खेल के मैदान के पास क्यों रखा है, मुझे रसोई के सामान के लिए बार-बार चलकर जाना पड़ेगा आदि उनके पास बताने को अनेक कारण होते, और वे उसे रिजेक्ट कर देते। बच्चा फिर उत्साह से नया डिजायिन बनाने लगता।
हाॅलाकि बच्चा डिनर पर आये मेहमान को अपने डिजायिन किए मकान से प्रभावित करना चाहता था, लेकिन माता-पिता द्वारा बार-बार डिजायिन खारिज किए जाने के कारण थोड़ा चकराया हुआ था। उसके सवालों से बचने के लिए दोनो ने कहा यदि अंकल कहेंगे डिजायिन अच्छा है तो हम भी मंजूरी दे देंगे।
वह बच्चा कोई सिविल इन्जीनियर तो था नहीं। उसकी अपनी एक समझ थी और वह उसके अनुसार उस घर में सब चीजों को रख कर देख रहा था, जो अपनी दुनियाँ और अपने मित्रों के लिए चाहता था। जब उसने मुझसे अपने घर के बारे में पूंछा तो मैने तत्काल कहा, ‘डिजायिन तो बहुत अच्छी है, पर जरा मुझे बताओ कि गुलमोहर का यह विशाल वृक्ष कार पार्किंग के बीचो-बीच में क्यों है?’ अपनी छोटी उंगली उठाते हुए  उसने तपाक से जवाब दिया, ‘फिर स्नो (उसके पालतु कुत्ते का नाम) सू-सू कहा करेगा?’ जब उससे पूछा कि किचन का एक कवर्ड रेफ्रिजरेटर उसके कमरे के साथ घर के पीछे क्यो है तो उसने कहा ‘उसी में तो गिलहरी, बिल्ली और कुत्ते के लिए खाने की चीजे रखी होती हंै और मेरे लिए उन्हे देना आसान होगा।’ उसका कहना बिल्कुल वाजिब था।
डिजायिन को लेकर उसके मन में कोई भ्रम नहीं था। मैने उस बाल इन्जीनियर (मेरी नजर में वह पी॰जी॰ था) के डिजाईन को उसके दृष्टिकोण से देखना शुरू किया, क्योंकि उसका कहना एकदम तर्क संगत था। उसने एक ऐसा मकान बनाया था, जो छः वर्षीय बच्चे के दोस्तों व बिल्ली, कुत्ते व गिलहरी आदि के लिए था। वह चाहता था अपनी सहूलियत से डिजाइन। वह चाहता था कि माँ के किचन और पिता कि मर्सडीज़ कार के ऊपर उसके दोस्तों को तरजीह दी जाए।
हम सब एक ऐसी पीढ़ी के हैं, जो इस सिद्धान्त के साथ बढ़े हैं जिसमें कहा गया है कि आप की विकास के लिए जो भी चीज़ नुकसान दायक नजर आए उसे नष्ट कर दो। शिक्षा के लिए हमने बच्चों की मासूमियत को खत्म किया, सड़क बनाने के लिए पेड़ नष्ट किए और बाँध बनाने के लिए पहाड़ियाँ ध्वस्त कर दी। ये तो कुछ उदाहरण ही है।
बच्चे के रूप में ईश्वर ने हमें सह-अस्तित्व का सिद्धान्त सिखाया है। अपने बच्चों को इसी सिद्धान्त के अनुसार उन्हें उनकी दुनियाँ बनाने दो। हमने कुछ ही दशकों में जो विनाश किया है, वह उससे कहीं ज्यादा है जो पूरी नस्ल सदियों में नष्ट कर पाती है। आईये एक और चीज नष्ट करें - संघर्ष का सिद्धान्त, ताकि हमारी नई पीढ़ी सह-अस्तित्व के सिद्धान्त के साथ अपने आसपास के वातावरण से सामंजस्य के साथ जी सके। 

संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा भविष्य में विकास के मूलभूत 17 लक्ष्य -

इस वर्ष 25 और 26 सितम्बर, 2015 को सम्पन्न संयुक्त राष्ट्र महासभा के अधिवेशन में भविष्य में आगामी 15 वर्षों (2030 तक) के विकास के लिए 17 लक्ष्य तय किए हैं, जो इस प्रकार हैं -
1. गरीबी का अन्त।
2. भुखमरी से पूर्ण मुक्ति।
3. एडस, टीबी, मलेरिया व छुआछूत की सभी  बीमारियों से निजात।
4. समावेशी व संतुलित शिक्षा।
5. पानी व सफाई का प्रबन्ध।
6. सतत व नवीन उर्जा स्रोतों का सुनिश्चितता।
7. आथिक विकास की बढ़ोŸारी।
8. सभी के लिए रोजगार की उपलब्धता।
9. विषमता उन्मूलन।
10. पर्यावरण सुरक्षा।
11. शान्ति की स्थापना।
12. दो हजार पच्चीस तक बाल मजदूरी समाप्त करना।
13. दो हजार तीस तक सभी लड़कों और लड़कियों को गुणवत्तापूर्ण मुफत प्राथमिक व उच्च माध्यमिक शिक्षा हासिल कराना।
14. साल 2025 तक पांच वर्ष के सभी बच्चों को कुपोषण और भूख से छुटकारा दिलाना।
15. बाल विवाह की समाप्ति।
16. बच्चों के प्रति हो रहीं हिंसा की समाप्ति।
17. सतत विकास लक्ष्यों में आधुनिक दासता और दुव्यवहार के सभी प्रकारों का तत्काल उन्मूलन 
    करना। 

अनूठा गाँव शेल्केबाड़ी, संत ने दिखाई दुनिया को राह ........गोपाल मोहन उपाध्याय

महाराष्ट्र राज्य में कर्नाटक के सीमावर्ती जिला कोल्हापुर में स्थित कनेरी मठ प्राचीन काल से देश के आध्यात्मिक क्षेत्र में विशिष्ट स्थान रखता है। मठ के प्रबन्धन की जिम्मेदारी पू॰ अदृश्य काणिसिद्धेश्वर महाराज के पास आई तो उन्होंने तय किया गाँव व गाँव की व्यवस्था का आधार गाय के लिए कार्य करना मठ की प्राथमिकता होगी। इस हेतु कोल्हापुर एवं महाराष्ट्र व कर्नाटक के निकटवर्ती जिलों में लम्बे समय से व्यापक अभियान चलाया जा रहा है।
इस अभियान का एक प्रमुख कार्य 72 परिवार व 400 जनसंख्या के शेल्केबाड़ी गाँव में हुआ अद्भुत परिवर्तन है। जिससे यह देश के सभी गाँवों के लिए एक अनुकरणीय माडल बना है।
इस परिवर्तन का प्रारम्भ हुआ 2005 की विरदेव यात्रा से जिसके अवसर पर प्रतिवर्ष गाँव के हर घर में औसतन 4-5 बकरों की बलि दी जाती थी। महाराज जी  ने ग्रामवासियों से आह्वान किया ‘यह कैसा अध्यात्म जिसमें अपनी सुख समृद्धि की कामना कि लिए दूसरे जीव की हत्या हो।’ आह्वान का गाँव पर असर हुआ बलि प्रथा बंद हुई व गाँव पूर्ण शाकाहरी होने का संकल्प लिया।
इस संकल्प के बाद पू॰ महाराज जी व ग्रामवासियों के मन में विश्वास जगा परिवर्तन का एवं गाँव की बड़ी बैठक बुलाई गई।
- बैठक में गाँव ने सम्पूर्ण नशामुक्ति का संकल्प लिया कुछ वर्ष के प्रयास के बाद गाँव में पूर्ण नशा मुक्ति हुई गाँव में न कोई नशा करता है और न नशीली चीजें बेचता है। गुटखा तक गाँव में नहीं मिलता।
- बैठक में तय हुआ गाँव में कोई पेड़ नहीं काटेगा व पेड़ लगाकर गाँव वालों ने उन्हें गोद लिया परिणाम आज गाँव पूरा हरा-भरा है।
- गाँव का विवाद गाँव में ही निपटाने हेतु टंटा मुक्ति समिति बनी गाँव में लम्बे समय से कोई मुकदमा नहीं है।
- गाँवों के लोगों ने साप्ताहिक सामूहिक स्वच्छता कार्यक्रम प्रारम्भ किया व गाँव का डेªनेज सिस्टम (जल निकासी हेतु नाली व्यवस्था) बनाई गई व नाली में मच्छर का लार्वा खाने वाली गप्पी मछली डाली गई। परिणामतः,  स्वच्छ एवं बीमारी मुक्त गाँव बना।
- गाँव के हर मकान की पुताई गुलाबी रंग से  की गई व हर घर पर पहले गृहणी बाद में बाकी सब के नाम का बोर्ड लगाया। हर घर की रजिस्ट्री महिला के नाम पर की गई।
- महिलाओं के 6 स्वयं सहायता समूह बनाए गए जिनके द्वारा घरेलू चीजों का निर्माण व प्रशिक्षण गाँव में ही प्रारम्भ हुआ व कृषि कार्य भी इन्हीं समूहों द्वारा होता है बाहर से श्रमिक नहीं आते।
- गाँव के थोड़ी दूर बहने वाली नदी से सिंचाई हेतु नाला बनाया गया उससे पाइप डालकर गाँव में सामूहिक सिंचाई व्यवस्था बनाई गई।
- गाँव के सभी लोगोें ने धन एकत्रित कर खुद के पैसे से पंचायत भवन बनवाया है।
- महाराज जी ने गाँव के सभी लोगों से शौचालय व बायोगैस बनवाने का आह्वान किया तो धनाभाव आड़े आया तब बैंक आॅफ इण्डिया ने पहल की व गाँव वालों को फसल के बाद वापसी की शर्त पर ऋण उपलब्ध कराया।
आज गाँव के 80 प्रतिशत घरों में देशी गाय है व घर में औसतन 2-4 जानवर हैं सबका गोबर व मूत्र गोबर गैस में जाता है।
गाँव के हर घर में शौचालय है व शौचालय का पाइप भी गोबर गैस में जाता है।
गोबर व मानव मल, मूत्र के गोबर गैस में निस्तारण के बाद स्लरी (अवशेष) खेत में खाद के रूप में काम आता है व गैस से घर का पूरा खाना बनता है। गाँव में एल॰पी॰जी॰ के सिलेण्डर की आवश्यकता नहीं पड़ती एल॰पी॰जी॰ मुक्त गोबर गैस युक्त गाँव।
- गाँव के लोगो ने यह गोबर गैस, शौचालय व गाँव की सड़क अतिक्रमण तोड़कर खुद के श्रम से बनाई, फसल आने पर बैंक का पूरा कर्ज लौटाया, आज पूर्ण ऋण मुक्त गाँव ।
- गाँव में पूर्ण स्वच्छता रहती है हर घर में शौचालय है गप्पी मछली के कारण मच्छर पैदा नहीं होता व पेयजल की स्वच्छता का भी ध्यान रखा जाता है इसीलिए बीमारी भी काफी कम है। 

कर्मयोगी के अनमोल वचन|

‘‘सपने सच हों इसलिए सपने देखना जरूरी है।’’ ऐसा उद्घोष करने वाले कर्मयोगी और भविष्य दृष्टा डा॰ अब्दुल कलाम, जिनके पैर जमीन पर लेकिन सपने आसमान से ऊँचे थे। उन्होंने भारत की सोच को ‘अग्नि की उड़ान’ दी, बच्चों और युवाओं के तेजस्वी मन में कुछ कर गुजरने का जज्बा भरा। विजन 20-20 से लेकर शहरी सुविधाओं को गावों तक पहुँचाने के उनके दर्शन ने भारतीय सŸाा प्रतिष्ठान को नई दृष्टि प्रदान की। उनका एक-एक शब्द, एक-एक कथन प्रेरक है जिसके कुछ अंश यहांँ प्रस्तुत हैं, जो हमारी युवा शक्ति के लिए मार्गदर्शक हो सकते हैं।
- ‘‘सपने वह नहीं जो सोते हुए देखे जायें, सपने वो हैं जो सोने न दें।’’
- ‘‘अगर आप सूरज की तरह चमकना चाहते हो, तो सूरज की तरह जलना होगा।’’
- ‘‘इन्तजार करने वाले को उतना ही मिलता है, जितना कि कोशिश करने वाले छोड़ देते हैं।’’
- ‘‘आत्मविश्वास और कड़ी मेहनत, असफलता को मिटाने के सर्वोत्म माध्यम हैं।’’
- ‘‘हम हमारा भविष्य नहीं बदल सकते, अलबत्ता अपनी आदतें जरूर बदल सकते हैं और वही बदली हुई आदतें भविष्य सुधार सकती हैं।’’
- ‘‘लक्ष्य प्राप्ति के लिए एकतरफा लगन और एकाग्रता जरूरी है।’’
- ‘‘कठिनाइयाँ जीवन को बिगाड़ती नहीं, बल्कि वे मददगार होती हैं, हमारी भीतरी ताकत उजागर करने में।’’
- ‘‘जीवन और समय दोनो सर्वोत्तम शिक्षक हैं, जीवन समय की कीमत सिखाता है और समय जीवन की कीमत।’’
- ‘‘जीवन एक जटिल खेल है, इन्सान बने रहकर ही इसे जीत सकते हैं।’’
सुबह उठकर स्वयं से कहें -
ऽ मैं सर्वश्रेष्ठ हँू। ऽ मै यह कर सकता हूँ।                
ऽ भगवान मेरे साथ सदा है। ऽ आज का दिन मेरा दिन है। ऽ मैं विजेता हूँ। ु
- डा॰ अब्दुल कलाम

सिर्फ अक्षर ज्ञान से नहीं सधेगा टिकाऊ विकास - अरूण तिवारी

वर्ष 2011 की जनगणना मुताबिक 74.04 प्रतिशत भारतीयों को अक्षरज्ञानी कहा जा सकता है। वर्गीकरण करें, तो 82.14 प्रतिशत पुरुष और 65.46 महिलाओं को आप इस श्रेणी में रख सकते हैं। आप कह सकते हैं कि आगे बढने और जिंदगी की रेस में टिकने के लिए अक्षर ज्ञान जरूरी है। इस संदर्भ मंे उनके इस विश्वास से शायद ही किसी को इंकार हो कि इसमें साक्षरता की भूमिका, मुख्य संचालक की हो सकती है। किंतु क्या साक्षरता का मतलब सिर्फ वर्णमाला के अक्षरों और मात्राओं को जोङ़कर शब्द तथा वाक्य रूप में पढ़ लेना मात्र है ? क्या मात्र अक्षर ज्ञान हो जाने से हम हर चीज के बारे में बुनियादी तौर पर ज्ञानी हो सकते हैं।
संयुक्त राष्ट्र द्वारा ’साक्षरता और टिकाऊ समाज’ को इस वर्ष के अंतर्राष्ट्रीय साक्षरता दिवस का मुख्य विचार बिंदु तय किया गया है। गौर कीजिए कि यह बिंदु, हमारे उत्तर का समर्थन करता है। टिकाऊ विकास के स्वास्थ्य और कृषि जैसे क्षेत्रों में सक्षमता हासिल करने के लिए संयुक्त राष्ट्र के विचारकों ने भी सिर्फ साक्षरता को नहीं, बल्कि सीखने का वातावरण को न्यूनतम आवश्यकता के रूप में महत्व दिया है। ’सीखने का वातावरण’ - हम भारतीयों को इसके मंतव्य पर खास ध्यान देने की जरूरत है। वे कहते हैं कि टिकाऊ समाज के निर्माण के लिए व्यापक ज्ञान, कौशल, व्यवहार और मूल्यों की आवश्कता है। यह सच है कि ये सभी आवश्यकतायें हमें टिकाऊ विकास की भी बुनियादी आवश्यकतायें हैं। इसी के मद्देनजर संयुक्त राष्ट्र ने खास निवेदन किया है कि टिकाऊ विकास के भावी लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए हमें यह वर्ष साक्षरता और टिकाऊ विकास का जुङाव व सहयोग सुनिश्चित करने हेतु समर्पित करना चाहिए। 
अक्षर ज्ञान से कितना आगे राष्ट्रीय साक्षरता मिशन?
आप संतुष्ट हो सकते हैं कि यह बात भारत के राष्ट्रीय साक्षरता मिशन द्वारा बहुत पहले समझ ली गई थी; इसीलिए साक्षरता मिशन के कार्यक्रम, आज अक्षर ज्ञान तक सीमित नहीं हैं; इसीलिए मिशन के संपूर्ण साक्षरता अभियान और उत्तर साक्षरता अभियान की संकल्पना की। इन अभियानों को नवसाक्षर को खासतौर पर आसपास के परिवेश और जरूरी कौशल के बारे में साक्षर और सक्षम बनाने के उद्देश्य से डिजायन किया गया है। 
प्रकृति प्रेमी इस बात से संतुष्ट हो सकते हैं कि भारत सरकार के साक्षरता मिशन ने अन्य विषयों के साथ-साथ प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण को विशेष उद्देश्य के रूप में चिहिन्त किया है।किंतु यह बात आप असंतुष्ट भी हो सकते हंै कि राष्ट्रीय साक्षरता मिशन के कार्यक्र्रम इस दिशा में रस्म अदायगी से बहुत आगे नहीं बढ़ सके हैं। कहने को आज भारत के 424 एवम् 176 जिले क्रमशः संपूर्ण साक्षरता और उत्तर साक्षरता अभियानों की पहुंच में है। किंतु भारत मंे प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण मंे सामाजिक पहल की सुस्त दर बताती है कि जरूरत रस्म अदायगी से कहीं आगे बढ़ने की है। बगैर औपचारिक-पंजीकृत संगठन बनाये ऐसी पहल के उदाहरण तो और भी कम हैं। 
कितने निरक्षर हम?
दरअसल, हमें साक्षरता की आवश्यकता हवा, पानी, नमी, जंगल, पठार, पहाङ से लेकर अनगिनत जीवों और वनस्पतियों आदि सभी की बाबत् है। क्या यह सच नहीं कि अक्षर ज्ञान रखने वाले ही नहीं, उच्च शिक्षा प्राप्त लोगों में भी आज प्रकृति और प्राकृतिक संरक्षण के मसलों को लेकर अज्ञान अथवा भ्रम कायम हैं। नदियों को जोड़ना ठीक है या गलत ? कोई कहता है कि ’रन आॅफ रिवर डैम’ से कोई नुकसान नहीं; कोई इसे भी नदी के लिए नुकसानदेह मानता है। कोई नदी को खोदकर गहरा कर देने को नदी पुनर्जीवन का काम मानता है; कोई इसे नदी को नाला बना देने का कार्य कहता है। किसी के लिए नदी, नाला और नहर में भिन्नता भी साक्षर होने का एक विषय है। कोई गाद और रेत के फर्क और महत्व को ही नहीं समझता। कोई है, जो गाद और रेत निकासी को सब जगह अनुमति देने के पक्ष में नहीं है। कोई मानता है कि जितने ज्यादा गहरे बोर से पानी लाया जायेगा, वह उतना अच्छा होगा। किसी की समझ इससे भिन्न है। 
पानी-पर्यावरण साक्षरता के विषय कई 
ज्यादातर लोग आज मानते हैं कि ’आर ओ’ प्रक्रिया से प्राप्त पानी को आपूर्ति किए जा रहे पानी तथा भूजल से बेहतर हैं; जबकि कई विशेषज्ञ ’आर ओ’ प्रक्रिया से गुजरे पानी को सामान्य अशुद्धि जल से ज्यादा खतरनाक मानते हैं। वे कहते हैं कि ’आर ओ वाटर’ बाॅयलर और बैटरी के लिए मुफीद है, जीवों के पीने के लिए नहीं। उनका तर्क है कि ’आर ओ’ प्रक्रिया मंे प्रयोग होने वाली झिल्ली सिर्फ खनिजों को ही वहीं नहीं रोक लेती, बल्कि ऐसे जीवाणुओं का भी वहीं खात्मा कर देती हैं, जो हमारे भोजन को पचाने के लिए सहयोगी हैं; जिन्हे प्रकृति ने हमें असल पानी के साथ मुफ्त दिया है। लिहाजा, ’आर ओ वाटर’ इसी तरह ’मिनरल वाटर’ के नाम पर मिल रहे बोतलबंद पानी को लेकर भी मत भिन्नता है। ’आर ओ वाटर’ और ’मिनरल वाटर’ नहीं, तो शुद्ध पानी प्राप्ति का सर्वश्रेष्ठ विकल्प क्या ? पानी को ठंडा करने के लिए मिट्टी का मटका, रेफ्रिजरेटर से बेहतर विकल्प क्यों है ? मिट्टी का मटका पानी को शीतल ही नहीं करता, नाइट्रेट जैसी अशुद्धि से मुक्त करने का काम भी करता है। क्या यह हमारे साक्षर होने का विषय नहीं। 
क्या सच नहीं कि हमें ऐसे कितने मसलों पर साक्षर होने की जरूरत है ? इन मसलों पर एक राय न होना ही जल के मामले में हमारे निरक्षर होने का पुख्ता सबूत है। तकनीकी डिग्री-डिप्लोमा प्राप्त कितने ही लोग ऐसे हैं, संचयन ढंाचे बनाने के लिए जिन्हे न विविध भूगोल के अनुकूल स्थान का चयन करना आता है और न ही ढांचे का डिजायन बनाना। यदि हमारे सरकारी ढांचें में यह निरक्षरता न होती, तो मनरेगा के ज्यादातर ढांचें बेपानी न होते। भारत की कष्षि को भूजल पर निर्भर बनाना अच्छा है या नहरी जल अथवा अन्य सतही ढांचों के जल पर ? क्या इसका उत्तर, पूरे भारत के लिए एक हो सकता है ? यदि हम अनुकूल माध्यम के बारे में साक्षर होते, तो ’स्वजल’ परियोजना के तहत् उत्तराखण्ड के ऊंचे पहाङी इलाकों में इंडिया मार्का हैण्डपम्प लगाने की बजाय, चाल-खाल बनाते।
अन्य प्राकृतिक संसाधनों को लेकर हमारी साक्षरता पर गौर कीजिए। कोई प्राकृतिक जंगल को सर्वश्रेष्ठ मानता है, तो किसी को इमारती जंगल बेहतर लगता है। किसी को गिद्ध, गौरैया, गाय, कौआ, बाघ, भालू, घङियाल, डाॅलफिन से लेकर अनेकानेक प्रजातियों की संख्या घटने से कोई फर्क नहीं पङता; अनेक हैं, जिन्हे फर्क पङता है।अभी दिल्ली के एक अस्थमा पीङित व्यक्ति नेे तीन ऐसे पौधों की खोज की, जिन्हे लगाकर हम अपने आसपास की हवा को साफ कर सकते हैं। किंतु हम में से ज्यादातर लोग यह नहीं जानते। 
कहना न होगा कि पानी-हवा समेत कई ऐसे प्राकृतिक संसाधन हैं, जिनके दैनिक उपयोग और संरक्षण को लेकर भारतीय समाज के हर वर्ग को साक्षर होने की जरूरत है; नेता, अफसर, इंजीनियर, ठेकेदार, किसान से लेकर शिक्षक, वकील और डाॅक्टर तक। यदि हम इनके उपयोग और संरक्षण को लेकर साक्षर हो जायें, तो न मालूम अपना और अपने देश का कितने आर्थिक, प्राकृतिक और मानव संसाधनों को सेहतमंद बनाये रखने में सहायक हो जायें !
सद्ज्ञान से स्वावलंबन
हमारी दैनिक समस्याओं को लेकर आज हमारे समक्ष पेश ज्यादातर विकल्प, खरीद-बिक्री की रणनीति पर आधारित हैं। बाजार, कभी किसी ग्राहक को स्वावलंबी नहीं बनाता। अतः सच यही है कि इन विषयों की साक्षरता और स्वयं करने का कौशल ही हमें इन मामलों में स्वावलंबी बनायेंगे।अतः हमें सिर्फ पानी-पर्यावरण ही नहीं, बल्कि विकास को टिकाये और बेहतरी की दिशा में गतिमान बनाये रखने के हर पहलू के प्रति साक्षर होने के प्रयास तेज कर देने चाहिए। रास्ते और रणनीति क्या हों ? इस पर सभी को अपने-अपने स्तर पर विमर्श और ज़मीनी काम शुरु कर देने चाहिए। इस अंतर्राष्ट्रीय साक्षरता दिवस पर इस बाबत् हम स्वयं चेतें और राष्ट्रीय साक्षरता मिशन के लोक चेतना केन्द्रों को भी चेतायें। 
मददगार तकनीक, साझे से समग्रता
यूनेस्को के महानिदेशक ने इस बाबत् अपने सभी सहभागी देशों से निवेदन किया है कि सम्ण्पूर्ण साक्षरता लक्ष्य हासिल करने हेतु वे मोबाइल फोन समेत उपलब्ध आधुनिक तकनीक को एक ताजा अवसर के तौर पर लें। उम्मीद है कि भारत में राष्ट्रीय साक्षरता मिशन, जल संसाधन, कृषि, पर्यावरण, संचार और सूचना से संबद्ध मंत्रालय इस दिशा में कुछ सोचेंगे और संयुक्त रूप से कुछ करेंगे। 
- 146, सुंदर ब्लाॅक, शकरपुर, दिल्ली-92

माँ की चिन्ता

"एक दिन वृद्धाश्रम से सूचना आई, तुम्हारी माँ बहुत बीमार हैं, आकर एक बार देख जाओ। बेटा सूचना मिलते ही, माँ को देखने वृद्धाआश्रम पहुँच गया। माँ ने बड़े प्यार से कापते हाथों अपने बेटे का हाथ पकड़ कर अपने पोते का हाल-चाल पूछा और फिर धीरे से कहा, ‘‘बेटा यहाँ एक पंखा लगवा दो, बहुत गरमी रहती है।’’ बेटे ने कहा ‘‘माँ! अब आप तो दो-चार दिन की मेहमान हैं, इतने दिन बिना पंखे के कट गये तो यह दिन भी कट जायेंगे।’’ माँ ने कहा, ‘‘बेटा! मुझे अपनी नहीं, तुम्हारी चिन्ता है, क्योंकि पोता अब बड़ा हो रहा है।’’

संकल्प ही स्वामित्व का अधिकारी - श्रीकान्त ‘कान्त’

‘स्वयमेव मृगेन्द्रता’ के बल पर सिंह जंगल का राजा कहलाता है और अपने अजेय पौरुष एवं संकल्प के बल पर ही बाज पक्षीराज बनता है। उसके जीवन की कहानी भी अत्यन्त रोचक है।
कहते हैं, बाज की आयु 70 साल होती है लेकिन 40 साल के बाद उसकी शक्ति के महत्वपूर्ण तीन अंग अनुपयोगी होने लगते हैं।
पहला - उसकी मजबूत पकड़ वाले पंजे ढ़ीले पड़ जाते हैं जिससे उसको शिकार पकड़ना कठिन हो जाता है।
दूसरा - इस आयु तक उसकी चोंच भी मुड़ जाती है जिससे शिकार को पकडने में कठिनाई होने लगती है।
तीसरा - उसकी शक्ति का महत्वपूर्ण आधार अचानक तेज गति की उड़ान का साधन पंख इतने बोझिल हो जाते हैं, कि उड़ते समय उनका पूरा खुलना ही मुश्किल हो जाता है जिससे उसकी गति धीमी पड़ जाती है और तब तक शिकार सजग हो कर भाग जाता है। अब उसके पास जीवन जीने के तीन विकल्प बचते है।
नियतिवाद - अर्थात् यह तो प्रकृति की नियति है, प्रत्येक जीव के अंग एक आयु में शिथिल हो जाते हैं। अतः नियति जैसे, जब तक, जिस स्थिति में जीवित रखना चाहेगी तव तक जीवित रहूंँगा।
परिस्थितिवाद - अर्थात् परिस्थितियों से समझौता कर जीवन यापन करने हेतु अगर स्वभाव में परिवर्तन आवश्यक है, तो करना। पहले स्वयं के बल पर शिकार करके आहर लेना उसका स्वभाव था, अब परिस्थितियों के वशीभूत शिकार करना संभव नहीं, तो गिद्ध आदि जीवों की तरह मृत-पशुओं के आहार पर जीवन यापन स्वीकार करना।
संकल्पवाद - न नियति के भरोसे जीना, न परिस्थिति से समझौता करना, अपितु अपने को पुर्नस्थापित करने का संकल्प लेना और उसके लिए कठिन तपस्या करके लक्ष्य को प्राप्त करना।
बाज इस तीसरे विकल्प का प्राणी है। वह अपने आप को पुर्नस्थापित करने हेतु सबसे पहले किसी पहाड़ी पर एकान्त में अपना घोसला बनाता है, जहांँ वह पुर्नस्थापन की निर्विघ्न तपस्या कर सके। उसके बाद अपने पंजों को पत्थर पर तब तक मारता है, जब तक कमजोर पंजे टूट न जायें और फिर उसके बाद उनके उगने की प्रतीक्षा करता है। जब वह उग आते हैं, तब दूसरा कदम उठाता है और अपनी चोंच को पत्थरों से  मार-मार कर तोड़ देता है और फिर उसके उगने की प्रतीक्षा करता है। जब चोंच पुनः उग आती है तव वह अपनी चोच से अपने बोझिल पंखों को एक-एक कर उखाडने का कार्य करता है और फिर से उनके उगने की प्रतीक्षा करता है। यह सब कष्टप्रद कार्य 150 दिन में पूरा होता है और परिणाम स्वरूप वह फिर से तेज उड़ान के लिए उपयुक्त पंख, शिकार को पकड़ने के लिए मजबूत पकड़ बाले पंजे और शिकार को फाड़ ड़ालने में सक्षम तेज, नुकीली चोंच सहित अपनी सामथ्र्य का पुनः स्वामी बन जाता है। इसीलिए तो वह पक्षीराज है और भगवान विष्णु ने भी ऐसे संकल्पवान को ही अपना वाहन बनाया।
संकल्पवान कभी पराजित नहीं होता, कभी निराश्रित नहीं होता, वह तो सदैव स्वाभिमानपूर्ण जीवन का स्वामी रहता है। ु