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Tuesday, November 18, 2014

पावन नदियाँ - कृष्णानन्द राय


 सारे जग की पावन नदियांँ, माता के समान हैं।
गंगा, यमुना, सरस्वती से संगम की पहचान है।।
झर-झर बहता निर्मल पानी, लगता बड़ा सुहाना।
जो बैठे नदियों के तीरे, गायें गीत तराना।।
तीर्थों के राजा प्रयागराज, ऐसा बना विधान है।
सारे जग की पावन नदियांँ, माता के समान हैं।।

नदियों का जल दूषित करना, माता का अपमान है।
माता को जो समझ न पाये, यह उसका बचकान है।।
नदियों, पेड़ों की रक्षा में, जुट जाओ जग के वासी।
रक्षा का संकल्प भरो, चाहे मथुरा रहो या काशी।।
पेड़ों-नदियांें से धरती सजती, प्रकृती का वरदान है।
सारे जग की पावन नदियांँ, माता के समान हैं।।

नदियों-पेड़ों से पर्यावरण, गाते सब वेद पुराण हैं।
प्रकृति धरोहर से ही सबको मिलता जीवन दान है।।
पेड़ लगाकर हरियाली से पर्यावरण बचाना है।
नदियों का जल स्वच्छ रहे, कुछ करके दिखलाना है।।
‘कृष्णानन्द’ नदियों-पेड़ों से सब जीवों का कल्याण है।
सारे जग की पावन नदियांँ, माता के समान हैं।।
- प्रदूषण नियन्त्रण बोर्ड, लखनऊ।

अभी भी जारी है भारतीयता पर आघात -प्रो॰ राममोहन पाठक

स्वतन्त्रता के सड़सठ साल बाद भी भारतीयता की प्रतीक वेशभूषा धोती और भारत की समृद्ध भाषा हिन्दी, संस्कृत पर उठे सवाल जवाब मांगते हैं। तामिलनाडु के एक अभिजात्य (इलीट) क्लब में धोती पहने मद्रास उच्च न्यायालय के एक न्यायाधीश और इनके दो साथी वकीलों को प्रवेश नहीं करने दिया गया। राजभाषा हिन्दी के प्रयोग को प्रोत्साहित करने के लिए सोशल मीडिया में जारी केन्द्र सरकार के दो आफिस सर्कुलर तामिलनाडु की मुख्यमन्त्री की अगुवाई में दक्षिण के राज्यों में विवादों में उलझ गए हैं। तीन-चार दशक बाद एक बार फिर दक्षिण के राजनेताओं ने जुमला उछाला है, ‘दक्षिण भारतीयों पर हिन्दी थोपी जा रही है।’
संस्कृति के प्रतीक रूप में वेशभूषा, खानपान, बाल्यावस्था से मृत्यु तक के संस्कारों सहित वाचा (वाणी या भाषा) के साथ ही वपु (शरीर) का विशेष महत्व है। भारत में धोती को पारम्परिक वस्त्र की मान्यता है। क्लबों में ड्रेस कोड के नाम पर इस मनमानी के खिलाफ तामिलनाडु की मुख्यमन्त्री जयललिता की प्रतिक्रिया उचित ही है कि वेशभूषा की वंदिश में भारतीय वस्त्रों पर रोक लगाने वाले ‘क्लबों’ के लाइसेन्स रद् होने चाहिए। स्पष्ट है कि धोती पहनने के आधार पर किया गया क्लब का यह भेदभाव वस्तुतः हमारी संस्कृति का अपमान तो है ही, साथ ही संविधान में प्राप्त वाक् एवं अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता का हनन भी है।
एक ओर हिन्दी को संयुक्त राष्ट्र की भाषा के रूप में वैश्विक प्रतिष्ठा के अभियान चल रहे हैं, वहीं दूसरी ओर भारतीय प्रशासनिक सेवा के लिए होने वाली आईएएस की परीक्षा में हिन्दी को कम महत्व दिए जाने को लेकर देश आक्रोशित और आन्दोलित है। अपने ही घर में हिन्दी का यह विरोध सालों बाद एक बार फिर अंगड़ाई ले रहा है। इसके खतरों से देश को सतर्क होना जरूरी है। गृह मन्त्रालय की यह सफाई अत्यन्त महत्वपूर्ण है कि हिन्दी के प्रोत्साहन को दूसरी भाषाओं की उपेक्षा के तौर पर नहीं लिया जाना चाहिए। किन्तु इसके बावजूद दक्षिण में प्रतिक्रिया तीखी हुई। तमिल, तेलगु, कन्नड़, मलयालम आदि भाषाओं की तरक्की की बातें कहने या माँग करने के बजाय हिन्दी को राजभाषा के रूप में प्रतिष्ठित करने के नई सरकार के प्रयासों में दुर्भावना तलाशने की संकुचित राजनैतिक सोंच के रूप में सामने आई प्रतिक्रिया को अब 1960-70 के पहले जैसा जन समर्थन मिलेगा, यह कदापि सम्भव नहीं। यह पिछले 67 सालों में हुए प्रयासों एवं सामाजिक विकास का प्रतिफल है, जिसमें राष्ट्र हित में और अधिक प्रगति की अपेक्षा थी।
दक्षिण में ही भाषा, खास कर हिन्दी के मामले में वातावरण और परिदृष्य बदल चुका है। महात्मा गाँधी की प्रेरणा से स्थापित दक्षिण भारत हिन्दी प्रचार सभा (टी. नगर, चेन्नई) का परिसर आज हिन्दी का तीर्थ बन चुुका है। जबकि हिन्दी विरोध के दौरान वहाँ आये दिन प्रदर्शन होते थे, बम फूटते थे, जिनके धमाकों की भयावह आवाज हिन्दी पे्रमियों को अपने संकल्प से डिगा न सकी। आज यहांँ हर महीने लगने वाले हिन्दी मेले में हजारों लोग शामिल होते हैं। इसकी अनदेखी कर  राजनैतिक कारणों से हिन्दी को कोसना दक्षिण के आम आदमी की फिदरत नहीं है, इसे सिर्फ राजनैतिक लाभ के चश्में से देखना अलोकतान्त्रिक, भाषाई समरसता और सहभाग के विपरीत है।
भाषा से जुड़ा एक और सवाल या मुद्दा उठा है संस्कृत का। सीबीएसई का हर राज्य के सभी विद्यालयों में 7 से 13 अगस्त तक संस्कृत सप्ताह मनाने का निर्देश इस विवाद का बड़ा कारण क्यों बना? चिन्ता और चिन्तन का विषय है। क्यांेकि संस्कृत का भारत की भाषाई संरचना में एतिहासिक महत्व रहा है। दक्षिण की तमिल, तेलगु, कन्नड़ और मलयालम भाषाओं की जननी के रूप में संस्कृत को विद्वानो की मान्यता प्राप्त है। इसी संस्कृत की रक्षा के लिए 1835 में जो आन्दोलन शुरू हुआ, उसमें संस्कृत भाषा के सवाल पर कलकŸाा में कैलाशचन्द्र दŸा फांसी के फंदे पर झूल गए। लार्ड मैकाले ने अंगे्रजी को संस्कृत के स्थान पर शिक्षा की भाषा और राष्ट्रभाषा बनाने की कोशिश की। इसके विरूद्ध आन्दोलन में सैकड़ों छात्र मरे और घायल हुए।
दक्षिण में अनादि काल से लेकर आज भी संस्कृति की संवाहक संस्कृत ही है। यहाँ के मठ-मन्दिरों में पूजा स्थलों एवं सामाजिक-पारिवारिक संस्कारों में सम्पूर्ण भारत की तरह ही क्षेत्रीय भाषाओं में नहीं, बल्कि संस्कृत में धार्मिक कार्य सम्पन्न होते है। भारत ही नहीं तो विश्व भर में फैले हिन्दु परिवारों में जन्म-विवाह से लेकर मृत्यु तक सभी कर्मकाण्ड संस्कृत में ही होने की प्राचीन परम्परा, हमारे ऋषियों द्वारा भारत की एकात्मता की दूरगामी दृष्टि थी, जो आज भी जीवित है। भारतीय संस्कृति और संस्कृत को समर्पित आदि शंकराचार्य कालाडि (केरल) से ही आये थे। देश में स्थापित चार शंकराचार्य पीठ और कांची कामकोटि पीठ में स्थापित उनका आम्नाय (मठ) आज भी संस्कृत का केन्द्र है। इस पीठों के निर्देशन में सैकड़ों संस्कृत विश्वविद्यालय देश भर में चल रहे है।
भारत-योरोप भाषा परिवार की लैटिन, ग्रीक आदि तमाम भाषाओं की जननी के रूप में संस्कृत को मान्यता प्राप्त है। नेपाली, तिब्बती, बर्मी, पाली-प्राकृत-अपभं्रश सभी के सूत्र संस्कृत में निहित है। राजनैतिक और भाषाई संकीर्णता के आधार पर  संस्कृत को अमान्य कर देने की सोच रखने वाले अभारतीय ही होगे।
व्यावहारिक तौर पर भी संस्कृत को विश्व में मान्यता और महत्व प्राप्त है। वर्तमान में वैज्ञानिक प्रगति के प्रतीक कम्प्युटर की वैश्विक भाषा के रूप में सर्वाधिक उपयुक्त संस्कृत को ही पाया गया है। इसे ही ध्यान में रखते हुए सर्वोच्च न्यायालय की दो सदस्यीय पीठ ने ऐतिहासिक निर्णय में कहाकि ‘भारतवासी संस्कृत का अध्ययन देश की संास्कृतिक धरोहर की रक्षा के लिए करते है।’ ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्र में देश के हजारों संस्कृत विद्वानों के अवदान को विस्मृत नहीं किया जा सकता। विदेशी भाषा के विद्वान मैक्स मूलर, ग्रियर्सन, हवस्ले, दारा शिकोह ने संस्कृत का अध्ययन कर विश्व को इसके महत्व से परिचित कराया। संस्कृत, हिन्दी और धोती का प्रश्न भारतीय संस्कृति से जुड़ा है। संकुचित राजनैतिक स्वार्थों एवं क्षेत्रीयता की दृष्टि से इन प्रश्नो को विवाद का मुद्दा बनाना राष्ट्रीय हित के विरूद्ध है।

Monday, September 15, 2014

lokbharti@yahoo.com

Saturday, September 6, 2014

लाल किले पर हमारे प्रधानमन्त्री


देश के सभी प्रधानमन्त्रियों को लाल किले की प्राचीर से तिरंगा फहराकर देशवासियों को सम्बोधित करने का कितनी बार सौभाग्य मिला। 
जवाहरलाल नेहरू 17 बार
इन्दिरा गाँधी 16 बार  
डा॰ मनमोहन सिंह 10 बार
अटल बिहारी बाजपेई 6 बार
राजीव गाँधी 5 बार
पी॰वी॰ नरसिंह राव 5 बार
लाल बहादुर शास्त्री 2 बार
मोरारजी देसाई 2 बार
चैधरी चरण सिंह, वीपी सिंह, एचडी देवगौड़ा और आई के गुजराल को एक बार लाल किले पर झंडा फहराने का सौभाग्य मिला। जबकि 222 दिन पद पर रहने के बाद चन्द्र शेखर एवं दो बार कार्यवाहक प्रधानमन्त्री रहे गुलजारी लाल नन्दा को लालकिले पर तिरंगा फहराने का अवसर नहीं मिला।
नरेन्द्र मोदी लाल किले पर झंडा फहराने वाले 7वें गैर कांगे्रसी तथा स्वतन्त्र भारत में पैदा होने वाले पहले प्रधानमन्त्री हैं।

लोक भारती के बढ़ते चरण - ब्रजेन्द्र पाल सिंह

बचपन से दूसरों की मूर्खता के लिए एक कहावत सुनते आ रहे हैं, ‘‘जिस डाल पर बैठे हैं, उसी डाल को काट रहे हैं।’’ या कभी-कभी यह भी कहते सुना है, ‘‘जिस थाली में खाते हैं, उसी में छेद करते हैं।’’ यह कहावतें पता नहीं, कुछ लोगों की मूर्खतापूर्ण कार्यों से बनी थीं या आज के प्रगतिशील कहे जाने वाले समाज के लिए हैं? जो भी हो! हाँ कालीदास की कहानी से यह अवश्य पता चलता है कि वह जंगल में जिस डाल पर बैठे थे, उसी डाल को काट रहे थे। और कहते हैं, उनके इसी गुण के कारण उनका विवाह एक बुद्धिमान लड़की विद्वोŸामा से करा दिया गया था, जिसके प्रभाव से कालीदास परम विद्वान व विश्व के प्रथम कवि बन गये। यदि यह सच है, तो निश्चित रूप से हमारे आज के समाज को किसी विद्वोŸामा की तलाश है? आइये, अपने कारनामों को स्वयं देखें और फिर निर्णय करें।
विद्वानों का मत है कि, मनुष्य इस ब्रह्माण्ड का सबसे बुद्धिमान प्राणी है, सम्भवतः इसीलिए उसने प्रकृति के साथ जीने का रास्ता चुना। हमारे पूर्वजों ने तो प्रकृति के साथ अपने रिश्ते मजबूत बनाये रखने के लिए पेड़ों, पत्थरों, पहाड़ों में देवत्व की स्थापना की, जल-स्रोतों, नदियों, पौधों में माँ के दर्शन किए और पशु-पक्षियों को देवताओं के वाहन के रूप में मान्यता देकर सदैव उनके सहअस्तित्व का मार्ग अपनाया।
मनुष्य को अपने जीवन के लिए सबसे पहले प्राणवायु की आवश्यकता होती है, जिसके बिना कुछ क्षण जीना भी असम्भव है। प्रकृति ने हमारी इस आवश्यकता की पूर्ति हेतु पेड़-पौधों की संरचना की, जो बिना कुछ लिए निरन्तर हमें प्राण वायु देते रहते हैं और हम उसका उपयोग करने के बाद जो प्रदूषित वायु (कार्बनडाई आक्साईड) प्रकृति को लौटाते हैं, उसको भी वह सोख कर, हमें उसके दुष्प्रभाव से बचाते हैं। स्वंय सोचें! यदि ऐसा न होता तो, हम क्या होते? हमारे पूर्वर्जों ने प्रकृति के इस रहस्य को समझ कर हमारे दैनन्दिन जीवन के लिए ऐसी व्यवस्थायें बनाईं, जो हमारे जीवन का सदैव सुरक्षा कवच बनी रहीं। उन्होंने हमे बताया था, पेड़ों में देवता का वास होता है, अतः हरे पेड़ को काटना पाप है और यह भी बताया कि अपनी जरूरत के लिए सूखी डाली का ही उपयोग करें और यदि जीवन रक्षण के लिए हरी वनस्पति की आवश्यकता पड़े तो प्रार्थना करके ही उसका उपयोग करें। परन्तु पश्चिम की संस्कृति ने कहा, प्रकृति में जो कुछ भी है, वह सब कुछ हमारे उपभोग के लिए है। वहीं विज्ञान रूपी आविष्कार ने उन्हंे जिस पेड़ पर बैठे थे, उसी डाल को काटने वाली कुल्हाड़ी भी उपलब्ध करा दी। हमारे पूर्वजों की सीख के कारण हरे पेड़ सुरक्षित बने रहते थे। इतना ही नही ंतो कुछ पेड़ों को सुरक्षित रखना आवश्यक समझकर, उन्हें काटना वर्जित ही कर दिया था, जिसके कारण समाज का सामान्य व्यक्ति आज भी पीपल आदि पेड़ों को काटने से बचता है।
परन्तु हमने विज्ञान के अधूरे ज्ञान और उसकी अधूरी समझ से वह सब किया, जिससे सावधान करने के लिए सदैव कहा जाता रहा है- ‘‘नीम हकीम, खतरे जान।’’ हमने पेड़ों को काटना प्रारम्भ कर दिया, क्योंकि अब हमें उनमें बसे किसी देवता या उन्हें काटने पर पाप का कोई डर नहीं बचा था। जब देश में अन्न संकट गहराया, तो आधुनिक ऋषियों (वैज्ञानिकों) ने समाधान दिया, ‘अधिक अन्न उपजाओ’ आगे बढ़ना है तो बड़े-बड़े उद्योग चहिए। अधिक अन्न उपजाने के लिए अधिक खेत चाहिए और अधिक खेतों के लिए प्राणवायु की आवश्यकता को नजरंदाज करते हुए जंगलों को काटना प्रारम्भ हो गया। 
पर, सच को कोई झुठला नहीं सकता। विज्ञान की अधूरी समझ के कारण जब पूरे विश्व के जंगल-बाग काट कर हमने खेत बना डाले, उन पर खेती करने लगे व बड़े-उद्योग खड़े कर लिए, तब हमारे आज के ऋषियों (वैज्ञानिक) नें चिन्ता व्यक्त करते हुए कहा- ‘‘तैतीस प्रतिशत धरती पर हरे पेड़-पौधे चाहिए, तभी हमारी मानवता सुरक्षित रह सकेगी।’’ बस! फिर क्या था, अधिक अन्न उपजाओं के स्थान पर अब अधिक पेड़ लगाओं का नारा बुलन्द हो रहा है। अर्थात् हमारे ऋषियों ने जो हमंे सीख दी थी कि प्रकृति का विनाश पाप है, हरे पेड़ को काटना पाप है, तब हमने उनकी बात को अनसुना कर आज के ऋषियों की बात आँख बंद कर मानी और बाग, जंगल काटे और पाप किया। पाप का फल  भोगना अवश्यमभावी है, जो हम कम होते जल, भूगर्भ जल स्तर, सूखते जल-स्रोत, सिकुड़ती व प्रदूषित होती नदियाँं, समाप्त होती कृषि भूमि की उर्वरा-शक्ति, कम होती खाद्यान्न की गुणवत्ता, आँखों से ओझल होती जैव विविधता और बढ़ती ग्लोबल वार्मिंग के रूप में भोग रहे हैं।
उŸार प्रदेश के संदर्भ में देखें, तो हमारे प्रदेश का वनावरण मात्र 7 प्रतिशत बचा है और यदि उसमें से तराई व पहाड़ी भाग को निकाल दे ंतो मैदानी क्षेत्र में मात्र 4 प्रतिशत वनावरण ही शेष है, परिणामतः गंगा कराह रही है, गोमती जैसी भूगर्भ जल स्रोतों से बहने वाली नदियाँ दम तोड़ रहीं हैं, निरन्तर बहने वाले छोटे नाले सूख चुके हैं, खेती की उर्वरा शक्ति समाप्त हो रही है। इसके साथ ही खेती के लिए आवश्यक पशुओं से विहीन होते गाँव, गाँवों से होता निरन्तर पलायन, जिससे वहाँ घर के स्थान पर सूने मकानों की निरन्तर बढ़ रही संख्या, दूसरी ओर शहरों का बढ़ता अनियोजित तथाकथित विकास व विस्तार, झुग्गी झोपडि़यों व फुटपाथ पर सोने वालों की बढ़ती संख्या, टूटते परिवारिक रिश्ते, शुद्ध पेयजल का बढ़ता संकट और न जाने कितनी जनमन को पीडि़त करने वाली नितनवीन घटित होती घटनायें।
अब प्रश्न उठता है कि, पाप का फल भोगना या उससे बचने के लिए प्रयाश्चित करना? आज के ऋषियों ने भी हमें प्रयाश्चित का ही मार्ग बताया है। अब हम कहने लगे हैं, ‘एक पेड़ सौ पुत्र समान’, हरे पेड़ काटने पर कानूनी शिकंजा, मारे गये पशु-पक्षिओं के प्रयाश्चित के लिए अभयारण्य, संरक्षण एवं संवर्धन स्थल तथा आगे प्रयाश्चित की तैयारी, जिसमें भूगर्भ जल निकालने हेतु बोरिंग बनाने के लिए परमिट, डार्कजोन में पानी निकालने पर लगने वाला प्रतिबन्ध, जितना भूगर्भ से पानी निकालो उतना वर्षाजल धरती की कोख में भरने की अनिवार्यता, पशु-पक्षियों एवं जैवविविधता संरक्षण के लिए लगने वाला टैक्स जैसे न जाने कितने प्रयाश्चित अपनी ना समझी के लिए करने अनिवार्य होंगे? कहते हैं, ‘‘गलती करना मनुष्यता है, पर गलती को बार-बार करना मूर्खता और की गई गलती से सबक लेकर आगे का मार्ग बनाना बुद्धिमŸाा है।’’ आज सम्पूर्ण समाज से उसी बुद्धिमŸाापूर्ण व्यवहार की आवश्यकता है। हम सब उस दिशा में कुछ कदम आगे बढ़ा कर, सुख-समृद्धि का मार्ग प्रशस्त कर सकते हैं।
लोक भारती ने समाज की उस अपेक्षा व अपने नाम के अनुरूप प्रथमतः पर्यावरण संरक्षण हेतु लोक आधारित, लोक जागरण की योजना बनाकर उŸार प्रदेश के 999 विद्यालयों, महाविद्यालयों में जागरूकता कार्यक्रमों के आयोजन किए, जिनके माध्यम से लगभग दो लाख छात्र एवं शिक्षकों के साथ इस दिशा में कार्यरत सामाजिक कार्यकर्ताओं व विशेषज्ञों से सम्पर्क बढ़ाया। क्योंकि पर्यावरण संरक्षण में प्राणिमात्र के जीवन के लिए सर्वाधिक आवश्यक शुद्ध वायु, शुद्ध जल एवं शुद्ध खाद्यान्न आता है। अतः लोक भारती ने इन्हीं विषयों के लिए सामाजिक जागरूकता तथा आवश्यक प्रशिक्षण एवं समस्या निवारण के लिए करणीय कार्यों पर ध्यान केन्द्रित कर अपनी शक्ति-सामथ्र्य के अनुरूप क्रमशः कदम बढ़ाये।
शुद्व वायु के लिए आवश्यक है, 33 प्रतिशत भूभाग पर वृक्षावरण, इसकी पूर्ति के लिए पूरे देश के लिए सनातन आस्था केन्द्र नैमिषारण्य तथा उसके चैरासी कोसी परिक्रमा पथ पर सम्पूर्ण देश के स्थापित तीर्थ क्षेत्रों में श्री राधेकृष्ण दुबे के नेतृत्व में देववृक्ष अभियान चलाया गया, जिसके अन्तर्गत परिक्रमापथ के 108 गावों में एक माह की जागरूकता यात्रा, पौध-दान एवं पौधारोपण के आयोजन किए गये, जिसके परिणामस्वरूप परिक्रमा पथ के सीतापुर व हरदोई जिले में 88 हजार ऋषियों की स्मृति में 88 हजार पेड़ सामाजिक सहयोग एवं वन विभाग द्वारा सम्पूर्ण सुरक्षा व्यवस्था के साथ लगाये गये, जो नैमिषारण्य में अरण्यभाव को सार्थक करने का प्रभावी कदम सिद्ध हुआ है। इस अभियान की सफलता के परिणामस्वरूप लखनऊ के निकट गोमती तट पर स्थित चन्द्रिका देवी क्षेत्र, मथुरा जिले के वृन्दावन क्षेत्र में यमुना किनारे, गंगा तट पर श्रृंगवेरपुर क्षेत्र व गोमती की सहायक 700 कि॰मी॰ दूरी तक बहने वाली सई नदी क्षेत्र में वृक्षारोपण अभियान चलाया जा रहा है, जिसके अन्तर्गत हरियाली पखवारा, पौध-भण्डारा, वृक्षारोपण-यज्ञ, हरियाली-चूनर, हरियाली-चादर एवं वृक्ष-डोली जैसे कार्यक्रम प्रारम्भ हुए हैं। इन अभियानों में कृत संकल्पित, निरन्तर संलग्न अनेक विभूतियों का महत्वपूर्ण योगदान है।
वायु के बाद जल हमारी दूसरी अनिवार्य आवश्यकता है। इस विषय को समझने-समझाने के लिए सबसे पहले मासिक पत्रिका ‘लोक सम्मान’ के  विशेषांक से प्रारम्भ करके जल विशेषज्ञों एवं सामाजिक कार्यकर्ताओं की कार्यशालाएं, संगोष्ठियांँ, देश भर में किए गयेे कार्यों का अध्ययन एवं प्रत्यक्ष दर्शन व देश भ्रमण जैसे कार्यक्रम आयोजित हुए, जिसमें से वर्षा जल संग्रहण विधियों पर शोध, तकनीकी विकास एवं इसके लिए कार्य करने वाले व्यक्ति विशेष से लेकर कार्य-समूह एवं प्रशासनिक अधिकारियों तक में संकल्प जाग्रत हुआ और उसके प्रत्यक्ष प्रमाण दिखाई देने लगे, जो पे्ररक व विश्वास पैदा करने वाले हैं। नगरों में वर्षाजल से भूगर्भ जल-भरण, नई बन रही कालोनियों में घरेलू मल-मूत्र युक्त जल के शोधन संयन्त्रों की स्थापना, जल-संकट से जूझते बुन्देलखण्ड के महोबा जिले में परम्परागत तालाबों की सामाजिक सहयोग से खुदाई-सफाई के साथ ही महोबा व बाँदा जिले में वर्ष 2013-14 में लगभग 100 खेत-तालाबों का निर्माण तथा 2000 तालाब बनाने का संकल्प केसर सिंह एवं उनकी टोली के सहयोग से लिया गया।
जल का सम्बन्ध वर्षा के साथ ही भूगर्भ-जल, ग्लैशियरों एवं नदियों से भी है। अतः लोक भारती ने जल एवं नदियों पर कार्य करने वाले अग्रणी संगठनों, व्यक्तियों से सम्पर्क, उनके कार्य का अध्ययन, उनके माध्यम से सामाजिक जागरूकता कार्यक्रमों के आयोजनों एवं उनके साथ प्रत्यक्ष कार्य में सहयोग की भूमिका के साथ कदम आगे बढ़ाये। प्रारम्भ में गंगोत्री से गंगा सागर तक आयोजित दो यात्राओं में सहयोग के अनुभव के परिणामस्वरूप संस्था का निश्चय बना, यदि गंगा को स्वच्छ जल युक्त रखना है तो गंगा में मिलने वाली सभी नदियों पर कार्य करना होगा। अतः संस्था ने उत्तर प्रदेश एवं उत्तराखण्ड की सभी नदियों व उन पर कार्यरत व्यक्तियों, समूहांे की सूची बनाकर सम्पर्क किया और 23 व 24 जनवरी, 2011 को लखनऊ में ‘माँ गंगा समग्र चिन्तन वर्ग’ का आयोजन किया जिसमें 20 नदियों के 400 प्रतिनिधियों ने भाग लिया तथा उसी आयोजन में लोक भारती ने प्रत्यक्ष कार्यानुभव हेतु 960 किमी॰ मैदानी भाग में बहकर गंगा में मिलने वाली लखनऊ की जीवन रेखा, आदिगंगा गोमती के अध्ययन एवं सामाजिक जागरूकता हेतु एक सप्ताह की गोमती यात्रा का निश्चय किया, जो 28 मार्च से 3 अप्रैल, 2011 को गोमती प्रवाह के 13 जिलों में होती हुई 33 स्थानों पर गोमती मित्र-मण्डलों के निर्माण के साथ सम्पन्न हुई।
गोमती यात्रा के परिणामस्वरूप समाज में गोमती संरक्षण के प्रति आयी जागरूकता और प्रदेश सरकार को सौंपी गई उसकी कार्य योजना रिर्पोट ने तात्कालिक प्रदेश सरकार को भी प्रेरित किया और यात्रा के एक सप्ताह के अन्दर ही पीलीभीत जिले के गोमती उद्गम स्थल, माधौटाण्डा में प्रदेश सरकार के एक सचिव द्वारा वहाँ जिलाधिकारी, तहसीलदार एवं सिचाई विभाग के अधिकरियों के साथ निरीक्षण किया, जिसके बाद, पीलीभीत से लखनऊ तक गोमती को सुजला व प्रदूषण मुक्त रखने की कार्य योजना बनाई गई और तत्काल उसका क्रियान्वयन प्रारम्भ हो गया। क्रियान्वयन के प्रथम चरण में पीलीभीत में 47 किमी॰, शाहजहाँपुर जिले में 16 किमी॰ गोमती क्षेत्र की नाप, उसका चिन्हीकरण और खुदाई का कार्य किया गया। गोमती संरक्षण परियोजना को दिये जा रहे महत्व को इससे समझ सकते हें कि, पूरे-पूरे पृष्ठ के सभी समाचार पत्रों में विज्ञापन छपवाकर सरकार द्वारा अपने संकल्प की सार्वजनिक अभिव्यक्ति की गई। परन्तु इसके कुछ समय बाद हुए चुनाव में सरकार बदल गई और नई सरकार के आते ही अधिकारियों ने कार्य बंद कर फाइल को ठंडे बस्ते में डाल दिया।
इसके बाद भी लोक भारती द्वारा पूरे गोमती क्षेत्र में गोमती संरक्षण हेतु नदी स्वच्छता अभियानों, जल के लैव परीक्षणों, तट, घाट एवं एस॰टी॰पी॰ के सामाजिक निरीक्षणों, उपवास, संगोष्ठी, ज्ञापन, प्रतिनिधि मण्डलों के मिलन, पत्राचार, समाचार-पत्रों, पत्रिकाओं में लेखन गोमती क्षेत्र में वृक्षारोपण, आरती, दीपोत्सव जैसे सामाजिक व प्रशासनिक जारूकता के विविध कार्याें की निरन्तरता बनाये रखी। जिससे समाज के अनेक व्यक्ति व संगठन गोमती संरक्षण अभियान में सम्मिलित होते गए, वहीं सई, तमसा, ससुर खदेरी, हिन्डन, काली, मनोरमा आदि प्रदेश की अन्य नदियों के संरक्षण अभियानों में भी तेजी आयी, जिसका प्रभाव राजनैतिक क्षेत्र में कार्यरत लोगों पर भी हुआ और शासन के अधिकारियों ने भी जल, जल-स्रोत एवं छोटी नदियों के संरक्षण के लिए कुछ कदम उठाये। परिणामस्वरूप जून 2013 में मऊ जिले में तमसा तथा फतेहपुर जिले में स्वामी विज्ञानानन्द की प्रेरणा से ससुर खदेरी नदी के उद्गम से लेकर 36 किमी॰ तक मनरेगा से खुदाई, महोबा जिले में सामाजिक कार्यकर्ताओं एवं जिलाधिकारी की अग्रणी भूमिका से जिले के प्रसिद्ध सरोवर कीर्तिसागर की हजारों लोगों ने निरन्तर लगकर खुदाई व सफाई का कार्य किया। लखनऊ में भी शासन, प्रशासन ने गोमती संरक्षण में सक्रियता दिखाई। तीन दिसम्बर, 2013 को लोक भारती की अग्रणी भूमिका में लखनऊ में शासन द्वारा जल-स्रोत संरक्ष्ण हेतु एक अभूतपूर्व क्रियान्वयन कार्यशाला का आयोजन मुख्य सचिव, कृषि उत्पादन आयुक्त (एपीसी) की अध्यक्षता में सम्पन्न हुआ, जिसमें प्रदेश में 50 नदियों एवं जल-स्रोतों पर कार्य करने वाले संगठनों के प्रतिनिधियों तथा 50 जिलों से जिलाधिकारी, सी॰डी॰ओ॰ व समकक्ष अधिकारियों के साथ ही प्रदेश के ग्राम विकास, भूमि संरक्षण विभाग के सचिव, ग्राम विकास व मनरेगा के आयुक्त सम्मिलित हुए और प्रदेश भर में जल-स्रोतों, झीलों, तालाबों व सिकुड़ती नदियों की खुदाई तथा उन पर वर्षाजल संग्रहण के लिए स्थान-स्थान पर जल-बंध (चेक डैम) बनाने की योजना बनी। जिसके परिणामस्वरूप गोमती की सहायक नदी छोहा पर 8, अंधरा छोहा पर 7 तथा बेहता पर 2 चेक डैम बनाए गए, जो मरती नदियों के पुनर्जीवन की दिशा में प्रेरक कदम है।

प्रदेश के अन्य जिलों के साथ ही पीलीभीत जिले में तत्काल गोमती पर पिछली सरकार के समय प्रारम्भ किए गये कार्यों को पुनः प्रारम्भ करने हतु सर्वेक्षण का कार्य पूरा करके, परियोजना पर कार्य प्रारम्भ हुआ, वहीं महोबा एवं बांदा जिले में एक-एक हजार खेत तालाब बनाने के लिए सामाजिक कार्यकर्ता व प्रशासन दोनांे सक्रियता निरन्तर प्रयत्न की उपलब्धि है।
लोक भारती भी महत्वपूर्ण भूमिका गंगोत्री से गंगा सागर तक चल रहे सामाजिक प्रयास ‘गंगा समग्र अभिायान’ में भी रही, जिसके सतत प्रयत्न के परिणाम स्वरूप वर्तमान सरकार ने गंगा की अविरलता-निर्मलता के लिए ‘‘नमामि गंगे’’ परियोजना प्रारम्भ की है। वहीं दैनिक जागरण ने इस जारूकता अभियान को जन-जन तक पहुँचाने के लिए देव प्रयाग से गंगा सागर तक ‘गंगा यात्रा’ का आयोजन कर महत्वपूर्ण पहल की।
वायु, जल-स्रोत एवं नदियों के संरक्षण के साथ ही खाद्यान्न की गुणवत्तापूर्ण उत्पादकता एवं मृदा संरक्षण आवश्यक है, इस हेतु लोक भारती ने 2001 से सम्पूर्ण उत्तर भारत में जैविक खेती तथा 2012 से शास्वत खेती (जीरो बजट प्राकृतिक खेती) के प्रचार-प्रसार हेतु व्यापक व सघन अभियान चला रखा है, जिसके अन्तर्गत अभी तक मथुरा, अलीगढ़, झाँसी, बाँदा, देवरिया, लखनऊ, पीलीभीत, सहारनपुर, कन्नौज, बस्ती, कुरूक्षेत्र सहित 11 स्थानों पर बडे़-बड़े प्रशिक्षण वर्गों के आयोजन सम्पन्न हुए हैं, जिनमें 8 प्रदेशों के 50 से अधिक जिलों के लगभग 5 हजार किसानों नें प्रशिक्षण प्राप्त कर, माॅडल कृषि क्षेत्र विकसित किए हैं, जो इस कृषि-विद्या के विस्तार में सहायक हांेगे। जिससे किसान स्वावलम्बी, कृषि भूमि की उर्वरा-शक्ति का संवर्धन, गुणवत्ता-युक्त खाद्यान्न उप्पादन में वृद्धि, सिंचाई में केवल 10 प्रतिशत जल उपयोग से भू-गर्भ स्तर में बढ़त तथा जैवविविधता का संरक्षण संवर्धन होगा। यह कार्य एक देशी गाय से 15 से 20 एकड़ खेती में सम्भव है, अतः किसान गाय पालेगा, जिससे देशी गाय, किसान और किसानी का अभिन्न अंग बनेगी और उसका संरक्षण-संवर्धन सुनिश्चित होगा। इस हेतु आगामी प्रशिक्षण वर्ग 10 से 14 सितम्बर, 2014 को शाहजहाँपुर जिले के गांधी भवन में सम्पन्न होगा, इसके अतिरिक्त उत्तर प्रदेश में वाराणसी व छŸाीसगढ़ के रायपुर में जीरो बजट प्राकृतिक खेती प्रशिक्षण वर्ग प्रस्तावित हैं।
इस प्रकार लोक भारती विभिन्न सामाजिक संगठनों, व्यक्तियों, विशेषज्ञों एवं शासन-प्रशासन तथा विभिन्न सम्बन्धित संस्थानों, प्रतिष्ठानों को सहभागी बनाते हुए निरन्तर आगे बढते हुए निम्ननांकित आयामों-अभियानों के लिए निरन्तर प्रयत्नशील है।
(1) मेरा गाँव-मेरा तीर्थ, (2) पर्यावरण संरक्षण, (3) वृक्षारोपण एवं हरियाली पखवारा (4). जल एवं नदी संरक्षण, (5) गंगा-समग्र एवं गोमती संरक्षण, (6) जीरो बजट प्राकृतिक खेती प्रशिक्षण, (7) ग्रामीण तकनीकी विकास एवं प्रसार, (8) व्यक्तित्व विकास एवं गौरव सम्मान, (9) स्वयंसेवी संस्थाओं के मध्य समन्वय, (10) साहित्य एवं मासिक पत्रिका ‘लोक सम्मान’ का प्रकाशन तथा (11) समय के साथ गतिमानता हेतु ई-भारती एवं वेब साइड का उपयोग प्रारम्भ किया है, जिसके लिए सवाइींतजपपदकपंण्बवउएतपअमतण्हवउजपण्पदए उंहं्रपदमण्सवाइींतजपपदकपंण्बवउ तथा ूूूण्मइींतजपण्वतह पर संस्था से जुड़ा जा सकता है।
लोक भारती का कार्य लक्ष्य है - ‘भारत का विश्व में सर्वोच्च, गौरवपूर्ण स्थान’ बने, उसके लिए हमारे पास ‘वसुधैव कुटुम्बकम्ं’ की भावना के साथ प्रकृति-मूलक विकास का ध्येय मन्त्र है- 
सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे शन्तु निरामया।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मां कश्चिद् दुखः भाग्भवेत।।’’ 
 - राष्ट्रीय संगठन मन्त्री, लोक भारती

समग्र नदी-संस्कृति एवं पारिस्थितिकी तन्त्र प्रबन्धन के लिए मार्गदर्शी: चैदह नदी सूत्र. - डा॰ वेंकटेश दŸाा

नदियों को पहले बेजान कर उन्हें पुनर्जीवित करने की कोशिश के बजाय, हमे उन्हें प्रारम्भ से ही स्वस्थ रखना होगा। क्योंकि हम सबको स्वस्थ रहने के लिए, हमारी नदियों का स्वस्थ रहना बहुत जरूरी है। 40-50 साल पहले बिना किसी फंडिंग प्रोजेक्ट या एक्शन प्लान के हमारी नदियांँ साफ थीं, निर्मल थीं, अविरल थीं, क्योंकि तब हमारे गाँव के लाखों किसान अपनी जिम्मेदारी को अपने कंधों पर लेकर पानी का काम करते थे।
विकास की अंधी दौड़ ने हमारी पारम्परिक समझ व जिम्मेदारी को कुंठित और साझेदारी के भाव को दिग्भ्रमित किया, परिणमतः आज हम नदियों में साफ पानी के लिए तरस रहे हैं।
वर्तमान समय में पारम्परिक नदी, नाव और गाँव की संस्कृति पर विश्वास कर अगर हम जन भागीदारी की योजना बनाएं और सामाजिक जागरूकता से लोगों को जोड़ें तो हम काफी हद तक अपनी नदियों को सुजला-सजला बनाते हुए गंगा को अविरल-निर्मल और नैसर्गिक बना सकते हैं। परन्तु इसके लिए हमें इन 14 नदी सूत्रों का स्मरण रखना होगा।
¨ चैदह नदी सूत्र -
1. नदियाँ हमारी प्राकृतिक विरासत का हिस्सा हैं।
2. जल, भूआकृतियाँ और कुदरती-निवास प्रशासनिक सीमाओं मे बंधे नहीं होते। 
3. नदियाँ प्राकृतिक रचनाएँ हैं, उनके कारणों को समझे बिना जब चाहे, जहांँ चाहे काटना या मोड़ना प्राकृतिक आपदाओं का कारण बन सकती हैं।
4. नदियाँ हमारे शरीर में बहने वाली रक्त शिराओं के समान हैं, जिनका कार्य शुद्ध रक्त को शरीर में प्रवाहित करना होता है, जबकि अशुद्ध रक्त के प्रवाह व शुद्धीकरण के लिए धमनियाँ होती हैं। शरीर की यह प्रकिृया जब तक ठीक है हम स्वस्थ हैं। उसी प्रकार समाज को स्वस्थ रखने के लिए आवश्यक है कि नदियों को गंदगी ढ़ोने वाला नाला नहीं बनाऐं। अभी तक जो भूल हुई है,  अन्ततः उसमें सुधार करते हुए नदियों से गंदे नालें को अलग करना ही होगा। इसी में हमारा भविष्य सुरक्षित है।
5. नदियों के बाढ़ क्षेत्र (फ्लडप्लेन्स) की प्राकृतिक प्रणालियाँ हजारों-हजारों सालों में विकसित हुई हैं, उनका अतिक्रमण या अपहरण आपदा का कारण बन सकते हैं। 
6. एक नदी, नदी बेसिन के हाइड्रोलाॅजिकल एकता का अविभाज्य अंग हैं और लैण्डस्केप घटक पानी और बाढ़  के मैदानों के प्रवाह के साथ जुड़े हुए हैं।
7. भू-जल गैर-मानसून मौसम में नदी प्रवाह को बनाये रखता है, अतः भूजल के स्तर को हम भी बनाये रखें।
8. सहायक नदियां एवं झीलें एक नदी के जीवन कार्यों के बनाये रखती हैं, अतः हम भी उन्हें जीवन्त बनाये रखें।
9. नदियांँ पारिस्थितिकी प्रणालियों में मीठे पानी की सबसे अधिक उत्पादक प्रणालियाँ हैं, जो जीवन का उत्पादन व रक्षण करती हैं।
10. नदियों का प्रवाह ही उनका जीवन है।
11. नदी के प्राकृतिक बाढ़ क्षेत्र (फ्लड प्लेन) नदी का अभिन्न हिस्सा हैं, अतः उसकी चोरी नहीं की जानी चाहिए।
12. नदी का बिस्तर (रिवरबेड) नदी का अभिन्न हिस्सा है, उसके साथ दुव्र्यवहार नहीं किया जाना चाहिए।
13. नदी का स्वास्थ्य उसके पारिस्थितिकी तन्त्र के स्वास्थ्य पर निर्भर करता है। अतः नदी संरक्षण का अर्थ है उसकी समस्त पारिस्थितिकी प्रणाली का संरक्षण।
14. भारत में नदियों और आध्यात्म के बीच सार्वभौमिक सम्बन्ध है। अतः नदी संरक्षण एवं प्रबन्धन की योजनाओं में आध्यात्मिक पहलुओं पर विशेष रूप से ध्यान देना होगा।  

एक पहल - नदियों के किनारे स्थित तीर्थों का पर्यावरणीय विकास. - डा॰ महेन्द्र प्रताप सिंह

हमारे देश की नदियाँ पहले शुद्ध जल से परिपूर्ण थीं जिसका पान एवं स्नान कर लोग आनन्द की अनुभूति करते थे। इन्हीं पावन नदियों के तट पर हमारे प्रमुख तीर्थ स्थल स्थित हैं। प्राचीन काल में हमारे ऋषि-मुनि नदियों के किनारे स्थित इन तीर्थ स्थलों पर प्रकृति की गोद में रहते थे। सृष्टि के सभी जीव-जन्तुओं एवं पेड़ पौधों से उनका पारिवारिक सम्बन्ध होता था। वे अपने बच्चों के समान प्रकृति के प्रत्येक अवयव की देखभाल एवं सुरक्षा करते थे। नदी तट पर स्थित आश्रम शिक्षा का केन्द्र थे जिससे देश के भावी कर्णधार प्रकृति के प्रति स्वाभाविक प्रेम का पाठ पढ़ कर एवं उसे आत्मसात कर जीवन की कर्मभूमि में प्रवेश करते थे। नदियों की पावन धारा के निर्मल प्रवाह के साथ ही नदी तट पर स्थित इन आश्रमों से ज्ञान-विज्ञान की पावन यशस्वी धारा भी सतत प्रवाहित होती थी जिससे यह भारत देश जगद्गुरु के रूप में समस्त विश्व के लिये पे्ररणा का स्रोत था।
नदी तट पर स्थित वे तीर्थं आज भी विद्यमान हैं किन्तु नदियों का जल पीना तो दूर, नहाने लायक भी नहीं है। तीर्थ स्थलों की हरीतिमा लुप्त हो गई है। तीर्थ स्थलों की गन्दगी से मन कराह उठता है। तीर्थ स्थलों पर पक्के निर्माण तो लगातार हो रहे हैं किन्तु उनके पर्यावरणीय विकास पर ध्यान नहीं दिया जा रहा है। वस्तुतः तीर्थस्थलों का विकास पाँच सितारा संस्कृति से भिन्न है। तीर्थ स्थलों का पर्यावरणीय विकास करकेे ही उन्हें आध्यात्मिक प्रेरणा का स्रोत बनाया जा सकता है। दुर्भाग्यवश इस दिशा में प्रभावी प्रयास नहीं हो सके हंै।
निश्चित रूप से यह बहुत बड़ा कार्य है जिसके लिये लगातार प्रभावी प्रयास की आवश्यकता है। इस दिशा में विचार करने पर मुख्यतः तीन कार्य किये जाने की आवश्यकता दृष्टिगोचर होती है -
¨ पहला नदियों एवं पवित्र कुण्डों की सफाई।
¨ दूसरा तीर्थस्थलों को हरा-भरा करना।
¨ तीसरा तीर्थस्थलों को पालीथीन मुक्त करना।
मेरा यह अनुभव है कि पालीथीन मुक्त करके हम किसी भी क्षेत्र को स्थाई रूप से गन्दा होने से बचाते हैं। नदियों को स्वच्छ रखने एवं सभी प्रकार के पर्यावरण प्रदूषण को दूर करने के लिये वनों एवं वृक्षों की सुरक्षा तथा अधिक से अधिक पौधारोपण ही एकमात्र विकल्प हैं। उक्त समस्या के दृष्टिगत राष्ट्रीय वन नीति में देश के भौगोलिक क्षेत्रफल का 1/3 अर्थात् कुल भू-भाग का 33 प्रतिशत वनों एवं वृक्षों से आच्छादित करने का लक्ष्य रखा गया है किन्तु स्वतन्त्रता प्राप्ति के 67 वर्ष बाद भी हम इस लक्ष्य से काफी पीछे हैं। वर्तमान में देश के कुल भू-भाग का 20.60 प्रतिशत क्षेत्र वनाच्छादित है एवं उत्तर प्रदेश के कुल भू-भाग का मात्र 5.56 प्रतिशत क्षेत्र वनाच्छादित है। उक्त से स्पष्ट है कि उत्तर प्रदेश में पौधारोपण की दिशा में विशेष प्रयास की आवश्यकता है। अतएव इस दिशा में किये गये कतिपय कार्यों का उल्लेख यहाँ पर किया जा रहा है।
¨ माँ चन्द्रिका देवी मन्दिर - लखनऊ से लगभग 30 कि॰मी॰ दूर बख्शी का तालाब के आगे माँ चन्द्रिका देवी शक्तिपीठ परिसर स्थित है। नवरात्रि, अमावस्या एवं अन्य अवसरों पर वहाँ अपार भीड़ होती है। यह महाभारत कालीन एवं श्री कृष्ण से जुड़ा तीर्थस्थल है। इस मन्दिर का परिसर अत्यन्त विशाल है। इसी परिसर में सुधन्वा कुण्ड स्थित है। यहाँ पालीथीन की अधिकता के कारण यह कुण्ड धीरे-धीरे प्रदूषित हो रहा है तथा उसकी मछलियाँ भी मर रही हैं।
अतः मेरे मन में विचार आया कि क्यों न इस परिसर को पालीथीन प्रदूषण मुक्त कराने का प्रयास किया जाय। मेरे विभागीय मित्र श्री ए॰पी॰ सिन्हा एवं श्री वी॰के॰ मिश्र के सहयोग से दिनाँक 11.09.2011 को मन्दिर समिति के अध्यक्ष श्री अखिलेश सिंह चैहान, महामन्त्री श्री अनुराग तिवारी ‘अन्नू’, डा॰ एस॰के॰ सिंह, श्री बी॰डी॰ सिंह, सभी दुकानदारों एवं स्थानीय व्यक्तियों के साथ बैठक की गई। बैठक में सर्वसम्मति से निर्णय लिया गया कि दिनाँक 28.09.2011 से इस परिसर को पालीथीन मुक्त किया जायगा। उसके बाद आस-पास के कुम्हारों के साथ बैठक कर कुल्हड़ आपूर्ति की व्यवस्था की गई। पालीथीन थैली के विकल्प रूप में दुकानदारों को कागज एवं वैकल्पिक थैले उपलब्ध कराये गये। इस प्रकार प्रथम चरण में दुकानों पर पालीथीन कप के स्थान पर कुल्हड़ लाये गये तथा पालीथीन थैलियों के स्थान पर कागज एवं अन्य थैलों का प्रयोग प्रारम्भ किया गया।
इस सफलता को स्थायित्व देने के लिए यह विचार किया गया कि स्थानीय ग्रामवासियों, मन्दिर समिति के लोगों एवं दुकानदारों को किसी श्रेष्ठ सन्त से सौगन्ध दिलाई जाय। इसी के क्रम में दिनाँक 28.09.2011 को नवरात्रि के प्रथम दिवस पर मन्दिर परिसर में मेरे आध्यात्मिक गुरु सन्त स्वामी महेशानन्द जी द्वारा सभी को परिसर को पालीथीन मुक्त करने की शपथ दिलाई गई। शपथ ग्रहण समारोह में मन्दिर समिति के संरक्षक श्री भगवती सिंह जी, लखनऊ विश्व विद्यालय के प्रो॰ हरि शंकर मिश्र एवं अनेक शिक्षाविद्, मन्दिर समिति के सभी पदाधिकारी, वन विभाग के अनेक सहयोगी, परिसर के सभी दुकानदार एवं अनेक स्थानीय लोगों द्वारा परिसर में पालीथीन का प्रयोग न करने का संकल्प लिया गया। इस समय तक परिसर में काफी सीमा तक दुकानों को पालीथीन मुक्त किया जा चुका है। श्रद्धालुओं एवं भक्तों द्वारा पालीथीन का प्रयोग रुकवाने एवं मेला के दिनों में बाहर से आने वालों सेे पालीथीन रुकवाने की दिशा में मन्दिर समिति के सहयोग से प्रयास जारी है।
दिनाँक 28.09.2011 को ही स्वामी जी द्वारा कृष्णवट का रोपण कर परिसर में वृक्षारोपण का शुभारम्भ कर दिया गया जो अब वृक्ष का रूप ले रहे हैं। इसके बाद मेरे मन में यह विचार आया कि इतने विशाल परिसर में सुनियोजित ढंग से न केवल पौधारोपण कराया जाय बल्कि उसे स्थापित कर इसे हरा-भरा किया जाय। वृक्षारोपण के बारे में मेरा यह अनुभव रहा है कि अनेक माध्यमों से प्रतिवर्ष व्यापक रूप से वृक्षारोपण किया जाता है किन्तु अधिकांशतः उनकी सुरक्षा पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया जाता। पौधों की सुरक्षा बच्चे को पालने जैसी है। पौधारोपण के बाद लम्बे समय तक, जब तक कि वह पूर्णतः स्थापित न हो जाय, उसकी सुरक्षा आवश्यक है। वर्ष 2012 एवं 2013 में मन्दिर समिति एवं वन विभाग के सहयोग से व्यापक पौधारोपण किया गया। गोमती तट पर जल भराव वाले क्षेत्र में अर्जुन का रोपण किया गया एवं मन्दिर के आस-पास पीपल, पाकड़ एवं बरगद के साथ-साथ कैथ, बड़हर एवं आमरा जैसी अनेक लुप्त हो रही प्रजातियों को रोपित किया गया। इसमें धार्मिक महत्व को देखते हुये यहाँ कल्पवृक्ष का भी रोपण किया गया है। सन्तोष का विषय है कि सभी प्रजातियाँ न केवल जीवित हैं बल्कि अच्छी दशा में चल रही हैं।
अब यह देखकर बड़ी प्रसन्नता एवं सन्तोष का अनुभव होता है कि वहाँ पर चाय आदि की दुकानों पर मिट्टी के कुल्हड़, चाट की दुकानों पर पत्तल एवं अन्य दुकानों पर कागज के थैलों का व्यापक प्रयोग किया जा रहा है। इससे वहाँ होने वाली गन्दगी में कमी आयी है। इस उल्लेखनीय पहल के लिये मन्दिर समिति के सभी पदाधिकारी, परिसर के दुकानदार एवं सहयोगी मित्रगण बधाई के पात्र हैं। मन्दिर परिसर में कराए गये कार्यों का स्मरण करने पर बरबस उन दो सहयोगियों की याद आती है जो अब इस दुनियाँ में नहीं रहे। श्री बबलू सिंह पालीथ्ीन मुक्ति एवं मो॰ इदरीश वृक्षारोपण कार्यक्रम में ऐसे लगे रहते थे जैसे उनके घर का कोई कार्य हो। इन मित्रों को याद करके आज भी आँख नम हो जाती है।
इसके अगले चरण में भक्तों द्वारा बाहर से लाई जाने वाली पालीथीन पर नियन्त्रण किये जाने की दिशा में अभी व्यापक प्रयास किये जाने की आवश्यकता है। पालीथीन का प्रयोग बन्द होना एवं जनसहयोग से पौधारोपण करने की यह स्वतः स्फूर्त छोटी सी पहल सुखद, प्रेरणास्पद एवं अनुकरणीय है।
¨ नैमिषारण्य - उत्तर प्रदेश के सीतापुर जनपद में स्थित नैमिषारण्य एक प्रसिद्ध एवं प्राचीन तीर्थस्थल है। यह प्राचीन ऋषियों की तपस्थली रही है। प्राचीन काल में यहाँ सघन वन था, इसीलिये इस क्षेत्र का नाम नैमिषारण्य था, परन्तु वर्तमान में यहाँ वन नहीं बचे हैं। आज नैमिषारण्य में नैमिष मात्र बचा है, अरण्य गायब है। यह विचारणीय  विषय है, जिस पर ध्यान दिया जाना आवश्यक है।
मेरे आध्यात्मिक गुरु श्री अखण्डानन्द आश्रम, वृन्दावन के स्वामी महेशानन्द जी हैं। कभी-कभी लखनऊ स्थित मेरे निवास पर उनका आना होता है। उत्तर प्रदेश के पूर्व राज्यपाल श्री विष्णुकान्त शास्त्री जी उनके गुरुभाई थे। जब भी स्वामी जी लखनऊ आते थे, शास्त्री जी से मिलने अवश्य जाते थे। शास्त्री जी एक बार लखनऊ प्राणि उद्यान में एक समारोह में आए थे, तब उन्होंने वन विभाग के अधिकारियों से कहा था कि वृन्दावन एवं नैमिषारण्य हमारी सांस्कृतिक धरोहर हैं। आज न तो वृन्दावन में वन है और नही नैमिषारण्य में अरण्य। श्री राज्यपाल ने आग्रह किया कि वृन्दावन में वन एवं नैमिषारण्य में अरण्य स्थापित करने का विशेष प्रयास किया जाय। स्वामी जी के साथ मैं तीन बार शास्त्री जी से मिला। मेरे वन विभाग में कार्यरत होने के कारण उन्होंने मुझसे तीनों बार जोर देकर कहा कि वृन्दावन में वन एवं नैमिषारण्य में अरण्य स्थापित करने की दिशा में कुछ किया जाय। मैंने कुछ विभागीय अधिकारियों से इसकी चर्चा भी की किन्तु कोई ठोस परिणाम नहीं निकला। बहुत दिन बाद मैंने समाचार पत्र में पढ़ा कि शास्त्री जी नहीं रहे। उस दिन के बाद मैं कई दिन तक व्यथित रहा। उनके हृदय की पीड़ा को मैने अपने मन में आत्मसात् किया एवं तय किया कि शास्त्री जी की इच्छा पूर्ण करने की दिशा में यथासम्भव प्रयास करूँगा।
इसी बीच मेरे मित्र श्री राधे कृष्ण दुबे द्वारा एक महीने तक नैमिषारण्य परिक्रमा पथ की पदयात्रा कर परिक्रमा पथ पर स्थानीय लोगों एवं वन विभाग के सहयोग से 88000 ऋषियों की स्मृति में 88000 पौधों का रोपण कराया गया। यह एक अद्भुत पदयात्रा थी जिसमें व्यापक जन समर्थन मिला। यह एक ऐसी पदयात्रा थी जिसे लम्बे समय तक याद किया जायगा। इस पद यात्रा में मुझे भी दो दिन सम्मिलित होने का अवसर मिला तथा कार्य को आगे बढ़ाने का संकल्प मन मे आकार लेने लगा। इसके अतिरिक्त चन्द्रिका देवी मन्दिर परिसर में पालीथीन मुक्ति एवं सफल वृक्षारोपण से मन में विश्वास उत्पन्न हुआ तथा नैमिषारण्य में इस दिशा में कुछ किए जाने का भाव जगा।
मेरे मित्र एवं प्रभागीय वनाधिकारी सीतापुर श्री वी॰के॰ मिश्र के सहयोग से नैमिषारण्य स्थित पहला आश्रम में दिनाँक 16 दिसम्बर, 2012 को पहली सभा की गई। इस सभा में विभिन्न आश्रमों के प्रमुख सन्त, व्यापार मण्डल के प्रतिनिधिगण, वन विभाग के अधिकारी कर्मचारी गण, मीडिया से जुड़े प्रतिनिधि एवं स्थानीय गणमान्य लोग उपस्थित थे। इस सभा में निर्णय लिया गया कि नैमिषारण्य स्थित श्मशान घाट एवं उसके आस-पास की भूमि पर वृक्षारोपण कार्य कराया जाय। वन विभाग के क्षेत्रीय वनाधिकारी श्री ए॰के॰ सिंह एवं अन्य कर्मचारियों को यह दायित्व दिया गया कि सम्बन्धित ग्राम प्रधान से उक्त भूमि का वृक्षारोपण हेतु प्रस्ताव प्राप्त किया जाय तथा उस पर विशेष ध्यान देकर रोपण कार्य कराया जाय। पालीथीन मुक्त क्षेत्र बनाने पर लोगों की राय थी कि यह अत्यन्त कठिन कार्य है। श्री ए॰के॰ सिंह अध्यक्ष व्यापार मण्डल के सुझाव पर यह तय हुआ 29 दिसम्बर सन् 2012 को नैमिषारण्य के प्रमुख साधु सन्त, व्यापार मण्डल के प्रतिनिधि गण एवं गणमान्यलोग माँ चन्द्रिका देवी मन्दिर परिसर में आकर देखें कि वहाँ पर पालीथीन के विकल्प का कैसे प्रयोग किया जा रहा है तथा वहाँ गोमती नदी के किनारे किये जा रहे रोपण कार्य को भी देखें ताकि एक सकारात्मक एवं व्यावहारिक सोच जागृत हो सके।
दिनाँक 29 दिसम्बर सन् 2012 को चन्द्रिका देवी मन्दिर परिसर में सभा की गई। इस सभा में चन्द्रिका देवी मन्दिर परिसर के अध्यक्ष श्री अखिलेश सिंह चैहान ने सभी को वहाँ पर पालीथीन के विकल्पों को दिखाया। चाय एवं चाट की दुकानों पर कुल्हड़ एवं पत्तल का प्रयोग देखकर लोग बहुत प्रभावित हुये। इस सभा से एक सकारात्मक वातावरण बना तथा नैमिषारण्य के गणमान्य लोगों के मन में यह भाव आया कि पालीथीन के विकल्प का प्रयोग कर इसे हटाया जा सकता है। यह निश्चित हुआ कि दिनाँक 27 जनवरी 2013 को चन्द्रिका देवी मन्दिर परिसर के पालीथीन के विकल्प के विक्रेता को नैमिषारण्य लाया जाय तथा पालीथीन को बन्द करने की दिशा में आगे कार्यवाही की जाय।
दिनाँक 27 जनवरी 2013 को पालीथीन के विकल्प के विक्रेता के साथ मैं नैमिषारण्य पहुँचा। इस सभा में पहला आश्रम के महन्त जी एवं अन्य कई लोगों ने पालीथीन के विकल्प के रूप में प्रयोग की जाने वाली थैलियाँ खरीदीं। इस सभा में उत्तर प्रदेश में पालीथीन को प्रतिबन्धित करने के मा॰ उच्च न्यायालय के आदेश से सबको अवगत कराया गया। ललिता पीठ के श्री गौरी शंकर जी द्वारा सुझाव दिया गया कि यदि मा॰ उच्च न्यायालय के आदेश के क्रम में आग्रह करके प्रशासक से ललितापीठ को पालीथीन मुक्त करने का आदेश करा लिया जाय तो पालीथीन मुक्त करने की दिशा में आगे बढ़ा जा सकता है। मेरे मित्र श्री विनय कृष्ण मिश्र जी के प्रयास से दिनाँक 8 मार्च 2013 को माँ ललिता देवी परिसर को पालीथीन मुक्त करने का आदेश रिसीवर महोदय से निर्गत हो गया। इस प्रकार पालीथीन मुक्ति की दिशा में एक सार्थक प्रयास हुआ।
इसके अतिरिक्त गोमती के तट पर शमशान घाट के निकट वन विभाग द्वारा स्थानीय गणमान्य नागरिकों के सहयोग से भूमि का प्रस्ताव प्राप्त कर वृक्षारोपण कार्य भी प्रारम्भ कर दिया गया। यह वह भूमि है जिस पर लगातार अतिक्रमण होता जा रहा था। नदी तट स्थित इस संवेदनशील भूमि पर 05 हे॰ क्षेत्र में वन विभाग एवं स्थानीय लोगों के सहयोग से विधिवत् पौधारोपण कार्य कराया गया। इसके अतिरिक्त बालाजी मन्दिर परिसर में पंचवटी, नवग्रह वाटिका एवं नक्षत्र वाटिका की स्थापना कराई गई। ईश्वर की कृपा से यहाँ पर रोपित सभी पौधे सुरक्षित एवं प्रफुल्लित हैं। इस समय वन विभाग के साथ-साथ स्वामी बालकृष्ण शास्त्री जी द्वारा इन पौधों की देखभाल की जा रही है जिसके लिये वे बधाई के पात्र हैं।
उक्त के अतिरिक्त गोमतीपार क्षेत्र स्थित पहला आश्रम की भूमि पर भी व्यापक रोपण तथा नैमिषारण्य से थोड़ी दूर स्थित रुद्रावर्त मन्दिर के पास हरिशंकरी स्थापित की गई। भगवान शिव के अद्भुत भक्त यहाँ के महात्मा जी द्वारा हरिशंकरी की स्वयं सेवा की जा रही है जिसके लिये वे साधुवाद के पात्र हैं। हरिशंकरी में ब्रह्मा, विष्णु, महेश त्रिदेव के प्रतीक रूप में पीपल, बरगद एवं पाकड़ का पास-पास रोपण किया जाता है, जो बड़े होने पर एक रूप हो जाते हैं।
¨ वृन्दावन - दिनाँक 11.05.2013 को वृन्दावन में साधुसन्तों एवं स्थानीय प्रबुद्ध लोगों के साथ वृन्दावन को हरा-भरा करने के सम्बन्ध में बैठक की गई। इस बैठक में तटिया स्थान के स्वामी मदन बिहारी दास द्वारा वृन्दावन को हरा करने में विशेष रुचि दिखाई गई। इसी दिन स्वामी मदन बिहारी दास जी के साथ उन स्थलों का भ्रमण किया गया जहाँ पौधारोपण कराया जा सकता था। भ्रमण के उपरान्त वृन्दावन दिल्ली मार्ग पर स्थित सुनरख क्षेत्र में में पौधारोपण कराने का निर्णय लिया गया। यहाँ पानी खारा है तथा पौधों को बचाने की विकट समस्या है। विशेष प्रयास करके वन विभाग की सहायता से 2013 वर्षाकाल में यहाँ पर 119 एकड़ क्षेत्र में पौधारोपण कार्य कराया गया। ईश्वर की कृपा से यहाँ अधिकांश पौधे जीवित हैं।
स्वामी मदन बिहारी दास जी द्वारा इस क्षेत्र की लगातार प्रभावी देखभाल की जा रही है। स्वामी जी का यह कार्य हम सबके लिए पे्ररणास्रोत एवं अनुकरणीय है।
¨ धौम्य ऋषि आश्रम, धोबियाघाट -हरदोई जनपद में गोमती के तट पर स्थित धोबियाघाट एक अद्भुत स्थान है। यह दो कारणों से अद्भुत है- पहला यहाँ भूमि से अनेक पानी के सोते निकलते हैं जो बाद में गोमती नदी में मिलते हैं तथा दूसरा गोमती के तट पर स्थित मन्दिर के सघन वन क्षेत्र को देखकर प्राचीन आश्रमों की परिकल्पना साकार रूप लेती है। आज के व्यावसायिक युग में यहाँ के सघन वन क्षेत्र को बचाये रखने के लिये यहाँ के महन्त श्री नारायणानन्द जी अभिनन्दन के योग्य हैं। मैं लोक भारती के मित्रों मुख्यतः श्री बृजेन्द्र पाल सिंह जी का आभारी हूँ  कि उनके माध्यम से मुझे गोमती के तट पर स्थित ऐसे हरे भरे क्षेत्र में स्थित तीर्थस्थल का दर्शन करने का अवसर प्राप्त हुआ। लोक भारती के नेतृत्व में यहाँ पर एक सभा का आयोजन कर यहाँ पर पालीथीन बन्द करने पर विचार किया गया। यहाँ की सभा में हमें स्वामी जी एवं अन्य सभी का व्यापक सहयोग मिला एवं पालीथीन बन्द करने का अभियान यहाँ भी प्रारम्भ हो गया।

¨ सैलानी माता मन्दिर - लखनऊ से लगभग 20 कि॰मी॰ दूर बाराबंकी जिले में गोमती नदी के तट पर सैलानी माता का मन्दिर स्थित है। लोक भारती के सहयोग से मन्दिर समिति के पदाधिकारियों के साथ यहाँ पौधारोपण के सम्बन्ध में बैठक की गई तथा वर्ष 2014 वर्षाकाल में यहाँ पर धार्मिक महत्व के एवं लुप्त हो रही वृक्ष प्रजातियों के व्यापक पौधारोपण की योजना बनायी गयी। उक्त पौधा रोपण हेतु मन्दिर समिति द्वारा यहाँ पर रोपण हेतु वृत्ताकार खाईं खुदवाई गयी। दिनाँक 04.05.2014 को मन्दिर समिति के अध्यक्ष श्री रामदुलारे यादव एवं मन्दिर के मुख्य पुजारी श्री वासुदेव जी द्वारा रुद्राक्ष के पौधे का रोपण कर पौध रोपण का शुभारम्भ किया गया। दिनाँक 20.07.2014 को सैलानी माता मन्दिर परिसर में कल्पवृक्ष, पारिजात (हरसिंगार), हरिशंकरी (पीपल, पाकड़ एवं बरगद), कैथ, खिरनी, कनकचम्पा, मौलश्री, खैर, बड़हल, गूलर आदि प्रजातियों का रोपण किया गया। उक्त पौधा रोपण हेतु श्री सुरेश चन्द्र यादव, प्रभागीय वनाधिकारी, लखनऊ वन प्रभाग द्वारा यहाँ पौध उपलब्ध कराकर प्रशंसनीय सहयोग किया गया। उक्त कार्यक्रम में वन विभाग के अनेक अधिकारियों मुख्यतः श्री ए॰पी॰ त्रिपाठी प्रभागीय वनाधिकारी सुल्तानपुर वन प्रभाग, श्री पी॰पी॰ सिंह प्रभागीय वनाधिकारी बाराबंकी वन प्रभाग एवं वन विभाग के अन्य सहयोगियों मुख्यतः श्री अनिल कान्त गुप्ता, श्री हरि राम यादव तथा श्री राम सेवक यादव का विशेष योगदान रहा है। उक्त परिसर में वृक्षारोपण कराये जाने एवं उसकी सुरक्षा हेतु सैलानी माता मन्दिर समिति के सभी सदस्य मुख्यतः श्री रामदुलारे यादव का अमूल्य सहयोग मिला, जिसके बिना यह कार्य कराया जाना सम्भव नहीं था।
कभी-कभी मन में विचार आता है कि ऐसे प्रतीकात्मक रोपण से पर्यावरण प्रदूषण की समस्या नहीं हल होने वाली है। पर्यावरण प्रदूषण की विकट समस्या को देखते हुये थोड़ी देर लगता है कि बात तो सही है, किन्तु फिर अपनी ही कृति ‘नारद की भू-यात्रा’ की अन्तिम पंक्तियाँ मेरा पथ प्रदर्शन करती हैं -
‘घनी काली रातों में
सपनों के सूरज देखने से अच्छा है,
कि इस रात में जागकर
निःस्वार्थ प्रयास का
माँ प्रकृति की आराधना में
सरिता गिरि तरु उपासना में
एक छोटा ही दीप जलाएॅं
आज के मुख्य युगधर्म को निभाएॅं।
इस छोटे से चिराग की रोशनी में संशय के घनघोर अँधेरें में भी मुझे अपना कर्तव्य पथ साफ-साफ दिखता है और मैं उसी पर चलने का प्रयास भी कर रहा हूँ। ु
- उप वन संरक्षक, कार्यालय प्रमुख वन संरक्षक,
17, राणा प्रताप मार्ग, उत्तर प्रदेश, लखनऊ।