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Tuesday, March 25, 2014

प्रलय का शिलालेख - अनुपम मिश्र

सन् 1971 की जुलाई का तीसरा हफ्ता। चमोली जिले कि बिरही घाटी में आज एक अजीब सी खामोशी है। यों तीन दिन से लगातार पानी बरस रहा है और इस कारण अलकनंदा की सहायक नदी बिरही का जल स्तर भी बढ़ता जा रहा है। उफनती पहाड़ी नदी की तेज आवाज पूरी घाटी में टकरा कर गूंज भी रही है। फिर भी चमोली-बद्रीनाथ मोटर सड़क से बाई तरफ लगभग 22 किलोमीटर दूर 6500 फुट की ऊंचाई पर बनी इस घाटी के 13 गांवों के लोगों को आज सब कुछ शांत सा लग रहा है। आज से सिर्फ सात बरस पहले ये लोग प्रलय की गर्जना सुन चुके थे, देख चुके थे। उनके घर, खेत व ढोर इस प्रलय में बह चुके थे। उस प्रलय की तुलना में आज बिरही नदी का शोर इन्हें डरा नहीं रहा था। कोई एक मील चैड़ी और पांच मील लम्बी इस घाटी में चारों तरफ बड़ी-बड़ी शिलाएं, पत्थर, रेत और मलबा भरा हुआ रास्ता है, इस सब के बीच से किसी तरह रास्ता बना कर बह रही बिरही नदी सचमुच बड़ी गहरी लगती है। लेकिन सन् 70 की जुलाई का तीसरा हफ्ता ऐसा नहीं था। तब यहां यह घाटी नहीं थी, इसी जगह पर पांच मील लम्बा, एक मील चैड़ा और कोई तीन सौ फुट गहरा एक विशाल तालाब था-गौना ताल। ताल के एक कोने पर गौना गांव था और दूसरे कोने पर दुमरी गांव, इसी लिए कुछ लोग इसे दुमरी ताल भी कहते थे। पर बाहर से आने वाले पर्यटक के लिए यह बिरही ताल था, क्योंकि चमोली-बद्रीनाथ मोटर-मार्ग पर बने बिरही गांव से ही इस ताल तक आने का पैदल रास्ता शुरू होता था। ताल के ऊपरी हिस्से मेें त्रिशूल पर्वत की शाखा कुवांरी पर्वत से निकलने वाली बिरही समेत अन्य छोटी-बड़ी चार नदियों के पानी से ताल में पानी भरता रहता था। ताल के मुंह से निकलने वाले अतिरिक्त पानी की धार फिर से बिरही नदी कहलाती थी। जो लगभग 18 किलोमीटर के बाद अलकनंदा में मिल जाती थी। सन् 70 की जुलाई के तीसरे हफ्ते ने इस सारे दृश्य को एक ही क्षण में बदल कर रख दिया।
दुरमी गांव के प्रधानजी उस दिन की याद करते है, ‘तीन दिन से लगातार पानी बरस रहा था। पानी तो इन दिनों में हमेशा गिरता है, पर उस दिन की हवा कुछ और थी। ताल के पिछले हिस्से से बड़े-बड़े पेड़ बह-बह कर ताल के चारों ओर चक्कर काटने लगे थे, ताल में उठ रही लहरें उन्हें तिनकांे की तरह यहां से वहां, वहां से यहां फेंक रही थी। देखते-देखते सारा ताल पेड़ों से ढक गया। अधेंरा हो चुका था, हम लोग अपने-अपने घरों मेें बन्द हो गए। हम घबरा रहे थे कि आज कुछ अनहोनी होकर रहेगी।’ खबर भी करते तो किसे करते? जिला प्रशासन उनसे 22 किलोमीटर दूर था। घने अंधेरे ने इन गांव वालों को उस अनहोनी का चश्मदीद न बनने दिया, पर इनके कान तो सब सुन रहे थे। प्रधानजी बताते हैं, ‘रात भर भयानक अवाजें आती रहीं फिर एक जोरदार गड़गड़ाहट हुई और फिर सब कुछ ठंडा पड़ गया।’ ताल के किनारे की ऊंची चोटियों पर बसने वाले इन लोगों ने सुबह के उजाले में पाया कि गौना ताल टूट चुका है, चारों तरफ बड़ी-बड़ी चट्टानें, हजारों पेड़ों का मलबा, और रेत-ही-रेत पड़ी है।
ताल की पिछली तरफ से आने वाली नदियों के ऊपरी हिस्सों में जगह-जगह भूस्खलन हुआ था, उसके साथ सैकड़ों पेड़ उखड़-उखड़ कर नीचे चले आये थे। इस सारे मलबे को, टूट कर आने वाली बड़ी-बड़ी चट्टानों का गौना ताल अपनी 300 फुट की गहराई में समाता गया, सतह ऊंची होती गई और फिर लगातार ऊपर उठ रहे पानी ने ताल के मुंह पर रखी एक विशाल चट्टान को उखाड़ फंेका और देखते-ही-देखते सारा ताल खाली हो गया। घटना स्थल से लगभग तीन सौ किलोमीटर नीचे हरिद्वार तक इसका असर पड़ा था। गौना ताल ने एक बहुत बड़ी प्रलय को अपनी गहराई में समा कर उसका छोटा सा अंश बाहर फेंका था। उसने सन् 70 में अपने को मिटा कर उत्तराखण्ड, तराई और दूर मैदान तक के हिस्से को बचा लिया था। वह सारा मलबा उसके विशाल विस्तार और गहराई में न समाया होता तो सन् 70 की बाढ़ की तबाही के आँकड़े कुछ और ही होतें। लगता है गौना ताल का जन्म बीसवीं सदी के सभ्यों की मूर्खताओं से आने वाले विनाश को थाम लेने के लिए ही हुआ था।
ठीक आज की तरह ही सन् 1893 तक यहां गौना ताल नहीं था। उन दिनों भी यहां पर विशाल घाटी ही थी। सन् 93 में घाटी के संकरे मुंह पर ऊपर से एक विशाल चट्टान गिरकर अड़ गई थी। घाटी की पिछली तरफ से आने वाली बिरही और उसकी सहायक नदियों का पानी मुंह पर अड़ी चट्टान के कारण धीरे-धीरे गहरी घाटी में फैलने लगा। अंग्रजों का जमाना था, प्रशासनिक क्षमता में वे 1970 के प्रशासन से ज्यादा कुशल साबित हुए। उस समय जन्म ले रहे गौना ताल के ऊपर बसे एक गांव में तारघर स्थापित किया और उसके माध्यम से ताल के जल स्तर की प्रगति पर नजर रखे रहे। एक साल तक वे नदियांँ ताल का पानी भरती रहीं।
जल स्तर लगभग 100 गज ऊंचा उठ गया। तारघर ने खतरे का तार नीचे भेज दिया। बिरही और अलकनंदा के किनारे नीचे दूर तक खतरे की घंटी बज गई। ताल सन् 1894 में फूट पड़ा, पर सन् 1970 की तरह एकाएक नहीं। किनारे के गांव खाली करवा लिए गए थे, प्रलय को झेलने की तैयारी थी। फूटने के बाद 400 गज का जल स्तर 300 फुट मात्र रह गया था। ताल सिर्फ फूटा था सिमटा नहीं था। गोरे साहबों का सम्पर्क न सिर्फ ताल से बल्कि उसके आसपास की चोटियों पर बसे गांवों से भी बना रहा। उन दिनों एक अंग्रेज अधिकारी महीने में एक बार इस दुर्गम इलाके में आकर स्थानीय समस्याओं और झगड़ों को निपटाने के लिए कोर्ट लगाता था। विशाल ताल साहसी पर्यटकों को भी न्योता देता था। ताल मे नावें चलती थी। आजादी के बाद के बाद भी नावें चलती रहीं। सन् 60 के बाद ताल से 22 किलोमीटर दूरी में गुजरने वाली हरिद्वार बद्रीनाथ मोटर-सड़क बन जाने से पर्यटको की संख्या बढ़ गई। ताल में नाव की जगह मोटरं-बोट ने ले ली। ताल में पानी भरने वाली नदियों के जलागम क्षेत्र कुंआरी पर्वत के जंगल भी सन् 60 से 70 के बीच कटते रहे। ताल से प्रशासन का सम्पर्क सिर्फ पर्यटन के विकास के के नाम पर कायम रहा-वह ताल के इर्द-गिर्द बसे 13 गांवों को धीरे-धीरे भूलता गया। फिर सन् 70 जुलाई का वह तीसरा हफ्ता आ गया। ताल फूट जाने के बाद सड़क पूरी करने की जरूरत ही नहीं समझी गई। सन् 1894 में गौना ताल फटने की चेतावनी तार से भेजी थी, पर 1970 में ताल फटते ही खबर लग गई। बहरहाल, अब यहां गौना ताल नहीं है, पर उसमें पड़ी बड़ी-बड़ी चट्टानों पर पर्यावरण का एक स्थाई शिलालेख खुदा हुआ है। इस क्षेत्र में चारो तरफ बिखरी चट्टानें हमें बताना चाहती हैं कि जंगलों खास कर नदियों के जलसंगम क्षेत्र में खड़ें जंगलों का हमारे पर्यावरण पर क्या असर पड़ता है।  पर हम ‘शिलालेख’ पढ़ने के लिए तैयार नहीं हैं। लेकिन उŸाराखण्ड का ‘चिपको’ आन्दोलन’ न केबल इस ‘शिला लेख’ को पढ़ चुका है, बल्कि वह अपनी सीमित शक्ति और अति सीमित साधनों से इसकी हिदायतों पर अमल भी कर रहा है।
जुलाई के तीसरे हफ्तेे में आन्दोलन के कार्यकर्ताओं की एक टुकड़ी लगातार बारिश के बीच गौना ताल पहुंची और उसने ताल के मलबे के बीच से बह रही विरही नदी के किनारे-किनारे मजनू नाम के एक पेड़ की कोई तीन हजार कलमें रोपीं। क्योंकि मजनू की जड़ों में नदी के किनारों को बांँध रखने का विशेष गुण है। अतः इस इलाके में मजनू का पेड़ पहली बार लगाया गया है।
गाड़ी गांव में रहने वाले आजाद हिन्द फौज के भूतपूर्व सैनिक ने 1977 के जून माह में सीधे प्रधानमन्त्री को पत्र लिख कर पूंछा था ‘क्या आप इन तेरह गांव के लोगों को भी अपनी प्रजा मानते हैं? यदि हांँ तो तो हमारे लिए बाढ़ के इन दिनों में खाने-पीने का इन्तजाम करवाइए। हम मुफ्त में नहीं तो उचित मूल्य और उचित दर पर मांग रहे हैं।’
1977 में एक भूतपूर्व सैनिक की लिखी बात आज भी प्रासंगिक है। लेकिन तब भूतपूर्व सैनिक के गुस्से में जो दम था, आज वह नहीं है? उत्तराखण्ड के अनेक गांवों में वैसा ही गुस्सा उबल रहा है। पर! क्या आज भी उस सैनिक की भावना को समझ कर उस पर अमल हो पा रहा है?
बाढ़ तो हर बरस आयेगी जब तक हम गौना ताल के मलबे पर लिखे शिलालेख को पढ़ नहीं पायेंगे, पढ़कर समझ नहीं पायेंगे।

Monday, March 24, 2014

विश्व शान्ति हेतु ’जल जन जोड़ो’ -राजेन्द्र सिंह, जल पुरूष

समुदायों के जलाधिकार छिनने के कारण तथा राजनेताओं के वोट के बदले पानी देने के आश्वासन ने समाज को बेपानी बना दिया। जहाँ का समाज राजनेताओं के आश्वासन में नहीं फंसा तथा ’अपना हाथ जगन्नाथ’ मानकर बादल से निकली हर जल बूँद को अपना जीवन मानकर सहेजने लगा तो, फिर उसके हाथ में पानी आ गया। अनुशासित होकर उपयोग करने लगा। वह समुदाय आज 21 वीं शताब्दी के दूसरे दशक में पानीदार बन गया है।
भारत पानीदार राष्ट्र था। सभी को सब जगह जीने और जल पीने तथा जरूरतें पूरी करने का स्वंतत्र अवसर प्राप्त था। जब भी हम नदी या बादल से जल लेते थे तो उनको सम्मान करने के लिए नदी को ’मां’ और बादल को ’देवता’ कहते थे। हमारे प्रकृतिमय जीवन को अंग्रेजीयत ने बदला। हमारी जनसंख्या बढी, सुख सुविधाऐं, पानी का भोग और लालच बढ़ा। हम लालची बनकर दूसरों पर निर्भर रहने के आदी हो गए और यदि हम शक्तिशाली है तो पानी का अतिक्रमण, प्रदूषण और शोषण करने वाले बन गए हैं। पूरे राष्ट्र में ऐसे भी बहुत सारे समुदाय हैं जिन्होंने ’सूर्य देवता’ को जल देने और लेने वाला मानकर उसके काम में मदद की और जब भी सूर्य देवता समुद्र के खारे पानी का वाष्पीकरण करके बादल बनाकर जल देता तो उसे समुदाय अपना जीवन मानकर फिर उस सूर्य देवता की नजरों से बचाने के लिए धरती के पेट में रख देते। जब कभी ’प्रकृति क्रोध’ हुआ और वर्षा नहीं हुई तो धरती के पेट से पानी निकालकर अपने प्राण बचा लेते थे।
राजस्थान के हजारों समुदायों ने बादलांे की बूदों को पकड़कर सूरज की नजरों से बचाकर अपना जीवन चलाया तथा इसी विधि से सात नदियों अरवरी, रूपारेल, सरसा, साबी, महेश्वरा, भगाणी और जहाजवाली को पुनर्जीवित करके शुद्व सदानीरा बना दिया।
उक्त अनुभव का पूरे देश को अहसास कराने और वैसा काम करने के लिए विश्वास बनाकर काम का आभास देने के लिए ’जल जन जोड़ो अभियान’ शुरू करने का निर्णय तरूण भारत संघ, भीकमपुरा, राजस्थान में हुआ। उसके बाद दिल्ली से 18-19 अप्रैल 2013 को विधिवत शुरूआत हुई।
समुद्र किनारे, कन्नूर से शुरू होकर अभी तक केरल, तमिलनाडू, पांडीचेरी, कर्नाटक, आंध्रप्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ, उड़ीसा, झारखण्ड़, बिहार, उत्तर प्रदेश, दिल्ली और राजस्थान में दिनाँक 20 अप्रैल से 6 मई 2013 तक इस अभियान की पूर्व तैयारी, बैठकंे और कार्यक्रम आयोजित किए हैं। इसके साथ ’जल जन जोड़ो अभियान’ का पहला कदम पूर्ण हुआ। अब इसे आगे देश भर में स्थानीय समुदाय ही चलायेंगे। परन्तु इस समय उŸाराखण्ड में आई आपदा में फंसे लोगों के तत्काल बचाव तथा उसके बाद आपदा के कराण व निवारण पर विचार करने की आवश्यकता है।
ऽ बसाने और बचाने की जरूरत -‘देवभूमि’ भारतीय समाज में सबसे अधिक सम्माननीय है। उसी सम्मान को एक बार फिर से बनाने और बचाने की जरूरत है। उŸाराखण्ड को राष्ट्रीय शुभ् की चाह बनानी होगी। ऐसा होगा तो हिमालय को बुखार नहीं चढ़ेगा, आपदा नही आयेगी। लेकिन, इसके लिए जरूरी है कि सरकार के साथ ही समाज जाग्रत हो।
सरकार को तीर्थ और पर्यटन में भेद कर हिमालय प्रबन्धन करना चाहिए। तीर्थ यात्री सरकार से ज्यादा सुुविधा नहीं चाहता, उन्हें सम्मान और संरक्षण चाहिए। तीर्थ यात्रियों को सुविधा देने के नाम पर हिमालय की हरियाली कतई नष्ट नहीं की जानी चाहिए। हिमालय की हरियाली राष्ट्रीय शुभ् है।
आपदा में बहुत नुकसान हुआ है। ऐसे में आध्यात्मिक सुख, सन्तोष, समृद्धि देने वाले हिमालय को सम्मानजनक स्वरूप में पुनः खड़ा करने के लिए, पूरे देश का दायित्व बनता है। इसके साथ ही उŸाराखण्ड के पुनर्निमाण में कुछ एहतियात जरूरी हैं -
 नदियों की भूमि को संरक्षित घोषित करें व इस भूमि में परिवर्तन का अधिकार किसी भी पंचायत, नगर पालिका व राज्य सरकार को न हो तथा नदी किनारे बसावट पर रोक लगे।
 संवेदनशील जगहों की पहचान हो और नदी घाटियों में 200 मी॰ तक हरी पट्टी स्थापित किया जाना सुनिश्चित हो।
 नदियों के उद्गम से 50-100 किमी तक के क्षेत्र को इकोसेन्सटिव घोषित किया जाय।
पहाड़ों पर सड़क बनाने के बाद मलबा नदी व गदेरे में न छोड़ा जाय।
हमल आधारित बिजली परियोजनाओं व बड़े बांँधों की नीति बदलने की जरूरत है।
आर्थिक मदद का उपयोग प्रकृति के संरक्षण, प्रभावितों के पुनर्वास व युवाओं को रोजगार प्रदान करने में हो। 
लेखक मैगसेसे पुरस्कृत, व प्रसिद्ध पर्यावरणविद् हैं।

सृजन का संकल्प-


मैं उत्तराखंड हूं। मेरी आयु तेरह साल है। मैं उत्तर दिशा में हिमालय की गोद में बसा हूं। अपनी किशोरावस्था के पहले पावदान पर चढ़ने के साथ, मैं अपने सभी भाई प्रदेशों से आयु में छोटा हूं। हमारी भारतीय संस्कृति रही है कि हम अपने छोटे भाइयों को खूब लाड़ प्यार करते हैं, लिहाजा मुझे पूरे देश से यह हक मिलता रहा है। देश के कोने-कोन से लोग हमारे यहां अपनी आस्था, श्रद्धा, धर्म, आध्यात्म और घुमक्कड़ी की भूख मिटाने आते हैं।
हमने आज तक उनकी यात्रा के लिए अपने पलक पांवड़े बिछाते हुए मेजबानी में कोई कोताही नहीं की। मेरे अस्तित्व से पहले सदियों से चली आ रही इस परम्परा में हम एक दूसरे का पूरक होने का भरोसा दिखाते रहे। हमने अपनी नदियों से उनकी सभी जरूरतों को पूरा किया। अपनी औषधीय वनस्पतियों के इस्तेमाल से लोगों के दुख दूर किए। यहाँ की बिजली से देश को रोशन किया। यह बात और है कि इन सबके लिए हमें खुद कष्ट उठाना पड़ा है।
आज हम विपदा में घिरे हुए हैं। हाल र्में आइं प्राकृतिक आपदा यहां पर आंसुओं का सैलाब छोड़ गई। हमारा तिनका-तिनका बिखर गया। सब कुछ नष्ट हो गया। हमारे लोगों के सामने उजड़ चुके चमन को आबाद करने की बड़ी चुनौती आ खड़ी हुई है। हालाकि हम बिलकुल घबरा नहीं रहे हैं। हमें आप सबका आसरा और भरोसा है। उम्मीद कायम है कि जिस भाई के यहां आप अपनी परेशानियों, चिन्ताओं और व्यथा को त्याग कर सुकून, आनन्द और मोक्ष प्राप्त करते हैं, आज अगर वह बदहाल है तो आप लोग जरूर उसे इस संकट से निकालेंगे। छोटे भाई को परेशानी से उबारना यदि बड़े भाई का दायित्व है तो यह कर्तव्य बखूबी आप लोग निभायेंगे। हम चिन्तित नहीं हैं........ हमें आपकी मदद का इन्तजार है।
- आपका स्नेहिल, उत्तराखंड

केदार विनाश-त्रिवेणी प्रसाद दुबे ‘मनीष’

सहसा दल बादल फटे, सरक गिरे चट्टान।
श्रीकेदार अडिग डटे, मिटे अनेक निशान।।
धाराएँ सब धिक् बनी, ऐसा मुखर उफान।
पानी के सैलाभ में, बहे कितने इन्सान।।
भोलेभाले भक्त भव, आस धरे मजबूर।
देश विदेश परिवार रव, भावी आशा चूर।।
भोजन साधन धन बिना, लोग विवश लाचार।
समाचार सन्देश बना, अनगिन भाव विचार।।
दिवस सोलह माह जून, भीषण ध्वंश विनाश।
वर्ष दो हजार तेरह, विस्मित शैल विकास।।
अकस्मात् कान्हें फटा, बादल रूप अनूप।
सुषमाघाटी भव घटा, धूमिल जीवन धूप।।
भूस्खलन और जल प्रलय, विकल रूप केदार।
सुन्दरघाटी के शरण, मानव शव अम्बार।।
बहती धर्मशालाएं, बहे गाँव के गाँव।
मन्दाकिनी मालाएं, प्रकृति आपदा छाँव।।
उत्तरकाशी चमोली, चारितर चारों धाम।
रामबाड़ा विकृतवेश, नाम अज्ञात अनाम।।
देवी आपदा सम्मुख, टूटे दर्पण सार।
आकुल आतंक आमुख, सरिता साज श्रृंगार।।
शंकर समाधि पुरातन, ढही बही कित काम।
अतिशय भोग विलास तन, विघटित पावन धाम।।
जल श्रोत नग शैल खंड, व्याकुलदिव्य महेश।
ध्वस्त लोक मान घमंड, दुर्लभ प्रवेश।।
- भारतीय वन सेवा

Saturday, March 8, 2014

लोक भारती उत्तर प्रदेश की सामाजिक गतिविधियाँ और उसकी व्यवस्था- (सितम्बर-अक्टूबर, 2013)

लोक भारती उत्तर प्रदेश समाजहित के अनेक कार्यों में संलग्न, सामाजिक सहयोग से चलने वाली स्वयंसेवी संस्था है, जिसका कार्यक्षेत्र सम्पूर्ण भारत है। संस्था वर्तमान समय में प्राथमिकता के आधार पर निम्नलिखित क्षेत्रों में कार्यरत है।
(1). शाश्वत खेती प्रशिक्षण (सुभाष पालेकर प्रणीत - जीरा बजट प्राकृतिक खेती), (2). मेरा गांव, मेरा तीर्थ, (3). गोमती संरक्षण अभियान, (4). गंगा समग्र, (5).नदी समग्र समन्वय, (6). पर्यावरण संरक्षण एवं वृक्षारोपण, (7).स्वयंसेवी संस्थाओं (एनजीओ) के मध्य समन्वय एवं सहयोग, (8) साहित्य प्रकाशन, ़(9) मासिक पत्रिका - लोक सम्मान का प्रकाशन एवं (10) सेवा कार्य, जो सामाजिक सहयोग के आधार पर ही संचालित होते हैं, जिनका संक्षिप्त विवरण इस प्रकार है -
(1)जीरो बजट प्राकृतिक खेती, प्रशिक्षण-
यह वर्ग विशिष्ट है, इसकी व्यवस्था हेतु पूरा भायला गांव एकजुट होकर लगा, अन्य दूसरे गावों ने सम्भाले-
स्थान        - ग्राम-भायला, जिला- सहारनपुर।
कार्यावधि    - पाँच दिवसीय, 29सित.-3 अक्टू.,
संख्या        - 500 किसान
व्यवस्था विवरण प्रस्तुत है -
व्यवस्था    सहयोगी    सहयोग राशि
भोजन        भायला गाँव    1,50,000/-
टेन्ट        सूबरी गाँव    35,000/-
लाइट,साउण्ड    दलेहडी        5,000/-
डीजल        बडगाँव        25,000/-
जनरेटर        कल्लरपुर    5,000/-
गद्दे (100)    सोना अर्जुनपुर    2,500/-
गद्दे (100)    जडोदा जट    2,500/-
गद्दे (100)    कातला        2,500/-
गद्दे (100)    बडुल्ली माजरा    2,500/-
गद्दे (100)    भारी        2,500/-
कुर्सी (150)    रणखण्डी        3,750/-
पेन,पैड ़(500)    त्रीमूर्ति योगीराज    7,500/- 
 विष्णु नन्दन महाराज ट्रस्ट
यातायात        राजकुमार जी एवं
        ठा॰ धर्मपास सिंह    5,000/-
        कुल योग    2,48,750/-
(2) गोमती संरक्षण, डाकूमेन्ट्री वीडियोग्राफी -    (16 अक्टूबर, 2013, लखनऊ)
व्यवस्था    सहयोगी    सहयोग राशि
टीम आवास    एस.आर. अग्रवाल    1,200/-
गाड़ी (1)        अशोक सिंह    2,500/-
        योग        3,500/-
(3) कार्यालय व्यवस्था - (सित॰-अक्टू॰, 2013)-
व्यवस्था    सहयोगी   
 वी.एन. खेमका    12,700/-
        आर.पी. सिंह    10,000/-
        एम.पी. सिंह    5,000/-
        अजय प्रकाश    2,500/-
        अंशु केडिया    1,000/-
        मेवालाल जी    1,000/-
        भास्कर अस्थाना    1,100/-
        भार्गव जी    1,000/-
        जवाहर लाल जी    1,000/-
        कृष्णानन्द राय    500/-
        योग        35,800/-
सामग्री -
प्रसाधन फिटिंग, 2 सेट    द्वारा - हरीराम अग्रवाल
टाइल्स (400 वर्ग फिट)    द्वारा - बल्लभदास एण्ड सन्स
ऽ कुल सहयोग रू॰ 2,88,050/-
ऽ सहयोग के लिए संस्था सबकी आभारी है और सदैव सहयोग की कामना करती है। ु

बड़ा बनने के लिए "देना सीखो" - - डेविड जे॰ श्वार्टज

जब मैं छोटा था तो मेरे पिता जी पास के कस्बे में मक्के के भुट्टे बेचते थे। जब मैने गिनती सीख ली, तो पिता जी ने मुझे मक्के के एक दर्जन भुट्््टों की ढ़ेरियाँ बनाने की जिम्मेदारी सौंपी। इसमें मुझे बहुत गर्व महसूस हुआ। मैं पाँच साल का था, मगर मुझे लगा जैसे मैं भी पिता जी के काम में योगदान दे रहा हूंँ। इसीलिए मैने पिता जी के आदेश का पालन करते हुए भुट्टों की ढ़ेरियाँ बना दीं। हर ढ़ेरी में पूरे बारह भुट्टे थे। जब पिता जी ने मेरी बनाई गई कुछ ढ़ेरियों के नमूने देखे, तो वे बोरी के पास गये और उन्होने उसमें से कुछ और भुट्टे निकाले तथा हर ढेरी में एक भुट्टा बढ़ा दिया। इस पर मैं नाराज हुआ और मैने उनसे कहा-‘मुझे गिनना आता है। एक दर्जन का मतलब बारह होता है। अब हर ढ़ेरी में तेरह भुट्टे हो गये हैं।’
मैं पिता जी के इस काम से चिढ़ गया था। पिता जी ने मुस्कराते हुए मुझे प्यार से समझाया- ‘जब हम भुट्टे बेचते हैं, तब एक दर्जन में तेरह भुट्टे ही होते हैं। हम हमेशा अच्छे मक्के बेचते हैं, मगर जब भुट्टे पर छिलका लिपटा हो तो हमारा कोई भुट्टा खराब भी निकल सकता है। इसलिए हम अपने ग्राहकों को एक अतिरिक्त भुट्टा देते हैं। इसके अलावा हम चाहते हैं कि जो भी हमारे भुट्टे खरीदे, वह अपने पड़ोसियों को बताये कि हमारे भुट्टे कितने अच्छे हैं। इस प्रकार हमारा मक्का अधिक बिकेगा और हम अधिक धन कमा पायेंगे।’
वस्तुतः सफलता, दौलत और सुख मिलते हैं उदारता से। आप जितना ज्यादा देते हैं आपको उतना ही अधिक मिलता है। सफल लोग उदार होते हैं। लोग उनसे जितनी उम्मीद करते हैं, वे उससे अधिक देते हैं। देने पर ध्यान केन्द्रित करें, जल्दी ही आपको अपने आप मिलने लगेगा।

स्वास्थ्य के दिशा निर्देशक हमारे संस्कार - डा॰ के॰के॰ अग्रवाल

हम अपने संस्कारों, पूजाविधियों और विश्व स्वास्थ्य संगठन की गाइडलाइन्स पर गौर करें तो वे बहुत मिलते-जुलते लगेंगे। हम उन संस्कारों को भूल रहे हैं, लेकिन सही बात यह है कि वे स्वास्थ्य के अच्छे इन साइक्लोपीडिया हैं। हमारे संस्कार हमें प्रकृति के करीब लाने वाले हैं। हम प्रकृति से दूर होते जा रह हैं और उसी का परिणाम हैं कि हम लगातार जानलेवा रोगों के जाल में फंसते जा रहे हैं। अगर हम स्वस्थ रहना चाहते हैं, तो हमें फिर से पुरानी परम्पराओं में छिपे स्वास्थ्य के मन्त्रों को अपने जीवन में उतारना होगा।
हमारे पारिवारिक या सामाजिक संस्कारों के अवसर पर अब घरों में हवन होना बन्द हो रहे हैं। यही वजह है कि आज मलेरिया और डेंगू का प्रकोप लगातार बढ़ रहा है। हर घर में फिर से हवन की प्रथा प्रारम्भ हो जाये तो इन रोगों का प्रकोप निश्चित रूप से बहुत हद तक कम हो जायेगा। अगर घर में हवन होते रहें तो वहांँ मच्छर नहीं आयेंगे। हवन में काम आने वाली सामग्रियों की खासियत यह होती है कि उनके निकले धुएंँ से न तो अस्थमा बढ़ता है, न ही होता है। हवन से वातावरण शुद्ध होता है न कि प्रदूषित। हवन को अगर हम अपने संस्कारों का केन्द्र मान ले तो कह सकते हैं कि हवन में सारे रोगों को भस्म करने या उन्हें भगाने की ताकत है।
हमारे संस्कार में शामिल था कि शाम का खाना सोने से तीन घंटा पहले खा लेना चाहिए। लेकिन अब हम उसे भूलकर देर रात को खाना खाने लगे हैं। आज यह एसिडिटी (अम्लता) की सबसे बड़ी देन बन रही है। खाने-पीने को लेकर जो संस्कार बने थे, वे स्वास्थ्य के हिसाब से बनाये गये थे। वे संस्कार आज भी उतने ही प्रासांगिक हैं, बल्कि आधुनिक स्वास्थ्य विज्ञान उन्हीं की ओर संकेत कर रहे है।
परम्परा को देखें तो घर में किसी अतिथि के आने पर हम उनका स्वागत गुड़-चने से करते थे। अगर हम आयरन की कमी से बचना चाहते हैं तो सप्ताह में एक दिन हमें गुड़-चने का सेवन करना चाहिए। सन्तोषी माँ की पूजा में गुड़-चना चढ़ाते हैं। यह पूजा सिर्फ महिलाएँ करती हैं। हम सभी जानते हैं कि महिलाएँ एनीमिया (खून की कमी) की शिकार रहती हैं। आज एनीमिया का इलाज है आयरन की गोली खाना, जो कार्य गुड़-चना करता था।
माघ, वैशाख एवं कार्तिक महीने में स्नान करके सूर्य की पूजा करना, प्राचीन संस्कार का हिस्सा है। इन महीनों में कैल्शियम की अच्छी मात्रा पाने के लिए उड़द की दाल और तिल खाते है। एक अन्र्राष्ट्रीय अध्ययन कहता है कि कैल्शियम की गोली बिना विटामिन डी की गोली के नहीं दी जानी चाहिए। यह कार्य परम्परागत संस्कारों से सूर्य उपासना पूरा करती थी।
विश्व स्वास्थ्य संगठन ने अब यह भी कहा है कि सप्ताह में एक बार 60 मिली. ग्राम की आयरन की गोली जरूर खानी चाहिए। एक सप्ताह में एक दिन व्रत का मतलब है सप्ताह में एक दिन अनाज नहीं खाना। हर दिन अनाज खाते रहना स्वास्थ्य के लिए अच्छा नहीं  होता। आधुनिक स्वास्थ्य विज्ञान भी कहता है कि रोज कार्बोहाइडेªट, चीनी, चावल, मैदा खाने से मधुमेय, उच्च रक्तचाप और हृदय रोग बढ़ रहे हैं। हमारी परम्परा में खाना-पान सम्बन्धी उपवास के साथ ही मन के उपवास पर भी जोर दिया गया है। मन के उपवास का अर्थ है अच्छा सोचो, अच्छा करो, अच्छा बोलो, अच्छा लिखो। राजसी ओर तामसी भोजन से दूर रहो। आधुनिक स्वास्थ्य विज्ञान ने भी मान लिया है कि अवसाद (डिपे्रशन) से बचने के लिए अच्छी जीवनशैली अपनानी चाहिए। हमारे संस्कार हमें अनेक प्रकार की बीमारियों से बचाते है।
हर दो महीने में ऋतु बदलती है और हर दो पक्षों में मास बदलता है। हमारे संस्कार कहते हैं कि हमें इस परिवर्तन के हिसाब से अपने खान-पान को तय करना चाहिए। जैसे फागुन के महीने में नमक और खट्टा कम खाना चाहिए। पूर्णिमा के दिन रक्तचाप ऊपर-नीचे होता है, गुस्सा बढ़ता है। इसका ध्यान रखे तो दुष्प्रभाव से बच सकते हैं।
मौसम के अनुसार पूजा में जो प्रसाद खाया जाता है वह भी स्वास्थ्य को ध्यान में रखकर बना था। जिस अन्न या फल का दान दिया जाता है, उसमें यह पाठ छिपा रहता है कि उन्हें खाओ लेकिन कम खाओ। माघ महीने में तिल की पूजा होती है, तिल का दान दिया जाता है। इसलिए हम तिल खाते जरूर हैं, लेकिन उसे कम मात्रा में खाना चाहिए। ताजेे फलों में कोलोस्ट्राॅल नहीं होता, इसलिए फल भगवान को चढ़ाते हैं और हम उसे प्रसाद के रूप में खाते हैं। कहने की जरूरत नहीं कि स्वास्थ्य के लिए फलों को सबसे अधिक जरूरी माना गया है। जो चीजे भगवान को भोग नहीं लगाया जाता, उन्हे मत खाओ तो अच्छा है। भगवान को मूली नहीं चढ़ाते, जो चीजे जमीन के नीचे से आती हैं उन्हें भी हम भगवान को नहीं चढ़ाते, अतः ऐसी चीजों को कम खाएँ तो अच्छा है। हमारे संस्कार या जीवन पद्धति स्वास्थ रहने के लिए सदैव उपयोगी है। - पर्यावरण चेतना से साभार