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Friday, May 29, 2015

हम क्या थे, क्या हो गये? - डा॰ सुरचना त्रिवेदी

हमे हजारों बलिदानों के बाद मिली स्वतन्त्रता के 67 वर्ष व्यतीत हो चुके हैं। जो स्वतन्त्रता भारतीय सांस्कृतिक परम्पराओं के ताने-बाने में गुंथी हुई अपनी एक अलग पहचान से युक्त थी, इसका हमें बोध था। आरम्भ में राष्ट्रीय भावना से ओत-प्रोत जय घोषों व देश भक्ति के गीतों से वातावरण गूँजित  तथा ‘‘राष्ट्रवाद’’ मन-मष्तिस्क में हिलोरें  भरता रहता था। परन्तु विकास की अंधी दौड़ ने प्रत्यक्ष या परोक्ष भविष्य की अनेकों चुनौतियों की तपन में हम भारतीयों को एक निर्णायक मोड़ पर ला कर खड़ा कर  दिया है। 
स्वतन्त्रता के साथ रामराज्य की कल्पना की गई थी, पर आज उस पर प्रश्न उठाये जा रहे हैं। राजनीति में ‘राज’ का वर्चस्व है और नीति मानो गौढ़ हो गई है। चन्द लोग संकल्प बद्ध हैं, अन्य लोग उनकी आलोचना-प्रत्यालोचना की होड़ में शामिल हैं।
हमारा देश ऐसी सांस्कृतिक विरासत को आज धारण किए हुए है, जिसमें भाषा-साहित्य-वेषभूषा, धार्मिक विश्वास-आस्थाएँ अपनी मजबूत जड़ों के साथ हिली हुई हैं। देश की संस्कृति पर विदेशी प्रभाव इस कदर हावी होता जा रहा है कि सर्वत्र मात्र कृत्रिमता का वातावरण ही लक्षित होता है। 
कहा जाता है कि परिवर्तन समय की माँग है, और कुछ लोग जो हो रहा है वह समय की माँग का ही परिणाम है, यह तर्क दे सकते हैं। पर मेरा मानना है कि कोई भी विकास परम्पराओं को त्याग कर सफल नहीं हो सकता। भविष्य का स्वप्न बुनने के लिए जो नया है वह तो आकर्षित करता है परन्तु परम्परा की आधारशिला उसे सुदृढ़ बनाने का महŸार कार्य करती है। इसलिए स्वतन्त्रता के इतने वर्षों बाद हम संकल्प लें कि विकास के परम बिन्दु पर पहुँचने पर भी अपनी विरासत व परम्पराओं की रक्षा करेंगे।

समग्र विकास की हमारी दृष्टि - डाॅ॰ अनिल प्रकाश जोशी

समग्र विकास में गाँवों का महत्व - प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने पिछले दिनों गाँवों की बदलती तस्वीर में वैज्ञानिकों की भूमिका पर टिप्पणी कर देश में संस्थानों के दायित्वों की तरफ अहम इशारा किया है। यह बात पूरी तरह सच है कि ये संस्थान इस देश को इण्डिया बनाने में चिंतित रहे, न कि भारत। आज भी हमारे छह लाख गावों में देश की 70 प्रतिशत आबादी रहती है। इस बड़ी आबादी के वे सभी अधिकार उतने ही महत्वपूर्ण और जरुरी है जितने कि शहरी आबादी के। बड़ी बात तो यह है कि देश में जो भी आर्थिक गतिविधियाँ हैं उनका मूल स्रोत गाँव ही है। वर्तमान आर्थिक तंत्र का 90 प्रतिशत हिस्सा गाँवों के संसाधनों से सबल होता है। देश में शायद ही ऐसे गाँव हो जो आज आर्थिक स्वतंत्रता का दम भर सकते हों। एक समय गाँवों में सतत् विकास दिखता था। सब कुछ गाँवों में ही होता था। श्रम व संसाधानों का बड़ा गहरा गठजोड़ था, लेकिन नई तकनीकें गाँवों में पैठ नहीं बना सकी जबकि आज गाँवों में शहरी उत्पादों ने पूरी जगह बना ली है।
असल में नए विज्ञान ने गाँवों के ज्ञान को विस्थापित किया है। इसका उद्देश्य होना चाहिए था कि गाँवों की दक्षता को नए विज्ञान के साथ जोड़कर मजबूत करे, लेकिन हुआ इसके विपरीत। देश में आज गाँव मात्र उत्पादक के रूप में जाने जाते हैं। दूसरी ओर शहर गाँवों में उत्पादित वस्तुओं का शोधन कर लाभ कमा रहे हैं।  शहरी उद्योग इन्हीं कृषि उत्पादों का शोधन कर और अधिक लाभ उठाते हैं। इससे उत्पादक और उपभोक्ता दोनों ही दुखी है। एक को कम दाम मिलते हैं और दूसरे को ज्यादा दाम देने पड़ते है और सब इसलिए ही सम्भव हुआ, क्योंकि हमने विज्ञान को ग्रामोन्मुखी नहीं बनाया। देश के बड़े संस्थान चाहे वे कृषि से जुडे हों या फिर अन्य संसाधनों से, गाँवों से अभी भी बहुत दूर ही हैं। देश का सबसे बड़ा हिस्सा खेती में जुटा है और इसके लिए भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद व इसके 105 संस्थान व 55 कृषि विश्वविद्यालय गाँवों के लिए ही समर्पित होने चाहिए थे। पर क्या देश में खेती व किसान के हालात बेहतर कहे जा सकते हैं? प्रौद्योगिकी व उद्योग शोध परिषद यानी सीएसआइआर और इससे जुड़े 20 से अधिक संस्थान ग्राम्य तकनीक पर काम करनेे का दावा करते हैं। ऐसे ही देश में आइआइटी व एनआइटी व सैकड़ों विज्ञान संस्थान कार्यरत है, लेकिन गाँवों के हालात बद-से-बदतर ही हुए हैं। विज्ञान संस्थानोें और लाखों वैज्ञानिकों से भरा ये देश मंगल पर तो चला गया, पर गाँवों में मंगल कार्य आज तक अछूूते ही रहे।
ऐसे में प्रधानमंत्री का विज्ञान कांग्रेस में वैज्ञानिकों का आवाहन बहुत महत्व रखता है। दुर्भाग्य से हमारे देश में कागजी शोध का बड़ा महत्व है। हमारे वैज्ञानिक अपने विज्ञान काल में कितने शोध-पत्र छापते हैं। उनके शोधपत्र का प्रकाशन ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाता है, न कि यह कि वह शोध कितना जमीन पर उतरा। यही हमारे देश के विज्ञान संस्थानों व वैज्ञानिकों की ज्यादा बड़ी कमी रही है। देश के सभी संस्थानों में होने वाले शोध अधिकतर अव्यवहारिक होते हैं। बाकी जो शोध ठीक-ठाक होतंे भी हैं तो उनमें से कई कभी बाहर ही नहीं निकले और जो कुछ निकल कर आए भी तो उनमें से कई तोे जमीन पर उतरे ही नहीं। इसका कारण हमारी शोध करने की संकुचित पहल है। किसी भी तरह के शोध को दिशाहीन व अव्यवहारिक नहीं होना चाहिए। हमारे वैज्ञानिक संस्थानों व वैज्ञानिकों के पास स्पष्ट संदेश होना चाहिए कि शोध व्यावहारिकता के आधार पर तय हो, न कि शोध पत्रों पर।
विज्ञान व वैज्ञानिकों का एक बड़ा दायित्व है कि वे विज्ञान में असमानता से बचें और ग्रामोन्मुखी विज्ञान को प्राथमिकता दें। हमें नहीं भूलना चाहिए कि विज्ञान के पहले हकदार गाँव है, जहाँ से मूल उत्पादन की नींव पड़ी है। अगर उनका दायित्व मात्र उत्पादन के रूप में ही देखा जाएगा तो वे बड़े लाभ के हिस्सेदार नहीं बन पाएंगे और लाभ ही तय करेगा कि उनका झुकाव कृषि या अन्य उत्पादों की तरफ विश्वास के योग्य है भी या नहीं। गत दो-तीन दशकों में गाँवों व किसानों की अपनी खेती और उत्पादों के विश्वास में कमी आई है। कारण साफ है कि स्थानीय उत्पादों से लाभ लागत के भी नीचे पहुँच गया है। मजबूरी व विकल्प का अभाव उन्हें इस श्रम से जोड़े हुए है। वरना जिन्हें अवसर मिला उन्होंने अक्सर इसे त्यागना ही बेहतर समझा। लेकिन अगर जल्दी सब कुछ नहीं संभला तो हम बड़े संकट में घिर जाएंगे। गाँवों का शहरों की तरफ ़रुख हमारे प्राथमिक उत्पादन पर बड़ा असर डालेगा।
अब यह जरूरी हो गया है कि हमारी विज्ञान नीति ऐसी हो जो गाँवों से जुड़ी हो। मंगलयान पर पहुँचने वाले वैज्ञानिक अगर प्रधानमंत्री के वाह-वाही के पात्र हों तो लोक विज्ञानी को भी उसी श्रेणी में रखा जाए और उसे भी राष्ट्रीय सम्मान की दृष्टि से देखा जाए। गाँवों में कार्य करने वाले वैज्ञानिकों को उत्साहित करना होगा। बड़े-बड़े संस्थानों में कार्य करने वाले वैज्ञानिकों को ही प्रथामिकता न मिले, बल्कि ग्रामीण विज्ञान के कार्य को भी बड़े स्तर का योगदान माना जाए। अंतरिक्ष, न्युक्लियर जैसे बड़े शोध, जिनका घर-गाँव से सीधा सम्बन्ध नहीं है, आज प्रमुखता से जाने जाते हंै। इनके विज्ञानी ही प्रधानमंत्री कार्यालय की शोभा ब़ढ़ाते हैं। दूसरी तरफ लोक विज्ञानी को ऐसा सम्मान नहीं मिलता। हम जब तक ग्राम विज्ञान की आवश्यकता को देश के अन्य विज्ञान की आवश्यकताओं के समानान्तर नहीं देखेंगे तब तक विज्ञान को ग्रामोन्मुखी नहीं बना पाएंगे। अब देखना यह है कि देश के विज्ञान संस्थान व वैज्ञानिक प्रधानमंत्री की इस सलाह को कितनी गम्भीरता से लेते है।
पर्यावरण के साथ ही समग्र विकास सम्भव - पर्यावरण और विकास एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। जहाँ एक तरफ मूल संसाधन हवा, पानी व मिट्टी के बिना जीवन सम्भव नहीं। वहीं दूसरी तरफ जीवन के लिए न्यूनतम सुविधाओं को जुटाना सभ्यता का भी प्रतीक है।
दरअसल यह जानना जरूरी है कि स्थायी आर्थिक स्रोत भी स्थायी पारिस्थितिकी है। पारिस्थितिकी के उत्पाद, प्राकृतिक संसाधनों के बिना आर्थिक ढांचे को कतई भी संभाला नहीं जा सकता और ना ही बेहतर किया जा सकता है। क्योंकि आर्थिक के आधार प्राकृतिक संसाधन ही हंै। विकास और पर्यावरण को बराबर का महत्व देना होगा। जिस शैली में उद्योगों को आर्थिक का आधार बनाया है, उसी सुर में पारिस्थितिकी की बेहतरी के कदम भी बढ़ाने होंगे। मसलन, अगर शहर उद्योगों के केन्द्र हैं तो गाँव व वनवासियों का आर्थिक आधार पारिस्थितिकी को बेहतर करना होगा। वन उद्योग व जल उद्योग  जैसे पारिस्थितिकी उद्योग को भी वह ही दर्जा मिले जो अन्य उद्योगों को है। जब देश-दुनिया का एक बड़ा हिस्सा उद्योग पर आधारित आर्थिक से बेहतर जीवनयापन कर सकता है, तो गाँवों के पारिस्थितिकी उद्योग से क्यों नही। यह पहल जहाँ पर्यावरण के ढ़ाचे को देश-दुनियाँ के लिए सुधारेंगे पर साथ इससे गाँवों की आमदनी भी जुटा पायेंगी। मसलन मृदा, जल व वन संरक्षण एक सतत् रोजगार के रूप में आ जाने से गाँवों की आर्थिकी तो बढ़ेगी ही और साथ में पलायन भी रुकेगा। हम एक सतत् विकास की ओर अग्रसर हो जाएंगे। अगर शहर और सरकार जहाँ एक तरफ सुविधाएं व उद्योगों को बेहिचक आगे बढ़ाएंगी, वहाँ ही पारिस्थितिकी रोजगार पर्यावरण को तो सुरक्षित रखेगी ही, गाँवों में भी पारिस्थितिकी की शक्ल में आर्थिक क्रान्ति जन्म लेगी। तभी पर्यावरण व विकास एक ही मंच पर होंगे।
पृथ्वी पर जितना भेगो, उनतना जोड़ों - इंसान की यह आम वृत्ति होती है कि जब तक वह किसी चीज को प्रत्यक्ष रूप से देख-सुन, जान-समझ  एवं भोग नहीं लेता, तब तक कहे पर यकीन नहीं करता। यही बात धरती के संकट को लेकर भी है। हमारे पूर्वजों ने धरती  को माॅँ कहा, पर आज हम उस कथन को भोग कर मानने पर उतारू हैं। 1896 में पहली वार स्वीडन वैज्ञानिक स्वांते ने बताया कि जीवाश्म ईंधन के इस्तेमाल से धरती का औसत तापमान बढ़ रहा है, परन्तु मानव लोभ से उस सबके साथ धरती के संसाधनों का क्षय और क्षरण  आज भी अनवरत जारी है। प्राणवायु दमघोटू हो चली है, अमृत समान जल रोगों और मौतों की बड़ी बजह बन चुका है, पृथ्वी की स्वभाविक उर्वराशक्ति को विषैले रसायन चाट चुके हैं, मौसम चक्र बदल और विगड़ रहा है, समुद्र तल ऊपर उठ रहा है, वैश्वविक तापमान बढ़ रहा है और प्राकृतिक आपदाओं की आवृत्ति में इजाफा हो रहा है।
परन्तु यह कहाबत ‘जब चोट लगी (भोगा) तब दर्द का अहसास हुआ’’, सिद्ध हो रही है। जो लोग पहले धरती को हो रहे नुकसान को सिरे से खारिज करते थे, वे आज उसको बचाने की अगुआई कर रहे हैं। क्योंकि, पृथ्वी हमारे जीवन का केन्द्र है। अगर प्रतिदिन इस पृथ्वी को जीते व भोगते हैं तो हर दिन पृथ्वी के प्रति दायित्वों का निर्वहन भी होना चाहिए।
पृथ्वी के प्रति दायित्व को समझने का सीधा और सरल समीकरण है- ‘‘जितना भोगो, उतना जोड़ो।’’ परन्तु, हमने धरती को भोगने की कलाएं खूब पनपाईं, लेकिन इसे संवारने की बारी पूरी तरह भटक गए। पहली बात हमें समझ जाना चाहिए कि ये पृथ्वी मात्र सरकारों या समाज विशेष का दायित्व नहीं है, बल्कि यह सामूहिक कर्तव्य का विषय हेै।
यदि हम अपने स्तर पर मनन करें कि, अपने पूरे जीवन में हम पृथ्वी से क्या-क्या लेते हैं -वे पानी, वायु, मिट्टी तो सब समान रूप से ही भोगते हैं, पर उस ऋण का छोटा सा हिस्सा भी पृथ्वी को वापस करने की नहीं सोच पाते। अतः आवश्यकता है कि हम पृथ्वी के इस ऋण को महसूस करें व करवायें और किसी भी रूप में इसे चुकाएं, यही समाधान है। यही हमारा कर्तव्य है।
इसके लिए हमें अपनी जरूरतों को सीमित करना होगा व साथ ही वर्तमान विकास माण्डल का पुर्नमूल्यांकन करना होगा, जिसके अंधेपन ने हमें पृथ्वी व इसकी संवेदनशीलता से दूर कर दिया है। इस हेतु तत्काल प्रभाव से कुछ महत्वपूर्ण कदम उठा सकते हैं - हर पारिवारिक पर्वों में पर्यावरण को जोड़कर देखें। स्कूली शिक्षा में व्यवहारिकता पूर्ण पर्यावरण की शिक्षा जोड़ें। सरकार को चाहिए कि विकास को मात्र आर्थिक विकास से ही जोड़कर नहीं देखें, अपितु पर्यावरण को भी विकास का मूल आधार बनाएँ। यह तय करना होगा कि हम हर वर्ष कितने वन, पानी, हवा को बेहतर कर पाये और उसमें कितना स्थायित्व ला पाये, यही हमारे विकास की कसौटी होगी। ु
- (लेखक जाने माने पर्यावरणविद् हैं।)

समग्र विकास में भूमि का महत्व . (बदलती परिस्थितियों में समझं और समझाएं) - शशि शेखर

भागलपुर से पटना लौटते समय मेरे सहयोगी डाॅक्टर वीर विजय सिंह बोले कि बड़हिया में कुछ देर रुकते हैं। वहाँ का रसगुल्ला मशहूर है और चाय भी अच्छी मिलती है। अन्य साथियों के चेहरे पर सहमति के भाव देख मैंने हामी भर दी।
जलपान के दौरान देखा के आसपास की टेबल पर कुछ लोग आ जमे और वे कौतुहल से हमारी ओर देख रहे हैं। वे प्रस्तावित भूमि अधिग्रहण कानून के बारे में जानना चाह रहे थे। उन्होंने कहा कि हम लांेगो ने अन्ना जी का भाषण सुना। वह कह रहे हैं कि सरकार यदि जमीन अधिग्रहण करेगी, तो उसके खिलाफ किसानों को अब अदालत में जाने का मौका नहीं मिलेगा। ऐसा तो अंग्रेजों ने भी नहीं किया। लोकतंत्र में कोई कानूनी लड़ाई लड़ने का हक कैसे छीन सकता है।
मैंने उनसे कहा कि आप इतनी जल्दी किसी निष्कर्ष पर मत पहुँचिए। यह किसानों का देश है और उनके हक-हुकूक कोई भी सरकार नहीं छीनना चाहेगी। वे सबसे बड़ा ‘वोट बैंक’ हैं। उनकी कटुता राजनीतिक दलों पर भारी पड़ सकती है। आपको एक बार इस प्रस्तावित अध्यादेश को पढ़ना चाहिए। किसी निष्कर्ष पर पहुँचने से पहले खुद सोचिए कि विकास के लिए जरूरी भूमि कहीं बाहर से नहीं लाई जा सकती। उसके लिए हम सबको सहयोग करना होगा। इस पर उनका जवाब था कि आप सही कह रहे हैं। किसानों के मामले में हमेशा राजनीति होती है और सही बात हम तक नहीं पहुँचती।
पटना जल्दी पहुँना था, लिहाजा मैंने हाथ जोड़कर उनसे विदा माँग ली। शेष रास्ते सड़क से ज्यादा हिचकोले विचारों ने दिए। ये भारत के किसान ही तो थे, जिन्होंने नई परम्परा को पोसा और दलित को पुजारी का दर्जा दिया। धार्मिक कट्टरता के जाले में उलझती जा रही दुनिया क्योें नहीं इससे सबक लेती? किसान, जिन्हें नेता सिर्फ ‘वोट बैंक’ मानते हैं, उन तक सच क्यों नहीं पहुँचता? वे भले ही डिग्री शुदा न हों, पर मनीषा और जागृती के मामले में किसी से कम नहीं। फिर उन्हें ‘गिनी पिग’ की तरह इस्तेमाल क्यों किया जाता है? इस विचार श्रंखला को साथ चल रहे संजय सिन्हा ने नया आयाम दिया। उन्होंने कहा कि कई विद्वान अब लोकतंत्र की उपयोगिता पर सवाल उठा रहे हैं। चीन का उदाहरण देते हुए ‘द इकोनाॅमिसट’ ने कहा है कि वहाँ विकास इसलिए हो रहा है, क्योंकि वहाँ भूमि अधिग्रहण जैसे मामलों में कोई रोड़ा नहीं अटकाता। भारत में लोकतंत्र है, और वह भी ऐसा कि सौ करोड़ लोगों के पास ‘वीटो पावर’ है। हम भले ही संसार का सबसे बड़ा लोकतंत्र हों, पर विकास के लिए जरूरी फैसलों में अड़ंगेबाजी ने गुड़ को गोबर कर दिया है।
जवाब में मैंने कहा कि लोकतंत्र बनाम साम्यवादी तानाशाही की बहस बहुत पुरानी है। सोवियत संघ को मानने वाले अक्सर अमेरिका की तौहीन करते थे। 1961 में माॅस्को ने जब यूरी गागरिन को अंतरिक्ष में भेजा, तो वहाँ के अखबारों ने छापा कि साम्यवाद की उड़ान अब धरती की कक्षा को पार कर गई है। बताने की जरूरत नहीं कि गागरिन अंतरिक्ष की सैर करने वाले पहले इंसान भले ही साबित हुए, पर सोवियत उपलब्धियों के पांव अधर में थे। उन्होंने कुछ क्षेत्रों में बढ़त जरूर हासिल की, पर उसे कायम न रख सके। इसीलिए आज अमेरिका शीर्ष पर है और सोवियत संघ को बिखरे हुए चैथाई सदी बीतने को आई। हम अमेरिकी नीतियोें के खिलाफ हो सकते हैं, पर जम्हूरियत अपनी तमाम खामियों के बावजूद सर्वोत्तम शासन प्रणाली साबित हुई है।
बाद में पटना से दिल्ली की उड़ान के दौरान डेढ़ घंटा लगातार किसानों के बारे में सोचता रहा, जिनके बीच से मैं आता हूँ। इस देश में भूमि का अधिग्रहण एक जनवरी, 2014 से पहले अंग्रेजों के बनाए ‘लैण्ड एक्विजिशन ऐक्ट आॅफ-1894’ के तहत होता था। कांग्रेस की सरकार ने इसे बदला और इस दौरान खुद पार्टी के अन्दर वैचारिक टकराव उजागर हुए।
केन्द्र में इस वक्त नरेन्द्र मोदी की अगुवाई वाली सरकार है। मोदी ‘जय जवान और जय किसान’ के नारे को नए तरीके से पेश कर सत्ता में पहुँचे हैं। अब तक उनकी सरकार की जिम्मेदारी है कि वह कृषकों तक इस कानून की खूबियों को पहुँचाएं और यदि कुछ खामियों पर असहमति बनती है, तो उन्हें हटाए। यह अच्छी बात है कि कई वरिष्ठ मंत्री इस मुद्दे पर विपक्षी नेताओं से बात कर रहे हैं। लोकसभा में खुद नरेन्द्र मोदी ने आह्वान किया कि किसानों के मामले में राजनीति न की जाए। अगले ही दिन आम बजट में किसानों को कई तरह की सहूलियत देकर वित्त मंत्री अरुण जेटली ने सरकार के इरादों को जाहिर कर दिया। क्या सियासी दल इस बेहद संवेदनशील मुद्दे पर आमराय बना सकेंगे?
कहने की जरूरत नहीं कि देश के 70 फीसदी लोग अब भी खेती-किसानी पर निर्भर हैं। उनके हक-हुकूक पर सहानुभूतिपूर्वक विचार करना जरूरी है। हजारों साल से हमारा राष्ट्र कृषि पर निर्भर रहा है। अब वक्त बदल गया है। 21वीं शती में फलने-फूलने के लिए हमें राजमार्ग, फैक्टरियाँ और नौजवानों के लिए रोजगार चाहिए। फिर हमारी सीमा-सुरक्षा की अपनी आवश्यकताएं हैं। इसके लिए यदि जमीन की जरूरत पड़ती हैं, तो उसे मुहैया कराना ही होगा। मुझे नहीं लगता कि किसान प्रगति के खिलाफ हैं। जरूरत है उनके हृदय में भरोसा जगाने की, इसमें लोकतंत्र बाधक कहाँ साबित होता है?
भूलिए मत जनतंत्र हमारी रगों में है और इसका सबसे बड़ा तत्व है- आम सहमति। उम्मीद है हमारे सत्तानायक इस तथ्य को समझने में भूल नहीं करेंगे। ु

समग्र विकास में ग्लोबल वार्मिंग एक समस्या औरं उसका निदान?

मानव की अदूरदर्शी व संकीर्ण प्रवृत्ति से प्रकृति के अन्धाधुन्ध शोषण के प्रयास आज समग्र विकास के मार्ग में प्रमुख प्रतिगामी घटना बन गये जो, ग्लोबल वार्मिंग एवं निदान पर प्रस्तुत चर्चा से स्पष्ट होता है।
अन्तरराष्ट्रीय संस्था आईपीसीसी के अध्ययन के मुताबिक पिछली सदी के दौरान धरती का औसत तापमान 1.4 फाॅरेनहाइट बढ़ चुका है जो अगले सौ साल में बढ़कर 2 से 11.5 फाॅरेनहाइट होने का अनुमान है। धरती के औसत तापमान में हो रही यह मामूली वृद्धि हमारी पृथ्वी  की जलवायु और मौसम प्रणाली में व्यापक रूप से विनाशकारी बदलाव ला सकती है। जिसके मौसम और जलवायु में परिवर्तन के साक्ष्य, बारिस की पद्धति में बदलाव, गम्भीर बाढ़, सूखा, तेज बारिश, अक्सर लू चलने की प्रवृत्तियाँ दिखने लगी है। महासागर गर्म होकर अधिक अम्लीय हो रहे हैं। हिमाच्छादित चोटियांँ और ग्लैशियर पिघल रहे हैं। समुद्र तल बढ़ रहा है। जैसे-जैसे दुष्परिणाम मजबूत होंगे जीवन मुश्किल होता जायेगा।
पिछली सदी के दौरान इन्सानी गतिविधियों के चलते वायुमण्डल में बड़ी मात्रा में कार्बन डाईआक्साइड समेत अन्य ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन हुआ। ऊर्जा उत्पादन में जलाए गए जीवाश्म ईंधनों से बहुतायत में ये ग्रीन हाउस गैसें पैदा हुईं। बढ़ता औद्योगीकरण, कटते जंगल और कुछ कृषि पद्धतियां भी इन गैसों के उत्सर्जन के लिए जिम्मेदार रही हैं। आईपीसीसी के अनुसार पिछले 250 साल के दौरान हुई इन्सानी कारगुजारियाँं 90 फीसदी से ज्यादा जिम्मेदार रही हैं। पिछले 150 साल में औद्योगिक गतिविधियों के चलते कार्बन डाईआक्साइड का स्तर 280 पीपीएम से बढ़कर 379 पीपीएम हो चुका है। 6 मार्च से 12 अप्रैल, 2015 के बीच पृथ्वी के वातावरण में कार्बन डाइ आक्साइड का स्तर 404.01 पाट्र्रस प्रति मिलियन (पीपीएम) पहुँच गया। जो अब तक के मानव इतिहास में सर्वाधिक है। इसी के अनुपात में गर्मी, वर्षा और कृषि उत्पादन में अभूतपूर्व संकट की आशंका भी बलवती हो गई है।
ग्रीनहाउस गैसें धरती के चारो तरफ लिपटी हुई चादर की तरह काम करती हैं। सूर्य से आने वाली प्रकाशीय ऊर्जा का अधिकांश हिस्सा धरती अवशोषित कर लेती है। इसका कुछ भाग वह वायुमण्डल में उत्सर्जित करती है। चंूकि धरती के चारो तरफ ऐसी ग्रीनहाउस गैसों की परत लिपटी है और उत्सर्जित ऊर्जा उसे भेदकर वायुमण्डल में विलीन होने में असमर्थ है। लिहाजा सबकी सब यह वायुमण्डल में ही एकत्र हो रही है। इससे धरती का तापमान बढ़ रहा है। इसे ग्रीनहाउस इफेक्ट कहा जाता है।
यद्यपि कार्बन डाई आक्साइड की गैर मौजूदगी में कायनात की कल्पना ही नहीं की जा सकती है। जीवन के लिए यह बेहद अहम है। पौधे अपनी खुराक प्रकाश की उपस्थिति में इसी के मध्यम से बनाने में सक्षम होते हैं। प्रत्युत्तर में यही पौधे इन्सानी जीवन के लिए प्राणवायु वायुमण्डल में छोड़ते हैं। लेकिन आज अनेकों कृत्रिम माध्यमों, फैक्ट्रियों, मनुष्य की अदूरदर्शी करतूतांे के कारण इस गैस का इतना अधिक उत्सर्जन होने लगा है कि उसकी खपत नहीं हो पा रही है। फलस्वरूप वायुमण्डल में विद्यमान रहकर यही गैस उसे गर्म करने में पूरा सहयोग करती है।
हमारे घरों में गर्मी, ठंड ऊर्जा पहुँचाने व  औद्योगिक इकाइयों के लिए जिस प्रकार ऊर्जा का उपयोग किया जा रहा है, जलवायु परिवर्तन में इसका बड़ा योगदान है। ऐसे में एनर्जी एफिशियेंट उत्पादों के जरिए कम ऊर्जा में जरूरतें पूरी करने के प्रयास किए जाने चाहिए। परिवहन के चलते वायुमण्डल में कार्बन का उत्सर्जन दिन व दिन बढ़ रहा है। ऐसे में सार्वजनिक परिवहन की सेवाओं में बढ़ोत्तरी की आवश्यकता है, जिससे सड़कों पर निजी बाहनों की संख्या घटाई जा सके।
वायु और भू-तापीय ऊर्जा के स्रोत दुनियाँ भर में मौजूद हैं। अध्ययन बताते हैं कि इन स्रोतों में हमारी विस्तृत ऊर्जा जरूरतें पूरी करने की क्षमता तो मौजूद है।  कोयला और अन्य जीवाश्म पर आधारित ईंधन का विकल्प तलाशने के बाद अब आगे इसका इस्तेमाल बन्द किया जाये। परमाणु ऊर्जा एक विकल्प हो सकता है, पर इसके अन्य खतरे हैं। वर्तमान में एक ऐसी तकनीक का प्रयोग किया जा रहा है, जिसके तहत कार्वन उत्सर्जन को जमीन के अन्दर इकट्ठा किया जा सकता है। तकनीक काफी किफयती मानी जा रही है लिहाजा इसे अपनाने में कोई नुकसान नहीं, यह समय ही बतायेगा।
भविष्य में कार्बन उत्सर्जन घटाने में कार्बन रहित न्यूनतम कार्बन उत्सर्जन पर आधारित तकनीकों की बड़ी भूमिका रहने वाली है। ऐसे में बैटरी, सोलर, शैवाल से ऊर्जा तकनीक मददगार साबित हो सकती है।
इसी सन्दर्भ में ओजोन परत सम्बन्धी इस चर्चा को भी समझना आवश्यक मार्ग दर्शन करा सकता है।
पिछली सदी में ओजोन परत में क्षरण के अलावा बड़े पैमाने पर पर्यावरण क्षरण देखा गया और इसको इंसानी  गतिविधियों और उपभोग के स्तर के साथ जोड़ कर देखा गया जो कि विकासशील देशों में भी विस्तारित होता जा रहा है। हालांकि यह कहा जा सकता हैं कि पर्यावरणीय क्षति का कुछ हिस्सा अनजाने में हुआ, लेकिन अब इस विषय में अनजाना नहीं रहा जा सकता है।
1992 में रियो सम्मेलन में 100 देशों के राष्ट्र प्रमुखों ने एकत्र होकर टिकाऊ विकास के एजेन्डे पर सहमति प्रकट की और जलवायु परिवर्तन की समस्या को पहचानते हुए इसको रोकने बाले समझौते पर हस्ताक्षर किए। उस समय यह तथ्य सामने आये थे कि 80 प्रतिशत उपभोग की वस्तुएं मसलन जीवाष्म ईंधन से लेकर स्टील, अल्मोनियम, तांवा जैसे खनिजों और कार जैसी चीजों का उपयोग विकसित देशों की 20 प्रतिशत आवादी कर रही है। इन्हीं सब का नतीजा जलवायु परिवर्तन और ओजोन परत के क्षरण के रूप में दिखाई दे रहा है। अब उपभोग की वही प्रवृत्तियां विकासशील देशों में विशेषकर चीन के उदय के बाद देखी जा रही  हैं और इसके चलते अब विकासशील देशों का हिस्सा उत्पादों और वस्तुओं के उपभोग के लिहाज से 35 प्रतिशत से अधिक हो गया है। उसके नतीजे इस सदी की नई पीढ़ी को भुगतने पड़ रहे हैं तथा उस रास्ते से दूर हटते हुए समाधान तलाशने की कोशिशें करनी पड़ रही हैं - कम उत्सर्जन वाले परिवहन साधनों, नवीकरणीय ऊर्जा के समाधान के रूप में देखा जा सकता है।
कार्बन डाई आक्साइड उत्सर्जन (2011 के अनुसार)-
रैंक देश कुल उत्र्जन /व्यक्ति उत्सर्जन
(दसलाख टन में) (टन में)
1. चीन 8715.31 6.52
2. अमेरिका 5490.63 17.62
3. रूस 1788.14 12.55
4. भारत 1725.76 1.45
5. जापान 1180.62 9.26
6. जर्मनी 748.49 9.19
7. ईरान 624.86 8.02
8. द॰ कोरिया 610.95 12.53
9. कनाडा 552.56 16.24
10. साउदी अरब 513.53 19.65
हालांकि पिछली सदी के अन्त तक सुधार के कई प्रस्ताव पेश हुए और उनका अमलीजामा पहनाना भी सुनिश्चित किया गया। ओजोन परत दुरूस्त करने की दिशा में मांट्रियल प्रोटोकाॅल के तहत सीएफसी (क्लोरोफ्लो कार्बन) के उत्सर्जन को प्रतिबन्धित किया गया है। अभी बहुत कुछ किया जाना बाकी है। कठिन प्राकृतिक विरासत के साथ 21वीं सदी शुरू हुई है। हालांकि इस संकट के समाधान के लिए कुछ समय के भीतर ही नए रास्ते तलाशे गए हैं।
कम उर्जा खपत और कम कार्बन उत्सर्जन टेक्नालाॅजी जैसे एलईडी लैम्प का इस्तेमाल शुरू हुआ है, जिसमें उतने ही प्रकाश उत्पन्न करने के लिए ऊर्जा के दसवें हिस्से की जरूरत होती है। पवन और सौर ऊर्जा, इन्टरनेट अर्थव्यवस्था शुरू हुई है, जिससे पेपर और परिवहन की बचत होती है। परन्तु निराकरण केबल तकनीकों के जरिए ही संभव नहीं है, इसके लिए सबसे जरूरी समाज के प्रति नए दृष्टिकोण की है जो समावेशी और हर एक की बुनियादी जरूरतों को पूरा करने से संबन्धित है। इसके लिए उपभोग की पुरानी प्रवृत्ति को छोड़ना होगा और सनातन मान्यता ‘अपरिग्रह’ को अपनाना होगा।
इसका आशय प्रकृति से लालच की बजाय केबल जरूरत के मुताबिक लेने को प्रोत्साहित करने से है। इसकी बानगी गांधी जी से ली जा सकती है, जो नदी किनारे बैठकर भी मुंह धोने के लिए केबल एक कप पानी लेते थे। नई पीढ़ी के समक्ष कठिन चुनौतियां हैं और उनको सावधानी पूर्वक ऐसे संतुलित विकल्पों को अपनाना चाहिए, जिसमें तकनीक पर निर्भरता के साथ विवेक का इस्तेमाल करते हुए गरीबों के प्रति सहानुभूति का भी भाव हो। ु

समग्र विकास और प्रजातन्त्र - जी॰एन॰ वाजपेयी

वैश्विक स्तर पर स्वीकार्य और अनुभवसिद्ध तमाम शोध इस बात की पुष्टि करते हैं कि लोकतंत्र किसी भी समाज को सुशासन देने के लिए एक बेहतर विकल्प है। यह किसी भी अन्य प्रणाली की तुलना में कहीं अधिक प्रभावशाली है। एक लम्बे अर्से से लोकतंत्र ने बड़ी संख्या में अच्छी चीजंे दी हैं। यही लोकतंत्र का वरदान है। लोकतंत्र विचार-विमर्श का अवसर मुहैया कराता है। इसमें असहमति की आवाज के साथ-साथ अन्य विकल्प भी होते हैं, जो कि सभी समुदायों के व्यापक हित में होता है। हालांकि कभी-कभी आम सहमति पर पहुँचने के लोकतांत्रिक तौर-तरीके अथवा उपाय विलम्ब का कारण बनते हंै और अक्सर ये तौर-तरीके संकीर्ण सोच तथा स्वार्थ को आगे बढ़ाते हैं। जब भी ऐसा होता है तो लोकतंत्र एक अभिशाप में बदल जाता है। आजाद भारत की प्रथम पीढ़ी के नेताओं की बुद्धिमत्ता, दूरदर्शिता और उनके साहस को श्रेय देना होगा कि उन्होंने लोकतंत्र (संसदीय) का चुनाव किया जिसमें शासन संचालन के लिए मताधिकार को आधार बनाया गया।
आजाद भारत की यात्रा में तमाम उथल-पुथल के बावजूद लोकतंत्र न केवल बचा रहा, बल्कि फलता-फूलता भी रहा। प्रत्येक लोकतंत्र में होने वाले राजनेताओं और राजनीतिज्ञों की तरह हमारे यहाँ भी इस तरह के लोग हैं। राजनीतिक विज्ञान के साहित्य में राजनेता उसे कहा गया है जो सिद्धान्तों विचारों के लिए कार्य करता है, जबकि राजनीतिज्ञ वह होता है जो अपने निहित स्वार्थों की पूर्ती में अधिकाधिक लगा रहता है। आजाद भारत में जो तमाम वादे किए गए उनमें सर्वाधिक महत्वपूर्ण था देश के लाखों लोगों को आर्थिक तौर पर सशक्त करना। दुर्भाग्य से इस दिशा में प्रगति बहुत धीमी रही या कहें अपर्याप्त और निराशाजनक रही। आज का युवा भारत इस मामले में बहुत अधीर है, वह बहुत इंतजार करने को तैयार नहीं है। अप्रत्यक्ष तौर पर कहा जाए तो और इंतजार की स्थापित मान्यता अब स्वीकार्य नहीं रह गई है। इसे पिछले वर्ष मई माह में आए चुनाव के परिणामों से भी समझ सकते हैं। नई सरकार का चुनाव ही इस जनादेश के साथ किया गया है कि वो समृद्धि लाने वाले उपायों पर काम करेगी, गरीबी और दरिद्रता का उन्मूलन करेगी। हालांकि इसमें समय लगेगा और पटरी से उतरी हुई अर्थव्यवस्था को ऊपर उठाने के लिए बहुत सारे प्रयास करने होंगे। यह एक चुनौती पूर्ण कार्य है। इसलिए और भी क्योंकि मौजूदा समय अर्थव्यवस्था वृहद आर्थिक अस्थिरता, राजकोषीय फिजूलखर्जी और सरकारी घाटे के बोझ तले दबी हुई है।
राजनीतिक कर्ता-धर्ता भले ही बहुत तेजी से स्थितियों को न बदल सकंे, लेकिन उन्हें मतदाताओं को अपनी ईमानदारी के प्रति भरोसा दिलाना होगा और टिकाऊ आर्थिक विकास के लिए समग्रतावादी नजरिया अपनाना होगा। हमारे नीति-नियंताओं को अपने विचारों को बेहतर तरीके से जनता के बीच रखना होगा और उन्हें बताना होगा कि अर्थव्यवस्था में सुधार के लिए क्या-क्या जरूरी है। हालांकि राज्यों और भारतीय अर्थव्यवस्था के सन्दर्भ में समग्रतावादी नजरिए का परिणाम आने में समय लगेगा। इस बीच सरकार की ईमानदारी और उसकी योग्यता-नीयत को लेकर किसी तरह का संदेह नहीं होना चाहिए। इसके लिए सरकार कई मोर्चों पर काम कर रही है तथा कई एक कदम उठाए गए हैं जिसमें कई ऐसे विधेयक प्रस्तावित किए गए है जिससे देश में व्यवसाय के प्रति माहौल बना है और प्रक्रियाएं सरलीकृत हुई हैं। संसद के पिछले सत्र में केन्द्र सरकार ने अधीर भारत की बेचैनी को दूर करने के लिए अध्यादेशों के माध्यम से आर्थिक सुधारोें की गति को तेजी देने की कोशिश की ताकि स्थिति में बदलाव हो सके। इसके लिए सरकार ने भूमि अधिग्रहण विधेयक को पेश किया, कोयला, खदानों और खनिजों जैसी राष्ट्रीय सम्पदा की पारदर्शी बिक्री को सुनिश्चित किया और बीमा क्षेत्र में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की सीमा में वृद्धि को अनुमति देने का काम किया।
कार्यपालिका के पास लोकहित में अध्यादेशों को जारी करने की शक्ति संविधान में मिली हुई है। इन अध्यादेशोें को संसद में पारित करा पाना सरकार के लिए बड़ी राजनीतिक परीक्षा है। दुर्भाग्य से इस मुद्दे पर राजनीतिज्ञ अपने-अपने हितों के लिहाज से राजनीति कर रहे हैं और अपने संकीर्ण राजनीतिक स्वार्थों के कारण इसे विफल बनाने की कोशिश कर रहे हैं। हालांकि एक वर्ग अप्रत्यक्ष तौर पर इसे सहारा भी दे रहा है। सच्चाई यही है कि यह राजनीतिज्ञों की राजनीति है, न कि राजनेताओं की। इन लोगों ने ही आर्थिक विकास की गति को धीमा किया है और इस समय भी इसे विफल बनाने की कोशिश कर रहे हैं। हालांकि यह भी सच है कि भारत के पास आर्थिक विकास की दिशा में आगे बढ़ने के लिए एक बेहतर अवसर है। पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्थाआंें में जब गिरावट का दौर है तो भारत उम्मीद की एक नई ऊँचाई पर है। वैश्विक पूँजी बाजार को भारत में बेहतर लाभ मिलने की अपेक्षा है। कुछ सुधारों के साथ भारत अपनी नीतियों में बदलाव की घोषाणाएं करके व्यावसायिक सुशासन को दिशा दे सकता है। विशेषकर कर ढ़ाचे में सुधार और अनुपयुक्त नीतियों का त्याग करके। यह कदम वित्तीय पूँजी के लिहाज से आवश्यक है। वर्तमान में निजी क्षेत्र और सार्वजनिक क्षेत्रों की बैंकिंग स्थिति खराब है और यह भारी एनपीए यानी गैर-निष्पादन सम्पत्ति के बोझ तले दबी हुई है। वास्तविकता यही है कि भारत का राजकोषीय संसाधन वृहद तौर पर कमजोर बुनियादी ढ़ाचे को इस रूप में सहारा देने के लिए अपर्याप्त है कि उच्च जीडीपी विकास दर का लक्ष्य हासिल किया जा सके और विशाल युवा आबादी के लिए देश को समृद्धि-सम्पन्नता की भूमि में बदला जा सके। इस क्रम मेें देश का नया मतदाता वर्ग क्षेत्रवाद अथवा सामाजिक इंजीनियरिंग से बहुत कम प्रभावित है। आज का आकांक्षी भारत इन बातों को अच्छे से समझता और जानता है कि नियंत्रित अर्थव्यवस्था उसके लिए बेहतर नहीं है।
उदारीकरण, वैश्वीकरण और आधुनिकीकरण के माध्यम से दुनिया में आर्थिक बेहतरी की खबरों को मीडिया ने बखूबी पेश किया है। देश का युवा चाहता है कि हमारी जीडीपी का विकास इस स्तर पर हो कि उसकी आर्थिक सम्भावनाओं में इजाफा हो और लोगों की जीवन दशा अच्छी हो सके। यह भी सच्चाई है कि  सामाजिक असंतोष और असमानता के कारण देश में नक्सल प्रभावित क्षेत्रों का विस्तार हुआ है। राजनीतिक व्यवस्था की प्रासंगिकता का परीक्षण समाज की मौजूदा आकांक्षाओं को पूरा करने के लिए उसकी दृढ़ता से ही हो सकेगा। क्रियान्वन में देरी राजनीतिक व्यवस्था को भी प्रभावित करेगी। मौजूदा समय में भारत बदलाव के दौर में है। प्रार्थना करें और उम्मीद रखें कि समावेशी आर्थिक विकास में विफलता और सामाजिक असंतोष की आग हमारे लोकतांत्रिक ढांचे के लिए खतरा नहीं बने। ु
- (लेखक सेबी और एलआइसी के पूर्व अध्यक्ष है।)

विद्या और शिक्षा में अन्तर - हरिबाबू द्विवेदी

विद्या से मिलती विनम्रता,
शिक्षा घमण्ड की जननी है।
विद्या देती है संस्कार,
शिक्षा पथ भ्रष्ट कराती है।
शिक्षा के द्वारा मिली हमें,
जग की चिकनी चुपड़ी बातें।
जिसके कारण हम फिसल गए,
अपना ली पश्चिम की थाती।
उस थाती को ही किरण समझ,
हम आगे बढ़ते चले गए।
रख दिया रेहन निज संस्कृति को,
मानवता सारी भूल गए।
जो पाठ पढ़ा था बचपन में,
आदर्श राम का रख करके।
धीरे-धीरे सब भूल गए,
आदर्श सभी निज संस्कृति के।
जिसके कारण पथ भ्रष्ट हुए,
मानवता नष्ट-भ्रष्ट कर दी।
चीत्कार उठी धरती माता,
निज संस्कृति तहस-नहस कर दी।
क्या अब भी तुम को होश नहीं,
निज गौरव का भी ध्यान नहीं।
देखो हम कैसे चलते थे,
क्या अब वह मेरी चाल नहीं।
देखो अतीत को मनन करो,
उर में शक्ति संवरण करो।
चल पड़ो पवन सुत के समान,
निज संस्कृति का अनुसरण करो।
पावन बेला वह आयेगी,
फिर मंजिल भी मिल जायेगी।
प्रकृति भी हँस हँस कर अपना,
तुमको सर्वस्व लुटायेगी।
मानव मानव बन जायेगा,
विद्या का पाकर अमरदान।
भारत फिर से सिर मौर बने,
ऐ ही है मेरा लक्ष्य महान। ु

कर्तव्य से बनता है देश - आचार्य शिवेन्द्र नागर

अमेरिका में भूतपूर्व राष्ट्रपति जे॰एफ॰ कैनेडी ने कहा था - ‘यह मत सोचो कि देश आपको क्या देता है, बल्कि यह सोचो कि देश को आपने क्या दिया है......’। बात स्लोगनों की नहीं है, बात नारों की नहीं है, बात विचार की है। विचार यह है कि क्या मै देश के सामने याचक बन कर आता हूँ या देश के लिए कुछ करने की इच्छा से जीता हूँ?
आमतौर पर लोग देश से अपेक्षाएं रखते है, स्वतंत्रता से अपेक्षाएं रखते है, लेकिन खुद से कोई अपेक्षा नहीं रखते। यह जानते हुए भी कि हमसे ही बनता है देश। हम हमेशा शिकायत करते रहते है कि स्वतंत्रता के इतने सालों बाद हमें यह नहीं मिला, हमें वह नहीं मिला, लेकिन हम यह नहीं देखते कि हमने देश को क्या दिया। यदि उन लोगों की बात को सही भी मान लें कि देश गर्त में जा रहा है, तो क्या उसके जिम्मेदार हम नहीं है? हम देश के लिए कुछ नहीं करते, उसकी आर्थिक, सांस्कृतिक समृद्धि में कोई योगदान नहीं करते और देश से अपेक्षा करते है कि वह हमारे लिए करे। हमसे ही देश बनता है। हमारे कार्यों से ही वह प्रगति के रास्ते पर जाएगा।
स्वतंत्रता दिवस के समय जरूर हम लोगों में देश के प्रति देशभक्ति उजागर होने लगती है। रेडियों, टेलीविजन में देशभक्ति के गाने हमें कुछ समय के लिए अपने कर्तव्यों के लिए प्रोत्साहित करते हैं। परन्तु कुछ समय बाद हमारा मन भी कुछ और चीजों में उलझ जाता है।
दरअसल, व्यक्ति पाँच स्तरों पर जीता है। आर्थिक, शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक तथा आध्यात्मिक स्तरोें पर। हर स्तर में देश की एक प्रमुख भूमिका होती है। हम सब पर देश का उधार है। देश ने हमारी झोली में इतना कुछ दिया है, फिर भी हम देश के सामने भीख का कटोरा लेकर खड़े रहते हैं। अंग्रेजी में एक कहावत है, जैसा आप सोचते है, वैसे ही हो जाएंगे अर्थात् आपकी सोच ही आपको बनाती है। अपने आसपास देखिए। अधिकतर लोग आपको याचक बने नजर आएंगे। माँ-बाप बच्चों के सामने बैठे हैं कि मेरी झोली में सम्मान डाल दो। कर्मचारी मालिक के सामने याचक बना बैठा है कि मुझे प्रमोशन दे दो। मालिक सरकार के सामने याचक बना बैठा है कि हमें टैक्स में छूट दे दो।
हमें सोच को व्यापक बनाना चाहिए। छोटा सोचेंगे तो हम छोटे ही रह जाएंगे। हमारे मन में देने का भाव हो न कि लेने का। देश को जब हम देते है, उसी का प्रतिफल देश हमें देता है, इसे याद रखें। जैसे ही हमारे अन्दर देने का भाव पैदा होता है, अपने आप हम दाता के रूप में स्थापित हो जाते है, वहीं जब मन में लेने का भाव होता है, तो हम याचक बन जाते है। स्वामी रामतीर्थ जी ने एक नियम बताया था, ‘द वे टु गेन एनीथिंग इज टू लूज इट’ अर्थात् कोई भी चींज प्राप्त करना चाहते हो तो उसको देना शुरू कर दो। यदि आप ज्ञान चाहते हो, तो आप ज्ञान देना शुरू कर दो। जितना ज्ञान आप लोगों को दोगे, उतना आपका ज्ञान बढ़ेगा। यदि आप चाहते है कि आपको सम्मान मिले तो अन्य लोगों को सम्मान देना शुरू कर दीजिए। यदि आप सेवा चाहते हैं तो दूसरों की सेवा शुरू कर दीजिए।
परिवार, समाज और ईश्वर तक तो यह बात हमें शायद समझ में आ जाए, परन्तु जब देश की बात होती है तो हम सब लोगों में अधिकतर लूटने, हड़पने, छीननेे का विचार आ जाता है। हम अपने काम से दूसरे शहर जाते हंै, तो एक-एक पैसा संभाल कर खर्च करते हंै, परन्तु कभी सरकारी खर्च पर कहीं जाने का अवसर मिल गया, तो अनाप-शनाप खर्च करने लगते हंै। आमतौर पर लोग कहते हैं, ‘सब चोरी करते हैं तो हम क्यों न करें’। यह तो वही बात हुई कि, सब कुएँ में कूद रहे हैं तो हम क्यों न कूदें।
यह मानकर चलें कि ईश्वर परमपिता है, यानी वह सबका पिता है। कोई भी पिता नहीं चाहता कि उसके पुत्र लोगों से याचना करें। हम सब ‘अमृतस्य पुत्रम’ हैं। सारे संसार के सामने याचक बने भीख का कटोरा लिए बैठे हैं। ईश्वर सोचते होंगे, ‘मैंने मनुष्य को कर्तव्य करनेे के लिए बनाया था और यह तो याचक बन गया।’
कर्तव्य का भाव किसी अवसर का मोहताज नहीं होता, यह हमारे भीतर का स्थायी भाव होना चाहिए। कर्तव्य का मतलब देश से अपेक्षा करना नहीं, बल्कि देश के लिए कुछ करने की प्रवृत्ति पैदा होना है।