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Tuesday, November 18, 2014

नमामि गंगे परियोजना हेतु सुझाव - विश्वनाथ खेमका


आज समाज में पर्यावरण के प्रति अपने कर्तव्यों को सोचने और उसके अनुरूप कुछ करने का भाव प्रबल हुआ है। अनेक कार्य ऐसे हो गये जिनमें तो प्रयाश्चित की आवश्यकता है। गंगा की अविरलता और निर्मलता ऐसा ही विषय है। अतः विचारणीय है कि, जब तक गंगा जी में जल का प्रवाह नहीं होगा तब-तक निर्मल गंगा-अविरल गंगा के बारे में सोचा नहीं जा सकता। उत्तर प्रदेश में वर्ष 1960 में हजारों की संख्या से लाखांे की संख्या में ट्यूबवेल की स्थापना होने के कारण गंगा जी के किनारे भूजल स्तर (ळॅस्) जमीनी सतह से पहले जो 7-8 मीटर नीचे था वह अब 35 मीटर से अधिक हो गया है। इस प्रक्रिया के कारण गंगा जी का जल प्रवाह के बजाय भूमि में रिसना पूर्व की अपेक्षा अब ज्यादा हो रहा है। देश के लोगांे को पीने के लिए पानी तथा अन्न की पैदावार के लिए ट्यूबवेल बड़ा साधन है जिसे बंद नही किया जा सकता है। हिमालय घाटी में उत्तर प्रदेश सिंचाई विभाग के माध्यम से गंगा जी पर टेहरी बाँध का निर्माण करवाया गया है जिसमें बरसात में बहने वाले पानी का भण्डारण होता है। इसके निर्माण के कारण अपर गंगा परियोजना में 5000 क्यूसेक पानी अतिरिक्त की आपूर्ती होने लगी है जो खेती तथा पीने के लिए प्रयोग में आता है।
भारत सरकार ‘‘नमामि गंगे’’ परियोजना के माध्यम से गंगा जी में जल की मात्रा की कमी, जल प्रदूषित होना तथा निर्मल धारा को प्रवाहमय रखने के लिए प्रयत्नशील  है। लोगों का यह सोचना है कि टिहरी बाँध के निर्माण के कारण गंगा जी में ये प्रवाह संकट उत्पन्न हुआ है। इस संकट से बाहर निकलने के प्रयास हेतु निम्न प्रस्ताव हैं:-
1. परियोजना की सफलता हेतु ठम्छब्भ् ड।त्ज्ञप्छळ की जाय। कानपुर या प्रयाग में गंगा जी में उपलब्ध जल की मात्रा व गुणवत्ता प्राप्ति हेतु (वर्ष 1960 या उसके आसपास) को आधार बनाया जाय। बरसात में बहने वाले पानी का भण्डारण करके गंगा जी में उसके स्मंद च्मतपवक में विनियमित (त्महनसंजमक) प्रवाह किया जाय। इसके लिए गंगा बेसिन विशेषकर उत्तर प्रदेश की नदियों तथा नालों में चेक डैम आदि का निर्माण समय बद्धता के साथ किया जाय।
2. यमुना नदी पर शंकरगढ़, चिल्लाघाट तथा हमीरपुर से नीचे तीन बैराजों का निर्माण किया जाय। लगभग 700 करोड़ प्रति बैराज के खर्च से 2100 करोड़ रूपये में गंगा में यमुना के माध्यम से उसके स्मंद च्मतपवक में लगभग 1200 क्यूसेक पानी की उपलब्धता सम्भव हो सकती है। शंकरगढ़ बैराज परियोजना सम्भवतः ब्ॅब् द्वारा अनुमोदित भी है। इसे अविलम्ब प्रारम्भ किया जाय।
3. सिंचाई परियोजनाओं में ॅन्म् ;ूंजमत नेम मििपबपमदबलद्ध बढ़ाकर तथा ब्तवचचपदह च्ंजजमतद में संशोधन कर 05-10ः नदी जल नहरों से बचत कर गंगा में जल बहाव को बढ़ाया जाये।
4. ैज्च् का संचालन व्छ स्प्छम् ैलेजमउ त्मबवतकपदह द्वारा प्रभावी किया जाय।
5. उद्योगों के म्ििसनमदज को ज्तमंजए त्मबलबसम - त्मनेम उद्योगों में ही किया जाय। छव ैमूंहमए छव म्ििसनमदज सिवू जव त्पअमत का अनुपालन सुनिष्चित हो।
6. गंगा समग्र में न्यायिक पैनल को प्रभावी किया जाय।
7. गंगा जी के किनारों के गाँवों में ठपव.वनजसमजए स्वच्छता एवं जन-जागरण हेतु शिक्षा केन्द्रों की स्थापना की जाय।
8. विगत 30 वर्षो में भारत की जलवायु में अत्यधिक परिवर्तन हुआ है। इसके वैश्विक तथा हिमालय घाटी के म्बव ैलेजमउ को प्रभावित करने वाले सभी च्ंतंउमजमते का समावेश करते हुए संशोधन कार्य किया जाय। संशोधन का उपयोग हिमालय घाटी एवं नदी जीवन की समग्रता और मौसम के सकारात्मक प्रभाव हेतु किया जाय।
9. टेहरी बाँध से अविरल प्रवाह हेतु 300-400 क्यूसेक का एक व्नजसमज है। गंगा जी में अविरल प्रवाह हेतु मानकों के आधार पर अन्य व्नजसमज की सम्भावना पर विचार किया जाय।
10. जो नदियाँ त्महपउ ैजंजम में हैं उनमें सिल्ट सफाई उपयोगी नही सिद्ध होगी। ऋषीकेश से ऊपर हिमालय घाटी में बैराज निर्माण व्यवहारिक नहीं है। अतः गंगा जी में जल की मात्रा तथा प्रवाह की गति बढ़ाने हेतु यदि आवश्यकता हो तो घाटी में 40-50 मीटर ऊचाई का बाँध निर्मित हो जिसमें नदी तल से ही जल प्रवाह का प्राविधान हो और उसके फाटक त्ंकपंस  हांे। इस बाँध के जल भण्डारण का उपयोग केवल गंगा जी में गंगा को अविरल गंगा-निर्मल गंगा हेतु ही हो।
उपरोक्त कार्यांे की समीक्षा के पश्चात,् क्रियान्वयन से ‘नमामि गंगे परियोजना’ कम लागत तथा सफलता से अगले पांँच वर्षों तक निश्चित होगी ही और गंगा के किनारे तीर्थ, ‘मानव के आनन्द स्थल’ बनेंगे। गंगा मैया के अविरल-निर्मल प्रवाह की बाधाओं की समाप्ति  ज्ञान-विज्ञान पूरक संयोजन से ही होगी, ऐसा मेरा व्यक्तिगत दृढ़ विश्वास है। ु

नदी का चिन्तन - गौरी शंकर वैश्य ‘‘विनम्र’’


वृद्धा माँ-सी संकेतों में
सुनों! नदी कुछ कहती है।
लोरी सा मधुरिम निनाद कर
‘कल-कल’ धारा बहती है।
हिमखण्डों को ताप मिला, तब बूँद-बूँद बनकर पिघली
प्रकृति-पुरूष रूपी जीवों का, करने को उद्धार चली
जिसने पावन अमृत बाँटा
वह अन्तर में दहती है।
सुनों! नदी कुछ ....
देवतुल्य जो पूज्य सनातन, अब उसका सम्मान नहीं
जल से रस-चेतनता हैं, बिन जल के कल्याण नहीं
तन अस्वस्थ हैं, मन मलीन है
प्रतिपल पीड़ा सहती है।
सुनों! नदी कुछ ....
स्वार्थ में अन्धे मानव ने, किया प्रदूषित, निर्मल जल
डाल रहा अपशिष्ट, रसायन, मिला रहा है वाहित मल
शुष्क-अशक्त हुए दोनों तट
उर में सिसकता ढहती है।
सुनों! नदी कुछ ....
औद्योगिक अपशिष्ट रोक दो, दूषित जल का हो शोधन
जल-जीवों की संरक्षा हो, चले स्वच्छता-आन्दोलन
पुत्र भगीरथ कब आओगे!
चिन्तन में रत रहती है।
सुनों! नदी कुछ कहती है।
चिन्तन, मनन और क्रियान्वयन की आवश्यकता है।ु
- 117 आदिल नगर, डाकघर-विकास नगर, लखनऊ-226022, दूरभाष: 9956087585

अब प्राकृतिक रूप से पकाएं कच्चे फल - डाॅ॰ राज किशोर एवं डाॅ॰ वी॰के॰ चैधरी


देश में जनसंख्या बढ़ने तथा स्वास्थ्य के प्रति लोगो की बढ़ती जागरूकता से राष्ट्रीय स्तर पर बड़े शहरों से लेकर सुदूर गाँवों तक बाजार में विभिन्न प्रकार के पके फलों की माँग निरन्तर बढ़ती जा रही है। ऐसी स्थिति में फलों की खेती करने वाले किसानों तथा फलों का व्यापार करने वाले बड़े-छोटे व्यापारियों के लिए बाजार में पके फलों की जितनी अधिक माँग रहती है उतनी बड़ी मात्रा में फल प्राकृतिक रूप से पक नहीं सकते हैं। इसलिए मांग और आपूर्ति के बीच के इस अन्तर को दूर करने के लिए बागवानों एवं व्यापारियों को फलों को पकाने के लिए कृत्रिम विधियों का सहारा लेना पड़ता है। दूसरी ओर विभिन्न प्रकार के फल व्यावसायिक स्तर पर दूर-दराज के क्षेत्रों और यहाँ तक कि दूसरे प्रदेशों में उगाए जाते है, जहाँ से वे देश के विभिन्न क्षेत्रों में परिवहन के विभिन्न माध्यमों से भेजे जाते है। अब यदि दूर-दराज से भेजे जाने वाले इन फलों को पकी हुई अवस्था में विपणन के लिए तोड़ा जाएगा तों वांछित स्थान तक पहुँचते-पहुँचते ये फल खराब हो जायेंगें या फिर सड़ जायंेगें। इन सभी परिस्थितियों के कारण फलों को कृत्रिम रूप से पकाने का सहारा लिया जाता है।
फलों को कृत्रिम रूप से पकाने की विधियाँ -
फल चाहें प्राकृतिक रूप से पकें या कृत्रिम रूप से पकाएं जायें, इसके लिए इथिलीन और एसिटिलीन गैसें मुख्य कारक हैं। ‘खरबूजे को देखकर खरबूजा रंग बदलता है।’ यह कहावत जिसने भी और जिस उद्देश्य से पहली बार कही होगी उसे कृषि कार्यो का गहन अनुभव रहा होगा, क्योंकि इस कहावत का वैज्ञानिक आधार है। खरबूजे के खेत में जब एक खरबूजा पकता है तो इस क्रिया में इथिलीन गैस मुक्त होती है। मुक्त हुई यह गैस खेत के दूसरे खरबूजे को पकाने में उत्प्रेरक का कार्य करती है और धीरे-धीरे पूरे खेत में इथिलीन गैस मुक्त होने लगती है और फलों के पकने की प्रक्रिया तीव्रता से चल पड़ती है। कृत्रिम रूप से फलों को पकाने के लिए बागवानों और व्यापारियों द्वारा कैल्सियम कार्बाइड रसायन (रसायनिक सूत्रःब्ंब्2) का उपयोग किया जाता है। रसायन शास्त्री फ्रेडरिक वोहलर ने वर्ष 1862 में सर्वप्रथम यह ज्ञात किया था कि कैल्सियम कार्बाइड पानी के साथ रसायनिक अभिक्रिया करके एसिटिलीन गैस का निर्माण करती है। इस गैस का उपयोग उसी समय से अनेक औद्योगिक कार्यो के साथ-साथ फलों को पकाने में होता आ रहा है। यद्यपि एसिटिलीन इथिलीन सदृश गैस होती है और इसका व्यावसायिक स्तर पर उपयोग फलों को पकाने के लिए किया जाता है, लेकिन यह मानव स्वास्थ्य के लिए अत्यधिक खतरनाक है, जिसके कारण कैल्शियम कार्बाइड से पकाएं फलों को खाने से आँख, फेफड़े, गुर्दे एवं हृदय पर अत्यधिक दुष्प्रभाव पड़ता है। कैल्शियम के इन्हीं दुष्प्रभावों को देखते हुए फलों को पकाने के लिए शासन द्वारा इसे प्रतिबन्धित कर दिया गया है और विकल्प के रूप में इथेफान या इथेरल नामक तरल रसायनों के उपयोग की अनुमति प्रदान की गयी है।
इथेफान या इथेरल के द्वारा अलग-अलग प्रकार के फलों को पकाने के लिए इन रसायनों की अलग-अलग मात्राओं का प्रयोग किया जाता है। आम एवं केला पकाने के लिए 12.5 मि॰ली॰, पपीता पकाने के लिए 18 मि॰ली॰ तथा टमाटर को पकाने के लिए 6.5 मि॰ली॰ रसायन प्रति दस लीटर पानी में घोलकर और उसमें 10 मि॰ली॰ तरल साबुन मिलाकर घोल तैयार करके फलों को इस घोल में 10 से 15 मिनट तक (फलों के आकार के अनुसार) डुबोकर निकाल लिया जाता है। 5 से 7 दिन के भीतर सारे फल समान रूप से पक जाते हैं। रसायनों की माप के लिए कोई साधन न होने पर चाय की चम्मच का प्रयोग करना चाहिए। चाय की एक चम्मच में पाँच  मि॰ली॰ दवा आती है।
फलों को पकाने के प्राकृतिक उपाय -
नरेन्द्र देव कृषि एवं प्रौद्योगिक विश्वविद्यालय, नरेन्द्र नगर, कुमारगंज, फैजाबाद के फल प्रसंस्करण एवं संरक्षण विभाग के अध्यक्ष डाॅ॰ संजय पाठक द्वारा विभिन्न प्रकार के कच्चे फलों में मिठास बढ़ाने तथा पेड़ों पर फलों को देर से पकाने जैसे अनेक कार्यों के लिए सरल विधियों का विकास किया गया है। पोस्ट-हार्वेस्ट टेक्नोलाॅजी के विशेषज्ञ डाॅ॰ संजय पाठक के अनुसार कच्चा केला, पपीता, आम तथा टमाटर जैसे फलों को प्राकृतिक रूप से पकाने के लिए इन फलों के साथ पका पपीता, सेब, आम, केला या पका शरीफा रख देने से कच्चे फल आसानी से पक जाते है। प्राकृतिक रूप से पके हुए इस प्रकार के फल रंग एवं स्वाद में उत्तम किस्म के रहते है और उपभोक्ता के शरीर पर कोई विपरीत प्रभाव नहीं डालते हैं। आम को पकाने के लिए 22 डिग्री तापमान एवं केले को पकाने के लिए 18 डिग्री तापमान उचित रहता है। डाॅ॰ पाठक के अनुसार शरीफा एक ऐसा फल है जिसके पकने पर और फलों की तुलना में सबसे ज्यादा इथीलीन गैस का उत्सर्जन होता है जो कच्चे फलों को पकाने के लिए सबसे सुरक्षित गैस मानी जाती है।
डाॅ॰ संजय पाठक द्वारा किए गए शोधों के अनुसार पेड़ों पर लगे फलों का जीवन काल और भण्डारण समय बढ़ाने के लिए बागवान को फल लगे पेड़ों पर कैल्सियम क्लोराईड के दो प्रतिशत जलीय घोल का छिड़काव करना चाहिए। आम के फलों में मिठास बढ़ाने के लिए फलों के पकने के एक माह पूर्व पोटैशियम सल्फेट के एक प्रतिशत जलीय घोल का छिड़काव किया जा सकता है। दूसरी ओर यदि बागवान आम या अन्य फलों को पेड़ों पर देर से पकाना चाहते है तो उन्हें पेड़ों पर लगे फलों पर दो प्रतिशत यूरिया के जलीय घोल का छिड़काव करना चाहिए। ु
- कुमारगंज, कृषि विश्वविद्यालय, फैजावाद।

नदियों के किनारे स्थित तीर्थों का सम्यक विकास -डा॰ महेन्द्र प्रताप सिंह


हमारे देश के प्रायः सभी प्राचीन तीर्थस्थल नदियों के किनारे स्थित हैं। नदियों की स्वच्छता हेतु चलाए जा रहे विभिन्न प्रयत्नों के क्रम में नदियोें के किनारे स्थित तीर्थों के सम्यक विकास हेतु कुछ उपयोगी सुझाव निम्न प्रकार हैं -
1. स्वच्छता अभियान -  तीर्थस्थलों पर प्रायः अपेक्षित स्वच्छता नहीं रहती है। धार्मिक भावना से वहाँ के लोगों मुख्यतः साधु-सन्तों, सामाजिक कार्यकर्ताओं एवं अन्य प्रबुद्ध लोगों के साथ स्वच्छता का कार्यक्रम चलाया जा सकता है। तीर्थे स्थलों के जलस्रोतों की सफाई पर विशेष ध्यान दिया जाना चाहिए।
2. पालीथीन मुक्ति - पालीथीन स्थाई गन्दगी का एक प्रमुख स्रोत है। यह हजारों वर्ष तक विघटित नहीं होता तथा गाय एवं अन्य जानवर इसे खाकर मर जाते हैं। धीरे-धीरे तीर्थस्थलों पर पालीथीन का प्रयोग समाप्त किया जाना चाहिए।
3. वृक्षारोपण - तीर्थों को हरा-भरा किया जाना आवश्यक है। तीर्थस्थल स्थित नदी तट पर धार्मिक एवं पर्यावरणीय महत्व की प्रजातियों जैसे- पीपल, पाकड़, बरगद, गूलर आदि एवं लुप्त हो रही प्रजातियों जैसे- कैथा, बड़हल, खिरनी आदि का रोपण किया जाना चाहिये। विभिन्न देवी, देवताओं से जुड़े पौधों का रोपण एवं यदि देखरेख की व्यवस्था हो तो विशिष्ट प्रजातियाँ जैसे- रुद्राक्ष एवं कल्पवृक्ष आदि का रोपण किया जाना चाहिये।
4. चढ़ाए गये फूल आदि का उपयोग - मुख्य मन्दिरों से बड़ी मात्रा में फूल, माला आदि निकलते हैं। इनसे अगरबत्ती एवं धूपबत्ती बनाई जाती हैं। इस कार्य से मन्दिर की सफाई के साथ-साथ स्थानीय लोगों को रोजगार भी मिलता है।
5. जलस्रोतों में विसर्जन को हतोत्साहित करना - नदियों एवं पवित्र सरोवर आदि में मूर्तियों एवं प्रयोग की जा चुकी हवन सामग्री को विसर्जित करने की परम्परा है। इसी के साथ बड़ी मात्रा में पालीथीन थैली भी जलस्रोतों में डाल दी जाती हैं। इसे प्रत्येक दशा में रोका जाना चाहिए। इस दिशा में किये गये कतिपय कार्यों का उल्लेख यहाँ पर किया जा रहा है -
माँ चन्द्रिका देवी मन्दिर - लखनऊ से लगभग 30 कि0मी0 दूर बक्शी के तालाब के आगे माँ चन्द्रिका देवी शक्तिपीठ परिसर स्थित है। मन्दिर समिति एवं स्थानीय लोगों के साथ बैठक कर सर्वसम्मति से निर्णय लिया गया कि दिनाँक 28.09.2011 से इस परिसर को पालीथीन मुक्त किया जायगा। उसके बाद आस-पास के कुम्हारों के साथ बैठक कर कुल्हड़ आपूर्ति की व्यवस्था की गई। पालीथीन थैली के विकल्प रूप में दुकानदारों को कागज एवं वैकल्पिक थैले उपलब्ध कराये गये। इस प्रकार प्रथम चरण में दुकानों पर पालीथीन कप के स्थान पर कुल्हड़ लाये गये तथा पालीथीन थैलियों के स्थान पर कागज एवं अन्य थैलों का प्रयोग प्रारम्भ किया गया। स्थाई रूप में इस परिसर को पालीथीन मुक्त बनाने के लिये स्थानीय ग्रामवासियों, मन्दिर समिति के लोगों एवं दुकानदारों को दिनाँक 28.09.2011 को नवरात्रि के प्रथम दिवस पर मेरे आध्यात्मिक गुरु सन्त स्वामी महेशानन्द जी द्वारा परिसर को पालीथीन मुक्त करने की शपथ दिलाई गई। इस समय तक परिसर में दुकानों को पालीथीन मुक्त किया जा चुका है। श्रद्धालुओं एवं भक्तों द्वारा पालीथीन का प्रयोग रुकवाने एवं मेला के दिनों में बाहर से आने वालों सेे पालीथीन रुकवाने की दिशा में मन्दिर समिति के सहयोग से प्रयास जारी है।
दिनाँक 28.09.2011 को ही स्वामी जी द्वारा कृष्णवट का रोपण कर परिसर में वृक्षारोपण का शुभारम्भ कर दिया गया जो अब वृक्ष का रूप ले रहे हैं। गोमती तट पर जल भराव वाले क्षेत्र में अर्जुन का रोपण किया गया एवं मन्दिर के आस-पास पीपल, पाकड़ एवं बरगद के साथ-साथ कैथ, बड़हर एवं आमरा जैसी अनेक लुप्त हो रही प्रजातियों को रोपित किया गया। धार्मिक महत्व को देखते हुये यहाँ कल्पवृक्ष, रुद्राक्ष, सिन्दूर का भी रोपण किया गया है। सभी प्रजातियाँ न केवल जीवित हैं बल्कि अच्छी दशा में चल रही हैं।
यहाँ पर चाय आदि की दुकानों पर मिट्टी के कुल्हड़, चाट की दुकानों पर पत्तल एवं अन्य दुकानों पर कागज के थैलों का व्यापक प्रयोग किया जा रहा है। इससे वहाँ होने वाली गन्दगी में कमी आयी है।
मन्दिर परिसर में चढ़ाए गए फूलों से अगरबत्ती एवं धूपबत्ती बनाने का कार्य किया जा रहा है। अन्य मन्दिर से जुड़े लोगों को दिखाकर यह कार्य अन्यत्र भी प्रारम्भ किया जाना चाहिये।
नैमिशारण्य  - उत्तर प्रदेश के सीतापुर जनपद में स्थित नैमिशारण्य एक प्रसिद्ध एवं प्राचीन तीर्थस्थल है। यह प्राचीन ऋषियों की तपस्थली रही है।
परिक्रमा पथ पर स्थानीय लोगों एवं वन विभाग के सहयोग से 88000 ऋषियों की स्मृति में 88000 पौधांें का रोपण कराया गया। दिनाँक 29 दिसम्बर सन् 2012 को नैमिशारण्य के प्रमुख साधु सन्त, व्यापार मण्डल के प्रतिनिधि गण एवं गणमान्य लोगों ने माँ चन्द्रिकादेवी मन्दिर परिसर में आकर वहाँ पर पालीथीन के विकल्प प्रयोग तथा वहाँ गोमती नदी के किनारे किये जा रहे रोपण कार्य को देखा। दिनाँक 27 जनवरी 2013 को पालीथीन के विकल्प के विक्रेता के साथ मैं नैमिशारण्य पहुँचा। इस सभा में पहला आश्रम के महन्त जी एवं अन्य कई लोगों ने पालीथीन के विकल्प के रूप में प्रयोग की जाने वाली थैलियाँ खरीदीं। दिनाँक 8 मार्च 2013 को माँ ललितादेवी परिसर को पालीथीन मुक्त करने का आदेश रिसीवर से निर्गत होने से पालीथीन मुक्ति की दिशा में एक सार्थक प्रयास प्रारम्भ हुआ।
गोमती के तट पर शमशानघाट के निकट स्थानीय गणमान्य नागरिकों के सहयोग से भूमि का प्रस्ताव प्राप्त कर 05 हे0 क्षेत्र में वन विभाग एवं स्थानीय लोगों के सहयोग से विधिवत् पौधारोपण कार्य कराया गया जिससेे उसे अतिक्रमण से भी बचाया जा सका है। इसके अतिरिक्त बालाजी मन्दिर परिसर में पंचवटी, नवग्रह वाटिका एवं नक्षत्र वाटिका की स्थापना कराई गई है।
उक्त के अतिरिक्त गोमतीपार क्षेत्र स्थित पहला आश्रम की भूमि पर भी व्यापक रोपण कराया गया। नैमिशारण्य से थोड़ी दूर स्थित रुद्रावर्त मन्दिर के पास हरिशंकरी स्थापित की गई। यहाँ पर रोपित सभी पौध सुरक्षित एवं प्रफुल्लित हैं।
वृन्दावन -  यहाँ पर विशेष प्रयास करके वन विभाग की सहायता से 2013 वर्षाकाल में 119 एकड़ क्षेत्र में पौधारोपण कार्य कराया गया।
धौम्य ऋषि आश्रम, धोबियाघाट - हरदोई जनपद में गोमती के तट पर स्थित धोबियाघाट एक अद्भुत स्थान है- पहला यहाँ भूमि से अनेक पानी के सोते निकलते हैं जो बाद में गोमती नदी में मिलते हैं तथा दूसरा गोमती के तट पर स्थित मन्दिर के सघन वन क्षेत्र को देखकर प्राचीन आश्रमों की परिकल्पना साकार रूप लेती है। पालीथीन बन्द करने का अभियान यहाँ भी प्रारम्भ हो गया।
सैलानी माता मन्दिर - लखनऊ से लगभग 20 कि0मी0 दूर बाराबंकी जिले में गोमती नदी के तट पर सैलानी माता का मन्दिर स्थित है। वर्ष 2014 वर्षाकाल में यहाँ पर धार्मिक महत्व के एवं लुप्त हो रही वृक्ष प्रजातियों के व्यापक पौधारोपण की योजना बनायी गयी। उक्त पौधारोपण हेतु मन्दिर समिति द्वारा यहाँ पर रोपण हेतु वृत्ताकार खाईं खुदवाई गयी। दिनाँक 04.05.2014 को मन्दिर समिति के अध्यक्ष श्री रामदुलारे यादव एवं मन्दिर के मुख्य पुजारी श्री वासुदेव जी द्वारा रुद्राक्ष के पौधे का रोपण कर पौध रोपण का शुभारम्भ किया गया। दिनाँक 20.07.2014 को सैलानी माता मन्दिर परिसर में कल्पवृक्ष, पारिजात (हरसिंगार), हरिशंकरी (पीपल, पाकड़ एवं बरगद), कैथ, खिरनी, कनकचम्पा, मौलश्री, खैर, बड़हल, गूलर आदि प्रजातियों का रोपण किया गया।
भविष्य के कार्यक्रम -
1. रायबरेली जनपद में सई नदी के किनारे स्थित भौरेश्वर महादेव मन्दिर परिसर में धार्मिक महत्व की प्रजातियों का रोपण।
2. सैलानी माता मन्दिर परिसर में पालीथीन मुक्ति का कार्य।
3. उपरोक्त मन्दिरों में कभी-कभी सफाई कार्य किया जाना। ु
- उप वन संरक्षक, कार्यालय प्रमुख व संरक्षक, 17, राणा प्रताप मार्ग, उŸार प्रदेश, लखनऊ।

आदर्श गाँव की पहल.संकलन - भास्कर अस्थाना

जहांँ समाज जाग्रत होता है, वहाँ कोई भी किया गया काम स्थायी व प्रभावी होता है। अपने गाँव को सक्षम बनाने और वर्तमान चुनौतियों के अनुरूप उसे विकसित करने की दिशा में गाँव के जागरूक नागरिकों ने भी पहल की है, जिसमें से गुजरात के ‘पुंसरी’ और उत्तर प्रदेश में बरेली जिले के ‘ग्रेम’ गाँव का संक्षिप्त विवरण प्रस्तुत है।
1. पुंसरी गाँव - गुजरात की राजधानी ‘गाँधी नगर’ से 35 किमी॰ दूर सावरकांठा जिले में स्थित पुंसरी गाँव के युवा सरपंच हिमांशु पटेल की कुछ करने की जिद ने आज गाँव की सूरत व सीरत दोनो बदल दी है। केन्द्र व राज्य सरकार की योजनाओं से हर ग्राम पंचायत को तीन से पाँच करोड़ रूपये मिलते हैं, लेकिन कुछ गाँव ही उस पैसे का उपयोग कर पाते हैं। सरपंच हिमांशु भाई ने पद संभालते ही सबसे पहले सेनीटेशन सुविधा पर जोर दिया तथा सुरक्षा व मानीटरिंग के लिए सी॰सी॰ टीवी लगाये। बिजली की तकनीकी खराबी व उसकी तत्काल मरम्मत की सुविधा के लिए खम्भों पर नम्बर डाल दिये, गाँव के 1200 घरों में से 250 घरों को इको फ्रैन्डली बिजली की उपलब्धता के लिए बायो इलेक्ट्रिीसिटी प्लांट पर काम प्रारम्भ किया। 6 हजार आबादी वाले गाँव में कम लागत में प्रकाश उपलब्धता हेतु 22 लाख रू॰ खर्च करके 450 एलईडी लाइट का प्रावधान किया, जिससे बिजली के बिल में 50 प्रतिशत तक की कमी की उम्मीद है। गाँव में सी॰सी॰ रोड है, स्वच्छता व्यवस्था उत्तम है, गाँव का अपना आर॰ओ॰ वाटर प्लांट है जिससे गाँववासियों को 4 रू॰ में 20 लीटर मिनरल वाटर की उपलब्धता होती है। बच्चों को स्कूल भेजने व दूध बेचने वाले पशुपालकों के लिए गाँव की अपनी बस सेवा तथा आधुनिकता में शहरों को भी पीछे छोड़ते हुए वाईफाई व कम्युनिटी रेडियों की उपलब्धता की ओर कदम बढ़ाता पंुसरी गाँव आज देश के सात लाख गावों के लिए एक पे्ररक ‘दीप’ बन गया है।
पंुसरी गाँव पंचायत के पास पाँच साल पहले 30 लाख 40 हजार रूपये जमा पूँजी थी, अब उसके खाते में 45 लाख रूपये हैं, जो प्रारम्भ किए गये कार्यों को गति देने में सहायक हांेगे।
2. ग्रेम गाँव - उŸार प्रदेश में बरेली जिले के नवाबगंज क्षेत्र में गाँव के विकास की कहानी भी एक संकल्प की कहानी है। राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित, संकल्प के धनी मास्टर लालता प्रसाद जब उच्च प्राथमिक विद्यालय से रिटायर हुए तोे गाँव वालों ने तय कर लिया कि अगले प्रधान वही होंगे। मास्टर साहब ने सशर्त स्वीकृति दी कि वह चुनाव प्रचार पर एक पैसा खर्च नहीं करेंगे, वोट माँगने किसी के घर नहीं जायेंगे तथा जीतने के लिए कोई वायदा नहीं करेंगे। मास्टर साहब ने विचारों के अनुरूप चुनाव लड़ने की स्वीकृति देकर प्रजातन्त्र की नींव मजबूत की। नतीजा आया तो वह प्रधान बन गए। जीत के बाद सबसे पहले बालिका शिक्षा उत्थान के लिए 7.49 लाख रू॰ सरकारी सहयोग और डेढ़ लाख अपने पास से लगाकर उच्च प्राथमिक विद्यालय बनवाया, जो तमाम स्कूलों के लिए रोल माॅडल है। इसके साथ ही गाँव के अन्दर व बाहर पक्की सड़कों का उपयोगी जाल है। खेतों तक जाने वाले पक्के चकरोड, पक्की सड़कें, गंदे पानी निकास को नालियाँ व बहगुल नदी तक नाले की 2 कि॰मी॰ सफाई, साफ पानी को हैण्डपम्प, चैराहे के मोड़ों पर ढ़की हुई नालियाँ, मरकरी लाइट, कब्रिस्तान और शमशान के पास से गंदगी की सफाई, जल संचय को तालाब, शौच को शौचालय, हरियाली हेतु मुख्य मार्ग से विद्यालय और तालाबों के किनारे पेड़ लगवाये तथा खुले में शौच न जाने और सड़कों पर कूड़ा न फेंकने के ग्रामीणों में संस्कार भरे हैं।
इतना सब कुछ करने के बाद भी वह स्वयं दुबारा प्रधान नहीं बनना चाहते। प्रधान बनने से पहले के मास्टर साहब के तन पर कुर्ता-पायजामा, पैर में साधारण चप्पल, चलने को पुराना वेस्पा स्कूटर और रहने को पुराना मकान, प्रधान बनने के बाद मास्टर लालता प्र्रसाद जी का कुछ भी तो नहीं बदला। हांँ, उनके प्रधान बनने से गाँव की तस्वीर और तकदीर जरूर बदल गई।
मास्टर साहब अपने को प्रधान कहलाना पसन्द नहीं करते, क्योंकि, वह कहते हैं- ‘आज प्रधान शब्द की गरिमा ही नहीं बची है।’ वह प्रधानों को सीख देते हैं, ‘उन्हें प्रधान शब्द के प्रति समाज में बनी सोच बदलने के लिए काम करना होगा।’
उनका कहना है, ‘‘प्रधान चाहें तो गाँव स्वर्ग बन सकता है। न संसाधनों का टोटा रास्ता रोकेगा और न पैसे की कमी आड़े आयेगी। लेकिन ताली दोनो हाथों से बजती है, जैसा कि ‘ग्रेम’ गाँव में हुआ।’’ ु

सांसद आदर्श ग्राम योजना एक दृष्टि - ब्रजेन्द्र पाल सिंह


ग्राम एक संस्कृति है, एक विचार है और अन्ततः व्यक्ति निर्माण की एक पाठशाला है। जहाँ वह व्यक्ति से परिवार, परिवार से समाज, समाज से राष्ट्र और राष्ट्र से वसुधैव कुटुम्बकम् का पाठ सीखता है। हम जहांँ भी जायें, जहांँ भी रहें, अपने पूर्वजों की विरासत ‘ग्राम संस्कृति’ के विकास के लिए कार्य करें। हम अपने गाँव को न भूलें, उसे अपने जीवन का तीर्थ बनाएँ। अपने जीवन-तीर्थ रूपी गाँव को सजाएं, संवारें और भारत को विश्व का सिरमौर बनाने के लिए एक कदम आगे बढ़ाएँ।
प्रधानमंत्री मोदी जी ने भी इसी दिशा में एक कदम आगे बढ़ाते हुए लोकनायक जयप्रकाश नारायण के जन्मदिन 11 नवम्बर को सांसद आदर्श ग्राम योजना की घोषणा करते हुए उŸाल दृष्टि का प्रयोग किया है। हम सभी जानते हैं कि यदि सूर्य की किरणों को एक लेंस (उŸाल लेंस) के माध्यम से एक बिन्दु पर केन्द्रित किया जाये, तो अग्नि प्रज्ज्वलित हो जाती है। इसी दृष्टि का प्रयोग करते हुए मोदी जी ने फैली हुई सांसद निधि की ऊर्जा को उसके संसदीय क्षेत्र के एक गाँव पर केन्द्रित करने की व्यवस्था बना दी है। इससे सांसद-निधि की ऊर्जा के साथ ही अनेक अन्य ऊर्जाएँ भी उस चयनित गाँव पर केन्द्रित होंगी और उससे राष्ट्र विकास की असीम-ऊर्जा प्रकट होगी।
यह ऊर्जाएँ हैं -
1. राष्ट्रीय विकास के एजेन्डे में ग्राम विकास का कार्य प्राथमिकता पर आ जायेगा, जिससे गाँव का बहुमुखी विकास होगा, आर्थिक समृद्धि के मार्ग खुलेंगे, रोजगार सृजन होगा और पलायन रूकेगा।
2. सांसदों, विधायकों को अपनी क्षमता प्रकट करने का अवसर मिलेगा। ग्राम का चयन उसकी प्रथम परीक्षा होगी।
3. केन्द्र व राज्य की ग्राम विकास की अनेक योजनाएंँ एक ग्राम पर केन्द्रित होकर प्रभावी परिणाम देंगी।
चुनौतियाँ भी हैं -
1. गाँव की समस्त शक्तियों को इस अभियान से जोड़ना, जिससे वह इस कार्य में अपने कार्य की अनुभूति कर गौरान्वित हो सकें।
2. गाँव से बाहर गई मानवीय ऊर्जा को भी अपने गाँव के प्रति प्रेरित करना और गाँव में उन्हें अपेक्षित सम्मान मिल सके ऐसा अनुकूल वातावरण बनाना।
3. वर्तमान पंचायत की चुनाव प्रकिृया के कारण गाँव में बढ़ती सामाजिक खाईं को पाटना।
4. वर्तमान प्रदूषित राजनीति और सरकारी नीतियों के कारण गावों में आई परावलम्बन की भावना का निवारण करना।
5. ग्राम संस्कृति के प्राण-तत्व, सबके प्रति अपनत्व के भाव का विकास करना।
मोदी जी की सांसद आदर्श ग्राम योजना समस्त चुनौतियों को पार कर सफल होगी, उसका भी कारण है। हम सबने बचपन में श्रंखला-निर्माण (चेन बनाना) खेल, अनेक बार खेला है। मोदी जी ने उसी खेल-भावना का प्रयोग करते हुए गाँधी जयन्ती पर ‘नव-मन्त्र’ के साथ ‘स्वच्छ भारत अभियान’ प्रारम्भ किया। उन्हांेने नौ राष्ट्रीय प्रतिभाओं को इस कार्य का एम्बेसडर बनाया, उनमें से अनिल अम्बानी ने राष्ट्र की जानी-मानी नौ हस्तियों को चुन कर श्रंखला निर्माण का कार्य प्रारम्भ कर दिया। श्रंखला निर्माण के खेल-खेल में यह अभियान समाज का अपना अभियान बन जायेगा, क्योंकि वास्तव में तो समाज के अन्तस में गंदगी के प्रति छिपी विरल भावना को ही एक बिन्दु पर केन्द्रित करने और उससे प्रकट होने वाली ऊर्जा के लिए ‘स्वच्छ भारत अभियान’ एक सशक्त उपक्रम है।
सांसद आदर्श ग्राम योजना उसकी ही अगली कड़ी है। अतः उसकी सफलता में हमारा भी योगदान हो सके, इस हेतु इस योजना के महत्वपूर्ण बिन्दुओं को जान लेना आवश्यक है। वे बिन्दु हैं -
लक्ष्य -
1. माँग आधारित सुविधा की सीढ़ी की उपलब्धता सुुनिश्चित कराना तथा वर्तमान सांसद काल में कम से कम तीन गाँव आदर्श गाँव बनाने का लक्ष्य है।
2. आदर्श गाँव का अर्थ, वह गाँव- स्वास्थ्य, स्वच्छता, शिक्षा, विकास एवं आपसी सौहार्दय का केन्द्र बने।
3. विज्ञान सार्वभौमिक है, पर स्थानीय तकनीकी को प्राथमिकता।
चयन -
1. शहरी इलाके के सांसद अपने निकट की किसी लोकसभा का कोई गाँव चुनेंगे।
2. लोक सभा सांसद को अपने क्षेत्र से गाँव चुनना होगा और राज्यसभा सांसद जिस राज्य से चुनकर आये हैं, उस राज्य से गाँव चुन सकते हैं।
3. सांसद अपना या अपनी पत्नी का गाँव नहीं चुन सकेंगे।
4. मैदानी इलाकों में 3000 से 5000 तक आबादी वाले गाँव को चुना जायेगा और जिन इलाकों में इतनी आबादी नहीं हैं, वहाँ ग्राम पंचायतों को ग्राम चुनने का अधिकार दिया जायेगा।
कार्य -
1. हर गाँव अपना आर्थिक एजेन्डा तय करेगा, ताकि उस गाँव में उत्पादित होने वाली चीजों का उत्पादन बढ़े।
2. गाँव में ढ़ांचागत विकास के साथ नैतिक विकास का साधन मुहैया होगा और कोशिश होगी रामराज की तर्ज पर व्यवस्था बन सके।
3. सबसे पहले छोटी अवधि वाले काम को प्राथमिकता देनी होगी, जैसे - गाँव की सफाई और हराभरा बनाने का काम, स्कूल और आंगनबाड़ी में गाँव के 100 फीसदी बच्चों का नामांकन, सबको स्वास्थ्य सुविधायें आदि।
4. हर गाँव अपना जन्म दिन मनायेगा, जिसमें गाँव से बाहर रह रहे किसी व्यक्ति को बुलाकर उसका सम्मान किया जायेगा।
5. गाँव के बुर्जुगों का भी सम्मान हो, गाँव में कोई स्वतन्त्रता संग्राम सेनानी या शहीद हो उसके बारे में बच्चों को जागरूक किया जाये।
कार्यकाल -
1. तीन चरणों में आदर्श गाँव बनाने के लिए कार्य किए जायेंगे। छोटी अवधि वाले कामों को तीन महीने, मध्यम अवधि वाले काम एक साल में पूरे करने होंगे, वहीं लम्बी अवधि वाले कामों के लिए एक साल से अधिक समय रहेगा।
कार्यपद्धति -
1. ग्राम विकास से जुड़ी सभी योजनाऐं, इस गाँव में लाई जायेंगी।
2. सांसदों और जनता की स्पष्ट भूमिका होगी, कोई बिचैलिया नहीं होगा।
जिम्मेदारी -
1. इस योजना को अमल में लाने की जवाबदेही उस सांसद की होगी, जिसने उस गाँव का चयन किया है।
निगरानी -
1. देश भर में वर्कशाप आयोजित की जायेंगी, जिसमें खुद प्रधानमन्त्री सांसदो, अधिकारियों और पंचायत प्रतिनिधियों से वीडियो कान्फ्रेन्सिंग से बात करेंगे।
चुनौतियांँ -
1. सांसदों को अपनी योग्यता, योजना कुशलता व कार्यक्षमता सिद्ध करने का अवसर है।
2. राज्यों के सामने चुनौती है कि उनके भी अपने राज्य में विधायकों के लिए विधायक आदर्श ग्राम योेजना बनाई जाये, जिससे अतिरिक्त 6-7 हजार गाँव आदर्श गाँव बन सकें।
3. गाँव के निवासियों को योजना का सहभागी बनाना और उस कार्य को अपना समझना एक बड़ी चुनौती है।
पेशकश -
1. कारपोरेट जगत।, 2. स्वयंयेवी संस्थायें। ु

मनुज प्रत्येक स्वच्छ भारत बनाता हो। - यानन्द जडि़या ‘अबोध’


स्वच्छता सदैव सर्वश्रेष्ठ है समाज मध्य,
हर सन्त, ग्रन्थ सत्य तथ्य नित्य गाता है।
तन, मन, सदन, चमन, हाट, बाट, पथ,
सभी साफ रहे, ज्ञान ज्ञाता बतलाता है।
स्वच्छता सदैव प्रफुल्लित करे तन, मन,
सुन्दर सुस्वास्थ्य की सफाई प्रदाता है।
साफ रहने व रखने की ही प्रवृत्ति बने,
यही वृत्ति गांँव, पुर भारत-सृजाता है।।(1)

सलिल सदैव सर सरिता का स्वच्छ रहे,
जलचर, थलचर, खग सुख पाते हैं।
तन की सुस्वच्छता से, सुन्दर सुस्वस्थ रहें,
रोग दोष दुख दूर भागते दिखाते हैं।
सज्जित सुस्वच्छ हो सदन सभी सज्जनों का,
स्वागत अतिथि सुर सम पाते हैं।
मंजु मन-मन्दिर मनोरम हो मानव का,
ममता ले माया पति महिमा दिखाते हैं।।(2)

आंँगन सदन द्वार, पथ सब साफ रहे,
पर्यावरण स्वच्छ स्वास्थ्य उपजाता है।
कूड़ा कचड़ा न दिखाई पड़े पथ पर,
मनुज प्रत्येक स्वच्छ भारत बनाता हो।
हाट, बाट, गली, कूचा, सर, सरितादि, वन,
साफ हो प्रत्येक थल, स्र्वग सम भाता है।
कीजिए सफाई खुद, मुख अन्य का न देख,
सपनों का भारत, अबोध छबि पाता है।।(3)
- चन्द्रा-मण्डप, 370/27 हाता नूरवेग,
संगम लाल वीथिका, सअसदतगंज,
लखनऊ-226003