कितनी ही बार हमसे कहा जाता है कि अतीत की ओर नजर डालने से केवल मन की अवनति होती है और इससे कोई फल प्राप्त नहीं होता, अतः हमें भविष्य की ओर दृष्टि रखनी चाहिए। यह सच है। लेकिन हमें एक और बात समझ लेनी चाहिए कि अतीत से ही भविष्य का निर्माण होता है। अतः जहां तक हो सके अतीत की ओर देखो। पीछे जो चिरंतन निर्झर बह रहा है, आकंठ उसका जल पियो और उसके बाद सामने देखो और फिर अपने साथ-साथ देश को उज्वलतर, महत्तर और पहले से भी और भी ऊँचा उठाओ।
हमारे पूर्वज महान थे। पहले हमें यह बात याद करनी होगी। हमें समझना होगा कि हम किन उपादानों से बने हैं। कौन सा खून हमारी नसों में बह रहा है। उस खून पर हमें विश्वास करना होगा और अतीत के उस कृतित्व पर भी। इस विश्वास और अतीत के गौरव ज्ञान से हम अवश्य एक ऐसे भारत की नींव डालेंगे, जो पहले से श्रेष्ठ होगा।
अवश्य ही यहाँ बीच-बीच में दुर्दशा और अवनति के युग भी रहे हैं, पर मैं उनको अधिक महत्व नहीं देता। हम सभी उनके विषय में जानते हैं। ऐसे युगों का होना आवश्यक था। किसी विशाल वृक्ष पर एक सुन्दर फल पका, जमीन पर गिरा, मुरझाया और सड़ा। इस विनाश में जो अंकुर उगा, सम्भव है वह पहले के वृक्ष से बड़ा हो जाये।
अवनति के जिस गुण भीतर से हमें गुजरना पड़ा, वे सभी आवश्यक थे। इसी अवनति के भीतर से भविष्य का उज्जवलतम् भारत आ रहा है। - स्वामी विवेकानन्द
हमारे पूर्वज महान थे। पहले हमें यह बात याद करनी होगी। हमें समझना होगा कि हम किन उपादानों से बने हैं। कौन सा खून हमारी नसों में बह रहा है। उस खून पर हमें विश्वास करना होगा और अतीत के उस कृतित्व पर भी। इस विश्वास और अतीत के गौरव ज्ञान से हम अवश्य एक ऐसे भारत की नींव डालेंगे, जो पहले से श्रेष्ठ होगा।
अवश्य ही यहाँ बीच-बीच में दुर्दशा और अवनति के युग भी रहे हैं, पर मैं उनको अधिक महत्व नहीं देता। हम सभी उनके विषय में जानते हैं। ऐसे युगों का होना आवश्यक था। किसी विशाल वृक्ष पर एक सुन्दर फल पका, जमीन पर गिरा, मुरझाया और सड़ा। इस विनाश में जो अंकुर उगा, सम्भव है वह पहले के वृक्ष से बड़ा हो जाये।
अवनति के जिस गुण भीतर से हमें गुजरना पड़ा, वे सभी आवश्यक थे। इसी अवनति के भीतर से भविष्य का उज्जवलतम् भारत आ रहा है। - स्वामी विवेकानन्द






